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इस्लामिक देश ईरान में नहीं मिटी हिंदू आस्था, पढ़ें- बंदर अब्बास के 134 साल पुराने भगवान विष्णु के मंदिर की दास्ताँ

इस मंदिर के निर्माण के पीछे भारतीय व्यापारियों की सामूहिक आस्था और एकजुटता की कहानी छिपी है। उस समय भारत से आए व्यापारी आर्थिक रूप से संपन्न थे और उन्होंने मिलकर चंदा इकट्ठा कर इस मंदिर का निर्माण कराया। माना जाता है कि यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित था।

एक इस्लामिक राष्ट्र ईरान के बंदर अब्बास में समुद्र किनारे हिंदुओं की जीवंत संस्कृति विरासत 130 से भी ज्यादा वर्षों से खड़ी है। बंदर अब्बास का यह अनोखा हिंदू मंदिर सिर्फ पत्थरों की संरचना नहीं बल्कि उन भारतीय व्यापारियों की जीवटता की कहानी है जिन्होंने समुद्र पार जाकर भी अपनी संस्कृति को मिटने नहीं दिया। यह मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि प्रवास, व्यापार, आस्था और सांस्कृतिक मेल-जोल का जीवंत प्रतीक है जो यह दिखाता है कि किस तरह हिंदू अपनी जड़ों से जुड़े रहते हैं, चाहे वे दुनिया के किसी भी कोने में क्यों न बस जाएँ।

समुद्री व्यापार से जन्मी आस्था की कहानी

बंदर अब्बास ऐतिहासिक रूप से एक महत्वपूर्ण समुद्री बंदरगाह रहा है, जो फारस की खाड़ी के व्यापारिक नेटवर्क का प्रमुख केंद्र था। पुराने समय में भारत और ईरान के बीच समुद्री व्यापार काफी विकसित था और इसी वजह से भारतीय व्यापारी बड़ी संख्या में यहाँ आते-जाते थे।

खासतौर पर गुजरात, कच्छ और सिंध के व्यापारी इस इलाके में सक्रिय थे। व्यापार के सिलसिले में उनका यहाँ लंबे समय तक ठहराव होने लगा और धीरे-धीरे कई लोग यहीं बस गए। विदेशी जमीन पर रहने के बावजूद उन्होंने अपनी संस्कृति, भाषा और धार्मिक परंपराओं को जीवित रखा। इसी जरूरत ने उन्हें एक ऐसे स्थान के निर्माण के लिए प्रेरित किया, जहाँ वे पूजा-पाठ कर सकें और अपने सामुदायिक जीवन को बनाए रख सकें।

130 साल पुराना इतिहास आज भी जिंदा

इस मंदिर का निर्माण 19वीं सदी के अंतिम वर्षों में लगभग 1892 के आसपास हुआ था जो उस समय के हिसाब से एक बड़ा सांस्कृतिक कदम था। यह वह दौर था जब बंदर अब्बास व्यापारिक गतिविधियों के कारण तेजी से विकसित हो रहा था और भारतीय समुदाय भी यहाँ मजबूत स्थिति में था।

(फोटो साभार: sindhrenaissance)

लगभग 130 से 134 साल पुराना यह मंदिर आज भी अपनी मूल संरचना के साथ खड़ा है और उस समय की सामाजिक और धार्मिक जीवनशैली की झलक दिखाता है। इसके निर्माण में उस दौर के स्थानीय शासक मोहम्मद हसन खान साद-ओल-मलेक के शासनकाल का भी जिक्र मिलता है, जो इस क्षेत्र के प्रशासनिक प्रमुख थे।

भारतीय व्यापारियों की आस्था और सामूहिक प्रयास

इस मंदिर के निर्माण के पीछे भारतीय व्यापारियों की सामूहिक आस्था और एकजुटता की कहानी छिपी है। उस समय भारत से आए व्यापारी आर्थिक रूप से संपन्न थे और उन्होंने मिलकर चंदा इकट्ठा कर इस मंदिर का निर्माण कराया। माना जाता है कि यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित था, जो हिंदू धर्म में पालनकर्ता और रक्षक के रूप में पूजे जाते हैं।

इस मंदिर ने वहाँ बसे भारतीयों को एक आध्यात्मिक आधार दिया, जहाँ वे अपने धार्मिक अनुष्ठान कर सकते थे और अपने त्योहार मना सकते थे। यह स्थान उनके लिए घर से दूर एक ‘छोटा भारत’ बन गया था।

वास्तुकला में भारत-ईरान का अद्भुत संगम

इस मंदिर की संरचना इसे विशेष बनाती है। इसका मुख्य कक्ष चौकोर आकार में है, जिसके ऊपर एक बड़ा और आकर्षक गुंबद बना हुआ है। यह गुंबद पारंपरिक भारतीय मंदिरों से अलग है और इसमें फारसी एवं इस्लामी स्थापत्य शैली का प्रभाव दिखाई देता है, जो इसे एक अनोखा रूप देता है।

निर्माण में मूंगा पत्थर, मिट्टी, गारा और चूने का इस्तेमाल किया गया, जो स्थानीय संसाधनों को दर्शाता है। मंदिर के गुंबद पर छोटे-छोटे अलंकरण और मीनारनुमा संरचनाएँ भी बताई जाती हैं, जो भारतीय शैली की याद दिलाती हैं। अंदर की दीवारों पर कभी रंगीन चित्रकारी और धार्मिक प्रतीकों की सजावट हुआ करती थी।

मरम्मत के दौरान यहाँ भगवान कृष्ण की एक चित्रकारी भी सामने आई, जो इस बात का प्रमाण है कि यहाँ केवल पूजा ही नहीं, बल्कि धार्मिक कला और परंपराओं को भी संजोया गया था।

पूजा से विरासत बनने तक का सफर

एक समय यह मंदिर धार्मिक गतिविधियों का केंद्र हुआ करता था। यहाँ नियमित रूप से पूजा, आरती और धार्मिक अनुष्ठान होते थे। जन्माष्टमी, दीवाली जैसे त्योहारों पर भारतीय समुदाय बड़ी संख्या में यहाँ इकट्ठा होता था और मंदिर का वातावरण पूरी तरह उत्सवमय हो जाता था।

इसके अलावा यह स्थान सामाजिक मेल-जोल का भी केंद्र था, जहाँ लोग एक-दूसरे से मिलते, अपनी समस्याएँ साझा करते और सामुदायिक जीवन को मजबूत बनाते थे। लेकिन 20वीं सदी के मध्य में परिस्थितियाँ बदलने लगीं। व्यापार के स्वरूप में बदलाव आया और कई भारतीय व्यापारी वापस अपने देश लौट गए।

इसके बाद मंदिर की गतिविधियाँ धीरे-धीरे कम होती गईं और अंततः यह एक शांत ऐतिहासिक स्थल बनकर रह गया। आज यह मंदिर सक्रिय पूजा स्थल नहीं है लेकिन इसे ईरान की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में संरक्षित किया गया है और राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा भी मिला हुआ है। अब यह पर्यटकों और इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए एक महत्वपूर्ण आकर्षण है।

ईरान में हिंदू समुदाय की मौजूदगी

ईरान की कुल आबादी लगभग 9 करोड़ के आसपास मानी जाती है, जिसमें करीब 99.40 प्रतिशत लोग इस्लामी मजहब का पालन करते हैं। इनमें लगभग 89.46 प्रतिशत शिया और करीब 9.94 प्रतिशत सुन्नी मुस्लिम शामिल हैं। ईसाई, यहूदी और अन्य छोटे समुदायों के साथ-साथ हिंदू समुदाय भी यहाँ रहता है।

Pew Research Center की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2010 में ईरान में करीब 20 हजार हिंदू रहते थे और 2020 तक भी यह संख्या लगभग स्थिर बनी रही। इनमें अधिकतर भारतीय मूल के व्यापारी, कामगार और उनके परिवार शामिल हैं। भले ही संख्या कम हो लेकिन इनकी सांस्कृतिक उपस्थिति ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण रही है, जिसका प्रमाण बंदर अब्बास का यह मंदिर है।

बंदर अब्बास का यह हिंदू मंदिर यह बताता है कि धर्म और संस्कृति की कोई सीमाएँ नहीं होतीं और हिंदू जहाँ भी जाते हैं वो अपनी पहचान को साथ लेकर चलते हैं।

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सौम्या सिंह
सौम्या सिंह
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