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जो कॉन्ग्रेस विधायक विनय कुलकर्णी अब भाजपा नेता की हत्या मामले में हुआ दोषी करार, उसने ऑपइंडिया को धमकाने के लिए भेजे थे 12 ईमेल: पढ़िए डिटेल और जानिए क्या था पूरा मामला

कुलकर्णी का दावा था कि उनके खिलाफ छप रही खबरों से उनके सालों के करियर और साख को नुकसान पहुँच रहा है। इसी वजह से उन्होंने एक कंपनी को अपनी 'ऑनलाइन इमेज' सुधारने की जिम्मेदारी दी। इसी कंपनी ने 'ऑपइंडिया' को ईमेल भेजकर 24 घंटे के अंदर तीन लेख (Articles) हटाने की चेतावनी दी थी।

बेंगलुरु की एक विशेष अदालत ने 15 अप्रैल 2026 को कॉन्ग्रेस विधायक विनय राजशेखरप्पा कुलकर्णी और उनके साथियों को बीजेपी नेता योगेश गौड़ा की हत्या का दोषी करार दिया है। यह हत्या साल 2016 में हुई थी। सीबीआई (CBI) की ओर से पेश हुए वकील ने दोषियों के लिए कड़ी से कड़ी सजा की माँग की है, जिस पर फैसला 17 अप्रैल 2026 को सुनाया जाएगा।

हैरानी की बात यह है कि पिछले कुछ महीनों से कुलकर्णी की एक ‘ब्रांड प्रोटेक्शन’ टीम मीडिया संस्थान ‘ऑपइंडिया’ पर दबाव बना रही थी। जून 2025 से अब तक करीब 12 ईमेल भेजकर ऑपइंडिया को धमकाया गया कि वे कुलकर्णी के आपराधिक मामलों से जुड़ी खबरें हटा लें। विधायक के प्रतिनिधियों ने उन खबरों को भी हटाने का दबाव बनाया जो अदालती फैसलों पर आधारित थीं।

हत्या की साजिश में कुलकर्णी दोषी करार

बेंगलुरु की विशेष अदालत ने कॉन्ग्रेस विधायक विनय कुलकर्णी और उनके साथियों को 2016 के हत्या मामले में आपराधिक साजिश का दोषी पाया है। कुलकर्णी, जो वर्तमान में कर्नाटक शहरी जल आपूर्ति बोर्ड के अध्यक्ष हैं, इस केस में 15वें आरोपित थे। साल 2020 में सीबीआई (CBI) द्वारा जाँच हाथ में लेने के बाद चली लंबी सुनवाई के बाद यह फैसला आया है।

पावर का गलत इस्तेमाल और बेरहमी

CBI के वकील ने कोर्ट में बताया कि यह एक ठंडे दिमाग से रची गई साजिश थी, जिसका मकसद राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी योगेश गौड़ा को खत्म करना था। उन्होंने आरोप लगाया कि कुलकर्णी ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए पुलिस मशीनरी का गलत इस्तेमाल किया, फर्जी दस्तावेज बनवाए और सबूत मिटाने की कोशिश की।

बेरहमी से ली गई जान

कोर्ट को बताया गया कि योगेश गौड़ा की हत्या बेहद बेरहमी से की गई थी। हमलावरों ने पहले उनकी आँखों में लाल मिर्च पाउडर फेंका और फिर उनकी जान ले ली। सरकारी वकील ने इस बात पर जोर दिया कि एक विधायक होने के नाते कुलकर्णी की भूमिका बेहद गंभीर है, क्योंकि उन्होंने कानून की रक्षा करने के बजाय खुद अपराध की साजिश रची।

सरकारी गवाह को सता रहा पछतावा

इस मामले में आरोपित से सरकारी गवाह बने बसवराज मुत्तगी ने मीडिया से बात करते हुए अपना दर्द साझा किया। उन्होंने कहा कि साजिश में अपनी भूमिका को लेकर वे ग्लानि और पछतावे में जी रहे हैं। मुत्तगी के मुताबिक, उनकी असली कानूनी लड़ाई और संघर्ष तो अब शुरू होगा।

17 आरोपित दोषी, कुछ को मिली राहत

सीबीआई ने इस लंबे समय से चल रहे केस में कुल 21 लोगों को आरोपित बनाया था, जिनमें से कोर्ट ने 17 को दोषी करार दिया है। दो आरोपित सरकारी गवाह बन गए थे, जबकि दो अन्य को कोर्ट ने रिहा करने का आदेश दिया है। वहीं, एक सरकारी गवाह के मुकर जाने पर CBI ने उसे फिर से आरोपित बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

खबरें हटवाने के लिए मीडिया को धमकी

जाँच में यह भी सामने आया कि कुलकर्णी की ‘ऑनलाइन साख’ बचाने के लिए एक ‘ब्रांड प्रोटेक्शन’ कंपनी ने मीडिया संस्थान ‘ऑपइंडिया’ को धमकाया था। जून 2025 में भेजे गए ईमेल में कंपनी ने कुलकर्णी का एक लेटर दिखाया, जिसमें विधायक ने दावा किया था कि कुछ लोग उनकी छवि खराब करने की कोशिश कर रहे हैं। इस कंपनी के जरिए कुलकर्णी अदालती फैसलों पर आधारित खबरों को भी इंटरनेट से हटवाने का दबाव बना रहे थे।

स्रोत: ऑपइंडिया

कुलकर्णी का दावा था कि उनके खिलाफ छप रही खबरों से उनके सालों के करियर और साख को नुकसान पहुँच रहा है। इसी वजह से उन्होंने एक कंपनी को अपनी ‘ऑनलाइन इमेज’ सुधारने की जिम्मेदारी दी। उन्होंने कंपनी को अधिकार दिया कि वह इंटरनेट पर उनके खिलाफ चल रही अफवाहों, फेक न्यूज और गलत बयानों को हटाए और कोर्ट के आदेशों को लागू करवाए।

इसी कंपनी ने ‘ऑपइंडिया’ को ईमेल भेजकर 24 घंटे के अंदर तीन लेख (Articles) हटाने की चेतावनी दी। साथ ही कोर्ट के कुछ आदेशों की कॉपी भी भेजी। जब ऑपइंडिया ने उन आदेशों की जाँच की, तो पाया कि उनका इस कानूनी मामले से कोई लेना-देना ही नहीं था। दिलचस्प बात यह है कि यह ईमेल किसी कानूनी फर्म के बजाय एक ‘ब्रांड प्रोटेक्शन’ कंपनी की तरफ से आया था, इसलिए संस्थान ने खबरें हटाने से इनकार कर दिया।

ईमेल में साफ तौर पर कहा गया था कि अगर खबरें नहीं हटाई गईं, तो उनके पास ऑपइंडिया के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा। विधायक की टीम इन खबरों को पूरी तरह मिटाना चाहती थी, ताकि कुलकर्णी की छवि पर कोई आँच न आए।

सोर्स: ऑपइंडिया

25 जून को कंपनी ने दोबारा ईमेल भेजकर 24 घंटे में खबरें हटाने को कहा। इसके बाद जुलाई और अगस्त के बीच लगातार 10 बार रिमाइंडर्स भेजे गए। गौर करने वाली बात यह है कि 22 जुलाई के बाद से कंपनी ने केवल एक ही लेख को हटाने पर जोर दिया, जबकि बाकी दो लेखों को लेकर उनकी आपत्ति अचानक खत्म होती दिखी।

खबरें हटाने की इस माँग का आधार कर्नाटक हाई कोर्ट का एक आदेश था। उस आदेश में कोर्ट ने यूट्यूब, फेसबुक और एक्स (X) जैसे प्लेटफॉर्म्स को कुलकर्णी के खिलाफ अपमानजनक सामग्री हटाने को कहा था। इस केस में गृह मंत्रालय और पुलिस को भी शामिल किया गया था। लेकिन जब ऑपइंडिया ने कानूनी कागजात देखे, तो पता चला कि कोर्ट ने उन्हें कोई आदेश नहीं दिया था। कंपनी उस अदालती आदेश का गलत इस्तेमाल करके एक ऐसे संस्थान से खबरें हटवाना चाहती थी, जिसका उस केस से कोई सीधा ताल्लुक ही नहीं था।

क्या था योगेश गौड़ा मर्डर केस?

योगेश गौड़ा धारवाड़ से बीजेपी नेता और जिला पंचायत सदस्य थे। 15 जून 2016 को उनकी जिम में घुसकर बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। शुरुआत में स्थानीय पुलिस ने जाँच की, लेकिन योगेश के भाई ने सीबीआई (CBI) जाँच की माँग की। राज्य में बीजेपी की सरकार आने के बाद यह केस 2019 में सीबीआई को सौंप दिया गया। जाँच के बाद सीबीआई ने इस मामले में कॉन्ग्रेस नेता विनय कुलकर्णी को मुख्य साजिशकर्ताओं में शामिल पाया और नवंबर 2020 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

सीबीआई के मुताबिक, इस हत्या के पीछे राजनीतिक दुश्मनी थी। कुलकर्णी ने योगेश को चुनाव न लड़ने की चेतावनी दी थी, जिसे योगेश ने नहीं माना। जाँच में सामने आया कि हत्या के वक्त अपनी मौजूदगी छिपाने के लिए कुलकर्णी ने दिल्ली की यात्रा का बहाना (Alibi) बनाया था। वे मर्डर से ठीक पहले और ठीक बाद में दिल्ली गए थे, जिसके टिकट उसी दिन बुक किए गए थे। कोर्ट में बताया गया कि यह सब सोची-समझी प्लानिंग का हिस्सा था।

कुलकर्णी को 2021 में जमानत मिली थी, लेकिन जून 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने उसे रद्द कर दिया। कोर्ट ने माना कि कुलकर्णी गवाहों को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे थे। सुनवाई के दौरान जस्टिस पीवी संजय कुमार ने बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि कुलकर्णी और केस के मुख्य आरोपित के बीच 5 महीनों में 57 बार फोन पर बातचीत हुई थी। कोर्ट ने यहाँ तक कहा कि आरोपित ने मृतक की विधवा को भी अपने पक्ष में ‘खरीद’ लिया था। जब कुलकर्णी के वकील ने केस खत्म करने की याचिका वापस लेनी चाही, तो जज ने नाराजगी जताते हुए कहा कि कोर्ट को ‘जुआघर’ बना दिया गया है।

(ये रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है। अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

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Anurag
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Anurag is a Chief Sub Editor at OpIndia with over twenty one years of professional experience, including more than five years in journalism. He is known for deep dive, research driven reporting on national security, terrorism cases, judiciary and governance, backed by RTIs, court records and on-ground evidence. He also writes hard hitting op-eds that challenge distorted narratives. Beyond investigations, he explores history, fiction and visual storytelling. Email: [email protected]

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