मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अपने फैसले में उपलब्ध पुरातात्विक और ऐतिहासिक तथ्यों, ASI की सर्वे रिपोर्ट और कानूनी प्रावधानों को आधार बनाते हुए भोजशाला को माँ वाग्देवी यानी सरस्वती से जुड़ा एक हिंदू धार्मिक स्थल माना है।
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में हिंदुओं को पूजा का अधिकार दिया है। इसके साथ ही हाई कोर्ट ने सरकार को ये निर्देश भी दिए हैं वो लंदन से भोजशाला की माँ वाग्देवी की मूर्ति लाने का प्रयास करें। अब सबसे बड़ा सवाल है कि वाग्देवी की वह प्रतिमा, जिसे भोजशाला की आत्मा माना जाता है वह भारत से निकलकर लंदन तक कैसे पहुँच गई?
राजा भोज और भोजशाला: माँ वाग्देवी और भोजशाला की आध्यात्मिक पहचान
धार की भोजशाला को हिंदू समाज माता सरस्वती के मंदिर और प्राचीन विश्वविद्यालय के रूप में देखता है। ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, इसकी स्थापना 11वीं शताब्दी में परमार वंश के महान शासक राजा भोज ने की थी। राजा भोज केवल एक शक्तिशाली शासक ही नहीं, बल्कि शिक्षा, साहित्य, दर्शन, आयुर्वेद, खगोल विज्ञान और संस्कृत के बड़े संरक्षक माने जाते हैं।
उस समय धार उनकी राजधानी थी और भोजशाला ज्ञान तथा शिक्षा का प्रमुख केंद्र हुआ करती थी। यहाँ दूर-दूर से विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करने आते थे और संगीत, संस्कृत, योग, दर्शन, व्याकरण, ज्योतिष तथा आयुर्वेद जैसे विषय पढ़ाए जाते थे। हिंदू पक्ष का दावा है कि यह स्थान केवल पूजा का स्थल नहीं था, बल्कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा का जीवंत प्रतीक था।
भोजशाला परिसर में आज भी ऐसे कई शिलालेख, नक्काशीदार स्तंभ और स्थापत्य अवशेष मौजूद हैं, जिनमें संस्कृत, प्राकृत और प्राचीन नागरी लिपि के चिन्ह दिखाई देते हैं। कई अभिलेखों में ‘ॐ नमः शिवाय’, ‘ॐ सरस्वत्यै नमः’ और परमार राजाओं की प्रशंसा का उल्लेख मिलने का दावा किया गया है।
इसी व्यवस्था के भीतर माँ सरस्वती या वाग्देवी की उपासना का उल्लेख मिलता है, जिन्हें ज्ञान और वाणी की देवी माना जाता है। इसी कारण भोजशाला को ज्ञान और आस्था दोनों का संगम माना गया। भोजशाला से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण बात इसकी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान है, जो माँ वाग्देवी की परंपरा से जुड़ी हुई बताई जाती है।
वाग्देवी यानी सरस्वती को भारतीय संस्कृति में ज्ञान, शिक्षा, संगीत और वाणी की देवी माना जाता है। मान्यता के अनुसार, भोजशाला में एक विशेष वाग्देवी प्रतिमा स्थापित थी, जो पूरे शिक्षा केंद्र का आध्यात्मिक केंद्र बिंदु थी। यह प्रतिमा केवल पूजा की वस्तु नहीं थी, बल्कि उस समय की सांस्कृतिक चेतना और ज्ञान परंपरा का प्रतीक थी।
यहाँ शिक्षा और भक्ति एक साथ चलते थे। छात्र ज्ञान प्राप्त करने से पहले माँ सरस्वती का आशीर्वाद लेते थे और यही परंपरा भोजशाला की पहचान बन गई।
इतिहास के उतार-चढ़ाव और भोजशाला का बदला स्वरूप
भोजशाला पर कई बार इस्लामी आक्रमण हुए। दावा किया जाता है कि 1269 में कमाल मौलाना नाम का एक मुस्लिम फकीर मालवा पहुँचा और बाद में यहाँ इस्लामी प्रभाव बढ़ने लगा। इसके बाद 1305 में अलाउद्दीन खिलजी ने मालवा पर हमला किया और भोजशाला को भारी नुकसान पहुँचाया।
हिंदू पक्ष का दावा है कि उस समय यहाँ अध्ययन कर रहे 1200 से अधिक छात्रों और शिक्षकों को बंदी बनाया गया और इस्लाम स्वीकार करने से इनकार करने पर उनकी हत्या कर दी गई। इसके बाद 1401 में दिलावर खान ने परिसर के एक हिस्से को दरगाह में बदलने का प्रयास किया।
फिर 1514 में महमूद शाह ने भोजशाला परिसर पर कब्जा मजबूत करने की कोशिश की और कमाल मौला मकबरे का विस्तार किया। हिंदू पक्ष का कहना है कि इन्हीं घटनाओं के आधार पर बाद में इसे मस्जिद और दरगाह बताया जाने लगा। बाद में मेदनी राय ने मुस्लिम शासकों के खिलाफ युद्ध कर क्षेत्र पर दोबारा नियंत्रण स्थापित किया।
1703 में मालवा पर मराठों का अधिकार हो गया और मुस्लिम शासन समाप्त हुआ। इसके बाद अंग्रेजों का शासन आया।
प्रतिमा की विशेषताएँ: परमार काल की कला और शिल्प का उदाहरण
वाग्देवी की यह प्रतिमा परमार काल की उच्च स्तरीय मूर्तिकला का उदाहरण मानी जाती है, जिसे लगभग 11वीं सदी का बताया जाता है। यह प्रतिमा सफेद पत्थर (स्टोन स्कल्पचर) से बनी एक विस्तृत और संतुलित शिल्पकृति है, जिसमें देवी को पारंपरिक स्वरूप में चार भुजाओं के साथ दर्शाया गया है। प्रतिमा में भारतीय मध्यकालीन कला की बारीकी साफ दिखाई देती है।
चेहरे की शांत अभिव्यक्ति, आभूषणों की नक्काशी और शरीर की संतुलित मुद्रा इसे उस दौर की विशिष्ट मूर्तिकला परंपरा से जोड़ती है। ब्रिटिश म्यूजियम के रिकॉर्ड में इस प्रतिमा की पहचान को लेकर भिन्नता भी देखने को मिलती है। कहीं इसे वाग्देवी कहा गया है तो कहीं अम्बिका (जैन परंपरा की देवी) के रूप में दर्ज किया गया है।
लंदन कैसे पहुँची: 1875 की खोज और औपनिवेशिक दौर की भूमिका
इस प्रतिमा का आधुनिक इतिहास 1875 के आसपास ब्रिटिश काल से शुरू होता है। मुगलों के आक्रमण के बाद खंडित हुई इस प्रतिमा को अंग्रेजों ने खुदाई कर 1875 में निकाला था। इसके बाद 117 साल से प्रतिमा लंदन में ही है। साल 1880 में भोपावर के ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट मेजर किनकेड इस कीमती मूर्ति को अपने साथ समेटकर इंग्लैंड ले गए थे।

उन्होंने उस समय क्षेत्र में पुरातात्विक गतिविधियों में भूमिका निभाई थी। उस दौर में भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था और पुरातात्विक महत्व की वस्तुओं को अक्सर ‘study’, ‘preservation’ या ‘collection’ के नाम पर बाहर भेज दिया जाता था। कई बार इन वस्तुओं का स्वामित्व स्पष्ट नहीं होता था और वे औपनिवेशिक संग्रहालयों तक पहुँच जाती थीं।
इसी प्रक्रिया के तहत यह प्रतिमा भी भारत से ब्रिटेन ले जाई गई और बाद में लंदन के संग्रहालय संग्रह का हिस्सा बन गई। समय के साथ यह ब्रिटिश म्यूजियम में भारतीय कला और मध्यकालीन मूर्तिकला के एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में दर्ज हुई।
लंदन के म्यूजियम में वर्तमान स्थिति
आज यह प्रतिमा लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम ग्रेट रसल स्ट्रीट में संरक्षित बताई जाती है। इसे संग्रहालय के एशियन आर्ट सेक्शन में रखा गया है, जहाँ भारत और एशिया से संबंधित सैकड़ों प्राचीन मूर्तियाँ और कलाकृतियाँ मौजूद हैं। यह प्रतिमा 7 से 8 फीट उँचे एक सुरक्षित काँच के डिस्प्ले केस में रखी गई है और इसे आम लोग भी देख सकते हैं।
म्यूजियम में इसे मध्यकालीन भारतीय मूर्तिकला के एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में प्रदर्शित किया गया है। हालाँकि इसकी पहचान को लेकर अलग-अलग विवरण मिलते हैं। भारत में इसे स्पष्ट रूप से माँ सरस्वती या वाग्देवी के रूप में पूजा और सम्मान दिया जाता है, जबकि संग्रहालय इसे एक ऐतिहासिक कलाकृति के रूप में वर्गीकृत करता है।
भारत वापसी की संभावना और प्रक्रिया
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने प्रतिमा की वापसी को लेकर बड़ा संकेत देते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, “माँ वाग्देवी की प्रतिमा को UK से भारत वापस लाने के संबंध में केंद्र सरकार को विचार करने का निर्देश स्वागतयोग्य है। इस दिशा में राज्य सरकार भी आवश्यक प्रयास करेगी।”
माननीय उच्च न्यायालय द्वारा धार की ऐतिहासिक भोजशाला को संरक्षित स्मारक एवं मां वाग्देवी की आराधना स्थली मानते हुए दिया गया निर्णय हमारी सांस्कृतिक विरासत, आस्था और इतिहास के सम्मान का महत्वपूर्ण क्षण है।
— Dr Mohan Yadav (@DrMohanYadav51) May 15, 2026
ASI के संरक्षण एवं प्रबंधन में भोजशाला की गरिमा और अधिक सुदृढ़ होगी तथा…
उन्होंने आगे लिखा, “हमारी संस्कृति सदैव टसर्वधर्म समभावट, सामाजिक समरसता और भाईचारे की वाहक रही है। हम न्यायालय के निर्णय का पूर्ण सम्मान करते हैं और प्रदेश में सौहार्द, सांस्कृतिक गौरव एवं सामाजिक सद्भाव को और अधिक सशक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।”
भारत सरकार इस मुद्दे को ब्रिटेन के सामने UNESCO के 1970 कन्वेंशन का संदर्भ देकर आधिकारिक स्तर पर उठा सकती है। इस अंतरराष्ट्रीय समझौते के अनुसार किसी भी देश से अवैध या बिना अनुमति के बाहर ले जाई गई सांस्कृतिक धरोहरों को उनके मूल देश को वापस लौटाने पर जोर दिया जाता है।
हालाँकि इस प्रक्रिया में कई व्यावहारिक अड़चनें भी हैं, क्योंकि ब्रिटेन का ‘British Museum Act 1963’ बहुत सख्त नियमों के तहत काम करता है, जो सामान्य परिस्थितियों में संग्रहालय की वस्तुओं को स्थायी रूप से देश से बाहर भेजने पर रोक लगाता है।
इसके बावजूद उम्मीद इसलिए बनी हुई है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने कूटनीतिक बातचीत और कानूनी प्रक्रियाओं के जरिए दुनिया के अलग-अलग देशों से अपनी कई प्राचीन मूर्तियाँ और सांस्कृतिक धरोहरें सफलतापूर्वक वापस हासिल की हैं। मोदी सरकार के नेतृत्व में कई देशों से औपनिवेशिक काल की मूर्तियाँ और सांस्कृतिक धरोहरें वापस लाई जा चुकी हैं।


