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ट्रंप को अमेरिका की ही अदालत ने दिया झटका, H-1B Visa पर 1 लाख डॉलर वसूलने के फैसले को ‘अवैध’ बता रद किया: जानिए इससे किसको होगा फायदा

ट्रंप को झटका देते हुए जज लियो सोरोकिन ने आदेश में कहा, "अमेरिकी संविधान के तहत देश में किसी भी प्रकार का नया टैक्स लगाने की शक्ति केवल और केवल अमेरिकी कॉन्ग्रेस (संसद) के पास सुरक्षित है, राष्ट्रपति अकेले ऐसा नहीं कर सकते।"

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की सख्त अप्रवासन नीतियों को न्यायपालिका से एक और बड़ा झटका लगा है। मैसाचुसेट्स के एक फेडरल कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस बेहद विवादास्पद फैसले को पूरी तरह खारिज कर दिया है, जिसके तहत नए H-1B वीजा आवेदनों पर $100,000 (करीब 95 लाख रुपए) की भारी-भरकम सालाना फीस लगाने का ऐलान किया गया था। इस अदालती फैसले को अमेरिकी कंपनियों, विश्वविद्यालयों, अस्पतालों और विशेष रूप से भारतीय आईटी पेशेवरों के लिए एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक राहत माना जा रहा है।

बोस्टन के अमेरिकी जिला जज (US District Judge) लियो सोरोकिन ने सोमवार (8 जून, 2026) को इस नीति को पूरी तरह से ‘गैरकानूनी’ (Unlawful) करार देते हुए रद्द करने का आदेश दिया। कोर्ट ने अपने 42 पन्नों के फैसले में स्पष्ट किया कि व्हाइट हाउस के पास अमेरिकी संसद (कॉन्ग्रेस) की मंजूरी के बिना अपने स्तर पर इस तरह का कोई भी भारी टैक्स या फीस थोपने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है।

जज सोरोकिन ने अपने आदेश में क्या कहा?

अदालत ने अपने फैसले में साफ तौर पर कहा कि भले ही इस राशि को ‘नियामक भुगतान’ या ‘फीस’ का नाम दिया गया हो, लेकिन इसके पीछे का असल मकसद और इसका प्रभाव एक अनधिकृत टैक्स (Unauthorised Tax) की तरह है। जज सोरोकिन ने लिखा कि अमेरिकी संविधान के मुताबिक देश में किसी भी तरह का टैक्स लगाने का विशेष अधिकार सिर्फ और सिर्फ अमेरिकी कॉन्ग्रेस (संसद) के पास सुरक्षित है, राष्ट्रपति इसे अपनी मर्जी से अकेले लागू नहीं कर सकते।

इसके साथ ही अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि ट्रंप प्रशासन इस नीति को लागू करने से पहले देश के उन महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर पड़ने वाले असर का सही आकलन करने में विफल रहा जो पहले से ही श्रम की भारी कमी से जूझ रहे हैं। यह नियम देश के स्वास्थ्य क्षेत्र, उच्च शिक्षण संस्थानों और ग्रामीण इलाकों को बुरी तरह प्रभावित कर रहा था, जहाँ डॉक्टरों, नर्सों और योग्य शिक्षकों की कमी को पूरा करने के लिए विदेशी पेशेवरों की मदद ली जाती है।

यह कानूनी चुनौती कैलिफोर्निया समेत 20 ऐसे अमेरिकी राज्यों के कड़े विरोध के बाद सामने आई थी, जहाँ डेमोक्रेटिक पार्टी के नेतृत्व वाली सरकारें हैं। इन राज्यों के अटॉर्नी जनरल ने अदालत में दलील दी थी कि राष्ट्रपति ने इस नीति के जरिए ‘इमिग्रेशन एंड नेशनलिटी एक्ट’ के तहत मिले अपने कानूनी दायरे का खुलेआम उल्लंघन किया है। उनका तर्क था कि इतनी भारी फीस से राज्य की अर्थव्यवस्थाओं, यूनिवर्सिटीज और स्टार्टअप्स को गंभीर नुकसान पहुँच रहा था।

ट्रंप सरकार का क्या था तर्क और फीस का पुराना ढाँचा?

डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले साल सितंबर 2025 में एक राष्ट्रपति उद्घोषणा (Presidential Proclamation) के जरिए इस $100,000 की भारी फीस की घोषणा की थी। यह उनकी ‘बाय अमेरिकन, हायर अमेरिकन’ नीति और कानूनी अप्रवासन पर कड़े प्रतिबंध लगाने के अभियान का हिस्सा था। ट्रंप प्रशासन का दावा था कि इस कड़े कदम से अमेरिकी कंपनियाँ विदेशों से सस्ते श्रम को बुलाने के बजाय स्थानीय अमेरिकी नागरिकों को नौकरियों पर रखने के लिए मजबूर होंगी और इस कार्यक्रम के दुरुपयोग पर रोक लगेगी।

इस नए नियम के आने से पहले का ढांचा बेहद अलग और किफायती था। अमेरिकी नियोक्ताओं (Employers) को एक सामान्य H-1B वीजा आवेदन के लिए सरकारी फाइलिंग फीस के रूप में आमतौर पर केवल $2,000 से $5,000 (लगभग 1.6 लाख से 4.2 लाख रुपये) के बीच ही भुगतान करना होता था। ट्रंप सरकार ने इसे अचानक 20 से 50 गुना तक बढ़ा दिया, जिससे छोटे और मध्यम आकार की कंपनियों के लिए विदेशी टैलेंट को काम पर रखना पूरी तरह से नामुमकिन हो गया था।

व्हाइट हाउस के अधिकारी और कॉमर्स सेक्रेटरी हावर्ड लुटनिक लगातार यह दलील दे रहे थे कि अगर बड़ी टेक कंपनियों को वास्तव में वैश्विक प्रतिभाओं की इतनी ही आवश्यकता है, तो वे इतनी कीमत चुकाने में सक्षम हैं। ट्रंप प्रशासन का आरोप था कि H-1B कार्यक्रम का बड़े पैमाने पर शोषण करके अमेरिकी कामगारों को कम वेतन वाले विदेशी कर्मचारियों से बदला जा रहा है, जिससे अमेरिकी नागरिकों के लिए रोजगार के बाजार में असमानता पैदा हो रही थी।

टेक कंपनियों और आईटी उद्योग पर अब क्या पड़ेगा फर्क?

फेडरल कोर्ट के इस फैसले से सिलिकॉन वैली और वैश्विक तकनीकी उद्योग ने राहत की सांस ली है। अमेज़न, माइक्रोसॉफ्ट, और मेटा जैसी दिग्गज अमेरिकी टेक कंपनियाँ हर साल हजारों की संख्या में कुशल पेशेवरों को H-1B वीजा के जरिए अपने साथ जोड़ती हैं। अकेले 2025 की पहली छमाही में ही अमेज़न के लिए 10,000 से अधिक और माइक्रोसॉफ्ट व मेटा के लिए 5-5 हजार से ज्यादा वीजा स्वीकृत किए गए थे। ऐसे में इस भारी फीस के हटने से इन कंपनियों पर पड़ने वाला अरबों डॉलर का वित्तीय बोझ टल गया है।

न्यायालय के इस आदेश से बाजार में अनिश्चितता का माहौल खत्म होगा और कुशल पेशेवरों की नियुक्ति की प्रक्रिया में एक बार फिर पारदर्शिता और स्थिरता आएगी। इमिग्रेशन एडवोकेसी ग्रुप (FWD.us) के अनुसार, इस अत्यधिक शुल्क ने अमेरिकी रोजगार और मजदूरी के विकास को गंभीर नुकसान पहुँचाया था। अब कंपनियों के लिए वैश्विक स्तर पर उपलब्ध बेहतरीन टैलेंट को बिना किसी भारी वित्तीय जुर्माने के अपने साथ जोड़ना और अमेरिकी नवाचार (Innovation) की रफ्तार को बनाए रखना संभव हो सकेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला न केवल बड़ी कंपनियों, बल्कि अमेरिका के उन छोटे स्टार्टअप्स और अकादमिक संस्थानों के लिए जीवनदान साबित होगा, जो $100,000 की फीस का खर्च वहन करने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे। स्टैनफोर्ड, यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन और यूनिवर्सिटी ऑफ फ्लोरिडा जैसे प्रमुख संस्थान जो हर साल सैकड़ों विदेशी शोधकर्ताओं और प्रोफेसरों को अपने यहाँ लाते हैं, अब बिना किसी आर्थिक संकट के अपनी रिसर्च को आगे बढ़ा सकेंगे।

अमेरिका में कंपनियों से अब तक कितनी हुई थी वसूली?

अदालत के दस्तावेजों और ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट से सामने आए आँकड़े यह बताते हैं कि ट्रंप प्रशासन की यह नीति कितनी व्यावहारिक रूप से विफल साबित हुई थी। $100,000 की भारी-भरकम राशि के डर से अमेरिकी नियोक्ताओं ने नए कर्मचारियों के लिए आवेदन करना लगभग बंद ही कर दिया था। भारी माँग वाले इस वीजा कार्यक्रम में आवेदन करने की दर ऐतिहासिक रूप से गिर गई थी।

आधिकारिक कोर्ट फाइलिंग के अनुसार, यह नियम लागू होने के बाद से लेकर मध्य फरवरी (2026) तक अमेरिकी नागरिकता और अप्रवासन सेवा (USCIS) को देश भर की कंपनियों से इस भारी फीस के रूप में केवल 85 भुगतान (85 Payments) ही प्राप्त हुए थे। इसका सीधा मतलब यह है कि अमेरिका ने कंपनियों से इस योजना के तहत केवल $8.5 मिलियन (लगभग 71 करोड़ रुपए) की ही कुल वसूली की थी, जो यह दिखाता है कि कंपनियों ने विदेशी पेशेवरों को बुलाने के बजाय अपने हाथ पूरी तरह पीछे खींच लिए थे।

यह मामूली संख्या साफ करती है कि इस नीति ने रोजगार बढ़ाने के बजाय योग्य श्रम की आवक को पूरी तरह से ठप कर दिया था। केवल कुछ बहुत ही संपन्न और बेहद जरूरी मामलों वाली कंपनियों ने ही यह भारी रकम चुकाई, जबकि बाकी सभी नियोक्ताओं ने अदालत के अंतिम फैसले का इंतजार करना या नई नियुक्तियों को टालना ही बेहतर समझा।

भारतीयों को इस फैसले से क्या होगा फायदा?

H-1B वीजा कार्यक्रम कुशल विदेशी पेशेवरों के लिए अमेरिका में काम करने का सबसे लोकप्रिय और महत्वपूर्ण जरिया है, जो विशेष रूप से टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, हेल्थकेयर और फाइनेंस जैसे क्षेत्रों के लिए जारी किया जाता है। अमेरिका हर साल कुल 65,000 सामान्य H-1B वीजा जारी करता है, जबकि अमेरिकी विश्वविद्यालयों से मास्टर या पीएचडी जैसी एडवांस डिग्री हासिल करने वाले छात्रों के लिए 20,000 का अतिरिक्त कोटा आरक्षित होता है।

इस पूरे कार्यक्रम में भारतीय प्रोफेशनल्स का दबदबा जगजाहिर है। हर साल जारी होने वाले कुल H-1B वीजा में से लगभग 70 फीसदी हिस्सा अकेले भारतीय नागरिकों के खाते में जाता है। यही वजह है कि ट्रंप के इस फैसले से भारत का आईटी सेक्टर और वहाँ जाने का सपना देख रहे हजारों युवा सबसे ज्यादा चिंतित थे।

फीस रद्द होने का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि भारतीय इंजीनियरों और टेक विशेषज्ञों के लिए अमेरिकी कंपनियों में नौकरी पाने के रास्ते में खड़ा हुआ सबसे बड़ा वित्तीय रोड़ा अब हट गया है।

वर्तमान में अमेरिका के भीतर लगभग 7,30,000 H-1B वीजा धारक रह रहे हैं, जिनके साथ उनके करीब 5,50,000 आश्रित (पति/पत्नी और बच्चे) भी वहाँ मौजूद हैं।

हालाँकि भारतीय पेशेवरों के लिए एक चिंता का विषय यह भी है कि अमेरिकी जाँच एजेंसियाँ भारत से गलत या फर्जी तरीकों से वीजा हासिल करके अमेरिका आने वाले कुछ संदिग्ध मामलों की कड़ाई से जाँच कर रही हैं। लेकिन वैध और उच्च कुशल भारतीय पेशेवरों के लिए फेडरल कोर्ट का यह फैसला उनकी नौकरी की सुरक्षा और नए अवसरों के लिहाज से एक बड़ी जीत है।

ट्रंप प्रशासन के पास अब भी कानूनी लड़ाई का रास्ता, फिलहाल वसूली रुकी

जज सोरोकिन के इस फैसले ने भले ही इस विवादास्पद फीस पर देशव्यापी रोक लगा दी हो, लेकिन इस मामले में कानूनी लड़ाई अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। इस नीति को लेकर अमेरिकी न्यायपालिका में एक दिलचस्प कानूनी विभाजन (Legal Split) की स्थिति बन गई है। इससे पहले वॉशिंगटन की एक अन्य फेडरल कोर्ट ने यूएस चैंबर ऑफ कॉमर्स द्वारा दायर एक अलग मुकदमे में ट्रंप सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया था, जिसे बाद में ऊपरी अदालत में चुनौती दी गई थी।

व्हाइट हाउस की प्रवक्ता टेलर रोजर्स ने अदालती आदेश पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि ट्रंप प्रशासन को पूरा भरोसा है कि ऊपरी अदालत में अपील करने पर इस फैसले को पलट दिया जाएगा। प्रशासन का तर्क है कि राष्ट्रपति के पास देश के हितों की रक्षा के लिए किसी भी श्रेणी के विदेशियों के प्रवेश को प्रतिबंधित करने का स्पष्ट संवैधानिक अधिकार है।

कानूनी विशेषज्ञों और अप्रवासन वकीलों (Immigration Lawyers) को पूरी उम्मीद है कि ट्रंप प्रशासन इस फैसले के खिलाफ ‘यूएस कोर्ट ऑफ अपील्स फॉर द फर्स्ट सर्किट’ का दरवाजा खटखटाएगा। सरकार कोर्ट से यह माँग भी कर सकती है कि जब तक यह मुकदमा उच्च न्यायालयों में लंबित है, तब तक इस फीस को अंतरिम रूप से लागू रहने की अनुमति दी जाए। ऐसे में आने वाले हफ्तों में यह मामला अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुँच सकता है, लेकिन फिलहाल के लिए कंपनियों को इस भारी टैक्स से पूरी तरह मुक्ति मिल गई है।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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