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पश्चिम बंगाल में CBI को जाँच की खूली छूट, BJP सरकार ने दिया ‘जनरल कंसेंट’: 8 साल पहले ममता बनर्जी ने लिया था वापस, जानिए सबकुछ

पश्चिम बंगाल में एक अहम कदम उठाते हुए शुभेंदु सरकार ने CBI जाँच के लिए राज्य की 'जनरल कंसेंट' बहाल कर दी है। पिछली TMC सरकार ने आठ साल पहल इस पर रोक लगा दी थी। इससे ममता सरकार में हुए भ्रष्टाचार और भर्ती घोटालों की जाँच में तेजी आने की उम्मीद है।

पश्चिम बंगाल में ममता काल के भ्रष्टाचार को खत्म करने की दिशा में अहम कदम उठाया गया है। 8 जून 2026 को पश्चिम बंगाल की बीजेपी सरकार ने CBI के लिए ‘सामान्य सहमति’ (General Consent) बहाल कर दी। राज्य ने दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना (DSPE) अधिनियम 1946 की धारा 6 के तहत यह अधिसूचना जारी की है, जिससे सीबीआई केंद्र सरकार के कर्मचारियों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के मामलों की राज्य में बिना किसी बाधा के जाँच कर सकेगी।

यह अधिसूचना जारी होने के बाद से सीबीआई को केंद्रीय मामलों की जाँच के लिए हर बार राज्य सरकार की विशेष अनुमति लेने की आवश्यकता समाप्त हो गई। हालाँकि राज्य सरकार के कर्मचारियों से जुड़े मामलों में जाँच शुरू करने से पहले राज्य की लिखित अनुमति लेना अनिवार्य है। यह निर्णय करीब 8 साल बाद लिया गया है, क्योंकि नवंबर 2018 में तत्कालीन टीएमसी सरकार ने केंद्रीय एजेंसियों के कथित दुरुपयोग का हवाला देते हुए ‘सामान्य सहमति’ वापस ले ली थी।

8 साल बाद बहाल हुई ‘जनरल कंसेंट’

सामान्य स्वीकृति की बहाली से सीबीआई को पश्चिम बंगाल में केंद्र सरकार के कर्मचारियों, केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (सीपीएसयू) के साथ-साथ निजी व्यक्तियों के अपराध की जाँच सीबीआई कर सकेगी। इसके लिए हर मामले को लेकर अनुमोदन की आवश्यकता नहीं होगी।

पश्चिम बंगाल सरकार के गृह एवं पर्वतीय मामलों के विभाग द्वारा जारी अधिसूचना के मुताबिक, दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट (DSPE) एक्ट, 1946 के सेक्शन 6 के तहत, पश्चिम बंगाल सरकार “सेंट्रल गवर्नमेंट, सेंट्रल पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स और प्राइवेट लोगों (चाहे वे अलग-अलग काम कर रहे हों या सेंट्रल गवर्नमेंट और सेंट्रल गवर्नमेंट अंडरटेकिंग्स के कर्मचारियों के साथ मिलकर काम कर रहे हों) के अपराधों की जाँच के लिए राज्य में दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट (CBI) के सदस्यों की शक्तियों और अधिकार क्षेत्र को बढ़ाने के लिए अपनी सहमति देती है।”

हालाँकि अधिसूचना में एक शर्त का उल्लेख किया गया है। जनरल कंसेंट बहाल होने के बावजूद, पश्चिम बंगाल राज्य के लोक सेवकों के खिलाफ जाँच के लिए अभी भी राज्य की अनुमति आवश्यक है।

अधिसूचना में कहा गया है, “पश्चिम बंगाल राज्य सरकार के नियंत्रण में आने वाले लोक सेवकों से संबंधित मामलों में राज्य सरकार की लिखित अनुमति के बिना ऐसी कोई जाँच नहीं की जाएगी। राज्य सरकार द्वारा अन्य किसी भी अपराध के लिए पहले दी गई सभी सामान्य सहमति और मामले-दर-मामले आधार पर दी गई सहमति भी लागू रहेगी।”

‘जनरल कंसेंट’ बहाल करने का मकसद टीएमसी काल के कई घोटालों में अधिकारियों पर मुकदमा चलाने के लिए सीबीआई को खास स्वीकृति देने के तुरंत बाद लिया गया। ये स्वीकृति शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार ने दी है।

सीबीआई के लिए राज्य सरकार की जनरल कंसेंट बहाल होने से केंद्रीय जाँच एजेंसी लंबित मामलों पर कार्रवाई में तेजी ला पाएगी, जवाबदेही में सुधार होगा और केंद्र-राज्य संबंधों को मजबूत करने में मदद मिलेगी।

ममता बनर्जी ने 2018 में सीबीआई के लिए ‘जनरल कंसेंट’ क्यों रद्द की?

नवंबर 2018 में तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी सरकार ने ‘जनरल कंसेंट’ वापस ले लिया था। ममता सरकार का दावा था कि सीबीआई- ईडी सहित अन्य केंद्रीय जाँच एजेंसियों को भाजपा सरकार विपक्षी दलों वाली राज्य सरकार के खिलाफ ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ के लिए ‘हथियार’ के रूप में इस्तेमाल कर रही है।

भ्रष्टाचार और लचर कानून व्यवस्था वाली टीएमसी सरकार, अपने नेताओं पर एक के बाद एक घोटाले के खुलासे को लेकर हो रहे एक्शन से परेशान थी। केन्द्रीय एजेंसियों के कसते शिकंजे पर लगाम लगाने के लिए टीएमसी सरकार ने यह कदम उठाया था। उस वक्त कोयला घोटाला, पशु तस्करी घोटाला, शिक्षकों की भर्ती घोटाला, सहकारी समिति घोटाला, नगरपालिकाओं में नौकरी के बदले नकद घोटाला, शारदा चिट फंड घोटाला और दूसरे भ्रष्टाचार के मामले सामने आए थे, जिस पर एक्शन हो रहा था।

ममता बनर्जी ने मुख्यमंत्री के रूप में मिली ताकत का दुरुपयोग किया। उन्होंने भ्रष्टाचार के आरोपित अपनी पार्टी नेताओं को बचाने के लिए सीबीआई सहित दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान के सदस्यों की जनरल कंसेंट वापस ले ली। यह मूल रूप से केंद्रीय जाँच एजेंसियों द्वारा की जा रही जाँच में राजनीतिक हस्तक्षेप का एक उदाहरण था, जिसे ‘फेडरलिज्म पर हमले’ के आड़ में छिपाया जा रहा था।

जनरल कंसेंट वापस ले लिए जाने के बाद, सीबीआई को बार-बार मामले-दर-मामले अनुमति लेनी पड़ी, जिससे कई मामलों में कार्रवाई में देरी हुई। यहाँ तक ​​कि टीएमसी सरकार ने सीबीआई के अधिकार क्षेत्र को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में ममता सरकार के अलावा, मेघालय, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, मिजोरम, कर्नाटक, झारखंड, महाराष्ट्र, पंजाब और केरल में भी हाल ही में ‘जनरल कंसेंट’ वापस लेने के मामले सामने आए हैं। इन राज्यों में सामान्य स्वीकृति रद्द करने की अधिसूचनाएँ तब जारी की गईं जब विपक्षी दल सत्ता में थे।

पश्चिम बंगाल ने आंध्र प्रदेश के तुरंत बाद 2018 में सीबीआई को दी गई सहमति वापस ले ली। कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली छत्तीसगढ़ सरकार ने जनवरी 2019 में ऐसा ही किया। कॉन्ग्रेस शासित राजस्थान सरकार ने जुलाई 2020 में ‘जनरल कंसेंट’ रद्द कर दी। आम आदमी पार्टी शासित पंजाब ने नवंबर 2020 में ऐसा किया। शिवसेना-कॉन्ग्रेस-एनसीपी सरकार ने अक्टूबर 2020 में ऐसा ही किया। कॉन्ग्रेस शासित कर्नाटक ने सितंबर 2024 में ‘जनरल कंसेंट’ वापस ले ली ।

लगभग सभी मामलों में, सीबीआई को दी गई ‘जनरल कंसेंट’ ठीक उसी समय वापस ले ली गई, जब एजेंसी इन राज्यों में घोटालों और अन्य अनियमितताओं की जाँच कर रही थी।

शुभेंदु अधिकारी सरकार टीएमसी काल की व्यवस्थागत खामियों को ठीक करने में जुटी

मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी एक के बाद एक ऐसे कदम उठा रहे हैं, जिनका उद्देश्य जवाबदेही बहाल करना और टीएमसी काल के दौरान हुए व्यवस्थागत भ्रष्टाचार को दूर करना है। इस साल मई में, भाजपा सरकार ने शिक्षक भर्ती घोटाला, नगर निगम भर्ती घोटाला और सहकारी घोटाला मामलों में अभियोजन की अनुमति दी , जिसकी जाँच में ममता सरकार बाधा बनी।

6 जून 2026 को, मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने 2019 में सीएए विरोधी दंगों की जाँच का आदेश दिया। ये दंगे मुस्लिम भीड़ ने किए गए थे और राज्य में भारतीय रेलवे को करीब 93 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था।

मुख्यमंत्री अधिकारी ने डीजीपी सिद्ध नाथ गुप्ता के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल पुलिस को नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ 2019 के विरोध प्रदर्शनों के दौरान आगजनी, तोड़फोड़ और सार्वजनिक संपत्ति, विशेष रूप से रेलवे संपत्तियों को नुकसान पहुँचाने की सभी शिकायतों की समीक्षा करने और जाँच करने का निर्देश दिया।

पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार ने संस्थागत भ्रष्टाचार और महिलाओं के खिलाफ अत्याचारों की जाँच के लिए 18 मई को सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों से मिलकर दो जाँच आयोगों का गठन किया । इन जाँच आयोगों ने 1 जून 2026 से अपना काम शुरू किया।

इससे पहले मुख्यमंत्री अधिकारी ने 2024 के आरजी कर मेडिकल कॉलेज बलात्कार और हत्या मामले में लापरवाही बरतने के आरोप में तीन आईपीएस अधिकारियों को निलंबित कर दिया था।

पुलिस और नौकरशाही के राजनीतिकरण से लेकर, जड़ जमा चुके भ्रष्टाचार के नेटवर्क और कैडर आधारित राजनीति तक, शुभेंदु सरकार टीएमसी शासन के कुकर्मों की जाँच और निवारण के लिए कदम उठा रही है। ‘जनरल कंसेंट’ की बहाली इस दिशा में एक और सकारात्मक कदम है।

(मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है, इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

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Shraddha Pandey
Shraddha Pandey
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