अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) एक बार फिर सुर्खियों में है लेकिन इस बार वजह कोई बड़ा वैज्ञानिक प्रयोग या नई खोज नहीं बल्कि एक ऐसा तकनीकी संकट है जिसने अंतरिक्ष एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी। ISS में लगातार बढ़ रहे एयर लीक ने हालात इतने गंभीर कर दिए कि NASA को एहतियातन कुछ अंतरिक्ष यात्रियों को ‘सेफ हेवन’ में भेजना पड़ा और आपातकालीन निकासी तक की तैयारी करनी पड़ी।
हालाँकि स्थिति बाद में नियंत्रण में आ गई लेकिन इस घटना ने दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे महँगी अंतरिक्ष प्रयोगशाला की बढ़ती उम्र, उसकी सुरक्षा और अंतरिक्ष मिशनों के भविष्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ISS पृथ्वी से लगभग 400 किलोमीटर ऊपर परिक्रमा करने वाली मानव निर्मित सबसे बड़ी अंतरिक्ष प्रयोगशाला है। यहाँ अंतरिक्ष यात्री रहते हैं और वैज्ञानिक प्रयोग करते हैं। यह करीब 28000 km/h की रफ्तार से चलता है और हर 90 मिनट में पृथ्वी का एक चक्कर पूरा करता है। इसका पहला मॉड्यूल 1998 में लॉन्च किया गया था और तब से यह लगातार सक्रिय है।
अमेरिका, रूस, यूरोप, जापान और कनाडा सहित कई देशों की साझेदारी से चल रहा यह स्टेशन पिछले करीब तीन दशकों से अंतरिक्ष अनुसंधान का केंद्र बना हुआ है। यहाँ वैज्ञानिक माइक्रोग्रैविटी में ट्रीटमेंट, बायोलॉजी, फिजिक्स, कृषि और स्पेस टेक्नोलॉजी से जुड़े प्रयोग करते हैं।
स्टेशन का आकार लगभग एक फुटबॉल मैदान जितना है और यह मानव उपस्थिति वाला अंतरिक्ष में सबसे बड़ा ठिकाना माना जाता है।
आखिर कहाँ से हो रहा है एयर लीक?
मौजूदा समस्या ISS के रूसी हिस्से में मौजूद ज्वेज्दा (Zvezda) सर्विस मॉड्यूल के भीतर स्थित PrK ट्रांसफर टनल से जुड़ी हुई है। यह टनल एक डॉकिंग पोर्ट को मुख्य मॉड्यूल से जोड़ती है। सितंबर 2019 में पहली बार यहाँ दबाव में कमी दर्ज की गई थी। जाँच में पता चला कि इस हिस्से में छोटी दरारें मौजूद हैं जिनसे धीरे-धीरे हवा बाहर निकल रही है।
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— International Space Station (@Space_Station) June 5, 2026
तब से रोस्कोस्मोस इस समस्या को दूर करने के लिए कई बार अस्थायी और स्थायी सीलेंट का इस्तेमाल कर चुका है। हालाँकि हर मरम्मत के बाद कुछ समय के लिए स्थिति बेहतर हुई लेकिन रिसाव पूरी तरह बंद नहीं हो सका। पिछले कई वर्षों में यह समस्या बार-बार सामने आती रही और अब इसे स्टेशन की सबसे बड़ी तकनीकी चुनौतियों में गिना जा रहा है।
हाल में क्यों बढ़ गई चिंता?
जून 2026 के पहले सप्ताह में प्रोग्रेस-95 कार्गो यान के संचालन के दौरान रोस्कोस्मोस इंजीनियरों ने पाया कि स्थिति पहले की तुलना में अधिक गंभीर हो चुकी है। पहले जहाँ हर दिन लगभग एक पाउंड हवा का नुकसान हो रहा था, वहीं अब यह बढ़कर करीब दो पाउंड प्रतिदिन तक पहुँच गया।
इसके अलावा इंजीनियरों को PrK टनल में कुछ नए संदिग्ध क्षेत्र भी मिले, जहाँ से हवा के रिसाव की आशंका जताई गई। यही वजह थी कि रूसी अंतरिक्ष एजेंसी ने सामान्य पैचवर्क मरम्मत की बजाय अधिक व्यापक निरीक्षण और संरचनात्मक मरम्मत की योजना बनाई।
बढ़ती रिसाव दर ने NASA और रोस्कोस्मोस दोनों को सतर्क कर दिया क्योंकि लगातार दबाव में कमी स्टेशन की दीर्घकालिक सुरक्षा के लिए चिंता का विषय बन सकती है।
मरम्मत के दौरान क्यों अलर्ट पर आया पूरा स्टेशन?
लीकेज के सोर्स तक बेहतर पहुँच बनाने के लिए रोस्कोस्मोस ने एक विशेष मेटल ब्रैकेट को काटने की योजना तैयार की थी। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, रूसी कॉस्मोनॉट्स एक आरी (Saw) की मदद से उस हिस्से तक पहुँचने वाले थे जहाँ उन्हें दरार होने की आशंका थी।
NASA को चिंता थी कि इस प्रक्रिया से आसपास की स्ट्रक्चर को नुकसान पहुँच सकता है और स्थिति और खराब हो सकती है। इसी वजह से अमेरिकी मिशन कंट्रोल ने एहतियातन पाँच अंतरिक्ष यात्रियों को ‘सेफ हेवन‘ प्रक्रिया अपनाने का निर्देश दिया। इसके तहत उन्हें स्पेस एक्स ड्रैगन अंतरिक्ष यान में जाकर बैठने के लिए कहा गया, ताकि यदि कोई आपात स्थिति पैदा हो तो वे तुरंत स्टेशन छोड़ सकें।

यह स्थिति लगभग दो घंटे तक बनी रही। बाद में जब रोस्कोस्मोस ने मरम्मत कार्य रोकने और अतिरिक्त जाँच करने का फैसला किया तो NASA ने भी राहत की साँस ली और अंतरिक्ष यात्रियों को वापस सामान्य कार्यों पर लौटने की अनुमति दे दी।
किन अंतरिक्ष यात्रियों को भेजा गया था सेफ हेवन में?
NASA के निर्देश के बाद क्रू-12 मिशन के चार सदस्यों और NASA के एक अन्य अंतरिक्ष यात्री को ड्रैगन कैप्सूल में जाने के लिए कहा गया। इनमें NASA की जेसिका मीर, जैक हैथवे, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी की सोफी एडेनॉट, रोस्कोस्मोस के आंद्रेई फेड्यायेव और NASA के क्रिस विलियम्स शामिल थे।
दूसरी ओर रूसी कॉस्मोनॉट्स सर्गेई कुड-स्वेर्चकोव और सर्गेई मिकायेव स्टेशन पर ही रहे और संभावित मरम्मत अभियान की तैयारियों में जुटे रहे। ड्रैगन कैप्सूल इस दौरान एक लाइफबोट की तरह तैयार रखा गया था, जो जरूरत पड़ने पर कुछ ही मिनटों में स्टेशन से अलग होकर पृथ्वी की ओर रवाना हो सकता था।
NASA और रोस्कोस्मोस के बीच कहाँ है मतभेद?
ISS में एयर लीक को लेकर दोनों एजेंसियों के बीच लंबे समय से नजरिए का अंतर देखा गया है। NASA का मानना है कि समस्या की वास्तविक जड़ अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है और किसी भी बड़े स्ट्रक्चरल इन्वेन्शन से पहले अधिक डेटा जुटाना जरूरी है।
दूसरी ओर रोस्कोस्मोस अपेक्षाकृत आक्रामक मरम्मत रणनीति अपनाने के पक्ष में दिखाई देता है। यही वजह थी कि जब रूसी एजेंसी ने स्ट्रक्चर को काटकर अंदर तक पहुँचने की योजना बनाई तो NASA ने इस पर आपत्ति जताई।
2024 में NASA के इंस्पेक्टर जनरल की रिपोर्ट में भी यह उल्लेख किया गया था कि दोनों एजेंसियाँ इस बात पर भी पूरी तरह सहमत नहीं हैं कि किस स्तर पर पहुँचकर इस रिसाव को अस्थिर या अस्वीकार्य माना जाए।
हालाँकि मौजूदा मामले में रोस्कोस्मोस द्वारा मरम्मत कार्य रोकने के फैसले का NASA ने समर्थन किया और दोनों एजेंसियों ने संयुक्त रूप से आगे की जाँच जारी रखने पर सहमति जताई।
फिलहाल स्थिति क्या है?
रोस्कोस्मोस के अनुसार हालिया निरीक्षण के दौरान दो संभावित रिसाव बिंदुओं की पहचान की गई थी। इनमें से एक को सफलतापूर्वक सील कर दिया गया है, जबकि दूसरे क्षेत्र की जाँच जारी है। साथ ही उन सभी स्थानों का पुनः निरीक्षण किया जा रहा है जहाँ पहले सीलेंट लगाए गए थे।
NASA ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल ड्राइवर ग्रुप की सुरक्षा को कोई तत्काल खतरा नहीं है। सभी अंतरिक्ष यात्री सामान्य कार्यों पर लौट चुके हैं और वैज्ञानिक गतिविधियाँ पहले की तरह जारी हैं। फिर भी एजेंसियाँ इस समस्या को पूरी तरह समाप्त करने के लिए दीर्घकालिक समाधान तलाश रही हैं।
क्या ISS को खाली कराने की नौबत आ सकती है?
ISS के 27 वर्षों के ऑपरेशनल हिस्ट्री में अब तक कभी पूरी तरह से निकालने की आवश्यकता नहीं पड़ी है। हालाँकि अंतरिक्ष मलबे के खतरे या तकनीकी समस्याओं के दौरान कई बार सेफ हेवन प्रक्रिया लागू की गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा एयर लीक चिंता का विषय जरूर है, लेकिन फिलहाल यह उस स्तर तक नहीं पहुँचा है जहाँ पूरे स्टेशन को खाली कराना पड़े। फिर भी यदि रिसाव लगातार बढ़ता रहा और प्रभावी समाधान नहीं मिला तो भविष्य में स्टेशन के कुछ हिस्सों को स्थायी रूप से बंद करने जैसे विकल्पों पर विचार किया जा सकता है।
ISS पर इस समय कौन-कौन से वैज्ञानिक प्रयोग चल रहे हैं?
तकनीकी चुनौतियों के बावजूद ISS पर वैज्ञानिक अनुसंधान लगातार जारी हैं। हाल के दिनों में अंतरिक्ष यात्री 3D बायोप्रिंटिंग के जरिए मानव कार्टिलेज ऊतक तैयार करने, स्टेम सेल अनुसंधान, माइक्रोबायोलॉजी प्रयोग और अंतरिक्ष में पौधों की वृद्धि से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं।
इसके अलावा अल्फाल्फा फसलों की खेती, मानव शरीर पर माइक्रोग्रैविटी के प्रभावों का अध्ययन और लंबी अवधि के अंतरिक्ष अभियानों के लिए हेल्थ से जुड़े रिसर्च भी जारी हैं। इन प्रयोगों का उद्देश्य भविष्य में चंद्रमा और मंगल जैसे मिशनों के लिए आवश्यक वैज्ञानिक आधार तैयार करना है।
ISS पर कितना खर्च हुआ, कौन देता है पैसा और क्यों माना जाता है दुनिया का सबसे महँगा वैज्ञानिक प्रोजेक्ट?
ISS को मानव इतिहास की सबसे महंगी वैज्ञानिक और इंजीनियरिंग परियोजनाओं में गिना जाता है। जब 1998 में इसका निर्माण शुरू हुआ था, तब इसकी लागत का अनुमान काफी कम था, लेकिन समय के साथ नए मॉड्यूल जोड़ने, अंतरिक्ष यात्रियों के मिशन, कार्गो उड़ानों, रखरखाव और चलाने में लगने वाले खर्चों के कारण इसकी कुल लागत लगातार बढ़ती गई।
यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) के अनुसार, ISS के विकास, निर्माण, असेंबली और शुरुआती वर्षों के संचालन पर लगभग 100 अरब यूरो (करीब 10 लाख करोड़ रुपए) खर्च हुए थे।
वहीं बाद के वर्षों में इसको चलाने और रखरखाव लागत जुड़ने के बाद अलग-अलग अंतरिक्ष एजेंसियों के अनुमान बताते हैं कि ISS पर अब तक कुल खर्च 150 से 170 अरब डॉलर (करीब 12.5 से 14 लाख करोड़ रुपए) के बीच पहुँच चुका है। इसी वजह से इसे दुनिया की सबसे महँगी मानव निर्मित संरचनाओं में शामिल किया जाता है।
ISS किसी एक देश की संपत्ति नहीं है बल्कि यह एक अंतरराष्ट्रीय साझेदारी परियोजना है। इसके प्रमुख साझेदार अमेरिका (NASA), रूस (रोस्कोस्मोस), यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA), जापान (JAXA) और कनाडा (CSA) हैं।
इनमें सबसे बड़ा वित्तीय योगदान अमेरिका का है। NASA न केवल स्टेशन के अधिकांश ऑपरेशन का खर्च उठाता है, बल्कि हर साल इसके रखरखाव, रिसर्च और क्रू तथा कार्गो मिशनों पर अरबों डॉलर खर्च करता है। NASA के लिए अकेले ISS का सालाना ऑपरेशन का खर्च लगभग 3 अरब डॉलर माना जाता है।
रूस ने भी ISS के निर्माण और ऑपरेशन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। रूसी अंतरिक्ष निगम एनर्जिया के अनुसार, 1994 से 2023 के बीच रूस ने ISS कार्यक्रम में लगभग 14.2 अरब डॉलर (करीब 1.36 लाख करोड़ रुपए) का निवेश किया है। वहीं ESA, जापान और कनाडा ने अपने-अपने मॉड्यूल, वैज्ञानिक उपकरणों और तकनीकी संसाधनों के जरिए अरबों डॉलर का योगदान दिया है।
विशेषज्ञों के मुताबिक ISS पर हुआ खर्च केवल अंतरिक्ष स्टेशन बनाने तक सीमित नहीं है। इसमें अंतरिक्ष में मॉड्यूल पहुँचाने के लिए किए गए दर्जनों स्पेस शटल मिशन, लगातार होने वाली सप्लाई उड़ानें, वैज्ञानिक प्रयोग, ग्राउंड कंट्रोल नेटवर्क और अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा व प्रशिक्षण जैसी लागतें भी शामिल हैं। यही कारण है कि लगभग तीन दशक बाद भी यह परियोजना दुनिया के सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग के उदाहरणों में गिनी जाती है।
कब तक सेवा में रहेगा ISS?
NASA फिलहाल ISS को 2030 तक चलने की योजना पर काम कर रहा है। इसके बाद स्टेशन को नियंत्रित तरीके से पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कराकर नष्ट कर दिया जाएगा। हालाँकि अमेरिका की कॉन्ग्रेस में एक विधेयक पर चर्चा चल रही है जिसके तहत ISS को 2032 तक चलाने की बात कही जा रही है।
इस प्रस्ताव को अमेरिकी सीनेट के कई वरिष्ठ नेताओं का समर्थन प्राप्त है। उनका मानना है कि निजी अंतरिक्ष स्टेशनों के पूरी तरह तैयार होने तक ISS को सक्रिय रखना जरूरी है। साथ ही यह कदम अंतरिक्ष क्षेत्र में चीन की बढ़ती मौजूदगी के मुकाबले अमेरिका की स्थिति मजबूत बनाए रखने में भी मदद कर सकता है।


