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‘वीडियो बनाकर फैसला वापस लो’: दाऊदी बोहरा विवाद में पूर्व जस्टिस के परिवार को मिल रहीं श्मशान की धमकियाँ, लंदन में बेटी पर हमला; विस्तार से जानें- उत्तराधिकार का वो मामला

पूर्व जस्टिस गौतम पटेल ने बताया कि खुद को दाऊदी बोहरा समुदाय के प्रभावशाली लोगों का समूह बताने वाले कुछ लोगों ने उनसे फैसला वापस लेने की माँग की। उनसे कहा गया कि वे भारत से बाहर जाकर एक यूट्यूब वीडियो जारी करें, जिसमें यह स्वीकार करें कि उन्होंने दबाव या किसी प्रलोभन के कारण गलत फैसला दिया था।

बॉम्बे हाई कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस गौतम सिंह पटेल और उनके परिवार को 2024 में दाऊदी बोहरा समुदाय के एक उत्तराधिकार विवाद में दिए गए उनके फैसले के कारण पिछले करीब 10 महीनों से लगातार धमकियों और जानलेवा हमलों का सामना करना पड़ रहा है। स्थिति इंतनी गंभीर हो गई कि लंदन में रहने वाली उनकी बेटी के घर पर हमला भी किया गया। पूर्व जस्टिस से माँग की जा रही है कि वे वीडियो रिकॉर्ड कर उसमें फैसला वापस लेने की बात कहें।

इस मुद्दे पर अब भारत के मौजूदा मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने दखल दिया है। उन्होंने लंदन की अपनी यात्रा के दौरान इस मुद्दे को भारतीय उच्चायोग के सामने रखा। CJI सूर्यकांत ने भारतीय उच्चायुक्त पी कुमारन से इस मामले पर चर्चा की और जस्टिस पटेल और उनके परिवार की सुरक्षा के संबंध में आश्वासन प्राप्त किया। उच्चायुक्त ने भरोसा दिलाया कि पटेल या उनके परिवार को कोई नुकसान नहीं पहुँचेगा और इसके लिए लंदन पुलिस ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए हैं।

पूर्व जस्टिस गौतम पटेल से वीडियो बनाकर फैसला वापस लेने की माँग

पूर्व जस्टिस गौतम पटेल ने द वायर को बताया कि खुद को दाऊदी बोहरा समुदाय के प्रभावशाली लोगों का समूह बताने वाले कुछ लोगों ने उनसे फैसला वापस लेने की माँग की। उनसे कहा गया कि वे भारत से बाहर जाकर एक यूट्यूब वीडियो जारी करें, जिसमें यह स्वीकार करें कि उन्होंने दबाव या किसी प्रलोभन के कारण गलत फैसला दिया था।

साथ ही उनसे यह भी कहा गया कि वे बॉम्बे बार एसोसिएशन से भी यह वीडियो अपलोड करने को कहें और पत्रकारों को इंटरव्यू देकर इन बातों को दोहराएँ। धमकी देने वालों से इन माँगों को पूरा करने के लिए सितंबर (2025) के आखिर तक का समय दिया।

लेकिन पूर्व जस्टिस पटेल ने इन माँगों को पूरी तरह खारिज कर दिया। उनका कहना है कि किसी न्यायिक फैसले को इस तरह ‘वापस लेना’ कानून में संभव ही नहीं है। इसके बाद से ही पटेल और उनके परिवार पर खतरा मंडराने लगा। अब तक उनके परिवार पर 5 बार निशाना बनाया जा चुका है, इनमें चार बार लंदन में और एक बार मुंबई में।

लंदन में पटेल की बेटी के घर पर हमले से लेकर पत्नी को धमकियाँ तक, क्या-क्या हुआ?

अगस्त 2025 में लंदन में रहने वाली जस्टिस पटेल की बेटी अदिति के घर में घुसपैठ की घटना हुई। शुरुआत में इसे सामान्य चोरी या सेंधमारी का मामला माना गया, लेकिन कुछ सप्ताह बाद तस्वीर साफ होने लगी। अदिति को एक पत्र मिला, जो उनके पिता के नाम लिखा गया था। पत्र में जस्टिस पटेल के फैसले को ‘गलत’ बताते हुए उनसे उसे वापस लेने की माँग की गई थी।

सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि पत्र लिखने वालों ने अदिति के घर में हुई घुसपैठ की जिम्मेदारी भी ली। इसके सबूत के तौर पर उन्होंने एक एसडी कार्ड भेजा, जिसमें घर में घुसने का वीडियो होने का दावा किया गया था। इसके कुछ दिन बाद 9 सितंबर 2025 को मुंबई में जस्टिस पटेल की पत्नी को भी यही पत्र मिला। इस संबंध में मुंबई पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई।

लेकिन मामला यहीं नहीं रुका। 22 अप्रैल 2026 को अदिति पर लंदन में उनके घर के पास हमला किया गया। वह अपने बच्चे को स्कूल छोड़कर लौट रही थीं, तभी एक नकाबपोश व्यक्ति ने उन पर हमला कर दिया। उन्हें कई बार मुक्के मारे गए और जमीन पर गिरने के बाद भी लातों से पीटा गया। पड़ोसियों के मौके पर पहुँचने के बाद हमलावर वहाँ से भाग निकला। इस हमले में अदिति की नाक टूट गई। खास बात यह रही कि उनके पास मौजूद फोन और पर्स नहीं छीना गया, जिससे यह सामान्य लूटपाट की घटना नहीं लगी और इसके पीछे की मंशा साफ हुई।

अब जस्टिस के परिवार को जान से मारने की धमकी

अब 5 जून 2026 को अदिति के लंदन स्थित घर पर एक और पत्र पहुँचा, जिसमें जस्टिस पटेल और उनके परिवार को सीधे जान से मारने की धमकी दी गई। पत्र में कहा गया कि उन्हें पहले ही काफी चेतावनी दी जा चुकी है और अगला कदम ‘श्मशान’ होगा। धमकी देने वालों ने फिर वही पुरानी माँग दोहराई कि अगर जस्टिस पटेल पहले वाले पत्र में बताई गई शर्तें मान लें, तभी कथित ‘कॉन्ट्रैक्ट’ रद्द किया जाएगा।

इस पत्र के साथ भी एक एसडी कार्ड भेजा गया। हालाँकि परिवार ने उसे खुद देखने के बजाय सीधे पुलिस को सौंप दिया। जस्टिस पटेल का कहना है कि उन्हें पूरा विश्वास है कि धमकी भरे पत्रों और उनकी बेटी पर हुए हमलों के बीच सीधा संबंध है। फिलहाल लंदन पुलिस इस पूरे मामले की जाँच कर रही है, जबकि भारत और ब्रिटेन दोनों देशों के अधिकारियों ने जस्टिस पटेल और उनके परिवार की सुरक्षा को लेकर कदम उठाने का भरोसा दिया है।

आखिर दाऊदी बोहरा उत्तराधिकार विवाद क्या है?

इस पूरे विवाद को समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि शिया इस्लाम के दाऊदी बोहरा समुदाय में ‘दाई-अल-मुतलक’ (Dai-al-Mutlaq) का पद क्या होता है। दाई-अल-मुतलक समुदाय का सर्वोच्च आध्यात्मिक प्रमुख माना जाता है। उनके धार्मिक फैसलों और नेतृत्व को समुदाय में विशेष महत्व दिया जाता है।

विवाद की शुरुआत जनवरी 2014 में हुई, जब दाईदी बोहरा समुदाय के 52वें दाई-अल-मुतलक सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन का निधन हो गया। उनके निधन के तुरंत बाद उनके बेटे सैयदना मुफद्दल सैफुद्दीन ने 53वें दाई-अल-मुतलक के रूप में नेतृत्व संभाल लिया। लेकिन यहीं से उत्तराधिकार को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया।

दूसरी तरफ बुरहानुद्दीन के सौतेले भाई खुझैमा कुतुबुद्दीन ने दावा किया कि उन्हें वर्ष 1965 में ही गुप्त रूप से उत्तराधिकारी घोषित कर दिया गया था। दाऊदी बोहरा परंपरा में उत्तराधिकारी घोषित करने की प्रक्रिया को ‘नस्स’ (Nass) कहा जाता है। कुतुबुद्दीन का कहना था कि उन्हें वैध उत्तराधिकारी बनाया गया था, इसलिए 53वें दाई का पद उन्हें मिलना चाहिए था।

2014 से 2024 तक, अदालत में कैसे चली 10 साल की लड़ाई?

मार्च 2014 में खुझैमा कुतुबद्दीन ने बॉम्बे हाई कोर्ट में मुकदमा दायर किया। उन्होंने अदालत से माँग की कि उन्हें दाऊदी बोहरा समुदाय का वैध 53वाँ दाई-अल-मुतलक घोषित किया जाए। इसके जवाब में सैयदना मुफद्दीन ने कहा कि उनके अब्बा ने सार्वजनिक रूप से कई मौकों पर उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था।

मुकदमे के दौरान दोनों पक्षों ने दस्तावेज, धार्मिक परंपराओं से जुड़े तर्क, गवाह और अन्य सबूत पेश किए। इसी बीच 2016 में खुझैमा कुतुबुद्दीन का निधन हो गया। इसके बाद उनके बेटे ताहेर फखरुद्दीन ने अदालत में यह लड़ाई आगे बढ़ाई। यह मामला धीरे-धीरे भारत के सबसे चर्चित धार्मिक उत्तराधिकार मामलों में बदल गया। सुनवाई कई वर्षों तक चली। नवंबर 2022 से अंतिम बहस शुरू हुई और 5 अप्रैल 2023 को सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया गया।

पूर्व जस्टिस गौतम पटेल ने क्या फैसला दिया और विवाद क्यों बढ़ा?

करीब एक साल बाद 23 अप्रैल 2024 को बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस गौतम पटेल ने अपना फैसला सुनाया। उन्होंने ताहेर फखरुद्दीन की याचिका खारिज कर दी और माना कि सैयदना मुफद्दल सैफुद्दीन को ही वैध रूप से 53वाँ दाई-अल-मुतलक नियुक्त किया गया था। अदालत ने कहा कि उनके पक्ष में पर्याप्त सबूत मौजूद हैं, जबकि विरोधी पक्ष अपने दावे को साबित करने में सफल नहीं रहा।

फैसला सुनाते समय जस्टिस पटेल ने यह भी कहा था कि उन्होंने मामले को ‘आस्था नहीं, बल्कि सबूतों’ के आधार पर तय किया है। अदालत का काम धार्मिक मान्यताओं पर फैसला देना नहीं, बल्कि प्रस्तुत साक्ष्यों की जाँच करना है। फैसले पर दाऊदी बोहरा समुदाय ने एक प्रेस रिलीज जारी करके इसे ‘ऐतिहासिक फैसला’ बताते हुए तारीफ भी की थी।

अब इसी फैसले पर जस्टिस गौतम पटेल को निशाना बनाया जा रहा है। इसीलिए यह मामला केवल एक रिटायर्ड जस्टिस और उनके परिवार की सुरक्षा का नहीं है, बल्कि यह सवाल भी उठाता है कि क्या किसी न्यायाधीश को उसके फैसले के लिए इस तरह निशाना बनाया जा सकता है। यही वजह है कि इस पूरे घटनाक्रम को न्यायपालिका की स्वतंत्रता और कानून के शासन के लिए गंभीर चुनौती के तौर पर देखा जा रहा है।

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पूजा राणा
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