बेंगलुरु के कोथनूर थाने में इस संबंध में भारतीय न्याय संहिता और गैरकानूनी गतिविधियाँ रोकथाम अधिनियम की धारा 13, 17 और 18 के तहत एफआईआर दर्ज किया गया है। ईडी के अनुसार, जाँच में पता चला है कि नवंबर 2025 से अप्रैल 2026 के बीच करीब 92.55 करोड़ रुपए का इस्तेमाल नियमों का उल्लंघन करते हुए किया गया। एजेंसी का कहना है कि यह धन विदेशी डेबिट कार्डों के माध्यम से निकाला गया और अलग अलग जगहों पर खर्च किया गया।

गौरतलब है कि आयकर अधिनियम की धारा 132 और विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA) की धारा 37 के तहत 18 और 19 अप्रैल 2026 को ईडी ने तलाशी अभियान चलाया था।
एफआईआर में नामजद आरोपी
एफआईआर में जिन आरोपितों के नाम दर्ज हैं, उनमें जोनाथन एस राजन, मीका मार्क, अजीत वर्गीज मथाई, वर्गीज चाको, बबलू कुर्मी, सुप्रीम जॉय और द टिमोथी इनिशिएटिव यूएसए और अन्य शामिल हैं।
एफआईआर के अनुसार, आरोपितों और अमेरिका स्थित ईसाई प्रचारक संगठन ने अमेरिका के एक बैंक द्वारा जारी डेबिट कार्डों के माध्यम से विदेशी फंडिंग को भारत में लाने के लिए आपराधिक साजिश रची। एफआईआर में कहा गया है कि यह रकम देशभर के एटीएम से निकाली गई और टीटीआई से संबंधित गतिविधियों में इस्तेमाल की गई।
विदेशी डेबिट कार्ड और 92.55 करोड़ रुपए का घोटाला
शिकायतकर्ता के अनुसार, FEMA अधिनियम और विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) का उल्लंघन करते हुए नवंबर 2025 और अप्रैल 2026 के बीच करीब 92.55 करोड़ रुपए या 9995240 अमेरिकी डॉलर का इस्तेमाल किया गया। संगठन ने इस अवधि में खुल कर कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन किया।
एफआईआर में कहा गया है कि जनवरी 2024 और मार्च 2026 के बीच कर्नाटक, छत्तीसगढ़ और असम सहित कई राज्यों में विदेशी डेबिट कार्ड का उपयोग करके लगभग 44 करोड़ रुपए निकाले गए।
बेंगलुरु हवाई अड्डे पर माइका मार्क को रोका गया
एफआईआर का एक अहम हिस्सा है 18 अप्रैल 2026 को बेंगलुरु के केम्पेगौड़ा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर मीका मार्क की गिरफ्तारी। एफआईआर के अनुसार, जब ईडी ने उसे रोका तो उसके पास से 24 विदेशी डेबिट कार्ड बरामद हुए।
जाँच के दौरान, एजेंसी को पता चला कि मीका मार्क कई बार विदेश यात्रा कर चुका था और विदेशी डेबिट कार्ड भारत लेकर आया था। एफआईआर के अनुसार, वह भारत में टीटीआई के वित्तीय कार्यों को संभालने वाला अहम व्यक्ति था।
एफआईआर में कहा गया है कि अधिकांश विदेशी डेबिट कार्ड ‘संतोष कुमार’ के नाम पर छपे थे। चूँकि कार्डों पर एक ही नाम था, इसलिए उन्हें आंतरिक रूप से NE-1, NE-2 और दक्षिणी क्षेत्र-1 जैसे क्षेत्रीय लेबलों का उपयोग करके पहचाना गया। ऐसा कानून प्रवर्तन एजेंसी (LEA) और केवाईसी जाँच के दौरान संदेह से बचने और मूल रिकॉर्ड को छिपाने के लिए किया गया था। पिछले कुछ वर्षों में भारत में लगभग 1000 ऐसे डेबिट कार्ड वितरित किए गए थे।
डिजिटल साक्ष्य नष्ट कर दिए गए
शिकायतकर्ता ने एफआईआर डिजिटल साक्ष्यों को नष्ट करने की बात कही है। एफआईआर के अनुसार, ईडी ने जब तलाशी अभियान शुरू किया, तो टीटीआई ग्लोबल पोर्टल भारतीय यूजर्स के लिए मौजूद नहीं रहा यानी भारतीय यूजर्स इसका इस्तेमाल अब नहीं कर सकते थे। इसमें आगे कहा गया है कि अमेरिका में टीटीआई ने अपने सर्वरों तक में रिमोट एक्सेस के माध्यम से क्लाउड में जमा डेटा को मिटा दिया।
पूछताछ के दौरान मीका मार्क ने स्वीकार किया कि उसका खाता अब मौजूद नहीं है। घटना की रिपोर्ट और वीडियो रिकॉर्डिंग शिकायतकर्ता ने पुलिस को उपलब्ध कराई थी।
LWE से प्रभावित क्षेत्रों में संदिग्ध निकासी
जाँच में सबसे चौकानेवाला पहलू वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्रों में संदिग्ध लेन-देने था। नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ के धमतरी और बस्तर में इन विदेशी डेबिट कार्डों के माध्यम से संदिग्ध रकम की लेन-देने की गई थी। इन क्षेत्रों में लगभग 6.34 करोड़ रुपए निकाले गए। एफआईआर में आगे कहा गया है कि बड़ी मात्रा में नकदी निकालने के लिए डेबिट कार्डों का सुनियोजित तरीके से इस्तेमाल किया गया था, जो एक संगठित नेटवर्क की संलिप्तता का संकेत है।
एफआईआर में कहा गया है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में नकदी का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल भारत की सुरक्षा और अखंडता के लिए गंभीर खतरा पैदा करता है। ऐसी गैरकानूनी गतिविधियों से अवैध रूप से धन का हस्तांतरण होता है। इसमें बताया गया है कि 10000 रुपए के बदले 3200 रुपए का लेन-देन कर लगभग 3.2 करोड़ रुपए निकाले गए।
एफआईआर में विशेष रूप से उल्लेख किया गया है कि यह राशि छत्तीसगढ़ के धमतरी में बस्तर रोड पर विजय प्लाजा में एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक एटीएम से निकाला गया। इसके लिए दो डेबिट कार्डों का उपयोग किया गया। इसमें कहा गया है कि निकासी फील्ड-लेवल वर्कर वर्गीस चाको की देखरेख में की गई थी।
विदेशी धन की आवाजाही को लेकर UAPA लागू किया गया
एफआईआर में कहा गया है कि छत्तीसगढ़ के वामपंथी उग्रवाद और नक्सलवाद प्रभावित जिलों में इकाइयों और फील्ड कार्यकर्ताओं के माध्यम से जो पैसे निकाले गए उसका एक पैटर्न था। इस पैटर्न में अमेरिका के टिमोथी इनिशिएटिव का धन भी शामिल था।
इसमें आगे कहा गया है कि यह प्रथम दृष्टया गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम, 1967 की धारा 2 के तहत ‘गैरकानूनी गतिविधि’ है। एफआईआर में यह भी कहा गया है कि विदेशी धन को नक्सली प्रभाव वाले क्षेत्रों में ले जाने का इरादा था।
इसी वजह से एफआईआर में कहा गया है कि विदेशी संस्था टीटीआई से छत्तीसगढ़ के एलडब्ल्यूई और नक्सल प्रभावित जिलों में धन ट्रांसफर पर यूएपीए के प्रावधान लागू होते हैं।
अजीत वर्गीस मथाई और जोनाथन एस राजन की भूमिका
एफआईआर के अनुसार, अजीत वर्गीस मथाई टीटीआई का भारत में वित्त प्रमुख थे। इसमें कहा गया है कि धन हस्तांतरण बेंगलुरु में पंजीकृत अलग-अलग फर्जी संस्थाओं के माध्यम से किए गए थे। इसके अलावा मथाई के कार्यालय से विदेशी डेबिट कार्डों का उपयोग करके निकाली गई 37 लाख रुपये की नकदी जब्त की गई।
एफआईआर में यह भी कहा गया है कि जोनाथन एस राजन भारत में टीटीआई प्रमुख था। उसने अजीत वर्गीज मथाई के साथ मिलकर पूरे भारत में टीटीआई की गतिविधियों के लिए एटीएम से पैसे निकालने की साजिश रची थी।
एफआईआर में बताया गया है कि इस पैसे का इस्तेमाल प्रशिक्षण, धार्मिक उपदेश और गरीब लोगों का वामपंथी उग्रवाद की ओर ले जाने वाले तरीके से ब्रेनवॉश करने जैसी गतिविधियों के लिए किया गया था। इसमें यह भी कहा गया है कि जोनाथन राजन ऐसे प्रशिक्षण आयोजित करने वाले व्यक्तियों के चयन और ऐसे कार्यक्रमों के आयोजन स्थलों की पहचान का काम देखता था।

क्षेत्रीय स्तर के कार्यकर्ता और टीटीआई का खर्च
एफआईआर में आगे कहा गया है कि वर्गीस चाको, सुप्रीम जॉय और बबलू कुर्मी फील्ड स्तर के कार्यकर्ता थे। इनलोगों ने दूसरों के साथ मिलकर साजिश रचते हुए विदेशी डेबिट कार्डों का उपयोग करके कई एटीएम से पैसे निकाले और उनका इस्तेमाल टीटीआई के उद्देश्यों के लिए किया।
एफआईआर में आगे कहा गया है कि सबूतों से पता चला है कि टीटीआई ने भारत में 95 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए थे। इसमें टीटीआई के अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर quickbook.com के स्क्रीनशॉट को भी शामिल किया गया और बताया गया है कि मीका मार्क से पिछले छह महीनों के दौरान विभिन्न फील्ड कोऑर्डिनेटरों द्वारा एकत्र किए गए व्यय बिलों के बारे में पूछताछ की गई थी। एफआईआर के अनुसार, उन्होंने बताया कि ये बिल टीटीआई द्वारा नवंबर 2025 से अप्रैल 2026 के बीच भुगतान किए गए थे।
विदेशी फंडिंग नेटवर्क को लेकर जाँच
TTI के खिलाफ दर्ज FIR में विदेशी फंडिंग नेटवर्क को हाल ही में जाँच में शामिल किया गया है। यह प्रवर्तन निदेशालय (ED) की निगरानी में है। OpIndia ने पिछले कुछ महीनों में TTI पर कई रिपोर्ट प्रकाशित की हैं। हमारी जाँच के दौरान ये खुलासा हुआ था कि TTI ने भारत में अपना नेटवर्क कैसे बनाया, विदेशी चर्च ने इसकी गतिविधियों का समर्थन कैसे किया और FCRA की मंजूरी न होने के बावजूद विदेशों से भारत में धन कैसे लाया गया। ईडी इसकी भी जाँच कर रहा है।
जैसा कि इस श्रृंखला में पहले बताया गया है, टीटीआई की शुरुआत 2009 में ‘प्रोजेक्ट इंडिया’ के रूप में हुई थी और बाद में 2009 में इसका नाम बदलकर टीटीआई कर दिया गया। इसके संस्थापक डेविड नेल्म्स थे। पहली बार 1992 में वे भारत आए थे। संगठन ने बाद में भारत और अन्य देशों में ‘चर्च-स्थापना मॉडल’ विकसित किया।
टीटीआई का मॉडल स्थानीय स्तर पर ईसाइयत के प्रचार पर आधारित था। इसके लिए पॉल, टिमोथी और टाइटस की नियुक्ति होती थी । इस मॉडल में कम खर्च पर किसी स्थानीय व्यक्ति के घर पर प्रार्थना की जाती थी। इसमें कुछ सौ डॉलर में सारा काम हो जाता था।
ऑपइंडिया की जाँच से पता चला कि टीटीआई का भारत केंद्रित कार्य कोई स्वतंत्र गतिविधि नहीं थी। यह विदेशी चर्चों और ईसाई नेटवर्कों के एक व्यापक तंत्र से जुड़ा हुआ था , जिनमें से अधिकांश अमेरिका और कनाडा के थे। हमारी जाँच के दौरान सामने आए नामों में केंसिंग्टन चर्च, मिशन ग्रोव चर्च, नॉर्थवेस्ट बैपटिस्ट चर्च, वुडडेल चर्च, राइज सिटी चर्च, मिशन हिल्स चर्च, फर्स्ट प्रेस्बिटेरियन चर्च ऑफ हैनफोर्ड, स्प्रिंगब्रुक कम्युनिटी चर्च, बैपटिस्ट जनरल कॉन्फ्रेंस ऑफ कनाडा, लिबर्टी चर्च नेटवर्क, ऑल एक्सेस इंटरनेशनल, साल्टबॉक्स चर्च और वुडसाइड बाइबल चर्च शामिल थे।
इनमें से कई विदेशी चर्चों ने भारत में टीटीआई के साथ अपने काम की जानकारी दी है। स्थानीय स्तर पर चर्च की स्थापना, पादरियों का प्रशिक्षण, जमीनी दौरे और धन जुटाना इनका काम था। केंसिंग्टन चर्च उत्तर भारत के हजारों स्थानीय चर्च से जुड़ा था। मिशन ग्रोव चर्च ने उत्तरी भारत और नेपाल में हजारों चर्चों और भारत और बांग्लादेश में चर्च की स्थापना से संबंधित धन जुटाने की बात कही। वुडडेल चर्च भारत, नेपाल और बांग्लादेश में टीटीआई के प्रशिक्षण दौरों से जुड़ा था, साथ ही हजारों नेताओं और चर्चों का भी जिक्र किया गया।
इसके अलावा यह भी पाया गया कि टीटीआई की अपनी प्रशिक्षण और परिचालन सामग्री से पता चलता है कि संगठन ने स्थानीय कार्यकर्ताओं को हिंदू-बहुल गाँवों में प्रवेश करने, हिंदुओं से संपर्क करने, संदेह से बचने, स्थानीय सामाजिक संरचनाओं का उपयोग करने और संपर्क स्थापित करने के लिए जातिगत नेताओं की पहचान करने का प्रशिक्षण कैसे दिया। संगठन का मॉडल केवल बाहर से प्रचार करने तक सीमित नहीं था। यह स्थानीय स्तर के कार्यकर्ताओं, गाँव स्तर तक पहुँच और एक सुनियोजित योजना पर निर्भर था।
एफसीआरए और फेमा के उल्लंघनों से शुरू हुआ यह मामला अब राष्ट्रीय सुरक्षा के दायरे में आ गया है।
(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)


