मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु के कोयंबटूर में एक बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कलापट्टी मेन रोड पर स्थित मरिअम्मन मंदिर के पास चर्च बनाने पर रोक लगा दी है। जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और जस्टिस वी लक्ष्मीनारायणन की बेंच ने यह अंतरिम आदेश दिया।
यह फैसला स्थानीय निवासी बालासुब्रमण्यम की याचिका पर आया है। उन्होंने जिला कलेक्टर और राजस्व विभागीय अधिकारी (RDO) के आदेश के खिलाफ कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हाई कोर्ट ने मामले से जुड़े सभी सरकारी रिकॉर्ड्स की जाँच की। जाँच में पता चला कि जिस जमीन पर चर्च बनना था, वह कागजों में ‘सार्वजनिक सड़क’ दर्ज है।
कोर्ट ने नोट किया कि इस इलाके में ईसाई आबादी बहुत ही कम है। वहीं दूसरी तरफ वहाँ रहने वाली बहुसंख्यक हिंदू आबादी इस चर्च का कड़ा विरोध कर रही है। कोर्ट का मानना है कि 100 साल से भी पुराने हिंदू मंदिर के बिल्कुल पास बड़ा चर्च बनाना गलत इरादे की ओर इशारा करता है।
25 मई 2026 को दिए फैसले में जस्टिस स्वामीनाथन ने लिखा कि कोयंबटूर एक सांप्रदायिक रूप से बेहद संवेदनशील शहर है। यह शहर अतीत में बम धमाके और खूनी धार्मिक दंगे झेल चुका है। प्रस्तावित चर्च मंदिर से बिल्कुल थोड़ी ही दूरी पर बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और हमारा समाज विविधताओं से भरा है। इसलिए देश में धार्मिक सौहार्द और भाईचारा बनाए रखना बहुत जरूरी है।

जस्टिस स्वामीनाथन ने साफ किया कि संविधान सबको अपना धर्म मानने और उसका प्रचार करने का अधिकार देता है। लेकिन यह अधिकार देश की कानून व्यवस्था और शांति के दायरे में ही आता है। हालाँकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार को किसी भी विरोध के आगे घुटने नहीं टेकने चाहिए। अगर किसी का कानूनी अधिकार पूरी तरह सही है और विरोध बेबुनियाद है, तो सरकार को उस अधिकार को लागू कराने के लिए किसी भी हद तक जाना चाहिए।

जस्टिस स्वामीनाथन ने याचिकाकर्ता की एक और बात पर विचार किया। याचिकाकर्ता ने कहा था कि इस चर्च का इस्तेमाल धर्मांतरण (धर्म बदलने) की गतिविधियों के लिए हो सकता है। उनके वकील ने आशंका जताई कि नई इमारत धर्मांतरण का केंद्र बन सकती है। इस पर कोर्ट ने कहा कि हम एक धर्मनिरपेक्ष देश हैं। हमारा समाज विविधताओं से भरा हुआ है। इसलिए देश में धार्मिक सौहार्द और भाईचारा बनाए रखना बहुत जरूरी है। अगर किसी का धार्मिक अधिकार पूरी तरह कानूनन साबित होता है, तो उसे लागू कराना सरकार का कर्तव्य है।

याचिकाकर्ता ने लगाया कट्टरपंथी संगठनों को बढ़ावा मिलने का आरोप
याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट के सामने एक बड़ा दावा किया है। उन्होंने कहा कि राज्य में मुख्यमंत्री सी जोसफ विजय की सरकार आने के बाद से कुछ कट्टरपंथी संगठन काफी सक्रिय हो गए हैं। उनके हौसले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। याचिकाकर्ता ने राज्य के बदलते सामाजिक और धार्मिक माहौल को दिखाने के लिए कोर्ट के सामने कुछ उदाहरण भी रखे। उनका कहना है कि नई सरकार बनने के बाद से राज्य की स्थिति में काफी बदलाव आया है।
याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि विधानसभा के अध्यक्ष जेसीडी प्रभाकर खुद हजारों बाइबिल मुफ्त बाँटने का दावा करते हैं। उन्होंने विधानसभा के अपने उद्घाटन भाषण में भी बाइबिल की आयतों का जिक्र किया था। इसके अलावा याचिकाकर्ता ने विपक्ष के नेता उदयनिधि स्टालिन के एक बयान का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जब उदयनिधि स्टालिन ने विधानसभा में सनातन धर्म को खत्म करने की बात कही, तो सत्ताधारी दल ने इस पर कोई आपत्ति नहीं जताई। सत्ता पक्ष के किसी भी नेता ने इस विवादित बयान की निंदा तक नहीं की।
गाँव में बेहद कम है ईसाई आबादी
जिस गाँव में चर्च बनाने का प्रस्ताव है, वहाँ ईसाई समुदाय की आबादी बहुत ही कम है। इस गाँव में कुल मिलाकर लगभग 1000 परिवार रहते हैं। इनमें से 950 परिवार हिंदू हैं और 15 परिवार मुस्लिम हैं। बाकी बचे परिवारों में से कुछ ही ईसाई मजहब से जुड़े हैं। जनवरी 2010 में जिला कलेक्टर ने मंदिर के पास चर्च बनाने की मंजूरी का एक आदेश जारी किया था। गाँव के हिंदू परिवारों ने इस फैसले का कड़ा विरोध किया। उन्होंने 2011 में जिला कलेक्टर के इस आदेश को कोयंबटूर की जिला मुंसिफ कोर्ट में चुनौती दी। यह दीवानी मामला (सिविल सूट) अदालत में आज भी लंबित है।
इस मामले के करीब 13 साल बाद कुछ निजी लोगों ने चर्च का निर्माण फिर से शुरू करने की कोशिश की। इसके लिए उन्होंने जरूरी आदेश भी हासिल कर लिए। लेकिन इस निर्माण के कारण इलाके में कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ गई। माहौल खराब होता देख जिला कलेक्टर ने उन्हें तुरंत काम रोकने का निर्देश दिया। इसके बाद साल 2024 में ‘चर्च ऑफ साउथ इंडिया’ (CSI) ने जिला कलेक्टर के इस रोक वाले आदेश के खिलाफ मद्रास हाई कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की।
अप्रैल 2026 में मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस एम दंडपाणि की सिंगल बेंच ने इस मामले पर सुनवाई की। अदालत ने मामले के गुण-दोष पर कोई भी अंतिम फैसला सुनाने से साफ इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि चूँकि निचली अदालत में पहले से ही एक सिविल सूट लंबित है, इसलिए अभी इस पर कोई फैसला नहीं लिया जा सकता। हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को निर्देश दिया कि वे निचली अदालत से सिविल सूट का फैसला आने के बाद ही नए सिरे से आवेदन करें। तब तक चर्च के निर्माण कार्य पर पूरी तरह रोक रहेगी।
मद्रास हाई कोर्ट ने पहले भी की थी धार्मिक अधिकारों की रक्षा
पिछले साल दिसंबर में मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने एक बड़ा फैसला सुनाया था। अदालत ने हिंदुओं के धार्मिक अधिकारों की रक्षा की थी। कोर्ट ने डिंडीगुल के ‘मांडू कोविल’ और मदुरै की ‘तिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी’ पर स्थित दीपथून स्तंभ पर कार्तिकाई दीपम जलाने के अधिकार को सही ठहराया था।
इस मामले की सुनवाई हाई कोर्ट के सिंगल जज जस्टिस जीआर स्वामीनाथन ने की थी। उन्होंने डिंडीगुल और मदुरै के जिला प्रशासनों को कड़ी फटकार लगाई थी। जस्टिस स्वामीनाथन ने कहा था कि प्रशासन हिंदू भक्तों के लिए दीये जलाने की जरूरी व्यवस्था करने में पूरी तरह नाकाम रहा। कोर्ट ने साफ किया था कि प्रशासन को भक्तों के धार्मिक अधिकारों का सम्मान करना चाहिए।
(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)


