2015 में शुरू हुआ था पहला बड़ा खूनी संघर्ष
इस लंबे विवाद की शुरुआत वर्ष 2015 में मियांवाली के वान भच्छरन थाना क्षेत्र में हुई थी, जब यारो खेल कबीले के दो भाइयों अशरफ खान और असगर खान समेत उनके सहयोगियों मोहम्मद जमान हजारा खेल और शेर अब्बास भट्टी की हत्या कर दी गई थी।
इसी हिंसा में कालो कबीले के मोहम्मद लतीफ की भी जान चली गई थी। इस घटना ने कबीलों के बीच तनाव को इतना बढ़ा दिया कि बदले की आग लगातार भड़कती रही और क्षेत्र में कई बार हिंसक झड़पें होती रहीं।
तीन साल बाद 2018 में मियांवाली सिटी थाना क्षेत्र में एक और बड़ा हमला हुआ, जब कालो और कुंडी कबीलों के लोग अदालत की सुनवाई में जा रहे थे, तभी घात लगाकर उन पर हमला कर दिया गया। इस हमले में अब्दुल वहीद कालो, मोहम्मद मेहरान कुंडी, मोहम्मद नोमान कुंडी और दो राहगीरों की मौत हो गई।
इसके बाद 2019 में कायदाबाद के पास हुई एक और घटना में अशरफ खान बिखन खेल की हत्या कर दी गई, जिसने दोनों पक्षों के बीच दुश्मनी को और गहरा कर दिया।
11 साल बाद खत्म हुआ लंबा संघर्ष
इस संघर्ष को समाप्त कराने में मियां रियाज मियाना, शौकत खान, सिब्तैन खान और इंस्पेक्टर इरफान गुज्जर की अहम भूमिका मानी जा रही है। लंबे संवाद और भरोसा बहाली की कोशिशों के बाद आखिरकार मियांवाली के नूर मार्केट में सुलह समारोह आयोजित किया गया।
इस कार्यक्रम में पंजाब के राज्यपाल सरदार सलीम हैदर खान समेत कई पूर्व सांसद, राजनीतिक नेता और स्थानीय लोग मौजूद रहे। समारोह के दौरान कबीलों के सदस्यों ने एक-दूसरे को गले लगाकर दुश्मनी खत्म करने की घोषणा की।
राज्यपाल ने इसे सामाजिक स्थिरता और शांति की दिशा में अहम कदम बताया। इसी मौके पर अकरम खान ने 12 मिलियन रुपए के किसास (खून बहा) को माफ करने की घोषणा करते हुए कहा कि उन्होंने यह फैसला अल्लाह की रजा के लिए लिया है।


