“कहो काफ्का, कैसे हो? चहा पिला दूँ एक?”
सारा नैनीताल उसे काफ्का कांडपाल के नाम से जानने वाला हुआ। काफ्का कांडपाल जान ठैरा नैनीताल के लिटरेचर प्रेमियों की। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के तमाम युवा लड़के जिनके हार्मोन्स ने विश्वविद्यालय की विश्वविख्यात युवतियों को देख देख कर उछाल मारना सीखा ही था, उससे प्रेम पत्र लिखाने आया करते। वो उन प्रेम पत्रों में संपूर्ण जग का प्रेम निचोड़ कर भर देता।
काफ्का कांडपाल का लिखा खत हो और लड़की ने हाँ न की हो, ऐसा कोई वाकया अबतक नैनीताल की पहाड़ियों ने नहीं देखा था। जिस जिस की बात विश्वविद्यालय को जाती कच्ची सड़क से मॉल रोड पर प्रेमिका संग टहलने तक पहुँच जाती वह काफ्का कांडपाल को महँगी शराब पिलाता। और भला क्या ही चाहिए ठैरा काफ्का कांडपाल को फिर। बताते तो यहाँ तक हैं कि पंचानबे के नेट जेआरएफ, कुमाऊँ विश्वविद्यालय के भौतिकी के कड़क प्रोफेसर पांडे ने भी गणित की मैडम को काफ्का कांडपाल के लिखें खतों द्वारा ही कैपिटल सिनेमा में साथ फिल्म देखने के लिए राजी किया था।
शहर के छात्र नेता उससे छुप कर मिला करते। वो उससे चुनाव के लिए भाषण लिखवाते। नैनीताल के खपे पुराने कम्युनिस्ट नेता हों या बीजेपी-कॉन्ग्रेस के छात्र काडर के युवा नेता, सभी पार्टियों वाले उससे अकेले में मिल भाषण लिखवा कर मंच पर बोलने की कला सीखा करते। मंच पर चढ़कर काफ्का कांडपाल का लिखा भाषण पढ़ता छात्र नेता किसी नैपोलियन सा ही प्रतीत होता। काफ्का कांडपाल का लिखा भाषण लहरों को मोड़ देने का दमखम रखता था।
काफ्का कांडपाल अच्छी खासी कमेंट्री भी कर लेने वाला ठैरा। उसकी आवाज में अलग ही जादू जो हुआ। उसके पास शब्दों का अनमोल भंडार होने वाला ठैरा। नैनीताल की ठंडी हवाओं में हॉकी और फुटबॉल को लेकर अलग ही पागलपन बहने वाला ठैरा। लोग पागल ठैरे इन खेलों के लिए। जब भी सैनिक स्कूल या सेंट जोसेफ की स्कूल टूर्नामेंट में उतरती, हाड कंपाने वाली ठंड हों या बरसात, हजारों की संख्या में लोग बच्चों का मैच देखने पहुँचते।
जब भी नैनीताल की झील से लगे बड़े मैदान में क्रिकेट या फुटबॉल के मैच खेले जाने वाले हुए, काफ्का कांडपाल ही कमेंट्री के लिए सबकी पहली पसंद होने वाला हुआ। मैच शुरू होते ही काफ्का कांडपाल अपनी अंग्रेजी की रानीखेत एक्स्प्रेस दौड़ा देता। क्या जो शब्द, क्या जो आवाज का उतार चढ़ाव होने वाला हुआ ठैरा; अहा!
काफ्का कांडपाल अब बूढ़ा हो गया है। काफ्का कांडपाल अब चीज़ें भूलने लगा है। पिछले शनिवार वो लौटते वक्त टम्टा जी के घर को अपना घर समझ,वहाँ जाकर चारपाई पर लेट गया था। फिर टम्टा जी का बड़ा लड़का उन्हें घर छोड़ कर आया। बूढ़ा हो जाने पर लोग आपको भूलने लग जाते हैं। नैनीताल अब काफ्का कांडपाल को भुलाने लगा है। नैनीताल की नई पौध अपने हीरे को नहीं पहचानती। मगर, पुराने लोग इस हीरे का मोल बखूबी जानते हैं।
काफ्का कांडपाल रोज सुबौ उठ के घर से झील का रास्ता पकड़ कर तल्लीताल को आता है। वहाँ आकर वो बस अड्डे के पास चाह की गुमटी पर जाकर चाह और एक ‘इंडियन एक्सप्रेस’ अखबार लेकर झील किनारे धूप के टुकड़े इकट्ठा करने बैठ जाता है।
झील किनारे तफरीह करने वाले उम्रदराज लोग उसको घेर लेते हैं। वो सभी जानते हैं बूढ़ा होता जा रहा काफ्का कांडपाल एक रोज सब भूल जाएगा, मगर वो अपने पसंदीदा लेखकों का लिखा साहित्य कभी नहीं भूलेगा। वह फुटबॉल का मोह आज भी नहीं छोड़ सका है। लोगों को
काफ्का कांडपाल, उनके जिद करने पर, उन्हें बार्सिलोना, रियाल मैड्रिड, मैनचेस्टर यूनाइटेड आदि क्लबों के मैचों के किस्से सुनाया करता है।। फिर इधर उधर की बातें चलती हैं। बस अड्डे पर चाय बेचने वाले नेगी की चांदी हो जाती है। यह बुड्ढे ही रोज पांच सौ की चाय उससे पी जाते हैं। यूँ ही, झील किनारे, एक और दिन फुटबॉल की बातों के साथ ढल जाता है।
खैर, नैनीताल और उसके फुटबॉल प्रेम की बात फिर कभी। आज अब आगे बात कर लेते हैं फीफा विश्व कप के क्वार्टर फाइनल दौर के मुकाबलों की।
बीती रात बोस्टन स्टेडियम में पहला क्वार्टर फाइनल मुकाबला खेला गया जहाँ शानदार फॉर्म में चल रही मोरक्को का सामना था पिछले संस्करण की उपविजेता फ्रांस से। तमाम फुटबॉल पंडितों को उम्मीदें थी कि मोरक्को अंत तक हार न मानने का जज़्बा लिए मैदान में उतरेगी और फ्रांस को कठोर टक्कर देगी। दोनों ही टीमें पिछले विश्व कप में भी दोनों ही टीमें सेमीफाइनल में आमने-सामने थीं।
फ्रेंच कोच दीदीएर देशाँ ने अपनी टीम को 4-2-3-1 की फॉर्मेशन में मैदान पर उतारा। अटैकिंग लाइन में थे घातक फॉर्म में चल रहे एमबाप्पे, डेंबेले व युवा सनसनी देसिरे दोउ। मिडफील्ड का जिम्मा संभाला था माइकल ओलीस़ संग आद्रियन राबियो और मानू कोने ने। रक्षापंक्ति में सलिबा संग उपामेकानो, जूल्स कूंदे व लुका डीने मौजूद थे। मोरक्को भी इस ही फॉर्मेशन के साथ मैदान पर उतरी थी। पिछले मैचों में बेहद जुझारू फुटबॉल खेली थी इस टीम ने। अचरफ हाकीमी के नेतृत्व में मोरक्को का हर खिलाड़ी मैदान में अपना सबकुछ झोंक देता है। प्रमुख रेफरी फाकुन्दो टेल्लो से इशारा मिलते ही पहले क्वार्टर फाइनल मुकाबले की शुरुआत हो जाती है।
लेस ब्ल्यूज़ शुरुआत से ही लगातार हमले करने लगती है। देसिरे दोउ गोल की दिशा में एक जोरदार शॉट लगाते हैं। ऐसे ही लगातार फ्रेंच टीम बारम्बार गोल मारने के प्रयास कर रही थी। जल्द ही इन प्रयासों का फायदा मिलता भी दिखता है।
एक फाउल के चलते मैच के पच्चीसवें मिनट में फ्रांस को पेनाल्टी दे दी जाती है। शांत चित्त से कीलिएन एमबाप्पे पेनाल्टी स्पॉट की दिशा में बढ़ते हैं। वह पेनाल्टी लेने के लिए तैयार थे। सामने गोलपोस्ट पर अनुभवी गोलकीपर यासीन बोनू खड़े थे। रेफरी व्हिस्ल बजाते हैं। एमबाप्पे किक लेने के लिए दौड़ लगाते हैं। वह गोलपोस्ट की बांई ओर जोरदार किक लगाते हैं। लेकिन मोरक्को के सजग प्रहरी यासीन बोनू इस किक को गोलपोस्ट के भीतर जाने से रोका लेते हैं। आश्चर्यजनक तरीके से एमबाप्पे पेनाल्टी मिस कर चुके थे। खैर खेल आगे बढ़ता है। जूल्स कूंदे व माइकल ओलीस़ फिर फ्रांस को बढ़त दिलाने के लिए कोशिश करते हैं परन्तु उन्हें सफलता नहीं मिलती। पहले हाफ की समाप्ति तक स्कोर 0-0 ही था।
दूसरे हाफ में भी फ्रेंच तूफान जारी रहता है। नतीजतन साठवें मिनट में स्टार खिलाड़ी कीलिएन एमबाप्पे एक बेहद खूबसूरत गोल लगा देते हैं। देसिरे दोउ से गेंद मिलते ही वह खूबसूरत अंदाज में गोलपोस्ट की टॉप-लेफ्ट दिशा में एक किक जड़ते हैं। अब की दफा गोलकीपर यासीन बोनू के पास एमबाप्पे की किक का कोई जवाब नहीं था।
छह मिनट पश्चात डेंबेले अकेले ही गेंद लेकर आगे बढ़ते हैं व बॉक्स के बाहर से ही गोलपोस्ट की बाँई ओर शॉट लगाते हैं। यासीन बोनू एक दफा फिर अपने बाँई ओर गोल का चुके थे। छह मिनटों में दागे गए दो गोलों के चलते स्कोर 2-0 हो गया था।

फ्रांस ने इस मैच में यासीन बोनू के गोलपोस्ट की दिशा में बाइस दफा शॉट लगाए जिसमें से नौ शॉट निशाने पर रहे। पिछले विश्व कप की ही भांति एक बार फिर फ्रांस ने मोरक्को को 2-0 से पटखनी दे दी थी। फ्रांस इस जीत के साथ सेमीफाइनल में जगह बना चुका था। लेस ब्ल्यूज़ का विजय रथ रोकने वाला हर प्रयास अबतक बेअसर ही साबित हुआ है।
अब आज देर रात भारतीय समयानुसार साढ़े बारह बजे बेहतरीन फॉर्म में चल रही बेल्जियम की टीम 2010 विश्व कप की विजेता स्पेन के सामने खड़े होगी। दांव पर होगी पिछले संस्करण की उपविजेता फ्रांस के खिलाफ सेमीफाइनल की एक सीट।
लॉस एंजेलिस स्टेडियम में होने जा रहे इस मैच में एक ओर बेल्जियम है जो धीमी शुरुआत के बाद अब अपने पिछले तीन मैचों में बारह गोल दाग चुकी है। चार्ल्स डि किटिलीरी, कप्तान यूरी टीलमान्स व लियान्द्रो ट्रोसार्ड अबतक दो दो गोल दाग चुके हैं। वहीं लुकाकू बेंच से आने के बावजूद अबतक तीन गोल स्कोर कर चुके हैं।
वहीं दूसरी ओर है स्पेन की टीम जिन्होंने अबतक इस विश्व कप के अपने पाँच मैचों में विरोधी टीमों को अपने खिलाफ एक भी गोल नहीं दागने दिया है। स्पेन के कोच लुई डे ला फुएन्ते के लिए चिंता का विषय यह होगा कि फॉरवर्ड लाइन के खिलाड़ी टीम के लिए गोल स्कोर करने में असमर्थ रहे हैं। वहीं रेड डेविल्स की खासियत यह है कि उनके बेंच पर बैठे खिलाड़ी भी मैदान पर आकर गोल दागने की काबिलियत रखते हैं।
आज एक बेहतरीन डिफेंस का सामना एक घातक अटैकिंग टीम से होगा। यह निश्चित रूप से एक बेहतरीन मैच होगा। जुनून अपने चरम पर होगा। तैयार रहिए एक अच्छी फुटबॉल प्रतियोगिता देखने के लिए।


