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‘सतलुज’ ने उतार दिया मुखौटा: दिलजीत दोसांझ की ‘ग्लोबल सुपरस्टार’ वाली छवि के पीछे छिपी राजनीति बेनकाब, ऑपइंडिया ने पहले ही दी थी चेतावनी

सतलुज फिल्म के विवाद ने वैश्विक सुपरस्टार दिलजीत दोसांझ की छवि के पीछे छिपी राजनीतिक विचारधारा, खालिस्तानी तत्वों के प्रति उनके मौन और पुराने विवादों को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है।

वर्षों से दिलजीत दोसांझ को एक सीधे-सादे, ग्लोबल पंजाबी स्टार के रूप में पेश किया जाता रहा है। एक गायक, एक अभिनेता और एक सॉफ्ट स्पोकन हस्ती जिन्हें लाखों लोग प्यार करते हैं।

एक ऐसा व्यक्ति जो पंजाब के बारे में गाता है और प्यार, किसानों तथा पहचान की बात करता है। लेकिन हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ‘सतलुज’ ने उस सच को सामने ला दिया है जिसे सालों के इमेज मैनेजमेंट ने पर्दे के पीछे छिपा रखा था।

‘सतलुज’: एक प्रोपेगैंडा फिल्म

‘सतलुज’ सिर्फ पंजाब के उग्रवाद के दौर की बात करने वाली फिल्म नहीं है बल्कि इसका उद्देश्य बहुत गहरा है। यह फिल्म सालों तक अटकी रही क्योंकि इसमें छिपी राजनीतिक को लेकर तरह-तरह के सवाल थे।

शुरुआत में इस फिल्म का नाम ‘घल्लूघारा’ (नरसंहार) रखा गया था। यह नाम और इसके कुछ दृश्य केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) को रास नहीं आए। इसके बाद नाम बदलकर ‘पंजाब 95’ किया गया और आखिरकार बनने के तीन साल बाद यह रिलीज हो सकी।

इस फिल्म को 3 जुलाई को Zee5 OTT प्लेटफॉर्म पर बिना किसी शोर-शराबे के ‘सतलुज’ नाम से रिलीज किया गया। लेकिन 6 जुलाई को बिना किसी सटीक कारण बताए इसे प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया।

ध्यान देने वाली बात यह है कि यह फिल्म केवल भारतीय दर्शकों के लिए गायब हुई है, अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के लिए नहीं, Zee5 का अंतरराष्ट्रीय पोर्टल इसे अब भी दिखा रहा है। अब सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने इस मामले की जाँच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया है।

समस्या यह नहीं है कि फिल्म पंजाब में पुलिस की ज्यादतियों की बात करती है, किसी भी ईमानदार समाज में ऐसे मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए। समस्या ‘सतलुज’ में पंजाब के उग्रवाद के दौर को पेश करने के तरीके से है।

फिल्म में खालिस्तानी आतंकवादियों और सिख चरमपंथियों के प्रति नरम रुख अपनाया गया है जबकि भारतीय राज्य (सरकार/प्रशासन) को इकलौते विलेन के रूप में दिखाया गया है।

जब फिल्म में तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या को दिखाया गया, तो उसे ‘बदले’ के रूप में दिखाया किया गया। जो लोग पंजाब उग्रवाद के इतिहास को नहीं समझते, वे इसका पूरा संदर्भ गलत समझ लेंगे। इस संदर्भ को अगर फिल्म की नजर से देखे तो उसको ऐसे दिखने की कोशिश की गई है कि वो कार ब्लास्ट सही था और वो बदला भी।

इसके अलावा जसवंत सिंह खालरा द्वारा इस मामले को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ले जाने के फैसले ने उस समय के भारतीय अधिकारियों को बेहद खराब रोशनी में दिखाया। KPS गिल, जिन्होंने पंजाब में उग्रवाद को सचमुच खत्म कर दिया, उन्हें ‘IPS बिट्टा’ नामक एक बुरे पुलिस वाले के रूप में दिखाया गया।

फिल्म में हिंदुओं की हत्याओं को कोई जगह नहीं मिली, यहाँ तक कि एक साधारण संदर्भ भी नहीं दिया गया। सख्त पुलिस कार्रवाई के पीछे की वजह कभी नहीं समझाई गई और न ही यह संकेत दिया गया कि कैसे खालिस्तानी आतंकवादी हिंदुओं, उग्रवाद का विरोध करने वाले सिखों, पुलिसकर्मियों और अधिकारियों की बेरहमी से हत्या कर रहे थे।

ऑपइंडिया ने वर्षों पहले इस पैटर्न को किया था चिन्हित

इस मोड़ पर दिलजीत की राजनीतिक विचारधारा प्रासंगिक हो जाती है। ऑपइंडिया वर्षों से कह रहा है कि उनकी सार्वजनिक छवि और उनका राजनीतिक संदेश आपस में मेल नहीं खाते।

2020 में किसानों के विरोध प्रदर्शन के दौरान यह साफ था कि आंदोलन को खालिस्तानी तत्वों ने हाईजैक कर लिया था। दिलजीत उनके पक्ष में सबसे मुखर सेलिब्रिटी आवाजों में से एक बनकर उभरे।

उन्होंने विरोध प्रोटेस्ट इकोसिस्टम पर सवाल उठाने वालों पर खुलकर हमला किया। इस अभिनेता-गायक को हमेशा की तरह लेफ्ट-लिबरल भीड़ द्वारा एक बहादुर पंजाबी ‘आइकन’ के रूप में सराहा गया।

जून 2020 में कॉन्ग्रेस के तत्कालीन लुधियाना सांसद रवनीत सिंह बिट्टू (जो बेअंत सिंह के पोते भी हैं) ने खालिस्तानी आतंकवादी संगठन सिख फॉर जस्टिस (SFJ) के गुरपतवंत सिंह पन्नू का समर्थन करने के लिए दिलजीत दोसांझ और अन्य के खिलाफ FIR दर्ज करने की माँग की थी।

बिट्टू ने भारत-चीन आमने-सामने के दौरान SFJ के भारत-विरोधी रुख और सिख सैनिकों को लुभाने के उसके प्रयास की ओर इशारा किया था। ऑपइंडिया ने रिपोर्ट की थी कि कैसे दिलजीत प्रतिबंधित खालिस्तान समर्थक अलगाववादी संगठन के समर्थन को लेकर निशाने पर आए थे।

ऑपरेशन ब्लूस्टार से लेकर जगतार सिंह जोहल तक

दिलजीत का विवादों से पुराना नाता रहा है। फिल्म ‘पंजाब 1984’ के लिए उनके द्वारा गाए गए गाने ‘रंगरुत’ के बोलों के बाद भी उन्हें आलोचना का सामना करना पड़ा था, जिसमें खुलकर बंदूकें उठाने और (1984 का) बदला लेने की बात कही गई थी।

गाने के बोल हैं ‘सोधा जालमा नु लाउना एके-47इया ने’ जिसका अनुवाद है ‘AK-47 अत्याचारियों से हिसाब चुकता करेगी’। कॉन्ग्रेस सांसद रवनीत बिट्टू ने तब उन पर ऑपरेशन ब्लूस्टार के 36 साल बाद शांति भंग करने का आरोप लगाया था।

इसके बाद खालिस्तानी आतंकवादी जगतार सिंह जोहल के लिए उनका समर्थन आया, जिसका नाम हिंदू और RSS नेताओं की हत्या के मामलों में NIA की चार्जशीट में है। जोहल को ब्रिगेडियर जगदीश कुमार गगनेजा, रविंदर गोसाईं, अमित शर्मा और अन्य की हत्या के मामले में आरोपित बनाया गया है।

दिलजीत ने जोहल के लिए प्रताड़ना के दावों और निष्पक्ष सुनवाई की बात की थी। हालाँकि निष्पक्ष सुनवाई हर किसी का कानूनी अधिकार है, लेकिन दिलजीत के समर्थन में यह चुनिंदा जल्दबाजी साफ दिखाई दे रही थी। जब पंजाब में हिंदू नेताओं की हत्या की जा रही थी, तब इस सेलिब्रिटी की अंतरात्मा कहाँ थी?

खालिस्तान की स्पष्ट निंदा करने से इनकार

अभिनेत्री से सांसद बनीं कंगना रनौत के साथ ऑनलाइन बहस के दौरान यह पैटर्न और साफ हो गया। किसान आंदोलन के दौरान कंगना ने उनसे बार-बार सिर्फ यह कहने को कहा कि वे खालिस्तान का समर्थन नहीं करते और खालिस्तानी तत्वों की निंदा करते हैं।

दिलजीत इस माँग से बचते रहे और ट्रोल सेनाओं ने सोशल मीडिया पर कंगना पर हमला कर दिया। दिलजीत ने कभी भी साफ तौर पर खालिस्तानियों की निंदा नहीं की।

पुराने विवाद अब एक पैटर्न की तरह दिखते हैं

ये उदाहरण बताते हैं कि वास्तव में एक पैटर्न है। विरोध पारिस्थितिकी तंत्र का समर्थन करना जब खालिस्तानी तत्व दिखाई दे रहे थे, सीधे पूछे जाने पर खालिस्तान की स्पष्ट निंदा करने से इनकार करना, हिंदू नेताओं की लक्षित हत्याओं के आरोपितों के प्रति सहानुभूति रखना और अब ‘सतलुज’।

‘सतलुज’ पर आई प्रतिक्रिया ने इस पूरे इकोसिस्टम को और अधिक बेनकाब कर दिया है। Zee5 से फिल्म हटाए जाने के बाद, जेल में बंद खालिस्तान समर्थक सांसद अमृतपाल सिंह की पार्टी अकाली दल (वारिस पंजाब दे) ने पूरे पंजाब में इसकी सार्वजनिक स्क्रीनिंग आयोजित करना शुरू कर दिया।

गाँवों में प्रोजेक्टर और बड़ी स्क्रीन के जरिए डाउनलोड की गई कॉपियाँ दिखाई गईं। पार्टी नेता रशपाल सिंह सोसन ने इन स्क्रीनिंग को बढ़ावा दिया और अमृतपाल सिंह का एक पुराना वीडियो भी साझा किया जिसमें वह जसवंत सिंह खालरा की तारीफ कर रहा था।

यह कोई छोटी बात नहीं है। अगर जेल में बंद खालिस्तान समर्थक सांसद अमृतपाल सिंह की पार्टी द्वारा किसी फिल्म को अपनाया और प्रसारित किया जा रहा है, तो इससे पता चलता है कि फिल्म की राजनीतिक उपयोगिता है।

उनकी पार्टी ‘सतलुज’ को सिनेमा के रूप में नहीं दिखा रही है, वो इसका इस्तेमाल राजनीतिक सामग्री के रूप में कर रही है। पंजाब पीड़ित भावना और अलगाववादी भावना के इर्द-गिर्द एक नैरेटिव को पुनर्जीवित करने के लिए दिलजीत के चेहरे और खालरा की कहानी का इस्तेमाल कर रही है।

इस तरह आतंक को ‘प्रतिरोध’ के रूप में रीपैकेज किया जाता है

‘सतलुज’ महज एक फिल्म नहीं है। यह खालिस्तानी उग्रवाद को नैतिक प्रतिरोध के रूप में रीपैकेज करने के लंबे समय से चल रहे प्रयास का नया अध्याय है। यह एक पुराना हथकंडा है जो सबसे पहले आतंकवाद के पीड़ितों को गायब करता है, फिर चरमपंथी का मानवीकरण करता है, फिर अकेले राज्य को खलनायक बनाता है और आखिर में दुष्प्रचार पर सवाल उठाने वाले किसी भी व्यक्ति को सिख-विरोधी कह देता है।

यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि खालिस्तानी दुष्प्रचार पर सवाल उठाना सिख-विरोधी नहीं बल्कि भारत-समर्थक है। यह पंजाब-समर्थक भी है। इस राज्य ने खालिस्तानी आतंकवाद के कारण बहुत कुछ झेला है।

हिंदू उग्रवाद का विरोध करने वाले सिख और पुलिसकर्मी मारे गए। परिवार तबाह हो गए। सरकार से गलतियाँ हुईं और ज्यादतियाँ भी हुईं, लेकिन वह अलगाववादियों और आतंकवादियों का महिमामंडन करने का बहाना नहीं बन सकती।

सुपरस्टार की छवि बरकरार, लेकिन राजनीति बेनकाब

दिलजीत दोसांझ के पास स्थिति साफ करने के लिए सालों का समय था। उनके पास बिना किसी चालाकी भरे शब्दों के यह कहने के लिए सालों थे कि खालिस्तान अस्वीकार्य है और पंजाब में आतंकवाद का महिमामंडन नहीं किया जा सकता। इसके बजाय हर नए विवाद ने सुई को उसी दिशा में धकेला है।

‘सतलुज’ के साथ मुखौटा उतर गया है। सुपरस्टार की छवि बनी हुई है। वैश्विक संगीत कार्यक्रम बने हुए हैं। पॉलिश की हुई PR टीम बनी हुई है। लेकिन इसके पीछे वही राजनीति और विचारधारा खड़ी है जिसके बारे में ऑपइंडिया ने सालों पहले चेतावनी दी थी।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

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Anurag is a Chief Sub Editor at OpIndia with over 22 years of professional experience, including more than six years in journalism. He is known for deep dive, research driven reporting on national security, terrorism cases, judiciary and governance, backed by RTIs, court records and on-ground evidence. He also writes hard hitting op-eds that challenge distorted narratives. Beyond investigations, he explores history, fiction and visual storytelling. Email: [email protected]

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इनकी सोच बहुत सीधी है, जिस भी सरकारी या प्राइवेट जमीन पर एक बार हक जता दिया या जिसे अपना मान लिया, उसे फिर किसी भी कीमत पर छोड़ना नहीं है।
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