मध्य प्रदेश के आगर-मालवा जिले के नलखेड़ा में स्थित प्रसिद्ध माँ बगलामुखी मंदिर में दान संग्रह को लेकर एक बहुत बड़ा विवाद सामने आया है। अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे को लेकर चल रहे विवाद के बीच इस सिद्धपीठ में भी दान और चढ़ावे के कथित गबन का आरोप लगा है।
आरोप है कि मंदिर के नाम पर एक अशासकीय यानी फर्जी प्राइवेट समिति बनाकर श्रद्धालुओं से नकद राशि और सोने-चाँदी के आभूषण दान के रूप में लूटे गए। मामले की गंभीरता को देखते हुए आगर-मालवा की जिला कलेक्टर प्रीति यादव ने 7 जुलाई 2026 को तीन सदस्यीय जाँच समिति का गठन कर दिया है।
यह समिति 7 दिन के भीतर पूरे मामले की जाँच कर अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपेगी, जिसके आधार पर दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। कलेक्टर कार्यालय में दर्ज कराई गई शिकायत के अनुसार, मंदिर परिसर में शासकीय प्रबंधन समिति से अलग एक गैर-सरकारी समिति काम कर रही थी।
यह समिति मंदिर परिसर में ही श्रद्धालुओं से नकद, सोना और चाँदी दान के रूप में एकत्रित कर रही थी। सबसे बड़ी गड़बड़ी यह सामने आई कि चढ़ावे की इस राशि को सरकारी खजाने में जमा करने के बजाय निजी बैंक अकाउंट में भेजा जा रहा था। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान वित्तीय रिकॉर्ड में भारी हेराफेरी की गई। श्रद्धालुओं को गुमराह करने के लिए फर्जी रसीदें भी बांटी जा रही थीं।
अफसरों की मिलीभगत से साल 2024 में बनी प्राइवेट समिति
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, माँ बगलामुखी मंदिर प्रबंध समिति के नाम से पहले से ही एक आधिकारिक सरकारी समिति मौजूद है। चूंकि यह मंदिर पूरी तरह सरकारी प्रबंधन के अधीन है, इसलिए इसके पदेन अध्यक्ष इलाके के SDM यानी डिप्टी कलेक्टर होते हैं और इसके सचिव तहसीलदार होते हैं। मंदिर के रोजमर्रा के कामों का संचालन आउटसोर्स कर्मचारियों के माध्यम से किया जाता है।
प्रशासनिक अधिकारी समय-समय पर इसका निरीक्षण भी करते हैं। इसके बावजूद साल 2024 में कथित तौर पर अफसरों की मिलीभगत से नियम विरुद्ध जाकर ‘नलखेड़ा सुदर्शन सेवा समिति’ नाम की एक प्राइवेट समिति बना दी गई। इस फर्जी समिति के प्रमुख पाँच सदस्य पूरी तरह से प्राइवेट लोग हैं। यह फर्जी समिति करीब तीन साल से अफसरों के सामने ही लोगों से खुलेआम दान ले रही थी।
मंदिर परिसर में सात शिलालेख लगे हुए हैं। इन शिलालेखों पर 170 उन लोगों के नाम दर्ज हैं जिन्होंने चाँदी दान की थी। इसके बाद कितने लोगों ने चढ़ावा दिया, इसका कोई भी रिकॉर्ड न तो मंदिर में मौजूद है और न ही जिला प्रशासन को सौंपा गया है। इस फर्जी समिति के निर्माण के समय डिप्टी कलेक्टर मिलिंद ढोके वहाँ के SDM थे। उन्हीं के सामने यह समिति बनी और काम करती रही, लेकिन उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की।
दिलचस्प बात यह है कि ढोके ने खुद भी 1 किलो चाँदी दान की थी, जिसका जिक्र मंदिर के शिलालेख पर है। शिलालेख में दूसरे और तीसरे नंबर पर तत्कालीन SDM और तहसीलदार के दान देने की बात साफ लिखी है। उनके बाद आए 2 अन्य SDM सर्वेश यादव और कमल मंडलोई ने भी इस अवैध वसूली पर कोई एक्शन नहीं लिया। इस समिति का आज तक कोई ऑडिट भी नहीं हुआ है। हालाँकि समिति के सदस्यों का दावा है कि तत्कालीन SDM की देखरेख में ही समिति का बाकायदा रजिस्ट्रेशन कराया गया था।
रजत सौंदर्यीकरण के नाम पर संगठित वसूली
पड़ताल के दौरान इस प्राइवेट समिति की रसीद भी हाथ लगी है। इस रसीद पर समिति का नाम और उसका उद्देश्य ‘रजत सौंदर्यीकरण करना’ लिखा हुआ है। इसी बहाने से मंदिर के गर्भगृह का चाँदी से सौंदर्यीकरण किया जा रहा है और बाहर भी चाँदी की सीटें लगाई जा रही हैं।
जिला प्रशासन के एक अधिकारी ने बताया कि यह मामला काफी बड़ा हो सकता है क्योंकि यह पूरी तरह संगठित तरीके से चल रहा था। नकली रसीदें और अलग काउंटर बनाकर श्रद्धालुओं से नकद और गहनों के रूप में दान लिया जा रहा था। वर्तमान में इस कथित दान घोटाले में कुल कितनी रकम की हेराफेरी हुई है, इसका पूरा हिसाब लगाया जाना बाकी है।
सरकार ने दिए सख्त कार्रवाई के निर्देश
मध्य प्रदेश के संस्कृति राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) धर्मेंद्र सिंह लोधी ने कहा कि उन्हें 7 जुलाई 2026 को इस मामले की जानकारी मिली थी। इसके तुरंत बाद उनके कार्यालय ने जिला कलेक्टर को कड़ी जाँच के निर्देश जारी किए। मंत्री ने साफ कहा कि कुछ लोग, जिनका मंदिर प्रशासन से कोई सीधा संबंध नहीं था, वे मंदिर के नाम पर रसीदें छपवाकर श्रद्धालुओं से अवैध तरीके से पैसे वसूल रहे थे।
उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी है कि इस मामले में शामिल किसी भी कर्मचारी या अधिकारी को बख्शा नहीं जाएगा और सरकार दोषियों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कानूनी कार्रवाई करेगी। कलेक्टर प्रीति यादव द्वारा बनाई गई 3 सदस्यीय जाँच समिति की अध्यक्षता जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी यानी CEO बीएस सोलंकी कर रहे हैं।
इस समिति में जिला कोषालय अधिकारी मनीष सोलंकी और नलखेड़ा नगर परिषद की मुख्य नगरपालिका अधिकारी मिनी अग्रवाल को सदस्य बनाया गया है। यह टीम फिलहाल मंदिर पहुँचकर सारे दस्तावेज खंगाल रही है और मुख्य रूप से चार बिंदुओं पर जाँच कर रही है।
मंदिर में कुल कितना चढ़ावा आया और उसे सरकारी खजाने में क्यों नहीं जमा कराया गया? गर्भगृह की सजावट में वास्तव में कितनी चांदी का इस्तेमाल हुआ? समिति ने अब तक कितने लोगों से चढ़ावा लिया और उसका लिखित रिकॉर्ड कहाँ है? मंदिर सरकारी होने और उसकी अपनी समिति होने के बाद भी प्राइवेट लोगों की समिति बनाना कितना सही है?
मंदिर की सुरक्षा व्यवस्था और दान पेटियाँ
शासकीय प्रबंध समिति की ओर से मंदिर में कुल 27 दान पेटियाँ रखी गई हैं। इसके अलावा ऑनलाइन तरीके से भी श्रद्धालुओं से दान राशि जमा कराने की व्यवस्था की गई है, जहाँ पॉइंट ऑफ सेल यानी POS मशीन से पक्की रसीद दी जाती है। इसी वजह से इस फर्जी समिति के गठन और उसमें शामिल अधिकारियों की भूमिका पर बड़े सवाल उठ रहे हैं। सुरक्षा के लिहाज से मंदिर परिसर में कुल 28 CCTV कैमरे लगाए गए हैं, जिनमें से 4 कैमरे फिलहाल खराब पड़े हैं।
मंदिर में सुरक्षा गार्ड और सफाईकर्मी मिलाकर कुल 20 कर्मचारी प्रतिदिन तैनात रहते हैं। ये सभी दैनिक वेतनभोगी हैं, जिन्हें आधिकारिक मंदिर समिति वेतन देती है। इस विवाद के सामने आने के बाद ‘नलखेड़ा सुदर्शन सेवा समिति’ के अध्यक्ष मनोहरलाल पंडा या कोई भी सदस्य कुछ भी बोलने से इनकार कर रहे हैं। मनोहरलाल पंडा ने मोबाइल पर चर्चा के दौरान नलखेड़ा में होने से साफ मना कर दिया और वे मीडिया के सामने भी नहीं आ रहे हैं।
मंदिर में पिछले 9 साल से पूजा कर रहे पुजारी विशाल तिवारी ने कहा कि जिला प्रशासन को इस पूरे मामले की निष्पक्ष जाँच करनी चाहिए। अगर यह शिकायत गलत भी साबित होती है, तो भी संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई हो क्योंकि इस पूरे विवाद से विश्व प्रसिद्ध मंदिर की छवि धूमिल हो रही है।
प्रतिदिन दर्शन करने आने वाले भक्त कैलाश मकवाना का कहना है कि समिति में जो लोग हैं, वे सक्षम हैं और ऐसा नहीं कर सकते। मामले की जाँच चल रही है और जल्द ही दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। मैया सबको देख रही हैं और जो भी बेईमानी करेगा उसे सजा मिलकर रहेगी।
जानिए माँ बगलामुखी मंदिर का गौरवशाली इतिहास
नलखेड़ा में लखुंदर नदी के तट पर स्थित मां बगलामुखी मंदिर देश के प्रमुख और सबसे जाग्रत शक्तिपीठों में माना जाता है। यह पवित्र स्थल तंत्र साधना और अदालती मामलों में सफलता की कामना के लिए देशभर के श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। यह मंदिर धार्मिक एवं तांत्रिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। मंदिर में स्थित माँ बगलामुखी की मूर्ति पांडव कालीन मानी जाती है, जिसका स्पष्ट प्रमाण कालिका पुराण में मिलता है।
यह मंदिर 500 वर्ष से भी अधिक पुराना है। मान्यताओं के अनुसार द्वापर युग में अज्ञातवास के समय पांडवों के वैभव खो जाने पर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें माँ बगलामुखी की साधना करने का निर्देश दिया था। पांडवों ने लखुंदर नदी के तट के समीप अपनी यात्रा को विश्राम दिया और माँ की घोर तपस्या की। तपस्या से प्रसन्न होकर माँ ने उन्हें दर्शन दिए और महाभारत युद्ध में विजयी होने का वरदान दिया।
इस मंदिर का वर्णन राजा विक्रमादित्य के काल में भी मिलता है। माँ बगलामुखी की यह अलौकिक मूर्ति किसी मानव द्वारा निर्मित नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह स्वयंभू यानी स्वतः प्रकट हुई मूर्ति है। मंदिर के पीछे बहने वाली लखुंदर नदी का पानी वर्ष भर रहता है, जो इसके प्राकृतिक सौंदर्य को बढ़ाता है। नदी के किनारे कई संतों की समाधियाँ स्थित हैं, जिससे प्राचीन काल में यहाँ बड़ी संख्या में संतों के रहने का प्रमाण मिलता है।
मंदिर के चारों दिशाओं में श्मशान यानी मुक्तिधाम स्थित है, जो इसके एक सिद्ध तंत्र स्थल होने का पक्का सबूत है। मंदिर परिसर में 16 खंभों वाला एक सुंदर सभा मंडप बना हुआ है। इसका निर्माण संवत 1815 यानी 276 ईस्वी पूर्व पंडित ईबूजी दक्षिणी और कारीगर श्री तुलाराम ने करवाया था। इसी सभा मंडप में माँ की ओर मुख किए हुए एक कछुआ स्थापित है, जो यह दर्शाता है कि पुराने समय में यहाँ माँ को बलि चढ़ाई जाती थी।
मंदिर के ठीक सामने 32 फीट ऊँची दीपमाला स्थित है, जिसका निर्माण महाराजा विक्रमादित्य ने करवाया था। मंदिर प्रांगण में ही एक दक्षिण मुखी हनुमान मंदिर, उत्तर मुखी राधा-कृष्ण मंदिर और पूर्व मुखी भैरव जी का मंदिर स्थित है। इस मंदिर का सिंहमुखी द्वार श्रद्धालुओं के बीच बेहद प्रसिद्ध है।
10 महाविद्याओं में से एक हैं माँ बगलामुखी
हिंदू धर्म और तंत्र शास्त्र में 10 महाविद्याओं का विशेष स्थान है, जो दिव्य स्त्री शक्ति के विभिन्न रूपों को दर्शाती हैं। माँ बगलामुखी इन दस महाविद्याओं में से आठवीं महाविद्या हैं। सृष्टि की रचना के बाद ब्रह्मा जी देवताओं और दानवों के आपसी बैर से बहुत व्यथित रहते थे। दानव अधिक शक्तिशाली और क्रूर थे, जिससे देवताओं की संख्या घटने लगी। देवताओं की रक्षा के लिए समुद्र मंथन से अमृत निकाला गया और भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर उसे देवताओं में बांट दिया।
इसके बाद भी दानव अपने योगबल से देवगणों पर विजय पाते रहे। तब ब्रह्मा जी भगवान शंकर के पास गए, जो माता पार्वती के साथ पर्वत पर विराजमान थे। ब्रह्मा जी ने कहा कि दानव शक्ति के आगे देव शक्तियाँ निर्बल बनी हुई हैं। इस पर भगवान शंकर के मुख से क्रोध के कारण एक महान तेज उत्पन्न हुआ, जिससे संपूर्ण लोकों में कंपन शुरू हो गया। इसके बाद वह तेज एक स्त्री के रूप में बदल गया। शिव की उग्र स्वरूपा होने के कारण इस देवी के शीश पर चंद्र जटित मुकुट और ललाट पर तीसरा नेत्र था।
देवी ने शरीर पर पीले वस्त्र धारण कर रखे थे और उनके एक हाथ में शत्रु की जिह्वा तथा दूसरे हाथ में प्रलयंकर गदा थी। यही शक्ति स्वरूप पूरे विश्व में माँ बगलामुखी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इन्हें वाणी, वाकपटुता और शत्रुओं को स्तंभित करने वाली देवी माना जाता है।
ये हैं 10 महाविद्याएँ और उनके मुख्य पहलू
काली: समय, परिवर्तन और विनाश की उग्र देवी जो दुख के चक्र से मुक्ति देती हैं। तारा: करुणा और सुरक्षा की देवी जो संकट के समय मार्गदर्शन करती हैं। त्रिपुर सुंदरी: सुंदरता और सर्वोच्च वास्तविकता का प्रतीक जो इच्छाओं को पूर्ण करती हैं। भुवनेश्वरी: भौतिक ब्रह्मांड को बनाए रखने वाली और समृद्धि देने वाली माँ। छिन्नमस्ता: आत्म-बलिदान, अहंकार के विनाश और मानसिक नियंत्रण की देवी।
धूमावती: शून्यता और संकटों से आने वाले ज्ञान और बुद्धि की वृद्ध देवी। बगलामुखी: ज्ञान, अलौकिक शक्ति और शत्रुओं की वाणी पर नियंत्रण की देवी। मातंगी: कला, संगीत, रचनात्मकता और पारंपरिक सीमाओं से परे ज्ञान की देवी। षोडशी: पूर्णता, आंतरिक शांति और उच्च चेतना की दिव्य प्रतिमूर्ति। कमलात्मिका: धन, समृद्धि, उर्वरता और वित्तीय सफलता देने वाली माँ लक्ष्मी का रूप।
इस पवित्र मंदिर के गर्भगृह में माता तीन स्वरूपों में विराजती हैं। इसमें दाईं ओर महालक्ष्मी, बाईं ओर माँ सरस्वती और मध्य में माँ बगलामुखी के दर्शन होते हैं। मंदिर का गर्भगृह 3 करोड़ रुपए से अधिक मूल्य के स्वर्ण, करीब 65 लाख रुपए की चाँदी और बहुमूल्य आभूषणों से सुसज्जित है।


