गुजरात सरकार ने कट्टरपंथ पर लगाम लगाने के लिए बड़ी कार्रवाई की शुरुआत कर दी है। सरकार ने अपने एंटी-रेडिकलाइजेशन सेल (ARC) को औपचारिक रूप से लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। गुजरात स्टेट पुलिस सर्विस (SPS) ने राज्य के सभी जिला और पुलिस कमिश्नरेट कार्यालयों को विस्तृत स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) भेजी है।
14 जुलाई 2026 को गाँधीनगर स्थित स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो की ओर से जारी इस पत्र पर DCI (C) प्रफुल वाणिया के हस्ताक्षर हैं और इसे सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी के बाद राज्यभर की पुलिस इकाइयों को लागू करने के लिए भेजा गया।
जिला पुलिस अधीक्षकों और वरिष्ठ रेंज अधिकारियों को भेजे गए इस परिपत्र में कहा गया है कि नवगठित एंटी-रेडिकलाइजेशन सेल स्थानीय पुलिस इकाइयों, जेल प्रशासन, स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप (SOG) और स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारियों के साथ समन्वय करके काम करेगा।
SOP के साथ राज्य सरकार ने मासिक रिपोर्ट का प्रारूप भी जारी किया है, जिसे जिला इकाइयों को हर महीने की 5 तारीख तक इंटेलिजेंस मुख्यालय को भेजना होगा।
यह कदम गुजरात गृह विभाग द्वारा 2026-27 सेवा वर्ष के तहत एंटी-रेडिकलाइजेशन सेल के ढाँचे के लिए जिला और पुलिस कमिश्नरेट कार्यालयों में 100 से अधिक नए पदों को मंजूरी दिए जाने के कुछ महीनों बाद उठाया गया है।
गुजरात सरकार ने तैयार किया एंटी-रेडिकलाइजेशन का अलग ढाँचा
आधिकारिक पत्र के अनुसार, गुजरात गृह विभाग ने राज्यभर में एंटी-रेडिकलाइजेशन सेल (ARC) का नेटवर्क स्थापित करने के लिए विभिन्न संवर्गों में 136 नए पदों के सृजन को मंजूरी दी है। इन पदों पर भर्ती और तैनाती की प्रक्रिया फिलहाल जारी है।
ARC का उद्देश्य कट्टरपंथी विचारधाराओं के प्रसार को रोकना, कट्टरपंथ की ओर बढ़ रहे लोगों की पहचान करना, उनकी काउंसलिंग और डी-रेडिकलाइजेशन की प्रक्रिया चलाना, उनके पुनर्वास में मदद करना और यह सुनिश्चित करना है कि वे दोबारा किसी कट्टरपंथी नेटवर्क से न जुड़ें।
SOP में ‘कट्टरपंथी व्यक्ति’ की परिभाषा ऐसे व्यक्ति के रूप में दी गई है, जो उग्रवादी विचारधाराओं से प्रभावित होकर राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शामिल हो, देश की एकता और अखंडता को नुकसान पहुँचाने की कोशिश करे, लोगों के बीच भय फैलाए या दूसरों को भी कट्टरपंथी विचारधारा अपनाने के लिए प्रभावित करे।
दस्तावेज में ऐसे लोगों का भी उल्लेख किया गया है, जो अन्य धर्मों के अनुयायियों के प्रति शत्रुता फैलाने या यह प्रचार करने का प्रयास करते हैं कि केवल उनका मजहब ही सही है और बाकी सभी गलत हैं। अधिकारियों का कहना है कि यह व्यवस्था जिला पुलिस अधिकारियों को एक संगठित ढाँचा उपलब्ध कराने के लिए बनाई गई है।
ताकि वे कट्टरपंथ के शुरुआती संकेतों की समय रहते पहचान कर सकें और किसी व्यक्ति के आपराधिक या आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने से पहले आवश्यक हस्तक्षेप कर सकें।
कट्टरपंथ से निपटने के लिए 5 चरणों का मॉडल: रोकथाम, पहचान, हस्तक्षेप, पुनर्वास और निगरानी
SOP में कट्टरपंथ से निपटने के लिए पाँच चरणों वाला मॉडल तय किया गया है। इसका पहला चरण ‘रोकथाम (Prevention)’ है, जिसका उद्देश्य ऑनलाइन माध्यमों की निगरानी करना और कट्टरपंथी प्रचार के प्रसार को रोकना है। इसके तहत पुलिस इकाइयों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन फोरम, मैसेजिंग एप्लिकेशन और उन संदिग्ध नेटवर्कों पर नजर रखने के निर्देश दिए गए हैं, जहाँ कट्टरपंथी सामग्री का प्रसार किया जा सकता है।
दस्तावेज में विशेष रूप से कट्टरपंथी प्रचारकों, सांप्रदायिक संगठनों, कट्टरपंथ से प्रभावित कैदियों और उग्रवादी विचारधारा से जुड़े लोगों पर निगरानी रखने की बात कही गई है। इसमें सलफी और वहाबी विचारधारा से जुड़े ऐसे प्रभावशाली लोगों (इन्फ्लुएंसर्स) पर भी नजर रखने का उल्लेख है, जिनका इस्तेमाल जाँच एजेंसियों के अनुसार कट्टरपंथी नेटवर्क नए लोगों की भर्ती के लिए कर सकते हैं।
जिला इकाइयों को संवेदनशील क्षेत्रों में अपने खुफिया स्रोत विकसित करने और संभावित खतरों की शुरुआती स्तर पर पहचान के लिए स्थानीय समुदायों के साथ लगातार संपर्क बनाए रखने के भी निर्देश दिए गए हैं। SOP का दूसरा चरण ‘पहचान (Detection)’ है।
इसमें ऐसे व्यवहारिक, वित्तीय और डिजिटल संकेतों का उल्लेख किया गया है, जिन्हें अधिकारियों को किसी व्यक्ति के कट्टरपंथ की ओर बढ़ने के संभावित मामलों की पहचान करते समय ध्यान में रखना होगा।
SOP में बताए गए व्यवहार संबंधी संकेतों में अचानक दाढ़ी बढ़ाना, नकाब पहनना, बातचीत में बार-बार अरबी शब्दों का इस्तेमाल करना, दोस्तों और परिवार से संपर्क कम कर देना, मुस्लिम समुदाय से जुड़े वैश्विक घटनाक्रमों पर तीव्र विरोध जताना, आतंकवादियों का महिमामंडन करना या संघर्ष प्रभावित विदेशी क्षेत्रों की यात्रा के बाद व्यवहार में बदलाव दिखाई देना शामिल है।
दस्तावेज में कुछ ऐसी संदिग्ध गतिविधियों का भी उल्लेख किया गया है, जिन पर अन्य खुफिया सूचनाओं के साथ मिलाकर विशेष निगरानी रखने की आवश्यकता हो सकती है। इनमें अमोनियम नाइट्रेट या पोटैशियम नाइट्रेट जैसे विस्फोटक बनाने में इस्तेमाल होने वाले रसायनों की खरीद, सुनसान स्थानों पर बिना स्पष्ट कारण बार-बार जाना, संघर्षग्रस्त या आतंकवाद प्रभावित क्षेत्रों में मौजूद लोगों से लगातार संपर्क में रहना और असामान्य रूप से बड़ी नकद निकासी करना शामिल है।
डिजिटल स्तर पर SOP में अधिकारियों को एन्क्रिप्टेड संचार प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल, कट्टरपंथी ऑनलाइन समूहों में भागीदारी, उग्रवादी प्रचार सामग्री के प्रसार और ऐसे लोगों द्वारा बिना किसी स्पष्ट आय स्रोत के क्रिप्टोकरेंसी के असामान्य इस्तेमाल पर निगरानी रखने के निर्देश दिए गए हैं।
एंटी-रेडिकलाइजेशन सेल (ARC) को कट्टरपंथी तत्वों का रिकॉर्ड तैयार करने, चिन्हित व्यक्तियों की अलग डोजियर (विस्तृत फाइल) बनाने, उन्हें हर महीने अपडेट करने और ऐसे व्यक्तियों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों का रिकॉर्ड सुरक्षित रखने के भी निर्देश दिए गए हैं।
काउंसलिंग और मुख्यधारा में वापसी पर भी जोर
आतंकवाद से निपटने के केवल दंडात्मक उपायों के बजाय गुजरात एंटी-रेडिकलाइजेशन सेल (ARC) की SOP में काउंसलिंग और पुनर्वास पर भी विशेष जोर दिया गया है।
‘हस्तक्षेप (Intervention)’ चरण के तहत जिला प्रशासन को ऐसे प्रभावशाली सामुदायिक नेताओं, मजहबी विशेषज्ञों, मनोवैज्ञानिकों, शिक्षकों, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और गैर-सरकारी संगठनों (NGO) की पहचान करने के निर्देश दिए गए हैं, जो डी-रेडिकलाइजेशन की प्रक्रिया में सहयोग कर सकें।
SOP में परिवार के सदस्यों, मजहबी विशेषज्ञों, मनोचिकित्सकों और विभाग के प्रशिक्षित कर्मियों की मौजूदगी में काउंसलिंग सत्र आयोजित करने की सिफारिश की गई है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि काउंसलिंग से गुजर रहे व्यक्तियों की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखी जाएगी।
अधिकारियों को ऐसे लोगों को दोबारा शिक्षा या रोजगार से जोड़ने में मदद करने और हस्तक्षेप की प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी उनके साथ नियमित संपर्क बनाए रखने के निर्देश दिए गए हैं। हालाँकि दस्तावेज में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि काउंसलिंग और अन्य प्रयासों के बावजूद कोई व्यक्ति अपराध करता है या उसकी तैयारी करता है, तो उसके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के संबंधित प्रावधानों के तहत कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
इस ढाँचे का चौथा चरण पुनर्वास और समाज की मुख्यधारा में दोबारा शामिल करने पर केंद्रित है। इसके तहत सेमिनार, सामुदायिक पुलिसिंग कार्यक्रम, खेल प्रतियोगिताएं, कौशल विकास पहल और रोजगार मेलों जैसी गतिविधियों के माध्यम से लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने की बात कही गई है।
अंतिम चरण में डी-रेडिकलाइजेशन कार्यक्रम से गुजर चुके लोगों की लंबे समय तक निगरानी करने का प्रावधान है, ताकि वे दोबारा कट्टरपंथ की ओर न लौटें। इसके लिए शुरुआत में उनकी गतिविधियों की मासिक रिपोर्ट तैयार की जाएगी और उसके बाद समय-समय पर उनकी निगरानी जारी रखी जाएगी।
जिला ARC इकाइयों के लिए मंथली रिपोर्टिंग व्यवस्था लागू
SOP के तहत जिला स्तर की एंटी-रेडिकलाइजेशन सेल (ARC) इकाइयों के लिए विस्तृत मासिक रिपोर्टिंग व्यवस्था भी लागू की गई है। अब पुलिस अधिकारियों को हर महीने आयोजित किए गए काउंसलिंग सत्रों, डी-रेडिकलाइजेशन कार्यक्रम से गुजर रहे लोगों की संख्या, महीने के दौरान खोले गए नए डोजियर, कट्टरपंथी तत्वों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों, आयोजित सेमिनारों और जागरूकता कार्यक्रमों तथा शैक्षणिक और मजहबी संस्थानों में आयोजित व्याख्यान सत्रों की जानकारी देनी होगी।
जिला इकाइयों को सोशल मीडिया पर कट्टरपंथी विचारों का मुकाबला करने के लिए किए गए हस्तक्षेपों, ऑनलाइन पहचानी गई आपत्तिजनक सामग्री और उसके खिलाफ की गई कार्रवाई का विवरण भी अपनी मासिक रिपोर्ट में शामिल करने के निर्देश दिए गए हैं।
SOP पर ‘द वायर’ ने जताई आपत्ति, मुस्लिमों को निशाना बनाने का लगाया आरोप
SOP की जानकारी सोशल मीडिया पर सामने आने के कुछ ही समय बाद वामपंथी पोर्टल द वायर ने इस पर तीखी आलोचना करते हुए एक रिपोर्ट प्रकाशित की। “For Gujarat Police, Beard, Niqab Make ‘Radicalisation’ Checklist, Cow Vigilantism Doesn’t” शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में दावा किया गया कि यह ढाँचा मुख्य रूप से इस्लामी कट्टरपंथ पर केंद्रित है, जबकि अन्य प्रकार के उग्रवाद पर इसमें कोई चर्चा नहीं की गई है।
रिपोर्ट में कहा गया कि SOP में बताए गए कुछ संकेत, जैसे दाढ़ी रखना, नकाब पहनना, बार-बार अरबी शब्दों का इस्तेमाल करना या एतिकाफ (Itikaf) जैसी मजहबी प्रथाओं का पालन करना, आम मुस्लिमों को भी संदेह की नजर से देखने का कारण बन सकते हैं।
सूरत निवासी फिरोज खान के हवाले से ‘द वायर’ ने लिखा, “क्या हमें अपनी दाढ़ी मुंडवा लेनी चाहिए और मुस्लिम पैदा होने की सजा खुद को देनी चाहिए?” प्रकाशन ने यह भी दावा किया कि SOP में मजहबी पहचान और सुरक्षा संबंधी चिंताओं को एक साथ जोड़ दिया गया है।
रिपोर्ट में यह सवाल भी उठाया गया कि दस्तावेज में अफगानिस्तान या मध्य-पूर्व की यात्रा, सिग्नल (Signal) और एलिमेंट (Element) जैसे एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स के इस्तेमाल तथा कुछ मजहबी संस्थानों या विद्वानों से संपर्क का विशेष रूप से उल्लेख क्यों किया गया है।
रिपोर्ट में SOP के उस निर्देश की भी आलोचना की गई, जिसमें पुलिस अधिकारियों से मदरसा शिक्षकों का रिकॉर्ड रखने और यह पता लगाने को कहा गया है कि उनका किसी उग्रवादी संगठन से संबंध है या नहीं।
द वायर के अनुसार, यह SOP ‘आम मुस्लिमों को दंडित करने के उद्देश्य से तैयार की गई प्रतीत होती है’ और इसमें उस प्रकार के संकेत शामिल नहीं किए गए हैं, जिन्हें उसने ‘हिंदू कट्टरपंथ’ या देश के विभिन्न हिस्सों में वर्षों के दौरान हुई गौरक्षा के नाम पर हिंसा से जोड़कर देखा।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि गुजरात के पत्रकार साहिल कुरैशी ने दावा किया है कि SOP से संबंधित उनकी सोशल मीडिया पोस्ट वायरल होने के बाद पुलिस अधिकारियों ने उन्हें चेतावनी दी। रिपोर्ट के अनुसार, उनका आरोप है कि अधिकारियों ने उनसे पोस्ट हटाने के लिए कहा, क्योंकि इससे राज्य में सांप्रदायिक सौहार्द प्रभावित हो सकता है।
पहले से चल रही थी एंटी-रेडिकलाइजेशन सेल की तैयारी
भले ही गुजरात में एंटी-रेडिकलाइजेशन सेल (ARC) का औपचारिक गठन हाल ही में हुआ है, लेकिन इसकी अवधारणा नई नहीं है। समर्पित डी-रेडिकलाइजेशन तंत्र की अवधारणा को राष्ट्रीय स्तर पर पहली बार 2015 में गुजरात के रण ऑफ कच्छ में आयोजित पुलिस महानिदेशकों (DGP) और पुलिस महानिरीक्षकों (IGP) के सम्मेलन के दौरान प्रमुखता मिली थी।
उस बैठक में तेलंगाना पुलिस के डी-रेडिकलाइजेशन मॉडल पर चर्चा हुई थी और इसे अन्य राज्यों के लिए संभावित मॉडल के रूप में देखा गया था। इसके बाद वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के अन्य सम्मेलनों में भी यह मुद्दा उठा, जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी शामिल हुए थे।
बाद में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने गुजरात विधानसभा चुनाव के अपने घोषणापत्र में एंटी-रेडिकलाइजेशन सेल की स्थापना का वादा किया और इसे लागू करने की दिशा में तैयारियाँ शुरू कीं। इसके लिए पुलिस अधिकारियों, आतंकवाद-रोधी विशेषज्ञों और शिक्षाविदों की एक टास्क फोर्स भी गठित किए जाने की जानकारी सामने आई, जिसे इस विषय का अध्ययन कर संस्थागत ढाँचा तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।
इस वर्ष की शुरुआत में प्रशासनिक मंजूरी और बजटीय आवंटन मिलने के बाद एंटी-रेडिकलाइजेशन सेल के ढाँचे को औपचारिक रूप से लागू किया गया। इसके बाद जिला इकाइयों को SOP जारी कर दी गई।
क्या है इस SOP का उद्देश्य?
SOP जारी होने और एंटी-रेडिकलाइजेशन सेल (ARC) के लिए अलग से पद सृजित किए जाने के साथ गुजरात उन चुनिंदा राज्यों में शामिल हो गया है, जिन्होंने खुफिया जानकारी जुटाने, काउंसलिंग, पुनर्वास और दीर्घकालिक निगरानी को एक ही व्यवस्था के तहत जोड़ने वाला राज्यव्यापी एंटी-रेडिकलाइजेशन ढाँचा तैयार किया है।
हालाँकि वामपंथी पोर्टल द वायर ने आरोप लगाया कि SOP में दिए गए संकेतों का असर असमान रूप से मुस्लिमों पर पड़ता है, लेकिन दस्तावेज में किसी भी विशेष समुदाय को स्वभावतः कट्टरपंथी या विशेष निगरानी के योग्य नहीं बताया गया है।
इसके बजाय ARC का ढाँचा उन व्यक्तियों पर केंद्रित है, जो उग्रवादी विचारधाराओं को अपनाते हैं या उनका प्रचार करते हैं, राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शामिल होते हैं, मजहबी श्रेष्ठता का प्रचार करते हैं, हिंसक लामबंदी करते हैं या दूसरों को कट्टरपंथ की ओर ले जाने का प्रयास करते हैं, चाहे उनकी पहचान कुछ भी हो।
SOP में बताए गए कई व्यवहारिक और डिजिटल संकेत, जैसे आतंकवादियों का महिमामंडन, उग्रवादी संगठनों से संबंध, ऑनलाइन प्रचार नेटवर्क में भागीदारी, उग्रवादी समूहों द्वारा एन्क्रिप्टेड संचार माध्यमों का इस्तेमाल, संघर्षग्रस्त क्षेत्रों से विदेशी संपर्क और कट्टरपंथ के साथ व्यवहार में अचानक बदलाव, पिछले कई वर्षों में भारत और विदेशों की सुरक्षा एजेंसियों द्वारा की गई अनेक आतंकवाद संबंधी जाँचों और डी-रेडिकलाइजेशन मामलों में सामने आते रहे हैं।
गुजरात पुलिस की यह SOP ऐसे संकेतों को एक प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (Early Warning Framework) का हिस्सा बनाती है, ताकि किसी व्यक्ति के उग्रवादी विचारों से आगे बढ़कर आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने का इंतजार करने के बजाय पहले ही हस्तक्षेप किया जा सके।
दस्तावेज में गौरक्षा के नाम पर हिंसा या तथाकथित ‘हिंदू कट्टरपंथ’ का उल्लेख न होने को लेकर की गई आलोचना के संबंध में भी यह कहा गया है कि ARC की SOP उसी कट्टरपंथ की परिभाषा के दायरे में काम करती है, जिसे दस्तावेज में निर्धारित किया गया है।
यह ढाँचा संगठित वैचारिक कट्टरपंथ, उग्रवादी भर्ती और उन प्रक्रियाओं की पहचान के लिए तैयार किया गया है, जो आगे चलकर आतंकवाद या राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में बदल सकती हैं। वहीं भीड़ हिंसा, स्वयंभू सतर्कता (विजिलेंटिज्म) या सांप्रदायिक झड़पों से जुड़े अपराध मौजूदा आपराधिक कानूनों और पुलिस व्यवस्था के तहत ही आते हैं, जब तक कि वे ARC की परिभाषा में तय किए गए मानकों पर खरे न उतरें।
(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)


