‘द न्यूज मिनट’ ने सरकारी स्वामित्व वाली तेल कंपनी ओएनजीसी के बारे में एक रिपोर्ट 19 जुलाई 2026 को प्रकाशित किया । रिपोर्ट में कहा गया है कि ओएनजीसी ने आरएसएस से जुड़े 20 संगठनों को 670.97 करोड़ रुपए दिए। 2013 में सबसे पहले पैसे दिए गए। हालाँकि इसका अधिकांश हिस्सा पिछले 10 वर्षों में यानी 2015 और 2025 के बीच दिए गए, जो 668.01 करोड़ रुपए था।
इसी अवधि में, ONGC ने CSR पर कुल ₹4531 करोड़ खर्च किए। पूरे सीएसआर फंड 2000 से अधिक संगठनों के बीच बांटा गया यानी कुल फंड का केवल 14.7% हिस्सा ही इन 20 संस्थाओं को गया।

न्यूज मिनट ने 20 संगठनों को तीन समूहों में विभाजित किया। नौ संगठन सीधे आरएसएस से जुड़े हैं। जबकि नौ दूसरे संगठनों की स्थापना आरएसएस से जुड़े लोगों ने की है या उनका संचालन आरएसएस के कार्यकर्ता कर रहे हैं। दो ने अतीत में आरएसएस के साथ काम किया है।
जिन दो संगठनों को सबसे अधिक धनराशि प्राप्त हुई, वे थे बीएवीपी (डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर वैद्यकीय प्रतिष्ठान) और डीएटीएसएएस (डॉ. आबाजी थाट्टे सेवा और अनुसंधान संस्था)। बीएवीपी को असम के शिवसागर में 300 बिस्तरों वाला अस्पताल बनाने के लिए लगभग 434 करोड़ रुपए मिले, वहीं डीएटीएसएएस को नागपुर में कैंसर अस्पताल के लिए लगभग 140 करोड़ रुपए मिले।
ये आँकड़े सीधे ओएनजीसी की सीएसआर वार्षिक रिपोर्ट से लिए गए हैं। ये आँकड़े ओएनजीसी की वेबसाइट पर उपलब्ध है। ये तथ्य है और इसे समझना बेहद जरूरी है।
बाकी करीब 85% हिस्सा किन संगठनों को मिला
आरएसएस से जुड़े संगठनों को 14.7% ही मिला, बाकि 85% से थोड़ा अधिक हिस्सा यानी 4531 करोड़ रुपए के CSR खर्च में से लगभग 3863 करोड़ रुपए उन संगठनों को दिए गए, जिनका RSS से कोई संबंध नहीं है। इनकी संख्या 1980 से अधिक है।
अगर हम ONGC की वार्षिक CSR रिपोर्टों को देखें, तो ये पता चलता है कि ये खर्च कितना ज्यादा है। ये रिपोर्ट 2018-19 से सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं। अकेले वित्तीय वर्ष 2024-25 में ONGC ने असम के एसएम देव सिविल अस्पताल और करीमगंज सिविल अस्पताल के लिए चिकित्सा उपकरण उपलब्ध कराए। इनमें एनेस्थीसिया वर्कस्टेशन, आईसीयू वेंटिलेटर और डिजिटल रेडियोग्राफी सिस्टम शामिल हैं।
कंपनी ने इसके साथ-साथ हरिद्वार के एक नर्सिंग कॉलेज के लिए सभागार बनवाया। कोयंबटूर में बाल विकास सेवाओं के लिए सात आंगनवाड़ी भवन बनवाए। गुरुग्राम में ब्रह्मा कुमारिस के रिट्रीट सेंटर के लिए एक सौर ऊर्जा संयंत्र और ठाणे की एक झील से कचरा साफ करने में मदद करने वाली एक AI-सक्षम मशीन के लिए रकम उपलब्ध कराया। इनमें से किसी भी संगठन का RSS से कोई संबंध नहीं है। इनमें सरकारी सिविल अस्पतालों से लेकर पश्चिम बंगाल में एम्बुलेंस सेवा चलाने वाले एक सिख धर्मार्थ ट्रस्ट तक का नाम है।
ओएनजीसी के वित्त वर्ष 2018-19 के रिकॉर्ड भी इसी तरह के पैटर्न को दर्शाते हैं। हेल्पएज इंडिया को देशभर में बुजुर्ग नागरिकों की सेवा करने वाली मोबाइल मेडिकल यूनिटों के लिए 7 करोड़ रुपये से अधिक की राशि दी गई। अक्षय पात्र फाउंडेशन को राजस्थान और झारखंड में स्कूली बच्चों को भोजन पहुँचाने के लिए वाहनों की फंडिंग की गई।
केरल में आई बाढ़ के दौरान, ओएनजीसी ने हैबिटेट फॉर ह्यूमैनिटी के माध्यम से राहत कार्यों के लिए फंडिंग की और तमिलनाडु में चक्रवात गाजा जब तबाही मचा रहा था तो उस वक्त स्थानीय रिलीफ संगठनों के माध्यम से इमरजेंसी भोजन और लाइट के लिए फंडिंग की।
उसी वर्ष हजारों छोटे अनुदान बिहार, गुजरात और उत्तर प्रदेश के गाँवों में शौचालय बनाने, दूरदराज के क्षेत्रों में हैंडपंप और सौर स्ट्रीट लाइट लगाने और राष्ट्रीय स्तर पर केंद्रीय विद्यालय स्कूलों को सहायता प्रदान करने के लिए दिए गए। इनमें से अकेले केंद्रीय विद्यालय को एक वर्ष में 53 करोड़ रुपये से अधिक की राशि प्राप्त हुई।
इस कार्य में विचारधारा कभी आड़े नहीं आता। संरक्षण कार्यों के लिए वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया और वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन सोसाइटी इंडिया, प्रशिक्षण और अभियानों के लिए इंडियन माउंटेनियरिंग फाउंडेशन, कई राज्यों में स्वच्छता परियोजनाओं के लिए सुलभ इंटरनेशनल और विकलांगों के संगठनों को मदद की। कंपनी ने भगवान महावीर विकलांग सहायता समिति को भी मदद की थी, जो कम कीमत पर या फ्री में कृत्रिम अंग बाँटती हैं।
कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि ओएनजीसी का सीएसआर खर्च वास्तव में बड़ा है। कंपनी इसके माध्यम से स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, आपदा राहत, स्वच्छता, वन्यजीव संरक्षण और हाशिए पर पड़े समुदायों को मदद करती है। यह राष्ट्रीय गैर सरकारी संगठनों से लेकर स्थानीय ग्राम पंचायतों तक को मदद करती है। न्यूज़ मिनट ने अपनी रिपोर्ट में ₹668 करोड़ आरएसएस से जुड़े 20 संगठनों को देने की बात कही है वह सही है, लेकिन यह एक बहुत बड़े सीएसआर बजट का एक छोटा सा हिस्सा है।
न्यूज मिनट ने अधूरी जानकारी दी
यह देखना महत्वपूर्ण है कि 668 करोड़ रुपये की राशि वास्तव में 20 संगठनों के बीच कैसे वितरित की गई है। ₹668 करोड़ में से 574 करोड़ रुपए यानी लगभग 86% केवल दो संगठनों BAVP और DATSAS को दी गई। बाकी 18 संगठनों को करीब 94 करोड़ रुपए मिले। इस दौरान किसी संगठन को 1 करोड़ भी मिले तो किसी को 15.53 करोड़ रुपये भी दिए गए।
यह इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि अस्पताल और कैंसर संस्थान बनाना महँगा पड़ता है। एक बड़ी स्वास्थ्य परियोजना पर आसानी से सैकड़ों करोड़ रुपए खर्च हो सकते हैं, जबकि स्कूल, छात्रावास और आपदा राहत जैसे दूसरे सामाजिक सेवा संबंध (सीएसआर) कार्यों में काफी कम खर्च आता है। यही वजह है कि आरएसएस से जुड़े कुल दान का बड़ा हिस्सा दो अस्पताल से जुड़े परियोजनाओं पर खर्च किया गया। इसलिए 14.7% का आँकड़ा इस वजह से नहीं है कि ये आरएसएस से जुड़े हुए संगठन थे, बल्कि दो अहम परियोजनाओं को इसका बड़ा हिस्सा दिया गया। न्यूज मिनट की रिपोर्ट में इस जानकारी को छिपाने की कोशिश की गई।
मेडिकल सेवा से जुड़ा बीएवीपी-डीएटीएसएएस
बीएवीपी की स्थापना 1989 में हुई थी और यह कई कार्यरत अस्पतालों का संचालन करता है। इनमें औरंगाबाद स्थित डॉ. हेडगेवार अस्पताल और असम में स्थित नया अस्पताल शामिल है। असम में 300 बिस्तरों वाला अस्पताल है, जिसमें 21 विशेषज्ञ मौजूद हैं और यह सरकार की आयुष्मान भारत स्वास्थ्य बीमा योजना के अंतर्गत सूचीबद्ध है। यह कम खर्च पर आम जनता को चिकित्सा सेवा प्रदान करता है, जिसमें गरीबी रेखा से नीचे के रोगियों के लिए खास छूट भी शामिल है। डीएटीएसएएस ने नागपुर में राष्ट्रीय कैंसर संस्थान का निर्माण किया है, जो 470 बिस्तरों वाला अस्पताल है और 2023 में खोला गया था।
दोनों संगठन पंजीकृत हैं और चिकित्सा क्षेत्र में उनके काम जगजाहिर हैं। न्यूज मिनट ने रिपोर्ट किया कि दोनों संगठनों का आरएसएस से संबंध रहा है, लेकिन इन तथ्यों के साथ यह समझना भी जरूरी है कि ये कार्यरत संस्थाएँ हैं, जो मेडिकल सेवा कर रही हैं। आरएसएस से उनके पुराने संबंध भी हैं, तो इसमें दिक्कत क्या है।
संगठनों ने दी जानकारी
राष्ट्रीय सेवा भारती के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख उदय कुंतल का कहना है कि उन्हें द न्यूज मिनट की रिपोर्ट की विशिष्टताओं की पूरी जानकारी नहीं है और तथ्यों को देखे बिना वे इसके निष्कर्षों की पुष्टि करने की स्थिति में नहीं हैं।
उन्होंने इस बात का खंडन किया कि आरएसएस स्वयं जिला स्तर पर कार्यरत एक पंजीकृत संस्था नहीं है, बल्कि इससे संबद्ध संगठन जिनमें राष्ट्रीय सेवा भारती भी शामिल है, अलग-अलग पंजीकृत हैं। इन संगठनों की जानकारी इनकी वेबसाइटों पर उपलब्ध है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रवादी संगठनों को केवल इसलिए निशाना बनाना आसान हो जाता है, क्योंकि उन्हें ऐसा कहा जाता है। जबकि वास्तविकता में वे देश के लिए काम कर रहे होते हैं।
कुंतल ने कहा कि यह कहना भ्रामक है कि सीएसआर फंड आरएसएस से जुड़े संगठनों को सिर्फ इसलिए दिए गए थे क्योंकि वे आरएसएस से जुड़े हुए थे। उनके अनुसार, उनके जैसे संगठन अस्पताल और राहत कार्य जैसे क्षेत्रों में काम करते हैं। सीएसआर डेटा उनके द्वारा शुरू की गई परियोजनाओं को दर्शाता है, न कि किसी विचारधारा के आधार पर किए गए आवंटन को। उन्होंने कहा कि इसे जानबूझकर आरएसएस को पैसा भेजने के रूप में पेश करना गलत और भ्रामक है।
उन्होंने यह भी बताया कि उनका संगठन भारत भर में पहली बार सामाजिक कार्यों के लिए सीएसआर फंडिंग का प्रभावी ढंग से उपयोग करने के तरीके पर प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाता है। उन्होंने कहा कि कई बड़ी संस्थाओं ने पहले अपनी सीएसआर की फंडिंग नहीं भी की है और उनके आवेदन को अस्वीकार कर दिया।
दोनों बातें सच हैं। ONGC ने एक दशक के CSR खर्च का 14.7% यानी 668 करोड़ रुपये उन संगठनों को दिए, जिनके RSS से जुड़े होने के दस्तावेजी प्रमाण मौजूद हैं। यह कोई गलती या तकनीकी खामी नहीं है। यह एक बड़ी रकम है, और अकेले दो संगठनों- BAVP और DATSAS ने ही इसका अधिकांश हिस्सा खर्च किया। न्यूज मिनट के आँकड़े जाँच में खरे उतरते हैं, और किसी भी तरह से संदर्भ बदलकर इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
लेकिन, इसका दूसरा पहलू भी देखने की जरूरत है। दो अस्पताल निर्माण परियोजनाओं के लिए दिए गए ₹574 करोड़ की राशि का अलग महत्व है। भले ही बाकी 18 संगठनों को 92 करोड़ रुपए ही दिए गए। दोनों डोनेशन को एक साथ मिलाना पाठकों को वास्तविक स्थिति से गुमराह करता है। अस्पताल का इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े परियोजनाओं की लागत सैकड़ों करोड़ रुपए होती है। यह तथ्य है। वहीं कुल सीएसआर खर्च का 85 फीसदी हिस्सा यानी ₹3863 करोड़ की विशाल धनराशि स्वच्छता, स्कूलों, आपदा राहत और दिव्यांग कल्याण से जुड़े 1980 से अधिक ऐसे संगठनों को डोनेट किया गया, जिनका आरएसएस से कोई संबंध नहीं है।
दोनों में से कोई भी तथ्य दूसरे का खंडन नहीं करता। जो पाठक TNM की हेडलाइन और अपने पूर्वाग्रह के कारण केवल ‘ONGC ने RSS को पैसा दिया’ जैसे निष्कर्ष निकालते हैं, वे इसकी बारीकियों को नजरअंदाज करते हैं या समझने की कोशिश ही नहीं करते।
(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)


