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CJP प्रोपेगेंडा आपकी टाइमलाइन तक कैसे पहुँच रहा? समझिए Meta का एल्गोरिदम और मॉडरेशन कैसे साध रहे ग्लोबल लेफ्ट का नैरेटिव

मेटा आपके 'लाइक्स' और 'देखने के समय' को आपकी पसंद का संकेत मानता है। इसी वजह से सिस्टम उन लोगों को भी उग्र प्रदर्शन वाले वीडियो दिखाता है जो उन्हें फॉलो नहीं करते। दूसरी तरफ, नियम-कायदों के नाम पर विरोधी पक्ष की बातों को हिंसा या अलगाववाद बताकर रोक दिया जाता है। इसका नतीजा यह होता है कि सोशल मीडिया फीड पर हर पक्ष को बराबर जगह नहीं मिल पाती।

पिछले कुछ दिनों में कई सोशल मीडिया यूजर्स ने शिकायत की है। उनका कहना है कि कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शनों से जुड़े वीडियो और पोस्ट जबरन उनके फीड पर दिखाए जा रहे हैं। यह कंटेंट उन लोगों को भी दिखाई दे रहा है जो CJP के अकाउंट्स को फॉलो नहीं करते हैं। ऐसे लोग जो इस तरह का राजनीतिक कंटेंट नहीं देखते या जिन्होंने हाल ही में अपने अकाउंट बनाए हैं, उन्हें भी ये पोस्ट दिख रहे हैं।

X (ट्विटर) की एक यूजर मोहिनी ने अपनी पोस्ट में इस बात को उठाया है। उन्होंने लिखा, “पिछले कुछ दिनों में मेटा के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर CJP के नैरेटिव को आगे बढ़ाने के लिए एल्गोरिदम के साथ चालाकी की गई है। खासतौर पर इंस्टाग्राम पर युवा पीढ़ी के बीच अराजकता और अशांति फैलाने के लिए एक स्पॉन्सर्ड कैंपेन चलाया जा रहा है।”

एक अन्य यूजर ‘ऑलवेज4राइट’ ने कहा, “इंस्टाग्राम पूरी तरह से हाईजैक हो चुका है। इस पर ज्यादातर पुलिस विरोधी और सरकार विरोधी बातों को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसकी वजह से पुलिस के खिलाफ हिंसा का माहौल बन रहा है।”

‘अश्विनी’ नाम के X यूजर ने लिखा, “इंस्टाग्राम पर CJP प्रदर्शन के समर्थन वाले कंटेंट को जबरदस्ती आगे बढ़ाया जा रहा है।” उन्होंने सरकार से इस पर तुरंत कार्रवाई करने की माँग की।

वहीं ‘Shush’ नाम के एक और यूजर ने कहा, “इंस्टाग्राम ने CJP प्रदर्शनों के हक में एल्गोरिदम के जरिए पूरा प्रोपेगेंडा शुरू कर दिया है। भारत को नेपाल या बांग्लादेश जैसा बनाने की योजना चालू हो चुकी है। इसका बहुत गंभीरता से जवाब देने की जरूरत है।”

‘रिवोल्यूशनमोंक’ नाम के यूजर ने अपनी डिटेल्ड पोस्ट्स में पूरी बात समझाई है। उन्होंने बताया कि अगर लोग किसी CJP अकाउंट को फॉलो या लाइक नहीं भी करते, तब भी उनके फीड में ये रील्स लगातार आ रही हैं। उन्होंने लिखा, “इसकी वजह यह है कि CJP के पास राज्य स्तर के सोशल मीडिया कोऑर्डिनेटर्स का एक बड़ा नेटवर्क है। ये लोग इंस्टाग्राम इन्फ्लुएंसर्स के साथ मिलकर काम कर रहे हैं।” उन्होंने आगे बताया कि 5,000 रुपए से शुरुआत करके पैसे देकर ऐसे पोस्ट करवाए जा रहे हैं।

अपनी अगली पोस्ट्स में उन्होंने कई इंस्टाग्राम अकाउंट्स के स्क्रीनशॉट्स भी शेयर किए। इन स्क्रीनशॉट्स में एक जैसा कंटेंट दिख रहा था, जिससे उनकी बात को बल मिलता है।

अब फेसबुक, इंस्टाग्राम और यहाँ तक कि X पर एक ही राजनीतिक नैरेटिव का बार-बार दिखना एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। सवाल यह है कि क्या यह कंटेंट सिर्फ इसलिए वायरल हो रहा है क्योंकि लोग इसे देखना चाहते हैं? या फिर सोशल मीडिया का एल्गोरिदम खुद इसे नए और अनजान लोगों तक जबरदस्ती पहुँचा रहा है?

इसका जवाब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के काम करने के तरीके में छुपा है। फेसबुक और इंस्टाग्राम सिर्फ वही पोस्ट नहीं दिखाते जिन्हें यूजर फॉलो करता है। मेटा खुद यह तय करता है कि कौन सा राजनीतिक कंटेंट लोगों को दिखाया जाए। वही तय करता है कि गैर-फॉलोअर्स को किसकी पोस्ट दिखेगी और कौन से इशारे यह बताने के लिए काफी हैं कि यूजर किसी राजनीतिक अभियान में दिलचस्पी रख रहा है।

कंपनी ने इन नियमों को कई बार बदला है। इससे भी अहम बात यह है कि खुद मेटा ने माना है कि वह अब सीधे और अप्रत्यक्ष इशारों के आधार पर ज्यादा राजनीतिक कंटेंट रिकमेंड कर रहा है। आसान शब्दों में कहें तो किसी पोस्ट को ‘लाइक’ करना एक सीधा इशारा है। वहीं किसी वीडियो को सिर्फ ‘रुककर देखना’ एक अप्रत्यक्ष इशारा माना जाता है।

इसी वजह से किसी यूजर के लिए CJP का समर्थक होना, उसके अकाउंट फॉलो करना या प्रदर्शन के बारे में खोजना जरूरी नहीं है। अगर कोई यूजर सिर्फ एक नाटकीय वीडियो देखने के लिए भी रुक जाता है, तो मेटा उसके फीड में वैसे ही कंटेंट की भरमार शुरू कर देता है।

मेटा ने खुद माना है कि वह यूजर्स को राजनीतिक कंटेंट रिकमेंड करता

साल 2021 में मेटा ने अपने प्लेटफॉर्म्स पर दिखने वाले राजनीतिक और नागरिक मामलों से जुड़े कंटेंट को कम करना शुरू किया था। बाद में उसने राजनीतिक पोस्ट की रैंकिंग तय करते समय कमेंट्स और शेयर्स को दी जाने वाली अहमियत भी घटा दी थी। कंपनी का कहना था कि यूजर्स नहीं चाहते कि उनके फीड पर राजनीतिक बातें छाई रहें।

जनवरी 2025 में यह स्थिति पूरी तरह बदल गई। मेटा ने ऐलान किया कि वह एक ‘ज्यादा पर्सनल तरीके’ से फेसबुक, इंस्टाग्राम और थ्रेड्स पर राजनीतिक कंटेंट को वापस लाना शुरू करेगा। उसने कहा कि पोस्ट को लाइक करने जैसे सीधे इशारों और किसी पोस्ट को सिर्फ देखने जैसे अप्रत्यक्ष इशारों के आधार पर कंटेंट की रैंकिंग होगी। मेटा ने यह भी कहा कि वह इन इशारों के आधार पर ज्यादा राजनीतिक कंटेंट रिकमेंड करेगा।

मेटा ने साल 2025 में जो कहा था, वह यह समझने के लिए बेहद जरूरी है कि CJP के वीडियो अनजान खातों तक कैसे और क्यों पहुँच रहे हैं।

हो सकता है कि कोई इंसान वीडियो इसलिए देखे क्योंकि उसमें पुलिस पर हमला हो रहा हो। दूसरा इंसान प्रदर्शनकारियों के बर्ताव से हैरान होकर उसे देख सकता है। कोई तीसरा इंसान यह जानने के लिए रुक सकता है कि घटना कहाँ हुई है। मेटा का सिस्टम यह सही-सही तय नहीं कर सकता कि हर इंसान ने वह क्लिप क्यों देखी। वह सिर्फ इतना दर्ज करता है कि उस कंटेंट ने यूजर का ध्यान खींचा है।

जैसे ही कोई यूजर रुकता है, वीडियो देखता है, कमेंट सेक्शन खोलता है या उस अकाउंट पर जाता है, प्लेटफॉर्म को कई इशारे मिल जाते हैं। इसके बाद वह यूजर को दूसरा प्रदर्शन वाला वीडियो दिखा सकता है। फिर उसी मुद्दे पर बात करने वाला कोई और अकाउंट भी सामने ला सकता है।

मेटा का अपना हेल्प सेंटर भी यही कहता है। इंस्टाग्राम पर सजेस्टेड पोस्ट्स यूजर की पुरानी एक्टिविटी, उसके कनेक्शंस, पोस्ट की जानकारी और शेयर करने वाले अकाउंट की लोकप्रियता देखकर चुनी जाती हैं। यह खास तौर पर यह भी देखता है कि दूसरे लोग उस पोस्ट के साथ कैसे जुड़ रहे हैं। यह सजेस्टेड कंटेंट आपके मेन फीड, एक्सप्लोर सेक्शन और रील्स में दिख सकता है।

आसान शब्दों में कहें तो, CJP के वायरल कंटेंट को लोगों के ढूँढने का इंतज़ार नहीं करना पड़ता। मेटा खुद इसे सीधे उनके सामने लाकर परोस देता है।

AI से बनाई गई तस्वीर

एल्गोरिदम यह नहीं समझता कि यूजर प्रदर्शन का समर्थन कर रहा है या उसकी निंदा कर रहा है

सोशल मीडिया कंपनियाँ अक्सर अपने रिकमेंडेशंस को यूजर की दिलचस्पी का एक निष्पक्ष जवाब मानती हैं। लेकिन यहाँ ‘दिलचस्पी’ की परिभाषा बहुत ज्यादा बड़ी और खतरनाक है। अगर कोई यूजर CJP के वीडियो पर गुस्से में कमेंट कर रहा है, तो वह भी एक कमेंट ही है। अगर कोई इंसान प्रदर्शनकारियों की निंदा करने के लिए क्लिप शेयर कर रहा है, तो वह भी शेयर ही कर रहा है। कोई व्यक्ति क्या हुआ यह समझने के लिए हिंसा का वीडियो बार-बार देख रहा है, तो वह भी उसका वॉच टाइम ही बढ़ा रहा है।

रिकमेंडेशन सिस्टम के लिए ये सभी काम यह दर्शाते हैं कि वह पोस्ट बाकी लोगों को दिखाने लायक और काम की है।

साल 2020 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान एक रिसर्च की गई थी। इसमें फेसबुक और इंस्टाग्राम के एल्गोरिदम वाले फीड की जगह समय के हिसाब से (क्रोनोलॉजिकल) फीड दिया गया था। इससे यूजर्स का प्लेटफॉर्म पर बिताया जाने वाला समय और उनकी एक्टिविटी काफी कम हो गई। इसके साथ ही उनके सामने आने वाले राजनीतिक कंटेंट का तरीका भी पूरी तरह बदल गया। शोधकर्ताओं को राजनीतिक सोच में तो तुरंत कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखा, लेकिन उन्होंने यह साबित कर दिया कि एल्गोरिदम यह तय करता है कि यूजर्स क्या देखेंगे और वे प्लेटफॉर्म पर कैसा बर्ताव करेंगे।

20.8 करोड़ फेसबुक यूजर्स के डेटा पर की गई एक और स्टडी में भी बड़ी बात सामने आई। जैसे-जैसे शोधकर्ताओं ने देखा कि यूजर क्या देख सकता था, एल्गोरिदम ने उसे असल में क्या दिखाया और फिर उसने किस चीज पर क्लिक किया, वैसे-वैसे लोगों के बीच वैचारिक दूरी और बँटवारा बढ़ता चला गया।

मुद्दा एकदम साफ और सीधा है। मेटा का एल्गोरिदम सिर्फ राजनीतिक माहौल को दिखाता भर नहीं है। वह यह खुद तय करता है कि किस कंटेंट को ज्यादा से ज्यादा लोग देखेंगे और इस तरह वह पूरे माहौल को ही बदल देता है।

CJP का प्रोपेगेंडा भले ही उसके आयोजकों और समर्थकों से शुरू होता हो। लेकिन इस नाटक और उग्रता वाले वीडियो को शुरुआत में जैसे ही थोड़ा अटेंशन मिलता है, रिकमेंडेशन सिस्टम इसे पकड़ लेता है और बहुत बड़े दर्शक वर्ग तक पहुँचा देता है।

मेटा खुद एल्गोरिदम तैयार करता है और वह राजनीतिक नतीजों को बदल सकता है

‘एल्गोरिदम’ को एक ऐसी स्वतंत्र मशीन की तरह देखना गलत होगा जिस पर मेटा का कोई नियंत्रण नहीं है।

मेटा खुद यह तय करता है कि कौन से इशारे उसके लिए मायने रखते हैं। वही यह फैसला करता है कि कमेंट्स, शेयर्स, देखने का समय, नेगेटिव फीडबैक या सर्वे के जवाब राजनीतिक रिकमेंडेशंस को प्रभावित करेंगे या नहीं। इसके साथ ही वह यह भी तय करता है कि किस तरह का कंटेंट उन लोगों तक पहुँचना चाहिए जो मूल अकाउंट को फॉलो नहीं करते हैं।

साल 2022 में मेटा ने कहा था कि उसने वैश्विक स्तर पर राजनीतिक कंटेंट पर कमेंट्स और शेयर्स को दी जाने वाली अहमियत कम कर दी है। साल 2023 तक कंपनी ने कहा कि वह एंगेजमेंट पर आधारित रैंकिंग से हटने की कोशिश कर रही है। उसने उन सर्वे को ज्यादा अहमियत देने की बात कही जिनमें यूजर्स बताते हैं कि उनके लिए क्या जानकारीपूर्ण या अर्थपूर्ण है।

साल 2024 में मेटा ने इंस्टाग्राम और थ्रेड्स पर अनफॉलो किए गए अकाउंट्स से राजनीतिक कंटेंट के सीधे रिकमेंडेशन को सीमित कर दिया था। इसके बाद साल 2025 में उसने अपना फैसला बदल दिया और राजनीतिक रिकमेंडेशंस को ज्यादा पर्सनल बना दिया। वर्तमान में फेसबुक पर पॉलिटिकल-कंटेंट कंट्रोल डिफ़ॉल्ट रूप से चालू रहता है। यानी अगर कोई यूजर कम राजनीतिक कंटेंट देखना चाहता है, तो उसे खुद सेटिंग्स में जाकर इसे बदलना होगा।

ये सारे बदलाव साबित करते हैं कि राजनीतिक कंटेंट का ज्यादा दिखना सिर्फ लोगों की दिलचस्पी की वजह से नहीं है। यह पूरी तरह से कंपनी की अपनी नीतियों और फैसलों का नतीजा है।

मेटा को यह आदेश देने की जरूरत बिल्कुल नहीं है कि CJP को प्रमोट किया जाए। उसे बस इसके वीडियोज को रिकमेंडेशन के लायक राजनीतिक कंटेंट की कैटेगरी में डालना होता है। इसके बाद एंगेजमेंट के इशारे खुद-ब-खुद इन वीडियोज को अनजान लोगों के फीड में धकेल देते हैं।

पुलिस को हमलावर दिखाने वाले फुटेज को अपने आप ही ज्यादा फायदा क्यों मिलता है, ये है वजह

इस विवाद की एक और गहरी परत है। हिंसा की एक ही घटना को अलग-अलग तरीके से देखा जा सकता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि हिंसा कौन कर रहा है और पोस्ट को कैसे पेश किया गया है।

अगर किसी वीडियो में पुलिस प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग करती दिखती है, तो उसे पुलिस की बर्बरता, नागरिक अधिकारों के हनन या सरकारी दमन के रूप में पेश किया जा सकता है। इसलिए ऐसे वीडियो को खबर के लिहाज से जरूरी मानकर आसानी से दिखाया जाता है।

दूसरी तरफ, अगर किसी फुटेज में प्रदर्शनकारी पुलिस पर हमला करते नजर आते हैं, तो उसे हिंसक कंटेंट की कैटेगरी में डाल दिया जाता है। अगर वीडियो में कोई अलगाववादी या चरमपंथी संगठन दिखता है, तो बात और ज्यादा बिगड़ जाती है। तब इसे किसी खतरनाक संगठन के समर्थन, महिमामंडन या प्रदर्शन के दायरे में मान लिया जाता है।

मेटा की ‘डेंजरस ऑर्गनाइजेशन एंड इंडिविजुअल्स’ पॉलिसी ऐसी घटनाओं की रिपोर्टिंग, निंदा और निष्पक्ष चर्चा की इजाजत देती है। इसके बावजूद, सही रिपोर्टिंग और महिमामंडन के बीच के फर्क को ऑटोमेटेड सिस्टम और मानव रिव्यूअर्स अक्सर गलत समझ बैठते हैं।

मेटा के ओवरसाइट बोर्ड ने ऐसा ही एक मामला देखा था। यह मामला तालिबान से जुड़ी उर्दू अखबार की एक रिपोर्ट का था। मेटा के सिस्टम ने उस पोस्ट को हटा दिया था। दो ह्यूमन रिव्यूअर्स ने भी इसे नियमों का उल्लंघन माना था। इसके बाद प्लेटफॉर्म ने पेज को स्ट्राइक दी और एडमिन के फीचर्स भी सीमित कर दिए।

इस केस को गलत तरीके से हटाई गई पोस्ट्स की जाँच करने वाले सिस्टम में भेजा गया था। लेकिन वहाँ इसकी कभी समीक्षा ही नहीं हो सकी। इसकी वजह यह थी कि उस लिस्ट के लिए मेटा के पास 50 से भी कम उर्दू भाषी रिव्यूअर्स थे। कंपनी ने इस पोस्ट को ज्यादा जरूरी भी नहीं माना था। मेटा ने इसे तब जाकर वापस रिस्टोर किया जब ओवरसाइट बोर्ड ने इस केस को खुद चुना। तब जाकर कंपनी ने माना कि वह खबर के लिहाज से सही रिपोर्टिंग थी।

यह उदाहरण इस दावे को पूरी तरह खारिज करता है कि संदर्भ से जुड़ी छूट हमेशा सही तरीके से लागू होती है। नियम भले ही आतंकवाद या राजनीतिक हिंसा पर पत्रकारिता की इजाजत देते हों। लेकिन उन नियमों को लागू करने वाली मशीनें और रिव्यूअर्स आतंकवादी के बजाय पत्रकार को ही सजा दे बैठते हैं।

AI से बनाई गई तस्वीर

मेटा ने खुद माना है कि उसके सिस्टम ने सही और कानूनी राजनीतिक बयानों को भी सेंसर किया

कंपनी ने यह बात स्वीकार की है कि उसकी मॉडरेशन व्यवस्था न केवल अधूरी थी, बल्कि उसने अपनी सीमाओं को भी पार किया। जनवरी 2025 में मेटा ने कहा कि सामाजिक और राजनीतिक दबाव के चलते उसने बेहद जटिल सिस्टम बना लिए थे। उसने माना कि यह तरीका बहुत आगे निकल गया था। कंपनी के अनुसार, बहुत सारे बेकसूर कंटेंट को रोक दिया गया और कई निर्दोष यूजर्स पर गलत तरीके से नियम थोप दिए गए।

मेटा ने आगे यह खुलासा किया कि दिसंबर 2024 में उसने हर दिन लाखों कंटेंट हटाए। कंपनी का अनुमान है कि की गई हर दस में से एक या दो कार्रवाइयां गलत हो सकती हैं।

ये कोई छोटी-मोटी गलतियाँ नहीं हैं, खासकर तब जब रोज लाखों फैसले लिए जा रहे हों। अगर कंपनी के कम वाले अनुमान को भी देखें, तो भी इसका मतलब यह है कि बहुत सारे सही और जायज कंटेंट पर गलत कार्रवाई हुई।

मेटा ने यह भी माना कि थर्ड-पार्टी फैक्ट-चेकिंग की वजह से सही राजनीतिक बयानों पर भी अनुचित लेबल लग गए और उनकी पहुँच कम हो गई। कंपनी ने कहा कि यह प्रोग्राम अक्सर सेंसरशिप का जरिया बन गया, क्योंकि फैक्ट-चेकर्स ने काम के दौरान अपने पूर्वाग्रह और निजी नजरिए को शामिल कर लिया था।

इसीलिए, वैचारिक पक्षपात के आरोपों को कोई मनगढ़ंत कहानी बताकर खारिज नहीं किया जा सकता। मेटा का बचाव अब यह नहीं है कि गलत तरीके से पाबंदियाँ नहीं लगाई गईं। बल्कि उसका बचाव यह है कि वह अब इसे कम करने की कोशिश कर रहा है।

एल्गोरिदम अकेले काम नहीं करता। इंसान भी इस नैरेटिव को गढ़ने का काम करते हैं

सोशल मीडिया का यह पूरा सिस्टम सिर्फ ऑटोमेटेड मशीनों से नहीं चलता। मेटा ने साल 2024 में बताया था कि उसके पास फेसबुक, इंस्टाग्राम और थ्रेड्स पर काम करने वाले लगभग 15,000 कंटेंट रिव्यूअर्स हैं। ये लोग 80 से ज्यादा भाषाओं में काम करते हैं। इसके अलावा राजनीतिक फैसलों में पॉलिसी टीमें, इंजीनियर, कानूनी विभाग, पब्लिक-पॉलिसी अधिकारी और चुनाव विशेष ऑपरेशन्स सेंटर भी शामिल होते हैं।

इंसान ही यह तय करते हैं कि कोई पोस्ट हिंसा की निंदा कर रही है या उसका महिमामंडन कर रही है। वे ही यह फैसला करते हैं कि संदर्भ किसी पत्रकारिता का है, सामाजिक कार्यकर्ता का है, व्यंग्य (सटायर) का है या समर्थन का है। वे भारतीय भाषाओं में लिखे गए कैप्शन्स का मतलब भी निकालते हैं, जिनमें ऐसी राजनीतिक बातें हो सकती हैं जिन्हें देश से बाहर बैठे रिव्यूअर्स समझ ही नहीं पाते।

इस पूरी प्रक्रिया में हर स्तर पर पक्षपात आ सकता है। यह नियम (पॉलिसी) बनाते समय आ सकता है। यह किसी संगठन को खतरनाक संगठनों की सूची में डालते समय आ सकता है। यह तब आ सकता है जब कोई रिव्यूअर किसी रिपोर्ट के लहजे का गलत मतलब निकाल ले। या फिर यह तब भी आ सकता है जब संगठित यूजर्स अपने विरोधी विचार वाले कंटेंट को बार-बार रिपोर्ट करते हैं।

मेटा के अपने तालिबान वाले केस ने साफ दिखा दिया था कि दो इंसानी रिव्यूअर्स भी एक पूरी तरह से गलत फैसले को सही ठहरा सकते हैं। उसने यह भी दिखाया कि किसी भाषा के रिव्यूअर्स की कमी होने पर गलत तरीके से हटाई गई पोस्ट को ठीक करना कितना मुश्किल हो जाता है।

ऑपइंडिया (OpIndia) झेल चुका मेटा की इस भेदभाव भरी कार्रवाई

ऑपइंडिया के लिए पक्षपातपूर्ण कार्रवाई का यह सवाल सिर्फ किताबी या सैद्धांतिक नहीं है।

साल 2020 में ऑपइंडिया ने दिखाया था कि उसके फेसबुक पेज की रीच रोजाना करीब 20 लाख से घटकर लगभग 1.71 लाख रह गई थी। फेसबुक ने कंटेंट की क्वालिटी का हवाला दिया। उसने दावा किया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) यह तय करता है कि पोस्ट नियमों का उल्लंघन करती है या नहीं। हालाँकि, ऑपइंडिया के पेज से जो रिपोर्ट हटाई गई थी, वही रिपोर्ट उसी तस्वीर के साथ दूसरी वेबसाइट पर आसानी से उपलब्ध थी।

सितंबर 2024 में फेसबुक ने यूजर्स को विकिपीडिया पर बनी ऑपइंडिया की 187 पन्नों की रिपोर्ट शेयर करने से रोक दिया। प्लेटफॉर्म ने इसे स्पैम बता दिया। उसने ऑपइंडिया पर व्यूज पाने के लिए भ्रामक तरीके अपनाने का आरोप लगाया। जबकि उस रिपोर्ट में न तो पेज लाइक करने की शर्त थी, न कोई धोखा देने वाला पॉप-अप था और न ही कोई छिपा हुआ लिंक था।

मार्च 2026 में मेटा ने ऑपइंडिया का एक वीडियो हटाया। यह वीडियो BBC के उस दावे को चुनौती दे रहा था, जिसमें दिल्ली में मकान ढूँढ रही एक कश्मीरी पत्रकार के साथ कथित भेदभाव की बात कही गई थी। ऑपइंडिया के मुताबिक, फेसबुक पर अपलोड होते ही इस वीडियो को चंद सेकंडों के भीतर बैन कर दिया गया।

इसके अलावा, ऑपइंडिया द्वारा खालिस्तानी संगठनों, पंजाब के उग्रवाद और खालिस्तानी आतंकवादियों से जुड़ा कंटेंट पोस्ट करने पर उसे अक्सर ब्लॉक या डिलीट कर दिया जाता है।

इन सभी घटनाओं को अगर एक साथ मिलाकर देखें, तो साफ हो जाता है कि पोस्ट का हटाया जाना, रीच कम होना और रिकमेंडेशन में जाना राजनीति से अलग नहीं है। यही चीजें तय करती हैं कि कौन सी राजनीतिक बात जनता तक पहुँचेगी और कौन सी बात लोगों तक पहुँचने से पहले ही गायब कर दी जाएगी।

मेटा के ओवरसाइट बोर्ड पर उठते सवाल

मेटा के ओवरसाइट बोर्ड की निष्पक्षता पर लगातार सवाल खड़े हो रहे हैं। इस बोर्ड के राजनीतिक झुकाव को लेकर लोगों के मन में गहरी चिंताएँ हैं। ऑपइंडिया ने साल 2020 में एक बड़ा खुलासा किया था। एक जाँच से पता चला कि बोर्ड के 20 में से 18 सदस्य किसी न किसी तरह जॉर्ज सोरोस की संस्था से जुड़े थे। वे सोरोस के ‘ओपन सोसाइटी फाउंडेशंस’ द्वारा फंड किए गए संगठनों के साथ काम कर चुके थे। इसके अलावा, बोर्ड सदस्य तवक्कुल करमान का नाम भी विवादों में रहा है। उनके संबंध यमन की एक ऐसी पार्टी से पाए गए, जिसे मुस्लिम ब्रदरहुड का समर्थन हासिल था।

यह काफी चिंताजनक है कि जिस बोर्ड को अलग-अलग विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करने वाला बताया गया था, उसके ज्यादातर सदस्य एक ही छोटे लिबरल इंटरनेशनल नेटवर्क से जुड़े संस्थानों से चुने गए थे। यह मुद्दा तब और ज्यादा गंभीर हो जाता है जब यही बोर्ड यह तय करने में भूमिका निभाता है कि अलग-अलग देशों में राजनीतिक बयानों, राष्ट्रवाद, अलगाववाद, इस्लामी संगठनों और सरकारी कार्यवाहियों का क्या मतलब निकाला जाए।

यह बात हैरान करने वाली है कि जिस बोर्ड को निष्पक्ष और हर तरह की सोच का प्रतिनिधि बताया गया, उसके ज्यादातर सदस्य एक ही विचारधारा के नेटवर्क से आते हैं। वे सभी एक खास लिबरल सोच वाले अंतरराष्ट्रीय समूह का हिस्सा रहे हैं। मामला तब और गंभीर हो जाता है, जब यही लोग यह फैसला करते हैं कि किस देश में क्या सही है और क्या गलत। राष्ट्रवाद, अलगाववाद, कट्टरपंथी संगठनों और सरकारों के कदमों पर फैसला यही बोर्ड लेता है। इस वजह से इसकी निष्पक्षता पर सवाल उठना लाजमी है।

जुकरबर्ग का सच: सरकारी दबाव में हटाए गए पोस्ट

मेटा के मालिक मार्क जुकरबर्ग ने खुद एक बड़ा सच स्वीकार किया। अगस्त 2024 में अमरीकी संसद को लिखे एक खत में उन्होंने यह बात मानी। उन्होंने बताया कि अमरिकी सरकार के बड़े अधिकारियों ने कोविड के समय मेटा पर भारी दबाव बनाया था। वे चाहते थे कि महामारी से जुड़े पोस्ट हटा दिए जाएँ। इस चक्कर में हल्के-फुल्के मजाक और व्यंग्य वाले पोस्ट भी डिलीट करवा दिए गए। जुकरबर्ग ने माना कि ऐसा दबाव बनाना बिल्कुल गलत था। उन्हें इस बात का अफसोस है कि मेटा उस समय इसके खिलाफ खुलकर नहीं बोला।

जुकरबर्ग का यह कबूलनामा बहुत कुछ साफ कर देता है। इससे साबित होता है कि सरकारें और नेता इन सोशल मीडिया कंपनियों पर अपना दबाव बनाते हैं। मेटा जैसी बड़ी कंपनियाँ भी इस दबाव के आगे झुक जाती हैं और अपने फैसले बदल देती हैं। यह बात किसी बाहरी आलोचक ने नहीं, बल्कि खुद मेटा के मालिक ने कही है। ऐसे में यह मान लेना बेवकूफी होगी कि फेसबुक या इंस्टाग्राम पर पोस्ट का दिखना या गायब होना सिर्फ एक कंप्यूटर कोड का निष्पक्ष खेल है।

AI से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर

बिग टेक की असली ताकत: बिना कहे फैलाया जाने वाला एजेंडा

मेटा को CJP के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए उससे हाथ मिलाने की कोई जरूरत नहीं है। भले ही कंपनी ने इस प्रोपेगेंडा को फैलाने का कोई सीधा आदेश न दिया हो, लेकिन उसका सिस्टम ही कुछ ऐसा बना है। यह सिस्टम उन्हीं पोस्ट्स को आगे बढ़ाता है जो लोगों को रोककर रखती हैं। इसके नियम इतने उलझे हुए हैं कि पुलिस की सख्ती वाले वीडियो अधिकार की बात बताकर फैल जाते हैं। दूसरी तरफ प्रदर्शनकारियों की हिंसा वाले वीडियो पर रोक लग जाती है। CJP के वीडियो पर गुस्से में किया गया कमेंट भी उसकी रीच बढ़ाता है। उसे देखने में बिताया गया हर एक मिनट एल्गोरिदम को वैसा ही दूसरा वीडियो दिखाने के लिए उकसाता है।

मेटा भले ही इसे ‘यूजर की पसंद’ का नाम दे, लेकिन आम इंसान के लिए यह जबरदस्ती की परोसन ही है। अगर किसी ने यह कंटेंट माँगा ही नहीं, तो उसकी फीड में यह बार-बार क्यों आ रहा है? दरअसल, यही इन बड़ी टेक कंपनियों की असली और खतरनाक ताकत है। इन्हें किसी राजनीतिक दल या आंदोलन का खुलकर समर्थन करने की जरूरत नहीं होती। ये बस अपने सिस्टम से चुपचाप तय कर देती हैं कि किसे जनता की नजरों में बनाए रखना है और किसे पूरी तरह गायब कर देना है।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है, अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

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Anurag is a Chief Sub Editor at OpIndia with over 22 years of professional experience, including more than six years in journalism. He is known for deep dive, research driven reporting on national security, terrorism cases, judiciary and governance, backed by RTIs, court records and on-ground evidence. He also writes hard hitting op-eds that challenge distorted narratives. Beyond investigations, he explores history, fiction and visual storytelling. Email: [email protected]

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