नीट पेपर लीक विवाद और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग को लेकर जब ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के बैनर तले छात्र दिल्ली की सड़कों पर उतरे, तो यह आंदोलन कुछ ही दिनों में चर्चा का विषय बन गया। अभिजीत दिपके, सौरव दास, विजेता दहिया जैसे चेहरों और सोनम वांगचुक के अनशन से प्रभावित हो कई युवा जंतर-मंतर पहुँचने लगे।
लेकिन अब जब इस प्रदर्शन को चलते हुए करीब 25 दिन हो गए हैं तो वे छात्र खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। पार्टी के भीतर आंतरिक कलह मच गई है, भरोसा टूट रहा है और नेता इन युवाओं को बस उकसाने में लगे हैं।
CJP में हुई पहली बड़ी टूट की शुरुआत एक वायरल वीडियो से हुई। पार्टी के मुख्य प्रवक्ता विजेता दहिया का एक वीडियो सामने आया जिसमें वे संसद मार्च के दौरान प्रदर्शन स्थल से हटकर बर्गर खाते नजर आए। यह वीडियो ठीक उसी वक्त वायरल हुआ, जब पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प चल रही थी और कई छात्र आँसू गैस व कथित लाठीचार्ज का सामना कर रहे थे। CJP ने इसे ‘असंवेदनशील आचरण’ बताते हुए विजेता दहिया को इस प्रदर्शन से अलग कर दिया।
अब यह आंदोलन छात्रों की समस्या से कहीं हटकर इन लोगों को खुद को चमकाने का मौका लग रहा था, तो ऐसे में अलग होने पर दहिया भी उखड़ गए। उन्होंने भी एक वीडियो जारी कर दिपके को आड़े हाथों लिया। दहिया ने अब अपनी वीडियो में कहा है कि उन्हें बर्गर खाने के लिए निकाल दिया गया लेकिन उन्होंने दिपके का कचौड़ी खाने पर बचाव किया था।
दहिया ने कहा, “अभी भी लोग कह रहे हैं कि अभिजीत ट्रक पर चढ़ गया, उस पर मैंने तेरा बचाव किया है कि थप्पड़ भी तो उसे ही लगा था। मेरे साथियों ने ही ‘बलि का बकरा’ बना दिया तो थोड़ा बुरा तो लगा।” दहिया बेशक इसे थोड़ा बुरा लगना बता रहे हैं लेकिन उनके वायरल वीडियो दिखा रहे हैं कि मामला ज्यादा गंभीर है।
दहिया ने एक चैनल से बातचीत में कहा, “अभिजीत को लगा कि नहीं विजेता आंदोलन के लिए सही है कि आप इस्तीफा दे तो। तो मैंने कहा कि देखो इस्तीफा तो मैं नहीं दूँगा, ऐसा करो कि तुम ही मुझे निकाल दो, फिर उन्होंने ऐसा ही किया।”
असल में जब कोई ऐसा आंदोलन अचानक बड़ा रूप ले लेता है, तो नेतृत्व, अनुशासन और जवाबदेही को लेकर भीतर ही भीतर टकराव शुरू हो जाता है। डिजिटल स्टारडम हासिल करना आसान है लेकिन जमीन पर संगठन और नैतिक जवाबदेही बनाए रखना कहीं ज्यादा मुश्किल परीक्षा साबित होती है। यही कारण है कि यह घटना केवल एक व्यक्ति को निकालने की खबर नहीं है बल्कि CJP के भीतर मौजूद महत्वाकांक्षाओं का पहला सार्वजनिक विस्फोट है।
जिस तरह इस आंदोलन में अरविंद केजरीवाल से लेकर वामपंथी पार्टियों, सपा और TMC के नेता पहुँचे हैं उससे साफ लग रहा है कि यह अब छात्रों का आंदोलन नहीं रहा है बल्कि एक राजनीतिक आंदोलन बन गया है। जो भीड़ ‘आम छात्रों’ के नाम पर जंतर-मंतर और संसद मार्च में जुटी उसमें सपा, AAP, आजाद समाज पार्टी के कार्यकर्ता और जेएनयू-डीयू-जामिया जैसे संस्थानों के वामपंथी छात्र संगठन भी बड़ी संख्या में शामिल थे। इसके बाद जो इस आंदोलन में बदलाव देख रहे थे वो भी निराश होने लगे हैं।
इनमें से कुछ छात्र जो असल में परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता, पेपर लीक पर जवाबदेही जैसे मुद्दों पर आए थे उन्हें अब दिखने लगा है कि चर्चा का केंद्र बिंदु धीरे-धीरे शिक्षा से हटकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप, नेताओं की मौजूदगी, प्रवक्ता के निष्कासन और हिंसा की घटनाओं पर सिमटता चला गया है।
वीरू भाई नामक एक युवक एक आंदोलन में लंबे समय तक सक्रिय था लेकिन अब उसने निराशा में खुद को इस आंदोलन से अलग कर लिया है। वीरू भाई का कहना है कि पुलिस के साथ झड़प के समय कोई भी बड़ा नेता आगे नहीं आया। आयोजकों ने खुद पीछे रहकर महिला प्रदर्शनकारियों को सबसे आगे धकेल दिया। इसी कारण भटके नौजवानों और युवाओं ने पहली बार आंदोलन में भाग लिया और अंत में उन्हें परेशानी का सामना खुद करना पड़ा।
उनका सीधा आरोप है कि खुद को गैर-राजनीतिक बताने वाली सीजेपी असल में आम आदमी पार्टी (AAP) की ‘बी-टीम’ की तरह काम कर रही है। उन्होंने आंदोलन में असामाजिक तत्वों के घुसने का भी दावा किया है। यह निराशा केवल वीरू की नहीं है, दर्जनों ऐसे वीरू हैं जिनके वीडियो सोशल मीडिया पर भरे पड़े हैं।
जब आंदोलन के भीतर से ही अनुशासनहीनता, आपसी अविश्वास और नेतृत्व को लेकर सवाल उठने लगें तो जमीन पर मौजूद आम प्रदर्शनकारी के मन में यह सवाल उठता ही है कि क्या यह नेतृत्व वाकई उनके मुद्दों के प्रति गंभीर है या यह वो सिर्फ अपनी डिजिटल लोकप्रियता की मौज ले रहे हैं।
किसी भी जन आंदोलन की सबसे बड़ी पूंजी उसकी नैतिक साख और उसका मूल उद्देश्य होता है। CJP के मामले में यह दोनों चीजें एक साथ खतरे में हैं। एक तरफ नेतृत्व के भीतर अनुशासन और जवाबदेही को लेकर उठे सवाल संगठन की आंतरिक मजबूती पर सवाल खड़ा करते हैं। दूसरी तरफ राजनीतिक दलों की सक्रिय भागीदारी और उससे जुड़े आरोप इस आंदोलन की ‘स्वतंत्र छात्र आंदोलन’ वाली पहचान को धुँधला कर दिया है।
सोशल मीडिया के दौर में किसी आंदोलन को रातों-रात लोकप्रियता और डिजिटल समर्थन मिल सकता है लेकिन उसे लंबे समय तक अनुशासित, केंद्रित और राजनीति से दूर रखना बहुत मुश्किल काम है। इन सबमें सबसे ज्यादा नुकसान उन आम छात्रों का हुआ है, जो ईमानदारी से अपने भविष्य और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की उम्मीद लेकर सड़कों पर उतरे थे।
ये बात सही है कि सिस्टम में खामियाँ हैं, पेपर लीक हुए हैं। और अगर परीक्षा प्रणाली में खामियाँ हैं तो उनका समाधान राजनीतिक टकराव से नहीं बल्कि सिस्टम में सुधारों से ही निकलेगा। वरना ऐसे आंदोलनों के नाम पर भीड़ इकट्ठा हो तो जाएगी लेकिन उसका फायदा नेता बस अपनी नेतागिरी के लिए उठाएँगे और आम जन केवल ठगे जाएँगे।


