दिल्ली के जंतर-मंतर पर जून 2026 से जारी कॉकरोच जनता पार्टी के विरोध प्रदर्शन में भूख हड़ताल, सोशल मीडिया अभियान, राजनीति और खुलेआम हिंदू-विरोधी भावना दिख रही है। इस्लामी-वामपंथी ग्रुप हिंदुओं को खलनायक के तौर पर पेश करने में लगे हुए हैं। उनका दावा है कि 20 जुलाई को हुई हिंसा के दौरान मस्जिद- गुरुद्वारे ने तो सीजेपी प्रदर्शनकारियों को शरण देने के लिए अपने द्वार खोल दिए, लेकिन हनुमान मंदिर ने ऐसा नहीं किया।
यह दावा किया गया है कि गुरुद्वारा बंगला साहिब और उससे नजदीक मौजूद मस्जिद ने सीजेपी के प्रदर्शनकारियों को उस वक्त शरण दी, जब दिल्ली पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया था, लेकिन प्राचीन हनुमान मंदिर का दरवाजा बंद था। दरअसल मामला उस वक्त शुरू हुआ जब कई राजनीतिक दल के कार्यकर्ताओं सहित ‘प्रदर्शनकारियों’ ने पत्थर फेंके थे।
कई इस्लामी-वामपंथियों ने दावा किया कि कनॉट प्लेस के पास विरोध स्थल के नजदीक होने के बावजू प्राचीन हनुमान मंदिर ने सीजेपी के कोकरोचों को शरण नहीं दी।
‘पत्रकार’ नेहा दीक्षित ने X पर लिखा, “मध्य दिल्ली के गुरुद्वारे और मस्जिद ने घायल प्रदर्शनकारियों के लिए अपने द्वार खोल दिए। पास स्थित हनुमान मंदिर ने इसके बजाय अपने द्वार क्यों बंद कर दिए?”
क्राउडफंडिंग घोटाले के आरोपी इस्लामी-वामपंथी राणा अय्यूब ने दीक्षित के पोस्ट पर व्यंग्य करते हुए कहा कि ‘गलती से कोई दलित ना चला जाए’। ये जातिगत टिप्पणी थी

एक वीडियो में सीजेपी के कुछ प्रदर्शनकारियों ने दावा किया कि उन्हें प्रवेश करने से रोकने के लिए मंदिर के दरवाजे बंद कर दिए गए थे।
इस वीडियो पर कुख्यात इस्लामी समर्थक तरुण गौतम ने भी कमेंट किया। उसने लिखा, “घायल प्रदर्शनकारियों को देखकर पुजारियों ने मंदिर का द्वार बंद कर दिया, वहीं गुरुद्वारों ने न केवल छात्रों को अंदर आने दिया, बल्कि उनकी रक्षा की। उन्हें भोजन कराया और उन्हें आश्रय दिया।”

सोशल मीडिया पर इस तरह की कई पोस्ट भरी पड़ी हैं, जिनमें यह झूठी कहानी फैलाई जा रही है कि प्राचीन हनुमान मंदिर ने सीजेपी प्रदर्शनकारियों के लिए अपने दरवाजे बंद कर दिए, जबकि ‘धर्मनिरपेक्षता और मानवता के प्रतीक’ मस्जिद और गुरुद्वारों ने अपने द्वार खोल दिए।
इस्लामी-वामपंथियों ने हिंदू मंदिर के खिलाफ जम कर बयानबाजी की, लेकिन इन लोगों ने ‘असली वजह’ नहीं बताई। ऑपइंडिया ने जब जमीनी सच्चाई का पता लगाया तो एक अलग पहलू उजागर हुआ।

ऑपइंडिया से बातचीत में प्राचीन हनुमान मंदिर प्रशासन ने बताया कि मंदिर के द्वार दस मिनट के लिए बंद कर दिए गए थे, ताकि मंदिर के अंदर मौजूद श्रद्धालुओं को हिंसा से बचाया जा सके। इन इलाकों में ही पत्थरों से भरे बैग लाए गए थे, जिनका इस्तेमाल हिंदू मंदिर पर और उसके आसपास किया जा रहा था।
"बैग से पत्थर निकाल-निकालकर मार रहे थे कॉकरोच", "मंदिर के अंदर तक हो रहा था पथराव"
— ऑपइंडिया (@OpIndia_in) July 22, 2026
कॉकरोचों के हिंसक प्रदर्शन के दौरान कनॉट प्लेस के 'हनुमान मंदिर के बंद' होने को लेकर जाति के नाम पर नैरेटिव गढ़ रहीं राणा अय्यूब के दावों का चश्मदीदों ने किया फैक्ट चेक
देखिए @Anurragmishra की… pic.twitter.com/3paHIRIG1v
इसके अलावा, दिल्ली पुलिस के निर्देश पर मंदिर के द्वार बंद कर दिए गए थे। लेकिन, किसी को भी मंदिर में जाने से नहीं रोका गया था।
जबकि इस्लामी-वामपंथी हिंदू मंदिर को कॉकरोचों को शरण न देने के लिए निशाना बना रहे हैं, उनमें से किसी ने भी यह कहने की जुर्रत नहीं की कि इसी मंदिर और उसके आसपास के क्षेत्र पर नकाबपोश प्रदर्शनकारियों ने पथराव किया।
20 जुलाई को प्राचीन हनुमान मंदिर के आसपास सीजेपी समर्थकों ने पत्थरबाजी की और इसका भी वीडियो मौजूद हैं। ऐसे हालात में मंदिर प्रशासन अपने परिसर को उपद्रवी दंगाइयों के लिए खुला क्यों छोड़ेगा ताकि वे मंदिर पर हमला करें, तोड़फोड़ करें और निर्दोष लोगों को निशाना बनाएँ?
मंदिर अधिकारियों ने बुनियादी सुरक्षा और आत्मरक्षा के उपाय के तौर पर द्वार बंद कर दिए, क्योंकि परिसर पर और उसके आसपास भारी पथराव हो रहा था। हिंसक भीड़ को प्रवेश की अनुमति देना एक तरह से तोड़फोड़, अपवित्रता को बुलावा देने जैसा था। ऐसे में उन लोगों के जीवन भी खतरे में पड़ जाते जिनका विरोध प्रदर्शन से कोई लेना-देना नहीं था और वे मंदिर में पूजा करने पहुँचे थे।
हिंदू मंदिर में पत्थर फेंकने वालों या ‘विरोध’ के नाम पर पत्थर फेंकने वालों का समर्थन करने वालों को किसी भी हालत में जगह नहीं दी जानी चाहिए। ‘शांतिपूर्ण छात्र प्रदर्शन’ का पूरा मुखौटा उस क्षण धराशायी हो गया, जब सीजेपी के प्रदर्शनकारियों ने पत्थर फेंके और पुलिस पर हमला किया। इसकी वजह से हिंसा हुई और पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा और आँसू गैस के गोले दागने पड़े।
इस्लामी-वामपंथी गुट का पाखंड हिंदुओं को खलनायक के रूप में पेश करना और उन्हें दोषी ठहराना हास्यास्पद है। वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, वैज्ञानिक सोच आदि के नाम पर हिंदुओं के खिलाफ हमेशा जहर उगलते हैं और हिंदू धर्म का उपहास करते हैं और मदद की उम्मीद भी करते हैं।
इस्लामी-वामपंथी जिन गुरुद्वारों और मस्जिदों को ‘अल्पसंख्यक धार्मिक स्थलों द्वारा दिखाई गई मानवता’ बताकर उनकी सराहना कर रहे हैं, उन पर कोई हमला नहीं हुआ। गुरुद्वारे या किसी मस्जिद पर या उसके आसपास पत्थर नहीं फेंके गए।
इसके अलावा, मुस्लिम का एक बड़ा हिस्सा भाजपा विरोधी है और मोदी सरकार के पतन की कामना करता है। वास्तव में, इस्लामी कट्टरपंथी खुलेआम कहते हैं कि ‘निजाम’ बदलेगा। अयोध्या राम मंदिर को ध्वस्त करके बाबरी मस्जिद का पुनर्निर्माण किया जाएगा। राम मंदिर को वे मोदी सरकार द्वारा निर्मित मानते हैं। यह आश्चर्य की बात नहीं है कि किसी मस्जिद ने उन लोगों को पनाह दी हो जो सड़कों पर उतरकर केंद्र सरकार का हिंसक विरोध कर रहे हैं।
इस्लामी-वामपंथियों को भी तलवारें लहराते निहंगों के सीजेपी विरोध प्रदर्शन में शामिल होने से कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन अगर बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने हथियारों के साथ जवाबी विरोध प्रदर्शन किया होता, तो हिंदू-विरोधी गुट उन्हें ‘भगवा आतंकवादी’ करार दे देता।
वामपंथी-लिबरल ग्रुप ने बड़ी चालाकी से प्राचीन हनुमान मंदिर पर और उसके आसपास पत्थरबाजी के बड़े मुद्दे से ध्यान हटाकर, उसी मंदिर पर निशाना साधना शुरू कर दिया, जिसमें प्रदर्शनकारियों को शरण नहीं दी गई थी।
चाहे वह बांग्लादेश हो, जहाँ सरकार विरोधी ‘छात्र विरोध प्रदर्शन’ हिंदुओं के खिलाफ इस्लामी हमले में परिणत हुए, या सीजेपी का ‘चलो संसद’ विरोध प्रदर्शन हो, किसी न किसी तरह हिंदू और हिंदू धर्म को ही निशाना बनाया जाता है।
सीजेपी का विरोध प्रदर्शन एनईटी पेपर लीक, परीक्षा अनियमितताओं और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग को लेकर था। लेकिन सीजेपी की अगुवाई इस्लामी-वामपंथी ग्रुप ने की, जो हिंदू विरोधी नफरत फैलाने के लिए कुख्यात हैं।
अभिनेता प्रकाश राज सीजेपी के समर्थन में इस विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए। यूँ भी वो सनातन धर्म (हिंदू धर्म) को मिटाने की बात करते हैं। जेएनयू की पूर्व प्रोफेसर निवेदिता मेनन ने सीजेपी का समर्थन किया। उन्होंने ‘लव जिहाद’ और इससे पीड़ित हिंदुओं का मजाक उड़ाया था। ‘कॉमेडियन’ कुणाल कामरा ने सीजेपी के विरोध प्रदर्शन मंच से माता सीता के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की। बर्गर खाने को लेकर सीजेपी से निष्कासित सदस्य विजेता दहिया ने हिंदू विरोधी टिप्पणी की। दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नंदिता नारायण ने ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’ गाया और पाकिस्तानी कवि फैज अहमद फैज की इस्लामी वर्चस्ववादी और मूर्ति तोड़ने वालों को महिमामंडित करने वाली कविता ‘हम देखेंगे’ की तारीफ की। वहीं वामपंथी छात्र ग्रुप ‘आजादी-आजादी’ और ‘ब्राह्मणवाद से आजादी’ जैसे आपत्तिजनक नारे लगाए।
एक ओर जहाँ एक कॉकरोच ने अपमानजनक टिप्पणी करते हुए कहा, ‘राम मारे हुए हैं’, वहीं दूसरे ने कहा ‘राम मंदिर या जो भी बकवास हो…’।
“Ram Mandir or whatever the fuck…”
— Fuhrer (@GroFaZ_) July 22, 2026
Every temple should be closed for such people & their supporters pic.twitter.com/WjwR58mdkp https://t.co/ZcKctOZT4P
एक सीजेपी प्रदर्शनकारी ने तो यहाँ तक कह दिया कि ‘मुस्लिम हिंदुओं से एक लाख गुना बेहतर हैं’।
अब निष्कासित हो चुकी सीजेपी नेता विजेता दहिया से लेकर सीजेपी के कई भ्रष्ट नेताओं तक, सभी ने खुलेआम हिंदुओं और हिंदू धर्म के प्रति अपनी नफरत जाहिर की है। फिर भी मंदिरों से शरण की उम्मीद रखते हैं।
इसी बीच राणा अय्यूब जैसे ऑनलाइन इस्लामी-वामपंथियों ने चतुराई से जाति आधारित व्यंग्य कर हिन्दुओं को और बदनाम करने की कोशिश की। उसकी मंशा हिन्दुओं को जातियों में विभाजित करने की ही लगती है।
इससे साफ है कि वामपंथी उदारवादी उतने ही ‘धर्मनिरपेक्ष और सहिष्णु’ हैं, जितना कि सीजेपी का विरोध प्रदर्शन ‘गैर-राजनीतिक और शांतिपूर्ण’ है।
(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)


