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UPI पेमेंट पर टैक्स लगने वाला है? नहीं, कॉन्ग्रेसी और लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम ने नए कानून को लेकर आपको गुमराह किया

एक संसदीय समिति ने भी कहा है कि MDR के बिना पूरे UPI सिस्टम को आर्थिक रूप से लंबे समय तक चलाना मुश्किल होता जा रहा है, क्योंकि सरकार की सब्सिडी इंडस्ट्री के वास्तविक खर्च का केवल एक छोटा हिस्सा ही पूरा करती है।

पिछले कुछ दिनों से विपक्षी नेता और लेफ्ट-लिबरल गैंग के लोग यह अफवाह फैला रहे हैं कि मोदी सरकार ने यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) से होने वाले लेन-देन पर शुल्क लगाने के लिए कानून बनाया है जबकि अब तक UPI लेन-देन मुफ्त रहे हैं। कानून को लेकर फैलाई जा रही इस अफवाह से बने माहौल का फायदा उठाने के लिए कई मुख्यधारा के मीडिया प्लेटफॉर्म भी भ्रामक और अटकलों पर आधारित हेडलाइन प्रकाशित कर रहे हैं।

संसद ने हाल ही में कराधान और अन्य कानून संशोधन विधेयक, 2026 को पारित किया। इसके बाद UPI लेन-देन पर कर लगाने को लेकर झूठे दावे फैलने लगे। विपक्ष के साथ-साथ लेफ्ट-लिबरल गैंग ने भी मोदी सरकार को निशाना बनाना शुरू कर दिया। उनका आरोप था कि मोदी सरकार अमेरिका के दबाव में काम कर रही है।

कॉन्ग्रेस सांसद जयराम रमेश ने X पर एक लंबा पोस्ट लिखा। इसमें उन्होंने दावा किया कि अब आम लोगों को UPI लेन-देन करने की कीमत चुकानी पड़ेगी। सांसद ने दावा किया कि मोदी सरकार ने अपने ‘अच्छे दोस्त डोनाल्ड ट्रंप’ के दबाव में UPI लेन-देन पर कर लगाने वाला कानून पारित किया है।

जयराम ने X पर लिखा, “दरअसल, इस संशोधन को लाने की असली वजह शायद और भी ज्यादा चिंताजनक है। यह अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि की 2026 की उस रिपोर्ट के बाद आया है, जिसमें UPI और RuPay के मुफ्त होने की आलोचना की गई है और आरोप लगाया गया है कि इनकी वजह से Visa और MasterCard जैसे अमेरिकी पेमेंट प्लेटफॉर्म बाजार से बाहर हो गए हैं। क्या प्रधानमंत्री अपने अच्छे दोस्त डोनाल्ड ट्रंप के दबाव में UPI को कमजोर करने और डिजिटल भुगतान क्षेत्र को अमेरिकी कंपनियों के लिए खोलने की कोशिश कर रहे हैं?”

कॉन्ग्रेस सांसद की पोस्ट पर कमेंट करते हुए वामपंथी प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘द वायर’ के संस्थापक संपादक एमके वेणु ने भी इस झूठ को आगे बढ़ाया और सरकार को गरीब-विरोधी दिखाने की कोशिश की। वेणु ने दावा किया कि पीएम मोदी ने अपने ‘फ्रैंड के दबाव’ में ‘गरीब भारतीयों’ द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले UPI लेन-देन पर टैक्स लगाने का फैसला किया है। यहाँ ‘फ्रैंड’ से स्पष्ट रूप से उनका इशारा अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की ओर था।

कई मुख्यधारा के मीडिया पोर्टल भी ऐसी भ्रामक हेडलाइन के साथ लेख प्रकाशित कर रहे हैं, जिनसे यह संकेत मिलता है कि सरकार वास्तव में UPI लेन-देन पर टैक्स लगाने जा रही है। विधेयक को लोकसभा में पेश किए जाने के बाद रॉयटर्स ने ‘डिजिटल पेमेंट पर मर्चेंट फीस की वापसी का रास्ता साफ कर रहा भारत’ हेडलाइन से एक लेख प्रकाशित किया। इस लेख की हेडलाइन से ऐसा लगता है कि UPI लेन-देन पर टैक्स जल्द ही हकीकत बनने वाला है।

रॉयटर्स की खबर का स्क्रीनशॉट

इसी तरह, लोकसभा में कानून पारित होने के बाद द टेलीग्राफ ने भी एक लेख प्रकाशित किया, जिसकी हेडलाइन थी, “लोकसभा ने बैंकों और सेवा प्रदाताओं को UPI लेन-देन पर शुल्क लगाने की अनुमति देने वाले विधेयक को मंजूरी दी।”

Screenshot via The Telegraph

कुछ मीडिया पोर्टलों ने दावा किया कि केवल ₹2,000 तक के UPI भुगतान ही मुफ्त होंगे और इससे अधिक की किसी भी रकम के लेन-देन पर टैक्स लगेगा।

सोशल मीडिया पोस्ट और मीडिया रिपोर्ट्स के कारण आम लोगों में डर और भ्रम की स्थिति पैदा हो गई। भ्रामक हेडलाइन और पोस्ट की वजह से लोग यह मानने लगे कि UPI भुगतान पर टैक्स लगाया जा रहा है। इन दावों ने न केवल डिजिटल भुगतान को लेकर गलत जानकारी फैलाई बल्कि यह भी कहा गया कि सरकार ने अमेरिका के दबाव में यह फैसला लिया है। हालाँकि, लेफ्ट-लिबरल प्रोपेगेंडा और मीडिया में किए जा रहे दावों से हकीकत काफी अलग है।

क्या नए कानून में UPI लेन-देन पर टैक्स लगाया गया है?

कराधान और अन्य कानून संशोधन विधेयक, 2026 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 4 अगस्त 2026 को लोकसभा में पेश किया था। विपक्ष के अलग-अलग मुद्दों को लेकर किए जा रहे हंगामे के बीच यह विधेयक 6 अगस्त 2026 को पारित हुआ। इस विधेयक के जरिए 2025 के आयकर अधिनियम, 2026 के वित्त अधिनियम और 2007 के पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट समेत कुछ मौजूदा कानूनों में बदलाव किए गए हैं। इसी 2007 के कानून में किए गए बदलाव को लेकर सबसे ज्यादा विवाद हो रहा है।

विधेयक में पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट की धारा 10A को हटा दिया गया है। यह धारा बैंकों और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स को सरकार की ओर से अधिसूचित डिजिटल भुगतान माध्यमों, जैसे UPI और RuPay डेबिट कार्ड से किए गए लेन-देन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लेने से कानूनी तौर पर रोकती थी। MDR वह शुल्क है, जो किसी डिजिटल भुगतान को प्रोसेस करने के बदले व्यापारी से लिया जाता है। अब तक इसी प्रावधान के कारण UPI भुगतान पर प्रोसेसिंग शुल्क नहीं लिया जा सकता था।

हालाँकि, इस प्रावधान को हटाने का मतलब यह नहीं है कि अब डिजिटल भुगतान पर अपने आप टैक्स लग जाएगा। इस बदलाव के बाद केंद्र सरकार के पास यह तय करने का अधिकार होगा कि किन डिजिटल भुगतान माध्यमों पर शुल्क लगाया जा सकता है और किन पर नहीं।

सीधे शब्दों में कहें तो विधेयक खुद UPI या किसी अन्य डिजिटल भुगतान पर कोई टैक्स नहीं लगाता। इसमें सिर्फ उस कानूनी रोक को हटा दिया गया है, जो डिजिटल भुगतान पर शुल्क लगाने से रोकती थी। यानी अगर भविष्य में सरकार कुछ डिजिटल लेन-देन पर शुल्क लगाने का फैसला करती है, तो वह इसके लिए अलग से अधिसूचना जारी कर सकती है।

संशोधन की जरूरत क्यों पड़ी?

देश में डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने UPI और RuPay से होने वाले लेन-देन पर MDR (Merchant Discount Rate) हटा दिया था। यानी डिजिटल भुगतान करने पर व्यापारियों से प्रोसेसिंग फीस नहीं ली जाती थी। लेकिन इन डिजिटल लेन-देन को चलाने में खर्च होता है, जिसे सरकार बैंकों और पेमेंट कंपनियों को सब्सिडी या दूसरे प्रोत्साहनों के जरिए पूरा करती है।

इसका नतीजा यह हुआ कि पिछले कुछ वर्षों में UPI लेन-देन की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई। खास बात यह है कि सरकार की ओर से दी जाने वाली आर्थिक मदद सिर्फ छोटे व्यापारियों और ₹2,000 तक के छोटे लेन-देन के लिए उपलब्ध है। दूसरी ओर, बैंकों और पेमेंट कंपनियों का खर्च लगातार बढ़ रहा है। इसमें सर्वर को बनाए रखना, ऑनलाइन सुरक्षा यानी साइबर सिक्योरिटी सुनिश्चित करना और पूरे पेमेंट सिस्टम को सुचारू रूप से चलाना शामिल है।

एक संसदीय समिति ने भी कहा है कि MDR के बिना पूरे UPI सिस्टम को आर्थिक रूप से लंबे समय तक चलाना मुश्किल होता जा रहा है, क्योंकि सरकार की सब्सिडी इंडस्ट्री के वास्तविक खर्च का केवल एक छोटा हिस्सा ही पूरा करती है। RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भी साफ कहा है कि इतने बड़े UPI सिस्टम को हमेशा पूरी तरह मुफ्त चलाना संभव नहीं है। सिस्टम की सुरक्षा बनाए रखने और इसके नेटवर्क को आगे बढ़ाने के लिए पैसे की जरूरत होती है। हालाँकि, उन्होंने यह भी कहा कि इस समय किसी तरह के शुल्क को लेकर अटकल लगाना जल्दबाजी होगी। सरकार की ओर से आधिकारिक अधिसूचना जारी होने के बाद ही स्थिति साफ होगी।

अगर भविष्य में सरकार MDR लागू करने का फैसला करती भी है, तो इसका असर आम लोगों या छोटे कारोबारियों पर पड़ने की संभावना कम है। डिजिटल पेमेंट में ₹2,000 से ज्यादा के लेन-देन पर टैक्स लगने की चर्चा पेमेंट्स काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) की ओर से दिए गए एक प्रस्ताव के बाद शुरू हुई। PCI गैर-बैंकिंग पेमेंट कंपनियों का प्रतिनिधित्व करने वाला एक उद्योग संगठन है। इस संगठन ने पिछले साल सरकार से UPI पर जीरो-MDR की नीति पर दोबारा विचार करने की अपील की थी।

PCI के मुताबिक, सरकार की ओर से हर साल दी जाने वाली करीब ₹1,500 करोड़ की सब्सिडी UPI सिस्टम को चलाने और उसका विस्तार करने के वास्तविक खर्च का केवल एक छोटा हिस्सा है। संगठन ने पूरे UPI इकोसिस्टम को चलाने और विस्तार देने का सालाना खर्च करीब ₹10,000 करोड़ बताया था।

PCI ने सरकार से सुझाव दिया था कि MDR सिर्फ बड़े कारोबारियों से लिया जाए, जिनका सालाना टर्नओवर ₹50 करोड़ से ज्यादा है। इसके अलावा ₹2,000 से ज्यादा के लेन-देन पर 0.3% से 0.5% तक MDR लगाने का प्रस्ताव दिया गया था।

इसका मतलब यह हुआ कि अगर किसी बड़े रिटेल स्टोर या ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर ₹2,000 से ज्यादा का भुगतान किया जाता है, तो उस बड़े कारोबारी से बैंक डिजिटल भुगतान को प्रोसेस करने के लिए मामूली MDR ले सकता है। लेकिन यह सिर्फ एक प्रस्ताव है और सरकार ने इसे अभी लागू नहीं किया है।

इसलिए फिलहाल जो डिजिटल लेन-देन अब तक बिना किसी शुल्क के हो रहे थे, वे बिना शुल्क के ही जारी रहेंगे, जब तक सरकार की ओर से कोई नया बदलाव अधिसूचित नहीं किया जाता।

साथ ही, ऊपर दी गई जानकारी से यह भी साफ है कि कानून में किया गया यह बदलाव अमेरिका या किसी दूसरे बाहरी दबाव की वजह से नहीं है। यह एक आर्थिक और राजकोषीय कदम है, न कि UPI की भुगतान नीति में अचानक किया गया कोई बड़ा बदलाव। UPI से जुड़ा यह प्रावधान सरकार की ओर से किए गए कई अन्य कानूनी और आर्थिक बदलावों वाले एक बड़े पैकेज का सिर्फ एक हिस्सा है।

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Aditi
Aditi
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