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संभल की डेमोग्राफी: हिंदू 13 हजार से हुए 47 हजार, मुस्लिम 23 हजार से हो गए 1 लाख 71 हजार – मुस्लिम भीड़ की दंगाई मानसिकता का यह है गणित

संभल में 1891 से लेकर 2011 तक हुए हर जनगणना को जब आप देखेंगे और आबादी में बढ़ोतरी का प्रतिशत देखेंगे तो चौंक जाएँगे। 120 वर्षों में संभल की कुल आबादी में 493.17 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इस दौरान मुस्लिम आबादी बढ़ी है 632.1 प्रतिशत। जबकि हिंदुओं की जनसंख्या में बढ़ोतरी हुई सिर्फ 260 प्रतिशत।

भगवान कल्कि के मंदिर को ध्वस्त कर उसके अवशेषों पर ही संभल में शाही जामा मस्जिद बना दी गई। यह किया गया 1526 में। इतिहास और हिंदु-स्मृति में लेकिन सब दर्ज रहा। 498 साल बाद 2024 में न्यायिक प्रक्रिया के तहत हिंदुओं ने मस्जिद के सर्वेक्षण की याचिका दायर की। कोर्ट ने सर्वे का ऑर्डर भी दे दिया। सर्वे करने लेकिन जब सरकारी टीम पहुँचती है तो वहाँ मुस्लिम भीड़ दंगा करती है। आखिर पुलिस-प्रशासन पर हमला करने की हिम्मत आई कहाँ से भीड़ को? इस सवाल का जवाब संभल दंगों की जाँच करने वाली आयोग की रिपोर्ट में स्पष्ट है – संभल की बदलती जनसांख्यिकी मतलब डेमोग्राफी।

रिपोर्ट में 2011 की जनगणना के अनुसार संभल शहर की डेमोग्राफी 77.67% मुस्लिम आबादी जबकि हिंदू आबादी सिर्फ 22% वाली बताई गई है। इससे ज्यादा चौंकाने वाला संभल के पुलिस अधीक्षक कृष्ण कुमार और अपर पुलिस अधीक्षक श्रीश्चंद का वो बयान है, जहाँ वो वर्तमान में 80% मुस्लिम जबकि सिर्फ 20% हिंदुओं के होने की बात कह रहे हैं। मतलब संभल में हिंदू कम से कम होते जा रहे हैं, यह सरकारी आँकड़ा है।

क्या संभल का इतिहास हमेशा से मुस्लिम बाहुल्य ही रहा है? आयोग ने अपनी रिपोर्ट में इस पर भी विस्तार से बताया है। ‘संभल में हिंसा का इतिहास और शाही जामा मस्जिद का इतिहास’ रिपोर्ट के अध्याय-3 का शीर्षक ही यही है। जिस संभल में भगवान कल्कि का मंदिर हुआ करता था, वो संभल आखिर मुस्लिम-बहुल कैसे हुआ? मुस्लिम-बहुल होने के कारण वहाँ क्या-क्या सामाजिक बदलाव देखने को मिले, आयोग की रिपोर्ट इन परतों को भी खोलती है।

संभल जो कभी था शंभाला: महाभारत और पुराणों में है जिसका उल्लेख

संभल का पौराणिक नाम शंभाला है। इसका जिक्र महाभारत, स्कंद पुराण, भविष्य पुराण, कल्कि पुराण में विष्णु के दसवें और अंतिम अवतार भगवान कल्कि के जन्मस्थान के रूप में उल्लेखित है। यही कारण है कि यहाँ ‘श्री कल्कि विष्णु मंदिर’ भी है। हिंदू धर्म ग्रंथों के अलावे तिब्बती बौद्ध पौराणिक कथाओं में भी शंभाला को हिमालय के पार एक पौराणिक साम्राज्य और शुद्ध भूमि के रूप में वर्णित किया गया है।

सरकारी आँकड़ों की बात करें तो 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व के दौरान संभल पर पाँचाल शासकों का राज था। बाद में यह मौर्य सम्राट अशोक के साम्राज्य का हिस्सा बना। किंवदंती यह भी है कि 12वीं सदी के दौरान दिल्ली के अंतिम हिंदू शासक पृथ्वीराज चौहान ने संभल में गाजी सैय्यद सालार मसूद (गजनी साम्राज्य का शासक महमूद गजनी का भांजा) के खिलाफ दो युद्ध लड़े थे।

13वीं और 14वीं शताब्दी में संभल दिल्ली सल्तनत का हिस्सा बना। इस दौरान यह पहले कुतुब-उद-दीन ऐबक और बाद में फिरोज शाह तुगलक के अधीन रहा। 14वीं सदी की बात करें तो मोरक्कन यात्री व दिल्ली के काजी इब्न बतूता ने भी अपने यात्रा वृत्तांत ‘रिहला’ में संभल का जिक्र किया है। इब्न बतूता के अनुसार चीन के युआन सम्राट तोगोन तेमुर ने दिल्ली के सुल्तान मोहम्मद बिन तुगलक को एक राजदूत भेजा था, जिसमें संभल में एक बौद्ध मंदिर के पुनर्निर्माण की अनुमति माँगी गई थी। कारण था – तिब्बत से उस समय भारी संख्या में आने वाले तीर्थयात्री। मतलब संभल पर मुस्लिम आक्रांताओ का शासन जरूर हो गया था लेकिन पौराणिक-सामाजिक-धार्मिक मान्यताएँ न सिर्फ देश बल्कि विदेशियों तक की स्मृति से लोप नहीं हुई थी, यह आसानी से समझा जा सकता है।

संभल का क्या महत्व था, इसे ऐसे समझें। 15वीं शताब्दी में लोदी साम्राज्य के दूसरे शासक सिकंदर लोदी ने संभल को अपने साम्राज्य की राजधानियों में से एक घोषित किया था। यह चार वर्षों तक इसी तरह बना रहा। इसके बाद यहाँ मुगलों का राज हुआ। मुगल शासक बाबर ने अपने साम्राज्य के शुरुआती दिनों में इसी संभल में अपनी अस्थायी राजधानी स्थापित की थी। संभल में पहली बाबरी मस्जिद का निर्माण भी करवाया था। संभल का तब इतना महत्व हुआ करता था कि उसने अपने बेटे हुमायूँ को यहाँ का गवर्नर बनाया था। हुमायूँ जब राजा बना तो यह अकबर को सौंपा गया। कहा जाता है कि संभल अकबर के शासन-काल में फला-फूला। इसके बाद जब शाहजहाँ को यहाँ का प्रभारी बनाया गया, उसके बाद से इसकी लोकप्रियता और महत्व धीरे-धीरे खत्म होता गया।

संभल की जनसंख्या: 1881 से लेकर अब तक

साल 1881 में अंग्रेजों ने पहली बार भारत की जनगणना की। तब संभल की कुल जनसंख्या 35196 थी। 1891 में यह बढ़ कर 37226 हुई।

भारत की सबसे पहली और दूसरी जनगणना में संभल की आबादी, स्रोत साभार: North-Western Provinces and Oudh, Imperial Tables, Part II, Vol-XVII, Uttar Pradesh – Census 1891

जनसांख्यिकी मतलब डेमोग्राफी की बात करें तो इसका डेटा साल 1891 से ही उपलब्ध है। 1881 के उपलब्ध रिकॉर्ड से संभल का सिर्फ कुल आबादी का डेटा प्राप्त हुआ है। जबकि 1891 और उसके बाद जितनी बार भी जनगणना की गई, धार्मिक-मजहबी आबादी का डेटा भी संलग्न है।

1891 की जनगणना के अनुसार संभल की डेमोग्राफी, स्रोत साभार: North-Western Provinces and Oudh, Imperial Tables, Part II, Vol-XVII, Uttar Pradesh – Census 1891

1891 में संभल (वर्तमान का नगर पालिका परिषद) में रह रहे कुल 37226 लोगों में 13291 हिंदू थे, जबकि 23476 मुसलमान। मतलब कुल आबादी का 35.7 प्रतिशत हिंदू और 63.1 प्रतिशत मुस्लिम।

नीचे आप 1891 से लेकर 2011 तक हुए हर जनगणना को देख सकते हैं। जब आप आबादी में बढ़ोतरी का प्रतिशत देखेंगे तो चौंक जाएँगे। 120 वर्षों में संभल की कुल आबादी में 493.17 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इस दौरान मुस्लिम आबादी बढ़ी है 632.1 प्रतिशत। जबकि हिंदुओं की जनसंख्या में बढ़ोतरी हुई सिर्फ 260 प्रतिशत। मतलब शहर की आबादी में बढ़ोतरी दर से लगभग आधी दर पर हिंदुओं की जनसंख्या संभल में बढ़ी है। यह चिंताजनक स्थिति है।

घटते गए हिंदू, फैलता गया मुसलमान: स्रोत साभार – 1891 से 2011 तक की गई जनगणना का सरकारी आँकड़ा, ग्राफिक्स साभार – Gemini AI

कोरोना काल के दौरान 2021 की जनगणना नहीं हो सकी। लेकिन संभल दंगों की जाँच के लिए बने आयोग के समक्ष वहाँ के पुलिस अधीक्षक कृष्ण कुमार और अपर पुलिस अधीक्षक श्रीश्चंद का बयान हिंदुओं की संख्या में हो रही कमी की ओर इशारा करती है। उनके अनुसार 2011 में लगभग 22% हिंदुओं की तुलना में वर्तमान में लगभग 20% हिंदू ही बचे हैं संभल शहर में।

आजाद भारत में क्यों नहीं फले-फूले संभल के हिंदू

इस्लामी आक्रांताओं और अंग्रेजों की गुलामी के दौर में संभल के हिंदू अगर उपेक्षा के शिकार हुए तो क्या आजादी के बाद क्या हालात में सुधार हुआ?

1891 में संभल में हिंदू-मुस्लिम आबादी का अंतर सिर्फ 10000 के लगभग था। डाटा से यह स्पष्ट है कि संभल तब भी मुस्लिम-बहुल था लेकिन जनसंख्या का अंतर बहुत कम था। संभव है कि पृथ्वीराज चौहान की सत्ता जाने के बाद इस्लामी आक्रांताओं ने हिंदू-घृणा के कारण इस पौराणिक शहर के धार्मिक स्थलों को बर्बाद करने के साथ-साथ यहाँ के कुछ लोगों को इस्लाम में धर्मांतरित भी किया होगा, कुछ बाहरी मुस्लिमों को बसाया भी होगा, बदलती परिस्थितियों को देखते हुए कुछ हिंदू पलायन भी कर गए होंगे। 12वीं सदी से लेकर 1890 तक संभल जैसे प्रमुख हिंदू नगर का मुस्लिम-बहुल हो जाने के ये कुछ चंद कारक हो सकते हैं। लेकिन आजाद भारत (ऊपर के डाटा चित्र में, 1951 से 2011 के आँकड़ों पर नजर डालिए) में ऐसी परिस्थितियाँ क्यों बनीं कि यहाँ हिंदू 16920 से बढ़ कर 47846 पर ही सिमट गए, जबकि इसी समय-काल में मुस्लिमों की संख्या 43910 से 171857 हो गई?

इस सवाल का जवाब है – सांप्रदायिक दंगा। एक दंगे के बाद दूसरा, दूसरे के बाद तीसरा… संभल में आजादी से कुछ साल पहले से यह जो चक्र चला, उसकी जड़ों में मट्ठा डालने की आजादी के बाद भी न तो राजनीतिक मंशा कभी किसी की रही, न ही प्रशासनिक स्तर पर कभी प्रयास किया गया।

24 नवंबर 2024 की घटना संभल में दंगा का कोई अकेला मामला नहीं थी। शहर का एक लंबा और अशांत इतिहास है, जिसमें बार-बार सांप्रदायिक अशांति की घटनाएँ हुई हैं। संभल दंगों की जाँच के लिए बने आयोग ने यहाँ बार-बार होने वाली हिंसक घटनाओं का अध्ययन किया, जिनमें से अधिकांश हिंदुओं और मुसलमानों के बीच झड़पों से संबंधित हैं। इसके लिए आयोग ने विभिन्न स्रोतों से उपलब्ध सामग्री का अध्ययन किया। आयोग ने यह पाया कि 16वीं शताब्दी की शुरुआत में हरि मंदिर को ध्वस्त कर उसके ऊपर ही शाही जामा मस्जिद मुगल शासक बाबर द्वारा बनाया गया, जो यहाँ दो संप्रदायों के बीच विवाद का मूल है। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में 1936 से लेकर 2024 तक के सभी दंगों का वर्णन किया है। एक दंगा हालाँकि 1924 में भी हुआ था, जिसका जिक्र जवाहरलाल नेहरू ने खुद अपनी रिपोर्ट में की है, नीचे वो भी शामिल किया जा रहा है। ज्ञात और दर्ज स्रोतों के आधार पर कुल 16 दंगों का जिक्र नीचे है।

संभल में सांप्रदायिक दंगे: 1924 से 2024 तक – 100 वर्षों का इतिहास

“मुहर्रम महीने के 9वें दिन (11 अगस्त 1924, इस दिन श्रावण मास का आखिरी सोमवार भी था) संभल में दो हिंदू मंदिर तोड़ दिए गए। वहाँ स्थापित मूर्तियों को विखंडित कर दिया गया था। कई हिंदुओं को बुरी तरह मारा गया। जबकि मुहम्मडनों के साइड कोई क्षति या चोट के निशान नहीं देखे गए। यह इसलिए हुआ क्योंकि मुहम्मडन जहाँ से ताजिया लेकर जा रहे थे, वहाँ भगवान शिव के सूरजकुंड मंदिर में भजन-कीर्तन चल रहा था। उन्होंने मंदिर से आ रहे संगीत पर आपत्ति जताने के बाद मंदिर तोड़ा, मूर्ति विखंडित की, भक्तों को बहुत मारा। इसके बाद यहाँ से कुछ दूरी पर स्थित ठाकुरद्वारा मंदिर को भी इस्लामी भीड़ ने तोड़ डाला। हिंदू पीड़ितों ने यह भी बताया कि मंदिर निर्माण के लिए एक साधु को कुल 1305 रुपए दान-दक्षिणा में मिले थे। मुस्लिम दंगाइयों ने पहले उन साधु को नंगा किया, फिर उनको मिला दान भी छीन लिया।”

यह रिपोर्ट खुद जवाहरलाल नेहरू ने लिखी है, वो भी संभल में 3 दिन रह कर, हिंदू-मुस्लिम पक्षों से आमने-सामने बातचीत करके।

एसपी संभल ने आयोग के समक्ष बताया कि उनके कार्यालय में उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार संभल में इस दौरान सांप्रदायिक हिंसा की कुछ घटनाएँ हुई थीं। हालाँकि तारीख और स्थान का विवरण (संभवतः पुराने रिकॉर्ड के कारण) वो आयोग को उपलब्ध नहीं करा सके।

विभाजन के समय हुए सांप्रदायिक दंगों से संभल भी अछूता नहीं था। दंगाई मुस्लिमों से बचने के लिए हातिमसराय और आसपास के क्षेत्रों के लोग संभल पुलिस स्टेशन में शरण लिए थे। दंगे शांत होने के बाद जगदीश शरण नाम के व्यक्ति के साथ 20-25 अन्य लोग पुलिस स्टेशन से पुलिस एस्कॉर्ट के साथ अपने-अपने घरों की ओर लौट रहे थे। जब इनके घर केवल 50 मीटर दूर रह गए थे, तो इन्होंने खुद का सुरक्षित मान कर पुलिसकर्मियों को वापस लौटने के लिए कह दिया। पुलिस वालों के वापस मुड़ते ही हिलाली सराय में कुरैशी वाली गली में इन लोगों पर दंगाई मुसलमानों ने हमला कर दिया। अन्य लोग भागने में सफल रहे, लेकिन जगदीश शरण को पकड़ लिया गया और मार डाला गया।

यह दंगा बड़े नवाब महमूद हसन खान (वर्तमान विधायक इकबाल महमूद का अब्बा) द्वारा भड़काया गया था। दंगों की शुरुआत बड़े नवाब ने ही गोलीबारी करके शुरू की थी। इसमें छह हिंदुओं की मृत्यु हुई थी। हिंदुओं को और ज्यादा क्षति पहुँचाने के लिए नवाब महमूद ने अनवर मिस्त्री से एक अस्थायी तोप बनवाई थी। हालात इतने खराब थे कि दंगों के बाद 20 दिनों से अधिक समय तक कर्फ्यू लगाना पड़ा था।

1958 में हिंद इंटर कॉलेज में हिंदू और मुस्लिम छात्रों के बीच हिंसक झड़प हुई। ‘बेरा के कारखाना’ से आए मुस्लिम लड़कों ने लोहे के पंजों सहित हथियारों से हमला किया, जिसमें 10-12 हिंदू छात्र घायल हो गए। इसके बाद 2 दिन का कर्फ्यू लगाया गया।

संभल लोकसभा क्षेत्र में उपचुनाव होना था। इस दौरान प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और जेपी कृपलानी ने भी प्रचार किया। देखते-देखते सांप्रदायिक तनाव भड़क उठा। इसी बीच पूर्व जनसंघ विधायक महेश गुप्ता को रुक्नुद्दीन सराय में दंगाई मुसलमानों ने चाकू मार दिया।

इसकी शुरुआत होती है 29 फरवरी को एक मौलवी की हत्या से। अफवाह फैलाया जाता है कि हत्या राजकुमार सैनी नाम के एक हिंदू ने की। जबकि जाँच से पता चल गया था कि मस्जिद समिति के भीतर विवाद के कारण मौलवी की हत्या एक अन्य मुस्लिम ने की थी। इसके बावजूद मंजर शफी और अताउल्लाह ततारी के नेतृत्व में मुस्लिम भीड़ ने सूरजकुंड मंदिर और मानस मंदिर सहित हिंदू धार्मिक स्थलों पर हमला कर दिया। इस दौरान 2 लोगों की हत्या कर दी गईः सुखा सिंह के बेटे हरिसिंह की और रामेश्वर प्रसाद के बेटे राकेश वैश्य की।

इसके बाद 24 अप्रैल को कल्लू के घर में विस्फोट होता है। उसका बेटा सलाम इसमें घायल होता है और अगले दिन उसकी मौत हो जाती है। बिना यह जाने कि विस्फोट क्यों हुआ, मुस्लिम भीड़ दंगा शुरू कर देती है। इसमें बुजुर्ग हिंदू कमता प्रसाद की चाकू मारकर हत्या कर दी जाती है। जयचंद रस्तोगी की हत्या गोली मार कर की जाती है। इसी अशांति के दौरान संभल शहर के बाहर भी एक हिंदू की हत्या कर दी गई।

पुलिस ने क्या किया? संतुलन बनाया? कैसे? लगभग 20-22 दोषी मुसलमानों को गिरफ्तार किया। लेकिन इससे संतुलन नहीं बनता। इसलिए इतने ही निर्दोष हिंदुओं को भी गिरफ्तार किया गया। ‘निर्दोष हिंदुओं की गिरफ्तारी’ – चौंकना नहीं है, यह सब आयोग की रिपोर्ट में दर्ज है।

1978 में संभल में हुआ दंगा वहाँ के हिंदुओं के लिए सबसे विनाशकारी दंगा था। आयोग की रिपोर्ट के अनुसार इस दंगे में 183 से ज्यादा हिंदुओं की हत्या की गई थी। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार 184 लोगों की हत्या की गई थी। इस दंगे की भयावहता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि मुरारी लाल की फड़ (कोठी/दूकान का वह भाग, जहाँ बैठ चीजें खरीदी-बेची जाती हैं) पर 24 हिंदुओं को जिंदा जला दिया गया था। दंगों के बाद सैकड़ों हिंदू घर-कारोबार छोड़कर पलायन कर गए थे।

25 मार्च 1978 को होली थी। लेकिन संभल में यह मनाई गई थी तनाव के बीच। क्योंकि होलिका दहन जिस स्थान पर होनी थी, वहाँ एक मुस्लिम दुकानदार ने लकड़ी का स्टॉल लगा दिया था। जबकि एक अन्य स्थान पर मंच बना दिया गया था। प्रशासन ने लकड़ी का स्टॉल और मंच तो समय रहते हटा दिया लेकिन होली तनाव में ही गुजरी। यह तनाव दंगों में बदल गया 29 मार्च को।

इस दंगे की साजिश रची थी मंजर शफी (1976 में हुए दंगों में भी इसका हाथ) और उसके गुर्गों ने। मंजर शफी अलीगढ़ में छात्र नेता था और इमरजेंसी के बाद 1977 में मुस्लिम लीग से चुनाव भी लड़ा था। इसे भीड़ जुटाना अच्छे तरीके से आता था। भीड़ को कैसे हमलावर बनाना है, 1976 के दंगों में यह अपना ‘कौशल’ दिखा चुका था। 29 मार्च 1978 को मंजर शफी ने कुछ चंद जुमले गढ़े, फिर उसे अफवाहों की तरह फैलाया:
(i) मंजर शफी मारा गया
(ii) मस्जिद तोड़ दी गई
(iii) पेश इमाम को जला दिया गया
(iv) कोतवाली के पास बनी मस्जिद ध्वस्त कर दी
(v) लूटपाट-कत्लेआम मचा है

नतीजा क्या हुआ? पूरे संभल में मुस्लिम भीड़ दंगाई बन कर घूमने लगी। कहीं एक साथ 24 हिंदुओं (कुछ मीडिया रिपोर्ट में 25 हिंदुओं को जलाए जाने की बात) को गन्ने की खोई और टायर का ढेर लगाकर जिंदा जला दिया गया। यह हुआ था मुरारी लाल की फड़ पर। क्योंकि दंगे भड़कने के बाद बनवारी लाल गोयल ने कई हिंदू दुकानदारों को अपने साले मुरारी लाल की कोठी में छिप जाने को कहा था। लेकिन मुस्लिम आढ़तियों ने इसकी सूचना दंगाइयों को दे दी। इसके बाद मुस्लिम दंगाइयों की भीड़ ने ट्रैक्टर लगाकर मुरारी लाल की कोठी का गेट तोड़ दिया। यहाँ छिपे 24 हिंदुओं को जिंदा जला दिया।

अगर वहाँ मौजूद रसोईया हरिद्वारी लाल खुद को एक ड्रम में बंद नहीं करता, एक छोटे से छेद से पूरी घटनाक्रम नहीं देखता, और सबसे बड़ी बात… जिंदा बचकर वापस नहीं आता तो यह दर्दनाक कहानी सरकारी फाइलों में दब जाती, शायद सिंपल आगजनी बता दी जाती।

यहाँ जिनको जिंदा जलाया गया था, उनमें से बहुतों की अस्थियाँ तक उनके परिवार वालों को नसीब हो सकी थी, उन्हें सांकेतिक रूप (घास-फूस पर आटा लपेट पुतला बना कर) से उनका अंतिम संस्कार करना पड़ा था।

सबसे बुरा हुआ था बनवारी लाल के साथ। दंगों के बावजूद वो प्रभावित इलाके में चले गए। उनकी पत्नी और बेटे ने उन्हें रोका भी। लेकिन वे यह कहते हुए गए:

“सारे मुस्लिम मेरे मित्र और भाई जैसे हैं। सब मेरे साथ काम करते हैं। मुझे कुछ नहीं होगा।”

बनवारी लाल गोयल को लेकिन मुस्लिम दंगाइयों ने पकड़ लिया। उनसे कहा कि तुम इन पैरों से पैसे लेने आए हो और उनके पैर काट दिए। फिर कहा कि तुम इन हाथों से पैसे लेने आए हो और हाथ भी काट दिए। इसके बाद गर्दन काट कर उनकी हत्या कर दी गई। इस दौरान मुस्लिम दंगाइयों के सामने बनवारी लाल गिड़गिड़ाते रहे कि मुझे काटो मत, गोली मार दो। पर किसी ने नहीं सुनी।

दंगाई भीड़ से जो हिंदू जान बचा कर आस-पास के गाँवों-जंगलों की ओर भाग रहे थे, ऐसे 160 लोगों की हत्या कर दी गई। दंगों के खत्म होने के कई दिनों बाद तक लाशें मिलती रही थीं।

1978 दंगों से पहले तक संभल के हिंदू कथित शाही जामा मस्जिद (जो हिंदुओं के लिए हरिहर मंदिर है) के अंदर जाते थे। PAC की निगरानी में परिसर के अंदर बने हवन कुंड के पास बैठ कर भजन-कीर्तन करते थे। 1978 के दंगों की आड़ में शफीकुर रहमान बर्क ने स्थानीय हिंदुओं से इनका यह हक भी छीन लिया। हवन कुंड को मुस्लिमों के पैर-हाथ धोने, कुल्ला करने (वजू करने की जगह) की जगह में तब्दील कर दिया।

यह दंगा इतना व्यापक था, पुलिस-प्रशासन इतनी लाचार थी इसे कंट्रोल करने में कि 29 मार्च से 20 मई तक संभल के नगर क्षेत्रों में कर्फ्यू लगा रहा था। 169 FIR किए गए, इनमें से 3 मुकदमे पुलिस ने दर्ज करवाए थे, जबकि बाकि संभल के दोनों संप्रदाय के व्यक्तियों द्वारा पंजीकृत कराए गए थे।

मुलायम सिंह यादव कनेक्शन भी
1993-94 की बात है। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार थी। 23 दिसंबर 1993 को शासन (मतलब यूपी सरकार, मुलायम सिंह यादव की सरकार) द्वारा मुरादाबाद के डीएम को लिखा गया एक पत्र सामने आया। इसमें संभल में 1978 में हुए दंगों से संबंधित मुकदमे वापस लेने की बिंदुवार जानकारी दी गई थी।

इसी पत्र के आधार पर 5 जनवरी, 1994 को तत्कालीन जिला शासकीय अधिवक्ता ने कोर्ट में शासन के मुकदमे वापस लेने का पत्र दिया था। विभिन्न अदालतों में विचाराधीन 1978 दंगे के 16 में से आठ मुकदमों को तत्कालीन मुलायम सरकार ने वापस लिया था।

सुअर एक जानवर है। उसके पास इंसानी दिमाग नहीं। निश्चित तौर पर वो ईंट-सीमेंट की बनी मस्जिद और घर में फर्क नहीं कर पाता होगा। बेचारा बेजुबान सुअर बिना किसी साजिश या षड्यंत्र के मुरादाबाद में एक ईदगाह में चला गया। इस कारण से वहाँ दंगा भड़क गया। इसकी लपटें संभल तक भी पहुँचीं। यहाँ भी दंगे हुए। प्रजापति समुदाय के एक व्यक्ति की हत्या भी हुई। ध्यान यह दीजिए कि हत्या किसकी हुई? प्रजापति समुदाय के एक व्यक्ति की – मतलब हिंदू की।

पुलिस ने क्या किया? 1976 वाला फॉर्मूला अपनाया। संतुलन बनाने का। कैसे? तस्दीक इलाही को गिरफ्तार किया। लेकिन इससे संतुलन नहीं बनता। संतुलन बनाते हुए विजय त्यागी नामक व्यक्ति को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत भी गिरफ्तार किया गया। तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट का यह आधिकारिक बयान था, जो आयोग की रिपोर्ट में दर्ज है।

बाबरी ढाँचे (मस्जिद) का ताला खोला गया वर्ष 1982 में। संभल के मुसलमानों को यह रास नहीं आया। विरोध के लिए चुना गया शुक्रवार मतलब जुमे की नमाज का दिन। 10-15 हजार मुसलमानों ने इस दिन जामा मस्जिद में काली पट्टियाँ बाँध कर नमाज अदा की। उसके बाद यह नमाजी भीड़ टंडन तिराहा तक आई। नमाजियों की इतनी बड़ी संख्या के कारण, हिंदुओं ने अपनी दुकानें बंद रखीं थीं और भय का माहौल था।

इसी दौरान दीपासराय के एक मुस्लिम ने पैसे के लेन-देन को लेकर हरिशंकर रस्तोगी की गोली मारकर हत्या कर दी। हिंदुओं ने हत्यारे की गिरफ्तारी के लिए विरोध-प्रदर्शन किए। स्थिति तनावपूर्ण हो गई थी। हिंदुओं के दबाव के कारण शफीकुर रहमान बर्क ने हत्यारे का आत्मसमर्पण तो करवाया, लेकिन बाद में हत्यारा बरी हो गया।

इसकी शुरुआत होती है 14 फरवरी 1986 से, मतलब जुमे की नमाज से। श्री राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन के विरोध में मुस्लिमों ने भारी संख्या में विवादित जामा मस्जिद में सामूहिक नमाज अदा की। इसी दौरान एक समाचार छपा। इसमें खबर थी कि कुंभ मेले के लिए हरिद्वार जा रहे नागा साधु महाशिवरात्रि के दिन संभल आएँगे और हरिहर मंदिर में जल चढ़ाएँगे। इस खबर ने संभल में तनाव बढ़ा दिया।

इसके बाद 8 मार्च 1986 को जब शिवरात्रि का जुलूस निकाला जा रहा था, किसी ने यह अफवाह फैला दी कि हरिहर मंदिर (विवादित जामा मस्जिद) में जल चढ़ाया जा रहा है। इसी अफवाह का फायदा उठाकर, ट्यूबवेल ऑपरेटर रहीसुर्रहमान ने मेन्था व्यापारी प्रदीप रस्तोगी की गोली मार कर हत्या कर दी। रास्ते में एक अन्य हिंदू की भी हत्या की गई।

सबसे बड़ा दुस्साहस (पुलिस-प्रशासन को डायरेक्ट चुनौती) दिखाया गया भगवत शरण रस्तोगी की हत्या के बाद। हुआ यह कि टंडन तिराहा के पास खेरू हलवाई की दुकान से चीनी खरीदने गए भगवत शरण रस्तोगी को दुकान के अंदर खींचकर मार डाला गया। लेकिन उनका शव यहाँ से बरामद नहीं हुआ। यह बरामद हुआ नई सराय पुलिस स्टेशन नखासा के अंदर से। भगवत शरण रस्तोगी की लाश को एक बोरे में बाँध कर वहाँ रखा गया था।

इसके बाद मनोकामना मंदिर के पास एक अन्य हिंदू की हत्या की गई। इस दौरान दंगों के बीच में असंख्य दुकानों को लूटा गया और जलाया गया।

8 मार्च 1986 से 6 जून 1986 के बीच मुस्लिम दंगाइयों ने धर्म के आधार पर कुल 7 हिंदुओं की हत्या की:
(i) प्रदीप रस्तोगी
(ii) भगवत शरण रस्तोगी
(iii) सीताराम (मोतीराम के पुत्र)
(iv) ओमिशंकर (छेदलाल के पुत्र)
(v) मास्टर कृपाल सिंह
(vi) एक अन्य हिंदू (शिवरात्रि के जुलूस वाले दिन रास्ते में हत्या)
(vii) एक अन्य हिंदू (मनोकामना मंदिर के पास हत्या)

3 महीने तक चले इन दंगों के संबंध में 50 लोगों को गिरफ्तार किया गया और 250 लोगों को निवारक कार्रवाई के तहत गिरफ्तार किया गया। इसके अलावा, विजय प्रकाश त्यागी, रहीसुर्रहमान और तस्दीक इलाही के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत कार्रवाई की गई और उन्हें हिरासत में लिया गया। 1976 और 1980 की तरह ही ‘संतुलन बनाने वाले फॉर्मूला’ के तहत ही विजय प्रकाश त्यागी को हिरासत लिया गया होगा, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में हालाँकि इस पर कोई टिप्पणी नहीं की है।

भारतीय जनता पार्टी के नेता लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया गया था। इसी दौरान श्री राम जन्मभूमि आंदोलन के समर्थन में पूर्व विधायक महेश कुमार गुप्ता के नेतृत्व में भाजपा कार्यकर्ताओं ने एक जुलूस निकाला। इसके विरोध में 2 नवंबर 1990 (शुक्रवार, जुमे के ही दिन) को, नखासा क्रॉसिंग पर बड़ी संख्या में सशस्त्र मुस्लिम भीड़ एकत्र हो गई, जबकि धारा 144 लागू थी। भीड़ “नारा-ए-तकबीर”, “अल्लाह हू अकबर” और “हिंदुओं को मारो” जैसे नारे लगा रही थी।

पुलिस उस भीड़ को काबू नहीं कर पाई। हिंसा भड़क उठी। भीड़ ने पुलिस पर पथराव किया, जिसमें दो सिपाही घायल हो गए। इसके बाद पुलिस को आत्मरक्षा में गोली चलानी पड़ी। 9 नवंबर 1990 को अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि में नींव स्थापना का समारोह हुआ। संभल में इसके बाद सांप्रदायिक विभाजन और बढ़ गया।

6 दिसंबर 1992 बाबरी ढाँचे (मस्जिद) को गिरा दिया गया। संभल के मुस्लिम इससे भड़क उठे। बदला लेने के लिए लगभग 20000 मुसलमान नखासा तिराहा और छग्गल की कोठी पर एकत्र हो गए।

7 दिसंबर को इस मुस्लिम भीड़ ने पक्का बाग पुलिस चौकी पर हमला बोल दिया। इनका आरोप था कि पुलिस हिंदुओं का समर्थन कर रही है। मुस्लिम भीड़ ने पथराव किया, गोलीबारी भी की। इसमें पीएसी के 4 सिपाही घायल हो गए। तब जाकर इंस्पेक्टर अरविंद कुमार ने आत्मरक्षा में गोली चलाई और भीड़ तितर-बितर हो गई।

8 दिसंबर को लेकिन मुस्लिम दंगाई शांत नहीं बैठे। फिर से हिंसा शुरू की। चौधरी सराय के पास 2 हिंदुओं की हत्या इन लोगों ने कर दी।

22 दिसंबर को हयातनगर में 3 अन्य हिंदू पीड़ितों के शव बरामद हुए। मतलब 8 से 22 दिसंबर तक संभल शांत था, ऐसा नहीं है। मुस्लिम भीड़ हिंसा की ताक में थी, बाबरी ढाँचे (मस्जिद) को गिराए जाने के जवाबी फिराक में तैयार बैठी थी।

2 मार्च 1995 को संभल में फिर से दंगा भड़क उठा। रुक्नुद्दीन सराय या मंडीसराय में बाहर से आए 2 हिंदुओं की हत्या कर दी गई। पुलिस-प्रशासन को व्यवस्था बहाल करने के लिए 8 दिनों का कर्फ्यू लगाना पड़ा था।

नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के खिलाफ वर्ष 2019 में संभल में विरोध प्रदर्शन शुरू हुए। सरायतरिन और दीपा सराय जैसे इलाकों से हजारों की संख्या में मुस्लिम भीड़ नगर पालिका मैदान में एकत्रित हुई। यह शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन नहीं था, यह आए थे अपने स्ट्रीट-पावर को दिखाने।

भीड़ ने पथराव शुरू कर दिया। देखते-देखते रोडवेज की 2 बसों को आग लगा दी। कुछ देर में गोलीबारी भी शुरू कर दी। इस बार हालाँकि हिंसा में 2 मुस्लिमों की ही मृत्यु हुई।

इसके बाद शफीकुर रहमान बर्क के नेतृत्व में मुस्लिम महिलाओं (एकदम दिल्ली के शाहीन बाग की तर्ज पर) ने पक्का बाग, थाना नखासा में दो महीने तक धरना दिया। इसको बड़ा मुद्दा बनाने के लिए इसमें संभल के बाहर से विभिन्न मुस्लिम नेताओं और संगठनों ने भाग लिया। तब तक हालाँकि COVID-19 महामारी आ चुकी थी। इसके कारण राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन लागू हुआ। तब जाकर यह विरोध-प्रदर्शन समाप्त हुआ।

विवादित शाही जामा मस्जिद के भीतर हरिहर मंदिर के अवशेष हैं या नहीं? इसके संबंध में संभल न्यायालय में एक याचिका डाली गई। कोर्ट ने सुनवाई के बाद सर्वे का आदेश दे दिया। लेकिन यह समाजवादी पार्टी के सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और संभल के विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहेल इकबाल को रास नहीं आया। उन्होंने अपने-अपने समर्थकों को जमा किया, उन्हें भड़काया।

19 नवंबर 2024 को मस्जिद के भीतर जब सर्वे करने सरकारी टीम पहुँची तो इन लोगों ने वहाँ स्थानीय मुस्लिमों को फिर से भड़काया। धमकी देते हुए सरकारी कार्य में बाधा पहुँचाई और अंततः उस दिन सर्वे पूरा होने नहीं दिया। 22 नवंबर को शुक्रवार यानी जुमे के दिन औसतन भीड़ से कहीं ज्यादा नमाजियों की भीड़ शाही जामा मस्जिद में नमाज के लिए पहुँचती है। यह स्वाभाविक नहीं था, बल्कि सोशल मीडिया और वॉट्सऐप के जरिए इस भीड़ को साजिशन बुलाया गया था। नमाज के बाद सांसद जिया-उर-रहमान बर्क ने मस्जिद की सीढ़ियों पर खड़े होकर भड़काऊ भाषण भी दिया।

अंततः जब 24 नवंबर 2024 को मस्जिद के शेष सर्वे के लिए सरकारी टीम फिर से आती है, तो इन लोगों पर जानलेवा हमला किया जाता है। पत्थरबाजी-गोलीबारी की जाती है। इस दंगे में पुलिस अधिकार कई सहित पुलिसकर्मी घायल होते हैं। मुस्लिमों की आपसी रंजिश के कारण हालाँकि इस फसाद में मौत 4 मुस्लिमों की ही होती है।

‘आजाद भारत में क्यों नहीं फले-फूले संभल के हिंदू’ – अगर हम वापस इस सवाल पर आते हैं तो ऊपर दर्ज 16 दंगे इसका एक प्रमुख कारक दिखते हैं। समय-दर-समय कोई भी समाज हमेशा डर और खौफ के साये में जी नहीं सकता। संभल के हिंदुओं का पलायन आजादी के बाद भी नहीं रुका, क्योंकि दंगों को रोकने या दंगाइयों पर अंकुश लगाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ-साथ प्रशासनिक मनोबल भी न के बराबर था।

2017 के बाद हालाँकि वातावरण बदल गया उत्तर प्रदेश शासन का। तभी 2019 और 2024 के दंगों का विवरण उसके पहले हुए बाकी के अन्य 14 दंगों से अलग पढ़ने को मिलेगा। इतना ही नहीं, योगी सरकार ने संभल में ऐसे हिंदुओं को वापस लाने के लिए भी पहल शुरू कर दी है, जो दंगों के भय से पलायन कर गए थे, जिनकी जमीनें मुस्लिमों ने कब्जा कर रखी थीं। इन हिंदुओं को फिर से उनकी जमीनों का मालिकाना हक दिलाया गया है।

हिंदुओं का पलायन, मुस्लिम आबादी बढ़ी: संभल में आतंकी पैठ का कारण

सरकारी आँकड़े मतलब जनगणना से यह तो स्पष्ट हो गया कि संभल में मुस्लिमों की आबादी हिंदुओं की तुलना में हद से ज्यादा बढ़ी है। हिंदू आबादी क्यों नहीं बढ़ी, क्यों इनका समय-समय पर पलायन हुआ – यह 1924 से लेकर 2024 तक हुए दंगों से परिलक्षित है। लेकिन इस डेमोग्राफी चेंज के कारण संभल में एक और बदलाव हुआ – आतंकी संगठनों की पैठ यहाँ आसान हुई। कैसे? आयोग की रिपोर्ट में इसका भी जिक्र है। पुलिस अधिकारियों ने रिकॉर्ड के साथ इस संबंध में अपने-अपने बयान दर्ज करवाए हैं।

2024 में हुए संभल दंगों की जाँच वाले आयोग को बयान देते हुए तब के पुलिस अधीक्षक कृष्ण कुमार बताया कि सांप्रदायिक दंगों के लंबे इतिहास के कारण संभल शहर में हिंदू आबादी लगातार घटी है और अब यह लगभग 20 प्रतिशत से कम रह गई है। इसके कारण मुस्लिमों में न सिर्फ मजहबी उग्रवाद बढ़ा बल्कि मजहबी उग्रवाद को बढ़ावा देने और उकसाने वाले तत्वों को बल भी मिला। इसी कारण से यहाँ आतंकवादी संगठनों ने पैठ जमाई। इनमें प्रमुख हैं:

(i) अल-कायदा (इन द इंडियन सबकॉन्टिनेंट – AQIS: Al-Qaeda in the Indian Subcontinent)
(ii) हरकत-उल-मुजाहिदीन
(iii) एसोसिएशन ऑफ अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (SAMU ISIS: Students of Aligarh Muslim University connection with ISIS)
(iv) प्रतिबंधित संगठन सिमी

उपरोक्त सभी संगठनों के संभल जिले में सक्रिय होने की जानकारी सामने आई है, यह संभल के तात्कालिक एसपी कृष्ण कुमार का बयान है। इनके अलावा श्रीश्चंद [संभल जिला (उत्तरी) में तब पदस्थापित रहे अपर पुलिस अधीक्षक] ने भी इन संगठनों के संभल से ऑपरेट करने का बयान दर्ज करवाया है। संभल के अत्यधिक संवेदनशील नखासा पुलिस स्टेशन में तैनात सब-इंस्पेक्टर मोहम्मद शाह फैसल का बयान इनमें सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि वो खास उसी इलाके की बात कर रहे हैं, जहाँ पर से इन आतंकी संगठनों के गुर्गे ऑपरेट करते हैं। सब-इंस्पेक्टर शाह फैसल ने आयोग को बताया:

“मैं नखासा पुलिस स्टेशन में दीपासराय चौकी इंचार्ज के रूप में तैनात हूँ। यह चौकी राजनीतिक, सांप्रदायिक और आपराधिक दृष्टिकोण से अत्यधिक संवेदनशील है। चौकी क्षेत्र में अल-कायदा और ISIS जैसे आतंकवादी संगठनों के सदस्य रहते हैं। वर्ष 1976 की घटना (दंगे) के बाद से संभल क्षेत्र लगातार तनावपूर्ण रहा है।”

अब ऐसा सवाल कोई कर सकता है, और यह सवाल जायज भी है कि क्या सिर्फ पुलिस वालों के बयान के आधार पर ही यह मान लिया जाए कि सच में संभल शहर में अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठनों ने अपनी पैठ बना ली है? क्या सच में यहाँ अल-कायदा और ISIS जैसे आतंकी संगठनों के सदस्य रहते हैं?

इस सवाल का जवाब है – 2024 में संभल में हुए दंगों से बरामद हथियार। एक-एक हथियार की छानबीन की गई। सबको रिकॉर्ड में दर्ज किया गया। फिर आयोग के सामने भी इनसे संबंधित बयान दर्ज किए गए। संभल में रहने वाला एक आम मुस्लिम के पास (अगर वो मजहबी तौर पर भड़का दिया गया हो तो) दंगा के समय चाकू मिल सकता है, देसी गोली-कट्टा-बम आदि-इत्यादि मिल सकते हैं – इसकी संभावना है। लेकिन मिले क्या-क्या हैं, जरा इसकी लिस्ट देखिए:

(i) 9 एमएम कारतूस, जिस पर POF मतलब पाकिस्तान ऑर्डनेंस फैक्ट्री का चिह्न बना था
(ii) 12-बोर कारतूस, जिस पर लिखा था – Made in USA

संभल से कोई आम मुस्लिम नागरिक अमेरिका या पाकिस्तान जाकर तो लाया नहीं होगा इन हथियारों को। आया होगा आतंकी रास्ते से ही। लाया या मँगवाया गया तो कहीं न कहीं रखा भी गया होगा। आखिर कहाँ? उन्हीं विदेशी आतंकी संगठनों के गुर्गों के यहाँ, जिसकी बात संभल एसपी कृष्ण कुमार से लेकर चौकी इंचार्ज सब-इंस्पेक्टर शाह फैसल तक कर चुके हैं।

जिस शाही जामा मस्जिद के लिए मजहबी सनक, आखिर क्या है उसका इतिहास

2024 में संभल में हुए दंगे की जाँच करने वाली आयोग ने अपनी रिपोर्ट में यह भी दर्ज किया है कि 16वीं शताब्दी की शुरुआत में हरि मंदिर को ध्वस्त कर उसके ऊपर ही शाही जामा मस्जिद मुगल शासक बाबर द्वारा बनाया गया। आयोग के अनुसार दोनों संप्रदायों (हिंदू-मुस्लिम) के बीच विवाद का मूल यही है।

अगर यह विवाद का मूल है, तो समाधान भी इसी से निकलेगा। और समाधान है इतिहास को खँगालना। विवादित जामा मस्जिद के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को जानने के लिए आयोग ने मुरादाबाद के गजेटियर और इस संबंध में उपलब्ध विभिन्न रिकॉर्ड्स का अध्ययन भी किया।

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि इतिहासकारों के अनुसार संभल प्राचीन काल में हिंदुओं के लिए पवित्र स्थान माना जाता था। यहाँ स्थित पुराने शहर के केंद्र में कोट के नाम से प्रसिद्ध बड़े टीले पर भगवान विष्णु का एक प्रसिद्ध मंदिर (हरि मंदिर) था। विभिन्न समय-काल और विभिन्न स्वरूपों में इसके निर्माण का श्रेय पृथ्वी राज, राजा जगत सिंह और राजा विक्रम सेन के परपोते नाहर सिंह को दिया जाता है।

आयोग ने स्पष्ट लिखा है कि यह मंदिर अब मौजूद नहीं है और इसकी जगह एक बहुत ही प्रभावशाली मस्जिद ने ले ली है, जो आसपास के परिदृश्य में मीलों तक एक प्रमुख विशेषता बन गई है। इस मस्जिद की स्थलाकृति का जिक्र करते हुए लिखा गया है कि यह भवन मुख्य रूप से पत्थर का है। केंद्रीय गुंबद, बाहरी दीवारें, पोर्च और विशाल आंगन के फर्श के लिए पत्थर का ही उपयोग किया गया है।

ब्रिटिश काल में इस विवादित मस्जिद को लेकर पुरातत्वविदों की क्या राय थी, आयोग ने इसे भी दर्ज किया है। ऐसा इसलिए क्योंकि हरि मंदिर-जामा मस्जिद को लेकर तब भी मुकदमेबाजी हुई थी। इसी सिलसिले में साल 1874 में कार्लाइल (Archibald Campbell Carlleyle) नाम के एक पुरातत्वविद ने इस मस्जिद का निरीक्षण किया था।

निरीक्षण के बाद कार्लाइल ने यह निष्कर्ष निकाला था कि मस्जिद का मुख्य गुंबद हिंदू कारीगरी का है, लेकिन उसके साइड से बने स्ट्रक्चर में छोटी मुसलमानी ईंटों का काम है। तब कार्लाइल ने यह भी लिखा था कि मस्जिद का पूरा हिस्सा प्लास्टर से ढका हुआ है, इसलिए उसके अंदर की सामग्री का पता लगाना असंभव है। उन्होंने यह भी नोट किया था कि मस्जिद की दीवारों पर दर्ज पुरानी लिखावटें ऑरिजिनल नहीं हैं बल्कि इसके मूल स्वरूप के साथ छेड़छाड़ कर साजिश के तहत, फर्जीवाड़ा करके बाद में लिखा गया है।

अंत में कार्लाइल ने अपना निष्कर्ष लिखा था कि मंदिर को मस्जिद में परिवर्तित हाल में किया गया है। साथ ही यह भी लिखा था कि मस्जिद का इतिहास जो भी हो, पूर्व में हिंदू अधिग्रहण के कई निशान इस मस्जिद में अभी भी मौजूद हैं।

पुरातत्व विभाग के डायरेक्टर जनरल एलेक्जेंडर कनिंघम ने हालाँकि कार्लाइल के तर्क को खारिज कर दिया था। यह कुछ-कुछ ऐसा ही हुआ कि फील्ड से लाए गए डेटा को एसी कमरे में बैठे-बैठे खारिज करना। वैसे भी टॉप पर बैठा कोई ब्रिटिश अधिकारी यह क्यों चाहता कि किसी मस्जिद के नाम पर हिंदू-मुस्लिम में अगर तनाव हो तो उसका हल खोजा जाए, इससे तो उनकी ‘फूट डालो, शासन करो’ की नीति ही समाप्त हो जाती।

अब जरा नजर डालते हैं इतिहासकारों ने क्या लिखा है संभल जामा मस्जिद को लेकर। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में इस संदर्भ को भी डाला है, जो बहुत जरूरी था। रिपोर्ट के अनुसार भारत के जाने-माने इतिहासकारों ने आइन-ए-अकबरी और बाबरनामा किताबों के आधार पर बताया है कि विवादित स्मारक हरिहर मंदिर के खंडहरों पर साल 1526 में बाबर के आदेश पर हिंदूबेग नाम के शख्स ने बनवाया था। यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि बाबरनामा और आइन-ए-अकबरी किसी हिंदू इतिहासकार ने नहीं लिखी थी। बाबरनामा बाबर की आत्मकथा है जिसे खुद बाबर ने लिखा था और आइन-ए-अकबरी के लेखक अबुल फ़ज़ल हैं।

इन इतिहासकारों ने जो इतिहास दर्ज किया है, उससे भी ब्रिटिश पुरातत्वविद कार्लाइल द्वारा दिए गए निष्कर्ष को बल मिलता है कि मंदिर को मस्जिद में परिवर्तित किया गया था।

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चंदन कुमार
चंदन कुमारhttps://hindi.opindia.com/
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