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केले के रेशे से बना सैनिटरी पैड होगा 120 बार इस्तेमाल, जानें कितनी है कीमत? क्या है खास?

महिलाओं की जरूरत का ख्याल रखते हुए और प्रकृति को होने वाले नुकसान से संरक्षित करने के लिए आईआईटी दिल्ली से जुड़े एक स्टार्टअप ने पहली बार ऐसा पैड बनाने का दावा किया है जो केले के रेशे से निर्मित है।

स्त्री जीवन में ‘माहवारी’ एक शाश्वत हकीकत है। इसे न झुठलाया जा सकता है और न इससे बचा जा सकता है। हर 28 दिन के चक्र में महिला को अपने शरीर में बदलते हॉर्मोन्स के कारण इस प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। ये चक्र 11-12 वर्ष की आयु से शुरू होता है और अधिकतम 45-55 की उम्र तक चलता है। मतलब स्त्री जीवन का एक बहुत लंबा काल इस चक्र के साथ गुजरता है।

पुराने समय में महिला के जीवन में माहवारी को लेकर कई भ्रांतियाँ थी, लेकिन अब धीरे-धीरे समय बदल रहा है। पहले जहाँ लोग इस विषय पर बात करने से गुरेज करते थे, वहीं अब लोग इसपर खुलकर बात कर रहे हैं। महिला की स्वास्थ्य सुरक्षा अब समाज में एक अहम मुद्दा है। जिसके चलते शहर की तंग गलियों से लेकर गाँव-कस्बों तक की महिलाओं को सैनिटरी पैड को इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। लेकिन सवाल है कि क्या ये सैनिटेरी पैड वाकई सुरक्षित हैं? तो जवाब है, नहीं। महिलाओं के लिए बाजार में उपलब्ध सैनिटेरी पैड न महिलाओं के लिए सुरक्षित हैं और न ही प्रकृति के लिए।

जानकारी के मुताबिक इनका ज्यादा इस्तेमाल करने से इंफेक्शन तो होता ही है। इसके अलावा अधिकांश सैनिटरी पैड के सिंथेटिक सामग्री और प्लॉस्टिक से निर्मित होने के कारण इन्हें 50 से 60 साल सड़ने में लग जाते है। जो प्रकृति के लिए नुकसानदायक है।

आमतौर पर महिलाएँ इसका इस्तेमाल करती हैं और फिर इसे कूड़े में फेंक देती हैं। बाद में इन्हें या तो जला दिया जाता है या मिट्टी में दबा दिया जाता है। जिससे प्रकृति दूषित होती है। क्योंकि जब इन्हें जलाया जाता है तो इनमें डाइऑक्सिन के रूप में कार्सिनोजेनिक धुएँ का उत्सर्जन होता है, और वह वायु प्रदूषण का बहुत बड़ा कारक है।

इसलिए, महिलाओं की जरूरत का ख्याल रखते हुए और प्रकृति को होने वाले नुकसान से संरक्षित करने के लिए आईआईटी दिल्ली से जुड़े एक स्टार्टअप ने पहली बार ऐसा पैड बनाने का दावा किया है जो केले के रेशे से निर्मित है।

यह पैड न सिर्फ़ महिलाओं के लिए सुरक्षित है बल्कि इको फ्रेंडली भी है। इसको बनाने में केले में मौजूद फाइबर का इस्तेमाल किया गया है। इसकी कीमत 199 रुपए है और इसकी खास बात ये है कि इसे महिलाएँ 2 साल तक चला सकती हैं। इसे बनाने वाले लोगों ने दावा किया है कि इसका 120 बार इस्तेमाल किया जा सकता है।

इस पैड में केले के रेशे के अलावा टेरी, पॉलिस्टर पिलिंग और कॉटन का इस्तेमाल किया गया है। पैड की खासियत है कि महिलाओं को माहवारी के दौरान होने वाले गीलेपन से छुटकारा मिलेगा क्योंकि इसमें मौजूद विस्कोस और पॉलिस्टर अत्यधिक शोषक है।

आईआईटी दिल्ली के प्रोफेसर्स की मदद से ‘सैनफे’ द्वारा तैयार किए गए इस उत्पाद के लिए एक पेटेंट का आवेदन जमा कराया गया है। स्टार्टअप के संस्थापक अर्चित अग्रवाल की मानें तो इस पैड को लेकर थर्ड पार्टी लैबोरेट्री में प्रयोग किए जा चुके हैं। इससे साबित हो चुका है कि इस पैड में किसी प्रकार का बैक्टीरिया नहीं है। न ही इससे महिलाओं को किसी करह की जलन या फिर रैश होने का खतरा है।

अर्चित अग्रवाल की मानें तो इस पैड को जल्द ही आम दुकानों पर उपलब्ध करवाया जाएगा, लेकिन उससे पहले महिलाएँ इसे ऑनलाइन मँगवा कर इस्तेमाल कर सकती है।

बता दें महिलाओं की सुरक्षा और प्रकृति को बचाने के लिहाज से किए गए इस प्रयोग केन्या और तंजानिया जैसे देशों में भी अमल हो रहा है। अर्चित बताते हैं कि इन देशों में तौलिया बनाने के पदार्थों से पैड का निर्माण किया जाता है, क्योंकि सिर्फ़ रुई इसके लिए काफी नहीं होती। वे कहते हैं कि वो केले के रेशे से बना सैनिटरी पैड अन्य देशों में एक्सपोर्ट भी करेंगे, और इस काम के लिए वह दक्षिण भारत से केले के रेशे लेगें।

अर्चित की मानें तो सरकार और एनजीओ निरंतर ग्रामीण इलाकों में डिस्पोजल पैड बाँटने का काम करती हैं। हम उनसे भी अपील करेंगे कि वो इस रियूजेबल पैड को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाने में मदद करें।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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