देश में नक्सलवाद अब अपनी अंतिम साँसे गिन रहा है। 2014 में जब से मोदी सरकार सत्ता में आई है, नक्सलियों के खिलाफ एक से बढ़कर एक ऑपरेशन किए गए। 2014 से पहले नक्सलियों के प्रति अपनाए गए ढूलमुल रवैये को त्याग कर केन्द्र सरकार ने बातचीत, सुरक्षा, समन्वय और ऑपरेशन पर आधारित नीति बनाई। इसका असर यह है कि बड़े बड़े नक्सली या तो सरेंडर कर रहे हैं या फिर सुरक्षाबलों के हाथों मारे जा रहे हैं।
गृहमंत्री अमित शाह की घोषित डेडलाइन से 12 दिन पहले माओवादी नक्सली माडवी हिड़मा को सुरक्षाबलों ने मार गिराने में सफलता पाई। गृहमंत्री शाह ने देश से नक्सलियों के समूल नाश की डेडलाइन 31 मार्च 2026 रखा है। हिड़मा की मौत के बाद अब जनता ये उम्मीद लगाए बैठी है कि 2026 की पहली तिमाही बचे- खुचे नक्सलियों के लिए ‘काल’ साबित होगा।
हिड़मा की मौत, नक्सलवाद पर जबरदस्त प्रहार
आज की तारीख में, माओवादियों की ताकत काफी कम हो गई है। सबसे जवान सदस्य हिड़मा ही था, जिसकी समझ और तकनीक से नक्सलियों ने बड़े-बड़े हमले किए। उसके खात्मे ने नक्सलियों की कमर तोड़ दी है।
अधिकांश नेता या तो आत्मसमर्पण कर चुके हैं या मारे जा चुके हैं। कई नक्सलियों की उम्र हो चली है। कई वरिष्ठ माओवादी गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं। नेतृत्व का अभाव, वैचारिक तौर पर आकर्षण की कमी, नए लोगों का आना कम होना इसके ढ़हने में अहम भूमिका निभा रहा है। सुरक्षा बल हर नक्सली किले को भेद चुके हैं। संसाधनों की कमी है। यही वजह है कि नक्सली क्षेत्र अब गिनती के रह गए हैं।
गृहमंत्री शाह ने दिया सुरक्षाबलों को ‘टारगेट’
पिछले साल जब गृहमंत्री अमित शाह ने नक्सलवाद के खात्मे की तारीख मुकर्र की थी, तो इसका फायदा ये हुआ था कि सुरक्षाबलों को एक ‘गोल’ मिल गया था।
सुरक्षाकर्मियों ने कई इलाकों को नक्सल मुक्त कर एक कीर्तिमान रच दिया। एक के बाद एक क्षेत्र नक्सलमुक्त होते गए। कई नक्सली नेताओं ने अपने समर्थकों के साथ सरेंडर किया। कई लोगों को सुरक्षाबलों ने एनकाउंटर में मार गिराया।
इसी क्रम में नक्सलियों का फिलहाल सबसे बड़ा चेहरा हिड़मा था, जिसे खत्म करने के लिए गृहमंत्री शाह ने सुरक्षाबलों को 30 नवंबर 2025 तक का समय दिया था। इसे वक्त रहते पूरा कर लिया गया।
नक्सलवाद के खिलाफ मोदी सरकार ने उठाए कई कदम
2014 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार ने नक्सलवाद पर लगाम कसने के लिए दीर्घकालिक योजनाएँ बनाई। इसका असर ये हुए कि 2024 तक नक्सल से जुड़ी हिंसक घटनाओं में 53 प्रतिशत की कमी आयी।
पिछले 10 सालों में नक्सल प्रभावित इलाकों में 576 पुलिस स्टेशन बनाए गए। इस दौरान नक्सल प्रभावित जिले 126 से घटकर 18 रह गए। अक्टूबर 2025 तक 1,225 नक्सलियों ने सरेंडर किया और करीब 270 नक्सलियों को मौत के घाट उतार दिया गया।
नक्सलियों से मुठभेड़ में मरने वाले सुरक्षाकर्मियों की संख्या में 73% की कमी आयी। नक्सली हिंसा में मरने वाले आम नागरिकों की संख्या भी 70% कम हुई।
20 सालों में सबसे बड़ी कामयाबी है हिड़मा का खात्मा
लगभग तीन दशकों तक, माडवी हिड़मा का नाम बस्तर के जंगलों में खौफ का पर्याय था। माओवादियों का सबसे खूंखार कमांडर और संगठन के हर निर्णय में दखलंदाजी करने वाला वह एकमात्र आदिवासी नेता था।
अधिकारियों का मानना है कि उसकी मौत पिछले 20 सालों में माओवादियों के लिए सबसे बड़ा झटका है। वह न सिर्फ सुरक्षाबलों पर हुए बड़े-बड़े हमलों के लिए जिम्मेदार था, बल्कि कम उम्र और जंगलों के चप्पे-चप्पे से वाकिफ ऐसा जनजातीय नेता था, जिसकी पकड़ संगठन पर सबसे ज्यादा थी। वह नक्सलियों के लिए प्रेरणा था।
हिडमा की कहानी सुकमा-बीजापुर सीमा पर बसे एक छोटे से गाँव पुवर्ती से शुरू होती है, जिसे कुछ साल पहले तक माओवादियों का ‘अभेद्य किला’ माना जाता था।
1991 में वह 17 साल की उम्र में नक्सली संगठन से जुड़ा, करीब 3 दशक तक संगठन के साथ जुड़े रहने की वजह से उसे सब कुछ पता था। सुरक्षाबलों पर हुए ज्यादातर हमलों की रणनीति उसने बनाई। उसकी मौत हर दृष्टि से देश को राहत देने वाला है।
छत्तीसगढ़ के नक्सल इलाकों में उसका अच्छा खासा प्रभाव था। बस्तर के नक्सलियों में जनजातीय लोग ज्यादा हैं। नेताविहीन होने पर ये लोग अब सरेंडर करने के लिए मजबूर होंगे। हिड़मा पीएलजीए बटालियन नंबर 1 का नेता था। 2009 से 2021 के बीच घात लगाकर किए गये सुरक्षाबलों पर हमले उसने किए।
इन हमलों में 2010 में हुआ ताड़मेटला हमला, जिसमें 76 सीआरपीएफ जवान बलिदान हुए। 2017 में बाँकुपारा का हमला। इसमें 12 सीआरपीएफ के जवान मारे गए। 2017 में हुआ बुर्कापाल का हमला जिसमें 25 सीआरपीएफ के जवानों की जान गई। 2021 में हुआ तेकुलगुडेम-पेडागेलुर का हमला, जिसमें 22 डीआरजी, एसटीएफ और कोबरा जवानों ने बलिदानी दी।
इसके अलावा झीरम घाटी का वो हमला, जिसने छत्तीसगढ़ की कॉन्ग्रेस को नेतृत्वविहीन कर दिया था, हिड़मा की साजिश का नतीजा था। कुछ आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों ने उसे ‘कसाई’ बताया है।
हर बार चकमा देकर भाग निकलता था हिड़मा
हिडमा को पकड़ने या मारने के लिए कई बड़े अभियान चलाए गए। भेज्जी और बुरकापाल हत्याकांड के बाद 2017 में शुरू किए गए ऑपरेशन प्रहार में छत्तीसगढ़ पुलिस और केंद्रीय बलों ने बड़े पैमाने पर अभियान चलाया। कई दिनों तक, टीमें टोंडामरका के जंगलों में तलाशी लेती रहीं।
पुलिस का मानना था कि हिड़मा बुरी तरह घायल हो गया है, लेकिन कुछ महीनों बाद सुरक्षाबलों पर हुए हमले में उसका नाम आया।
2021 का तेकुलगुडेम मुठभेड़ एक और उदाहरण था। पुवर्ती के पास हिडमा की मौजूदगी की खुफिया जानकारी मिलने पर, सीआरपीएफ, कोबरा, डीआरजी और एसटीएफ के लगभग 800 जवान इलाके में पहुँचे, लेकिन वे साजिश का शिकार हो गए। एक पहाड़ी पर तैनात हिडमा की बटालियन ने लगातार एलएमजी से गोलीबारी की, जिसमें 22 जवान मारे गए।
साल 2025 के शुरुआत में करेगुट्टा हिल्स में सबसे बड़े माओवादी-विरोधी अभियान में 25,000 जवानों को शामिल किया गया था। इस अभियान का मकसद भी हिड़मा को घेरना था। इस अभियान में 31 नक्सली मारे गए, लेकिन हिडमा एक बार फिर बच निकला।
इस बार आंध्र प्रदेश का पहाड़ी इलाका, उसका तीन लेयर का सुरक्षा घेरा और हथियार उसे नहीं बचा पाया और सुरक्षाबलों ने हिड़मा के साथ उसकी पत्नी राजे, बॉर्डीगार्ड और तीन नक्सलियों को मौत के घाट उतार दिया।
सुरक्षाबलों ने पिछले 10 सालों में जनजातीय समाज के बीच अपनी पैठ बढ़ाई है। इन क्षेत्रों में विकास की पहुँच हो गई है। कई पुलिस थाने ऐसे इलाकों में बन गए हैं और सबसे बड़ी बात वैचारिक तौर पर कमजोर नक्सलियों से जुड़ने के लिए नई पीढ़ी तैयार नहीं है। यही वजह है कि 2026 में नक्सलियों के खात्मे की तैयारी देश कर चुका है।
नक्सलवाद के खात्मे का प्रण ले चुकी मोदी सरकार लगातार एक के बाद नक्सलियों को ढेर करती जा रही है। इस बीच बड़े-बड़े नक्सली हथियार छोड़कर देश की मुख्य धारा से भी जुड़ रहे हैं। हाल ही में एनडीटीवी के पावर प्ले में गृहमंत्री अमित शाह ने देश से नक्सलियों के खात्मे की तारीख 31 मार्च 2026 बताई थी। साथ ही नक्सलियों को चेतावनी देते हुए माडवी हिड़मा को 30 नवंबर से पहले खत्म करने की भविष्यवाणी की थी।
12 दिन पहले मारा गया टॉप नक्सली हिड़मा
केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सुरक्षाबलों को मोस्ट वांटेड हिड़मा को खत्म करने के लिए 30 नवबंर 2025 तक का डेडलाइन तय किया था। लेकिन सुरक्षा बलों ने 12 दिन रहते अपना टारगेट पूरा कर लिया और 1 करोड़ का ईनामी हिड़मा मारा गया।
छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश की सीमा पर खूंखार नक्सली माडवी हिड़मा को सुरक्षाबलों ने एनकाउंटर में मार गिराया। हिड़मा पर 1 करोड़ का ईनाम था। नक्सल का हार्डकोर कमांडर माडवी हिड़मा के साथ 5 और नक्सली भी मारे गए हैं। इसमें उसकी पत्नी राजे उर्फ रजक्का, बॉडीगार्ड देवे, लकमल, कमलू, मल्ल शामिल है। लाल आतंक के इस टॉप कमांडर के मारे जाने पर सुकमा में पटाखे फोड़कर लोगों ने जश्न मनाया।
आंध्रप्रदेश के डीजीपी ने ऑपरेशन की जानकारी देते हुए कहा, “अल्लूरी सीताराम राजू जिले के मारेदुमिल्ली में पुलिस और माओवादियों के बीच एनकाउंटर सुबह 6 से 7 बजे के बीच हुई। इसमें एक शीर्ष माओवादी लीडर समेत 6 माओवादी मारे गए।”
हमेशा बच कर निकल जाता था हिड़मा
नक्सली हिड़मा के जुड़े अभियान के दौरान सुरक्षाबलों ने 27 माओवादियों को हिरासत में लिया। घटनास्थल से एके47, 1 रिवॉल्वर, 1 पिस्टल बरामद किया गया है। कृष्णा जिले के पेनामलुरु पुलिस ने भी अभियान चलाया था।
इस अभियान के तहत सुकमा से सटे अल्लुरी सीताराम जिले के पास उसका एनकाउंटर किया गया। यह क्षेत्र छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के सटा हुआ है। पुलिस को इस इलाके में नक्सलियों के छिपे होने की खबर मिली थी। सर्च ऑपरेशन के दौरान नक्सलियों ने फायरिंग शुरू कर दी। मंगलवार सुबह (17 नवंबर 2025) से ही नक्सलियों के साथ डीआरजी जवानों की मुठभेड़ चल रही थी, जिसके बाद टॉप नक्सली के मरने की खबर आई है।
बस्तर में नक्सलियों का वह सबसे बड़ा कमांडर था और सेंट्रल टीम को संभाल रहा था। माना जाता है कि कर्रेगुट्टा की पहाड़ियों पर जब नक्सलियों के खिलाफ अभियान चलाया गया था, तब माड़वी हिड़मा भागने में कामयाब रहा था। लेकिन इस बार सुरक्षाबलों ने उसका काम तमाम कर दिया।
नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश , तेलंगाना, महाराष्ट्र, झारखंड जैसे हिस्सों में घने जंगल हैं। इन क्षेत्रों में फोन नेटवर्क ठीक से काम नहीं करता है। ऐसे में सुरक्षाबलों को जानकारी मिलने के बाद जब तक अभियान शुरू किया जाता है, ये नक्सली नौ दो ग्यारह हो जाते हैं। सुकमा, बीजापुर और दंतेवाड़ा का भी यही हाल है। यहाँ मुखबिर ही काम आते हैं। ऐसे में हिड़मा का मारा जाना सुरक्षाबलों के लिए बड़ी कामयाबी है।
बीफ खाने का शौकीन था
अनुसूचित जनजाति का एकमात्र टॉप नक्सली 24 घंटे हथियारों के साथ सुरक्षा घेरे में रहता था। उसके दिन की शुरुआत सुबह 4 बजे हो जाती थी। पूरी यूनिट को वह व्यायाम करवाता था। फिर आगे की रणनीति के लिए योजना बनाता था। वह बीफ खाने का शौकीन था और शुगर की वजह चावल छोड़ दिया था और अब सिर्फ रोटी खाता था।
टेक्नोफ्रेंडली भी था नक्सली हिड़मा
टॉप नक्सली हिड़मा को तकनीक की अच्छी समझ थी। माओवादियों को वह तकनीक की जानकारी देता था। इसलिए सुरक्षाबलों के लिए वह ‘काल’ बन गया था। एनडीटीवी के मुताबिक, उसकी सुरक्षा 3 से 4 घेरे की होती थी। बाहरी घेरे को जैसे ही सुरक्षाबलों के आने का आभास होता था, वह उनसे भिड़ जाते थे। इस बीच हिड़मा भाग जाता था।
हिड़मा 150 से अधिक जवानों की जान ले चुका था। साल 2004 से अब तक 26 से अधिक हमलों में वह शामिल था। इन हमलों में 2013 का झीरम अटैक और 2021 का बीजापुर अटैक शामिल है।
झीरमघाटी अटैक का मास्टरमाइंड
झीरमघाटी में हिड़मा ने 2013 में हमला कर पूरे कॉन्ग्रेस नेतृत्व को खत्म कर दिया था। मारे गए नेताओं में पूर्व केन्द्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल, तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल,उनके बेटे दिनेश पटेल, बीजापुर के नेता टाइगर महेन्द्र कर्मा, पूर्व विधायक उदय मुदलियार समेत 27 लोग शामिल थे। इस दौरान नक्सलियों ने टाइगर महेन्द्र कर्मा पर 100 से ज्यादा गोलियाँ बरसाई।
2021 में सुकमा- बीजापुर में सुरक्षाबलों पर हमला
3 अप्रैल 2021 को छत्तीसगढ़ के सुकमा-बीजापुर के घने जंगलों में सुरक्षाबलों ने ‘ऑपरेशन प्रहार’ के तहत नक्सलियों को पकड़ने के लिए अभियान चलाया था। इस दौरान घात लगाकर नक्सलियों ने कायराना हमला किया। इस हमले में 22 जवान बलिदान हो गए और 30 से ज्यादा घायल हो गए। इसमें सीआरपीएफ, डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड और स्पेशल टास्क फोर्स के जवान थे।
दरअसल सुरक्षाबलों को जानकारी मिली थी कि माड़वी हिड़मा जंगलों में छिपा हुआ है। लेकिन ये जानकारी जानबूझकर नक्सलियों ने फैलाई थी। सुरक्षाबलों के पहुँचते ही 3 तरफ से करीब 250 नक्सलियों ने उन्हें घेर लिया और 4 घंटे तक गोलियाँ चलाई। इस दौरान ग्रेनेड और रॉकेट लॉन्चरों का भी इस्तेमाल किया गया था। नक्सलियों ने सुरक्षाबलों के हथियार भी लूट लिए थे।
2010 दंतेवाड़ा हमले का मास्टरमाइंड
6 अप्रैल 2010 को छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में नक्सलियों ने 76 सीआरपीएफ जवानों को मार दिया था। ये जवान वहाँ रूटीन सर्च ऑपरेशन चला रहे थे। यूनिट के 150 जवान जंगल की तरफ गए। इन्हें अंदाजा नहीं था कि नक्सली वहाँ घात लगाकर इनका इंतजार कर रहे हैं।
ऊँची झाड़ियाँ और घुमावदार रास्ते का इस्तेमाल कर करीब 1000 वहाँ पहुँच कर तैयारी कर रहे थे। जब जवान वहाँ पहुँचे तो सब कुछ शांत था। सर्च ऑपरेशन कर जब ये लोग वापस लौट रहे थे, तभी तेज धमाका हुआ। जब तक वे संभल पाते, चारों ओर से अँधाधुंध फायरिंग शुरू हो गयी। इस दौरान 76 जवानों ने अपनी जान दे दी।
एक मात्र जनजातीय समुदाय था टॉप नक्सली था
हिड़मा का जन्म सुकमा के पुवाार्ती में 1981 में हुआ था। 1996 में मात्र 17 साल की उम्र में वह नक्सलियों से जुड़ गया। उसे हिड़मा हिदमल्लाडु और संतोष भी कहा जाता था। वह गोंड जनजाति समुदाय का था। इस इलाके के चप्पे-चप्पे से वाकिफ था।
इसलिए उसके लिए निकलकर भागना और सुरक्षाबलों को साजिश में फँसाना आसान था। बड़े-बड़े नक्सली हमले की साजिश रचने के साथ साथ उसने खुद को बचाने के कई तरकीब आजमाए थे। लेकिन सरकार के प्रण के आगे उसकी तरकीब काम नहीं आई और सुरक्षाबलों ने उसे मार गिराया।
दिवंगत CDS जनरल बिपिन रावत ने एक बार कहा था कि भारत को 2 मोर्चों पर नहीं ढाई मोर्च पर लड़ाई लड़नी है। 2 मोर्चे यानी पाकिस्तान और चीन हमारे सामने हैं और आधा मोर्चा देश के भीतर ही छिपा बैठा है। इसकी कोई तय सूरत नहीं है लेकिन उसकी सीरत भारत विरोध ही है। भारत के खिलाफ बयानबाजी और आतंकी व भारत विरोधी तत्वों को कवर फायर देना, यही काम इस आधे मोर्चे का है। इसका जिक्र क्यों? क्योंकि हो सकता है कि यह खबर पढ़ते हुए आपको इस मोर्चे की याद आए, खैर आगे बढ़ते हैं।
जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के एक बयान के कुछ हिस्से पढ़िए। उन्होंने लाल किले के सामने विस्फोट पर कहा है, “कश्मीर की मुसीबत लाल किले के सामने बोल पड़ी है।” जनसत्ता में छपे एक बयान के मुताबिक, उन्होंने कहा, “जो युवा डॉक्टर और इंजीनियर बनने के लिए तैयार थे, वे अब खुद को विस्फोट करने के लिए तैयार हैं, यह सोचने की जरूरत है।”
मुफ्ती ने कहा आगे है, “हमसे कहाँ गलती हुई। केंद्र सरकार को सोचना होगा। आपने यहाँ के युवाओं से वादा किया था कि आप उनके हाथों से पत्थर और बंदूकें लेकर उन्हें लैपटॉप देंगे। लेकिन आज आपने उसी युवा को आत्मघाती हमलावर बना दिया है।”
आतंकियों के लिए महबूबा का दर्द कोई पहली बार या नया नही हैं। आतंकी बुरहान वानी से लेकर अफजल गुरु और यासीन मलिक तक उनकी नजरों में हालात के मारे लोग रहे हैं। वो इनको मिली सजा के लिए न्याय व्यवस्था तक पर सवाल खड़े कर चुकी हैं और अब आतंक की पौध को तैयार करने का ठीकरा भी केंद्र सरकार के सिर मढ़ देना चाहती हैं।
द वायर में महबूबा का अफजल और यासीन के लिए लेख
अब आते हैं महबूबा के बयान पर और समझने की कोशिश करते हैं कि वो केंद्र को निशाना बना रही हैं लेकिन क्यों? हो सकता है कि केंद्र की योजनाओं को लेकर सवाल हों, कई लोगों में नाराजगी पर भी हो सकती है लेकिन क्या इतनी नाराजगी कि लोग आतंकी बन जाएँ? जाहिर है ऐसा कतई नहीं है, तो बात साफ है कि महबूूबा मुफ्ती अपने इस बयान के सहारे किसी को तो बचाने की कोशिश कर रही हैं।
महबूबा मुफ्ती ने दोष बेशक केंद्र पर मढ़ दिया लेकिन शायद इसकी आड़ में जहर बोने वालों को बचाने की भी कोशिश चल रही है। वह उन्हें कवर फायर देने पर आमादा हैं जिनकी वजह से नौजवान किताबों और लैपटॉप से खीचकर बम-बारूद की ओर जा रहे हैं। जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठन क्या दिल्ली से चलाए जाते हैं? कल को कहीं महबूबा यह सवाल ना उठा दें कि इन आतंकी संगठनों की विचारधाराएँ संसद में बैठकर लिख जा रही हैं?
महबूबा का सवाल आतंकी कैंपों में दी जाने वाली ट्रेनिंग पर नहीं है, वहाँ फैलाई जाने वाली नफरत पर नहीं है और पाकिस्तान से आने वाली फंडिंग पर भी नहीं है। वो बस केंद्र सरकार और उसकी नीतियों को ही आतंकवाद का जिम्मेदार बताना चाहती हैं। वो उस मजहबी कट्टरता को नहीं देखती हैं जो युवाओं के मन में भरी जा रही है।
भारत 140 करोड़ लोगों का देश है। तरह की परेशानियाँ यहाँ हैं, रोजगार की दिक्कतें हैं, असमानता और संघर्ष भी है लेकिन क्या देश के लोग बारूद बनकर फट गए हैं? क्या देश के युवा अपनी समस्याओं का समाधान टिफिन या जूते में बम बाँधकर निकालता है? यह कहना कि किसी युवा के हाथ में बंदूक इसलिए आई क्योंकि सरकार ने लैपटॉप नहीं दिया, आतंकियों की विचारधारा को एक राजनीतिक तर्क में बदलने की कोशिश है।
सरकार ने कश्मीर के विकास के लिए लगातार काम किया है। शिक्षा से लेकर पर्यटन और रोजगार के अवसर बनाए गए हैं लेकिन कुछ राजनीतिक दल और अलगाववादी समूह हर समस्या के पीछे एक ही कहानी बताते हैं- नाराजगी।
इसी कथित नाराजगी का इस्तेमाल आतंकी संगठन अपने रिक्रूटमेंट के लिए करते रहते हैं। गुमराह करने वाली किताबें, उकसाने वाले भाषण, मजहबी लोगों और स्थानों से फैलाए गए कट्टर संदेश और बॉर्डर के उस पार से आने वाले हथियार-पैसे, ये जिस आतंकी इकोसिस्टम की देन है उस पर महबूबा जैसे लोग सवाल नहीं उठाते हैं।
महबूबा का तर्क है कि केंद्र ने युवाओं को पत्थर और बंदूकें छुड़ाकर लैपटॉप देने का वादा किया था। हाँ, वादा किया था और बड़े पैमाने पर दिया भी गया। जम्मू-कश्मीर में स्कूल-कॉलेजों के लिए नई इमारतें बनीं, मेडिकल कॉलेजों की सीटें बढ़ीं, पर्यटन के रिकॉर्ड टूटे, खेल के मैदान भरे, उद्योग ने दस्तक दी और युवाओं ने स्टार्टअप शुरू किए।
महबूबा कभी यह नहीं पूछतीं कि इतने सकारात्मक बदलावों के बीच भी आतंकी संगठन क्यों सक्रिय हैं, कौन उन्हें बनाए रखता है, कौन उनके लिए भर्ती करने का माहौल तैयार करता है। यह सवाल भी तो उठना चाहिए कि जो युवा पढ़ाई के लिए तैयार थे उन्हें ‘शहादत’ के नाम पर कौन तैयार करता है?
केंद्र सरकार को दोष देना आसान है। आतंकी विचारधारा से सवाल पूछना और उसके कटघरे में खड़ा करना मुश्किल हैं। कश्मीर के युवाओं के नाम पर अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने की कोशिश कर रही महबूबा मुफ्ती को इन चालबाजियों से बाहर आने की जरूरत है। जनता ने आपको नकार दिया है और आपके इन विचारों को अपने वोट से नकार दिया है।
कश्मीर के युवाओं ने बार-बार दिखाया है कि वे खेल, शिक्षा, कला और व्यापार अन्य क्षेत्रों में भी कमाल का काम कर सकते हैं। कुछ नेता जो चाहते हैं कि उनका दर्द के बहाने वो अपनी राजनीतिक दवाई तलाश कर सकें उनसे युवाओं को बचना ही होगा।
केरल के कुन्नूर में 41 साल के बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) अनीश जॉर्ज ने आत्महत्या कर ली। अब इस आत्महत्या मामले से वामपंथी धड़ा SIR की प्रक्रिया को बदनाम करने में जुटा है। वामपंथी मीडिया पोर्टल द न्यूज मिनट (TNM) से लेकर प्रोपेगेंडा पत्रकार राजदीप सरदेसाई ऐसा दावा कर रहे हैं कि BLO ने SIR के काम के दबाव में आकर आत्महत्या का कदम उठाया है।
हालाँकि, आत्महत्या मामले के पीछे का सच तो जाँच के बाद ही सामने आएगा। लेकिन इसी बीच कॉन्ग्रेस ने केरल की CPI(M) सरकार पर गंभीर आरोप लगाया है। कॉन्ग्रेस का कहना है कि केरल के BLO की आत्महत्या में CPI(M) का हाथ है। कॉन्ग्रेस ने कहा कि CPM ने ही BLO को आत्महत्या करने पर मजबूर किया।
केरल में BLO की हत्या पर कॉन्ग्रेस का CPM पर आरोप
केरल में BLO अनीश जॉर्ज की आत्महत्या मामले में कॉन्ग्रेस ने दावा किया कि इसके पीछे INDI गठबंधन की सहयोगी CPM का हाथ है। कन्नूर जिला कॉन्ग्रेस कमेटी (DCC) के अध्यक्ष मार्टिन जॉर्ज ने सोमवार (18 नवंबर 2025) को आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में BLO, कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता और बूथ लेवल एजेंट (BLA) वैशाख के बीच बातचीत का एक ऑडियो जारी किया।
द इंडियन एक्सप्रेस और द हिंदू के मुताबिक, इस ऑडियो में अनीश बता रहे हैं कि CPM घर-घर जाकर SIR प्रक्रिया पर दखल डाल रही है। ऑडियो से साफ हो रहा है कि CPM ने कहा कि नियुक्त BLA को घरों की पहचान करने में मदद के लिए BLO के साथ जाना चाहिए। लेकिन BLA भेजने के बजाए CPM ने अपने शाखा सचिव चंद्रन को BLO के साथ भेज दिया।
यही आरोप लगाते हुए कॉन्ग्रेस नेता वीडी सतीशन ने भी दोहराया कि BLO अनीश जॉर्ज पर CPM ने दबाव डाला था। CPM चाहती थी कि कॉन्ग्रेस के BLA उनके साथ न जाए, इसी कारण BLO अनीश ने आत्महत्या कर ली।
#WATCH | Thiruvananthapuram, Kerala | On the death of a BLO in Kannur, allegedly by suicide, LoP Kerala Assembly & Congress leader VD Satheesan says, "All the BLOs are overloaded. They cannot afford the work entrusted to them by the Election Comission… Election Comission… pic.twitter.com/Nnt6YRnyEX
आत्महत्या पर राजदीप सरदेसाई से लेकर TNM ने SIR को बनाया निशाना
जहाँ केरल के BLO पर कॉन्ग्रेस ने आरोप लगाए कि इसमें CPM का हाथ है। वही देश के कुछ मीडिया संस्थान ने आत्महत्या मामले में SIR को निशाना बनाने से पीछे नहीं हटे। राजदीप सरदेसाई से लेकर द न्यूज मिनट (TNM) की फाउंडर धान्या राजेन्द्रन ने धड़ल्ले से खबरें चलाईं कि BLO ने SIR प्रक्रिया के काम के दबाव में आकर आत्महत्या की है।
The suicide of a BLO, Aneesh Grorge, in Kerala during the SIR process raises significant questions. Aneesh faced pressure to steer clear of Congress BLA, allowing their INDI partner CPM BLA to manipulate the voter list in that region through his involvement.
इंडिया टुडे ने ‘SIR के दबाव में आकर 2 लोगों की मौत; BLO की आत्महत्या से चुनाव सूची संशोधन प्रभावित’ जैसी हेडलाइन से खबरें चलाई। ऐसे नैरेटिव की खबरें गढ़ने वाले भी संस्थान के ही पत्रकार राजदीप सरदेसाई हैं। उन्होंने इस मामले पर पूरी रिपोर्ट की और जबरन BLO की आत्महत्या मामले से SIR को बदनाम किया।
राजदीप सरदेसाई ने लिखा, “हकीकत जानिए भारत: अवास्तविक लक्ष्यों और समय-सीमाओं के चलते तीन अलग-अलग राज्यों में SIR को लेकर 2 कथित आत्महत्याएँ और एक BLO द्वारा आत्महत्या का प्रयास किया गया। क्या चुनाव आयोग हमेशा की तरह इसे नजरअंदाज कर देगा? एक ऐसी खबर देखिए जो आपको प्राइम टाइम पर उन तथाकथित न्यूज चैनलों पर नहीं मिलेंगी, जहाँ शोर-शराबा और विपक्ष की आलोचना ‘असली’ खबरों से ज्यादा मायने रखती है।”
Get real India: 2 alleged deaths by suicide, one suicide attempt of BLOs over SIR in 3 diff states because of unrealistic targets and deadlines. Will @ECISVEEP as always brush it aside? Watch a story that you won’t find on prime time across so called news channels where noise and… https://t.co/z44f59PDQw
कुछ मीडिया पोर्टल ने भी इसी प्रोपेगेंडा को आगे बढ़ाया। द न्यूज मिनट (TNM) नाम मीडिया पोर्टल ने लिखा- ‘केरल में BLO ने आत्महत्या की, परिवार ने SIR पर काम के दबाव का आरोप लगाया।’ ऐसी हेडलाइन से लोगों को भ्रमित किया गया। इस आर्टिकल में केवल BLO के परिवार के बयान को अपना नैरेटिव गढ़ने के लिए इस्तेमाल किया गया, जबकि पूरी कहानी नहीं बताई गई।
फोटो साभार: The News Minute
द न्यूज मिनट की फाउंडर धन्या राजेन्द्रन ने भी खबर को आगे बढ़ाया और BLO की आत्महत्या को SIR के जिम्मे डाल दिया गया।
यह सब उसी प्रोपेगेंडा का हिस्सा है, जिसमें इन वामपंथी मीडिया संस्थानों ने बिहार में SIR प्रक्रिया का विरोध किया और कई सवाल उठाए। लेकिन नतीजतन, बिहार में मतदान प्रतिशत बढ़ा और यहाँ तक कि जनता भी इस प्रक्रिया से खुश नजर आई।
क्या है केरल में BLO की आत्महत्या का पूरा मामला?
केरल के कन्नूर में रविवार (16 नवंबर 2025) को BLO अनीश जॉर्ज अपने घर में मृत पाए गए। 44 साल के अनीश एक स्कूल कर्मचारी हैं, जिन्हें राज्य में चल रही SIR प्रक्रिया के दौरान वार्ड संख्या 18 के लिए BLO की जिम्मेदारी दी गई थी। पय्यान्नूर पुलिस ने इस मामले में अप्राकृतिक मौत का मामला दर्ज किया है।
वहीं, जाँच शुरू होने से पहले ही मीडिया में खबरें प्रसारित की गईं कि अनीश जॉर्ज ने SIR के काम के दबाव में आकर आत्महत्या की है। इन खबरों को BLO के परिवार का हवाला देकर चलाया गया। परिवार का कहना है कि अनीश रात-रात भर जगकर काम करते थे। वहीं कॉन्ग्रेस के आरोप हैं कि CPM ने अनीश को आत्महत्या करने के लिए मजबूर किया है।
कैसे वामपंथी मीडिया ने SIR विरोधी प्रोपेगेंडा को BLO की आत्महत्या से जोड़ा
केरल में BLO की आत्महत्या को वामपंथी मीडिया ने अपने सटीक नैरेटिव से जोड़कर देखा। ये वामपंथी मीडिया, जो बिहार में SIR शुरू होने से इसका विरोध कर रही है। वह अब इतनी निर्दयी हो चुकी है कि किसी की आत्महत्या को भी मीडिया ने प्रोपेगेंडा बना लिया। क्योंकि अब तक जाँच में साफ नहीं हो सका है कि आखिर आत्महत्या के पीछे क्या वजह थी, तो मीडिया ने अपना SIR विरोधी नैरेटिव चुना और धड़ल्ले से आगे बढ़ाया।
उल्लेखनीय है कि बिहार चुनाव 2025 में सफल रहा SIR अब देश के तमाम राज्यों में शुरू हो चुका है। इसके तहत मतदाता सूची को साफ करने का काम किया जा रहा है। कई बार चुनाव आयोग के SIR पर स्पष्टीकरण देने के बावजूद भी वामपंथी मीडिया और कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम इसका विरोध कर रहा है। और अब यह विरोध किसी की जान की कीमत से भी बड़ा हो गया है। इससे यह तो साफ हो गया कि वामपंथी मीडिया और कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम का SIR विरोध इससे भी निचले स्तर तक गिर सकता है।
16 नवंबर 2025 को जब ऑपइंडिया की टीम पंजाब विश्वविद्यालय पहुँची तो ग्राउंड पर चल रहा नजारा वैसा नहीं दिख रहा था जैसा कि सोशल मीडिया में चर्चा में है। कैंपस के अंदर कई छात्र शांतिपूर्वक धरना स्थल पर बैठे थे और बार-बार अपनी वही साधारण माँग दोहरा रहे थे- सीनेट चुनावों की तारीख घोषित की जाए।
जिन छात्रों से ऑपइंडिया ने बात की, वे चाहते थे कि चुनाव की तारीख घोषित हो जाएँ तो वे तुरंत कक्षाओं में लौटें और अपनी पढ़ाई फिर से शुरू करें। उनके चेहरों पर पाठ्यक्रम छूट जाने की चिंता साफ दिखाई दे रही थी। पंजाब विश्वविद्यालय के छात्र स्पष्टता चाहते थे, अव्यवस्था नहीं।
एक छात्र अवतार सिंह ने साफ शब्दों में कहा कि जैसे ही चुनाव कार्यक्रम घोषित हो जाएगा, हमारी हड़ताल समाप्त हो जाएगी। उसने बताया कि छात्रों को पता है कि सीनेट चुनाव कराने में 200 दिन से अधिक लगते हैं और वे किसी से रातों-रात चमत्कार की माँग नहीं कर रहे। वे चाहते थे कि प्रक्रिया शुरू हो, जो विश्वविद्यालय ने कुछ दिन पहले ही घोषित कर दी है।
हालाँकि जैसे ही छात्र-समूह के घेरे से बाहर निकल कर देखना शुरू किया तो पाया कि नजारा पूरी तरह बदल जाता है। वहाँ ट्रैक्टर, लंगर वाहन, लाउडस्पीकर (हालाँकि हमारे जाने के समय वे शांत थे), राजनीतिक बैनर, किसान यूनियन के झंडे और ऐसे समूह मौजूद थे जिनका विश्वविद्यालय की आंतरिक व्यवस्था से कोई लेना-देना नहीं था।
खुद को यूनियन सदस्य, राजनेता और कार्यकर्ता कहने वाले ये लोग उस जगह पर कब्जा किए बैठे थे जो असल में विश्वविद्यालय के पूर्व या वर्तमान छात्रों की होनी चाहिए।
साभार- ऑपइंडिया ग्राउंड रिपोर्ट
कुछ ऐसा ही किसान आंदोलन के दौरान भी हुआ था, जहाँ किसानों की वास्तविक समस्याएँ राजनीतिक अवसरवाद और पहचान-आधारित लामबंदी के शोर में दब गई थीं। पंजाब विश्वविद्यालय में सीनेट चुनावों की शांतिपूर्ण माँग अब राज्य बनाम केंद्र के टकराव में घसीट ली गई है। जाहिर है, इस नए बवंडर में सबसे ऊँची आवाजें छात्रों की नहीं बल्कि उन लोगों की थीं जो छात्रों के आंदोलन के पीछे अपने एजेंडे चला रहे थे।
10 नवंबर को विश्वविद्यालय के गेट तोड़े जाने के साथ ही ये साफ हो गया कि बाहरी लोग अपने एजेंडे के साथ आए थे। FIR में भी यह दर्ज है कि गेट नंबर 1 को जबरन खोलने वाली भीड़ में बड़ी संख्या गैर-छात्र शामिल थे। पुलिस अधिकारियों ने बयान में कहा कि हालाँकि कुछ पीयू छात्र आगे थे, लेकिन बैरिकेड तोड़ने और धक्का-मुक्की करने का काम उन लोगों ने किया जिनका विश्वविद्यालय से कोई लेना-देना नहीं था।
फिर भी इन झड़पों को सीनेट मुद्दे का स्वाभाविक परिणाम बताया जा रहा है। सच्चाई यह है कि ये टकराव अवसरवादी हस्तक्षेप का नतीजा हैं और खुद छात्र भी इसे जानते हैं।
टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए पंजाव विश्वविद्यालय की कुलपति रेनू विग तक ने ये कहा कि छात्रों ने कहा है कि ये अब सीनेट तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने कहा, “छात्रों ने ये मुझसे सामने से तो नहीं कहा, लेकिन वार्डेन और कमेटी के जरिए उन्होंने ये बात पहुँचाई है कि वे लाचार महसूस कर रहे हैं।”
छात्र असल में क्या चाहते हैं और कैसे उनके अंदर डर बैठाया जा रहा है
अगर हम स्लोगन, पॉलिटिकल स्पीच, यूनियन का अंदाज और सोशल मीडिया पर चल रहे शोर को देखें तो पता चलेगा कि छात्रों की माँगे काफी स्पष्ट हैं। वे चाहते हैं कि सीनेट चुनावों के जरिए बहाल हो।
वे चाहते हैं कि पंजाब विश्वविद्यालय अधिनियम के अनुसार एक वैध गवर्निंग बॉडी (शासी निकाय) बने। सलाथ ही वे चाहते हैं कि पिछले एक साल की अनिश्चितता खत्म हो। वे चंडीगढ़ के मालिकाना हक की माँग करने वालों में से नहीं हैं।
वे विश्वविद्यालय पर पहचान-आधारित दावा नहीं कर रहे। वे संघवाद के नारे नहीं लगा रहे। वे केंद्र से यह नहीं कह रहे कि अपना सामान बाँधकर केंद्र शासित प्रदेश को छोड़ दे।
ऑपइंडिया की छात्रों से हुई बातचीत से साफ था कि वे सीनेट पर स्पष्टता चाहते हैं और जैसे ही चुनाव की तारीख घोषित हो, तुरंत कक्षाओं में लौटकर पढ़ाई शुरू कर सकें।
हालाँकि उनका विरोध केंद्र सरकार के उस फैसले के खिलाफ है जिसमें सीनेट सदस्यता को नामांकन-आधारित बनाने की एक अधिसूचना थी। इसे केंद्र सरकार पहले ही वापस ले चुकी है। ऐसे में वे केंद्र के खिलाफ नहीं हैं। वे बस अपने भविष्य को लेकर स्पष्टता चाहते हैं।
हमने देखा कि कैंपस के अंदर एक और अभियान चलाया जा रहा है, जिसमें छात्रों को यह विश्वास दिलाने की कोशिश की जा रही है कि जैसे ही केंद्र सीनेट पर ‘कब्जा’ करेगा, वैसे ही विश्वविद्यालय तानाशाह बन जाएगा, फीस बढ़ा दी जाएगी और पंजाब हमेशा के लिए इस संस्थान को खो देगा।
यही बातें हमें उन लोगों ने दोहराईं जो छात्र नहीं थे लेकिन स्थल पर मौजूद थे। यह डर बैठाया जा रहा है। यह स्वाभाविक नहीं है और यह छात्रों के बजाय राजनीतिक समूहों के हितों को कहीं अधिक साधता नजर आता है।
कानाफूसी इस बात की भी है कि केंद्र सरकार की ये अधिसूचना विश्वविद्यालय को राज्य से ‘छीनने’ की कोशिश थी। इस स्थिति को उसी दिन सुलझ जाना चाहिए था जब केंद्र ने अधिसूचना वापस ली, फिर भी ये किसी तरह अस्तित्व के संकट के रूप में बदल गई। असल में ये असमंजस अचानक नहीं है।
यह वही नजारा है जो हमने किसान आंदोलन के दौरान देखा था, जहाँ कई समूहों ने डर, पहचान और अविश्वास की समानांतर कहानियाँ चलाईं। किसान आंदोलन ने किसानों और यूनियन के बीच गहरी खाई बना दी थी। मूल मुद्दे दूसरे एजेंडों के शोर में दब गए थे।
यहाँ भी पंजाबियत, केंद्र बनाम राज्य राजनीति, क्षेत्रीय पहचान और धार्मिक पहचान की कहानियाँ छात्रों के विश्वविद्यालय के आंतरिक चुनावों की माँग पर हावी हो गई हैं।
सीनेट और सिंडिकेट क्या हैं?
सीनेट और सिंडिकेट पंजाब विश्वविद्यालय की दो वैधानिक गवर्निंग बॉडी (शासी संस्थाएँ) हैं। सीनेट सर्वोच्च प्राधिकरण है, जिसमें निर्वाचित स्नातक, प्रोफेसर, छात्र प्रतिनिधि और केंद्र-राज्य के नामित सदस्यों समेत सौ से अधिक सदस्य शामिल होते हैं।
सीनेट नीतियाँ बनाती है, बजट को मंजूरी देती है, नियुक्तियों की देखरेख करती है और प्रमुख शैक्षणिक और प्रशासनिक निर्णय लेती है। सिंडिकेट कार्यकारी निकाय के तौर पर काम करती है, जिसमें लगभग पंद्रह से बीस सदस्य होते हैं। जहाँ सीनेट निर्णय लेती है, वहीं सिंडिकेट उन निर्णयों को लागू करती है।
राजनीतिक यूनियन, किसान समूह और मजदूर संगठन प्रदर्शन पर कैसे हावी हो रहे हैं
अगर कोई अब भी ये मानता है कि यह केवल छात्रों द्वारा चलाया गया आंदोलन है तो उसने पिछले कुछ दिनों में पंजाब यूनिवर्सिटी बचाओ मोर्चा स्थल का दौरा नहीं किया। जब ऑपइंडिया कैंपस पहुँचा तो धरना स्थल पर ट्रैक्टर, लंगर स्टॉल, राजनीतिक पोस्टर और छात्रों से परे लोग हर तरफ मौजूद थे।
यह पैटर्न नया नहीं है। हमने इसे किसान आंदोलन के दौरान भी देखा था। कुछ खास समूह किसी वैध शिकायत को पहचानने में माहिर होते हैं, ‘समर्थन’ के नाम पर आंदोलन में प्रवेश करते हैं और फिर धीरे-धीरे आंदोलन की दिशा और आवाज बदल देते हैं। इसके बाद मूल मुद्दा अपनी पहचान खो देता है। यहाँ भी ठीक वही हुआ है।
सीनेट चुनाव की माँग से शुरू हुआ ये प्रदर्शन भी अब इस तरह से बदल रहा है-
पंजाब बनाम केंद्र मुद्दा
पंजाब बनाम हरियाणा
चंडीगढ़ का मालिकाना हक
पंजाबियत के नारे
टुकड़ों में आ रही राजनीतिक पार्टियाँ
10 नवंबर 2025 को बाहरी प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हुई झड़प के दौरान, एसएसपी कनवदीप कौर गेट पर चढ़ गईं और भीड़ को समझाने की कोशिश की। अंदर घुसने की कोशिश कर रहे बाहरी लोगों की संख्या इतनी अधिक थी कि पुलिस बिना बल प्रयोग किए उन्हें रोक नहीं सकती थी।
प्रदर्शनकारियों ने गेट तोड़ दिए और लोगों की भारी भीड़ कैंपस में घुस गई। उस दिन ट्रैक्टर, ट्रॉली, यूनियन प्रतिनिधि, राजनीतिक कार्यकर्ता और संगठनों के झंडे लेकर लोग कैंपस में दाखिल हुए जिनका विश्वविद्यालय की आंतरिक व्यवस्था से कोई लेना-देना नहीं था।
असल में तो न पुलिस और बाहरी समूहों, संगठनों और व्यक्तियों को ऐसे आंदोलनों में दखल न देकर बाहर ही रहना चाहिए। लेकिन घटनाएँ वैसी नहीं हुईं जैसी होनी चाहिए थीं।
आम आदमी पार्टी, कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और शिरोमणि अकाली दल के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल वहाँ पहुँचे। किसान यूनियन के नेता बलबीर सिंह राजेवाल, हरिंदर लखोवाल और इंदरपाल बैंस अपने कार्यकर्ताओं के साथ आए। यहाँ तक कि जेल में बंद सांसद अमृतपाल सिंह के पिता और उग्रवादी नेताओं के परिवारजन भी कैंपस पहुँच गए।
लखा सिधाना जैसे गैंगस्टर से कार्यकर्ता बने लोग, गायक सतिंदर सरताज और कई अन्य लोग कैंपस पहुँचे। असली छात्र नेता, जिन्हें पूरे आंदोलन की आवाज होना चाहिए था, उन्हें किनारे कर दिया गया ताकि ये नेता मंच पर बोल सकें।
प्रदर्शन में इन लोगों की घुसपैठ के साथ एक अलग ही शब्दावली आ गई। इसके तहत ‘चंडीगढ़ पंजाब दा’ और ‘राज करेगा खालसा’ जैसे नारे हवा में गूँजने लगे। इन नारों का सीनेट चुनावों से कोई लेना-देना नहीं है, न ही इनका पंजाब विश्वविद्यालय अधिनियम और लोकतांत्रिक निकायों की बहाली से कोई संबंध है। इनका पूरा संबंध राजनीतिक स्थिति बनाने, पहचान बताने और यह छवि गढ़ने से है कि विश्वविद्यालय सभी छात्रों और स्टेकहोल्डर्स के बजाय एक विशेष सांस्कृतिक समूह का है।
इस शोर के बीच छात्रों की असल माँगें लगभग खो गई। राजनीतिक खिलाड़ियों की इन प्रदर्शनों की अपेक्षाएँ छात्रों की अपेक्षाओं से बिल्कुल अलग हैं और इन्हीं दो एजेंडों के बीच की खाई ही इस अव्यवस्था का कारण बन रही है।
निहंगों की मौजूदगी और खालिस्तानी विचारधारा का परिचय
उस दिन कैंपस में पहुँचे कई समूहों में निहंग भी शामिल थे। ऑपइंडिया ने आंदोलन के दौरान मौजूद एक निहंग से बातचीत की। सतही तौर पर उन्होंने बार-बार यह कहा कि वे केवल ‘बच्चों’ का समर्थन करने आए हैं।
उन्होंने अपनी मौजूदगी को अभिवावक और सुरक्षात्मक जैसा बताया। लेकिन बातचीत के दौरान उन्होंने एक ऐसी लाइन कही जिसने यह साफ कर दिया कि उनकी सोच अलग है और उसका सीनेट चुनावों से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने लगभग शब्दशः कहा, “जब हिंदू भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की बात करते हैं तो कोई कुछ नहीं कहता। लेकिन जब दूसरे कुछ माँगते हैं तो समस्या बन जाती है।”
उन्होंने ‘खालिस्तान’ शब्द का साफ शब्दों में इस्तेमाल नहीं किया, लेकिन उन्हें करने की जरूरत भी नहीं थी। जो भी पंजाब को लंबे समय से कवर करता है, वह समझता है कि ‘दूसरे कुछ माँगते हैं’ का मतलब किस संदर्भ में किया जा रहा है। यह एक सांकेतिक भाषा है, जिसका इस्तेमाल अक्सर वे लोग करते हैं जो अलगाववादी विचारधारा को आगे बढ़ाना चाहते हैं, लेकिन सीधे कानूनी जाँच के घेरे में नहीं आना चाहते।
यहीं पर आंदोलन चुनावों और कैंपस लोकतंत्र से कहीं आगे एक खतरनाक क्षेत्र में चला जाता है। जब निहंग समूहों के प्रतिनिधि असंबंधित राष्ट्रीय तुलना करने लगते हैं और विश्वविद्यालय आंदोलन के अंदर पहचान-आधारित शिकायतों को धीरे-धीरे आगे बढ़ाते हैं तो इसका मतलब है कि आंदोलन उनके वैचारिक संदेशों का व्यापक जरिया बन गया है।
सीनेट आंदोलन को लीड कर रहे छात्रों ने स्पष्ट रूप से कहा कि उन्होंने किसी भी राजनीतिक दल या यूनियन को आंदोलन में आने के लिए नहीं कहा। लेकिन जैसे ही गेट जबरन खोले गए और बाहरी समूह अंदर आए तो वह जगह छात्रों के नियंत्रण में नहीं रही।
आंदोलन तितर- बितर हो गया और एक बार ऐसा होने पर वे किस्से जो असल मुद्दे से कोई संबंध नहीं रखते, ‘समर्थन’ के नाम पर चुपचाप आंदोलन का हिस्सा बन जाते हैं। जिन छात्रों से हमने बात की, उन्होंने कहा कि ये समूह ‘मौजूद होने चाहिए’ क्योंकि वे उनका समर्थन करते हैं।
हालाँकि कुछ आवाजें ऐसी भी थीं जो उलझन में थीं और यहाँ तक कि छात्रों के आंदोलन के हड़प लिए जाने को नापसंद करती थीं। उदाहरण के तौर पर, हिंदुस्तान स्टूडेंट एसोसिएशन (HSA) के अधिकारियों ने अलगाववादी नारों और विश्वविद्यालय पर पंजाब के दावे का समर्थन करने से साफ इनकार कर दिया।
मोर्चे के अंदर दरारें- पंजाब बनाम हरियाणा नैरेटिव हावी
जैसे-जैसे गेट के बाहर राजनीतिक तमाशा तेज होने लगा, पंजाब यूनिवर्सिटी बचाओ मोर्चा के अंदर पहली असली असहजता देखने को मिली। 12 नवंबर को, पीयू कैंपस स्टूडेंट्स’ काउंसिल के संयुक्त सचिव और पहले के हलफनामे अभियान का प्रमुख चेहरा रहे मोहित मंडेराना ने मोर्चा से इस्तीफा दे दिया। उसका इस्तीफा एक अहम संकेत है क्योंकि यह वह बात सामने रखता है जो कई छात्र व्यक्तिगत तौर पर कानाफूसी करते रहे हैं लेकिन सार्वजनिक रूप से कहने से डरते हैं- आंदोलन अपने मकसद से भटक गया है।
हालाँकि वह ‘बीजेपी और आरएसएस विचारधारा’ के डर को फैलने से रोक नहीं पाए। अपने बयान में उसने कहा, “यह संघर्ष पंजाब विश्वविद्यालय को राजनीतिक हस्तक्षेप, खासकर बीजेपी और आरएसएस विचारधारा से बचाने के लिए था। लेकिन 10 नवंबर का आंदोलन क्षेत्रीय मालिकाना हक के बारे में हो गया, विश्वविद्यालय को बचाने के बारे में नहीं।” ये बयान बताता है कि किस तरह हर तरह से डर फैलाने की कोशिश की जा रही है।
एक वीडियो में उसे कहते हुए देखा गया कि यह ‘पंजाब और हरियाणा’ का निजी मामला है और वे इसे घर पर ही सुलझा लेंगे। उसने कहा, “हमें किसी दिल्ली एजेंट की जरूरत नहीं है।”
दूसरी ओर, कुछ छात्रों ने ऑपइंडिया से नाम न बताने की शर्त पर कहा कि वे ‘चंडीगढ़ पंजाब दा’ नारों की बाढ़, सीनेट चुनावों से कोई लेना-देना न रखने वाले नेताओं के घुसने और अचानक ऑनलाइन फैल रही उस जानकारी से बेहद असहज थे जिसमें दावा किया जा रहा था कि हरियाणा विश्वविद्यालय को ‘कब्जा’ करना चाहता है।
ध्यान देने वाली बात ये है कि पंजाब बनाम हरियाणा का यह नैरेटिव नया नहीं है। 1966 में पंजाब के पुनर्गठन के बाद हरियाणा और हिमाचल प्रदेश बने। तब से इन राज्यों के बीच यह खींचतान हमेशा रही है, लेकिन यह विश्वविद्यालय कैंपस में पहले कभी इस तरह नहीं घुसी थी।
सीनेट चुनावों को इतिहास में भी कभी भी क्षेत्रीय लड़ाई में नहीं बदला गया। दोनों राज्यों के छात्र दशकों से एक साथ पढ़ते आए हैं। हरियाणा के अपने विश्वविद्यालय हैं और वह पीयू को फंड नहीं करता। हिमाचल के भी अपने संस्थान हैं। असल में यह मुद्दा क्षेत्रीय नहीं बल्कि प्रशासनिक था।
लेकिन जैसे ही राजनीतिक खिलाड़ी मैदान में उतरे, ‘पंजाब का आखिरी प्रतीक खतरे में’ का नैरेटिव आगे बढ़ाना आसान हो गया। सीनेट का मुद्दा जमीन, पहचान और इतिहास के नारों में बदल गया। स्वाभाविक रूप से, हरियाणा आधारित छात्र समूहों ने प्रतिक्रिया दी और आंदोलन कानून की बजाय भावनाओं का युद्धक्षेत्र बन गया।
इसलिए मंडेराना का इस्तीफा सिर्फ असहमति नहीं था। यह आंदोलन पर हावी होने को लेकर पैदा हुई पहली साफ दरार थी। अगर अंदरूनी लोग ही एकमत नहीं हैं, तो यह केवल समय की बात है कि छात्र अपनी जगह वापस हासिल कर पाएँ या आंदोलन अपने ही बोझ तले ढह जाए।
वर्तमान आंदोलन में एबीवीपी की स्थिति
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) पंजाब विश्वविद्यालय के अध्यक्ष पविंद्र सिंह नेगी ने ऑपइंडिया को बताया कि एबीवीपी छात्रों के साथ खड़ी है और सीनेट चुनावों की तारीख घोषित करने की उनकी असल माँग का समर्थन करती है।
हालाँकि संगठन सक्रिय रूप से आंदोलन में भाग नहीं ले रहा क्योंकि इसे बाहरी लोगों ने हड़प लिया है। उन्होंने कहा कि सरकार पहले ही अधिसूचना वापस ले चुकी है और हाई कोर्ट ने भी छात्रों को कक्षाओं में लौटने को कहा है, ऐसे में आंदोलन जारी रखने का कोई ठोस कारण नहीं बचता।
उनके अनुसार अब बाहरी लोग आंदोलन को पूरी तरह अलग दिशा में ले जा रहे हैं ताकि अपने एजेंडे साध सकें। उन्होंने स्थगित परीक्षाओं पर भी चिंता जताई क्योंकि इससे परिणामों में देरी होगी और प्लेसमेंट में समस्याएँ आएँगी।
उन्होंने कहा, “आज भी छात्र हमसे मिले। वे स्थगित परीक्षाओं को लेकर चिंतित थे। अगर समय पर परिणाम नहीं आए तो वे प्लेसमेंट की तारीख़ों से कैसे मेल खाएँगे?”
छात्रों में डर कैसे पैदा किया जा रहा है और इससे किसे फायदा हो रहा है
राजनीति में डर एक शक्तिशाली हथियार है, खासकर तब जब इसे ऐसे युवा छात्रों के समुदाय में डाला जाए जो पहले से ही शैक्षणिक अनिश्चितता में जी रहा हो। पिछले सप्ताह छात्रों में कुछ अलग ही तरह के डर जानबूझकर फैलाए गए हैं जैसे कि-
केंद्र का नियंत्रण आने पर विश्वविद्यालय तानाशाही बन जाएगा
फीस अचानक बहुत बढ़ जाएगी
चुनाव कभी नहीं होंगे
पंजाब विश्वविद्यालय को पंजाब से ‘छीन लिया’ जाएगा
चंडीगढ़ स्थायी रूप से बदल दिया जाएगा
पंजाब की पहचान पर हमला हो रहा है
यह विश्वविद्यालय को बचाने का ‘आखिरी मौका’ है
इनमें से हर डर तथ्यों के आधार पर सवालों के घेरे में है लेकिन राजनीतिक रूप से सही है।
ये नैरेटिव हॉस्टल्स या कक्षाओं के अंदर से नहीं निकले। ये बाहर से आए- भावनाओं से ओतप्रोत भाषण देने वाले किसान यूनियन नेताओं से, बार-बार पंजाबियत के नारे दोहराने वाले पहचान-आधारित समूहों से, केंद्र-विरोधी नया मुद्दा तलाशने वाले राजनीतिक नेताओं से और आंदोलन को अपनी गैर-जरूरी शिकायतों के लिए युद्धक्षेत्र मानने वाले वैचारिक तत्वों से ये नैरेटिव देखने को मिले।
साभार- ऑपइंडिया ग्राउंड रिपोर्टर
जब मैंने कानून की अच्छी जानकारी रखने वाले एक ‘समर्थक’ से पूछा कि फीस कैसे बढ़ेगी जबकि अन्य केंद्रीय विश्वविद्यालयों का फी स्ट्रक्चर भी बहुत किफायती है तो वह केवल इतना ही कह पाया, “ऐसे ही होता है, नहीं?”
हालाँकि डर तथ्यों से कहीं तेज फैलता है, खासकर तब जब हजारों लोग विश्वविद्यालय के बाहर खड़े होकर यह नारा लगा रहे हों कि ‘पंजाब का आखिरी संस्थान छीना जा रहा है।’
इस बात पर ध्यान देना जरूरी है कि शिक्षा मंत्रालय ने 7 नवंबर को विवादित अधिसूचना वापस ले ली थी। सीनेट संरचना बहाल कर दी गई थी। विश्वविद्यालय ने 9 नवंबर को कार्यक्रम उपराष्ट्रपति कार्यालय को भेज दिया था।
यहाँ तक कि हाई कोर्ट ने भी माना कि कार्यक्रम को आगे बढ़ाना चाहिए और चुनाव शीघ्र कराए जाने चाहिए। फिर भी, ऐसे कारणों से जिनका पीयू अधिनियम से कोई लेना-देना नहीं है, कई समूह चाहते हैं कि आंदोलन जारी रहे।
क्यों? क्योंकि अव्यवस्था से उन्हें फायदा मिलता है।
जो हो रहा है वह व्यवस्थित रूप से भड़काया गया भावनात्मक उकसावा है और डर का हर नया दिन उन समूहों की मदद करता है जिनकी सीनेट चुनावों में नहीं, बल्कि आंदोलन को जिंदा रखने में काफी दिलचस्पी है।
हाई कोर्ट का दखल और डर का नैरेटिव का कैसे हुआ पर्दाफाश
14 नवंबर को पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने इस पूरे मामले में शायद सबसे तार्किक बात दी। पूर्व सीनेट सदस्यों की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस शील नागू की अध्यक्षता वाली पीठ ने दो अहम बातें कहीं, जो अगर आंदोलनकारी सच में शांति चाहते तो कैंपस को तुरंत शांत कर सकती थीं।
पहली, कोर्ट ने साफ कहा कि शैक्षणिक गतिविधियाँ तुरंत शुरू होनी चाहिए। जजों ने स्पष्ट तौर पर कहा कि छात्र विश्वविद्यालय में पढ़ाई के लिए हैं और प्रशासनिक मुद्दों के कारण शिक्षा को रोका नहीं जा सकता।
जब वकील ने कहा कि छात्र सीनेट चुनावों में देरी के कारण आंदोलन कर रहे हैं, तो पीठ ने सीधे कहा, “कृपया अपनी कक्षाओं में वापस जाएँ।”
यह कोई मामूली टिप्पणी नहीं है। एक संवैधानिक अदालत की ओर से छात्रों को पढ़ाई पर लौटने का निर्देश उस पूरे डर को कमजोर करता है, जो फैलाया जा रहा था कि विश्वविद्यालय टूटने या कब्जे के कगार पर है।
दूसरी, कोर्ट ने कहा कि चुनाव शीघ्र कराए जाने चाहिए और विश्वविद्यालय पहले ही कार्यक्रम उपराष्ट्रपति (कुलपति) को भेज चुका है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पंजाब विश्वविद्यालय अधिनियम में कार्यक्रम के लिए कुलपति की ‘मंजtरी’ की आवश्यकता नहीं है। इसका मतलब है कि प्रक्रिया पहले से ही आगे बढ़ रही है।
केंद्र का पक्ष रखने वाले एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने इस बात कि पुष्टि की कि-
विवादित अधिसूचना वापस ले ली गई है सरकार चाहती है कि चुनाव हों कार्यक्रम प्रक्रिया में है यह एक विशाल अभ्यास है, जिसमें लगभग साढ़े तीन लाख पंजीकृत स्नातक मतदाता शामिल हैं
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि चुनाव के लिए ‘सौहार्दपूर्ण वातावरण’ जरूरी है। यह एक सामान्य बात है कि इतनी बड़ी प्रक्रिया बैरिकेड तोड़ने, बाहरी भीड़ और राजनीतिक नारों के बीच नहीं हो सकती।
कुल मिलाकर हाई कोर्ट ने छात्रों की चुनाव कराए जाने की असली माँग को आधिकारिक रूप से मान्यता दी और साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि आंदोलन के आसपास का अराजक माहौल बिल्कुल अनावश्यक है। कोर्ट के शब्द सीधे उन डर फैलाने वाले नैरेटिव को काटते हैं जिन्हें यूनियनों और राजनीतिक समूहों ने हवा दी थी।
बाहरी लोग आंदोलन को जारी क्यों रखना चाहते हैं और इसमें कौन-से राजनीतिक लाभ हैं
आंदोलन छात्रों की मूल माँग से कहीं आगे क्यों चला गया, यह समझने के लिए हमें ये देखना होगा कि कैंपस को अशांत बनाए रखने से किसे फायदा हो रहा है। खास बात ये हा कि इनमें से कोई भी लाभार्थी छात्र नहीं हैं।
राजनीतिक दल
आम आदमी पार्टी (AAP), कॉन्ग्रेस और शिरोमणि अकाली दल (SAD) जैसे दलों के लिए पंजाब विश्वविद्यालय एक आसान प्रतीकात्मक युद्धक्षेत्र है। चुनाव नजदीक हैं और नैरेटिव लगातार बदल रहे हैं। ऐसे में पीयू को ‘पंजाब की पहचान का आखिरी किला खतरे में’ के रूप में पेश किया जा रहा है।
कैंपस में मार्च करना, नारे लगाना और केंद्र पर हमला करना उन्हें राजनीतिक लाभ देता है, जिसका सीनेट से कोई लेना-देना नहीं है।
AAP के मंत्री पहुँचे, कॉन्ग्रेस के विधायक भावनाओं से भरा भाषण देने लगे, SAD नेता पंजाब के रक्षक बनकर सामने आए। लेकिन जब पीयू का बजट घटाया गया, हॉस्टलों में कमी आई या शैक्षणिक निर्णय टाले गए, तब ये नेता कहाँ थे? विश्वविद्यालय के प्रति उनका अचानक दिखा ‘प्यार’ समयबद्ध है, सच्चा नहीं।
किसान यूनियन
संयुक्त किसान मोर्चा में विभाजन और 2021 के बाद घटती भीड़ के चलते कई यूनियनें राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बने रहने को बेताब हैं। छात्र आंदोलनों का समर्थन उन्हें नैतिक अधिकार का आभास देता है, जबकि सीनेट चुनावों का कृषि मुद्दों से कोई संबंध नहीं है।
साभार- ऑपइंडिया ग्राउंड रिपोर्टर
इसी वजह से पंजाब में यूनियन नेताओं को पूरे जत्थों के साथ ट्रैक्टर और ट्रॉलियों में आते देखा गया। ‘पंजाब के लिए लड़ते किसान पुत्र’ जैसी तस्वीर वहाँ भावनात्मक रूप से प्रभावशाली है, लेकिन छात्रों की चिंताओं से रणनीतिक रूप से पूरी तरह अलग है।
मजदूर यूनियन और वैचारिक संगठन
ये समूह आंदोलनों को अपने राजनीतिक नैरेटिव आगे बढ़ाने का अवसर मानते हैं। उनके नारे शायद ही कभी छात्रों की माँगों से मेल खाते हैं। बल्कि वे अपने वही वैचारिक फैलाव दोहराते हैं जो हमने किसान आंदोलन के दौरान देखा था, जहाँ कई संगठन मूल शिकायत से परे जाकर आंदोलन से जुड़ गए थे।
इनमें से कई संगठनों को अराजकता से ही लाभ मिलता है। आंदोलन जितना लंबा चलता है, उन्हें उतना ही अधिक मंच और दिखने का मौका मिलता है।
कट्टरपंथी- अलगाववादी आवाजें
खालिस्तान के समर्थकों के समानांतर निहंग जैसे व्यक्तियों की मौजूदगी भी एक और परत दिखाती है। ये लोग पीयू को एक प्रतीकात्मक स्थल मानते हैं- एक ऐसी जगह जो पंजाब की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी है। अगर वे छात्र आंदोलन के अंदर इतिहास में हुए विश्वासघात, राज्य दमन या सांस्कृतिक मालिकाना हक के नैरेटिव बो देंगे तो उन्हें कैंपस से कहीं आगे वैचारिक लाभ मिलता है।
विपक्षी दल और केंद्र-विरोधी नैरेटिव
केंद्र की वापस ली गई अधिसूचना को बीजेपी पर हमला करने के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, जबकि वह अधिसूचना अब सक्रिय ही नहीं है। यह ठीक वही रणनीति है जो किसान कानूनों के साथ अपनाई गई थी।
हालाँकि वे 2021 में वापस ले लिए गए थे, फिर भी वे राजनीतिक दलों, यूनियनों और तथाकथित कार्यकर्ताओं के लिए डर फैलाने का साधन बने हुए हैं।
कंटेंट क्रिएटर्स और कार्यकर्ता
हमें नए दौर के आंदोलन लाभार्थियों को नहीं भूलना चाहिए। इन्फ्लुएंसर्स, हाशिये के कार्यकर्ता, स्थानीय आंदोलनकारी और कुछ छात्र नेता खुद अराजकता जारी रहने पर सामाजिक पूँजी हासिल करते हैं।
एक सुलझा हुआ आंदोलन उन्हें कुछ नहीं देता। एक लंबा खिंचता आंदोलन उन्हें अनुयायी, दृश्यता और ‘युवा नेता’ की पहचान देता है, भले ही उनका मूल मुद्दे से बहुत कम संबंध हो।
इन सभी परतों में एक पैटर्न साफ दिखाई देता है। छात्र स्पष्टता चाहते हैं। बाहरी लोग संकट चाहते हैं।
इसका सबसे सरल प्रमाण पीयू छात्र अवतार सिंह से मिला। उन्होंने हमें सीधे बताया कि जैसे ही चुनाव कार्यक्रम घोषित होगा, हड़ताल समाप्त हो जाएगी। हालाँकि उन्होंने किसान और मज़दूर यूनियनों की मौजूदगी का समर्थन किया, जो शुरुआत से ही टालना चाहिए था।
छात्र 240 दिन की समयसीमा समझते हैं। वे प्रशासनिक प्रक्रिया समझते हैं। वे केंद्र से नहीं डरते। वे पीयू को बंधक बनाने की कोशिश नहीं कर रहे।
यह बाहरी लोग हैं जो आंदोलन को जारी रखना चाहते हैं, क्योंकि सीनेट कार्यक्रम उनकी उपयोगिता समाप्त कर देता है।
निष्कर्ष- असली खतरा है आंदोलन का हड़पना, न कि केंद्र
दो सप्ताह के आंदोलन, बैरिकेड्स, एफआईआर और राजनीतिक नाटकों के बाद असली सवाल बहुत सरल है। असल खतरा क्या है? केंद्र ने अपनी अधिसूचना वापस ले ली है। हाई कोर्ट ने सीनेट प्रक्रिया को आगे बढ़ाया है। पीयू अधिनियम स्पष्ट है।
असली खतरा यह है कि छात्रों की चुनाव तिथियों की माँग कितनी आसानी से किसान यूनियनों, मजदूर समूहों, राजनीतिक दलों और पहचान-आधारित संगठनों द्वारा हड़प ली गई।
जो छात्र केवल पढ़ाई करना चाहते हैं, उन्हें डर के नैरेटिव से प्रभावित किया जा रहा है जबकि बाहरी लोग कैंपस का इस्तेमाल अपनी प्रासंगिकता के लिए कर रहे हैं। अदालत चाहती है कि कक्षाएँ फिर से शुरू हों। केवल वे लोग जिनके राजनीतिक मकसद हैं, अराजकता को जारी रखना चाहते हैं।
ये रिपोर्ट मूल रूप से अनुराग ने लिखी है। अंग्रेजी में इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएँ।
सीएनएन ने रविवार (16 नवंबर2025 ) को संयुक्त राज्य अमेरिका में बढ़ते भारत-विरोधी नस्लवाद पर रिपोर्ट दी। ये रिपोर्ट इस्लाम समर्थकों और भारत-विरोधी कट्टरपंथियों का हवाला देकर प्रकाशित की गई है।
अमेरिकी समाचार मीडिया कंपनी सीएनएन ने भारत-विरोधी प्रचार का इतिहास रहा है। उसने एक आर्टिकल प्रकाशित किया है ‘नस्लवादी अब खुलेआम भारतीय-अमेरिकियों को निशाना बना रहे हैं।’
सीएनएन ने जानकारी दी है कि कैसे भारतीय मूल के एफबीआई निदेशक काश पटेल, निक्की हेली और विवेक रामास्वामी को दिवाली की शुभकामनाएँ देने पर श्वेत ईसाई राष्ट्रवादियों को दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा।
लेख में कहा गया है, “कुछ भारतीय-अमेरिकी रूढ़िवादी इस बात से हैरान हैं कि राजनीतिक दक्षिणपंथी धड़ा अब उन पर निशाना साध रहे हैं।”
सीएनएन ने बढ़ते भारत-विरोधी नस्लवाद के लिए ‘राजनीतिक दक्षिणपंथ’, हाशिए पर चले गए स्थानीय लोग और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के वीजा नियमों में की गई सख्ती को जिम्मेदार ठहराया है। लेख में आगे कहा गया है, “MAGA गठबंधन के कुछ सदस्य खुलेआम कह रहे हैं कि केवल श्वेत ईसाई ही अमेरिका में रहने के हकदार हैं।”
यह साफ था कि अमेरिकी समाचार चैनल ने रिपब्लिकनों की आलोचना करने और नस्लवाद-विरोधी मुहिम को मजबूत करने के लिए यह लेख प्रकाशित किया था, लेकिन सीएनएन ने भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी बयानबाजी के लिए मशहूर लोगों के विचार भी इसमें शामिल किया।
रकीब नाइक
सीएनएन ने जिन विशेषज्ञों को शामिल किया है उनमें रकीब नाइक भी एक थे। उन्हें ‘ ऑर्गनाइज हेट स्टडी सेंटर’ का संस्थापक और कार्यकारी निदेशक बताया गया।
अमेरिकी समाचार एजेंसी ने दावा किया है कि रकीब नाइक ने कहा कि उनकी टीम ने अकेले अक्टूबर में भारतीयों और अमेरिकी भारतीयों के खिलाफ नस्लवाद और द्वेष फैलाने वाले लगभग 2,700 पोस्ट रिकॉर्ड किए।
HW started as a Twitter handle in 2019, & its website also became operational in the same year. It had no fathers until owned by Raqib Hameed Naik in 2023 with the help of WaPo journo Pranshu Verma. Verma didn’t even check the dates claiming it was founded in April 2021!
दरअसल नाइक एक इस्लामवादी और एक शातिर फर्जी खबर फैलाने वाला है। वह हिंदू-विरोधी दुष्प्रचार संगठन ‘हिंदुत्व वॉच’ का संस्थापक है, जिसका ट्विटर अकाउंट भारत में जनवरी 2024 में बंद कर दिया गया था।
यह भारत-विरोधी कट्टरपंथी है। इसने 1990 के दशक में कश्मीर घाटी में हिंदू नरसंहार को नकारने की कोशिश की। इस्लामी कट्टरपंथियों ने हिन्दुओं को रातोंरात पलायन के लिए मजबूर किया और जमकर रक्तपात मचाया। नाइक ने काशी की ज्ञानवापी मस्जिद में मिले ‘शिवलिंग’ का मज़ाक भी उड़ाया था। इसके बावजूद, सीएनएन ने नाइक को सोशल मीडिया पर ‘भारत-विरोधी कट्टरता’ पर एक विशेषज्ञ के तौर पर पेश किया।
रोहित चोपड़ा
अमेरिकी समाचार मीडिया कंपनी ने रोहित चोपड़ा नाम के एक व्यक्ति का भी हवाला दिया। अमेरिका के सांता क्लारा विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के तौर पर उनका विचार छापा गया है।
इसमें कहा गया है, ” रोहित चोपड़ा अति-दक्षिणपंथी समुदायों का ऑनलाइन अध्ययन करते हैं और नाइक के साथ ‘सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ ऑर्गनाइज्ड हेट’ के सह-लेखक हैं।”
चोपड़ा ‘इंडियाएक्सप्लेन्ड’ नाम से एक हिंदूफोबिक एक्स हैंडल चलाते हैं, जिसे पहले भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या का आह्वान करने के कारण निलंबित कर दिया गया था।
(रोहित चोपड़ा का ट्विटर पोल)
चोपड़ा ने एक सर्वे में शामिल होने के लिए लोगों को आगे आने को कहा। इस सर्वे में पूछा गया था कि क्या भारतीय प्रधानमंत्री की हत्या उनके अपने गृह मंत्री अमित शाह द्वारा की जाएगी।
(रोहित चोपड़ा का ट्वीट)
एक ट्वीट में, इस घटिया प्रोफेसर ने नरेंद्र मोदी की एक तस्वीर साझा की और दावा किया, “ऐसे कपड़े पहने हुए हैं जैसे वह किसी भक्त का बलात्कार करने, पत्नी की हत्या करने या दंगा भड़काने जा रहे हों।”
उनके ट्वीट वायरल होने के बाद, प्रमुख वैश्विक थिंक टैंक ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन (ORF) ने उन्हें अपने प्लेटफॉर्म से हटा दिया। एनडीटीवी के पत्रकार शिव अरूर के अनुसार, इसी ‘प्रोफ़ेसर’ की कई साल पहले बाल पोर्नोग्राफ़ी के आरोप लगे थे और जाँच चल रही थी। भारत ने उनके ट्वीट पर बैन लगा दिया गया।
यही कारण है कि उन्होंने ‘वैश्विक हिंदुत्व को ख़त्म करने’ वाले सम्मेलन का बचाव करने और इस आयोजन के खिलाफ हिन्दुओं के विरोध को कम करके आंका। इसके बावजूद सीएनएन ने उन्हें अमेरिका में भारत-विरोधी नस्लवाद के ‘विशेषज्ञ’ के रूप में पेश करने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई।
भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी बयानबाज़ी के लिए मशहूर चोपड़ा ने अमेरिकी समाचार चैनल से कहा, “यह एक तरह की चेतावनी होनी चाहिए कि अल्पसंख्यकों के प्रति नस्लवाद से आप भी अछूते नहीं हैं।”
सिद्धार्थ वेंकटरामकृष्णन
सीएनएन ने एक और विवादास्पद ‘विशेषज्ञ’ सिद्धार्थ वेंकटरामकृष्णन का मत लिया है। वह इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक डायलॉग (आईएसडी) में विश्लेषक के रूप में काम करते हैं।
उन्होंने पहले भी ‘लव जिहाद‘ को एक साजिश बता कर इसके असर को कम आंकने की कोशिश की थी, जबकि इसके हज़ारों मामले दर्ज हैं। ‘लव जिहाद’ गैर-मुस्लिम महिलाओं को इस्लाम में धर्मांतरित करने की एक चाल है।
सिद्धार्थ ने WIRED को दिए इंटरव्यू में ऑपइंडिया के ‘लव जिहाद’ को लेकर लिखे लेखों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि इन लेखों में दिए गए कंटेंट को एक्स और टेलीग्राम जैसे दूसरे प्लेटफॉर्म पर फैलाया जाता है। उनका कहना है कि “इन लेखों की वजह से कुछ जगहों पर मुसलमानों के खिलाफ हिंसा या मुसलमानों को भगाने के आह्वान किए जाते हैं।”
उनका कहना है कि ऐसे लेख हिंदुत्व या हिंदू राष्ट्रवाद के अंतर्गत आते हैं। यह एक राजनीतिक विचारधारा है, जो दावा करती है कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है जिसे इस्लाम और ईसाई धर्म जैसे बाहरी प्रभावों से खतरा है। ISD ने अपने लेख में इन बातों को छापा है।
इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक डायलॉग ने न केवल हिंदुत्व के बारे में झूठ फैलाया है, बल्कि 2022 के लीसेस्टर दंगों के लिए ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ (बिना किसी सबूत के) को दोषी ठहराने की कोशिश की है। इस इंस्टीट्यूट में सिद्धार्थ वेंकट रामकृष्णन एक विश्लेषक के रूप में काम करते हैं।
(मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को सोमवार (17 नवंबर 2025) को मौत की सजा सुनाई गई है। शेख हसीना को ढाका की इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (ICT) ने कथित मानवता के खिलाफ अपराध में दोषी माना है। उन्हें साल 2024 में छात्र विद्रोह पर कार्रवाई का आदेश देने का दोषी बनाया गया है। इनमें से 2 मामलों में शेख हसीना को मौत की सजा और बाकी 3 मामलों पर उम्रकैद की सजा दी गई है।
ट्रिब्यूनल का यह फैसला पिछले साल जुलाई में हुए हिंसक विरोध प्रदर्शन के एक साल से भी अधिक समय बाद आया है, जिसके कारण अगस्त 2024 में उनका 15 साल का शासन समाप्त हो गया था। हसीना अपने पद से हटने के बाद से भारत में रह रही हैं और उन पर उनकी अनुपस्थिति में मुकदमा चलाया गया था।
शेख हसीना पर क्या-क्या आरोप हैं?
शेख हसीना के खिलाफ अभियोजन पक्ष ने 01 जून 2025 को ICT को सौंपी चार्जशीट में मानवता के खिलाफ 5 गंभीर आरोप लगाए हैं, जो विशेष रूप से जुलाई और अगस्त 2024 में भड़के छात्र आंदोलन के समय हुई हिंसा से जुड़े हैं। इनमें सबसे पहला आरोप है कि 14 जुलाई 2024 को हसीना ने गनाभाबन (Ganabhaban) में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में भड़काऊ भाषण दिया था। उसके बाद ही सरकारी सुरक्षा बलों और आवामी लीग के समर्थकों ने छात्रों और नागरिकों पर हमला शुरू किया, जिसमें हत्या, हत्या की कोशिश, यातना और बाकी अमानवीय कृत्य शामिल हैं।
एक अन्य आरोप यह है कि शेशख हसीना ने प्रदर्शनकारियों को दबाने के लिए हेलीकॉप्टर, ड्रोन और घातक हथियारों के इस्तेमाल का आदेश दिया। ट्रिब्यूनल ने यह कहा कि इसके बाद सुरक्षा बलों ने इन निर्देशों को लागू किया और यह आदेश कमांड ‘जिम्मेदारी’, ‘षडयंत्र’ और ‘सहयोग’ के दायरे में आता है।
शेख हसीना पर यह भी आरोप है कि 16 जुलाई 2024 को बांग्लादेश के रांगपुर में बेगम रोकिया यूनिवर्सिटी के सामने एक छात्र अबू सैयद को सुरक्षा बलों ने बहुत नजदीक से गोली मारकर हत्या कर दी। ICT ने माना कि यह हत्या शेख हसीना की प्रेरणा, निर्देश और षड्यंत्र के तहत की गई थी, यानी उन्होंने न केवल इसकी अनुमति दी बल्कि इसमें सीधे तौर पर सहयोग किया।
चौथा आरोप है कि 05 अगस्त 2024 को ढाका के चनखरपुल इलाके में प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी हुई और 6 लोगों की हत्या कर दी गई। इसके अलावा पाँचवा आरोप है कि 05 अगस्त को ही आशुलिया पुलिस स्टेशन के सामने और आसपास के इलाकों में प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई गई। कम से कम 5 लोग मारे गए और उनके शवों को जला दिया गया। एक घायल व्यक्ति को जिंदा छोड़ कर भी जलाने का आरोप है।
शेख हसीना के सहयोगी भी दोषी करार
इन सभी 5 आरोपों में शेख हसीना के अलावा तत्कालीन गृह मंत्री असदुज्जामान खान कमाल और पूर्व पुलिस अधिकारी चौधरी अब्दुल्ला अल-मामुन को दोषी करार दिया है। कोर्ट ने हसीना और असदुज्जामान को मौत की सजा सुनाई है। वहीं अल-मामुन को 5 साल की जेल की सजा दी गई है क्योंकि उन्होंने राज्य के पक्ष में गवाही दी।
मौत की सजा के बाद शेख हसीना के पास क्या विकल्प?
शेख हसीना को मौत की सजा सुनाए जाने के बाद अब जानते हैं कि बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री के पास इस सजा से बचने के लिए क्या-क्या विकल्प हैं। सबसे पहले शेख हसीना को कानूनी अधिकार है कि वे ICT के फैसले के खिलाफ बांग्लादेश की सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर सकती हैं।
ICT ने भी 453 पन्नों के अपने फैसले में यह स्पष्ट कहा है कि दोषियों को 30 दिन के भीतर अपील दर्ज करने का अधिकार है। यानी इस अपील को बांग्लादेश की सुप्रीम कोर्ट की अपील विभाग (Appellate Division) में ले जाया जा सकता है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अगर अपील स्वीकार की जाती है तो वहाँ नए सबूत प्रस्तुत कर या फिर ट्रायल प्रक्रिया में गलती के आधार पर तर्क दिया जा सकता है। इस अपील पर सुप्रीम कोर्ट चाहे तो वह नई सुनवाई का आदेश दे सकती है या ICT के फैसले को पलट भी सकती है।
राष्ट्रपति और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शेख हसीना कर सकती हैं माँग
इसके बाद शेख हसीना के पास रिव्यू पिटीशन (Review Petition) का भी विकल्प है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट से यह अनुरोध किया जाता है कि वह अपने ही फैसले पर पुनर्विचार करे। लेकिन यह विकल्प केवल तभी सफल होता है जब नए सबूत सामने आएँ या अदालत में कोई बड़ी कानूनी गलती साबित हो जाए।
इसके अलावा शेख हसीना राष्ट्रपति के पास दया याचिका (Clemency) भी दायर कर सकती हैं। बांग्लादेश के संविधान के तहत राष्ट्रपति को सजा माफ करने, कम करने या बदलने का अधिकार है। यह पूरी तरह राजनीतिक फैसला होता है, इसीलिए यह देखना होगा कि राष्ट्रपति वर्तमान राजनीतिक माहौल और अंतरराष्ट्रीय दबाव को कैसे देखते हैं।
शेख हसीना के पास ‘कूटनीतिक और अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप’ का भी विकल्प है। चूंकि वह फिलहाल बांग्लादेश में नहीं हैं, इसीलिए यह मुद्दा भारत-बांग्लादेश संबंधों को प्रभावित कर सकता है। अगर वह चाहें तो अंतरराष्ट्रीय मानवाधिक संगठनों, संयुक्त राष्ट्र (UN) या कूटनीतिक मंचों पर ट्रायल की निष्पक्षता पर सवाल उठा सकती हैं। हालाँकि, ICT एक घरेलू न्यायालय होने के चलते अंतरराष्ट्रीय कोर्ट का प्रत्यक्ष हस्तक्षेप सीमित रहता है।
शेख हसीना के समर्थन में बांग्लादेश में प्रदर्शन
उधर, शेख हसीना के समर्थन में बांग्लादेश में व्यापक प्रदर्शन जारी है। देश में शेख हसीना के समर्थक सड़कों पर उतरकर मौजूदा यूनुस सरकार का विरोध कर रहे हैं। पिछले दिनों बांग्लादेश में कई जगहों पर धमाके हुए। यह सब कुछ ICT के फैसले से कुछ दिनों पहले से जारी है, जो शेख हसीना को मौत की सजा के आदेश के बाद तेज हो गया है।
मोहम्मद युनूस सरकार ने देश में शटडाउन का ऐलान कर दिया। इस बीच राजधानी ढाका में 15 हजार पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई है। प्रदर्शनकारियों पर शूट एट साइट का आदेश जारी किया गया है। पिछले 7 दिनों में 28 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। बांग्लादेश में एक बार फिर गृह युद्ध जैसे हालात हैं।
इससे पहले आवामी लीग ने रविवार (16 नवंबर 2025) की रात को शेख हसीना का एक ऑडियो मैसेज जारी किया था। इसमें शेख हसीना ने अपने समर्थकों को सरकार के बैन के बावजूद डटकर प्रदर्शन जारी रखने के लिए प्रेरित किया था।
गुजरात के गिर सोमनाथ जिले के कोडिनार स्थित एक दरगाह से घातक हथियार बरामद होने का खुलासा हुआ है। दिल्ली विस्फोट की घटना के बाद SOG समेत पुलिस की कई टीमों ने गुजरात के तटीय इलाके में तलाशी अभियान चलाया था। इसी सिलसिले में कोडिनार के मुलद्वारका इलाके में भी जाँच चल रही थी।
जाँच के दौरान उस इलाके में स्थित हजरत कच्ची पीर की दरगाह से घातक हथियार बरामद हुए। पुलिस ने इस मामले में मामला दर्ज कर दरगाह की संरक्षक अमिनशा इस्माइलशा कनौजिया को गिरफ्तार कर लिया है और आगे की जाँच जारी है।
घटना के विवरण के अनुसार, रविवार (16 नवंबर 2025) को गिर सोमनाथ जिला पुलिस ने संवेदनशील तटीय गाँवों और बंदरगाह क्षेत्रों की तलाश शुरू की। यह अभियान एसपी जयदीपसिंह जडेजा की देखरेख में अवैध गतिविधियों पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से चलाया जा रहा था।
इस अभियान में दो डीएसपी, छह पुलिस निरीक्षक, सात पुलिस उपनिरीक्षक, एसओजी, एलसीबी और बम निरोधक दस्ते सहित 120 से ज्यादा पुलिसकर्मी शामिल थे। कोडिनार, ऊना और वेरावल की एक संयुक्त पुलिस टीम ने मूल द्वारका बंदरगाह पर अचानक जाँच की और आस-पास के गाँवों में रहने वाले लोगों से पूछताछ की।
दरगाह से मिले हथियार
एसओजी टीम को जाँच के दौरान गिर सोमनाथ के हजरत कच्ची पीर बाबा की दरगाह से तलवार, चाकू और खंजर समेत कई हथियार मिले। इस दौरान दरगाह की केयरटेकर (देखभालकर्ता) अमिनशा इस्माइलशा भी वहाँ मौजूद थीं।
पुलिस ने आयोग की मौजूदगी में उनसे हथियार का लाइसेंस माँगा, लेकिन वह नहीं दे पाईं। जिसके बाद पुलिस ने मौके से हथियार जब्त कर आगे की कार्रवाई शुरू कर दी है। फिलहाल, पुलिस इस बात की जाँच कर रही है कि दरगाह में वो हथियार कैसे आए और इसके पीछे का कारण क्या था?
इस मामले में दरगाह के संरक्षक के खिलाफ कोडिनार थाने में मामला भी दर्ज किया गया है। पुलिस ने खुद शिकायतकर्ता बनकर FIR दर्ज की है। एसओजी के हेड कांस्टेबल गोपाल सिंह मोरी ने शिकायत दर्ज कराई थी और उसके बाद मामला भी दर्ज किया गया है। पुलिस ने अमिनशा इस्माइलशा के खिलाफ गुजरात पुलिस अधिनियम की धारा 135 के तहत मामला दर्ज किया है। FIR की एक प्रति ऑपइंडिया के पास उपलब्ध है।
ऑपइंडिया से बात करते हुए, शिकायतकर्ता पुलिसकर्मी ने बताया कि गिर सोमनाथ जिले के कलेक्टर ने हथियारों पर प्रतिबंध संबंधी एक अधिसूचना जारी की थी। इसके बाद पुलिस समेत कई टीमें मूल द्वारका स्थित कच्छी पीर की दरगाह की तलाशी ले रही थीं और वहाँ से हथियार बरामद हुए। इसके बाद दरगाह के संरक्षक मुंजावर के खिलाफ अधिसूचना का उल्लंघन करने का मामला दर्ज किया गया है।
पुलिसकर्मी के अनुसार, आरोपित को थाने लाया गया है और उससे पूछताछ की जा रही है। यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि ये हथियार दरगाह तक कैसे पहुँचे? ये हथियार किसने दिए और इन्हें रखने का क्या मकसद था।
जिला पुलिस प्रमुख ने ऑपइंडिया को क्या बताया?
गिर सोमनाथ जिले के पुलिस प्रमुख जयदीप सिंह जडेजा ने ऑपइंडिया को बताया कि दिल्ली कार ब्लास्ट की घटना के बाद जिला पुलिस टीम ने संवेदनशील इलाकों में तलाशी ली थी, जिसके दौरान एक धर्मस्थल की जाँच के दौरान भारी मात्रा में हथियार बरामद हुए। चूँकि इनके कोई दस्तावेज नहीं मिले, इसलिए जिम्मेदार लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है और आगे की जाँच शुरू कर दी गई है।
उन्होंने बताया कि इलाके में जाँच के दौरान कई अन्य मामले भी सामने आए, जिनमें दूसरे राज्यों से आए किराएदार पुलिस को सूचित किए बिना रह रहे थे, जबकि कुछ के खिलाफ अन्य नियमों का उल्लंघन करने पर कार्रवाई भी की गई है। उन्होंने आगे कहा कि पुलिस आगे भी ऐसी कार्रवाई करती रहेगी।
बता दें कि पिछले हफ्ते गिर सोमनाथ में ही एक जगह पर तोड़फोड़ अभियान के दौरान दरगाह हटाने गई पुलिस और जिला प्रशासन की टीम पर हमले की घटना भी सामने आई है। इस मामले में महिलाओं समेत कुछ लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर जाँच शुरू कर दी गई है।
हाल ही में उसी गिर सोमनाथ से कुछ कश्मीरी लोगों को भी हिरासत में लेकर पूछताछ की गई थी। लेकिन उनके पास से कुछ भी संदिग्ध नहीं मिला। हालाँकि एसपी जडेजा का कहना है कि ये सभी अलग-अलग घटनाएँ हैं और अभी तक इनका कोई संबंध नहीं मिला है।
गुजरात ATS द्वारा पकड़े गए आतंकवादियों ने कलोल के कब्रिस्तान में छिपाए थे हथियार
गौरतलब है कि हाल ही में गुजरात एटीएस ने हथियारों की तस्करी करने गुजरात आए तीन आतंकियों को गिरफ्तार किया था। यह भी पता चला था कि इन आतंकियों ने गाँधीनगर के कलोल स्थित एक कब्रिस्तान में हथियार छिपा रखे थे।
इससे पहले उत्तर प्रदेश के दो आतंकी राजस्थान से हथियार लेकर कलोल पहुँचे थे और उन्हें कब्रिस्तान में छोड़ गए थे। बाद में हैदराबाद का सैयद हथियार लेकर आया था। हालाँकि गुजरात से निकलने से पहले ही ATS की टीम ने उसे पकड़ लिया। फिलहाल इन सभी से पूछताछ की जा रही है।
यह रिपोर्ट मूल रुप से गुजराती में भार्गव राजगुरु ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
बिहार चुनाव में जनसुराज पूरी दमखम के साथ चुनावी रण में उतरी। प्रशांत किशोर ने 238 सीटों पर प्रत्याशी उतारे, यह पहली बार चुनाव लड़ रही पार्टी के मुकाबले कहीं अधिक हैं। हालाँकि, यह चुनाव परिणामों में साबित भी हो गया। जनसुराज एक भी सीट पर चुनाव नहीं जीती। पार्टी के अधिकतर उम्मीदवार तीसरे या तो चौथे स्थान पर लटके रहे। सिर्फ एक उम्मीदवार दूसरे स्थान तक पहुँचा।
जनसुराज की हालत इतनी बुरी रही कि पार्टी को केवल 2 से 3 प्रतिशत ही वोट शेयर हासिल हुआ, जिसका जीतने वाले NDA से तुलना भी नहीं की जा सकती है। यह वोट शेयर कुछ छोटे दलों की तुलना में भी काफी कम है। पार्टी के 68 सीटों पर तो वोट इतने कम थे कि वे NOTA से भी पिछड़ गए।
इसके अलावा सबसे बड़ी मात में जनसुराज के कुल 238 उम्मीदवारों में से 236 की तो जमानत तक जब्त हो गई। यानी लगभग 99.16 प्रतिशत अपनी जमानत बचाने में असफल रहे। इनमें अधिकतर उम्मीदवार तीसरे, चौथे या उससे भी नीचे स्थान पर रहे और कुल मिलाकर पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली। लेकिन पूरे प्रदेश में कुल मिलाकर पार्टी को 15 लाख वोट मिले।
वहीं जनसुराज के स्टार उम्मीदवारों की बात करें तो चनपटिया विधानसभा से यूट्यूबर मनीष कश्यप को 37172 वोट मिले। इस सीट पर कॉन्ग्रेस उम्मीदवार ने 602 वोट से जीत दर्ज की। कुम्हरार सीट से केसी सिन्हा को कुल 15,017 वोट मिले और वे तीसरे नंबर पर रहे। इस सीट पर बीजेपी के संजय कुमार ने 1,48,500 से ज्यादा वोट पाकर बड़ी जीत हासिल की। दरभंगा से पूर्व DGP आर मिश्रा और काराकाट से गायक रितेश पांडे जैसे चर्चित नाम भी चुनाव में उतरे लेकिन ये लोग भी जीत से दूर रहे।
जनसुराज ने महागठबंधन और NDA पर डाला असर?
इससे जाहिर है कि जनसुराज का प्रदर्शन बिहार चुनाव में बेहद खराब रहा। इस बीच कुछ मीडिया संस्थान और सोशल मीडिया पर खबरें तेज हैं कि बिहार चुनाव में जनसुराज ने NDA और महागठबंधन के वोट प्रभावित किए हैं। दावा किया गया कि चुनाव में जनसुराज ने NDA को लाभ और महागठबंधन को नुकसान पहुँचाया है।
ABP Live के सर्वे और रिपोर्ट में यह बताया गया कि जनसुराज की पकड़ कम होने के बावजूद, महागठबंधन की सीटें कम होने और NDA की बढ़त के पीछे जनसुराज के प्रभाव को एक कारण माना गया। खासकर, उन इलाकों में जहाँ NDA को चुनाव में भारी जीत मिल सकी।
यहाँ चर्चा जनसुराज की उन 35 सीटों की हो रही है, जिनपर उन्हें हार-जीत के अंतर से ज्यादा वोट मिले। इन सीटों में 19 सीटें NDA के खाते में गईं, जबकि 14 सीटें महागठबंधन के खाते में आईं और बाकी एक-एक ओवैसी की पार्टी AIMIM और BSP की झोली में गईं।
जनसुराज की उन 35 सीटों का हाल
मीडिया में सामने आया जनसुराज का यह सच अधूरा है। आइए आँकड़ों के अनुसार जनसुराज की उन 35 सीटों का हाल जानते हैं, जिनपर NDA को फायदा और महागठबंधन को नुकसान पहुँचाने का विश्लेषण पेश किया जा रहा है।
इनमें जनसुराज के स्टार उम्मीदवार मनीष कश्यप की विधानसभा चनपटिया भी शामिल है। इस सीट पर कॉन्ग्रेस के अभिषेक रंजन ने 602 वोटों से जीत दर्ज की। उधर, मनीष कश्यप को 50,366 वोट प्राप्त कर तीसरा स्थान हासिल हुआ। बीजेपी उम्मीदवार 86,936 वोट से दूसरे स्थान पर रहे।
फोटो साभार: ECI
एक और विधानसभा फोर्ब्सगंज की बात करें तो जनसुराज उम्मीदवार 977 वोट के साथ छठे स्थान पर रहे। वहीं जीतने वाली कॉन्ग्रेस ने बीजेपी को 221 वोट से हराया। सन्देश सीट पर भी तीसरे स्थान पर रहे जनसुराज उम्मीदवार को 6040 वोट मिले। जबकि जीतने वाली NDA के घटक दल JDU उम्मीदवार ने RJD को केवल 27 वोटों से मात दी।
फोटो साभार: ECI
इन्हीं 35 सीटों में एक सीट AIMIM के खाते में भी पहुँची है। इस जोकीहाट विधानसभा के आँकड़ों के अनुसार, जनसुराज को 35,354 वोट मिले हैं। जबकि AIMIM उम्मीदवार की जीत का मार्जिन 28,803 वोट है।
वहीं बहुजन समाज पार्टी (BSP) के खाते में पहुँची रामगढ़ विधानसभा सीट में प्रत्याशी सतीश कुमार ने केवल 30 वोटों से जीत हासिल की है। वहीं जनसुराज को 4,426 वोट मिले हैं, जिसका हार-जीत के वोट के अंतर से कोई लेना-देना नहीं है।
फोटो साभार: ECI
इन आँकड़ों से यह तो साफ हो गया कि इन सीटों पर जनसुराज का कोई असर नहीं दिखा है। जहाँ जीतने वाले दलों की जीत का अंतर जनसुराज को मिले वोट से कहीं कम है।
जनसुराज से महागठबंधन को नुकसान और NDA को पहुँचा लाभ?
इसका सीधा-सा मतलब यह है कि जनसुराज की मौजूदगी से केवल NDA विरोधी या महागठबंधन विरोधी होने का पता नहीं चलता है। जिस तरह के आँकड़े सामने आए हैं, वे यह नहीं दिखाते कि जनसुराज की वजह से महागठबंधन को नुकसान पहुँचा है या NDA को फायदा हुआ हो।
बल्कि जनसुराज के प्रभाव से NDA के भी वोट कटे है और अन्य दलों ने भी उसका असर झेला है। इन 35 सीटों के नतीजों को ही देखें तो कहीं भी ऐसा साफ-साफ नहीं दिखता कि जनसुराज की एंट्री से महागठबंधन को एकतरफा नुकसान हुआ हो और NDA को उतना ही बड़ा फायदा मिला हो। कुछ सीटों पर हालात उल्टे भी हुए हैं। कहीं जनसुराज का वोट NDA के हिस्से को काटता दिखता है तो कहीं महागठबंधन का वोट।
यानी राजनीतिक समीकरण सीट-दर-सीट बदलते रहे हैं। इससे पता लगता है कि जनसुराज का प्रभाव एकतरफा नहीं बल्कि मिश्रित है। उसका असर किसे कितना पड़ा, यह हर सीट की स्थानीय राजनीति और वहाँ के उम्मीदवारों की स्थिति पर निर्भर करता है।
दिल्ली कार ब्लास्ट और आतंकी डॉक्टरों के मॉड्यूल की लगातार गिरफ्तारी के बीच एक हिन्दू डॉक्टर प्रियंका शर्मा से पूछताछ के बाद सोशल मीडिया पर प्रोपेगेंडा फैलाने का दौर शुरू हो गया है। हालाँकि प्रियंका शर्मा को अब छोड़ भी दिया गया है। डॉक्टर प्रियंका के परिजनों के मुताबिक, ये पूछताछ जम्मू कश्मीर पुलिस ने सहारनपुर से गिरफ्तार जिहादी डॉक्टर आदिल अहमद के बारे में जानने के लिए की थी।
लालकिला ब्लास्ट और 2900 किलो विस्फोटक जमा करने के मामले में अल फलाह यूनिवर्सिटी से जुड़े डॉक्टरों के नाम आए। अब तक गिरफ्तार सभी डॉक्टरों के बारे में जो पता चला है, उसके अनुसार ये सभी इस्लामी कट्टरपंथी हैं। ये देश के सरकारी कॉलेजों में पढ़कर, करीब 90 फीसदी सब्सिडी के पैसों से एमबीबीएस और पीजी की डिग्री ली। मानवता की सेवा का प्रण लिया और निकल गए जिहादी बनकर देश को बर्बाद करने के लिए।
इन डॉक्टरों के खिलाफ देशभर में गुस्सा का माहौल है। एक के बाद एक मिल रहे सबूत इन डॉक्टरों के जिहादी होने की कहानी कह रहे हैं। ऐसे में एक हिन्दू डॉक्टर प्रियंका को हिरासत में लेकर की गई पूछताछ के बाद प्रतिक्रिया की बाढ़ आ गई है। दिल्ली ब्लास्ट के बाद आतंकियों से जुड़े इस मामले में पुलिस ने हजारों लोगों को पूछताछ के लिए बुलाया है। जहाँ इन आतंकियों ने काम किया, जहाँ से पढ़ाई की, उन जगहों पर काम करने वाले लोगों से रूटीन पूछताछ की जा रही है। हालाँकि, वे सभी संदिग्ध नहीं माने जा रहे हैं।
वहीं, जब प्रियंका का नाम इसमें आया तो प्रियंका का नाम लेकर सनातन को आतंकवाद से जोड़ कर दिखाने की कोशिश की जा रही है। ये कहा जा रहा है कि सिर्फ मुस्लिम ही आतंकी नहीं होते, हिन्दू भी हो सकते हैं।
जब नाम अरबाज़ हो, फ़र्ज़ी पासपोर्ट मिले और एक बम बरामद हो — तो पूरा मीडिया स्टूडियो हिला देता है। लेकिन जब नाम प्रियंका शर्मा हो, तो अचानक ये ‘लोन वुल्फ’, ‘मेंटल हेल्थ’, ‘साजिश का शिकार’ जैसे शब्द निकल आते हैं!
आतंकी का कोई धर्म नहीं होता — लेकिन मीडिया का रवैया बताता है कि उनके…
एक यूजर ने कहा कि दिल्ली ब्लास्ट में जैसे ही प्रियंका का नाम आया, चैनलों में सन्नाटा पसर गया, हाय रे मुस्लिम एंगल…वही एक दूसरे यूजर ने लिखा कि मुसलमानों से सवाल करते थे,अब क्या करेंगे।
जो यूट्यूबर मुसलमानों के मुँह में माइक घुसेड़ कर सवाल करते थे वो लोग अब सवाल करेंगे? रोहतक की डॉक्टर प्रियंका को गिरफ्तार किया गया, प्रियंका गिरफ्तार डॉक्टरों से जुड़ी हुई थी।#Delhipic.twitter.com/CJsyYo0B2t
दरअसल प्रियंका शर्मा से पूछताछ होते ही उसे दोषी साबित करने की कोशिश होने लगी।
डॉ प्रियंका शर्मा से पूछताछ हुई और अभी तक ऐसी कोई जानकारी नहीं है कि, उसके दिल्ली धमाके में शामिल होने के कोई भी संकेत हों, लेकिन सिर्फ हिन्दू नाम देखकर एक वर्ग दोषी साबित करने को तैयार हो जाता है। https://t.co/gbIh4FyyaO
दरअसल प्रियंका जनरल मेडिसीन में एमडी की पढ़ाई अनंतनाग के गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज से कर रही हैं। जिहादी डॉक्टर आदिल इसी कॉलेज में उसका सीनियर था और उसने जॉब भी ज्वाइन किया था। इसको लेकर ही पुलिस की टीम ने उससे पूछताछ की। फिलहाल प्रियंका का मोबाइल पुलिस के पास है।
प्रियंका के भाई भारत के मुताबिक, रात करीब 9 बजे प्रियंका के साथ वीडियो कॉल पर बात हो रही थी। 5 मिनट बाद प्रियंका के हॉस्टल में पुलिस की टीम पहुँची और गेट खटखटाया। इसके बाद प्रियंका का फोन कट गया। रात करीब 11 बजे प्रियंका के पति डॉक्टर अनिरुद्ध का फोन आया। उन्होंने बताया कि पुलिस ने प्रियंका को हिरासत में ले लिया है। इसके 1 घंटे बाद प्रियंका का फोन आया कि पूछताछ के बाद उसे छोड़ दिया गया है। उसका फोन पुलिस जाँच के लिए लैब भेज रही है।
Rohtak, Haryana: On MD student Dr. Priyanka Sharma custody for questioning related to Delhi's Red Fort bomb blast, Her brother Bharat Bhusan says, "Priyanka is currently working as a medical officer and is pursuing her MD in General Medicine at a government medical college in… pic.twitter.com/q4nnSII6oS
डॉक्टर प्रियंका हरियाणा के रोहतक की रहने वाली हैं। उनके पति भिवानी में सरकारी डॉक्टर हैं। प्रियंका ने एमबीबीएस सोनीपत के खानपुर मेडिकल कॉलेज से किया था। भाई भारत सोनीपत में रोडवेज में क्लर्क है। पिता सतीश शर्मा शुगर मिल की सिक्योरिटी टीम में हैं और माँ हाउस वाइफ हैं।
देवेन्द्र का नाम आने पर भी किए गए थे कमेंट
लालकिला कार विस्फोट में इस्तेमाल की गई i20 कार के मालिक की खोज के दौरान देवेन्द्र सिंह का नाम आया था। दरअसल गुरुग्राम के नंबर HR26 को लेकर जब पुलिस कार मालिक की तलाश कर रही थी और मोहम्मद सलमान से पूछताछ कर रही थी तो उसने कहा था कि डेढ़ साल पहले उसने कार देवेन्द्र सिंह से ली थी। इसके बाद भी सोशल मीडिया पर कोहराम मचा। लेकिन जल्द ही पुलिस ने कार के मालिक अमीर राशिद अली को गिरफ्तार कर लिया।
ठीक इसी तरह देवेन्द्र सिंह को मास्टरमाइंड बताया था जबकि आज NIA ने कार के असल मालिक अमीर राशिद अली को गिरफ्तार कर लिया है। अमीर आत्मघाती हमलावर उमर उन नबी के साथ मिलकर हमले की साजिश रचने में शामिल था। धमाके में जिस कार का इस्तेमाल किया गया था, वह अमीर राशिद अली के नाम से पंजीकृत… https://t.co/eEXHeQKVkfpic.twitter.com/EPotJgoHxI
डॉक्टर प्रियंका को छोड़ दिया गया है। इसको लेकर पुलिस का कोई बयान भी नहीं आया है। जब से इन जिहादी डॉक्टरों के मॉड्यूल का खुलासा हुआ है, यूपी से जम्मू कश्मीर तक धड़पकड़ शुरू हो गई। पूछताछ के बाद एक दूसरे से जुड़े तार का पता चला। लेकिन जैसे ही डॉक्टर प्रियंका से पूछताछ की बात सामने आई, प्रोपेगेंडा फैलाने वालों ने इस्लामी कट्टरपंथ की गंभीरता को कम करने के लिए प्रियंका का नाम लेना शुरू कर दिया। देवेन्द्र सिंह के केस में भी ऐसा ही हुआ था। जब पुलिस ने कार के असल मालिक आमिर अली को गिरफ्तार किया, तब प्रोपेगेंडा फैलाने वाले शांत हुए।
ये लोग तब तक चुप रहे, जब तक डॉक्टर प्रियंका शर्मा, देवेन्द्र सिंह जैसे नाम सामने नहीं आए। इन लोगों ने पहलगाम आतंकी हमले के वक्त भी यही किया था। जब टूरिस्ट आतंकियों के शिकार हुए, तब एक स्थानीय व्यक्ति की मौत होने की खबर भी आई। इसके बाद को प्रोपेगेंडा टीम इस बात को भी झुठलाने में लग गई की पर्यटकों का नाम पूछ-पूछ कर मारा गया। दरअसल सोशल मीडिया पर हो हल्ला मचाने वाले और प्रोपेगेंडा फैलाने वाले लोग अक्सर मरने वालों में एक मुस्लिम नाम ढूंढते हैं और साजिश करने वालों में कोई हिन्दू नाम। ताकि मुस्लिम कट्टरपंथ और आतंकवाद को जोड़ा न जा सके।