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देर से शादी, बच्चे भी नहीं, ‘एग्स फ्रीज’ कर लो… उपासना कोनिडेला जो ज्ञान लड़कियों को दे रहीं, उससे माँ और बच्चे दोनों का भविष्य होता है बर्बाद

अपोलो से जुड़ी और एक्टर राम चरण की पत्नी उपासना कोनिडेला ने महिलाओं को एग्स फ्रिज कर ‘जी लो अपनी जिंदगी’ टाइप-सी सलाह दी है। महिला सशक्तिकरण और आर्थिक आजादी से अलग एक महिला के लिए एक बच्चे को दुनिया में लाना इमोशनल शारीरिक-मानसिक मामला भी है। 45 साल की महिला अगर बच्चे को जन्म देती है, तो बच्चे के शारीरिक मानसिक विकास के साथ-साथ उसके जवान होने पर दुनिया में अकेला पड़ जाने का खतरा भी होता है।

ऐसी सलाह लड़कियों को देना सामाजिक ताने-बाने को भी नुकसान पहुँचाने जैसा है। परिवार, जिसे बच्चों की पहली पाठशाला कहा जाता है, उसके भी खिलाफ है।

आर्थिक तौर पर बात की जाए तो एग फ्रीज करने और उससे बच्चे पैदा करने की पूरी प्रक्रिया में करोड़ों खर्च आते हैं। ये अभिजात्य वर्ग के चोचले हो सकते हैं, आम महिला इसे वहन नहीं कर सकती। अगर किसी ने हिम्मत भी दिखाई, तो इसकी कोई गारंटी नहीं कि बच्चा पैदा हो ही जाएगा। ऐसे में महिला के डिप्रेशन, एन्जाइटी होने का खतरा पैदा हो जाता है।

इसके अलावा डॉक्टर तो महिलाओं को 30 की उम्र तक बच्चा पैदा कर लेने की सलाह देते हैं। इससे बच्चे के स्वस्थ और सुरक्षित दुनिया में आने की संभावना ज्यादा होती है।

क्या कहा उपासना कोनिडेला ने

उपासना कोनिडेला ने अपने X हैंडल पर शेयर किए एक वीडियो में कहा, “महिलाओं के लिए सबसे बड़ा इंश्योरेंस अपने एग्स फ़्रीज़ करना है। क्योंकि तब आप चुन सकती हैं कि कब शादी करनी है, कब बच्चे पैदा करने हैं, अपनी शर्तों पर, कब आप फाइनेंशियली इंडिपेंडेंट हैं।”

कोनिडेला ने साथ वाली पोस्ट में कहा कि जब उन्होंने IIT हैदराबाद के स्टूडेंट्स से पूछा कि उनमें से कितने शादी करना चाहते हैं, तो महिलाओं से ज्यादा पुरुषों ने हाथ उठाए। उन्होंने लिखा, “महिलाएं ज़्यादा करियर-फोकस्ड लग रही थीं। यह नया—प्रोग्रेसिव इंडिया है।”

उनके इस सलाह पर डॉक्टरों से लेकर इन्फ्लुएंसर समेत कई लोगों ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। सोशल मीडिया पर कोई उनका समर्थन कर रहा है तो कोई विरोध में खड़ा है। लेकिन इस बहस के हर पहलू पर बात करने से पहले हम जान लेते हैं कि एग फ्रीज करना होता क्या है?

क्या होता है एग्स फ्रीज करना ?

एग फ्रिजिंग एक तरीका है, जिसमें महिलाएँ अपने एग्स को निकालकर उसे अस्पतालों में फ्रीज करवा सकती है और भविष्य में माँ बनने के लिए इसका इस्तेमाल कर सकती है। जब महिला अपने करियर या दूसरे कारणों से तत्काल माँ बनना नहीं चाहती हैं, लेकिन उन्हें भविष्य में बच्चा भी चाहिए, तो एग फ्रीज करवाती हैं। इसमें काफी खर्च आता है और फ्रीज एग से बच्चे पैदा हो ही जाएँ, इसकी गारंटी नहीं होती। हर महिला का शरीर अलग होता है और उसकी हार्मोनल स्थिति भी अलग होती है।

25-30 साल मानी जाती है एग फ्रीज करने की ‘बेस्ट एज’

एक तो ये प्रक्रिया बहुत शारीरिक और मानसिक रूप से कष्ट देने वाली है। जब एग फ्रीज किया जाता है तो उससे पहले महिला को कई तरह के हॉर्मोन्स एक्टिव करने वाली दवाएँ और इंजेक्शन पड़ते हैं, इसका असर महिला के शरीर पर पड़ता है।

डॉक्टर के मुताबिक, “महिला की फर्टिलिटी बीस की उम्र में सबसे ज़्यादा होती है, तीस की उम्र में कम होती है और 35 के बाद तेजी से गिरती है। एग फ़्रीज़ करना कोई गारंटी नहीं है। यह एक जुआ है जिसमें सक्सेस रेट कम है।”

अगर कोई महिला अपने एग्स फ्रीज भी कर लेती है, तो भी इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि इससे सफल एम्ब्रियो ट्रांसफर और सफल प्रेग्नेंसी होगी। जैसे-जैसे महिला की उम्र बढ़ती है, कई हेल्थ फैक्टर्स होते हैं जो सफल एम्ब्रियो ट्रांसफर और इम्प्लांटेशन को रोकते हैं।

इसके अलावा ये काफी महँगी प्रक्रिया है। इसके लिए शारीरिक-मानसिक और आर्थिक रूप से सक्षम होना जरूरी है। साथ ही ये भी सच है कि ये एक तकनीक है, नेचुरल प्रक्रिया नहीं। एग निकालने के दौरान छोटी सी सर्जरी होती है। हालाँकि अब बड़े-बड़े अस्पतालों में सुरक्षित तरीके से एग फ्रीज कर लिया जाता है। इसके बाद जब आप बच्चा चाहते हैं तो अस्पताल उसे पिघलाता है। और आईवीएफ के लिए उपयोग लायक बनाता है।

एग फ्रीज करने की बेस्ट उम्र 25 से 30 साल मानी जाती है। इसे 10 से 15 साल तक सुरक्षित रखा जा सकता है। यानी 25-30 साल में आप माँ नहीं बनना चाहती हैं, तो 40-45 साल तक माँ बन सकती हैं। ये तो हुई मेडिकल तकनीक, जिससे आप बच्चे पैदा करने की ख्वाइश पूरी कर सकती हैं। लेकिन एक महिला जो अकेले बच्चे को पैदा करना और संभालना चाहती हैं, वह 40-45 साल में माँ बन गई तो कैसे उसकी परवरिश करेगी। इसके अलावा अधिक उम्र में माँ बनने से कई बीमारियों के होने का खतरा होता है।

40-45 की उम्र में माँ बनना कितना मुश्किल?

40 साल के बाद शारीरिक रूप से महिला कमजोर होने लगती है। उसका गर्भाशय बच्चे को 9 महीने तक संभालने की स्थिति में है या नहीं, ये भी काफी महत्वपूर्ण है। अगर दवाईयों और डॉक्टरों की मदद से उसने बच्चे को जन्म दे भी दिया, फिर उसे फीड करना, उसकी देखभाल करना आसान नहीं होता। 40 साल के बाद महिलाओं का शरीर कमजोर पड़ने लगता है। हड्डियाँ को मजबूत करने के लिए डॉक्टर कैल्शियम और विटामिन की गोलियाँ खाने की सलाह देने लगते हैं। ऐसे में बच्चे के पीछे दौड़ना, उसे गोद में उठाना, उसकी अच्छी तरह देखभाल करना आसान नहीं है।

जब बच्चा स्कूल जाने लगता है तो उसके मन में कई सवाल पैदा होते हैं। वह घर पर खुद को अकेला महसूस करने लगता है। इस वक्त उसे पिता की कमी महसूस होती है। जाहिर है माँ कामकाज के लिए बाहर जाएँगी। ऐसे में बच्चे दोस्तों के साथ वक्त गुजारने की कोशिश करते हैं। बच्चा गलत संगत में भी पड़ सकता है।

बच्चे के लिए जीवन ‘एक मुश्किल सफर’ न बन जाए

बच्चा जब स्कूल से कॉलेज में जाने की उम्र में आता है, तब माँ 60 पार कर चुकी होती हैं। रिटायर होकर घर पर बच्चे के साथ होती हैं। लेकिन इस उम्र में बच्चे को गाइड करने वाले के साथ-साथ ऐसे व्यक्ति की जरूरत होती है, जो उसकी पीढ़ी को समझता हो। करियर में सहायक हो और उसकी भविष्य की योजना तैयार करने में मददगार हो। माँ के लिए ये काम आसान नहीं होता। न पिता, न भाई-बहन और न दूसरे रिश्तेदार, बेचारा बच्चा अपने आप में सिमट कर रह जाता है।

जब बच्चा करियर बनाने और शादी की उम्र में आए, तो माँ शायद दुनिया में भी नहीं रहे। क्या दुनियादारी के बीच बच्चे को सामाजिक, मानसिक, आर्थिक हर दृष्टि से अकेला छोड़ देना सही है। ऐसा नौजवान, जिसका दुनिया में कोई नहीं, आखिर वह जाए तो जाए कहाँ। अपने इमोशन को किसके साथ शेयर करे। अगर भविष्य को लेकर कोई फैसला लेना हो, तो किससे पूछे? अगर बच्चे को अपने पिता के बारे में भी पता हो। फिर भी बच्चा हर हाल में अकेला ही रहेगा।

खुद के लिए बच्चे के साथ ‘अन्याय’ न करें

जब कोई महिला ये फैसला लेती है कि उसे शादी नहीं करनी है, तो ठीक है। अगर कोई महिला फैसला लेती है कि उसे शादी करनी है, लेकिन बच्चे पैदा नहीं करना। ये भी चलता है। लेकिन, जानबूझ कर जब महिला अपने जीवन की स्वतंत्रता और आर्थिक सफलता पा जाने के बाद बच्चे पैदा करती है, तो न केवल वह उस बच्चे के साथ अन्याय कर रही है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी नुकसान पहुँचा रही है।

अपने मन मुताबिक खुद की जिंदगी जीने की आजादी सबकी है। आर्थिक और सशक्तिकरण के लिए पूरी कोशिश करें, लेकिन किसी दूसरे व्यक्ति की ‘कीमत’ पर नहीं, जो कि आपका बच्चा है।

लाखों खर्च करने के बाद भी सफलता की गारंटी नहीं

डॉक्टरों का मानना है कि अगर आप करोड़पति हैं और करोड़ों रुपए खर्च करने की स्थिति में हैं, तो ये रिस्क लिया जा सकता है। उनका मानना है कि एग फ्रीजिंग की सलाह देना आसान है लेकिन उसके खर्च को वहन करना उतना ही मुश्किल।

पिछले 30 सालों से गायनोकॉलोजिस्ट के रूप में काम कर रहे डॉक्टर राजेश पारिख ने कहा, “जब आपके बैंक में करोड़ों रुपए हों, तो एग फ़्रीज़िंग पर सलाह देना बहुत आसान है। IVF में हर साइकिल का खर्च लाखों में आता है। एग फ़्रीज़िंग में लाखों पहले से लगते हैं और सालाना स्टोरेज चार्ज भी। उपासना की सलाह सुनने वाली ज्यादातर जवान औरतें एक कोशिश भी नहीं कर सकतीं।”

गायनेकोलॉजिस्ट के मुताबिक, उन्होंने अपने जीवन में कई ऐसे कपल्स देखे हैं, जिनका आईवीएफ सफल नहीं हो पाया। ये कपल्स लगातार फेल हो रहे आईवीएफ के साइकिल, निराशा और बढ़ते बिलों के कारण रोते हुए मिले।

सोशल मीडिया पर हो रही बहस

उपासना कोनिडेला ने 17 नवंबर 2025 को X पर अपनी पोस्ट शेयर की। 18 नवंबर तक 108,000 से ज्यादा बार देखी गईं। महिला सशक्तिकरण के नाम पर कुछ लोगों ने इसकी तारीफ की, वहीं बायोलॉजिकल और आर्थिक पहलू को लेकर सवाल उठाए गए।

कुछ लोगों ने यहाँ तक आरोप लगाया कि अपोलो हॉस्पिटल्स में कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी की वाइस चेयरपर्सन उपासना ने अपोलो अस्पताल की नींव रखी थी। सभी जानते हैं कि अपोलो अस्पताल में एग फ्रीज जैसी सुविधाएँ आसानी से उपलब्ध हैं। ऐसे में कहा जा रहा है कि उपासना ने जानबूझ कर अस्पताल को फायदा पहुँचाने और बाजार बढ़ाने के लिए ‘एग्स फ्रीज’ जैसे मुद्दों पर बात की। दरअसल उपासना ने खुद का उदाहरण देते हुए बातें कही थी।

कौन हैं उपासना कोनिडेला

उपासना अपोलो हॉस्पिटल्स में कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी की वाइस चेयरपर्सन और एक्टर राम चरण की पत्नी हैं। दोनों ने 2012 में शादी की थी। जब उपासना 34 साल की थीं तब 2023 में उनकी बेटी हुई। एक बार फिर राम चरण और उपासना जुड़वाँ बच्चों के स्वागत के लिए तैयार हैं। उपासना ने 23 अक्टूबर को इंस्टाग्राम पर दिवाली पोस्ट करके बताया कि वे प्रेग्नेंट हैं।

उपासना अपोलो जैसी फैमिली हेल्थकेयर एम्पायर का हिस्सा हैं। वह फैमिली हेल्थ प्लान इंश्योरेंस TPA लिमिटेड की मैनेजिंग डायरेक्टर के तौर पर भी काम करती हैं। वह अपोलो लाइफ की वाइस चेयरपर्सन हैं, जो अपोलो ग्रुप की एक वेलनेस-फोकस्ड ब्रांच है।

उन्होंने URLife शुरू किया, जो एक होलिस्टिक वेलनेस प्लेटफॉर्म है जिसका मकसद डिजिटल रिसोर्स के ज़रिए हेल्दी लाइफस्टाइल को बढ़ावा देना है। इसके अलावा उपासना बी पॉजिटिव मैगज़ीन की एडिटर-इन-चीफ भी हैं, जो अपोलो एम्पायर का ही पार्ट है।

‘राज्यपाल-राष्ट्रपति को बिल मंजूरी की समय-सीमा में नहीं बाँध सकते’: SC ने प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर सुनाया ऐतिहासिक फैसला, जानें- कोर्ट ने क्या-क्या कहा

सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की संवैधानिक पीठ (कॉन्स्टिट्यूशनल बेंच) ने गुरुवार (20 नवंबर 2025) को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा भेजे गए प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर अपना ओपिनियन जारी किया। इस 111 पन्नों के फैसले में कोर्ट ने अपना ही अप्रैल 2025 का फैसला पूरी तरह पलट दिया। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि न तो राज्यपाल और न ही राष्ट्रपति को विधानसभा से पारित बिलों पर फैसला लेने के लिए कोई निश्चित समय-सीमा तय की जा सकती है।

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने ‘डीम्ड असेंट’ यानी समय बीतने पर बिल को अपने आप मंजूर मानने की अवधारणा को असंवैधानिक (Unconstitutional) और शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत के विरुद्ध भी घोषित किया।

सुप्रीम कोर्ट के ओपिनियन की शुरुआती लाइन (फोटो साभार: SC)

चीफ जस्टिस बीआर गवई की अगुआई वाली बेंच में जस्टिस सूर्या कांत, विक्रम नाथ, पीएस नरसिम्हा और अतुल एस चंदूरकर शामिल थे। बेंच ने कहा कि संविधान ने अनुच्छेद 200 और 201 में जानबूझकर लचीलापन रखा है। इस लचीलेपन को सख्त समय-सीमा से बाँधना संवैधानिक पदों की स्वतंत्रता पर अतिक्रमण होगा।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की कॉपी का स्क्रीनशॉट

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अहम बातें

समय-सीमा तय करना असंवैधानिक: अप्रैल 2025 के फैसले में 1 महीने से 3 महीने तक की डेडलाइन तय की गई थी। संवैधानिक पीठ ने इसे गलत ठहराते हुए कहा कि संविधान में कम से कम 31 जगहों पर समय-सीमा स्पष्ट लिखी गई है (जैसे राष्ट्रपति चुनाव 30 दिन में, संसद सत्र 6 महीने में आदि)। जहाँ नहीं लिखी गई, वहाँ यह अनजाने में नहीं छोड़ा गया, बल्कि सोच-समझकर छोड़ा गया है।

डीम्ड असेंट का कॉन्सेप्ट खारिज: कोर्ट ने कहा कि अगर समय बीतने पर बिल अपने आप पास हो जाए तो इसका मतलब एक संवैधानिक पद (राज्यपाल/राष्ट्रपति) की जगह दूसरा संवैधानिक पद (न्यायपालिका) ले लेगा। यह शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का सीधा उल्लंघन है।

शक्तियों के बँटवारे पर सुप्रीम कोर्ट

राज्यपाल और राष्ट्रपति के फैसले न्यायिक समीक्षा से बाहर: अनुच्छेद 200 और 201 के तहत लिया गया कोई भी फैसला (मंजूरी देना, रोकना या राष्ट्रपति को भेजना) पूरी तरह गैर-न्यायिक (Non-Justiciable) है। इन्हें कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती। अनुच्छेद 361 भी राष्ट्रपति और राज्यपाल को अपने आधिकारिक कृत्यों के लिए व्यक्तिगत जवाबदेही से मुक्त करता है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की कॉपी

बिल के कानून बनने से पहले अदालत दखल नहीं दे सकती: विधायी प्रक्रिया पूरी होने से पहले (यानी बिल के कानून बनने से पहले) अदालत उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती। कानून बनने के बाद ही उसकी संवैधानिकता पर सवाल उठाया जा सकता है।

अनुचित देरी पर सीमित न्यायिक हस्तक्षेप संभव: यदि देरी ‘अनुचित, बेहिसाब और बिना किसी स्पष्टीकरण के’ हो जाए, तो संवैधानिक अदालत सीमित दखल दे सकती है। अदालत केवल इतना निर्देश दे सकती है कि ‘उचित समय के अंदर फैसला लिया जाए’। वह यह नहीं बता सकती कि फैसला क्या होना चाहिए।

राज्यपाल के काम में दखल नहीं, सिर्फ निर्देश

राज्यपाल के पास केवल तीन विकल्प: मंजूरी देना, मंजूरी रोकना या राष्ट्रपति के पास भेजना। चौथा विकल्प यानी अनिश्चितकाल तक जेब में रखना संभव नहीं है। ऐसा करना संघीय ढाँचे की भावना के खिलाफ होगा।

राज्यपाल सुपर मुख्यमंत्री नहीं: राज्य में दो कार्यपालिकाएँ नहीं चल सकतीं। चुनी हुई सरकार को ड्राइवर की सीट पर रहना है। राज्यपाल ज्यादातर मामलों में मंत्रिपरिषद की सलाह से बँधे हैं, लेकिन कुछ असाधारण मामलों में विवेकाधिकार का उपयोग कर सकते हैं।

संवाद और सहयोग जरूरी: संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को टकराव की जगह संवाद अपनाना चाहिए। राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच बातचीत, मुख्यमंत्री का प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति से मिलना-यही लोकतंत्र का सही रास्ता है।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि अप्रैल 2025 में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच द्वारा तय की गई 1-3 महीने की समय-सीमा और डीम्ड असेंट की व्यवस्था संविधान के मूल ढाँचे के विपरीत थी। उस फैसले में तमिलनाडु के 10 बिलों को बिना राज्यपाल-राष्ट्रपति की मंजूरी के ही कानून घोषित कर दिया गया था, जिसे अब पूरी तरह अवैध ठहराया गया है।

सुप्रीम कोर्ट में प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर क्यों हुई सुनवाई?

बता दें कि मई 2025 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत सुप्रीम कोर्ट को 14 संवैधानिक सवाल भेजे थे। ये सवाल सिर्फ समय-सीमा के नहीं थे, बल्कि पूरे संवैधानिक ढाँचे, शक्तियों के बँटवारे और न्यायपालिका की सीमा से जुड़े थे। राष्ट्रपति द्वारा पूछे गए सवाल-

  1. जब राज्यपाल के पास बिल आता है, तो उनके पास क्या-क्या विकल्प होते हैं?
  2. क्या बिल पर फैसला लेते वक्त राज्यपाल को मंत्रियों की सलाह माननी ही पड़ती है?
  3. क्या राज्यपाल का फैसला कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है?
  4. क्या संविधान का अनुच्छेद 361 कहता है कि राज्यपाल के फैसले को कोर्ट में नहीं ले जाया जा सकता?
  5. जब संविधान में कोई समय-सीमा नहीं है, तो क्या कोर्ट ये तय कर सकता है कि राज्यपाल को कब तक फैसला लेना है?
  6. क्या राष्ट्रपति का फैसला भी कोर्ट में चुनौती दी जा सकता है?
  7. क्या कोर्ट ये बता सकता है कि राष्ट्रपति को बिल पर कब और कैसे फैसला लेना है?
  8. अगर राज्यपाल कोई बिल राष्ट्रपति को भेजता है, तो क्या राष्ट्रपति को सुप्रीम कोर्ट से राय लेनी पड़ती है?
  9. क्या बिल के कानून बनने से पहले कोर्ट उसमें दखल दे सकता है?
  10. क्या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत राष्ट्रपति या राज्यपाल के फैसले को बदल सकता है?
  11. क्या बिना राज्यपाल की मंजूरी के विधानसभा से पास बिल कानून बन सकता है?
  12. क्या संविधान कहता है कि बड़े कानूनी सवालों को पाँच जजों की बेंच को भेजना जरूरी है?
  13. क्या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत ऐसा आदेश दे सकता है जो संविधान या कानून के खिलाफ हो?
  14. क्या केंद्र और राज्य सरकारों के बीच झगड़े सिर्फ अनुच्छेद 131 के तहत ही सुलझाए जा सकते हैं या कोर्ट के पास और भी रास्ते हैं?

राष्ट्रपति ने यह रेफरेंस तमिलनाडु मामले में आए अप्रैल 2025 के फैसले के बाद भेजा था, जिसमें राज्यपालों और राष्ट्रपति की शक्तियों को सीमित करने की कोशिश की गई थी।

सुप्रीम कोर्ट में चली लंबी सुनवाई, केंद्र सरकार ने भी दी दलील

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के लिए संवैधानिक पीठ का गठन किया था। जिसमें जून से अक्टूबर 2025 तक दस दिन सुनवाई चली। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और एटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने पैरवी की। इसमें सरकार की तरफ से कुछ अहम दलीलें दी गई, जिसमें-

  • संविधान में कम से कम 31 स्थानों पर समय-सीमा स्पष्ट लिखी गई है। जहाँ नहीं लिखी, वहाँ जानबूझकर लचीलापन छोड़ा गया है।
  • राज्यपाल और राष्ट्रपति संवैधानिक पद हैं। एक संवैधानिक संस्था दूसरी को आदेश नहीं दे सकती।
  • यदि राज्यपाल बिल रोक रहे हैं तो इसका समाधान राजनीतिक है- मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति से मिलें, बात करें। हर समस्या का न्यायिक समाधान नहीं हो सकता।

तमिलानाडु मामले की वजह से बढ़ा विवाद

साल 2023 से कई राज्यों में कथित तौर पर राज्यपालों और सरकारों के बीच टकराव बढ़ा। इसमें तमिलनाडु में राज्यपाल आरएन रवि ने 12 बिलों को महीनों तक रोके रखा। केरल, पंजाब, तेलंगाना में भी यही स्थिति रही। राज्य सरकारों का तर्क था कि राज्यपाल रबर स्टैंप नहीं बल्कि अड़ंगा बन रहे हैं।

  1. इस मामले में तमिलनाडु सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुँची थी। जिसमें 8 अप्रैल 2025 को सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने तमिलनाडु सरकार के पक्ष में फैसला देते हुए 3 अहम बातें कही थी, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने-
  2. राज्यपालों को 1-3 महीने की समय-सीमा में बाँध दिया था।
  3. सुप्रीम कोर्ट ने डीम्ड असेंट की व्यवस्था बना दी थी।
  4. इसके साथ ही तमिलनाडु असेंबली में पास हुए 10 बिलों को सीधे कानून घोषित कर दिया

इस फैसले से हंगामा मच गया। इसे न्यायिक अतिक्रमण करार दिया गया। इस संवैधानिक संकट की स्थिति में पारदर्शिता की और कानूनों पर सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या के लिए ही राष्ट्रपति ने 14 सवालों वाला रेफरेंस सुप्रीम कोर्ट के पास भेजा था।

अनुच्छेद 200 और 201 क्या कहते हैं?

अनुच्छेद 200: विधानसभा से पारित बिल राज्यपाल के पास जाता है। राज्यपाल के पास तीन विकल्प हैं- मंजूरी देना, मंजूरी रोकना या राष्ट्रपति के पास भेजना। पहली बार रोकने पर विधानसभा दोबारा विचार करके भेज सकती है, तब मंजूरी देनी ही पड़ती है।

कोर्ट के फैसले की कॉपी में अनुच्छेद 200 का रेफरेंस

अनुच्छेद 201: राज्यपाल से राष्ट्रपति को भेजा गया बिल राष्ट्रपति मंजूर कर सकते हैं, रोक सकते हैं या वापस भेज सकते हैं। इसमें समय-सीमा का कोई उल्लेख नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने केशवानंद भारती (1973) के सिद्धांत को दोहराया कि शक्तियों का पृथक्करण संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है। न्यायपालिका विधायी प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं कर सकती। राज्यपाल संघ और राज्य के बीच सेतु हैं, न कि राज्य सरकार के अधीनस्थ। बाबासाहेब अंबेडकर ने कहा था कि भारत का संघीय ढाँचा ‘केंद्र की ओर झुका हुआ’ है ताकि देश की एकता बनी रहे।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला दशकों तक संवैधानिक व्याख्या का आधार बनेगा। कई कानूनी विशेषज्ञ इसे ‘संविधान की जीत’ और ‘लोकतंत्र की परिपक्वता’ का प्रमाण बता रहे हैं। जिसमें राष्ट्रपति ने संवैधानिक तरीके से सवाल उठाया और सुप्रीम कोर्ट ने अपने पिछले फैसले की गलती को सुधारते हुए सभी बिंदुओं की विस्तार से व्याख्या की।

अमेरिका से जैवलिन मिसाइल और आर्टिलरी खरीद रहा भारत, US कॉन्ग्रेस ने मंजूर की $93M की डील: जानें- दुश्मन के टैंक से लेकर ठिकाने तक कैसे होंगे ध्वस्त

अमेरिका ने भारत के लिए 93 मिलियन डॉलर (लगभग 822 करोड़ रुपए) के रक्षा सौदे को मंजूरी दे दी है। इस पैकेज में भारत को 100 FGM-148 जेवलिन एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलें, 25 लाइटवेट कमांड लॉन्च यूनिट्स (CLU) और 216 M982A1 एक्सकैलिबर प्रिसिजन-गाइडेड आर्टिलरी राउंड्स मिलेंगे।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, डिफेंस सिक्योरिटी कोऑपरेशन एजेंसी (DSCA) ने अमेरिकी कॉन्ग्रेस को इसकी सूचना दे दी है। सौदे में ट्रेनिंग, स्पेयर पार्ट्स, लाइफसाइकल सपोर्ट, सिमुलेशन राउंड्स और तकनीकी सहायता भी शामिल है।

अमेरिका ने क्या कहा?

DSCA का कहना है कि यह सौदा न सिर्फ भारत की सैन्य क्षमता को मजबूत करेगा, बल्कि अमेरिका-भारत रणनीतिक साझेदारी को भी और गहरा बनाएगा। एजेंसी के मुताबिक, ये हथियार भारत को मौजूदा और भविष्य की सुरक्षा चुनौतियों से निपटने, अपनी सीमाओं की बेहतर रक्षा करने और क्षेत्रीय खतरों को प्रभावी ढंग से रोकने में मदद करेंगे।

अमेरिका ने साफ किया है कि इस बिक्री से क्षेत्रीय सैन्य संतुलन पर कोई असर नहीं पड़ेगा। साथ ही, किसी ऑफसेट व्यवस्था की जानकारी नहीं है। ऐसा कोई समझौता भविष्य में भारत और निर्माता कंपनियों के बीच अलग से किया जा सकता है।

जेवलिन मिसाइल सिस्टम, जिसे आरटीएक्स और लॉकहीड मार्टिन संयुक्त रूप से बनाते हैं, पैदल सेना को लंबी दूरी पर बख्तरबंद लक्ष्यों को सटीकता के साथ निशाना बनाने की क्षमता देता है। एक्सकैलिबर आर्टिलरी राउंड्स की कीमत करीब 47 मिलियन डॉलर है, जिसे शामिल करने के बाद पूरी डील का मूल्य लगभग 93 मिलियन डॉलर तक पहुँचता है।

क्या है हथियारों की खासियत

FGM-148 जेवलिन एक आधुनिक, कंधे से दागी जाने वाली थर्ड-जेनेरेशन एंटी-टैंक मिसाइल है, जिसे RTX कॉरपोरेशन और लॉकहीड मार्टिन मिलकर बनाते हैं। यह मिसाइल टॉप-अटैक मोड में ऊपर से वार करती है, जहाँ किसी भी टैंक का कवच सबसे कमजोर होता है। इसके कारण यह दुश्मन के बख्तरबंद वाहनों को आसानी से निशाना बना लेती है।

जेवलिन में सॉफ्ट-लॉन्च तकनीक होती है, जिससे इसे इमारतों, बंकरों या किसी बंद जगह के अंदर से भी सुरक्षित तरीके से दागा जा सकता है। एक जैवलिन सिस्टम में एक डिस्पोजेबल लॉन्च ट्यूब और एक रीयूजेबल कमांड लॉन्च यूनिट (CLU) होती है। यह व्यवस्था सैनिकों को तेजी से मिसाइल तैनात करने और फायर करने में मदद करती है।

यह मिसाइल कई युद्ध क्षेत्रों में अपनी क्षमता साबित कर चुकी है, सबसे ज्यादा चर्चा यूक्रेन में हुई, जहाँ इसने बड़ी संख्या में रूसी T-72 और T-90 टैंकों को नष्ट किया। आज यह कई देशों की सेनाओं में सक्रिय रूप से इस्तेमाल की जा रही है।

वहीं Excalibur गोले भारतीय तोपखाने को GPS-आधारित बेहद सटीक निशाना लगाने की क्षमता देते हैं। इससे पहले ही वार में लक्ष्य भेदने की संभावना बढ़ती है और अनचाहे नुकसान (collateral damage) कम होता है।

DSCA ने बताया है कि इस सौदे में प्राइमर, प्रोपेलेंट चार्ज, Portable Electronic Fire Control Systems (PEFCS), Improved Platform Integration Kit (iPIK), तकनीकी सहायता, डेटा, और मरम्मत सेवाएँ भी शामिल हैं।

जेवलिन मिसाइल: आधुनिक युद्ध की सबसे भरोसेमंद ATGM

जेवलिन को दुनिया की सबसे घातक एंटी-टैंक मिसाइल प्रणाली माना जाता है। इसकी लगभग 4 किमी की रेंज और 90% से अधिक की सफलता दर इसे खास बनाती है। इसका ‘फायर-एंड-फॉरगेट’ फीचर सैनिक को लॉन्च के बाद तुरंत सुरक्षित स्थान बदलने की सुविधा देता है।

साथ ही इसका टॉप-अटैक मोड टैंकों को ऊपर से निशाना बनाता है, जहाँ उनकी सबसे कमजोर कवच परत होती है। इन खूबियों के कारण भारतीय सेना को दुश्मन के बख्तरबंद वाहनों के खिलाफ महत्वपूर्ण बढ़त मिलती है।

M982 Excalibur: प्रिसिजन आर्टिलरी का गेम-चेंजर

आर्टिलरी सिस्टम की वास्तविक ताकत उसकी मारक दूरी और वारहेड की क्षमता पर निर्भर करती है। Excalibur इन दोनों में बेहतरीन है। GPS-गाइडेंस के कारण यह सामान्य गोले की तरह बिखरकर नहीं गिरता, बल्कि बेहद सटीक बिंदु पर प्रहार करता है।

इसका हाई-एक्सप्लोसिव ब्लास्ट-फ्रेगमेंटेशन वारहेड मजबूत किलाबंदी, भूमिगत बंकर और मोटी कंक्रीट संरचनाओं को भी ध्वस्त कर सकता है। इसके अलावा, इसमें सेंसर-फ्यूज़्ड वारहेड का विकल्प मिलता है जो ऊपर से हमला करके टैंकों को नष्ट करता है।

क्लस्टर-टाइप बमलेट लगाने का विकल्प इसे बड़े क्षेत्र में नुकसान पहुँचाने में सक्षम बनाता है, खासकर दुश्मन की आर्टिलरी, सपोर्ट वाहनों और आगे बढ़ती टुकड़ियों के खिलाफ। सबसे खास बात यह है कि Excalibur छिपी हुई छोटी लेकिन खतरनाक टीमों, जैसे स्नाइपर, मशीन गन पोजिशन या ATGM लॉन्च टीम पर भी बेहद सटीक वार कर सकता है, जो आधुनिक युद्ध में निर्णायक साबित होता है।

राम मंदिर-बाबरी विवाद-बुलडोजर एक्शन, दिल्ली दंगे और भी बहुत कुछ: USCIRF की 2025 रिपोर्ट में भारत और हिंदुओं पर निशाना, मुस्लिमों को बताया ‘शांतिदूत’

हर साल यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलिजियस फ्रीडम (USCIRF) एक रिपोर्ट जारी करता है, जिसे वह दुनिया में धार्मिक स्वतंत्रता का ‘स्वतंत्र आँकलन’ बताता है। लेकिन असल में यह रिपोर्ट अक्सर एक निष्पक्ष मूल्यांकन से ज्यादा एक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल होती है।

इसका निशाना ज्यादातर वे देश बनते हैं, जो अमेरिका की रणनीतिक पसंद या उसके वैचारिक दबावों से पूरी तरह सहमत नहीं होते। भारत, जो 1.4 अरब लोगों का एक सभ्यतागत लोकतंत्र है, ऐसे निशानों में अक्सर शामिल रहा है।

इस साल भी USCIRF ने भारत को ‘Countries of Particular Concern (CPC)’ की सूची में डाल दिया और यहाँ तक कि अमेरिका को भारत के लिए अपने हथियार सौदों की समीक्षा करने की सलाह भी दी।

इसके राजनीतिक इरादे साफ दिखते हैं। वॉशिंगटन भारत के रूस से तेल खरीदने से नाराज है। यह बात खुद में विडंबनापूर्ण है, क्योंकि अमेरिका खुद भी रूस के साथ व्यापार जारी रखता है। इसी माहौल में USCIRF की 2025 की रिपोर्ट सामने आती है, जो समझदारी या संतुलन से ज्यादा उसकी गलतियों और पक्षपात के लिए ध्यान आकर्षित करती है।

USCIRF ने राम मंदिर के ऐतिहासिक तथ्यों को जानबूझकर मिटाया

USCIRF रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा अयोध्या में हुए राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा समारोह का जिक्र है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि प्रधानमंत्री मोदी ने उस मंदिर का उद्घाटन किया जो ‘बाबरी के खंडहरों पर बनाया गया है’, मानो यह किसी तरह का बहुसंख्यकवादी प्रदर्शन हो।

जबकि यह समारोह एक लंबे और जटिल विवाद के कानूनी समाधान का परिणाम था, जिसे भारत के सुप्रीम कोर्ट ने विस्तृत सुनवाई के बाद तय किया था। रिपोर्ट इस तथ्य को नजरअंदाज कर देती है कि पुरातात्त्विक और ऐतिहासिक सबूत साफ तौर पर दिखाते हैं कि बाबरी ढाँचा एक पुराने हिंदू मंदिर के अवशेषों पर बनाया गया था।

पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की खुदाई, ब्रिटिश काल के रिकॉर्ड और राष्ट्रीय अभिलेखागार में मौजूद दस्तावेज सभी इस जगह को ‘मस्जिद-ए-जन्मस्थान’ के रूप में दर्ज करते हैं। मुगल काल के निर्माण के बाद भी हिंदू लगातार वहीं पूजा करते रहे, जिससे यह स्थान श्रीराम जन्मभूमि की पहचान बनाए रहा।

2019 के सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले में दशकों की सुनवाई और सभी साक्ष्यों को तौलने के बाद जमीन हिंदू पक्ष को दी गई। ऐसे में USCIRF का यह संकेत देना कि यह समारोह किसी तरह का गलत कार्य था, भारत की संवैधानिक संस्थाओं को हल्के में लेने जैसा है।

क्या संगठन यह मानता है कि भारत की लोकतांत्रिक सरकार और सुप्रीम कोर्ट अपने ही घरेलू मामलों को न्यायपूर्वक नहीं सुलझा सकते? या फिर USCIRF खुद को भारत के इतिहास और सभ्यता से अधिक जानकार समझता है?

दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों को छुपाना: कट्टरपंथियों को शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों में बदलना

यह रिपोर्ट 2020 के दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों की घटनाओं को भी तोड़-मरोड़कर पेश करने की कोशिश करती है। इसमें कहा गया है कि उमर खालिद, शरजील इमाम और मीरन हैदर को सिर्फ इसलिए जेल में रखा गया है क्योंकि वे CAA के खिलाफ ‘शांतिपूर्ण प्रदर्शन’ कर रहे थे। यह दावा न सिर्फ गलत है, बल्कि भ्रामक भी है।

फरवरी 2020 में दिल्ली में हुई हिंसा, जिसमें 50 से ज्यादा लोगों की मौत हुई और कई सौ लोग घायल हुए, अचानक भड़की भीड़ का नतीजा नहीं थी। यह हिंसा एक सोच-समझकर रची गई साजिश का हिस्सा थी, जिसे एक महत्वपूर्ण विदेशी दौरे के दौरान अंजाम दिया गया ताकि भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदा किया जा सके।

आरोपपत्र में उमर खालिद की एक प्रमुख साजिशकर्ता के रूप में पहचान की गई है, जिसमें उनके कॉल रिकॉर्ड, बातचीत के ट्रांसक्रिप्ट, मीटिंगों के सबूत और गवाहियों के आधार पर बताया गया है कि हिंसा की योजना कैसे बनाई गई।

शरजील इमाम का वह रिकॉर्डेड भाषण, जिसमें वह भारत के संवेदनशील चिकन नेक सिलीगुड़ी कॉरिडोर को बंद करने की बात करता है, साफ दिखाता है कि उसका आंदोलन सिर्फ विरोध नहीं बल्कि अलगाववादी सोच से प्रेरित था।

ऐसे लोगों को ‘निरपराध शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी’ बताना न सिर्फ दंगों के पीड़ितों का अपमान है, बल्कि यह भी दिखाता है कि USCIRF किस हद तक जाकर ऐसे व्यक्तियों की छवि सुधारने की कोशिश कर रहा है, जिनकी गतिविधियाँ किसी भी तरह शांतिपूर्ण विरोध की सीमा में नहीं आतीं।

बुल्डोजर झूठ: कानून प्रवर्तन को सांप्रदायिक उत्पीड़न के रूप में विकृत करना

USCIRF का यह दावा भी भ्रामक है कि भारत ने मुस्लिमों की संपत्तियाँ, जिनमें मस्जिदें भी शामिल हैं, इसलिए तोड़ीं क्योंकि वे मुस्लिम-मालिकाना थीं। हकीकत इससे बिल्कुल अलग है।

देश के कई राज्यों, दिल्ली, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड आदि में हुई तोड़फोड़ कार्रवाई गैर-कानूनी कब्जों के खिलाफ थी, जैसे सरकारी जमीन, नदी के किनारे, फुटपाथ या अन्य सार्वजनिक स्थानों पर बनी अवैध इमारतें।

इन कार्रवाइयों का धर्म या पहचान से कोई लेना-देना नहीं था, उद्देश्य केवल जमीन उपयोग के नियमों का पालन करवाना और जन सुरक्षा सुनिश्चित करना था। कई मामलों में तो मस्जिद समितियों ने खुद स्वीकार किया कि कुछ हिस्से वाकई अतिक्रमण पर बने थे और वे उन्हें स्वयं हटाने के लिए भी तैयार थे।

लेकिन USCIRF ने इन तथ्यों को नजरअंदाज करते हुए एक सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई को साम्प्रदायिक साजिश की तरह दिखाने की कोशिश की। जबकि वास्तविकता यह है कि ऐसे नियम सभी पर समान रूप से लागू होते हैं, धर्म चाहे कोई भी हो।

धर्मांतरण विरोधी कानून: USCIRF का जमीनी हकीकत को स्वीकार करने से इनकार

USCIRF की रिपोर्ट में किए गए आरोप भारत के धर्म-परिवर्तन विरोधी कानूनों को भी गलत तरीके से प्रस्तुत करते हैं। ये कानून देश के कई राज्यों ने बनाए हैं और ये सभी अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं वाले राज्यों में लागू हैं।

इनका उद्देश्य किसी की धार्मिक स्वतंत्रता छीनना नहीं, बल्कि धोखे, दबाव, लालच या शोषण के जरिये होने वाले मजबूरन धर्म-परिवर्तनों को रोकना है। कई जगहों पर दर्ज FIR, शिकायतें और लोगों की गवाही इस तरह की गतिविधियों के बढ़ने की पुष्टि भी करती हैं।

भारत के ये कानून स्वैच्छिक धर्म-परिवर्तन पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाते, बल्कि केवल जबरदस्ती और धोखाधड़ी पर रोक लगाते हैं। साथ ही, भारत की संघीय व्यवस्था राज्यों को यह अधिकार देती है कि वे अपने-अपने हालात के हिसाब से ऐसे कानून बना सकें ताकि स्थानीय समस्याओं को प्रभावी तरीके से नियंत्रित किया जा सके।

हाल के वर्षों में मिशनरी गतिविधियों में नई-नई छलपूर्ण रणनीतियों के इस्तेमाल से कमजोर और गरीब तबकों में जबरन या लालच देकर धर्म-परिवर्तन की शिकायतें काफी बढ़ी हैं। इसके बावजूद USCIRF इस पूरे मुद्दे को केवल ‘अल्पसंख्यकों के खिलाफ अभियान’ बताकर पेश करती है।

वह न तो पीड़ितों की गवाही पर ध्यान देती है और न ही उन समुदायों की चिंताओं पर, जो ऐसे धर्म-परिवर्तन रैकेट्स से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। यह दिखाता है कि USCIRF भारत की वास्तविक सामाजिक परिस्थिति और जमीनी सच्चाइयों को समझने की इच्छा ही नहीं रखती।

गौरक्षा: USCIRF की सांस्कृतिक संदर्भ के प्रति जानबूझकर की गई अनदेखी

यह रिपोर्ट गाय-संरक्षण कानूनों की आलोचना करते हुए भी वही बात दिखाती है, भारत की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को समझने की अनिच्छा। भारत में गाय सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि सभ्यतागत और संवैधानिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। संविधान के निदेशक सिद्धांतों में स्पष्ट रूप से गायों की सुरक्षा का उल्लेख है।

जिस तरह पश्चिमी देशों में कुछ जानवरों, जैसे घोड़े, कुत्ते या व्हेल, का सेवन सांस्कृतिक कारणों से नियंत्रित या प्रतिबंधित होता है, उसी तरह भारत में गाय-संरक्षण कानून समाज की गहरी परंपराओं और भावनाओं को दर्शाते हैं।

लेकिन USCIRF अपनी वैचारिक सोच के कारण इस सांस्कृतिक संदर्भ को समझने में असफल रहती है। वह इन कानूनों को सीधे-सीधे ‘बहुसंख्यकवाद’ का हथियार बताती है, जिससे उसके सांस्कृतिक भ्रम का पता चलता है, भारत की वास्तविकता का नहीं।

यह रिपोर्ट विचारधारा से प्रेरित है, साक्ष्य से नहीं

2025 की USCIRF रिपोर्ट की सबसे बड़ी कमजोरी सिर्फ उसकी गलतियों में नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपी सोच में है। हर साल यह आयोग अमेरिका की विदेश-नीति वाली चिंताओं को ही दोहराता है, वह उन देशों की आलोचना करता है जो अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखते हैं, लेकिन अमेरिका के पसंदीदा देशों में होने वाले उल्लंघनों को नजरअंदाज कर देता है।

भारत पर उसकी टिप्पणी किसी निष्पक्ष समीक्षा जैसी नहीं लगती, बल्कि ऐसे कार्यकर्ताओं की लिखी हुई लगती है जो भारत की बहुलतावादी सभ्यता को न समझते हैं और न सम्मान देते हैं। वह भारत से अमेरिकी तरह का सेक्युलरिज्म अपनाने की माँग करता है, जबकि भारत का असली सेक्युलरिज्म सभी धर्मों के समान सम्मान पर आधारित है, न कि बहुसंख्यक समाज को अदृश्य बनाने पर।

यह रिपोर्ट धार्मिक स्वतंत्रता का निष्पक्ष सर्वे नहीं, बल्कि एक राजनीतिक दस्तावेज जैसी लगती है। यह चुनिंदा आरोपों और पक्षपाती भाषा के जरिए भारत की अदालतों, चुनी हुई सरकारों और कानून व्यवस्था को कमजोर दिखाने की कोशिश करती है। धार्मिक आजादी के नाम पर USCIRF वास्तव में दुनिया के सबसे विविध लोकतंत्रों में से एक भारत की संप्रभुता और सांस्कृतिक अधिकारों में दखल देता दिखता है।

2024 और 2023 की रिपोर्टें USCIRF के बहु-वर्षीय दुष्प्रचार अभियान का खुलासा करती हैं

2025 की USCIRF रिपोर्ट कोई अलग घटना नहीं है। यह सिर्फ उसी रुझान का अगला हिस्सा है, जो 2023 और 2024 की USCIRF और अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट की रिपोर्टों में भी साफ दिखाई देता है।

2024 की रिपोर्ट भी लगभग उसी पैटर्न पर बनी थी। उसमें कहा गया था कि भारत में धार्मिक स्वतंत्रता खराब हो रही है, चुनावों के दौरान नफरत भरे भाषणों के दावे दोहराए गए थे और फिर वही मुद्दे उठाए गए थे, बुलडोजर कार्रवाई, धर्मांतरण-निरोधक कानून और गौ-संरक्षण कानून।

रिपोर्ट ने यहाँ तक सुझाव दिया था कि भारत को ‘Country of Particular Concern (CPC)’ घोषित किया जाए और उस पर प्रतिबंध लगाने पर विचार हो ठीक वही बातें जिन्हें 2025 की रिपोर्ट और ज़ोर देकर दोहराती है। भारत ने उस रिपोर्ट को पूरी तरह खारिज कर दिया था और कहा था कि USCIRF मानवाधिकारों के नाम पर राजनीतिक एजेंडा चला रही है।

2023 की रिपोर्ट पर भारत का जवाब और भी कड़ा था। जून 2024 में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इस रिपोर्ट को ‘गहरी पूर्वाग्रही,’ ‘वोट-बैंक आधारित’ और ‘तथ्यों की चुनिंदा और गलत व्याख्या’ बताया था। उन्होंने कहा था कि रिपोर्ट ने भारत के संवैधानिक प्रावधानों, कानूनों और यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर भी सवाल खड़े किए, जो किसी भी संप्रभु लोकतंत्र के लिए अस्वीकार्य है।

जायसवाल ने यह भी बताया था कि USCIRF भारत के FCRA और विदेशी फंडिंग नियमों की आलोचना करती है, जबकि अमेरिका में ऐसे नियम भारत से भी ज्यादा सख्त हैं। उन्होंने यह भी याद दिलाया था कि जबकि अमेरिका भारत पर नफरत-अपराध और धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर आरोप लगाता है, भारत कई बार अमेरिकी जमीन पर भारतीय मूल के लोगों पर नस्लीय हमलों, मंदिरों पर हमलों, घृणा-अपराधों और पुलिस द्वारा की गई ज्यादतियों का रिकॉर्ड साझा कर चुका है, लेकिन USCIRF ने इन पर कभी गंभीरता से ध्यान नहीं दिया। यह चुप्पी बहुत कुछ कहती है।

कुल मिलाकर, 2023, 2024 और 2025 की रिपोर्टें एक ही प्रवृत्ति दिखाती हैं, USCIRF हर साल लगभग उन्हीं सीमांत कार्यकर्ताओं, दंगों के आरोपितों, अलगाववादी समर्थकों और माओवादी-संबंधित व्यक्तियों को ‘पीड़ितों’ के रूप में पेश करता है।

वही आरोप साल-दर-साल दोहराए जाते हैं, बस शब्द बदल जाते हैं। भारत के कानूनों, सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक परंपराओं को अमेरिकी शैक्षणिक दुनिया के चश्मे से देखा जाता है और CPC टैग को एक राजनयिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है, न कि भारत की स्थिति का संतुलित या तथ्य-आधारित आँकलन देने की कोशिश की जाती है।

भारत को बदनाम करने का वर्षों पुराना अभियान

2025 का USCIRF रिपोर्ट सिर्फ पक्षपाती नहीं है; यह भारत की छवि को लगातार खराब दिखाने की एक लंबी मुहिम का नतीजा है। कई सालों से यह संगठन बार-बार वही आरोप दोहरा रहा है, पुराने और अविश्वसनीय स्रोतों पर भरोसा कर रहा है, कोर्ट के फैसलों को नजरअंदाज कर रहा है और भारत के सांस्कृतिक संदर्भ को समझने की कोशिश ही नहीं करता।

ऐसी स्थिति में समस्या भारत में नहीं, बल्कि उस संस्था में है जो मूल्यांकन कर रही है। सच्चाई यह है कि USCIRF भारत में धार्मिक स्वतंत्रता का निष्पक्ष आँकलन नहीं कर रहा है, वह एक तयशुदा कहानी गढ़ रहा है। और इसी वजह से उसके निष्कर्षों की विश्वसनीयता अब बेहद संदिग्ध हो चुकी है।

यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में जिनित जैन ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

SIR के डर से भारत छोड़ बांग्लादेश जाने वालों की लगी कतार, बंगाल बॉर्डर पर पहुँचे सैकड़ों घुसपैठिए: जिसे बताया गया ‘वोट चोरी’ का तरीका, वही बन गया घुसपैठियों का काल

देश में एक बार फिर यह बहस तेज हो गई है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और राजनीतिक स्वार्थ में से क्या ज़्यादा जरूरी है। चुनाव आयोग द्वारा चलाई जा रही मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) प्रक्रिया के डर से, हजारों अवैध बांग्लादेशी नागरिक अपना बोरिया-बिस्तर लेकर देश छोड़कर भाग रहे हैं। पश्चिम बंगाल के हाकिमपुर बॉर्डर पर 500 से अधिक लोग फँसे हुए हैं, क्योंकि बांग्लादेश के अधिकारी उन्हें वापस नहीं आने दे रहे हैं।

विडंबना यह है कि जिस SIR प्रक्रिया को लेकर विपक्षी दलों ने सुप्रीम कोर्ट से लेकर संसद तक भारी हंगामा किया और ‘लोकतंत्र पर हमला’ बताया, आज वही प्रक्रिया बिना किसी विवाद के देश से अवैध घुसपैठियों को बाहर निकाल रही है।

घुसपैठियों का ‘उल्टा पलायन’: SIR ने दिखाया आईना

पश्चिम बंगाल के हाकिमपुर बॉर्डर आउटपोस्ट पर पिछले कुछ दिनों से असामान्य हलचल देखी जा रही है। लोगों का समूह, जिनमें महिलाएँ और बच्चे भी शामिल हैं जल्दबाजी में अपने घर छोड़कर बांग्लादेश लौटने की कोशिश कर रहे हैं। BSF अधिकारी इसे ‘रिवर्स एक्सोडस’ या ‘उल्टा पलायन’ कह रहे हैं। ये वे लोग हैं जो कई सालों से कोलकाता के उपनगरों जैसे हावड़ा, न्यू टाउन और साल्ट लेक में छिपकर रह रहे थे।

इन भागने वाले लोगों के बयान खुद उनकी अवैधता साबित करते हैं। अब्दुल मोमिन नाम के एक अवैध प्रवासी ने बताया कि वह एक दलाल को पैसे देकर भारत आया था। उसने कहा, “जब SIR शुरू हुआ तो डर लगने लगा।” वहीं, एक अन्य महिला तकलीमा खातून ने कहा कि वह एक दशक से घरेलू सहायक का काम कर रही थी, लेकिन ‘मेरे पास कोई दस्तावेज नहीं हैं। अब मैं सतखीरा (बांग्लादेश) लौटना चाहती हूँ।’ उनके इस डर की असली वजह यही है कि उनके पास भारतीय नागरिकता का कोई कानूनी सबूत नहीं है।

BSF ने इन लोगों को भारत की सीमा में वापस आने से रोक दिया है, जबकि बांग्लादेश बॉर्डर गार्ड (BGB) उन्हें अपने देश में घुसने नहीं दे रहे। नतीजतन, 500 से ज़्यादा लोग जीरो लाइन पर फँसकर रह गए हैं। यह घटना स्पष्ट करती है कि SIR, CAA और NRC जैसी प्रक्रियाएँ देश की सुरक्षा और अवैध लोगों की पहचान के लिए कितनी जरूरी हैं।

विपक्ष का हंगामा: ‘वोट चोरी’ का शोर और राजनीतिक हथकंडे

SIR प्रक्रिया, जो कानूनी रूप से मतदाता सूची को शुद्ध करने के लिए चलाई जाती है, उसे विपक्षी दलों ने ‘लोकतांत्रिक अधिकारों पर सीधा हमला’ बताया। बिहार में यह प्रक्रिया शुरू होते ही विपक्ष ने चालें चलना शुरू कर दिया। उन्होंने पटना हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक इस पर रोक लगाने की माँग की, हालाँकि कोर्ट ने SIR पर रोक लगाने से मना कर दिया।

विपक्षी दलों ने चुनावी रैलियों में इस प्रक्रिया के खिलाफ गलत जानकारी फैलाई। राहुल गाँधी ने अपनी ‘वोटर अधिकार यात्रा’ के दौरान SIR को मुख्य मुद्दा बनाया और इसे ‘चुनावी धोखा’ और ‘वोट चोरी की साजिश’ करार दिया।

राहुल गाँधी ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग सरकार के दबाव में काम कर रहा है। तमिलनाडु में सीएम स्टालिन ने भी इसे वोट चुराने की योजना बताया। यह पूरा विरोध केवल राजनीतिक माहौल खराब करने और सत्य से ध्यान भटकाने के लिए था।

विरोधाभास देखिए, जिस विपक्ष ने SIR को ‘साजिश’ बताया, वह आज तक एक भी लिखित शिकायत दर्ज नहीं करा पाया कि किसी वैध मतदाता का नाम जानबूझकर गलत तरीके से हटाया गया हो। उनका असली मकसद मतदाता सूची की शुद्धता नहीं, बल्कि चुनावी माहौल में आयोग की साख पर चोट करना है। वे जानते हैं कि अवैध घुसपैठियों को वोटर लिस्ट से बाहर करने पर उनका वोट बैंक खतरे में आ जाएगा।

SIR: लोकतंत्र की शुद्धि और सच की जीत

चुनाव आयोग ने SIR प्रक्रिया को पूरी तरह कानूनी और पारदर्शी बताया। यह प्रक्रिया जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और मतदाताओं के पंजीकरण नियम, 1960 के तहत चलती है। बिहार में SIR के तहत 65 लाख नाम हटाए गए थे (जिनमें मृत, पलायन कर चुके और डुप्लीकेट नाम थे)। आयोग ने स्पष्ट किया कि नाम हटाए जाने के बाद भी इच्छुक नागरिकों के पास ‘दावे और आपत्तियाँ’ दर्ज कराने का पूरा अधिकार है।

SIR की जाँच में ऐसे कई मामले सामने आए जहाँ सालों से लापता या मृत माने जा रहे लोग ‘जिंदा’ पाए गए, जब उनका नाम वोटर लिस्ट से हटने पर उन्होंने जाँच के लिए आवेदन किया। इस प्रक्रिया ने उन लोगों को भी अपनी पहचान साबित करने का मौका दिया जो किसी कारणवश सूची से बाहर थे, लेकिन यह उन अवैध घुसपैठियों को बाहर करने में सफल रहा जो पहचान छुपाकर देश में रह रहे थे। SIR ने दिखाया कि निष्पक्ष प्रक्रिया डर केवल उन्हें पैदा करती है जो कानूनी रूप से गलत हैं।

SIR, CAA और NRC जैसी प्रक्रियाएँ देश की सुरक्षा, संसाधनों की रक्षा और स्वच्छ लोकतंत्र के लिए बेहद जरूरी हैं। विपक्षी दलों का SIR के खिलाफ खड़ा होना केवल उनके राजनीतिक स्वार्थ और अवैध वोट बैंक को बचाने की कोशिश है।

पश्चिम बंगाल बॉर्डर पर अवैध बांग्लादेशियों का यह ‘उल्टा पलायन’ दिखाता है कि सत्य की जीत हुई है और देश के नियम-कानून को हल्के में नहीं लिया जा सकता। देश को सबसे पहले असली नागरिकों के हितों की रक्षा करनी चाहिए, न कि अवैध घुसपैठियों के।

कुर्मी के राज, भूमिहार राजा, पांडे जी, चले ला अहिरान के, गोली चलेला बबुआन के… बिहार को जाति नहीं, जातीय दंभ से डराते इन गानों से चाहिए मुक्ति

‘RJD के माल हई रे’ और ‘यादव का माल हई रे’ जैसे गाने इस बार बिहार विधानसभा चुनावों में खूब चर्चा में रहे। केवल यही नहीं राजपूत, भूमिहार और ब्राह्मण जाति पर भी ऐसे गाने बने हैं, जो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हैं। ऐसे गानों ने बिहार में जातिवाद फैलाने की कोशिश की, जिससे समाज में नफरत फैलती है।

जाति के आधार पर दूसरों को नीचा दिखाने वाले ऐसे गाने समाज में भेदभाव को हवा देते हैं। खासकर चुनावों के समय सोशल मीडिया और लोक-कार्यक्रमों में ऐसे गानों का इस्तेमाल बढ़ जाता है। इससे चुनाव केवल जातिवाद के केंद्र में सिमटकर रह जाते हैं। इन जातिगत गानों से समाज को प्रभावित होने से बचाने की जरूरत है।

कौन-कौन से जातिवादी गाने बनाए गए?

बिहार में ऐसे कई गानें बने हैं, जिनसे केवल एक खास जाति को निशाना बनाया गया है। इनमें यादव, ब्राह्मणों, राजपूत, भूमिहार से लेकर सभी जाति के गाने बनाए गए हैं। ये गाने जातिगत पहचान को बढ़ावा देते हैं। कुछ जातिवाद फैलाने वाले लोकप्रिय गाने हैं-

  1. आरा में चले ला अहिरान के‘- जहाँ यादव जाति का ही प्रभुत्व दिखाया जाता है।
  2. ‘पांडे जी का बेटा हूँ‘ गाना ब्राह्मणों के लिए बनाया गया है।
  3. गोली चलेला बबुआन के बारात में‘- ये गाना राजपूत जाति को लेकर बनाया गया है।
  4. हमके मरदे चाहिले भूमिहार राजा जी‘- भूमिहार जाति को लेकर बनाया गया है।
  5. ‘न गले वाला दाल हिया रे, ई ता RJD के माल हई रे‘- ये गाना RJD के समर्थकों और यादव जाति को टारगेट कर बनाया है।
  6. कुर्मी के राज चलि‘- ये गाना कुर्मी समाज को टारगेट कर बनाया गया है।

जातिगत गीत प्रचलित होने की वजह क्या है?

ऐसे जातिगत गाने प्रचलित भी जल्दी हो जाते हैं। इनकी वजह है बिहार का डीजे कल्चर, खासकर शादी-ब्याह, जुलूस और चुनावी रैलियों में बजने वाले गानों का प्रभाव बेहद व्यापक होता है। जब ऐसे अवसरों पर जातिगत गाने तेज आवाज में बजाए जाते हैं तो वे सुनने वालों के दिमाग में अपनी जाति को सर्वश्रेष्ठ और दूसरी के लिए ‘नीचा’ वाला भाव जागृत करते हैं।

चुनाव के समय राजनीतिक दलों के समर्थक ऐसे गानों की रील्स और शॉर्ट वीडियो बनाकर शेयर करते हैं ताकि अपनी जाति के मतदाताओं पर प्रभाव छोड़ सकें। ये वीडियो इंस्टाग्राम, फेसबुक, रील्स जैसे प्लैटफॉर्म पर जल्दी वायरल होते हैं और वोटरों को भावनात्मक रूप से जोड़ते हैं।

वहीं शादी समारोह जैसे सार्वजनिक अवसरों पर ये गाने डीजे या चलती धुन के रूप में बजाए जाते हैं। इन्हें लोकल सिंगर्स और स्टेज आर्टिस्ट गाते हैं, जिन्हें गानों में जातिगत संदर्भ जोड़ने का फायदा होता है क्योंकि इससे उनकी लोकप्रियता और पहचान बढ़ती है।

इससे भी अधिक चुनावी माहौल में इन गानों का गहरा असर आम जनता पर पड़ता है। चुनावी माहौल में राजनीतिक दल इन जातिगत गानों से जाति के आधार पर अपने मतदाताओं को आकर्षित करते हैं। ये सब ‘जाति-आधारित संदेश’ फैलाने से शुरू होता है, जो समाज में जहर बनकर सामने आता है।

जातिगत गीतों से समाज में क्या समस्या हो रही है?

सोशल मीडिया के जमाने में इन जातिगत गानों का चलन बढ़ता जा रहा है। शॉर्ट वीडियो की ‘डोज’ के साथ ये गाने लाखों लोगों के बीच वायरल हो जाते हैं। और जिन जाति के गाने होते हैं, वे एक-दूसरे के खिलाफ नफरत पर उतर पड़ते हैं। नतीजा यह होता है कि एक पढ़ा-लिखा सामान्य युवक और स्कूली बच्चे तक इन गीतों की भाषा में सोचने लगते हैं। इससे समाज न सिर्फ विभाजित होता है बल्कि लोगों के बीच प्रतिद्विंदी वाली भावना भी पनपने लगती है।

समस्या केवल इन जातिगत गानों को बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि लोगों को इन्हें स्वीकारना इससे भी खतरनाक है। जब जाति आधारित गानों को लाखों व्यूज मिलते हैं, जब उन्हें रील्स में बार-बार इस्तेमाल किया जाता है और जब आम लोग इन्हें जोश के नाम पर आगे बढाते हैं, तो यह दिखाता है कि जातिवाद सिर्फ राजनीति का हिस्सा नहीं रहा बल्कि यह मनोरंजन का साधन बन चुका है।

कई बार इन जातिगत गानों पर आपत्ति भी जताई गई है। नेहा सिंह राठौर, गुंजन सिंह, समर सिंह जैसे कलाकारों के खिलाफ जातिवादी या उकसावे वाले गानों को लेकर कानूनी शिकायत भी दर्ज हुई है। क्योंकि उनके गानों को जातिवाद-विशुद्ध (Casteist) पाया गया। लेकिन ये जातिगत गाने कार्रवाई तक सीमित नहीं है, इनका सोशल मीडिया दर्शकों में गहरा प्रभाव पड़ चुका है। यह वो कंटेन्ट है जो कहीं न कहीं से उभरकर सामने आ ही जाता है।

जातिगत गीतों के प्रभाव से कैसे बचा जाए?

जातिगत गीतों पर प्रतिबंध लगाना ही केवल इस समस्या का समाधान नहीं है। बल्कि इसके प्रभाव से भी लोगों को बचाने की जरूरत है। सरकार को निश्चित रूप से ऐसे कन्टेंट पर नजर रखनी चाहिए और सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म को अधिक जिम्मेदार बनाना होगा ताकि जाति के प्रति उकसावे वाले गीत तेजी से फैल ही न सकें।

लेकिन उससे भी बड़ी जिम्मेदारी समाज में बैठे आम लोगों की है। जब तक लोग ऐसे गानों को मनोरंजन मानकर उन्हें व्यूज, लाइक्स और शेयर करते रहेंगे तब तक मनोरंजन के बड़े चेहरे और राजनीतिक दल जनता को जातिगत गीतों से निशाना बनाते रहेंगे।

फिलहाल इसका निदान शिक्षा और जागरूकता है। समाज का नेतृत्व कर रहे लोगों को बैठक बुलानी चाहिए और इस मुद्दे पर चर्चा करनी चाहिए। आम लोगों में संदेश फैलाना चाहिए कि जातिगत गीत कोई मनोरंजन नहीं बल्कि समाज के लिए जहर है।

टेक्सास में बैन किया गया राहुल गाँधी के ह्यूस्टन प्रोग्राम से जुड़ा आतंकी संगठन CAIR, हमास-अलकायदा से कनेक्शन: हिंदू और भारत विरोधी कामों से जुड़ाव

टेक्सास के गवर्नर ग्रेग एबॉट ने मंगलवार (18 नवंबर 2025) को काउंसिल ऑन अमेरिकन-इस्लामिक रिलेशंस (CAIR) को राज्य कानून के तहत विदेशी आतंकवादी संगठन और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक संगठन घोषित कर दिया। इस घोषणा में CAIR को मुस्लिम ब्रदरहुड के साथ सूचीबद्ध किया गया है, जिसे एबॉट ने इसका उत्तराधिकारी संगठन बताया

इस फैसले के बाद दोनों संगठनों पर टेक्सास में जमीन खरीदने-बेचने पर रोक लग गई है। इसके अलावा इन संगठनों की किसी भी तरह से मदद करने वालों के लिए कड़ी नागरिक और आपराधिक सजाओं का रास्ता भी खुल गया है।

स्रोत: एक्स

घोषणा में क्या कहा गया है?

गवर्नर एबॉट के आदेश में सबसे पहले मुस्लिम ब्रदरहुड के इतिहास और विचारधारा का उल्लेख किया गया। इसमें इसे एक अंतरराष्ट्रीय इस्लामिस्ट आंदोलन बताया गया, जिसकी नींव हथियारबंद जिहाद और शरिया कानून लागू करने वाले वैश्विक खिलाफत के लक्ष्य पर रखी गई थी।

एबॉट ने इसके संस्थापक हसन अल-बन्ना और बाद में इसके सुप्रीम गाइड मोहम्मद बदी के बयानों का हवाला देकर कहा कि संगठन के उद्देश्यों में लगातार यही सोच बनी रही है। उन्होंने यह भी बताया कि मुस्लिम ब्रदरहुड का नेटवर्क दुनिया भर में फैला है, जिसमें हमास भी शामिल है, जो इसका फ़िलिस्तीनी शाखा के रूप में शुरू हुआ था।

इसके बाद आदेश में CAIR का जिक्र किया गया और इसे अमेरिका में मौजूद मुस्लिम ब्रदरहुड के नेटवर्क का हिस्सा बताया गया। एबॉट ने इसके लिए फेडरल जाँचों, होली लैंड फ़ाउंडेशन टेरर फाइनेंसिंग केस के कानूनी निष्कर्षों और कई शैक्षणिक अध्ययनों का हवाला दिया, जिनमें CAIR के हमास और उससे जुड़े ढाँचे के साथ संबंध बताए गए थे।

आदेश में यह भी कहा गया कि 2008 में FBI ने CAIR के साथ अपने आधिकारिक संबंध खत्म कर दिए थे, और 2023 में बाइडेन प्रशासन ने भी कुछ संघीय दस्तावेजों से CAIR से जुड़े उल्लेख हटा दिए थे।

घोषणा का सबसे बड़ा हिस्सा उन CAIR से जुड़े व्यक्तियों पर केंद्रित था, जिन्हें बाद में आतंकवाद से जुड़े अपराधों में पकड़ा गया या उजागर किया गया। एबॉट ने इन मामलों को उदाहरण के रूप में इस्तेमाल किया ताकि यह दिखाया जा सके कि CAIR सिर्फ विचारधारा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका ढाँचा चरमपंथी नेटवर्कों से परिचालन स्तर पर भी जुड़ा हुआ है।

घोषणा में CAIR से जुड़े व्यक्तियों का उल्लेख

घोषणा में कई ऐसे लोगों के नाम दर्ज किए गए जो कभी CAIR के नेतृत्व, स्टाफ या फंडरेज़िंग नेटवर्क का हिस्सा रहे थे और बाद में आतंकवाद से जुड़े मामलों में दोषी पाए गए या आरोपित हुए। एबॉट ने कहा कि यह एक लंबे समय से चल रहा पैटर्न है कि CAIR ऐसे लोगों को अपने संगठन में महत्वपूर्ण जगह देता रहा है जिनके आतंकवादी संगठनों से सक्रिय संबंध रहे हैं।

सबसे प्रमुख नाम घसान इलाशी का था, CAIR टेक्सास के संस्थापक बोर्ड सदस्य और होली लैंड फाउंडेशन के कोषाध्यक्ष। उन्हें 2009 में आतंक वित्तपोषण के लिए दोषी ठहराया गया था और 65 साल की सजा मिली थी।

दूसरा नाम अब्दुरहमान आलामूदी का था, जिसने CAIR द्वारा आयोजित एक रैली में भाषण दिया था और खुद को हमास और हिज्बुल्लाह का समर्थक बताया था। बाद में वह अल-कायदा को फंडिंग करने का दोषी पाया गया।

तीसरा नाम रैंडल टॉड रोयर का था, जो CAIR में कम्युनिकेशन स्पेशलिस्ट और सिविल-राइट्स कोऑर्डिनेटर था। उसे 2004 में अल-कायदा और तालिबान की मदद की साजिश के लिए 20 साल की जेल हुई।

इसके बाद नाम आया बासेम खाफागी का, जो CAIR में कम्युनिटी रिलेशंस डायरेक्टर था। उसने 2003 में बैंक और वीजा फ्रॉड की बात कबूल की थी और उस पर पैसा कट्टरपंथी संगठनों को भेजने और अमेरिका पर आत्मघाती हमलों को बढ़ावा देने वाली सामग्री प्रकाशित करने के आरोप थे।

घोषणा में रबीह हद्दाद का नाम भी था, जो CAIR के लिए फंड जुटाता था। उसे ग्लोबल रिलीफ फ़ाउंडेशन के मामले में गिरफ्तार किया गया और बाद में देश से निकाला गया। यह संगठन 2002 में अल-कायदा को फंडिंग के चलते बंद किया गया था।

सूची में मुथन्ना अल-हनूटी का नाम भी शामिल था, मिशिगन का CAIR डायरेक्टर, जिसे 2011 में इराक के दो लाख बैरल तेल लेने और सद्दाम हुसैन की मदद के लिए प्रतिबंधों का उल्लंघन करने के आरोप में दोषी ठहराया गया।

एक और बड़ा नाम सामी अल-अरियान का था, पीआईजे (पैलेस्टीनियन इस्लामिक जिहाद) का फाइनेंसर और दोषी आतंकवादी। CAIR ने उसे 2014 में ‘Promoting Justice Award’ दिया था और 2020 के एक कार्यक्रम में भी उसे मंच दिया, जहाँ उसने CAIR का समर्थन बढ़ाने की अपील की।

घोषणा में निहाद अवाद का जिक्र था, CAIR के लंबे समय से कार्यकारी निदेशक। उन्होंने 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले पर खुशी जताई थी। इन गंभीर आरोपों और नामों के जवाब में CAIR ने ग्रेग एबॉट को कोर्ट में घसीटने की धमकी दी और उन्हें इजराइल फर्स्ट राजनेता कहा, साथ ही आरोप लगाया कि वह अमेरिकी मुसलमानों को बदनाम करने के लिए महीनों से एंटी-मुस्लिम माहौल बना रहे हैं।

स्रोत: एक्स

CAIR और उसका भारत विरोधी प्रचार

CAIR एक इस्लामिस्ट संगठन है, जिसने कई बार भारत और हिंदुओं के खिलाफ बयान दिए हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि CAIR के रिश्ते आतंकी संगठन हमास से जुड़े रहे हैं। यह संगठन लगातार हिंदू-विरोधी हिंदूफोबिक अभियान और प्रोपेगैंडा फैलाता रहा है। पहले भी CAIR ने अत्यंत हिंदूफोबिक ‘Dismantling Global Hindutva’ कॉन्फ़्रेंस का खुलकर समर्थन किया था।

CAIR ने जनवरी 2022 में राणा अय्यूब की रिपोर्ट के आधार पर हिंदू-विरोधी प्रोपेगैंडा चलाया। उन्होंने प्रेस रिलीज जारी कर हिंदी फिल्म ‘सूर्यवंशी’ को थिएटरों में रिलीज न करने की माँग की और फिल्म को घृणित और खतरनाक हिंदुत्व प्रेरित एंटी-मुस्लिम प्रोपेगैंडा तक बता दिया।
CAIR ने पाकिस्तानी आतंकी आफिया सिद्दीकी को भी रिहा करने की माँग की है, जो अमेरिकी सेना और FBI पर हमले के लिए 86 साल की सजा काट रही है।

उसी साल CAIR ने Still Suspect: The Impact of Structural Islamophobia नाम से रिपोर्ट जारी की और दावा किया कि अमेरिका में मुसलमानों के खिलाफ भेदभाव बढ़ रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, CAIR को एक साल में 6,720 शिकायतें मिलीं, जिनमें इमिग्रेशन, यात्रा संबंधी भेदभाव, कानून प्रवर्तन, सरकारी दखल, स्कूल घटनाएँ और फ्री स्पीच जैसे मुद्दे शामिल थे।

CAIR का दावा है कि अमेरिकी सरकार का भेदभाव मुसलमानों को अधिक प्रभावित करता है। लेकिन विरोधाभास यह है कि जो CAIR अमेरिका में इस्लामोफोबिया की शिकायत करता है, वही भारत में हिंदू-विरोधी नैरेटिव को लगातार बढ़ावा देता है।

दिसंबर 2022 में भी CAIR ने न्यू जर्सी में एक मोबाइल ट्रक पर दिखाए गए 26/11 हमले के वीडियो और लश्कर-ए-तैयबा आतंकियों के नामों पर आपत्ति जताई और इसे नफरत फैलाने वाला कहा, जबकि वीडियो में सिर्फ सच दिखाया गया था।

CAIR कई बार आफिया सिद्दीकी जैसे आतंकवादियों के समर्थन में भी खड़ा रहा है। जून 2023 में, जब कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी अमेरिका गए, तो वह सुनीता विश्वनाथ के साथ एक चर्चा में बैठे दिखाई दिए। वह HfHR नामक कट्टर हिंदू-विरोधी संगठन की सह-संस्थापक है और CAIR तथा ICNA जैसे संगठनों के लिए कार्यक्रम आयोजित करती रही है।

इसके अलावा राहुल गाँधी ने 2024 में कट्टर इस्लामिस्ट और भारत-विरोधी अमेरिकी सांसद इल्हान ओमर से भी मुलाकात की। ओमर इस्लामिस्ट एजेंडे को बढ़ावा देती हैं, मुस्लिम अपराधियों पर हुई कार्रवाई को इस्लामोफोबिया बताती हैं और आतंकवाद पर सवाल उठाने से बचती हैं।

वह 9/11 हमले को भी हल्के में लेते हुए CAIR के एक कार्यक्रम में बोली थीं कि यह कुछ लोगों ने कुछ कर दिया और इसके कारण मुसलमान अमेरिका में अपने अधिकार खो रहे हैं। इन सभी घटनाओं से CAIR के विचार, नेटवर्क और उसके भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी रुख स्पष्ट रूप से सामने आते हैं।

इस्लामी आतंकवादी संगठन हमास के साथ संबंध

ध्यान देने वाली बात यह है कि CAIR के रिश्ते फ़िलिस्तीनी इस्लामिक कट्टरपंथी आतंकी संगठन हमास से जुड़े रहे हैं। हमास का मानवाधिकार उल्लंघन का लंबा इतिहास है। यूरोपीय संघ, अमेरिका, कनाडा, इजरायल, जापान, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन सहित कई देशों ने हमास को आधिकारिक तौर पर आतंकी संगठन घोषित किया हुआ है।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है, मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ लिंक करें।)

वे ‘मजहब’ के नाम पर फिदायीन बनते हैं, पर लिबरल-इस्लामी गैंग चाहता है कि ‘मजहब’ की बात न हो; इसलिए आतंकी उमर नबी का Video वायरल होने से भड़के

दिल्ली में लाल किला के पास धमाका करने वाले आतंकी उमर नबी का हाल ही में एक वीडियो सामने आया है। वीडियो में उमर ‘सुसाइड बॉम्बिंग’ यानी फिदायीन बनने को सही ठहरा रहा है। वह इसे ‘शहादत का ऑपरेशन’ बताकर पेश करता है। यह वीडियो उन उदारवादी-बुद्धिजीवियों और इस्लामी कट्टरपंथियों की आँखों पर ढकी उस सच्चाई को दिखाता है, जो दावा करती हैं कि ‘आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता’ है। शायद इसीलिए ऐसे लोगों को वीडियो बाहर आने से परेशानी हो रही है।

ये लोग मीडिया पर इस वीडियो को प्रसारित करने के लिए सवाल उठा रहे हैं और चाहते हैं कि मजहब की बात न हो। वीडियो सामने आने पर मजहब के लिए फिदायीन बनने वाले उमर नबी का महिमामंडन करने में भी लगे कुछ कुछ इस्लामी कट्टरपंथी को यकीन नहीं हो रहा कि एक डॉक्टर इस तरह की चरमपंथी सोच में शामिल कैसे हो सकता है? वे आतंकवादी की मुस्लिम पहचान को अब भी नकार रहे हैं।

उमर नबी के वीडियो का अनुवाद

उमर नबी ने यह रोंगटे खड़े करने वाला वीडियो दिल्ली में धमाका करने से ठीक पहले रिकॉर्ड किया था। वीडियो में वह बिल्कुल प्रोफेशनल अंग्रेजी भाषा में बात कर रहा है। यह उस ‘व्हाइट कॉलर आतंकवाद’ का सबूत है, जिसका पिछले कई दिनों से जाँच एजेंसियाँ पर्दाफाश करने में लगी हुई हैं। फरीदाबाद, सहारनपुर से लेकर कश्मीर तक अब तक 5 से अधिक डॉक्टर पेशे आतंकी पकड़े जा चुके हैं।

वीडियो में उमर नबी कहता है, “आत्मघाती हमलों का सबसे अहम मुद्दा यह है कि जब कोई व्यक्ति यह मान लेता है कि वह किसी तय समय और स्थान पर निश्चित रूप से मरने जा रहा है तो वह एक खतरनाक मानसिकता में चला जाता है। वह खुद को एक ऐसी स्थिति में रखता है, जहाँ वह मान लेता है कि मौत ही उसकी एकमात्र मंजिल है।”

उमर नबी आगे कहता है, “हकीकत यह है कि किसी भी लोकतांत्रिक और मानवीय व्यवस्था में ऐसी सोच या ऐसी स्थिति को स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह जीवन, समाज और कानून तीनों के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।”

ऐसा पहली बार हुआ है जब आत्मघाती हमले के आतंकी का वीडियो सामने आया है। वीडियो सामने आने से काफी लोगों को परेशानी तो हुई, लेकिन यह कहना गलत नहीं है कि ऐसे वीडियो समाज में फैलने चाहिए ताकि भारत का हर नागरिक इस्लामी कट्टरपंथी की सोच वाली ‘सुसाइड बॉम्बिंग’ को सही ठहराने वाले लोगों से बचकर रह सके। क्या पता ऐसे इस्लामी कट्टरपंथी हमारे आसपास ही घूम रहे हों।

लिबरल का ‘इस्लाम से आतंकी विचारधारा’ को ढकने की तमाम कोशिश

वहीं आतंकी उमर नबी की इस वीडियो पर कुछ लिबरल और बुद्धिजीवी तिलमिला गए। ऐसे लोगों ने वीडियो को ‘संवेदनशील’ बताया और आतंकी की छवि पर पर्दा डालने के साथ-साथ इस ‘इस्लाम’ से जोड़ने पर नाराजगी जाहिर की। यह उनका हमेशा वाला प्रोपेगेंडा है। जो सिर्फ ‘मुस्लिमों की हिंसा और क्राइम’ पर आम लोगों को भटकाने की कोशिश में लगे रहते हैं। ये लोग सबसे पहले मीडिया को निशाना बनाते हैं।

ऐसी ही एक इस्लामी कट्टरपंथी RJ सैयमा ने आतंकी उमर नबी की वीडियो सामने लाने वाली मीडियो को निशाना बनाया लेकिन ‘सुसाइड बॉम्बिंग’ को सही ठहराने वाले इस आतंकी के खिलाफ एक शब्द भी नहीं लिखने से कतराई। सैयमा ने लिखा, “मेनस्ट्रीम न्यूज मीडिया आतंकी का वो वीडियो क्यों शेयर कर रहे हैं! ये बहुत ही विचलित करने वाला है और मैं सोच भी नहीं सकती कि इसे देखकर पीड़ितों के परिवारों पर क्या बीत रही होगी! सनसनीखेज TRP का ये दौर कितना विचलित करने वाला है! बिल्कुल निंदनीय।”

सैयमा के पोस्ट का स्क्रीनशॉट (साभार: X- @_sayema)

यहाँ सैयमा की ही तरह द हिंदू (The Hindu) की डिप्टी एडिटर विजेता सिंह लिखती हैं, “उस आत्मघाती हमलावर का वीडियो पोस्ट करना बंद करो, तुम बस उसके जहरीले बयान को बढ़ावा दे रहे हो।”

विजेता सिंह के पोस्ट का स्क्रीनशॉट (साभार: X-@vijaita)

इसी क्रम में लिबरल सोच वाली ऋचा द्विवेदी भी अपनाी ‘अलोकप्रिय राय’ लिखती हैं, “डॉक्टर से आत्मघाती हमलावर बने व्यक्ति का वीडियो सोशल मीडिया पर नहीं होना चाहिए और इसे निश्चित रूप से टेलीविजन पर प्रसारित नहीं किया जाना चाहिए।”

ऋचा द्विवेदी के पोस्ट का स्क्रीनशॉट (साभार: X- @RichhaDwivedi)

कुछ इस्लामी कट्टरपंथी को वीडियो सामने आने से ‘असहज’ हो जाते हैं और सवाल करते हैं, “जब जाँच पूरी नहीं हुई है तो यह वीडियो, निगरानी फुटेज, जाँच संबंधी जानकारी आदि मीडियो को कौन दे रहा है?”

एक्स यूजर का स्कीनशॉट (साभार: @salman_sayyid)

वहीं इन इस्लामी कट्टरपंथियों को यकीन नहीं होता कि आखिर एक डॉक्टर इस तरह की चरमपंथी सोच वाला कैसे हो सकता है। ये लोग ‘आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता’ वाले मनगढ़ंत बयान को उछालने में लग जाते हैं। एक एक्स यूजर ने लिखा, “यह वीडियो एक स्पष्ट चेतावनी है कि आतंकवाद धर्म, शिक्षा या पेशेवर पृष्ठभूमि तक सीमित नहीं है। यह एक खतरनाक विकृति है, एक सामाजिक रोग है जो हमारे युवाओं के मन में घर कर गया है और हमारे समाज के ताने-बाने के लिए खतरा बना हुआ है।”

एक्स यूजर के पोस्ट का स्क्रीनशॉट (फोटो साभार: X- @tabishhaji)

इन लिबरल और इस्लामी कट्टरपंथी विचारधारा वाले लोगों ने आतंकवाद एक धर्म तक सीमित नहीं है वाले प्रोपेगेंडा को बढ़ाने की तमाम कोशिश की। यहाँ तक कि मीडिया पर वीडियो उजागर करने को लेकर सवाल उठाया। ये लोग दिल्ली ब्लास्ट में मारे गए 15 लोगों की जान गवाने वाले परिवारों का दर्द तो समझ रहे हैं लेकिन इस्लामी कट्टरपंथ से बढ़ते आतंक को नजरअंदाज कर देते हैं।

लिबरल और इस्लामी कट्टरपंथियों का दोहरा सच

इससे यह साफ हो गया कि उमर नबी का वीडियो सामने आते ही लिबरल और इस्लामी कट्टरपंथियों को जो बेचैनी दिखी, वह दरअसल उनकी अपनी दोहरी राजनीति का पर्दाफाश है। यह वही लोग हैं जो हर मंच पर सच दिखाने का दावा करते हैं लेकिन जैसे ही कोई वीडियो उनकी पसंदीदा कथाओं पर चोट करता है, तुरंत उसे छिपाने में लग जाते हैं।

आतंकी उमर नबी का वीडियो ‘सुसाइड बॉम्बिंग’ को सही ठहराता है, उसे इस्लाम में जरूरी बताता है और युवाओं को हिंसा की राह पर धकेलने के लिए प्रभावित करता है। लेकिन इस जहर पर इन कथित लिबरल की जुबान अचानक सिल जाती है। इनके लिए आतंक का समर्थन करने वाला ‘भटका हुआ नौजवान‘ होता है, जबकि यही लोग गुजरात दंगों में ‘बाबू बजरंगी’ के स्टिंग ऑपरेशन की क्लिप्स दुनिया को दिखाना चाहते हैं। क्योंकि वहाँ एजेंडा पूरा होता है।

ये वही लोग है जो हिज्बुल मुजाहिदीन के कमांडर आंतकी बुरहान वानी को ‘हेडमास्टर का बेटा’ कहकर भावनात्मक एंगल देते हैं और लेकिन ‘सुसाइड बॉम्बिंग’ को सही ठहराने वाले उमर नबी पर खामोश रहते हैं। उमर नबी का ठीक दिल्ली ब्लास्ट से पहले ‘सुसाइड-बॉम्बिंग’ पर वीडियो बनाने की यही वजह होगी, क्योंकि इन आतंकियों को पता है कि भारत के लिबरल इनके अपराध को ‘शहादत’ बताने के लिए अब भी बैठे हैं।

हार से मुँह छिपाने का बेतुका बहाना, बिहार में 100-122 वाली ‘सेटिंग’ ढूँढ रही कॉन्ग्रेस: कर्नाटक–तेलंगाना में ऐसी ही ‘सेटिंग’ से बनी है खुद की सरकार

बिहार विधानसभा चुनाव में मनचाहा नतीजा न मिलने के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी ने अब एक नया ड्रामा शुरू कर दिया है। अब पार्टी सोशल मीडिया पर काउंटिंग के नंबरों पर सवाल उठाकर ऐसा माहौल बना रही है मानो वोट गिनती में कोई बड़ी ‘सेटिंग’ हुई हो। सोशल मीडिया पर ‘122 की सेटिंग’ जैसे नारे उछालकर कॉन्ग्रेस समर्थकों के बीच वैसा ही भ्रम पैदा किया जा रहा है, जैसा हर चुनाव हारने के बाद विपक्ष करने की कोशिश करता है।

लेकिन असली सवाल ये है, जब 2023 में कर्नाटक और तेलंगाना में कॉन्ग्रेस भारी मतों से जीती थी, तब क्या उन्होंने अपनी गिनती को भी इसी तरह जाँचा था? अगर हर बड़ी जीत ‘सेटिंग’ है, तो क्या वो जीत भी सेटिंग थीं? और बिहार में RJD की 93-95-97 हजार वाली जीतों पर कॉन्ग्रेसी क्यों खामोश है? आईए एक बार जान लेते है बीजेपी-NDA की जीत को ‘सेटिंग’ बताने वाली कॉन्ग्रेस खुद कितनी ‘सेटिंग’ कर चुकी है।

कॉन्ग्रेस की 100/122 वाली ‘सेटिंग’ का आरोप

बिहार चुनाव नतीजों के बीच कॉन्ग्रेस ने ‘EVM वाली 122 की Setting’ लिखकर ट्वीट किया, मानो मशीनों से ही खेल हो गया हो।

इसी लाइन को आगे बढ़ाते हुए पार्टी की प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने कहा, “अरे… EVM में तो 100 की Setting भी है। ज्ञानेश जी, कुछ तो बोलिए!”

कॉन्ग्रेस का पूरा नैरेटिव यही है कि सिर्फ BJP–NDA की सीटों में कुछ गड़बड़ी है, बाकी जगह सब सामान्य।

कर्नाटक: जब कॉन्ग्रेस के विनर ‘77000’ की लाइन में थे

कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस के कई उम्मीदवार भी इसी पैटर्न से जीते थे। उदाहरण के लिए- बंगारापेट (एससी) विधानसभा सीट से कॉन्ग्रेस के उम्मीदवार एस एन नारायणस्वामी को 77292 वोट मिले और उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार हो हराया था।

मुधोल (एससी) विधानसभा सीट से कॉन्ग्रेस उम्मीदवार टिम्मापुर रामप्पा बालाप्पा को 77298 वोट मिले और उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार को हराया था।

कारवार (जनरल) विधानसभा सीट से कॉन्ग्रेस उम्मीदवार सतीश कृष्णा सैल को 77445 वोट मिले और उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार को हराया था।

कित्तूर (जनरल) विधानसभा सीट से कॉन्ग्रेस उम्मीदवार बाबसाहेब पाटिल को 77536 वोट मिले और उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार को हराया था।

अगर वोट के आखिरी दो या तीन अंक ‘सेटिंग’ हैं, तो जब कॉन्ग्रेस के जीतने वाले उम्मीदवारों के वोट भी 77000 की लाइन में आकर 292, 298, 445 या 536 पर खत्म हो रहे थे, तब यह ‘जीत की सेटिंग’ क्यों नहीं लगी? तब तो सब कुछ सही था।

तेलंगाना: क्या यहाँ भी ‘87000’ वाली ‘सेटिंग’ थी?

यही हाल तेलंगाना विधानसभा चुनावों में भी था, जहांँ कॉन्ग्रेस ने जीत दर्ज की थी। मेडक (जनरल) विधानसभा सीट से कॉन्ग्रेस उम्मीदवार मायनामपल्ली रोहित को 87126 वोट मिले थे।

नागरकुरनूल (जनरल) विधानसभा सीट से कॉन्ग्रेस उम्मीदवार डॉ कुचकुल्ला राजेश रेड्डी को 87161 वोट मिले थे।

महबूबनगर (जनरल) विधानसभा सीट से कॉन्ग्रेस उम्मीदवार येन्नम श्रीनिवास रेड्डी को 87227 वोट मिले थे।

चेन्नूर (एससी) विधानसभा सीट से कॉन्ग्रेस उम्मीदवार विवेक वेंकट स्वामी को 87541 वोट मिले थे।

यहाँ पर भी वोटिंग का आँकड़ा 87,000 की लाइन में एक-दूसरे के बेहद करीब था। लेकिन तब तो कॉन्ग्रेस ने इस पर कोई सवाल नहीं उठाया। इसका मतलब साफ है, जब खुद की जीत होती है, तो यह ‘ईमानदार गिनती’ होती है, और जब हार होती है, तो यह ‘EVM वाली सेटिंग’ बन जाती है।

बिहार में RJD की 90+ वाली ‘सेटिंग’ पर चुप्पी क्यों?

अब बात करते हैं बिहार के हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों की। कॉन्ग्रेस-RJD के साथ गठबंधन में थी, तो उन्हें यह भी बताना चाहिए कि उनकी सहयोगी RJD की उन सीटों पर क्या ‘सेटिंग’ थी, जहाँ उनके उम्मीदवार भी भारी वोटों से जीते हैं?

महिषी विधानसभा सीट से आरजेडी उम्मीदवार गौतम कृष्णा को 93752 वोट मिले तो वहीं, गोह विधानसभा सीट से आरजेडी उम्मीदवार अमरेंद्र कुमार को 93624 वोट मिले। ये ‘93 वाली सेटिंग‘ किसने की?

परू विधानसभा सीट से आरजेडी उम्मीदवार शंकर प्रसाद को 95272 वोट मिले तो वहीं, ब्रह्मपुर विधानसभा सीट से आरजेडी उम्मीदवार शंभू नाथ यादव को 95828 वोट मिले। ये ‘95 वाली सेटिंग‘ किसने की।

इसके अलावा, टिकारी विधानसभा सीट से आरजेडी उम्मीदवार अजय कुमार को 97550 वोट मिले और वारसलीगंज विधानसभा सीट से आरजेडी उम्मीदवार अनीता को 97833 वोट मिले। ये ’97 वाली सेटिंग’ किसने की। इसका मतलब यह है कि सिर्फ बीजेपी-NDA के जीतने वाली सीटों पर ही उन्हें ‘गड़बड़ी’ नजर आती है।

हार छुपाने का बचकाना तरीका

असलियत यह है कि वोटों की गिनती में संख्या किसी भी अंक पर खत्म हो सकती है, यह कोई चमत्कार नहीं है, बल्कि लाखों वोटर्स की अलग-अलग पसंद का गणित है। जब कर्नाटक और तेलंगाना में कॉन्ग्रेस को जीत मिली, तो यही आँकड़े उनकी सफलता का प्रमाण थे।

लेकिन बिहार में हारने के बाद, इस तरह के बेबुनियाद और फर्जी आरोप लगाना सिर्फ अपनी हार को छुपाने का एक बचकाना तरीका है, जो लोकतंत्र और चुनाव प्रक्रिया पर से लोगों का भरोसा कम करने की कोशिश है। कॉन्ग्रेस को चाहिए कि वह EVM पर सवाल उठाने से पहले अपनी कमियों पर ध्यान दे।

हिड़मा की मौत से टूटेगी ‘लाल आतंक’ की कमर, डेडलाइन से 12 दिन पहले ही निपटा ‘जल्लाद’: जानिए टॉप कमांडर का खात्मा नक्सलियों के लिए कितना बड़ा झटका?

देश में नक्सलवाद अब अपनी अंतिम साँसे गिन रहा है। 2014 में जब से मोदी सरकार सत्ता में आई है, नक्सलियों के खिलाफ एक से बढ़कर एक ऑपरेशन किए गए। 2014 से पहले नक्सलियों के प्रति अपनाए गए ढूलमुल रवैये को त्याग कर केन्द्र सरकार ने बातचीत, सुरक्षा, समन्वय और ऑपरेशन पर आधारित नीति बनाई। इसका असर यह है कि बड़े बड़े नक्सली या तो सरेंडर कर रहे हैं या फिर सुरक्षाबलों के हाथों मारे जा रहे हैं।

गृहमंत्री अमित शाह की घोषित डेडलाइन से 12 दिन पहले माओवादी नक्सली माडवी हिड़मा को सुरक्षाबलों ने मार गिराने में सफलता पाई। गृहमंत्री शाह ने देश से नक्सलियों के समूल नाश की डेडलाइन 31 मार्च 2026 रखा है। हिड़मा की मौत के बाद अब जनता ये उम्मीद लगाए बैठी है कि 2026 की पहली तिमाही बचे- खुचे नक्सलियों के लिए ‘काल’ साबित होगा।

हिड़मा की मौत, नक्सलवाद पर जबरदस्त प्रहार

आज की तारीख में, माओवादियों की ताकत काफी कम हो गई है। सबसे जवान सदस्य हिड़मा ही था, जिसकी समझ और तकनीक से नक्सलियों ने बड़े-बड़े हमले किए। उसके खात्मे ने नक्सलियों की कमर तोड़ दी है।

अधिकांश नेता या तो आत्मसमर्पण कर चुके हैं या मारे जा चुके हैं। कई नक्सलियों की उम्र हो चली है। कई वरिष्ठ माओवादी गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं। नेतृत्व का अभाव, वैचारिक तौर पर आकर्षण की कमी, नए लोगों का आना कम होना इसके ढ़हने में अहम भूमिका निभा रहा है। सुरक्षा बल हर नक्सली किले को भेद चुके हैं। संसाधनों की कमी है। यही वजह है कि नक्सली क्षेत्र अब गिनती के रह गए हैं।

गृहमंत्री शाह ने दिया सुरक्षाबलों को ‘टारगेट’

पिछले साल जब गृहमंत्री अमित शाह ने नक्सलवाद के खात्मे की तारीख मुकर्र की थी, तो इसका फायदा ये हुआ था कि सुरक्षाबलों को एक ‘गोल’ मिल गया था।

सुरक्षाकर्मियों ने कई इलाकों को नक्सल मुक्त कर एक कीर्तिमान रच दिया। एक के बाद एक क्षेत्र नक्सलमुक्त होते गए। कई नक्सली नेताओं ने अपने समर्थकों के साथ सरेंडर किया। कई लोगों को सुरक्षाबलों ने एनकाउंटर में मार गिराया।

इसी क्रम में नक्सलियों का फिलहाल सबसे बड़ा चेहरा हिड़मा था, जिसे खत्म करने के लिए गृहमंत्री शाह ने सुरक्षाबलों को 30 नवंबर 2025 तक का समय दिया था। इसे वक्त रहते पूरा कर लिया गया।

नक्सलवाद के खिलाफ मोदी सरकार ने उठाए कई कदम

2014 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार ने नक्सलवाद पर लगाम कसने के लिए दीर्घकालिक योजनाएँ बनाई। इसका असर ये हुए कि 2024 तक नक्सल से जुड़ी हिंसक घटनाओं में 53 प्रतिशत की कमी आयी।

पिछले 10 सालों में नक्सल प्रभावित इलाकों में 576 पुलिस स्टेशन बनाए गए। इस दौरान नक्सल प्रभावित जिले 126 से घटकर 18 रह गए। अक्टूबर 2025 तक 1,225 नक्सलियों ने सरेंडर किया और करीब 270 नक्सलियों को मौत के घाट उतार दिया गया।

नक्सलियों से मुठभेड़ में मरने वाले सुरक्षाकर्मियों की संख्या में 73% की कमी आयी। नक्सली हिंसा में मरने वाले आम नागरिकों की संख्या भी 70% कम हुई।

20 सालों में सबसे बड़ी कामयाबी है हिड़मा का खात्मा

लगभग तीन दशकों तक, माडवी हिड़मा का नाम बस्तर के जंगलों में खौफ का पर्याय था। माओवादियों का सबसे खूंखार कमांडर और संगठन के हर निर्णय में दखलंदाजी करने वाला वह एकमात्र आदिवासी नेता था।

अधिकारियों का मानना है कि उसकी मौत पिछले 20 सालों में माओवादियों के लिए सबसे बड़ा झटका है। वह न सिर्फ सुरक्षाबलों पर हुए बड़े-बड़े हमलों के लिए जिम्मेदार था, बल्कि कम उम्र और जंगलों के चप्पे-चप्पे से वाकिफ ऐसा जनजातीय नेता था, जिसकी पकड़ संगठन पर सबसे ज्यादा थी। वह नक्सलियों के लिए प्रेरणा था।

हिडमा की कहानी सुकमा-बीजापुर सीमा पर बसे एक छोटे से गाँव पुवर्ती से शुरू होती है, जिसे कुछ साल पहले तक माओवादियों का ‘अभेद्य किला’ माना जाता था।

1991 में वह 17 साल की उम्र में नक्सली संगठन से जुड़ा, करीब 3 दशक तक संगठन के साथ जुड़े रहने की वजह से उसे सब कुछ पता था। सुरक्षाबलों पर हुए ज्यादातर हमलों की रणनीति उसने बनाई। उसकी मौत हर दृष्टि से देश को राहत देने वाला है।

छत्तीसगढ़ के नक्सल इलाकों में उसका अच्छा खासा प्रभाव था। बस्तर के नक्सलियों में जनजातीय लोग ज्यादा हैं। नेताविहीन होने पर ये लोग अब सरेंडर करने के लिए मजबूर होंगे। हिड़मा पीएलजीए बटालियन नंबर 1 का नेता था। 2009 से 2021 के बीच घात लगाकर किए गये सुरक्षाबलों पर हमले उसने किए।

इन हमलों में 2010 में हुआ ताड़मेटला हमला, जिसमें 76 सीआरपीएफ जवान बलिदान हुए। 2017 में बाँकुपारा का हमला। इसमें 12 सीआरपीएफ के जवान मारे गए। 2017 में हुआ बुर्कापाल का हमला जिसमें 25 सीआरपीएफ के जवानों की जान गई। 2021 में हुआ तेकुलगुडेम-पेडागेलुर का हमला, जिसमें 22 डीआरजी, एसटीएफ और कोबरा जवानों ने बलिदानी दी।

इसके अलावा झीरम घाटी का वो हमला, जिसने छत्तीसगढ़ की कॉन्ग्रेस को नेतृत्वविहीन कर दिया था, हिड़मा की साजिश का नतीजा था। कुछ आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों ने उसे ‘कसाई’ बताया है।

हर बार चकमा देकर भाग निकलता था हिड़मा

हिडमा को पकड़ने या मारने के लिए कई बड़े अभियान चलाए गए। भेज्जी और बुरकापाल हत्याकांड के बाद 2017 में शुरू किए गए ऑपरेशन प्रहार में छत्तीसगढ़ पुलिस और केंद्रीय बलों ने बड़े पैमाने पर अभियान चलाया। कई दिनों तक, टीमें टोंडामरका के जंगलों में तलाशी लेती रहीं।

पुलिस का मानना ​​था कि हिड़मा बुरी तरह घायल हो गया है, लेकिन कुछ महीनों बाद सुरक्षाबलों पर हुए हमले में उसका नाम आया।

2021 का तेकुलगुडेम मुठभेड़ एक और उदाहरण था। पुवर्ती के पास हिडमा की मौजूदगी की खुफिया जानकारी मिलने पर, सीआरपीएफ, कोबरा, डीआरजी और एसटीएफ के लगभग 800 जवान इलाके में पहुँचे, लेकिन वे साजिश का शिकार हो गए। एक पहाड़ी पर तैनात हिडमा की बटालियन ने लगातार एलएमजी से गोलीबारी की, जिसमें 22 जवान मारे गए।

साल 2025 के शुरुआत में करेगुट्टा हिल्स में सबसे बड़े माओवादी-विरोधी अभियान में 25,000 जवानों को शामिल किया गया था। इस अभियान का मकसद भी हिड़मा को घेरना था। इस अभियान में 31 नक्सली मारे गए, लेकिन हिडमा एक बार फिर बच निकला।

इस बार आंध्र प्रदेश का पहाड़ी इलाका, उसका तीन लेयर का सुरक्षा घेरा और हथियार उसे नहीं बचा पाया और सुरक्षाबलों ने हिड़मा के साथ उसकी पत्नी राजे, बॉर्डीगार्ड और तीन नक्सलियों को मौत के घाट उतार दिया।

सुरक्षाबलों ने पिछले 10 सालों में जनजातीय समाज के बीच अपनी पैठ बढ़ाई है। इन क्षेत्रों में विकास की पहुँच हो गई है। कई पुलिस थाने ऐसे इलाकों में बन गए हैं और सबसे बड़ी बात वैचारिक तौर पर कमजोर नक्सलियों से जुड़ने के लिए नई पीढ़ी तैयार नहीं है। यही वजह है कि 2026 में नक्सलियों के खात्मे की तैयारी देश कर चुका है।