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दावा- PK की जनसुराज ने महागठबंधन को पहुँचाया नुकसान, हकीकत- NDA की हार का भी बनी कारण: ओवैसी और BSP को भी हुआ फायदा

बिहार चुनाव में जनसुराज पूरी दमखम के साथ चुनावी रण में उतरी। प्रशांत किशोर ने 238 सीटों पर प्रत्याशी उतारे, यह पहली बार चुनाव लड़ रही पार्टी के मुकाबले कहीं अधिक हैं। हालाँकि, यह चुनाव परिणामों में साबित भी हो गया। जनसुराज एक भी सीट पर चुनाव नहीं जीती। पार्टी के अधिकतर उम्मीदवार तीसरे या तो चौथे स्थान पर लटके रहे। सिर्फ एक उम्मीदवार दूसरे स्थान तक पहुँचा।

जनसुराज की हालत इतनी बुरी रही कि पार्टी को केवल 2 से 3 प्रतिशत ही वोट शेयर हासिल हुआ, जिसका जीतने वाले NDA से तुलना भी नहीं की जा सकती है। यह वोट शेयर कुछ छोटे दलों की तुलना में भी काफी कम है। पार्टी के 68 सीटों पर तो वोट इतने कम थे कि वे NOTA से भी पिछड़ गए।

इसके अलावा सबसे बड़ी मात में जनसुराज के कुल 238 उम्मीदवारों में से 236 की तो जमानत तक जब्त हो गई। यानी लगभग 99.16 प्रतिशत अपनी जमानत बचाने में असफल रहे। इनमें अधिकतर उम्मीदवार तीसरे, चौथे या उससे भी नीचे स्थान पर रहे और कुल मिलाकर पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली। लेकिन पूरे प्रदेश में कुल मिलाकर पार्टी को 15 लाख वोट मिले।

वहीं जनसुराज के स्टार उम्मीदवारों की बात करें तो चनपटिया विधानसभा से यूट्यूबर मनीष कश्यप को 37172 वोट मिले। इस सीट पर कॉन्ग्रेस उम्मीदवार ने 602 वोट से जीत दर्ज की। कुम्हरार सीट से केसी सिन्हा को कुल 15,017 वोट मिले और वे तीसरे नंबर पर रहे। इस सीट पर बीजेपी के संजय कुमार ने 1,48,500 से ज्यादा वोट पाकर बड़ी जीत हासिल की। दरभंगा से पूर्व DGP आर मिश्रा और काराकाट से गायक रितेश पांडे जैसे चर्चित नाम भी चुनाव में उतरे लेकिन ये लोग भी जीत से दूर रहे।

जनसुराज ने महागठबंधन और NDA पर डाला असर?

इससे जाहिर है कि जनसुराज का प्रदर्शन बिहार चुनाव में बेहद खराब रहा। इस बीच कुछ मीडिया संस्थान और सोशल मीडिया पर खबरें तेज हैं कि बिहार चुनाव में जनसुराज ने NDA और महागठबंधन के वोट प्रभावित किए हैं। दावा किया गया कि चुनाव में जनसुराज ने NDA को लाभ और महागठबंधन को नुकसान पहुँचाया है।

ABP Live के सर्वे और रिपोर्ट में यह बताया गया कि जनसुराज की पकड़ कम होने के बावजूद, महागठबंधन की सीटें कम होने और NDA की बढ़त के पीछे जनसुराज के प्रभाव को एक कारण माना गया। खासकर, उन इलाकों में जहाँ NDA को चुनाव में भारी जीत मिल सकी।

यहाँ चर्चा जनसुराज की उन 35 सीटों की हो रही है, जिनपर उन्हें हार-जीत के अंतर से ज्यादा वोट मिले। इन सीटों में 19 सीटें NDA के खाते में गईं, जबकि 14 सीटें महागठबंधन के खाते में आईं और बाकी एक-एक ओवैसी की पार्टी AIMIM और BSP की झोली में गईं।

जनसुराज की उन 35 सीटों का हाल

मीडिया में सामने आया जनसुराज का यह सच अधूरा है। आइए आँकड़ों के अनुसार जनसुराज की उन 35 सीटों का हाल जानते हैं, जिनपर NDA को फायदा और महागठबंधन को नुकसान पहुँचाने का विश्लेषण पेश किया जा रहा है।

इनमें जनसुराज के स्टार उम्मीदवार मनीष कश्यप की विधानसभा चनपटिया भी शामिल है। इस सीट पर कॉन्ग्रेस के अभिषेक रंजन ने 602 वोटों से जीत दर्ज की। उधर, मनीष कश्यप को 50,366 वोट प्राप्त कर तीसरा स्थान हासिल हुआ। बीजेपी उम्मीदवार 86,936 वोट से दूसरे स्थान पर रहे।

फोटो साभार: ECI

एक और विधानसभा फोर्ब्सगंज की बात करें तो जनसुराज उम्मीदवार 977 वोट के साथ छठे स्थान पर रहे। वहीं जीतने वाली कॉन्ग्रेस ने बीजेपी को 221 वोट से हराया। सन्देश सीट पर भी तीसरे स्थान पर रहे जनसुराज उम्मीदवार को 6040 वोट मिले। जबकि जीतने वाली NDA के घटक दल JDU उम्मीदवार ने RJD को केवल 27 वोटों से मात दी।

फोटो साभार: ECI

इन्हीं 35 सीटों में एक सीट AIMIM के खाते में भी पहुँची है। इस जोकीहाट विधानसभा के आँकड़ों के अनुसार, जनसुराज को 35,354 वोट मिले हैं। जबकि AIMIM उम्मीदवार की जीत का मार्जिन 28,803 वोट है।

वहीं बहुजन समाज पार्टी (BSP) के खाते में पहुँची रामगढ़ विधानसभा सीट में प्रत्याशी सतीश कुमार ने केवल 30 वोटों से जीत हासिल की है। वहीं जनसुराज को 4,426 वोट मिले हैं, जिसका हार-जीत के वोट के अंतर से कोई लेना-देना नहीं है।

फोटो साभार: ECI

इन आँकड़ों से यह तो साफ हो गया कि इन सीटों पर जनसुराज का कोई असर नहीं दिखा है। जहाँ जीतने वाले दलों की जीत का अंतर जनसुराज को मिले वोट से कहीं कम है।

जनसुराज से महागठबंधन को नुकसान और NDA को पहुँचा लाभ?

इसका सीधा-सा मतलब यह है कि जनसुराज की मौजूदगी से केवल NDA विरोधी या महागठबंधन विरोधी होने का पता नहीं चलता है। जिस तरह के आँकड़े सामने आए हैं, वे यह नहीं दिखाते कि जनसुराज की वजह से महागठबंधन को नुकसान पहुँचा है या NDA को फायदा हुआ हो।

बल्कि जनसुराज के प्रभाव से NDA के भी वोट कटे है और अन्य दलों ने भी उसका असर झेला है। इन 35 सीटों के नतीजों को ही देखें तो कहीं भी ऐसा साफ-साफ नहीं दिखता कि जनसुराज की एंट्री से महागठबंधन को एकतरफा नुकसान हुआ हो और NDA को उतना ही बड़ा फायदा मिला हो। कुछ सीटों पर हालात उल्टे भी हुए हैं। कहीं जनसुराज का वोट NDA के हिस्से को काटता दिखता है तो कहीं महागठबंधन का वोट।

यानी राजनीतिक समीकरण सीट-दर-सीट बदलते रहे हैं। इससे पता लगता है कि जनसुराज का प्रभाव एकतरफा नहीं बल्कि मिश्रित है। उसका असर किसे कितना पड़ा, यह हर सीट की स्थानीय राजनीति और वहाँ के उम्मीदवारों की स्थिति पर निर्भर करता है।

दिल्ली ब्लास्ट पर मुँह सिलकर बैठी लिबरल गैंग में लगी आग, ‘प्रियंका’ नाम सुन सनातन पर फूटे: फैला रहे ‘मुस्लिम विक्टिम’ वाला प्रोपेगेंडा, आतंकियों का नाम लिखने में परहेज

दिल्ली कार ब्लास्ट और आतंकी डॉक्टरों के मॉड्यूल की लगातार गिरफ्तारी के बीच एक हिन्दू डॉक्टर प्रियंका शर्मा से पूछताछ के बाद सोशल मीडिया पर प्रोपेगेंडा फैलाने का दौर शुरू हो गया है। हालाँकि प्रियंका शर्मा को अब छोड़ भी दिया गया है। डॉक्टर प्रियंका के परिजनों के मुताबिक, ये पूछताछ जम्मू कश्मीर पुलिस ने सहारनपुर से गिरफ्तार जिहादी डॉक्टर आदिल अहमद के बारे में जानने के लिए की थी।

लालकिला ब्लास्ट और 2900 किलो विस्फोटक जमा करने के मामले में अल फलाह यूनिवर्सिटी से जुड़े डॉक्टरों के नाम आए। अब तक गिरफ्तार सभी डॉक्टरों के बारे में जो पता चला है, उसके अनुसार ये सभी इस्लामी कट्टरपंथी हैं। ये देश के सरकारी कॉलेजों में पढ़कर, करीब 90 फीसदी सब्सिडी के पैसों से एमबीबीएस और पीजी की डिग्री ली। मानवता की सेवा का प्रण लिया और निकल गए जिहादी बनकर देश को बर्बाद करने के लिए।

इन डॉक्टरों के खिलाफ देशभर में गुस्सा का माहौल है। एक के बाद एक मिल रहे सबूत इन डॉक्टरों के जिहादी होने की कहानी कह रहे हैं। ऐसे में एक हिन्दू डॉक्टर प्रियंका को हिरासत में लेकर की गई पूछताछ के बाद प्रतिक्रिया की बाढ़ आ गई है। दिल्ली ब्लास्ट के बाद आतंकियों से जुड़े इस मामले में पुलिस ने हजारों लोगों को पूछताछ के लिए बुलाया है। जहाँ इन आतंकियों ने काम किया, जहाँ से पढ़ाई की, उन जगहों पर काम करने वाले लोगों से रूटीन पूछताछ की जा रही है। हालाँकि, वे सभी संदिग्ध नहीं माने जा रहे हैं।

वहीं, जब प्रियंका का नाम इसमें आया तो प्रियंका का नाम लेकर सनातन को आतंकवाद से जोड़ कर दिखाने की कोशिश की जा रही है। ये कहा जा रहा है कि सिर्फ मुस्लिम ही आतंकी नहीं होते, हिन्दू भी हो सकते हैं।

एक यूजर ने कहा कि दिल्ली ब्लास्ट में जैसे ही प्रियंका का नाम आया, चैनलों में सन्नाटा पसर गया, हाय रे मुस्लिम एंगल…वही एक दूसरे यूजर ने लिखा कि मुसलमानों से सवाल करते थे,अब क्या करेंगे।

एक यूजर ने लिखा, “शर्मा जी की बेटी प्रियंका शर्मा दिल्ली ब्लास्ट केस में गिरफ्तार”

दरअसल प्रियंका शर्मा से पूछताछ होते ही उसे दोषी साबित करने की कोशिश होने लगी।

डॉक्टर प्रियंका से क्यों हुई पूछताछ?

दरअसल प्रियंका जनरल मेडिसीन में एमडी की पढ़ाई अनंतनाग के गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज से कर रही हैं। जिहादी डॉक्टर आदिल इसी कॉलेज में उसका सीनियर था और उसने जॉब भी ज्वाइन किया था। इसको लेकर ही पुलिस की टीम ने उससे पूछताछ की। फिलहाल प्रियंका का मोबाइल पुलिस के पास है।

प्रियंका के भाई भारत के मुताबिक, रात करीब 9 बजे प्रियंका के साथ वीडियो कॉल पर बात हो रही थी। 5 मिनट बाद प्रियंका के हॉस्टल में पुलिस की टीम पहुँची और गेट खटखटाया। इसके बाद प्रियंका का फोन कट गया। रात करीब 11 बजे प्रियंका के पति डॉक्टर अनिरुद्ध का फोन आया। उन्होंने बताया कि पुलिस ने प्रियंका को हिरासत में ले लिया है। इसके 1 घंटे बाद प्रियंका का फोन आया कि पूछताछ के बाद उसे छोड़ दिया गया है। उसका फोन पुलिस जाँच के लिए लैब भेज रही है।

डॉक्टर प्रियंका हरियाणा के रोहतक की रहने वाली हैं। उनके पति भिवानी में सरकारी डॉक्टर हैं। प्रियंका ने एमबीबीएस सोनीपत के खानपुर मेडिकल कॉलेज से किया था। भाई भारत सोनीपत में रोडवेज में क्लर्क है। पिता सतीश शर्मा शुगर मिल की सिक्योरिटी टीम में हैं और माँ हाउस वाइफ हैं।

देवेन्द्र का नाम आने पर भी किए गए थे कमेंट

लालकिला कार विस्फोट में इस्तेमाल की गई i20 कार के मालिक की खोज के दौरान देवेन्द्र सिंह का नाम आया था। दरअसल गुरुग्राम के नंबर HR26 को लेकर जब पुलिस कार मालिक की तलाश कर रही थी और मोहम्मद सलमान से पूछताछ कर रही थी तो उसने कहा था कि डेढ़ साल पहले उसने कार देवेन्द्र सिंह से ली थी। इसके बाद भी सोशल मीडिया पर कोहराम मचा। लेकिन जल्द ही पुलिस ने कार के मालिक अमीर राशिद अली को गिरफ्तार कर लिया।

डॉक्टर प्रियंका को छोड़ दिया गया है। इसको लेकर पुलिस का कोई बयान भी नहीं आया है। जब से इन जिहादी डॉक्टरों के मॉड्यूल का खुलासा हुआ है, यूपी से जम्मू कश्मीर तक धड़पकड़ शुरू हो गई। पूछताछ के बाद एक दूसरे से जुड़े तार का पता चला। लेकिन जैसे ही डॉक्टर प्रियंका से पूछताछ की बात सामने आई, प्रोपेगेंडा फैलाने वालों ने इस्लामी कट्टरपंथ की गंभीरता को कम करने के लिए प्रियंका का नाम लेना शुरू कर दिया। देवेन्द्र सिंह के केस में भी ऐसा ही हुआ था। जब पुलिस ने कार के असल मालिक आमिर अली को गिरफ्तार किया, तब प्रोपेगेंडा फैलाने वाले शांत हुए।

ये लोग तब तक चुप रहे, जब तक डॉक्टर प्रियंका शर्मा, देवेन्द्र सिंह जैसे नाम सामने नहीं आए। इन लोगों ने पहलगाम आतंकी हमले के वक्त भी यही किया था। जब टूरिस्ट आतंकियों के शिकार हुए, तब एक स्थानीय व्यक्ति की मौत होने की खबर भी आई। इसके बाद को प्रोपेगेंडा टीम इस बात को भी झुठलाने में लग गई की पर्यटकों का नाम पूछ-पूछ कर मारा गया। दरअसल सोशल मीडिया पर हो हल्ला मचाने वाले और प्रोपेगेंडा फैलाने वाले लोग अक्सर मरने वालों में एक मुस्लिम नाम ढूंढते हैं और साजिश करने वालों में कोई हिन्दू नाम। ताकि मुस्लिम कट्टरपंथ और आतंकवाद को जोड़ा न जा सके।

जब भी माना खत्म, ‘फीनिक्स’ की तरह उठ खड़े हुए चिराग पासवान: PM मोदी के हनुमान से बिहार के दमदार खिलाड़ी तक, जानें- LJP को कैसे दी संजीवनी

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के ‘सबसे दमदार’ खिलाड़ी बने चिराग पासवान का राजनीतिक करियर उतार-चढ़ाव भरा रहा है। पिता रामविलास पासवान का साया सिर से उठने के बाद उन्होंने पार्टी में बगावत का दौर देखा। चाचा पशुपतिनाथ पासवान ने जब पार्टी पर कब्जा कर लिया, तो चिराग अकेले पड़ गए। लेकिन उन्होंने पीएम मोदी को कभी नहीं छोड़ा। हमेशा खुद को मोदी का हनुमान बताते रहे।

चिराग पासवान को कभी चुका हुआ माना गया, तो कभी राजनीति पर छा गए। पिछले विधानसभा चुनाव में एक सीट जीते तो इस लोकसभा चुनाव 2024 में सभी 5 सीटें जीत ली। यहाँ तक कि जेडीयू के उतार चढ़ाव में भी उनका अहम किरदार रहा।

2021 में लोक जनशक्ति पार्टी में हुई थी बड़ी टूट

राम विलास पासवान के भाई और हाजीपुर के पूर्व सांसद पशुपति कुमार पारस ने 2021 में एलजेपी को तोड़ दिया था। दरअसल उन्हें चिराग पासवान का नेतृत्व स्वीकार्य नहीं था। ये टूट राम विलास पासवान के निधन के मात्र एक साल के भीतर हुई थी। इसके बाद चिराग पासवान ने एलजेपी रामविलास और पशुपतिनाथ पारस ने राष्ट्रीय लोकजनशक्ति पार्टी के नाम से अलग-अलग दल बना ली।

पशुपतिनाथ पारस को कैबिनेट में मिली थी जगह

एलजेपी पर पशुपतिनाथ पारस के कब्जे के बाद एनडीए ने उन्हें केन्द्रीय मंत्री बनाया था। दरअसल एलजेपी के सभी सांसद उनके साथ थे। उस वक्त भी चिराग पासवान ने अपनी सीमाएँ नहीं लाँघी। उन्होंने पीएम मोदी के प्रति सम्मान जताते हुए कहा था कि ये उनका अधिकार है कि टीम में वो किसे शामिल करेंगे, किसे नहीं। लेकिन पशुपतिनाथ पारस एलजेपी के सदस्य नहीं है, पार्टी तोड़ने के कार्य को देखते हुए उन्हें मंत्री न बनाया जाए, क्योंकि एलजीपी से उनका लेना देना नहीं है।” फिर भी पशुपति पारस मंत्री बने। चिराग पासवान ने इसके बाद भी पीएम मोदी और बीजेपी के खिलाफ कोई बयान नहीं दिया।

साल 2022 में नीतीश कुमार एनडीए से अलग होकर महागठबंधन के साथ चले गए और बिहार में नई सरकार बना ली। इसकी वजह चिराग पासवान को बताया गया। ये वक्त राजनीति दृष्टिकोण से चिराग पासवान के लिए सबसे चुनौती भरा था। लेकिन यहीं से उन्होंने वापसी भी शुरू की।

कहा जाता है कि आरजेडी और तेजस्वी यादव ने चिराग पासवान को कई बार अपने पाले में करने की कोशिश की, लेकिन चिराग टस से मस नहीं हुए और खुद को ‘मोदी का हनुमान’ कहते रहे। नीतीश के एनडीए से अलग होकर भी उन्होंने बीजेपी को उपचुनावों में समर्थन किया। जाहिर है इन सीटों पर जीत का सेहरा भी चिराग के सिर चढ़ा। आगे चल कर इसका फायदा भी उन्हें मिला।

2024 में एनडीए से किनारे किए गए पशुपतिनाथ और चिराग छाए

लोकसभा चुनाव 2024 में पशुपतिनाथ पारस की पार्टी राष्ट्र्रीय लोक जनशक्ति पार्टी को एनडीए ने एक भी सीट बिहार में लड़ने के लिए नहीं दिया। यहाँ तक कि हाजीपुर सीट से वे खुद लड़ना चाहते थे, लेकिन एनडीए को मनाने में विफल रहे। इससे आहत होकर उन्होंने एनडीए छोड़ने का ऐलान किया।

वहीं इस चुनाव में चिराग पासवान की पार्टी को 5 सीटें दी। इनमें हाजीपुर की सीट भी शामिल थी। चिराग की एलजेपी रामविलास ने 100 फीसदी स्ट्राइक रेट के साथ सारी सीटें जीत ली। इससे चिराग पासवान का राजनीतिक कद काफी बढ़ा और केन्द्र में उन्हें मंत्री बनाया गया। इसके साथ ही राम विलास पासवान की विरासत पर चाचा पशुपति पारस के दावे को भी खत्म कर दिया।

चिराग पासवान के जुड़ने और हटने का मतलब

बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में चिराग पासवान एनडीए का हिस्सा नहीं थे। उस वक्त उनकी पार्टी ने काफी खराब प्रदर्शन किया था। एलजेपी (रामविलास) 135 सीटों पर लड़ी, लेकिन सिर्फ 1 सीट ही निकाल पाई। उन्होंने बीजेपी के खिलाफ कुछ नहीं कहा, लेकिन सीएम नीतीश कुमार के खिलाफ जमकर हमले किए।

नतीजा ये हुआ कि जेडीयू 115 सीटों पर चुनाव लड़कर भी मात्र 43 सीटें जीत पाई। यानी इस चुनाव में चिराग पासवान जेडीयू के लिए ‘काल’ साबित हुए। दरअलस चिराग पासवान जब नीतीश कुमार के साथ नहीं थे, तो उन्होंने दिखा दिया कि वो नीतीश को कितना कमजोर कर सकते हैं। इस बार वो साथ थे तो अपनी ताकत भी दिखा दी।

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की बात करें तो इस वक्त चिराग पासवान न सिर्फ एनडीए में शामिल थे, बल्कि जेडीयू के साथ भी उनका राजनीतिक समीकरण सही था। चुनाव में इसका असर भी दिखा और जेडीयू 85 सीटें जीत गई।

चिराग पासवान ने भी 29 में से 19 सीटें जीतकर एनडीए को 200 पार पहुँचाने में अहम भूमिका निभाई। चिराग ने महागठबंधन से 17 सीटें छीन कर अपनी झोली में डाल ली। इससे उनका राजनीतिक कद और ऊँचा हो गया है। बिहार में दलितों के वे एकमात्र नेता हैं, उन्होंने ये एक बार फिर साबित कर दिया है।

इंजीनियरिंग और फिल्मों के बाद राजनीति में आए चिराग

चिराग पासवान की शुरुआती पढ़ाई दिल्ली में हुई। उन्होंने झांसी के एक कॉलेज से कंप्यूटर इंजीनियरिंग में दाखिला लिया लेकिन तीसरे सेमेस्टर के बाद कॉलेज छोड़ दिया। इसके बाद फिल्मों की ओर रुख किया। 2011 में ‘मिले न मिले हम’ फिल्म में कंगना रनौत के साथ काम किया। हालाँकि ये फिल्म फ्लॉप हो गई और बॉलीवुड को बाय-बाय करते हुए उन्होंने पिता रामविलास पासवान की छत्रछाया में राजनीति में कदम रख दिया।

राजनीतिक मौसम के वैज्ञानिक कहे जाते थे रामविलास पासवान

चिराग पासवान के पिता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री राम विलास पासवान ने 28 नवंबर 2000 में लोक जनशक्ति पार्टी की स्थापना की थी। पासवान समुदाय का बिहार में उन्हें एकमात्र नेता माना जाता था।बिहार विधानसभा चुनाव 2005 में उन्होंने 29 सीटें जीत ली थी। साथ ही 12 फीसदी वोट पाकर सबको चौंकाया था।

2014 में एनडीए गठबंधन में रामविलास पासवान के शामिल होने के पीछे चिराग को अहम वजह माना जाता है। राम विलास पासवान ने ही स्वीकार किया था कि उन्हें एनडीए में शामिल होने के लिए चिराग पासवान ने ही राजी किया। उससे पहले के चुनाव में भी LJP लगभग खत्म ही हो चुकी थी, लेकिन इस फैसले के बाद लोकसभा चुनाव 2014 में चिराग पासवान जमुई से सांसद चुने गए। 2019 में फिर वे जमुई से ही लड़े और दोबारा सांसद बने।

साल 2024 में उन्होंने अपने पिता के चुनाव क्षेत्र हाजीपुर से चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। इस बार मोदी कैबिनेट में भी उन्हें जगह मिली और अब बिहार चुनाव में उन्होंने कहीं से भी खुद की पार्टी को NDA की कमजोर कड़ी साबित नहीं होने दिया, बल्कि कड़ी लड़ाई वाली सीटों पर भी NDA को जीत दिलाई। अब चिराग पासवान ने अपनी राजनीतिक समझदारी से उन सभी को जवाब दे दिया है, जो उन्हें सिर्फ मौसम वैज्ञानिक के बेटे और पार्ट-टाइम नेता समझते थे।

ड्रग्स-गैंगवार-बैड इकोनॉमी, अब मैक्सिको में सड़कों पर उतरा GenZ: सत्ता परिवर्तन या किसी और लक्ष्य के पीछे US के पड़ोसी युवा- जानें सबकुछ

उत्तरी अमेरिका के देश मेक्सिको में शनिवार (15 नवंबर 2025) को भ्रष्टाचार, अपराध और सुरक्षा की कमी के खिलाफ हजारों की संख्या में Gen Z सड़क पर उतरे। ये विरोध प्रदर्शन मेक्सिको सिटी में राष्ट्रपति के आवास ‘नेशनल पैलेस’ के ठीक सामने हुए। कुछ प्रदर्शनकारियों ने’ नेशनल पैलेस’ की दीवारें कूदकर भीतर घुसने की भी कोशिश की, जिसके बाद पुलिस से हिंसक झड़प हुई।

देखते ही देखते Gen Z का यह प्रदर्शन दंगों में तब्दील हो गया। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर पत्थर, पटाखों, लाठियों और जंजीरों से हमला किया। यहाँ तक की पुलिस की ढाले और बाकी चीजें भी छीन ली गईं। इस हिंसा में 120 से अधिक घायल हुए, जिनमें से करीब 100 पुलिस अधिकारी हैं। ये बिल्कुल वैसा ही नजारा है जैसा सितंबर 2025 में नेपाल में देखा गया था, जहाँ Gen Z प्रदर्शन देश में सरकार बदलने की वजह बना।

कैसे शुरू हुआ मेक्सिको में Gen Z प्रदर्शन ?

नेपाल की होड़ में इन दिनों मेक्सिको की युवा पीढ़ी सड़कों पर उतर आई है। देश में Gen Z प्रदर्शन विश्वभर में चर्चा में हैं। यहाँ Gen Z ने सरकार के खिलाफ गुस्सा जाहिर किया। प्रदर्शन में Gen Z ने ‘अपराध के आगे कभी नहीं झुकेंगे’, ‘जस्टिस फॉर मंजो’, ‘देश मर रहा है’, ‘सरकार इस्तीफा दो’, ‘नार्को टेस्ट’ जैसे नारों लगाए।

कई प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति के इस्तीफे की माँग वाले पोस्टर और बैनर भी लगाए। इस दौरान One Piece कार्टून से प्रेरित समुद्री के खोपड़ी वाला झंडा लहराया गया, जिसे इस आंदोन का वैश्विक प्रतीक माना गया। यह आंदोलन सोशल मीडिया पर आह्वान के बाद अचानक से जोर पकड़ गया और फिर देश के और भी कई बड़े शहरों में फैल गया।

वैसे तो इस आंदोलन में सबसे बड़ी भागीदारी युवाओं की रही, खासकर इंटरनेट और सोशल मीडिया पर सक्रिय Gen Z की। लेकिन देश के बाकी नागरिक, बुजुर्ग और विपक्षी दलों के लोगों ने आंदोलन का समर्थन किया।

मेक्सिको में Gen Z प्रदर्शन में क्या हुआ?

प्रदर्शन की शुरुआत शांतिपूर्ण रही पर जैसे-जैसे भीड़ बढ़ी, तो प्रदर्शन उग्र और हिंसक हो गया, जिसमें पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पे भी शुरू हो गईं। प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति के आवास राष्ट्रीय महल को घेर लिया और दीवार फांदने की कोशिश की। प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए पुलिस ने आँसू गैस का इस्तेमाल किया। उधर से जवाबी कार्रवाई में प्रदर्शनकारियों ने पत्थरबाजी और लाठी-डंडों से हमला किया। सामने आई तस्वीरों में कुछ लोगों के हाथ में हथौड़ा भी देखा गया।

इस हिंसा में 120 से अधिक लोग घायल हुए, जिनमें से 100 से ज्यादा पुलिसकर्मी थे। मेक्सिको सिटी के जन सुरक्षा सचिव पाब्लो वाजक्वेज ने बताया कि लगभग 20 नागरिक घायल भी हुए हैं। वहीं करीब 20 प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी भी हुई जबकि 20 अन्य पर प्रशासनिक आरोप लगाए गए हैं।

मेक्सिको में Gen Z प्रदर्शन की वजह?

मेक्सिको के इस Gen Z प्रदर्शन की वजह देश में बढ़ते भ्रष्टाचार, सार्वजनिक हत्याएँ और न्याय प्रणाली में कमी है, जिसने युवा वर्ग की सहनशक्ति की परीक्षा ली। इस आंदोलन की शुरुआत मिचोआकन (Michoacan) के मेयर कार्लोस मंजो की हत्या के बाद हुई, जो लंबे समय से ड्रग कंट्रोल और अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई कर रहे थे। उनकी हत्या ने देशभर में गहरा सदमा और Gen Z में गुस्सा भड़का दिया।

Gen Z ने इस घटना को सरकार की असफलता और अपराध के खिलाफ नाकामी का प्रतीक माना और इसके खिलाफ आवाज उठाई। इस आंदोलन में युवाओं ने भ्रष्टाचार के खिलाफ सिस्टम की ढिलाई, राजनीतिक जवाबदेही की कमी और अपराधियों को दंड न मिलने को लेकर भारी निराशा जताई। सोशल मीडिया के माध्यम से जुड़े Gen Z ने युवाओं को एकत्र किया और व्यापक समर्थन प्राप्त किया, जिसमें बुजुर्ग और विपक्षी दल भी शामिल हुए। वे सरकार से पारदर्शिता, सुरक्षा और सख्त कार्रवाई की माँग कर रहे हैं।

मेक्सिको Gen Z प्रदर्शन का राजनीतिक एंगल

मेक्सिको का यह प्रदर्शन Gen Z की सरकार के खिलाफ बगावत है। ठीक वैसे ही जैसे नेपाल में Gen Z ने सरकार के काम से नाराज होकर सड़क पर हिंसक प्रदर्शन किया और पूरे देश को घुटने टेकने पड़े। लेकिन मेक्सिको में Gen Z का यह प्रदर्शन कहीं न कहीं राजनीतिक हलखों से जुड़ा लगता है। मेक्सिको में फिलहाल वामपंथी दल मोरेना (Morena) की सत्ता है। प्रदर्शन में भी युवाओं ने ‘Go Morena’ के नारे लगाए।

शनिवार को जिस राष्ट्रपति आवास ‘नेशनल पैलेस’ से यह विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ, इसकी वजह भी साफ थी। दरअसल, प्रदर्शन से कुछ दिन पहले मेक्सिको की राष्ट्रपति शीनबॉम ने दणिणपंथी दलों पर Gen Z आंदोलन में घुसपैठ करने के आरोप लगाए थे। उन्होंने कहा था कि प्रदर्शन की संख्या बढ़ाने के लिए सोशल मीडिया पर बॉट्स का इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे कुछ Gen Z सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स ने भी समर्थन वापस ले लिया।

क्या हिंसा को बढ़ावा दे रहा सोशल मीडिया?

मेक्सिको का यह Gen Z प्रदर्शन ठीक उसी दिशा में पहुँच गया जो नेपाल के Gen Z प्रदर्शन में हुआ। इसकी वजह सोशल मीडिया भी है। यूँ तो नेपाल और मेक्सिको में हुए दोनों ही प्रदर्शन की शुरुआत सोशल मीडिया से ही हुई। लेकिन प्रदर्शन को दंगा बनाने का काम भी सोशल मीडिया का ही रहा। सोशल मीडिया ने केवल Gen Z ही नहीं बल्कि आम नागरिकों को भी बढ़ावा दिया।

मेक्सिको में पूर्व राष्ट्रपति विसेंट फॉक्स और अरबपति रिकार्डो सेलिनास प्लीगो ने सार्वजनिक रूप से ऑनलाइन अपना समर्थन व्यक्ति किया। तभी दक्षिणपंथी दल सक्रिय हो गए और Gen Z प्रदर्शन में शामिल होने लगे। नतीजतन, शांतिपूर्ण Gen Z प्रदर्शन ने हिंसक रूप ले लिया। नेपाल में भी यही हुआ था, जब सोशल मीडिया का आह्वान पर हुए Gen Z प्रदर्शन में उग्रवादियों की घुसपैठ ने देश की संपत्ति को नुकसान पहुँचाया। लेकिन मेक्सिको में समय रहते Gen Z प्रदर्शन पर काबू पा लिया गया।

पहली बार हार से ही शुरू होता है भोजपुरी सितारों का राजनीतिक करियर, मनोज- निरहुआ-पवन से खेसारी तक दिखा यही पैटर्न: जानिए गैर-BJP पार्टियों के टिकट पर क्यों मिलती है मात?

भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े कलाकारों की राजनीति में एंट्री अक्सर हार से होती है। चाहे ये किसी पार्टी से चुनाव लड़ रहे हों या फिर निर्दलीय ही मैदान में उतरे हों। इस लिस्ट में एक से बढ़कर एक भोजपुरी फिल्मी सितारों का नाम शामिल है। इसमें मनोज तिवारी, रवि किशन, दिनेश लाल यादव (निरहुआ) से लेकर बिहार चुनाव 2025 में हारे खेसारीलाल, रितेश पांडे तक का नाम लिया जा सकता है।

भीड़ को ‘वोटर’ नहीं बना पाते कलाकार

ज्यादातर ये कलाकार बिहार, यूपी और झारखंड के क्षेत्रों में लोकप्रिय होते हैं, क्योंकि यहाँ भोजपुरी जानने और समझने वालों की बड़ी आबादी रहती है। इन क्षेत्रों में ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्र हैं। इनकी फिल्में, डायलॉग और गाने आम लोगों की जिंदगी से जुड़े होते हैं। इसलिए ये सेलिब्रिटीज भीड़ तो जमा कर लेते हैं और उन्हें देख कर उत्साहित भी होते हैं। लेकिन जब भीड़ को वोट में तब्दील करने की बारी आती है, तो पीछे रह जाते हैं।

इसकी वजह रणनीतिक कमजोरी, अनुभव की कमी और स्थानीय मुद्दों पर इनकी कमजोर पकड़ को माना जा सकता है। कुछ उत्साहित जनता तो इन्हें वोट दे देती है, लेकिन आम लोग इन्हें वोट नहीं देते। जनता ये भी सोचती है कि अगर वोट दिया, तो जीतने के बाद फिर शायद दर्शन भी न दे।

लेकिन, हारे हुए ये कलाकार जैसे ही बीजेपी से जुड़ते हैं, इनकी जीत का परचम लहराने लगता है। इसकी वजह है कि जनता सोचती है कि पार्टी उनके बीच रहेगी और कलाकार पार्टी से जुड़ा है, तो उस तक पहुँचना आसान होगा।

मनोज तिवारी- भोजपुरी फिल्मों के लोकप्रिय अभिनेता और गायक रहे मनोज तिवारी ने अपने राजनीति की शुरुआत उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी से की। 2009 लोकसभा चुनाव में वे योगी आदित्यनाथ के खिलाफ गोरखपुर से चुनाव मैदान में उतरे, लेकिन बुरी तरह हार गए।

राजनीति में पहली हार का सामना करने के बाद मनोज तिवारी ने पाला बदला और 2013 में बीजेपी ज्वाइन किया। 2014 लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने उत्तर- पूर्व दिल्ली से चुनाव मैदान में उतारा। इस सीट पर बिहार-यूपी के लोग बड़ी संख्या में हैं। उन्होंने न सिर्फ जीत दर्ज की, बल्कि लगातार तीन बार (2014, 2019, 2024) से जीतते आ रहे हैं। दिल्ली बीजेपी का ये एक प्रमुख चेहरा भी हैं।

रवि किशन- भोजपुरी के बड़े सितारों में रवि किशन का नाम भी आता है। राजनीति में उन्होंने 2014 में एंट्री की और लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के जौनपुर से चुनाव मैदान में उतरे। उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इस पर उन्होंने कहा था कि कॉन्ग्रेस ज्वाइन करना उनकी बड़ी भूल थी।

3 साल बाद 2017 में उन्होंने बीजेपी की सदस्यता ग्रहण की। लोकसभा चुनाव 2019 में उन्हें बीजेपी ने गोरखपुर से चुनाव मैदान में उतारा। उन्होंने जीत दर्ज की और दोबारा 2024 में भी गोरखपुर से ही बीजेपी के सांसद बने।

दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’- भोजपुरी फिल्मों और ‘निरहुआ रिक्शावाला’ सीरीज से मशहूर हुए दिनेश लाल यादव 2019 में राजनीति में आए। उन्हें बीजेपी ने आजमगढ़ से समाजवादी पार्टी के गढ़ और अखिलेश यादव जैसे दिग्गज के खिलाफ चुनाव मैदान में उतारा। जाहिर है टक्कर देने के बावजूद निरहुआ चुनाव हार गए।

साल 2022 के उपचुनाव में आजमगढ़ सीट से उन्हें बीजेपी ने फिर मौका दिया। इस बार अखिलेश यादव की अनुपस्थिति में वे चुनाव जीत गए। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव के रिश्तेदार धर्मेन्द्र यादव से वे चुनाव हार गए।

पवन सिंह- भोजपुरी ‘पावर स्टार’ पवन सिंह ने 2024 में बीजेपी का दामन थामा। पार्टी ने उन्हें पश्चिम बंगाल के आसनसोल लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाने की घोषणा की, लेकिन उन्होंने अपना नाम वापस ले लिया और बिहार के काराकाट सीट से निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरे। यहाँ उन्हें हार का सामना करना पड़ा।

बिहार चुनाव 2025 में भी उनके चुनाव लड़ने की चर्चा थी, लेकिन व्यक्तिगत विवादों की वजह से चुनाव मैदान से उन्होंने दूरी बनाई।

भोजपुरी सुपर स्टार खेसारी लाल यादव– बिहार चुनाव 2025 में राजनीति में एंट्री करते हुए उन्होंने आरजेडी की टिकट पर छपरा से चुनाव लड़ा, लेकिन बीजेपी उम्मीदवार छोटी कुमारी ने उन्हें हरा दिया। खेसारी लाल काफी लोकप्रिय कलाकार हैं और छपरा जैसे भोजपुरिया इलाके से चुनाव भी लड़ रहे थे, पर जीत नहीं पाए। अब उनका कहना है कि वो राजनीति से दूर रहेंगे।

रितेश पांडे– बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज की टिकट पर करगहर सीट से चुनाव मैदान में उतरने वाले भोजपुरी गायक रितेश पांडे को हार का सामना करना पड़ा। जाहिर है जब पार्टी ही खाता नहीं खोल पाई, तो रितेश कहाँ जीतते? लेकिन उन्हें वोट भी मात्र 7.45 फीसदी ही मिला।

गुंजन सिंह– भोजपुरी एक्टर गुंजन सिंह ने लोकसभा चुनाव 2024 में बिहार के नवादा से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में अपनी किस्मत आजमाया। उन्हें यहाँ बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। बीजेपी उम्मीदवार विवेक ठाकुर ने यहाँ से जीत हासिल की। गुंजन सिंह तीसरे नंबर पर रहे । उन्हें मात्र 3.4 फीसदी वोट मिले।

कुणाल सिंह– लोकसभा चुनाव 2014 में भोजपुरी फिल्मों के दिग्गज कलाकार कुणाल सिंह ने राजनीति में आने की सोची। उन्होंने पटना साहिब से कॉन्ग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन बीजेपी के शत्रुघ्न सिन्हा से हार गए।

क्यों गैर-बीजेपी पार्टियों से नहीं मिल पाती सफलता?

भोजपुरी सितारे हों या पैराशूट कैंडिडेट, फिर राजनीति से इतर चाहे वो किसी भी बैकग्राउंड के हो। इनकी पॉपुलैरिटी इन्हें बीजेपी से इतर जीत नहीं दिला पाती। इसे समझने के लिए राजनीतिक जड़ को देखना होगा। दरअसल, किसी भी पार्टी में ऊपर से थोपे गए कैंडिडेट-भोजपुरी सितारे रैलियों में तो भीड़ खींच लेते हैं, लेकिन इनके नाम की घोषणा होने के साथ ही पार्टियों में रूठने मनाने का जो दौर शुरू होता है, वो थम नहीं पाता।

बात खेसारी लाल यादव की ही करें, तो सालों से छपरा विधानसभा सीट पर जो आरजेडी नेता मेहनत कर रहा हो, उसकी जगह अचानक से मैदान में खेसारी लाल यादव आ गए। ऐसे में उसका नाराज होना तो बनता ही है। ऐसे में आरजेडी ने सालों से मेहनत किए पार्टी नेता को छोड़ दिया, तो उसमका नुकसान खेसारी को उठाना पड़ा।

दूसरी बात, अगर उस नेता ने बूथ से लेकर विधानसभा क्षेत्र के सभी अहम पदों पर लोगों के साथ तालमेल बिठाया, तो ये एक दिन काम नहीं। खेसारी लाल यादव टिकट मिलने के बाद मैदान में आए। अचानक पार्टी के सभी अहम लोग उनसे मिल तक नहीं पाए, संगठन और वोटिंग के दिन की तो बात भी छोड़ दीजिए। इस मामले के अलावा भी खेसारी लाल के खिलाफ उनकी कई बयानबाजियाँ भी गई। फिलहाल, ये मुद्दा यहाँ नहीं है। यहाँ बात भी सिर्फ खेसारी की नहीं हो रही, ये उदाहरण हर उसे पैराशूट कैंडिडेट पर लागू होती है, जबतक कि वो कोई करिश्माई व्यक्ति न हो।

लोकप्रियता के साथ ‘काडर’ जरूरी

चूँकि बीजेपी के अलावा ज्यादातर पार्टियों में हाई-कमान की तानाशाही चलती है, ऐसे में संगठन के जमीनी लोग पैराशूट कैंडिडेट से दूर हो जाते हैं। वहीं, बीजेपी में रूठों को मनाने की परंपरा रही है। एक-एक विधानसभा क्षेत्र में पूरी की पूरी ताकत झोंक देने की परपंरा रही है। प्रमोद महाजन इसे ‘कार्पेट मैनेजमेंट’ कहते थे। ये काम बीजेपी में अब भी होता है। ऐसे में बीजेपी में आकर इन नेताओं-अभिनेताओं को सफलता मिलनी पक्की हो जाती है। एक तरफ उनका खुद का करिश्माई व्यक्तित्व होता है, तो दूसरी तरफ संगठन का जोर, जो मतदाताओं के साथ घर से लेकर पोलिंग बूथ तक जुड़े रहते हैं।

अब बड़े कैनवस पर देखेंगे, तो साफ दिखेगा कि क्यों भोजपुरी स्टार्स की राजनीति में एंट्री होते ही हार मिलती है। साफ है कि उनके स्टारडम के जादू को वोटों में तब्दील कर पाने के लिए संगठन का वो साथ नहीं मिल पाता, जो जरूरी होता है। इसके उलट मैथिली ठाकुर का उदाहरण लें तो तमाम कठिनाइयों को पीछे छोड़ते हुए बीजेपी ने उनकी जीत सुनिश्चित की, यहाँ तक कि खुद गृहमंत्री अमित शाह ने उनके लिए रैली को संबोधित किया।

ये पूरा पैटर्न बताता है कि किसी भी स्तर पर चुनाव के लिए सिर्फ स्टारडम काफी नहीं होता, बल्कि इसके लिए चाहिए होते हैं समर्पित कार्यकर्ता। उनके साथ आता है विजन, रणनीति और राजनीतिक सोच, यही बीजेपी की असली ताकत है। इस बात को जो भी नेता-अभिनेता समझ जाते हैं, वो फिर बीजेपी के साथ जुड़ जाते हैं।

इसे इस बात से समझिए कि रविकिशन को गोरखपुर से लोकसभा चुनाव लड़ाया गया और खुद योगी आदित्यनाथ बतौर मुख्यमंत्री और लोकल गार्जियन उनके साथ खड़े रहे, ऐसे में रविकिशन को क्यों सफलता नहीं मिलती? वहीं, खेसारी हो या रितेश पांडे, ये अपने-अपने इलाके में सिर्फ क्राउड पुलर ही बन कर रह गए-वोट पुलर नहीं बन पाए।

अधिक वोट पाने से तय नहीं होती ज्यादा सीटों पर जीत: समझिए ‘वोट शेयर’ का सारा खेल, पढ़िए क्यों RJD समर्थकों के ‘वोट चोरी’ वाले दावे हैं खोखले

बिहार में एनडीए ने शानदार जीत के साथ सत्ता में वापसी की है। गठबंधन ने 243 में से 202 सीटें जीती हैं। दूसरी ओर महागठबंधन को केवल 35 सीटें मिलीं। कॉन्ग्रेस की सीटें कम हुईं और राष्ट्रीय जनता दल मात्र 25 सीटें ही जीतने में कामयाब रहा।

दोनों गठबंधनों द्वारा जीती गई सीटों में भारी अंतर होने के बावजूद, वोट शेयर के आँकड़े कुछ और बयाँ करते हैं। नतीजों के मुताबिक, राजद का वोट शेयर सबसे ज़्यादा 23% रहा। उसे 1,15,46,055 वोट मिले। भाजपा का वोट शेयर 20% और उसे 1,00,81,143 वोट मिले, जबकि जदयू को 96,67,118 वोट मिले, जो कुल वोटों का 19.25% है।

राष्ट्रीय जनता दल को सबसे ज्यादा वोट मिलने के बावजूद 25 सीटें ही क्यों मिली? ये सवाल सबके मन में उठ रहा है। कुछ लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि यह ‘वोट चोरी’ है, और राजद को वोट शेयर के आधार पर जीतना चाहिए था। कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता सूरज जी नाइक ने इसे ‘बिहार में शुद्ध #वोटचोरी, जीत नहीं’ कहा और स्पष्टीकरण माँगा।

कई अन्य सोशल मीडिया यूजर्स ने भी इसी तरह के पोस्ट किए। कुछ ने इसे चुनाव आयोग द्वारा आँकड़ों में हेरफेर बताया, तो कुछ ने ‘जादू/रहस्य’ को समझाने की कोशिश की।

पहली नजर ये आँकड़ा लोगों को भ्रमित कर सकता है, लेकिन नतीजों में कोई गड़बड़ी नहीं है। संसदीय लोकतंत्र को अपनाने के बाद से भारत की चुनाव प्रणाली इसी तरह काम करती आ रही है। सबसे अहम बात ये है कि चुनाव परिणाम अलग-अलग क्षेत्रों में जितने मत मिलते हैं, उन पर निर्भर करता है।

चुनाव आयोग की वेबसाइट पर सभी निर्वाचन क्षेत्रों के विस्तृत परिणाम उपलब्ध हैं। यहाँ हर निर्वाचन क्षेत्र में हर एक उम्मीदवार को मिले मतों को देखा जा सकता है। प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में, जिस उम्मीदवार को सबसे ज्यादा मत मिले, वह चुनाव जीत गया। जीत का अंतर 1 वोट हो या 1 लाख वोट, इससे फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि जीतता तो केवल एक व्यक्ति ही है।

चूँकि भारत में अधिकांश सीटों पर कई उम्मीदवारों के बीच बहुकोणीय मुकाबला होता है, इसलिए जीतने वाले उम्मीदवार को आम तौर पर लगभग 30-35% वोट ही मिलते हैं। 50% से ज्यादा वोट लाने की हमारे यहाँ अनिवार्यता भी नहीं है, जैसा कि अमेरिका जैसे देशों में होता है।

किसी पार्टी को पूरे राज्य में मिले कुल वोट का चुनाव प्रणाली में कोई महत्व नहीं है। जीतने के लिए जरूरी है किसी खास निर्वाचन क्षेत्र में सबसे ज्यादा मत लाना। यही कारण है कि एक पार्टी (या गठबंधन) अपने प्रतिद्वंद्वी से कम वोट पाकर भी ज्यादा सीटें जीत जाती है। अथवा ज्यादा वोट पाकर भी पार्टियाँ कम सीटें निकाल पाती हैं।

यह केवल भारत में ही नहीं होता, बल्कि यूके, कनाडा जैसे देशों में भी होता है। हालाँकि, बहुदलीय प्रणाली और गठबंधन की वजह से भारत में खासकर विधानसभा चुनाव में ये साफ दिख जाता है। अधिकांश पश्चिमी देशों में ऐसा कम देखने को मिलता है, क्योंकि यहाँ 2-4 प्रमुख पार्टियाँ हैं।

राजद को अधिक वोट मिलने का कारण यह है कि उन्होंने कहीं अधिक सीटों पर चुनाव लड़ा था। हालाँकि वे ज़्यादातर सीटें नहीं जीत पाए, फिर भी उन्हें उन निर्वाचन क्षेत्रों में अच्छा-खासा वोट मिला। इससे पार्टी के कुल वोटों की संख्या में इजाफा हुआ। राजद ने जहाँ 143 सीटों पर चुनाव लड़ा, वहीं भाजपा और जदयू ने 101-101 सीटों पर चुनाव लड़ा। यानी, राजद के कुल वोटों में 42 अतिरिक्त सीटों के वोट जुड़ गए। इसलिए कुल वोटों को लेकर बीजेपी या जदयू से उसकी तुलना करना गलत है।

भारतीय चुनावों में वोट शेयर और जीती हुई सीटों के बीच कई अंतर होते हैं। जो पार्टी कम सीटों पर चुनाव लड़ती है। और उन सीटों पर उनके वोटर ज्यादा हैं, तो औसत वोट उसे ज्यादा मिलेगा, वहीं अगर कोई पार्टी सभी सीटों पर चुनाव लड़ती है, यहाँ तक कि उन सीटों पर भी जहाँ वह जीत नहीं सकती, तो भी उसे उन सीटों पर कुछ वोट मिलेंगे। इससे पार्टी को मिले कुल वोटों में तो बढ़ोतरी होगी, लेकिन सीटें जीतना संभव नहीं होगा।

एक और वजह यह है कि विपक्षी दलों में, राजद ने अपने सहयोगियों की तुलना में काफ़ी बेहतर प्रदर्शन किया है। इसका मतलब है कि हारने वाली सीटों पर भी, वह काफी वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रही। इससे पार्टी का वोट शेयर बढ़ा, लेकिन जीती हुई सीटें नहीं बढ़ीं।

गौरतलब है कि विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या अलग-अलग होती है। कहीं ज्यादा मतदाता होते हैं तो कहीं बेहद कम। इसलिए जब कोई पार्टी कम अंतर से ज्यादा आबादी वाली सीट हारती है, तो उसके वोट शेयर में काफी वोट जुड़ जाते हैं। लेकिन नतीजों पर उसका फर्क नहीं पड़ता।

यह भी सच है कि राजद ने भाजपा और जद(यू) से 42 ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन उसे भाजपा से केवल 14 लाख और जद(यू) से केवल 18 लाख ज़्यादा वोट मिले। चूँकि राजद 42 सीटों पर भी वोट मिले, इसलिए उसके द्वारा लड़ी गई प्रत्येक सीट पर औसत वोट भाजपा और जद(यू) से कम हो गया।

महागठबंधन में ‘फ्रैंडली फाइट’ 12 सीटों पर हुई। इन सीटों पर एनडीए का पूरा वोट एक ही उम्मीदवार को गया, वहीं महागठबंधन के वोट उन्हीं सीटों पर गठबंधन के 2-3 उम्मीदवारों में बँट गए।

इन सब बातों से यह स्पष्ट है कि बिहार में सबसे ज्यादा वोट शेयर हासिल करने के बावजूद राजद को केवल 25 सीटें ही क्यों मिलीं, इसमें कोई रहस्य नहीं है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि भारत की चुनाव प्रणाली इसी तरह काम करती है। राजद के उम्मीदवार अपनी-अपनी सीटें हार गए, और यही बात मायने रखती है, पार्टी को मिले कुल वोट नहीं।

अगर किसी उम्मीदवार या पार्टी को लगता है कि मतगणना प्रक्रिया या परिणामों की घोषणा में कोई गड़बड़ी हुई है, तो वे याचिका दायर कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए कोई ठोस वजह बताना पड़ता है। गौरतलब है कि मतगणना सहित पूरी चुनाव प्रक्रिया उम्मीदवारों और पार्टियों के एजेंटों की मौजूदगी में होती है।

बिहार में एसआईआर प्रक्रिया के विरोध में राहुल गाँधी और महागठबंधन के नेताओं ने जमकर शोर मचाया, लेकिन कोर्ट में कोई याचिका दायर नहीं की। इसी तरह ‘वोट चोरी’ का आरोप लगा रही राजद या कॉन्ग्रेस का कोई भी उम्मीदवार परिणामों को कोर्ट में चुनौती देगा, इसकी संभावना नहीं दिख रही। ये सिर्फ ‘वोट चोरी’ का आरोप हर मंच पर लगाएँगे।

इसलिए सबसे ज्यादा वोट हासिल करने के बावजूद राजद ने इतनी कम सीटें कैसे जीतीं? इसका जवाब मिल गया होगा। यह किसी ‘वोट चोरी’ या किसी गड़बड़ी की ओर इशारा नहीं करता। यह संविधान सभा द्वारा अपनाई गई चुनाव प्रणाली के अनुसार है, और यह तब तक लागू रहेगा जब तक संविधान में बदलाव नहीं किया जाता और भारत कोई अलग चुनाव पद्धति नहीं अपना लेता।

2020 में अंकुरित हुआ था जो वामपंथी विष बेल, उसे 5 साल में ही बिहार ने फिर से किया दफन

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 कई दूरगामी राजनीतिक संदेश देने वाला रहा है। सत्तारूढ़ NDA को मिले स्पष्ट बहुमत ने जहाँ एक और दिखाया कि मतदाता अभी भी नीतीश कुमार की साफ छवि और विकासवादी राजनीति के साथ खड़े हैं। वहीं, RJD के खराब प्रदर्शन ने दिखाया कि उनका कोर वोट बैंक MY (मुस्लिम-यादव) भी उनसे छिटक रहा है। AIMIM को मिली 5 सीटों से उनके मुस्लिम बहुल इलाकों में पैठ बनाने की पुष्टि हुई तो बिहार ने एक बार फिर वामपंथ की ‘विषैली राजनीति’ को नकार दिया।

गुणा-गणित से 3 सीटों तक पहुँचीं लेफ्ट पार्टियाँ

इस विधानसभा चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्ससिस्ट-लेनिनिस्ट) (लिबरेशन) को जहाँ 2 सीटें मिलीं तो वहीं कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्ससिस्ट) के हाथ केवल एक सीट लगी। इन तीनों सीटों पर भी लेफ्ट के विचार से ज्यादा असर निर्दलीय उम्मीदवारों के गुणा-गणित का दिखाई पड़ा।

काराकाट सीट पर CPI (ML) (L) को 2,836 वोटों से जीत मिली तो इस सीट पर निर्दलीय चुनाव लड़ रहीं भोजपुरी सुपरस्टार पवन सिंह की पत्नी ज्योति सिंह को 23,469 वोट मिले। कमोबेश यही स्थिति लेफ्ट को मिली अन्य 2 सीटों पर दिखाई पड़ी। यानी अगर सीधा मुकाबला होता तो शायद लेफ्ट के हाथ ये सीटें भी ना आतीं।

जब बिहार ने RJD को किया था खारिज

दिलचस्प यह है कि यह पहली बार नहीं है जब वामपंथी दलों या RJD को बिहार ने इस तरह से नकारा हो। 2010 में RJD की ऐतिहासिक हार के बाद माना गया कि बिहार ने जंगलराज को प्रश्रय देने वाली पार्टी को जमीदोज कर दिया था। उसके उस स्मृति से हमेशा के लिए दूरी बना ली है जो उसके पिछड़ेपन का प्रतीक बनी हुई थी। नीतीश कुमार के सुशासन मॉडल ने उस जनमत को और मजबूत किया। RJD को उस चुनाव में केवल 22 सीटें मिली थीं।

2010 बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम (साभार: ECI)

हालाँकि, 2015 आते-आते नीतीश कुमार के राजनीतिक प्रयोगों के कारण RJD फिर जिंदा दिखाई देने लगी और उसकी नीतीश कुमार के साथ सत्ता में वापसी हो गई। इसके अगले चुनाव में भी हालात RJD के अनूकुल दिखाई दिए लेकिन उसके पीछे की बड़ी वजह चिराग पासवान थे। चिराग पासवान 2020 के चुनावों के दौरान नीतीश कुमार से नाराज थे और उनकी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए थे।

इसके कारण RJD को मदद मिली और पार्टी एक बार फिर ताकतवार बनकर वापस लौटी। हालाँकि, कॉन्ग्रेस-RJD की जीत फिर भी इतनी बड़ी नहीं थी कि उन्हें सत्ता दिला पाती। इसी चुनाव में वामपंथी दलों ने भी वापसी की थी। 2020 के चुनावों में CPI (ML) (L) को 12 तो CPI और CPI (M) को 2-2 सीटें मिलीं। यानी लंबे वक्त पहले जिस वामपंथ को बिहार ने खारिज कर दिया था वो 16 सीटों के साथ उसके फिर से वापसी करने की अटकलें लगने लगी थीं।

2015-2020 बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे (फोटो: PRS India)

2024 में लोकसभा चुनावों में भी CPI (ML) (L) ने बिहार में 2 सीटों पर जीत दर्ज की और लगने लगा की लेफ्ट की पार्टियाँ बिहार में एक बार फिर दम दिखा रही हैं। CPI-ML ने यह संकेत दिया कि बिहार के कुछ हिस्सों में उसकी जमीन अब भी सुरक्षित है।

2024 बिहार लोकसभा चुनाव परिणाम (ECI)

चिराग द्वारा दी गई ऑक्सीजन जब इस वार वामपंथियों और RJD से हटी तो उन्हें अपनी असलियत दिख गई। बिहार की जनता से RJD और वामंपथी दलों की एक बार फिर से सूपड़ा साफ कर दिया। जनता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर अपना विश्वास और पुख्ता किया है। जिस तरह से एकजुट होकर NDA ने चुनाव लड़ा उससे अगर वोटरों के मन में कोई शंका थी भी तो वो भी दूर हो गई। जनता ने स्पष्ट और एक तरफा मत दिया, वोटों की इस सुनामी में वामपंथी दल साफ हो गए।

फिर से ना पनपे ‘विष बेल’: अब NDA की जिम्मेदारी

अब NDA के सामने भी चुनौती है कि वो इस जनादेश का सम्मान करे। जनता ने उसे सिर्फ ‘विकल्प’ नहीं बनाया है बल्कि पूर्ण ‘विश्वास’ भी दिया है। यह विश्वास इस बात पर आधारित है कि NDA बिहार को उन पुराने दौरों में वापस नहीं ले जाएगा जिनमें वामपंथी उग्रवाद, जातीय हिंसा, आपराधिक राजनीति और संस्थागत दुर्बलता हावी रहती थी।

NDA को भी यह समझना होगा कि आगे वो ऐसे किसी भी राजनीतिक प्रयोग से बचें जिससे वामपंथी दलों को फिर से ताकत मिल सके। यह जनमत अतीत को दफन करने का विश्वासमत है। यह जनमत दिखाता है कि बिहार के लोग अपने सुरक्षित भविष्य के लिए NDA पर भरोसा कर रहे हैं। PM मोदी और नीतीश कुमार पर भरोसा कर रहे हैं।

जनता ने स्थिरता और विकास के नाम पर फैसला सुनाया है। यह फैसला सिर्फ NDA के पक्ष में नहीं है बल्कि यह फैसला उस बिहार के पक्ष में है जो आगे बढ़ना चाहता है, जो अपने युवा को अवसर देना चाहता है और जो किसी भी कीमत पर अराजकता के दौर में वापसी नहीं चाहता।

रील में अर्श पर, रियल में फर्श पर: प्रशांत किशोर की जनसुराज बिहार की जमीन पर क्यों हो गई साफ?

बिहार विधानसभा चुनाव में लड़ाई तो मुख्य रूप से सत्तारूढ़ राजग और विपक्षी दलों के महागठबंधन के बीच थी, लेकिन तमाम निगाहें एक और मोर्चे पर भी लगी हुई थीं। यह मोर्चा था चुनावी रणनीतिकार से नेता बनने की कवायद में जुटे प्रशांत किशोर की चुनावी पारी की शुरुआत और उसका परिणाम। उनकी नई नवेली जनसुराज पार्टी अपना खाता खोलना तो दूर इक्का-दुक्का सीटों को छोड़कर अपनी जमानत बचाने तक में नाकाम हुई।

सक्रिय राजनीति का पहला चुनावी ककहरा प्रशांत किशोर के लिए यही सिखाने वाला रहा कि चुनाव लड़वाने और लड़ने में जमीन-आसमान का फर्क है। चौबे जी छब्बे बनने गए और दुबे बनकर लौटे-वाली कहावत प्रशांत किशोर पर एकदम सटीक बैठती हुई दिख रही है।

वह इस कारण कि ऐसी चुनावी शिकस्त से रणनीतिकार के रूप में उनका कद भी घटेगा और संभव है कि भविष्य में उनकी कंपनी ‘आईपैक’ को मिलने वाले कामकाज पर भी इसका कोई असर पड़े।

बहरहाल, नेता के रूप में प्रशांत किशोर की पहली पारी एकदम फीकी रही। चुनाव से पहले बड़े-बड़े दावे करने वाले प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी जन के मन पर कोई छाप छोड़ने में सफल नहीं हो सकी। 243 सदस्यों वाली बिहार विधानसभा के लिए जनसुराज ने 238 उम्मीदवार उतारे। इनमें से लगभग 98% (233 उम्मीदवारों) की जमानत जब्त हो गई।

इस लिहाज से ये चुनाव प्रशांत किशोर के लिए राजनीतिक तौर पर गहरा झटका साबित हुआ है। चुनाव से पहले उन्होंने राज्य भर में व्यापक दौरे किए और पदयात्रा निकालकर लोगों से संपर्क भी साधा।

बड़े बड़े दावे, नहीं आए काम

जनसुराज के गठन से पहले प्रशांत किशोर ने 5 मई 2022 से 2 अक्टूबर 2024 तक 6 हजार किलोमीटर की पैदल यात्रा की। 5000 गाँवों तक पहुँचकर सभाएँ की। बिहार चुनाव से पहले वोटर्स को अपने पाले में लाने के लिए 1,280 दिन तक बिहार के चप्पे-चप्पे पर पहुँचने के जुगत में लगे रहे पर चुनाव के नतीजों में उनके हाथ कुछ न लगा।

उन्होंने चुनाव को एक जन आंदोलन के रूप में पेश करने का प्रयास किया, लेकिन उनकी यह कोशिश रंग नहीं ला पाई। चुनाव परिणाम में उनके लिए एकदम स्पष्ट सीख और संदेश रहा कि आँकड़ेबाजी और रणनीतिक तिकड़मों और जनता की नब्ज समझना एकदम विपरीत मुद्दे हैं।

चुनाव से पहले मीडिया से लेकर सोशल मीडिया पर प्रशांत किशोर और जनसुराज का बड़ा शोर सुनाई पड़ रहा था, लेकिन सुर्खियों, खबरों से लेकर नैरेटिव के मोर्चे पर मची यह हलचल जनमत की दशा-दिशा को किसी भी तरह प्रभावित करने में नाकाम दिखी।

स्पष्ट है कि दूसरों को परीक्षा की तैयारी कराने वाले प्रशांत जब खुद अपने इम्तिहान में बैठे तब या तो उनकी तैयारी पर्याप्त नहीं थी या फिर वह अति-आत्मविश्वास के शिकार थे। दोनों ही परिस्थितियों में परिणाम वही निकलना था जो अंततः सामने भी आया। 1 करोड़ से ज्यादा सदस्यों का दावा करने वाली जनसुराज पार्टी को 10 लाख वोट भी नहीं मिल सके।

प्रशांत को मिली पटखनी के प्रमुख कारण

प्रशांत किशोर की हार के लिए कई हद तक उनकी ही रणनीति जिम्मेदार है। पार्टी का संगठनात्मक ढांचा और जनसंपर्क दोनों ही कमजोर थे। प्रशांत किशोर ने इस चुनाव को एक बड़े जन आंदोलन के रूप में पेश किया था, लेकिन चुनावी नतीजों ने दिखा दिया कि जनता ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। कुछ बिंदुओं में इसे समझा जा सकता है-

  • जनता के मुद्दों को संबोधित न कर पाना- प्रशांत किशोर बिहार के जमीनी मुद्दों को अनदेखा करते हुए ऐसे मुद्दे उठाते रहे, जिनती अनुगूंज जनता के बीच सुनाई नहीं दी। वे गुजरात जैसे राज्यों के उदाहरण गिनाकर बिहार के पिछड़ेपन का जिम्मेदार बताते रहे। आज के दौर में जब हर व्यक्ति के पास जागरूकता के कई माध्यम उपलब्ध हैं, तब जनता को इस तरह बरगलाना आसान नहीं। इस वास्तविकता को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि चाहे गुजरात हो या फिर तमिलनाडु जैसा औद्योगिक मोर्चे पर अग्रणी कोई अन्य राज्य, वह उस स्थिति में एकाएक नहीं पहुँचा और बिहार को रातोंरात उस मुकाम पर पहुँचा पाना भी संभव नहीं। इसी तरह बिहार से विस्थापन और पलायन का रुझान भी एकाएक शुरू नहीं हुआ। इन स्थितियों को सुधारने के लिए समय की आवश्यकता होगी और संक्रमण की इस अवधि में जरूरी जमीन भी तैयार करनी होगी। ऐसे में प्रशांत के बिहार के साथ पक्षपात और एकाएक बनी स्थितियों के आरोप जनता के गले नहीं उतरे।
  • व्यावहारिकता के बजाय कल्पनालोक में विचरण- अपने विमर्श में प्रशांत किशोर ने हरसंभव तरीके से यह दिखाने का प्रयास किया कि बिहार की दशा-दिशा सुधारने की उनकी मंशा एकदम भली है, लेकिन अपने इरादों को सिरे चढ़ाने के लिए वह कोई कारगर ब्लूप्रिंट नहीं सुझा सके। इस मामले में उनके दावे भी तेजस्वी यादव जैसे रहे, जिन्होंने हर एक घर से सरकारी नौकरी देने से लेकर महिलाओं को मकर संक्रांति पर 30,000 रुपये देने का वादा किया। तेजस्वी की तरह प्रशांत के वादे भी जनता को न समझ आए और न ही उन पर भरोसा हो पाया।
  • वैचारिक शून्यता- राजनीति में वैचारिक आग्रह की हमेशा से एक अहम भूमिका होती है, जो प्रमुख नीतिगत मुद्दों पर भी अपना एक स्पष्ट दृष्टिकोण रखता है। इस मामले में प्रशांत किशोर की जनसुराज की स्थिति दिल्ली से आम आदमी पार्टी के रूप में शुरू हुए राजनीतिक प्रयोग के जैसी रही, जिसकी भी वैचारिक मुद्दों पर कोई स्पष्टता नहीं थी। बिहार जैसे राजनीतिक रूप से जागरूक एवं संवेदनशील राज्य में तो वैचारिक दिशा की भूमिका और अहम हो जाती है, जिसे प्रशांत किशोर समय रहते समझ नहीं पाए।
  • सांगठनिक ढांचे के बजाय पेशेवर प्रणाली पर दांव- किसी भी राजनीतिक दल की ताकत उसके कार्यकर्ता होते हैं। इसलिए कैडर बहुत महत्वपूर्ण होता है। यह कैडर अमूमन वैचारिक दिशा से ही प्रेरित होता है और खुद को राजनीतिक दलों की गतिविधियों में एक अंशभागी के रूप में देखता है। उसका अपने दल के साथ एक भावनात्मक लगाव भी होता है। भावनाओं और वैचारिक खुराक की जुगलबंदी के अभाव में कार्यकर्ता दुविधा एवं भ्रम के शिकार हो जाते हैं। प्रशांत किशोर ने अपना ऐसा सांगठनिक ढांचा विकसित करने के बजाय पेशेवर लोगों को प्राथमिकता दी, जिनके लिए यह किसी सामान्य कवायद जैसा ही रहा। उनकी शिकस्त में यह भी एक कारण रहा कि वह अपने पीछे ऐसे लोगों को लामबंद नहीं कर पाए, जो कड़ी के रूप में और जनता को अपने साथ जोड़ पाते।
  • गलत टिकट वितरण- टिकट वितरण में भी प्रशांत किशोर का रवैया ऐसा रहा कि वह किसी राजनीतिक लड़ाई के बजाय किसी कारपोरेट ढांचे में काम करने जा रहे हैं। उन्होंने जनता के बीच पैठ के बजाय उम्मीदवारों की निजी उपलब्धियों को ज्यादा तरजीह दी। अमूमन विधान परिषद या राज्यसभा के मामले में ऐसा होता है, लेकिन पंचायत से लेकर विधानसभा और लोकसभा जैसे चुनावों में जनता से नेता का जुड़ाव और उसकी लोकप्रियता कहीं ज्यादा मायने रखती है। इसमें भी प्रशांत मात खा गए और वह ऐसे दमदार उम्मीदवार नहीं तलाश पाए। यही कारण रहा कि जीतना तो दूर वह वोट काटने की स्थिति में भी नहीं आ पाए।
  • खुद चुनाव न लड़ना- खुद चुनाव से कन्नी काटकर प्रशांत किशोर ने अपने कार्यकर्ताओं को निराश किया। यह भी एक कारण रहा कि उनका चुनाव अभियान कभी परवान ही नहीं चढ़ पाया। अगर वह खुद चुनाव लड़ते तो उनकी पार्टी और कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ता। उन्हें आम आदमी पार्टी के प्रयोग से भी यह सीख लेनी चाहिए थी अपने पहले ही चुनाव में अरविंद केजरीवाल ने शीला दीक्षित के खिलाफ मोर्चा खोला और उसे जीता भी। इस तरह की चुनौतियां प्रस्तुत करने में जोखिम तो जरूर रहता है, लेकिन बिना जोखिम के प्रतिफल भी हासिल नहीं होता। प्रशांत किशोर का चुनाव लड़ने से किनारा करना उनके रक्षात्मक रवैये को ही जाहिर करने वाला रहा। इस मामले मे स्थिति तब और खराब हो गई, जब पहले उन्होंने तेजस्वी यादव के खिलाफ चुनाव में उतरने के संकेत दिए थे।
  • बड़े बड़े दावे करना- एक के बाद एक इंटरव्यू और रैलियों में प्रशांत किशोर बड़े-बड़े दावे करते दिखे। कई बार अनावश्यक आक्रामकता भी उन पर हावी दिखी। वह जदयू, भाजपा और राजद जैसे दलों के साथ ही तेजस्वी, नीतीश और मोदी जैसे नेताओं पर निजी हमले भी करते रहे। उनका यह प्रचार पूरी तरह नकारात्मक रहा, जो कई बार उलटा ही पड़ता है।

नामी प्रत्याशी फिर भी जब्त हो गई जमानत

प्रशांत किशोर की पार्टी से खड़े हुए लगभग सभी प्रत्याशियों की जमानत जब्त हुई। हैरानी वाली बात ये रही कि इनमें से ज्यादातर काफी नामी और प्रतिष्ठित बैकग्राउंड से हैं। फिर भी जनता को इनके नामों को नकार दिया।

लता सिंह- अस्थावां सीट से खड़ी हुई। पूर्व केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह की बेटी होने के बावजूद लता सिंह को जनता ने पूरी तरह नकार दिया और जमानत जब्त हो गई। एक तरह से जनता ने वंशवाद को नकार कर परिवारवाद की राजनीति को पूरी तरह खारिज कर दिया।

कुमारी पुनम सिन्हा- महिला प्रत्याशी होने के बावजूद पुनम सिन्हा को कोई खास समर्थन नहीं मिला। वह लालू यादव के गढ़ राघोपुर से उतरीं, लेकिन पूरी तरह हार गईं। इस जगह पर जनसुराज ने जातीय समीकरण साधने की कोशिश की, लेकिन जनता ने इसे भाव नहीं दिया।

तनुजा कुमारी- पूर्व जिला परिषद सदस्य होने और स्थानीय स्तर पर पहचान रखने वाली तनुजा ने कारगाह से चुनाव लड़ा और जमानत जब्त करा बैठीं। यहाँ जनसुराज ने स्थानीय चेहरों को टिकट तो दिया, लेकिन संगठनात्मक समर्थन नहीं दिखा पाए।

बिहार शरीफ सीट- नगर निगम के पूर्व महापौर को टिकट दिया गया, व्यापक प्रचार भी किया लेकिन जनता ने उन्हें भी नकार दिया। एक तरह से प्रशांत के पुराने चेहरों को नए रंग में पेश करने की कोशिश विफल रही।

रितेश पांडे- चर्चित नाम वाले रितेश सीवान से खड़े हुए पर चुनाव में तीसरे स्थान पर पहुँचे। जनसुराज ने प्रचार में सोशल मीडिया और इन्फ्लुएंसरों पर ज्यादा भरोसा किया फिर भी रितेश की जमानत जब्त हो गई। यह साफ तौर पर बताता है कि प्रशांत सोशल मीडिया की चमक में जमीनी वोट साध नहीं पाए।

के.सी. सिन्हा- एक अनुभवी चेहरा होने के चलते सिन्हा पटना साहिब से चुनाव लड़े पर हार गए। उनकी हार ने जनसुराज पार्टी के अंदर चल रही वैचारिक अस्पष्टता को जग जाहिर कर दिया।

सरफराज आलम- पूर्व सांसद सरफराज आलम कोचाधामन सीट से उतरे, लेकिन तीसरे स्थान पर रहे और जमानत जब्त हो गई। यहाँ जनसुराज ने मुस्लिम वोट बैंक को साधने की कोशिश की, लेकिन जनता ने इसे असली मुद्दों से भटकाव माना।

प्रशांत किशोर ने खुद चुनाव नहीं लड़ा, कार्यकर्ताओं की जगह पेड कैडर रखे, और सोशल मीडिया पर ज्यादा भरोसा किया। नतीजा यह हुआ कि पार्टी प्रशांत के बयान के अनुसार सीधे ‘फर्श’ पर ही आ गई।

अपने ही बयान में फँसे प्रशांत किशोर

प्रशांत किशोर ने बिहार विधानसभा चुनाव से पहले कई बार कहा था कि उनकी जनसुराज पार्टी ‘अर्श पर रहेगी या फर्श पर रहेगी‘ यानी या तो बहुत ऊँचाई पर जाएगी या पूरी तरह नीचे गिर जाएगी। चुनाव परिणामों में यह बयान कड़वी हकीकत बन गया, क्योंकि पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी।

इनके अलावा सोशल मीडिया पर प्रशांत किशोर का एक वीडियो भी तेजी से वायरल हुआ जिसमें वे अपना माथे से तिलक को मिटाते दिखे। यह वीडियो बिहार की जनता के बीच काफी विवादित रहा और इसने प्रशांत किशोर के प्रति नकारात्मक भावनाओं को और बढ़ाया। इस घटना के बाद से भी उनकी छवि जनता के बीच नकरात्मक बनी है।

बिहार के मुस्लिमों को विकास का एजेंडा नहीं कबूल, मजहब और BJP विरोध ही अब भी मतदान का पैटर्न: जानिए ओवैसी की ‘घुसपैठ’ क्यों हुई गहरी, क्या हैं इसके मायने

बिहार विधानसभा चुनाव में विपक्षी महागठबंधन की बुरी हार हुई है। 243 सीटों वाली विधानसभा में जहाँ NDA को 200 से अधिक सीटें मिलीं तो वहीं महागठबंधन 35 सीटों पर सिमट गया है। हालाँकि, 28 सीटों पर चुनाव लड़ने वाले असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM ने भी इस चुनाव में 5 सीटें जीती हैं। ओवैसी की सारी सीटें मुस्लिम बहुल सीमांचल इलाके में आई हैं।

इस चुनाव में AIMIM की सफलता दिखाती है कि बिहार के एक बड़े मुस्लिम वर्ग के लिए अब मजहबी पहचान पर आधारित राजनीति ही निर्णायक बनती जा रही है। मुसलमान अब ऐसे नेतृत्व की तलाश में हैं जो उनकी मजहबी पहचान के साथ और अधिक खुलकर खड़ा हो। AIMIM की राजनीति की जड़ें मजहबी पहचान में ही हैं। पार्टी खुद को एक ‘मुस्लिम प्लेटफॉर्म’ की तरह पेश करती है।

ओवैसी की इस जीत से एक बात और साफ होती है कि उन्होंने सीमांचल में दमदार ‘घुसपैठ’ कर ली है। RJD की रीढ़ माने जाने वाले MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण को उन्होंने तोड़ दिया है। AIMIM के प्रदर्शन से साफ है कि ओवैसी ने RJD के मुस्लिम वोटों को अपने पाले में कर लिया है। उन्होंने अब सीमांचल में अपना एक जनाधार खड़ा कर लिया है।

हालाँकि, ये वोटर भी कब तक ओवैसी के साथ हैं, यह भी अपने आप में एक सवाल होगा क्योंकि यही वोटर बीजेपी विरोध में लंबे वक्त तक RJD के साथ खड़ा था। इन्हीं वोटरों ने अपने प्रतिनिधित्व के लिए उप-मुख्यमंत्री का पद माँगने के लिए आवाज उठानी शुरू की और RJD-कॉन्ग्रेस की तरफ से सब उन्हें यह गारंटी नहीं मिली तो वो ओवैसी की तरफ शिफ्ट हो गए। क्योंकि इन्हें जब प्रतिनिधित्व नहीं मिला तो कम-से-कम एक कट्टर मजहबी पार्टी को मिल ही गई है।

आम तौर पर मुस्लिम वोटों को पैर्टन यही रहता है कि वो ऐसे दल को वोट करते हैं जिसका अपना एक तय जनाधार हो और जो उनकी नजरों में ‘सांप्रदायिक’ BJP को हरा सकता हो। जैसे उत्तर प्रदेश इसका एक उदाहरण है, यहाँ सपा के पास एक तय जातिगत वोट बैंक है तो आम तौर पर मुस्लिम उससे मिलकर BJP को हराने के लिए वोटिंग करते हैं।

बिहार में अभी ऐसे जनाधार वाला कोई दल उनको नजर नहीं है क्योंकि RJD का फिक्स माना जाने वाला यादव वोट बैंक भी उनसे छिटका-छिटका है। अगर भविष्य में कोई दल बिहार में ऐसा उभकर सामने आता है जिसका पास अपना एक जनाधार हो और जो BJP के विरोध में सरकार बनाने के लिए तैयार हो तो मुस्लिम उसके साथ भविष्य में नहीं जाएँगे इसकी कोई गारंटी नहीं है। मगर अभी ओवैसी ने MY समीकरण का गणित ध्वस्त कर दिया है, यह भी पूरी तरह से सही है।

ओवैसी ने तोड़ दिया RJD का भ्रम?

बिहार विधानसभा चुनाव से पहले ओवैसी ने कई बार कोशिश की थी कि वह किसी भी तरह महागठबंधन का हिस्सा बन जाएँ। ओवैसी ने RJD से 6 सीटों की माँग की थी और लालू यादव को दो बार खत लिखा था। लालू यादव ने इन खतों का कोई जवाब नहीं दिया।

खुद ओवैसी ने एक रैली में इससे जुड़ी जानकारी दी है। उन्होंने कहा था, “हमने RJD से कभी भी मंत्री पद की माँग नहीं की। अगर यह दरियादिली नहीं है तो और क्या है? हमने गठबंधन के लिए हर संभव प्रयास किए। अब फैसला RJD के हाथ में है।” तब ओवैसी को कुछ हाथ नहीं लगा लेकिन अब उन्होंने तेजस्वी को हाथ मलने को मजबूर कर दिया है।

औवेसी ने जो पाँच सीटें जीतीं हैं वो सभी मुस्लिम बहुल इलाकों में हैं और उन सभी पर मुस्लिम उम्मीदवारों ने ही जीत दर्ज की है। AIMIM ने जोकीहाट, बहादुरगंज, कोचाधामन, अमौर और बायसी सीट से क्रमश मोहम्मद मुर्शिद आलम, मौहम्मद तौसीफ आलम, मौहम्मद सरवर आलम, अखतरुल ईमान, गुलाम सरवर ने जीत दर्ज की है।

एक खास बात ये भी है कि AIMIM ने ये सीटें नजदीकी मुकाबले में नहीं जीती हैं बल्कि इन पर बड़े अंतर से जीत दर्ज की है। उनका सबसे कम जीत का अंतर ही 23,000 से ऊपर का है। इन सीटों पर मुस्लिम वोटों की भरमार है। इन सभी पाँचों सीटों पर मुस्लिमों की संख्या 64% से अधिक है। कोचाधामन में तो मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 72.4% है।

AIMIM द्वारा जीती गई सीटें और हार-जीत का अंतर (फोटो: ECI)

ओवैसी ने खुद को 5 सीटें जीतीं हैं इसके अलावा कम-से-कम 8 ऐसी सीटें भी हैं जहाँ उन्होंने महागठबंधन के उम्मीदवार को हराने में भूमिका निभाई है। यानी उन सीटों पर AIMIM के उम्मीदवार को मिले वोटों की संख्या हार-जीत के अंतर से अधिक रही है।

केवटी, शेरघाटी, प्राणपुर, कसबा, गोपालगंज और महुआ जैसी कम-से-कम 8 सीटें हैं, जहाँ AIMIM महागठबंधन की हार की वजह बनी है। RJD को जो यह भ्रम था कि मुस्लिम वोटों पर उसका एकमुश्त अधिकार है और मुस्लिम केवल उसके साथ ही जाएँगे यह भ्रम ओवैसी ने तोड़ दिया है।

मुस्लिमों वोटरों की प्राथमिकता- मजहबी पहचान और BJP विरोध

बिहार के इस चुनाव में एक बार फिर दिखा है कि मुस्लिम मतदाताओं की प्राथमिकताएँ दो मुख्य स्तंभों पर टिकती हैं। पहला है मजहबी पहचान और दूसरा है ऐसा राजनीतिक विकल्प चुनना जो BJP को प्रभावी रूप से चुनौती दे सके और उसे हराने की स्थिति में हो।

मुस्लिम समाज के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं होता कि किसने कितनी सड़क बनाई या किसने कितनी योजनाएँ लागू कीं बल्कि यह कि कौन-सी राजनीतिक शक्ति उनकी मुस्लिम पहचान को मजबूत करने का काम करेगी। AIMIM को चुनकर एक बार फिर वही प्राथमिकता मुस्लिम वोटरों ने दिखाई है।

यही वजह है कि उनकी राजनीति में मजहबी पहचान, प्रतिनिधित्व और उनके विचार की प्रमुखता सबसे ऊपर रहती हैं। जब उन्हें लगता है कि कोई दल उनकी पहचान को सीधे तौर पर संबोधित कर रहा है या उन्हें एक मजहबी पहचान दे रहा है तो वे उसके साथ खड़े होते हैं।

दूसरा पहलू रणनीतिक वोटिंग है। मुस्लिम मतदाता अक्सर यह देखते हैं कि चुनावी मुकाबले में BJP के खिलाफ सबसे मजबूत दावेदार कौन है। यदि कोई गठबंधन या पार्टी BJP को हराने में सक्षम दिखती है, तो मुस्लिम वोट बड़ी संख्या में उसके पक्ष में एकजुट हो जाते हैं।

मुस्लिमों का यह वोटिंग पैटर्न पूरे भारत में नजर आता है। गैर-बीजेपी दलों के सत्ता में आने के बाद उन्हें मिलने वाली खुली छूट के चलते मुस्लिम BJP के खिलाफ लामबंद रहते हैं। अधिकतर गैर बीजेपी सरकारें मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति कर किसी भी तरह उन्हें अपने पाले में रखना चाहती है। इसलिए उन्हें हर काम करने की खुली छूट मिलती है।

हर चुनाव से पहले बड़ी पार्टियाँ विकास योजनाएँ, रोजगार और शिक्षा के मुद्दे गिनाती हैं लेकिन मुस्लिम मतदाता उसी विकल्प की ओर झुकते हैं जो उन्हें अपनी मजहबी पहचान की ‘सुरक्षा’ का आश्वासन देता हो। यह पैटर्न प्रदेश भर में साफ दिखाई दिया है।

जहाँ RJD या कांग्रेस मुस्लिम वोट को ‘तुष्टीकरण’ का जरिया मान रहे थे लेकिन AIMIM ने उससे आगे जाकर ‘प्रत्यक्ष नेतृत्व’ का वादा किया। इसी वजह से मुस्लिम मतदाता AIMIM को एक ऐसे विकल्प के रूप में देखने लगे हैं जो उनकी पहचान को बिना किसी समझौते के राजनीतिक रूप देता है। ओवैसी की यही ‘घुसपैठ’ कई सीटों पर इतनी गहरी हुई कि मुख्यधारा की पार्टियाँ उसका मुकाबला नहीं कर पाईं।

बिहार के मौजूदा नतीजों से यही संकेत मिलता है कि मुस्लिम वोटों में पहचान आधारित राजनीति आने वाले समय में मजबूत ही होती जाएगी। युवा मुस्लिम मतदाता सोशल मीडिया और भाषणों के जरिए ऐसे मुस्लिम नेतृत्व की ओर झुक रहे हैं जो उनकी मजहबी पहचान को खुले तौर पर प्रस्तुत करे।

अब बहाने देना बंद करे कॉन्ग्रेस और पहले अपने भीतर झाँके: बिहार में पार्टी के प्रदर्शन को देख कॉन्ग्रेसी ही हुए शर्मसार, थरूर से लेकर मणिशंकर अय्यर के बयान के समझें क्या है मायने

बिहार में अपनी खोई सियासी जमीन तलाशने में जुटी कॉन्ग्रेस को इस बार के विधानसभा चुनाव में और भी बड़ा झटका लगा है। बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टी को बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद थी लेकिन नतीजों ने बता दिया कि बिहार में कॉन्ग्रेस कितने पानी में है। पार्टी दहाई का आँकड़ा भी नहीं छू पाई और 6 सीटों पर ही सिमट गई।

इस नतीजे के बाद जहाँ एक ओर कॉन्ग्रेस पार्टी के कई नेता चुनाव आयोग पर दोष मढ़ने पर तुले हैं तो वहीं कई नेताओं ने पार्टी के को लेकर रणनीतिक चूकों की ओर इशारा किया है। नेताओं ने संगठन की कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न खड़े किए हैं।

चुनावी नतीजों के बाद कॉन्ग्रेस के कई नेताओं ने कहा कि स्थिति बेहद गंभीर है और पार्टी को कथित आत्मनिरीक्षण से आगे बढ़कर कुछ कड़े कदम उठाने होंगे। कुछ नेताओं ने यह भी कहा कि सिर्फ आत्मनिरीक्षण नहीं, अब सच स्वीकार करने और वास्तविकता का सामना करने का समय आ गया है।

वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने तो स्पष्ट शब्दों में कहा कि पार्टी ने उन्हें लंबे समय से दरकिनार कर दिया है। दूसरी ओर, कई पूर्व नेताओं और कार्यकर्ताओं ने भी संगठन की कमजोरियों को उजागर किया है। उनका कहना है कि पार्टी की हार के पीछे बूथ-स्तर पर पार्टी की ढीली पकड़, गलत टिकट वितरण, स्थानीय नेतृत्व की कमी और शीर्ष नेतृत्व से दूरी जैसे गंभीर कारण जिम्मेदार हैं।

कॉन्ग्रेस के बड़े नेताओं जैसे शशि थरूर, मणिशंकर अय्यर, कृपानाथ पाठक, मुमताज पटेल और कई नेताओं के हालिया बयानों से साफ समझा जा सकता है कि वे अपनी ही पार्टी की नीतियों से खुद खुश नहीं है।

बिहार के जिम्मेदार लोगों ने सही जानकारी नहीं दी: कॉन्ग्रेस नेता कृपानाथ पाठक

कॉन्ग्रेस नेता कृपानाथ पाठक ने मीडिया से बातचीत में कहा, “हमारा मानना ​​है कि राज्य में जिम्मेदार लोगों ने सही जानकारी नहीं दी। उन्होंने सही लोगों के बारे में सही जानकारी नहीं जुटाई। चाहे यह गलती से हुआ हो या चूक से, इतनी बड़ी चूक कैसे हो गई? लोग हमसे लगातार शिकायत कर रहे हैं लेकिन हमें लगता है कि जो बातें उच्च अधिकारियों तक पहुँचनी चाहिए थीं, वे ठीक से नहीं पहुँचीं। अब उन्हें इस पर ध्यान देना होगा, वरना यह एक गंभीर संकट का कारण बन सकता है।”

विश्लेषण करना चाहिए कि कहाँ गलतियाँ हुईं: कॉन्ग्रेस सांसद शशि थरूर

वहीं कॉन्ग्रेस सांसद शशि थरूर ने बिहार चुनाव के परिणाम जानने के बाद मीडिया से बात करते हुए कहा, “यह बिल्कुल साफ है कि एनडीए की बढ़त जबरदस्त है। यह स्पष्ट रूप से बेहद निराशाजनक है और अगर यही अंतिम परिणाम निकलता है, तो मुझे लगता है कि बहुत गंभीर आत्मनिरीक्षण की जरूरत होगी और मेरा मतलब सिर्फ आत्मनिरीक्षण, बैठकर सोचना नहीं है बल्कि यह भी अध्ययन करना है कि क्या गलतियाँ हुईं, क्या रणनीतिक, संदेशात्मक या संगठनात्मक गलतियाँ रहीं।”

थरूर ने आगे कहा, “मैं बिहार में प्रचार करने वाला व्यक्ति नहीं हूँ। मुझे बिहार में प्रचार के लिए आमंत्रित नहीं किया गया था, इसलिए मैं आपको कोई प्रत्यक्ष जानकारी नहीं दे सकता। लेकिन मैं लोगों से बात कर रहा हूँ…हमारी पार्टी के नेताओं को इस बात का गंभीर विश्लेषण करना चाहिए कि कहाँ गलतियाँ हुईं।”

मणिशंकर अय्यर: मेरी ही पार्टी ने मुझको निकाल दिया है

कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने तो सीधे कहा, “एक जमाने में मैं बहुत सीनियर था लेकिन हाल में मुझको एकतरफा किया गया है। मैंने शुरू में ही मैंने स्पष्टीकरण दिया था कि मैं कॉन्ग्रेस के जानिब से यहाँ नहीं आया हूँ, व्यक्तिगत रुप से यहाँ पहुँचा हूँ।” उन्होंने आगे कहा, “मैं बहुत छोटा आदमी हूँ, मेरी ही पार्टी ने मुझको निकाल दिया है। मोदी जी मेरे बारे में गलत-गलत बातों करते हैं और मेरी ही पार्टी उसे स्वीकार करती है।

यह हमारे संगठन की कमजोरी को दर्शाता है: कॉन्ग्रेस नेता और पूर्व राज्यपाल निखिल कुमार

कॉन्ग्रेस नेता और पूर्व राज्यपाल निखिल कुमार ने स्पष्ट रुप से पार्टी की गलती निकाली और कहा, “यह हमारे संगठन की कमजोरी को दर्शाता है। किसी भी चुनाव में, एक राजनीतिक दल अपनी संगठनात्मक शक्ति पर निर्भर करता है। अगर संगठन कमजोर है और प्रभावी ढंग से काम नहीं कर सकता, तो कुल मिलाकर परिणाम प्रभावित होते हैं।”

उन्होंने कहा, “हमारे सभी उम्मीदवार बहुत सक्षम हैं लेकिन और भी बेहतर उम्मीदवार चुने जा सकते थे। संगठन को रणनीतिक और समझदारी से काम करना चाहिए था और सभी निर्वाचन क्षेत्रों में अपनी मजबूत उपस्थिति बनाए रखनी चाहिए थी।”

कॉन्ग्रेस नेता निखिल कुमार ने कहा, “हमारे उम्मीदवारों के चयन में कुछ मतभेद थे और शायद हमने सर्वश्रेष्ठ उम्मीदवारों का चयन नहीं किया लेकिन हाँ, यह एक संभावना है। संभावना यह थी कि चुने गए कुछ उम्मीदवार सर्वोत्तम गुणवत्ता वाले नहीं रहे होंगे। और शायद इसी वजह से यह परिणाम हुआ।”

आत्ममंथन करेंगे कि कॉन्ग्रेस कहाँ पिछड़ी: कॉन्ग्रेस सांसद अखिलेश प्रसाद

चुनाव नतीजों पर कॉन्ग्रेस सांसद अखिलेश प्रसाद सिंह ने कहा, “हम आत्ममंथन करेंगे कि कॉन्ग्रेस कहाँ पिछड़ गई। हालाँकि, मैं नीतीश कुमार और NDA को बधाई देता हूँ। दोस्ताना मुकाबला नहीं होना चाहिए था- राजद के संजय यादव और हमारी पार्टी के कृष्णा अलावरु बेहतर बताएँगे कि चुनावों में हमारा प्रदर्शन इतना खराब क्यों रहा।”

कब तक सफलता का इंतजार करेंगे?: मुमताज पटेल

कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे अहमद पटेल की बेटी मुमताज पटेल ने भयंकर नाराजगी जताते हुए कहा, “कोई बहाना नहीं, कोई दोषारोपण नहीं, कोई आत्मनिरीक्षण नहीं, अब समय है अपने भीतर झाँककर सच्चाई को स्वीकार करने का।”

उन्होंने एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा, “अनगिनत वफादार जमीनी कार्यकर्ता, जो हर मुश्किल हालात में पार्टी के साथ रहे हैं…कब तक सफलता का इंतजार करेंगे…बल्कि सत्ता कुछ ऐसे लोगों के हाथों में केंद्रित होने के कारण, जो जमीनी हकीकत से पूरी तरह कटे हुए हैं और बार-बार इस महान पुरानी पार्टी की दुर्गति और पराजय के लिए जिम्मेदार हैं, उन्हें लगातार असफलता ही हाथ लगेगी। और मेरी बात याद रखना, इन्हीं लोगों को बार-बार पुरस्कृत किया जाएगा क्योंकि उन्होंने अपने नियंत्रण और शक्ति से खुद को अपरिहार्य बना लिया है।”

कॉन्ग्रेस नेता शकील अहमद: मैं कॉन्ग्रेस में नहीं, मुझे बोलने का कोई अधिकार नहीं

बिहार के पूर्व मंत्री और कॉन्ग्रेस नेता शकील अहमद ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “मैं कॉन्ग्रेस में नहीं हूँ। मुझे बोलने का कोई अधिकार नहीं है। लेकिन टिकट वितरण के तुरंत बाद कॉन्ग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और कहा कि फलां व्यक्ति ने गलत कारणों से टिकट बाँटे हैं, वित्तीय अनियमितताओं और अन्य मुद्दों का आरोप लगाया है… हमें उम्मीद है कि जाँच होगी  और अगर आरोप सही हैं और टिकट किसी और कारण से दिए गए हैं, तो जाहिर है उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।”

करारी हार ने कॉन्ग्रेस के भीतर गहरे संकट और आत्ममंथन की माँगों को किया तेज

कॉन्ग्रेस के नेताओं के प्रतिक्रियाओं को देखकर साफ लगता है कि पार्टी के भीतर गहरी बेचैनी, असंतोष और आत्मविश्वास की कमी है। बयान भले अलग-अलग नेताओं के हों लेकिन इन सबके पीछे एक ही भावना दिखाई देती है कि हार का असली कारण संगठन के भीतर की कमजोरी, गलत आकलन, गलत उम्मीदवार चयन और शीर्ष नेतृत्व का जमीनी सच्चाइयों से दूर रहना।

नेताओं के मन में यह भी चल रहा है कि इतने वर्षों से लगातार मिल रही नाकामियों पर भी पार्टी की ऊपरी परत में कोई बड़ा बदलाव नहीं होता। जो लोग हार के लिए जिम्मेदार हैं, वही आगे भी फैसले ले रहे हैं और जमीनी स्तर पर मेहनत करने वाले कार्यकर्ताओं की आवाज लगातार अनसुनी हो रही है।

कई नेताओं के वक्तव्यों से यह भी साफ है कि पार्टी की आंतरिक लोकतांत्रिक संरचना कमजोर पड़ चुकी है। नेताओं को लगता है कि शीर्ष नेतृत्व अपने चार-पाँच सलाहकारों पर ही निर्भर रहता है और ये लोग जमीनी जानकारी तक नहीं पहुँचते या जानबूझकर असल हालत को दबा देते हैं।

हालात इतने खराब हैं कि कुछ वरिष्ठ नेता खुद स्वीकार कर रहे हैं कि उन्हें पार्टी से दूर कर दिया गया है, उनकी सलाह या अनुभव की कोई अहमियत नहीं बची है। इससे यह संकेत मिलता है कि पार्टी में संवादहीनता और अविश्वास का माहौल बढ़ रहा है।

गौरतलब है कि बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में राज्य की सत्ता में एक बार फिर NDA की जोरदार वापसी हुई है। गठबंधन ने 200 से अधिक सीटों पर जीत दर्ज कर प्रचंड बहुमत हासिल किया है।

इन चुनावों में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, जिसे 89 सीटों का जनादेश मिला। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) 85 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही। खास बात यह है कि 243 सीटों वाली विधानसभा में बीजेपी और JDU दोनों ने 101–101 सीटों पर मुकाबला किया था।

विपक्ष में आरजेडी तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी है और उसे 26 सीटों पर सफलता मिली। वहीं चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) ने 28 सीटों पर किस्मत आजमाई और 19 सीटों पर जीत हासिल की।

वहीं चुनाव में कॉन्ग्रेस का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा। 60 से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद पार्टी केवल 6 सीटें ही जीत पाई और दहाई का आँकड़ा भी पार नहीं कर सकी। इसे लेकर अब कॉन्ग्रेस पार्टी के नेताओं में भी अपनी ही पार्टी के प्रदर्शन को लेकर गहरी नाराजगी देखने को मिल रही है।

बिहार की करारी हार ने कॉन्ग्रेस के भीतर गहरे संकट और आत्ममंथन की माँगों को और तेज कर दिया है और संकेत साफ हैं कि पार्टी में निकट भविष्य में बड़ा आंतरिक मंथन देखने को मिल सकता है।