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बिहार के मुस्लिमों को विकास का एजेंडा नहीं कबूल, मजहब और BJP विरोध ही अब भी मतदान का पैटर्न: जानिए ओवैसी की ‘घुसपैठ’ क्यों हुई गहरी, क्या हैं इसके मायने

ओवैसी की इस जीत से एक बात और साफ होती है कि उन्होंने सीमांचल में दमदार 'घुसपैठ' कर ली है। राजद की रीढ़ माने जाने वाले MY समीकरण को उन्होंने तोड़ दिया है। AIMIM के प्रदर्शन से साफ है कि ओवैसी ने राजद के मुस्लिम वोटों को अपने पाले में कर लिया है।

बिहार विधानसभा चुनाव में विपक्षी महागठबंधन की बुरी हार हुई है। 243 सीटों वाली विधानसभा में जहाँ NDA को 200 से अधिक सीटें मिलीं तो वहीं महागठबंधन 35 सीटों पर सिमट गया है। हालाँकि, 28 सीटों पर चुनाव लड़ने वाले असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM ने भी इस चुनाव में 5 सीटें जीती हैं। ओवैसी की सारी सीटें मुस्लिम बहुल सीमांचल इलाके में आई हैं।

इस चुनाव में AIMIM की सफलता दिखाती है कि बिहार के एक बड़े मुस्लिम वर्ग के लिए अब मजहबी पहचान पर आधारित राजनीति ही निर्णायक बनती जा रही है। मुसलमान अब ऐसे नेतृत्व की तलाश में हैं जो उनकी मजहबी पहचान के साथ और अधिक खुलकर खड़ा हो। AIMIM की राजनीति की जड़ें मजहबी पहचान में ही हैं। पार्टी खुद को एक ‘मुस्लिम प्लेटफॉर्म’ की तरह पेश करती है।

ओवैसी की इस जीत से एक बात और साफ होती है कि उन्होंने सीमांचल में दमदार ‘घुसपैठ’ कर ली है। RJD की रीढ़ माने जाने वाले MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण को उन्होंने तोड़ दिया है। AIMIM के प्रदर्शन से साफ है कि ओवैसी ने RJD के मुस्लिम वोटों को अपने पाले में कर लिया है। उन्होंने अब सीमांचल में अपना एक जनाधार खड़ा कर लिया है।

हालाँकि, ये वोटर भी कब तक ओवैसी के साथ हैं, यह भी अपने आप में एक सवाल होगा क्योंकि यही वोटर बीजेपी विरोध में लंबे वक्त तक RJD के साथ खड़ा था। इन्हीं वोटरों ने अपने प्रतिनिधित्व के लिए उप-मुख्यमंत्री का पद माँगने के लिए आवाज उठानी शुरू की और RJD-कॉन्ग्रेस की तरफ से सब उन्हें यह गारंटी नहीं मिली तो वो ओवैसी की तरफ शिफ्ट हो गए। क्योंकि इन्हें जब प्रतिनिधित्व नहीं मिला तो कम-से-कम एक कट्टर मजहबी पार्टी को मिल ही गई है।

आम तौर पर मुस्लिम वोटों को पैर्टन यही रहता है कि वो ऐसे दल को वोट करते हैं जिसका अपना एक तय जनाधार हो और जो उनकी नजरों में ‘सांप्रदायिक’ BJP को हरा सकता हो। जैसे उत्तर प्रदेश इसका एक उदाहरण है, यहाँ सपा के पास एक तय जातिगत वोट बैंक है तो आम तौर पर मुस्लिम उससे मिलकर BJP को हराने के लिए वोटिंग करते हैं।

बिहार में अभी ऐसे जनाधार वाला कोई दल उनको नजर नहीं है क्योंकि RJD का फिक्स माना जाने वाला यादव वोट बैंक भी उनसे छिटका-छिटका है। अगर भविष्य में कोई दल बिहार में ऐसा उभकर सामने आता है जिसका पास अपना एक जनाधार हो और जो BJP के विरोध में सरकार बनाने के लिए तैयार हो तो मुस्लिम उसके साथ भविष्य में नहीं जाएँगे इसकी कोई गारंटी नहीं है। मगर अभी ओवैसी ने MY समीकरण का गणित ध्वस्त कर दिया है, यह भी पूरी तरह से सही है।

ओवैसी ने तोड़ दिया RJD का भ्रम?

बिहार विधानसभा चुनाव से पहले ओवैसी ने कई बार कोशिश की थी कि वह किसी भी तरह महागठबंधन का हिस्सा बन जाएँ। ओवैसी ने RJD से 6 सीटों की माँग की थी और लालू यादव को दो बार खत लिखा था। लालू यादव ने इन खतों का कोई जवाब नहीं दिया।

खुद ओवैसी ने एक रैली में इससे जुड़ी जानकारी दी है। उन्होंने कहा था, “हमने RJD से कभी भी मंत्री पद की माँग नहीं की। अगर यह दरियादिली नहीं है तो और क्या है? हमने गठबंधन के लिए हर संभव प्रयास किए। अब फैसला RJD के हाथ में है।” तब ओवैसी को कुछ हाथ नहीं लगा लेकिन अब उन्होंने तेजस्वी को हाथ मलने को मजबूर कर दिया है।

औवेसी ने जो पाँच सीटें जीतीं हैं वो सभी मुस्लिम बहुल इलाकों में हैं और उन सभी पर मुस्लिम उम्मीदवारों ने ही जीत दर्ज की है। AIMIM ने जोकीहाट, बहादुरगंज, कोचाधामन, अमौर और बायसी सीट से क्रमश मोहम्मद मुर्शिद आलम, मौहम्मद तौसीफ आलम, मौहम्मद सरवर आलम, अखतरुल ईमान, गुलाम सरवर ने जीत दर्ज की है।

एक खास बात ये भी है कि AIMIM ने ये सीटें नजदीकी मुकाबले में नहीं जीती हैं बल्कि इन पर बड़े अंतर से जीत दर्ज की है। उनका सबसे कम जीत का अंतर ही 23,000 से ऊपर का है। इन सीटों पर मुस्लिम वोटों की भरमार है। इन सभी पाँचों सीटों पर मुस्लिमों की संख्या 64% से अधिक है। कोचाधामन में तो मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 72.4% है।

AIMIM द्वारा जीती गई सीटें और हार-जीत का अंतर (फोटो: ECI)

ओवैसी ने खुद को 5 सीटें जीतीं हैं इसके अलावा कम-से-कम 8 ऐसी सीटें भी हैं जहाँ उन्होंने महागठबंधन के उम्मीदवार को हराने में भूमिका निभाई है। यानी उन सीटों पर AIMIM के उम्मीदवार को मिले वोटों की संख्या हार-जीत के अंतर से अधिक रही है।

केवटी, शेरघाटी, प्राणपुर, कसबा, गोपालगंज और महुआ जैसी कम-से-कम 8 सीटें हैं, जहाँ AIMIM महागठबंधन की हार की वजह बनी है। RJD को जो यह भ्रम था कि मुस्लिम वोटों पर उसका एकमुश्त अधिकार है और मुस्लिम केवल उसके साथ ही जाएँगे यह भ्रम ओवैसी ने तोड़ दिया है।

मुस्लिमों वोटरों की प्राथमिकता- मजहबी पहचान और BJP विरोध

बिहार के इस चुनाव में एक बार फिर दिखा है कि मुस्लिम मतदाताओं की प्राथमिकताएँ दो मुख्य स्तंभों पर टिकती हैं। पहला है मजहबी पहचान और दूसरा है ऐसा राजनीतिक विकल्प चुनना जो BJP को प्रभावी रूप से चुनौती दे सके और उसे हराने की स्थिति में हो।

मुस्लिम समाज के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं होता कि किसने कितनी सड़क बनाई या किसने कितनी योजनाएँ लागू कीं बल्कि यह कि कौन-सी राजनीतिक शक्ति उनकी मुस्लिम पहचान को मजबूत करने का काम करेगी। AIMIM को चुनकर एक बार फिर वही प्राथमिकता मुस्लिम वोटरों ने दिखाई है।

यही वजह है कि उनकी राजनीति में मजहबी पहचान, प्रतिनिधित्व और उनके विचार की प्रमुखता सबसे ऊपर रहती हैं। जब उन्हें लगता है कि कोई दल उनकी पहचान को सीधे तौर पर संबोधित कर रहा है या उन्हें एक मजहबी पहचान दे रहा है तो वे उसके साथ खड़े होते हैं।

दूसरा पहलू रणनीतिक वोटिंग है। मुस्लिम मतदाता अक्सर यह देखते हैं कि चुनावी मुकाबले में BJP के खिलाफ सबसे मजबूत दावेदार कौन है। यदि कोई गठबंधन या पार्टी BJP को हराने में सक्षम दिखती है, तो मुस्लिम वोट बड़ी संख्या में उसके पक्ष में एकजुट हो जाते हैं।

मुस्लिमों का यह वोटिंग पैटर्न पूरे भारत में नजर आता है। गैर-बीजेपी दलों के सत्ता में आने के बाद उन्हें मिलने वाली खुली छूट के चलते मुस्लिम BJP के खिलाफ लामबंद रहते हैं। अधिकतर गैर बीजेपी सरकारें मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति कर किसी भी तरह उन्हें अपने पाले में रखना चाहती है। इसलिए उन्हें हर काम करने की खुली छूट मिलती है।

हर चुनाव से पहले बड़ी पार्टियाँ विकास योजनाएँ, रोजगार और शिक्षा के मुद्दे गिनाती हैं लेकिन मुस्लिम मतदाता उसी विकल्प की ओर झुकते हैं जो उन्हें अपनी मजहबी पहचान की ‘सुरक्षा’ का आश्वासन देता हो। यह पैटर्न प्रदेश भर में साफ दिखाई दिया है।

जहाँ RJD या कांग्रेस मुस्लिम वोट को ‘तुष्टीकरण’ का जरिया मान रहे थे लेकिन AIMIM ने उससे आगे जाकर ‘प्रत्यक्ष नेतृत्व’ का वादा किया। इसी वजह से मुस्लिम मतदाता AIMIM को एक ऐसे विकल्प के रूप में देखने लगे हैं जो उनकी पहचान को बिना किसी समझौते के राजनीतिक रूप देता है। ओवैसी की यही ‘घुसपैठ’ कई सीटों पर इतनी गहरी हुई कि मुख्यधारा की पार्टियाँ उसका मुकाबला नहीं कर पाईं।

बिहार के मौजूदा नतीजों से यही संकेत मिलता है कि मुस्लिम वोटों में पहचान आधारित राजनीति आने वाले समय में मजबूत ही होती जाएगी। युवा मुस्लिम मतदाता सोशल मीडिया और भाषणों के जरिए ऐसे मुस्लिम नेतृत्व की ओर झुक रहे हैं जो उनकी मजहबी पहचान को खुले तौर पर प्रस्तुत करे।

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शिव
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