Home Blog Page 151

बिहार में जहाँ पहुँचे PM मोदी-योगी वहाँ NDA की बंपर जीत, राहुल गाँधी की सभाओं वाली जगह पर डूबी कॉन्ग्रेस की लुटिया

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजे स्पष्ट रूप से एक नया राजनीतिक संदेश लेकर आए हैं। 243 सीटों में से NDA गठबंधन ने 200 से अधिक सीटें जीतकर प्रचंड जीत दर्ज की, जबकि विपक्षी महागठबंधन केवल 34 सीटों पर सिमट गया। चुनावी नतीजों का गहरा विश्लेषण यह साबित करता है कि बिहार की जनता ने ‘कुशासन’ और विरोध की नकारात्मक राजनीति को स्पष्ट रूप से नकार दिया है, और विकास तथा सुशासन के एजेंडे को चुना है।

यह परिणाम सीधा संकेत देता है कि जिन क्षेत्रों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने चुनावी सभाएँ कीं, वहाँ मतदाताओं ने विकास की गारंटी पर मुहर लगाई। लेकिन, जहाँ राहुल गाँधी ने वोट चोरी को मुद्दा बनाकर रैलियाँ की, वहाँ वो हारी।

प्रधानमंत्री मोदी की रैलियाँ बनीं NDA की विजय गारंटी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावी घोषणा के बाद कुल 14 जिलों में जनसभाएँ और पटना में एक रोड शो किया। उनकी रैलियाँ न केवल भीड़ खींचने में, बल्कि सीधे वोटों में बदलने में भी निर्णायक साबित हुईं। पीएम मोदी ने अपने भाषणों का केंद्र विकास, सुशासन, राष्ट्रीय सुरक्षा और बिहार को आगे ले जाने की योजनाओं को बनाया।

पीएम मोदी ने भावनात्मक अपील के बजाय ठोस वादों पर जोर दिया, जिसका असर खासकर महिलाओं, युवा वोटरों और पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं के बीच सबसे ज्यादा देखने को मिला। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मोदी फैक्टर अंतिम चरण तक चुनावी हवा को पूरी तरह से NDA के पक्ष में मोड़ने में सफल रहा। PM मोदी की सभाओं वाले कई जिलों में मतदान प्रतिशत भी औसत से अधिक रहा, जो उनकी लोकप्रियता और प्रभाव का सीधा संकेत है।

जहाँ मोदी ने रैली की, वहाँ NDA को मिली प्रचंड जीत

पीएम मोदी ने जिन प्रमुख सीटों पर रैलियाँ कीं, वहाँ NDA प्रत्याशियों को बड़ी जीत मिली। उदाहरण के लिए, बेगूसराय में बीजेपी उम्मीदवार ने 30 हजार से अधिक वोटों से जीत दर्ज की, मुजफ्फरपुर में बीजेपी उम्मीदवार रंजन कुमार 32 हजार से अधिक वोटों से जीते, और कटिहार में बीजेपी उम्मीदवार को 22 हजार से अधिक वोटों से जीत मिली।

समस्तीपुर और भागलपुर में भी NDA के उम्मीदवार विजयी रहे। यह साबित करता है कि मोदी की उपस्थिति ने जातीय समीकरणों से ऊपर उठकर जनता के झुकाव को विकास की ओर मोड़ दिया। NDA के रणनीतिकारों ने प्रधानमंत्री की सभाओं को उन सीटों पर केंद्रित किया था जहाँ गठबंधन पिछली बार कमजोर था या जहाँ मुकाबला कड़ा था।

परिणामों से यह रणनीति बिल्कुल सटीक साबित हुई। सीमांचल, मगध, शाहाबाद और मिथिला के कई हिस्सों में पीएम की सभाओं की गूँज मतदान के दिन तक कायम रही। NDA के उम्मीदवारों ने खुद माना कि प्रधानमंत्री की सभा ने उनके अभियान में नई जान फूँक दी और मोदी फैक्टर ने विरोधी जातीय समीकरणों को भी पूरी तरह बदलकर रख दिया।

सीएम योगी आदित्यनाथ का ‘भगवा’ स्ट्राइक रेट: कुशासन पर सीधा प्रहार

प्रधानमंत्री मोदी के साथ-साथ, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी बिहार चुनाव में एक अत्यंत सफल स्टार प्रचारक की भूमिका निभाई। सीएम योगी ने 31 सभाएँ और रैलियाँ कीं और उनके प्रचार वाली सीटों पर NDA का जीत का स्ट्राइक रेट 87% से अधिक रहा।

सीएम योगी ने अपने भाषणों में महागठबंधन पर उसके ‘जंगलराज’ और परिवारवाद को लेकर तीखा हमला बोला। CM योगी ने विकास और सुशासन के नाम पर वोट माँगते हुए बिना नाम लिए महागठबंधन के प्रमुख नेताओं को ‘पप्पू-टप्पू और अप्पू‘ नाम के तीन बंदरों की जोड़ी तक करार दिया। उनकी रैलियों में भीड़ भी खूब उमड़ी, जो उनके प्रभाव को दर्शाती है।

योगी के प्रचार का शानदार परिणाम

सीएम योगी ने जिन 31 सीटों पर प्रचार किया, वहाँ NDA के 27 प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की। यह प्रदर्शन दिखाता है कि योगी आदित्यनाथ का सख्त सुशासन और राष्ट्रवाद का एजेंडा बिहार के मतदाताओं के एक बड़े वर्ग को प्रभावित करने में सफल रहा।

उदाहरण के लिए, उन्होंने बगहा, बेतिया, परिहार, ढाका, लौरिया और रक्सौल जैसी सीटों पर रैलियाँ की और तीनों ही जगह बीजेपी ने जीत हासिल की। यह सफलता स्पष्ट करती है कि बिहार की जनता ने अराजकता नहीं, बल्कि कानून का राज चुनने का मन बना लिया था।

वहीं, समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने 22 सीटों पर महागठबंधन के लिए प्रचार किया, लेकिन उनका स्ट्राइक रेट महज 9% रहा (सिर्फ दो सीटों पर जीत)। बसपा प्रमुख मायावती का स्ट्राइक रेट भी सिर्फ 20% रहा। ये नतीजे साबित करते हैं कि जनता ने यूपी के उन नेताओं को पूरी तरह नकार दिया जिनकी अपनी साख या पकड़ बिहार की राजनीति में कमजोर थी और जो केवल विरोध के नाम पर चुनाव लड़ रहे थे।

राहुल-प्रियंका का प्रचार रहा ‘नकारात्मक’, जनता ने किया खारिज

इसके विपरीत, नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी ने कटिहार, पूर्णिया, नालंदा, बेगूसराय और खगड़िया सहित कई जिलों में महागठबंधन के लिए प्रचार किया, लेकिन यह प्रचार वोट में तब्दील नहीं हो सका। राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी ने जहाँ-जहाँ प्रचार किया, वहाँ महागठबंधन को भारी निराशा हाथ लगी।

बेगूसराय और नालंदा में जहाँ कॉन्ग्रेस के उम्मीदवारों के लिए जोर-शोर से प्रचार किया गया था, वहाँ उन्हें बीजेपी और जेडीयू उम्मीदवारों के हाथों 30 हजार से अधिक वोटों के बड़े अंतर से हार मिली। कटिहार और पूर्णिया में भी कॉन्ग्रेस उम्मीदवार हार गए। किशनगंज (जहाँ कॉन्ग्रेस उम्मीदवार एमडी कमरुल होदा 12 हजार वोटों से जीते) एकमात्र अपवाद रहा, जो अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्र है।

यह आँकड़ा साफ करता है कि महागठबंधन के शीर्ष प्रचारकों का ध्यान वोट चोरी जैसे आरोपों और विरोध की नकारात्मक राजनीति पर केंद्रित रहा, जबकि बिहार की जनता को विकास, रोजगार और बेहतर भविष्य की ठोस गारंटी चाहिए थी। जनता ने उन नेताओं पर भरोसा किया, जिन्होंने विकास का खाका पेश किया, न कि उन पर जो केवल चुनावी धांधली के आरोप लगाते रहे। बिहार चुनाव 2025 का यह जनादेश स्पष्ट रूप से ‘कुशासन को नकारने और सुशासन को चुनने‘ का ऐतिहासिक फैसला है।

जमीन पर थे कई मुश्किल मोर्चे, पर अमित शाह की रणनीतियों से सब हुए ढेर: पहले बागियों को मनाया, फिर विरोधियों को चटाई धूल

2014 के लोकसभा चुनाव से पहले जब भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश के चुनाव की कमान अमित शाह के हाथों में सौंपी थी तो बहुत से जानकारों ने इसे एक खतरनाक दाँव माना था। UP की सामाजिक संरचना, जातीय समीकरण और दशकों से चली आ रही राजनीतिक खेमेबंदियों के बीच BJP के लिए पैठ बनाना आसान नहीं था।

मगर शाह के लिए यह चुनाव उन्हें चाणक्य बनाने वाला साबित हुआ। 2014 में यूपी के लोकसभा चुनाव के नतीजों ने साबित कर दिया कि वो संगठन के असल रणनीतिकार और जमीनी राजनीति के प्रबंधन के मास्टर हैं। बिहार के नतीजों ने इस पर एक बार फिर मुहर लगा दी है।

बिहार को समझना किसी भी नेता के लिए आसान नहीं रहा है। यहाँ का सामाजिक परिवेश, अलग-अलग इलाके के लोगों की अलग महत्वाकाँक्षाएँ और मानसिकता के साथ-साथ स्थानीय राजनीति को समझकर लोगों को भरोसा जीतना बिल्कुल आसान नहीं है। बिहार को भी उसी तरह से समझने, बूछने और लोगों भरोसा जीतने में अमित शाह को 11 वर्ष लगे लेकिन जब उन्होंने यह भरोसा जीता है तो तमाम जानकार और रणनीतिकारों के गणित को ध्वस्त कर दिया।

जो कर रहे थे बगावत वही बनाए गए जिम्मेदार

इस चुनाव में यह सही है कि JDU के लिए मैदान कुछ हद तक अनुकूल था। नीतीश कुमार को लेकर सहानुभूति थी, मोदी की लोकप्रियता थी, महिलाओं को 10,000 रुपए दिए जाने और वृद्धावस्था पेंशन बढ़ाए जाने का असर था। मगर बीजेपी के लिए यह लड़ाई कहीं से आसान नहीं थी। कई सीटों पर बगावत, कुछ जगहों पर भीतरघात को लेकर असमंजस की स्थिति थी और यहीं काम आया अमित शाह का चुनावी अनुभव।

चुनाव प्रचार शुरू होने से पहले उन्होंने पहला बड़ा काम किया बागियों को मनाने का, जहाँ कुछ लोगों ने चुनाव लड़ने का मन बना लिया था उम्मीदवारी वापस कराई और भीतरघात का खतरा लगभग खत्म कर दिया। खास बात यह थी कि जब बागी मान गए तो शाह ने उन्हें किनारे नहीं किया बल्कि अपने ही इलाके की चुनावी जिम्मेदारी देकर उन्हें सक्रिय भूमिका में रखा। इससे संगठन में ऊर्जा भी बढ़ी और अनुशासन भी मजबूत हुआ।

सिर्फ बड़ी सभाएँ नहीं छोटी-छोटी बैठकों से बनाई रणनीति

चुनाव अभियान के बीच में भी जहाँ अमित शाह को लगा कि इस इलाके में नेतृत्व को बदला जाना जरूरी है तो वहाँ प्रचार के बीच ही उन्होंने कमान हाथों-हाथ बदली। शाह को किसी फैसले को टालने या लंबा खींचने की आदत नहीं है। हर सीट की अलग प्रकृति, अलग संरचना और अलग चुनौतियों को देखते हुए उन्होंने ताबड़तोड़ फैसले लिए।

चुनाव अभियान के दौरान भी जब वह किसी इलाके में गए तो केवल सभा तक ही सीमित नहीं रहे, वे जहाँ भी जाते सुबह सबसे पहले प्रबुद्ध वर्ग, स्थानीय कार्यकर्ताओं और जमीन से जुड़े लोगों की अलग-अलग बैठकें लेते। यह सिर्फ फॉर्मेलिटी नहीं होती थी बल्कि इससे जो फीडबैक मिलता, उसके आधार पर उसी दिन रणनीति में बदलाव भी कर देते।

देर रात तक समीक्षा बैठकें करते शाह

दिन में रोड शो, सभाएँ, रैलियाँ और देर रात सीट-दर-सीट समीक्षा, चुनावों के बीच शाह का यह सिलसिला लगातार चलता रहा। उन्होंने इन दर रात तक चलने वाली बैठकों में सिर्फ आँकड़े नहीं जुटाए बल्कि हर संभावित बदलाव, हर नए मौके और विपक्ष की गतिविधियों का बारीकी से विश्लेषण किया था। इसके आधार पर फैसले लिए और धीरे-धीरे पार्टी के लिए जमीन मजबूत होती गई।

मिथिला-कोशी इलाके में बनाई खास रणनीति

बीजेपी के लिए बिहार का सबसे मुश्किल इलाका मिथिला-कोशी रहा है। दरभंगा, मधुबनी, सीतामढ़ी जिलों में वर्षों से बीजेपी के भीतर उठापटक चल रही थी लेकिन शाह ने इस चुनौती से दूरी नहीं बनाई। उन्होंने यहाँ डेरा डाल दिया। कई दिनों तक वहीं रहे, स्थानीय नेताओं को साथ बैठाया और उनके बीच के मतभेद दूर कराए। इसके साथ ही, बूथ स्तर की टीमों को दुरुस्त किया और यह स्पष्ट संदेश दिया कि संगठन का अनुशासन सर्वोपरि है।

उनका लक्ष्य केवल चुनाव जीतना नहीं था बल्कि संगठन को स्थायी रूप से मजबूत करना था। उनके इस प्रयास का असर यह हुआ कि चुनाव के नतीजों में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभर रही है। 101 सीटों पर चुनाव लड़ी बीजेपी 90 के करीब सीटें जीतता दिख रही है। शाह की मेहनत, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रभाव और नीतीश की साख ने NDA को अभेद्य किला बना दिया है।

चुनाव से पहले जिनको बता रहे थे बीमार, जिनके खत्म होने के हो रहे थे दावे; नतीजों के बाद वही नीतीश कुमार बने ‘जननायक’: जानिए कैसे विपक्ष को किया साफ

बिहार चुनाव शुरू होने से पहले नीतीश कुमार को थका हुआ मान लिया गया था लेकिन नतीजों में दिख रहा है कि आज भी बिहार को नीतीश कुमार की जरूरत है। उन्होंने सारे समीकरणों को खारिज कर दिया है। चुनाव से पहले उनके स्वास्थ्य को लेकर भ्रम फैलाए गए लेकिन नीतीश कुमार ने इस चुनाव में अपनी मेहनत से साबित कर दिया कि क्यों वह 20 वर्षों तक बिहार की राजनीति की धुरी बने हुए हैं।

इस चुनाव में जब बारिश के कारण नेता अपनी सभाओं में नहीं पहुँच पा रहे थे, सभाओं को मोबाइल से संबोधित कर रहे थे लेकिन जब हेलीकॉप्टर पटना से नहीं उड़ पा रहे थे। तो नीतीश कुमार ने सड़क से कुशेश्वर स्थान से अररिया संग्राम तक नाप दिया था। वो बारिश और खराब मौसम में सड़कों से सभाओं में पहुँचते रहे और लोगों से मिलते रहे। उन्होंने अपनी मेहनत से यह साबित कर दिया कि उनका स्वास्थ्य एकदम ठीक है।

बिहार की जरूरत बने नीतीश कुमार

जनता ने सीएम नीतीश कुमार पर अपना विश्वास जता कर तय कर दिया है कि आज भी वे ‘बिहार की जरूरत’ हैं। लालू राबड़ी का वो 15 सालों का राज, जब राजनीति का अपराधीकरण किया गया और जनता पर ताबड़तोड़ हमले किए गए। जनता को ये मंजूर नहीं है। इस ‘जंगल राज’ से राज्य को बाहर निकाल कर महिलाओं को सशक्त बनाने की उन्होंने पहल की।

जंगलराज की छवि से निकाल कर बिहार के विकास की नींव डाली। राज्य की जनता उसे नहीं भूली है। यही वजह है कि सभी समीकरणों को धत्ता बताते हुए जनता ने नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार पर भरोसा जताया।

महिला वोटरों का भरोसा बरकरार

बिहार विधानसभा चुनाव में इस बार महिलाओं ने पुरुषों के मुकाबले ज्यादा वोट किया। दरअसल नीतीश कुमार को महिलाओं ने अपना ‘रक्षक’ माना। शराबबंदी से लेकर साइकिल स्कीम तक का असर महिलाओं पर पड़ा है। साइकिल स्कीम के बाद राज्य में महिला शिक्षा 53 फीसदी से बढ़ कर 70 फीसदी हो गई है।

महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत रिकॉर्डतोड़ 71.6% रहा, जो 1951 के बाद सबसे अधिक है। पुरुषों के मुकाबले महिलाओं ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। इससे पता चलता है कि महिलाओं में वोटिंग को लेकर कितना उत्साह था और ये उत्साह एनडीए को वोट देने के लिए था। नतीजे इसका ऐलान कर रहे हैं।

शराबबंदी-कैश ट्रांसफर का पड़ा असर

महिलाओं के स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए उनके खातों में दिए गए 10000 रुपए का असर भी था। साथ ही उम्मीद थी कि अगर सरकार फिर से सत्ता में आई तो 2 लाख रुपए रोजगार को और बढ़ाने के लिए महिलाओं को दिए जाएँगे। इसका काफी असर पड़ा।

इसके अलावा फ्री राशन, आवास और शराबबंदी, हर महीने खाते में आने वाले पैसों ने नीतीश-मोदी कॉम्बो पर महिलाओं में अपना विश्वास कायम रखा। महिलाओं ने साबित किया कि उन्होंने जाति से परे विकास के मॉडल को अपना समर्थन दिया।

साफ छवि और परिवारवाद से कोसों दूर

नीतीश कुमार के 20 साल के कार्य में उनकी छवि अभी भी बेदाग रही है। राज्य में नीतीश और केन्द्र में मोदी, इन दो चेहरों पर जनता विश्वास करती है। ये इस विधानसभा चुनाव में भी साबित हो गई है। सीएम नीतीश के परिवार का कोई सदस्य राजनीति में नहीं है। यही बात पीएम मोदी के साथ भी है।

महागठबंधन पर परिवारवाद के आरोप लगते हैं। लालू यादव का पूरा कुनबा यानी पति- पत्नी और बेटे- बेटियाँ आरजेडी को संभाल रहे हैं। कॉन्ग्रेस में गाँधी परिवार के युवराज राहुल गाँधी के साथ प्रियंका गाँधी वाड्रा लोकसभा के सदस्य हैं जबकि माँ सोनिया गाँधी राज्यसभा की सांसद हैं। पीएम मोदी से लेकर सीएम नीतीश कुमार तक ने इस मुद्दे को अपनी रैली में जोरशोर से उठाया। इसका परिणाम हुआ कि जनता ने विपक्षी दलों को नकारा।

सुशासन बाबू के दौर में विकास की बयार, डबल इंजन की सरकार

2005 में बिहार को जंगलराज से बाहर निकाल कर विकास की पटरी पर लाने वाले नीतीश कुमार के काल में जनता ने देखा है कि कैसे बिहार की सड़कें तेजी से विकसित हुई है। राज्य में एयरपोर्ट, मेट्रो का निर्माण हुआ। एम्स, आईआईटी जैसी संस्थानों का निर्माण हुआ। विकास के पथ पर बिहार के अग्रसर होने का असर रहा कि जनता ने वर्तमान सरकार पर अपना भरोसा जताया।

केन्द्र सरकार की आवास योजना, उज्जवला योजना, इज्जतघर जैसी योजनाएँ जमीन तक पहुँची। सीएम नीतीश के ‘लोकल टच’ के साथ किए गए डबल इंजन की सरकार के कार्य को लोगों ने सराहा। बिहार ने पहली बार इंजन एक्सपोर्ट किया, गजाजी में इंजीनियरिंग क्लस्टर बना इससे जनता में विश्वास पैदा हुआ।

नीतीश कुमार की सेहत पर सवाल को जनता ने नकारा

चुनाव से पहले नीतीश कुमार के स्वास्थ्य को लेकर भ्रम फैलाए गए। आरजेडी के सीएम चेहरा तेजस्वी यादव ने उन्हें बीमार कहा। जन सुराज के प्रशांत किशोर ने उनके सेहत को लेकर बुलेटिन जारी करने की माँग की। इस भ्रम के बीच पटना में बारिश से हेलीकॉप्टर नहीं उतरा तो सड़क मार्ग से कुचेश्वर स्थान से अररिया तक सड़क मार्ग से पहुँचे और लोगों को संबोधित किया।

इस दौरान ज्यादातर नेताओं की रैलियाँ केंसिल कर दी गई थी। ऐसे प्रतिकूल मौसम में, स्वास्थ्य को लेकर अटकलों के बीच उन्होंने साबित कर दिया कि वो सेहतमंद हैं और राज्य की बागडोर संभालने में पुरी तरह सक्षम है। ग्राउंड लेवल पर नीतीश कुमार की मेहनत रंग लाई और एनडीए की सरकार बनने का मार्ग प्रशस्त हुआ।

बिहार में मोदी-नीतीश की प्रचंड सुनामी: महिला वोटरों से लेकर नौकरी-विकास तक, जानें वो 5 बड़े फैक्टर जिन्होंने NDA को फिर बना दिया ‘किंग’

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के रुझानों ने इतिहास रच दिया है। मतगणना का हर राउंड यही बता रहा है कि बिहार की जनता ने ‘जंगलराज’ को पूरी तरह नकार दिया है और डबल इंजन के विकास पर मुहर लगा दी है। यह कोई साधारण जीत नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 5-फैक्टर रणनीति का परिणाम है, जिसने विरोधियों को चारों खाने चित कर दिया।

मोदी ने अपनी रैलियों में लालू-राबड़ी शासन के खौफनाक अतीत को सफलतापूर्वक जीवित किया, जिससे जनता को यह संदेश मिला कि उन्हें फिर से उस अंधकार की ओर नहीं लौटना है। यह जीत नीतीश कुमार के जमीनी विश्वास और केंद्र सरकार की जन-कल्याणकारी योजनाओं के सफल क्रियान्वयन का भी प्रमाण है, जिसने गरीब और युवाओं का भरोसा जीता। पाँच मजबूत फैक्टरों की बदौलत, NDA ने न सिर्फ एक बड़ी जीत हासिल की है, बल्कि बिहार की राजनीतिक दिशा को भी पूरी तरह से विकासोन्मुख बना दिया है।

मोदी बने X फैक्टर: ‘जंगलराज’ की याद ने पूरा चुनावी माहौल मोड़ा

इस चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बार फिर बिहार के सबसे बड़े ‘नैरेटिव सेटर’ साबित हुए। उनकी रैलियों ने चुनाव का मुद्दा महँगाई, बेरोजगारी या स्थानीय नाराजगी से हटाकर सीधे कानून व्यवस्था के इतिहास पर ला खड़ा किया। मोदी ने लगातार जनता को ‘लालू-राबड़ी‘ शासन के उस काल की याद दिलाई जिसे बिहार की राजनीतिक भाषा में ‘जंगलराज‘ कहा जाता है।

शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा को टिकट देकर आरजेडी ने जैसे खुद विपक्ष के हाथ में हथियार दे दिया और मोदी ने इस मुद्दे को हर रैली में उछालकर लोगों की स्मृतियों को फिर जगा दिया। पुराने लोग इस दौर को आज भी डर और अव्यवस्था से जोड़ते हैं और आज की नई पीढ़ी को मोदी ने बार-बार यह कहकर प्रभावित किया, “अपने घर के बुजुर्गों से पूछो कि जंगलराज में क्या-क्या होता था।” यह भावनात्मक अपील अत्यंत प्रभावी साबित हुई।

मोदी ने सिर्फ भय की याद नहीं दिलाई, बल्कि उसकी तुलना डबल इंजन सरकार के विकास मॉडल से भी की। उन्होंने सड़क, बिजली, आवास, गैस, शौचालय, मुफ्त अनाज और किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं को जोड़कर यह संदेश दिया कि बिहार अब उस अंधकार से निकल चुका है और इसे फिर पीछे नहीं जाने देना चाहिए।

महिलाओं के प्रति मोदी की विशेष अपील, छठ पूजा के सम्मान का मुद्दा और सशस्त्र बलों के शौर्य- इन सभी को जोड़कर उन्होंने यह दिखाने की कोशिश की कि एनडीए केवल सुरक्षा और विकास नहीं, बल्कि बिहार की सांस्कृतिक पहचान का भी संरक्षक है। कुल मिलाकर, मोदी ने चुनाव का फोकस अपने नियंत्रण में लिया। इस चुनाव में वे निर्णायक ‘X फैक्टर’ साबित हुए।

नीतीश कुमार ने जमीन पर दिखाया दम: बीमार होने के बावजूद बारिश में भी सभाएँ कीं

20 साल सत्ता में रहने के बाद किसी भी नेता के लिए जनता के बीच उत्साह बनाए रखना आसान नहीं होता। लेकिन नीतीश कुमार ने इस चुनाव में दिखा दिया कि उनका जमीनी नेटवर्क और प्रशासनिक भरोसा आज भी उतना ही मजबूत है। बीमारी और उम्र की दिक्कतों के बावजूद वे लगातार दौरे करते रहे।

जब कई बड़े नेता बारिश के कारण सभाएँ स्थगित कर रहे थे, नीतीश कुमार कार से घंटों दूर-दराज के इलाकों में पहुँचते रहे और छोटी-बड़ी हर सभा में लोगों से संवाद करते रहे। इससे एक बहुत बड़ा संदेश गया कि ‘नीतीश थके नहीं हैं, रिटायर नहीं हुए हैं और काम छोड़ने को तैयार नहीं हैं।’

उनके इन दौरे सिर्फ राजनीतिक कार्यक्रम नहीं थे, बल्कि उस लंबे कार्यकाल का स्मरण थे जिसमें उन्होंने सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और प्रशासन को नई दिशा दी। लोगों में उनके प्रति स्वाभाविक भरोसा इस बार भी दिखाई दिया। दिलचस्प बात यह रही कि नीतीश के खिलाफ कोई बहुत बड़ी एंटी-इनकंबेंसी नहीं दिखी, जबकि यह भारतीय राजनीति में दुर्लभ है। इसका कारण उनका बीते 20 वर्षों का रिकॉर्ड है, विशेषकर शराबबंदी, महिला सशक्तिकरण, ग्रामीण सड़कों की क्रांति और प्रशासनिक सुधार।

युवाओं में बेरोजगारी को लेकर कुछ नाराजगी जरूर थी, पर प्रधानमंत्री मोदी और नीतीश कुमार ने मिलकर इसे बड़े वादों में बदल दिया, कौशल विकास, उद्योग लाने और पलायन रोकने जैसे मुद्दे उठाकर। नतीजा यह रहा कि ‘अनुभव + विश्वास’ के रूप में नीतीश की छवि NDA की जीत की रीढ़ बन गई।

महिलाओं ने खेल दिया पलट: 10,000 रुपए की सीधी सहायता और 8% ज्यादा महिला वोटिंग

2025 के बिहार चुनाव की सबसे प्रभावशाली बात महिलाओं की ऐतिहासिक मतदान भागीदारी रही। पहले चरण में पुरुषों के मुकाबले 8% अधिक महिलाओं ने वोट डाले। यह सिर्फ एक संख्या नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश था कि बिहार की महिलाएँ अब चुनाव का भविष्य तय कर रही हैं।

आपको बता दें, कि 10,000 रुपए की सीधी आर्थिक मदद इसके केंद्र में था, जो 1 करोड़ से अधिक जीविका समूह से जुड़ी महिलाओं के खातों में भेजी गई। यह लाभ पहली बार सीधे महिला मतदाता को मिला, बिना किसी बिचौलिये के।

इस आर्थिक सहायता के साथ 2 लाख रुपए तक आसान लोन का वादा, स्कूलों में साइकिल योजना, पोशाक योजना, सुरक्षा, स्वास्थ्य और स्व-सहायता समूहों की सफलता, इन सबने मिलकर महिलाओं को नीतीश के पक्ष में गोलबंद कर दिया। कई महिलाएँ जो पहले कभी वोट डालने नहीं आती थीं, इस बार वे बूथों पर लंबी कतारों में दिखाई दीं। यह बताता है कि महिलाओं के भीतर नीतीश सरकार के प्रति गहरा भरोसा और भावनात्मक जुड़ाव है।

इसके अलावा, पीएम मोदी ने भी महिलाओं को अपने संबोधनों के केंद्र में रखा। छठ पूजा के सम्मान, परिवारवाद की आलोचना और महिलाओं के लिए आर्थिक अवसर, इन सबकी बात करके उन्होंने महिला वोट को और सुदृढ़ किया। स्पष्ट है कि 2025 की जीत के मूल में महिलाओं की अभूतपूर्व भागीदारी सबसे निर्णायक फैक्टरों में से एक है।

नौकरी, विकास और जनकल्याण योजनाएँ: युवाओं और गरीबों का भरोसा NDA पर टिका

रोजगार हमेशा बिहार का केंद्रीय मुद्दा रहा है। इस बार भी युवा बेरोजगारी को लेकर असंतुष्ट थे, लेकिन NDA ने इसे अवसर में बदला। संकल्प पत्र में 1 करोड़ रोजगार का वादा मुख्य आकर्षण बना। प्रधानमंत्री मोदी ने इसे अपनी हर रैली में दोहराया और ‘बिहार में ही काम करेगा, बिहार का ही नाम करेगा’ जैसा नारा देकर युवाओं को यह संदेश दिया कि सरकार पलायन की समस्या को समझती है और उसका समाधान लाने की तैयारी में है।

दूसरी तरफ, गरीब और निम्न मध्यवर्गीय परिवारों में एनडीए की कल्याणकारी योजनाओं की पहुँच करोड़ों घरों तक बनी रही। मुफ्त अनाज योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, शौचालय, गैस कनेक्शन, किसान सम्मान निधि, वृद्धावस्था पेंशन, बिजली–सड़क–पानी जैसी योजनाओं ने NDA के आधार को बहुत मजबूत बनाया। जिन लोगों को इन योजनाओं का लाभ मिला, उन्होंने मूक लाभार्थी यानि ‘silent beneficiary’ की भूमिका निभाई और बड़ी संख्या में एनडीए के पक्ष में वोट किया।

पहले चरण में रिकॉर्ड वोटिंग इसलिए भी हुई क्योंकि SIR के तहत फर्जी और निष्क्रिय नाम हटाए गए थे और 21 लाख नए मतदाता जुड़े थे। बाहर रहने वाले बिहारियों में यह डर भी था कि अगर वे वोट नहीं देंगे तो अगली सूची में उनका नाम कट सकता है। इस बार कई वर्षों से वोट न डालने वाले भी मतदान केंद्र पहुँचे। इसमें प्रशांत किशोर के जनसुराज अभियान का भी प्रभाव रहा। लेकिन अंतिम फैसला युवाओं ने रोजगार की उम्मीद और गरीबों ने कल्याणकारी योजनाओं के भरोसे पर किया और इन दोनों वर्गों ने मिलकर NDA को भारी समर्थन दिया।

विपक्ष का आउट-ऑफ-फोकस अभियान: राहुल की वेबफूकियाँ, तेजस्वी के अनर्गल वादे

इस चुनाव में विपक्ष का सबसे बड़ा नुकसान उसकी खुद की रणनीतिक कमजोरियों से हुआ। राहुल गाँधी ने चुनाव प्रचार की शुरुआत तो दमदार की, लेकिन जब प्रचार का पीक समय था, वे 57 दिनों तक बिहार से गायब रहे। विदेश यात्रा, दिल्ली में इमरती छानने की तस्वीरें और हरियाणा-UP के कार्यक्रमों में दिखना… इन सबने यह संदेश दिया कि वे बिहार चुनाव को गंभीरता से नहीं ले रहे।

विपक्ष ने SIR पर ‘वोट चोरी’ का आरोप लगाया, लेकिन यह समझाने में असफल रहे कि इससे आम वोटर का क्या नुकसान हुआ। उल्टा, जिस फर्जी फोटो को उन्होंने हरियाणा का मतदाता बताकर ‘वोट चोरी’ का उदाहरण दिया था, वह ब्राजील की मॉडल निकली। इससे उनकी विश्वसनीयता को भारी चोट लगी।

दूसरी ओर तेजस्वी यादव के वादे अवास्तविक और अनियोजित लगे। 10 लाख नौकरियों का दावा, उद्योग के बिना रोजगार का फॉर्मूला और सीएम फेस की घोषणा को लेकर महागठबंधन में लंबी खींचतान… इन सबने जनता में यह धारणा बनाई कि विपक्ष खुद ही अपनी दिशा तय नहीं कर पा रहा, तो बिहार का भविष्य क्या है सही करेगा।

RJD और कॉन्ग्रेस की स्थानीय स्तर पर फूट की खबरें, कॉन्ग्रेस अध्यक्ष की सीट पर RJD उम्मीदवार खड़ा करना और दोनों दलों का एक-दूसरे को नुकसान पहुँचाने की कोशिश… इसने गठबंधन को कमजोर कर दिया। मतदाताओं का बिहार चुनाव के नतीजों से ये ही साफ संदेश मिलता है, “जो खुद बिखरा है, वह बिहार को क्या संभालेगा?” और यह सीधा लाभ एनडीए को मिला।

अब, 14 नवंबर 2025 के बिहार विधानसभा चुनावों का रुझान यह साफ दिखा रहा हैं कि बिहार की जनता ने सोच-समझकर मतदान किया है। मोदी का प्रबल नैरेटिव, नीतीश की जमीनी विश्वसनीयता, महिलाओं की रिकॉर्ड वोटिंग, रोजगार-विकास की उम्मीद, और विपक्ष की रणनीतिक कमजोरियाँ… इन पाँच फैक्टरों ने मिलकर NDA को 198 सीटों की मजबूत बढ़त दिला दी है। यह जीत सिर्फ एक चुनाव जीत नहीं, बल्कि बिहार की बदलती राजनीतिक मानसिकता का संकेत है।

बिहार चुनाव LIVE: मोकामा से अनंत सिंह जीते, तेजस्वी और तेज प्रताप बड़े अंतर से पीछे: रुझानों में NDA को 200 सीट पार, RJD-कॉन्ग्रेस मिलकर भी अर्धशतक तक नहीं पहुँची; जनसुराज का खाता खुलना मुश्किल

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की 243 सीटों पर मतगणना सुबह 08:00 बजे से प्रारंभ हुई। शुरुआती रुझानों में लगातार एनडीए की बढ़त है। सुबह 9:30 बजे के आँकड़ों के मुताबिक सबसे अच्छा प्रदर्शन अब तक जेडीयू-भाजपा का है। बिहार चुनाव से जुड़े पल-पल अपडेट्स के लिए यहाँ क्लिक करके पढ़ें और हमारे यूट्यूब पर चल रही चुनावी चर्चा को देखने के लिए नीचे दिए यूट्यूब लिंक पर क्लिक करें।

बिहार में वोटों की गिनती शुरू होते ही रुझानों में आगे निकली NDA, नीतीश का दिख रहा है जलवा: जानिए अब तक महागठबंधन का क्या है हाल

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की मतगणना शुरू हो चुकी है। निर्वाचन आयोग ने सभी 243 सीटों पर मतगणना 08:00 बजे से प्रारंभ करने की जानकारी दी। शुरुआती रुझानों में मीडिया लगातार एनडीए की बढ़त दिखा रहा है।

सबसे अच्छा प्रदर्शन अब तक जेडीयू का है। 182 सीटों पर रुझान दिख रहे हैं तो जेडीयू के पास 51-52 सीट बताई जा रही हैं। वहीं महागठबंधन फिलहाल के लिए रेस में आधे से ज्यादा मार्जिन से पीछे है। उनके हिस्से करीबन 61+ सीटें आ रही है। किसी भी दल को राज्य में जीतने के लिए 122 सीट जीतनी जरूरी होगी। इसके करीब अभी एनडीए ही है।

बता दें कि ECI की प्रक्रिया के अनुसार, मतगणना के क्रम में पहले डाक मत-पत्रों की गिनती हो रही है, उसके बाद इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) के मतों की गिनती की जाएगी।

राज्य के 40+ मतगणना केंद्रों में कुल 4,372 गिनती टेबल लगाई गई हैं और लगभग 18,000 एजेंट्स तथा रिटर्निंग अधिकारियों को नियुक्त किया गया है ताकि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और व्यवस्थित तरीके से हो सके। मतगणना के दौरान पूरे राज्य में सुरक्षा-व्यवस्था कड़ी की गई है। सीआरपीएफ और राज्य पुलिस बल को तैनात किया गया है ताकि किसी भी तरह की व्यवधान की स्थिति न बने।

किसी का उठा मीडिया से विश्वास, कोई ‘फर्जी’ बताने पर तुला: जानिए कैसे बिहार नतीजों से पहले एग्जिट पोल देख विपक्षी बौखलाए, अभी से रो रहे EVM-वोटचोरी का रोना

बिहार में दोनों चरणों में हुई रिकॉर्डतोड़ वोटिंग के बाद लोगों की दिलचस्पी एग्जिट पोल में थी, क्योंकि सब जानना चाहते हैं कि वोटरों का उत्साह वर्तमान नीतीश सरकार के पक्ष में है या 20 साल सत्ता में रहने के बाद एंटी इनकम्बैंसी फैक्टर का असर चुनाव पर पड़ा है। एग्जिट पोल के नतीजों ने ‘एक बार फिर नीतीशे कुमार’ पर मुहर लगा दी है। यही वजह है कि अभी से पटना में पोस्टर लग गए हैं- ‘टाइगर जिंदा है’

इससे पहले हम के प्रमुख और केन्द्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने कहा, ”मैं पहले दिन से ही कह रहा हूँ कि एनडीए 160 सीटें जीतेगा और सरकार बनाएगा. एग्ज़िट पोल भी बता रहे हैं कि एनडीए को कम से कम 40 सीटें मिलेंगी।” बीजेपी और जेडीयू के नेता भी मान रहे हैं कि एग्जिट पोल से साबित हो गया है कि जनता ने एनडीए के पक्ष में वोट किया है। जनता को ‘जंगलराज-2’ नहीं चाहिए।

एग्जिट पोल पचा नहीं पा रहा महागठबंधन

विपक्ष एग्जिट पोल को पचा नहीं पा रहा है। महागठबंधन के सीएम चेहरा तेजस्वी यादव ने एग्जिट पोल को फर्जी करार देते हुए कहा है कि 18 नवंबर को महागठबंधन की सरकार बनेगी। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर मतगणना में किसी तरह की ‘गड़बड़ी’ की गई, तो जनता इसका जवाब देगी। उन्होंने यहाँ तक आरोप लगाया कि एग्जिट पोल गृह मंत्री अमित शाह और बीजेपी के निर्देश के मुताबिक बनाया गया है।

तेजस्वी यादव ने कहा है कि एग्जिट पोल मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की है, ताकि रिजल्ट अधिकारियों पर दबाव बनाया जा सके। कुछ ऐसी ही प्रतिक्रिया बिहार चुनाव में बगैर उम्मीदवार उतारे जोर-शोर से महागठबंधन का प्रचार कर रहे एसपी अध्यक्ष अखिलेश यादव की भी है।

अखिलेश यादव ने एग्जिट पोल को ‘झूठा’ करार देते हुए इसे ‘भ्रमित’ करने वाला बताया है। उन्होंने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, जब चुनाव आयोग मतदान के कई दिनों तक वोटों का आँकड़ा नहीं दे पाता है तो ये चैनल कैसे एक घंटे में सब बता देते हैं।”

उन्होंने कहा, “इनके झूठ के ग्राफ़िक्स कई दिनों पहले से तैयार हो जाते हैं, जहाँ से भोजन-पानी का इंतज़ाम होता है ये झूठे चैनल उसकी पंगत में जा बैठते हैं। जिनको लगता भी है कि ये एग्जिट पोल सही हैं वो उप्र के लोकसभा के चुनाव का एग्जिट पोल देख लें जहाँ बड़े-बड़े भाजपाई सूरमाओं की हार हुई और फेक एग्जिट पोलों की भी।”

आरजेडी के प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने कहा, “एग्जिट पोल पहले भी गलत साबित हुए हैं और आगे भी गलत साबित होंगे। मुझे पूरा विश्वास है कि 14 नवंबर को महागठबंधन और तेजस्वी यादव भारी मतों से जीतेंगे। बिहार की जनता ने एनडीए सरकार के खिलाफ वोट दिया है और तेजस्वी को सरकार बनाने के लिए वोट दिया है। एग्जिट पोल देखकर जो लोग भ्रम में हैं, उन्हें भ्रम में रहने दें। सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं।”

आरजेडी नेता और बक्सर के सांसद सुधाकर सिंह ने कहा कि हाई मतदान का ज्यादा होना, हमेशा सत्ताधारी दल के खिलाफ जनता का जनादेश माना जाता है। हमें अंतिम परिणाम का इंतजार करना होगा। उन्होंने कहा कि उन्हें पूरा विश्वास है कि बिहार में ‘महागठबंधन’ आराम से सरकार बनाएगा। एग्जिट पोल हकीकत से कोसों दूर हैं।

समाजवादी पार्टी के सांसद अवधेश प्रसाद ने एग्जिट पोल पर सवाल उठाते हुए कहा, “बिहार की जनता तेजस्वी यादव को सीएम बनाना चाहती है। जनता ने नीतीश सरकार को हटाने का फैसला कर लिया है।”

महागठबंधन की घटक कॉन्ग्रेस का भी यही हाल है। कॉन्ग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने (12 नवंबर 2025) बुधवार को कहा, “मैं एग्जिट पोल पर कुछ नहीं कहूँगी। जब नतीजे आएँगे, तब इस पर बात करूँगी। उन्होंने कहा कि यहाँ लोगों के मताधिकार के साथ हेराफेरी की गई है इसलिए बिहार सबक सिखाएगा और मुझे पूरा विश्वास है कि महागठबंधन की सरकार बनेगी।”

कॉन्ग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने तो यहाँ तक दावा कर दिया है कि बिहार में दोनों गठबंधन के बीच मुकाबला बराबरी का था। यदि एनडीए को 140 से अधिक सीटें मिलती है तो ये ‘वोटर लिस्ट और ईवीएम में हेरफेर’ का कमाल होगा।

एग्जिट पोल पर दिग्विजय सिंह ने अविश्वास जताते हुए कहा कि उन्हें एग्जिट पोल पर कभी भरोसा ही नहीं रहा। ये चुनाव एकतरफा नहीं बल्कि दोनों गठबंधन के बीच बराबरी का था। वहीं सांसद पप्पू यादव ने एग्जिट पोल के नतीजो को खारिज करते हुए कहा कि एग्जिट पोल कब सही था? अगर वोट बढ़ा है तो कहाँ बढ़ा है। जाहिर है बिहार की जनता ने महागठबंधन को वोट दिया है।

कॉन्ग्रेस नेता तारिक अनवर ने कहा कि एग्जिट पोल कभी सटीक नहीं होते। ये सिर्फ एक अनुमान होते हैं कि क्या हो सकता है। इन्हें अंतिम नतीजा मान लेना सही नहीं होगा। वहीं आम आदमी पार्टी नेता संजय सिंह ने एसआईआर पर सवाल खड़े करते हुए अभी से कहना शुरू कर दिया है कि वोट चोरी हुई है उसका बहुत व्यापक असर इस चुनाव पर पड़ेगा।

बिहार में महागठबंधन के नेता जहाँ एग्जिट पोल को नकारने में लगे हैं और इसे भ्रम फैलाने वाला कह रहे हैं। अधिकारियों पर दबाव बनाने का तरीका बताने में लगे हैं, वहीं एनडीए के घटक दल के नेता इससे काफी उत्साहित दिख रहे हैं।

एग्जिट पोल में एनडीए की बन रही सरकार

अगर ‘पोल ऑफ पोल्स’ की बात करें तो एनडीए को 148 सीटें, महागठबंधन को 88 सीटें और अन्य के खाते में 7 सीटें आ रही हैं। किसी एग्जिट पोल में जेडीयू सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरती हुई दिख रही है, तो किसी एग्जिट पोल में बीजेपी को सबसे ज्यादा सीटें मिलती दिखाई दे रही है। लेकिन हर एग्जिट पोल एनडीए की सरकार बनवा रहा है।

MATRIZE एग्जिट पोल के अनुसार, बिहार चुनाव 2025 में NDA जीत हासिल करेगी। चुनाव में NDA को 147-167 सीटें मिलने वाली हैं। वहीं महागठबंधन को 70-90 सीटों पर सिमटकर रह जाएगा। उधर अन्य पार्टियों को 3-6 सीटें मिलने की संभावना है।

People’s Insight के एग्जिट पोल के हिसाब से बिहार चुनाव में NDA 133-148 सीटें हासिल करेगी। वही महागठबंधन को 87-102 सीटें मिलने का अनुमान है जबकि जनसुराज पार्टी केवल 0-2 सीटों पर सिमटकर रह जाएगी। उधर अन्य पार्टियों की झोली में 3-6 सीटें जाने की संभावना है।

दैनिक भास्कर के एग्जिट पोल में भी NDA को बढ़त मिल रही है। इसमें NDA 145-160 सीटें, महागठबंधन को 73-91 सीटें मिलने का अनुमान है। जनसुराज का खाता भी खुल सकता है, पार्टी को 0-3 सीटें मिल सकती हैं। वहीं अन्य दल 5-10 सीटों पर जीत हासिल कर सकते हैं।

Chanakya Strategies के एग्जिट पोल में NDA को 130-138 सीटें, महागठबंधन को 100 से 108 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है।

‘वोट चोरी’ और EVM के मत्थे फोड़ना चाहते हैं हार का ठीकरा

हालाँकि बिहार विधानसभा चुनाव में 2020 में एग्जिट पोल गलत साबित हुए थे। उस वक्त राज्य में महागठबंधन की जीत का दावा ज्यादातर एग्जिट पोल में किया गया था। लेकिन नतीजों ने महागठबंधन को फिर निराश किया था। यहाँ नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी। ऐसा ही 2015 के विधानसभा चुनाव के वक्त भी हुआ था।

फिलहाल एग्जिट पोल में मिल रही हार को लेकर महागठबंधन अभी से EVM और SIR पर ठीकरा फोड़ने की कोशिश में जुट गया है। एक तरफ ये कहा जा रहा है कि जनता बदलाव लाने जा रही है और तेजस्वी यादव के नेतृत्व में महागठबंधन की सरकार 18 नवंबर को शपथ लेगी। वहीं वोट चोरी, ईवीएम में गड़बड़ी जैसे बहाने तैयार कर चुनाव आयोग और चुनाव प्रक्रिया में ‘गड़बड़ी’ को निशाना बनाने की पूरी तैयारी है।

तेजस्वी यादव कह रहे हैं कि अगर काउंटिग धीमा हुआ तो इसका मतलब ‘हेराफेरी’ है, वहीं अखिलेश यादव कह रहे हैं कि भ्रम फैला कर चुनावी गिनती में गड़बड़ी करने की तैयारी है। यानी चुनाव में हार हुई तो मोदी सरकार और चुनाव आयोग ने मिलकर हराया दिया और जीत हुई तो जनता ने जिताया। आखिर विपक्ष कब अपनी हार को स्वीकार करेगा। ताकि नतीजों का विश्लेषण कर अपनी पकड़ जनता में बनाने के लिए खून-पसीना बहा सके।

‘यह जानते हुए भी कि गाय हिंदुओं के लिए पवित्र है’: गोहत्या केस में कासिम-इस्माइल-अकरम हाजी को उम्रकैद की सजा, पढ़ें- कोर्ट ने क्या-क्या कहा

गुजरात के अमरेली सत्र न्यायालय ने गोहत्या मामले में तीन लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। दोषियों की पहचान कासिम हाजी सोलंकी, सतार इस्माइल सोलंकी और अकरम हाजी सोलंकी के रूप में हुई है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यह जानते हुए भी कि गाय हिंदू धर्म का एक पवित्र प्रतीक है, इन तीनों ने गाय का वध करके समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचाई।

क्या है पूरा मामला?

मामला नवंबर 2023 का है, जब अमरेली सिटी पुलिस ने एक गुप्त सूचना पर बहारपाड़ा गाँव के मोटा खटकीवाड़ में एक घर पर छापा मारा था। यहाँ से पुलिस को 40 किलो गोमांस बरामद हुआ था। यह घर कासिम हाजी सोलंकी नाम के एक व्यक्ति का था, जो मौके पर ही मिला था।

बाद में जब इसे एफएसएल को भेजा गया, तो पता चला कि वह गोमांस ही था। इसके साथ ही उसके पास से तराजू समेत कई चीजें बरामद हुईं, जिससे पता चला कि वह गोमांस भी बेचता था। पूछताछ के दौरान उसके दो अन्य साथियों के नाम उजागर हुए, लेकिन छापेमारी के बाद वे मौके से भाग गए, जिन्हें बाद में पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।

गिरफ्तारी के बाद, तीनों के खिलाफ अमरेली सिटी पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज किया गया। इसके बाद मामला सिविल कोर्ट में पहुँचा, जहाँ से इसे 2024 में अमरेली सत्र न्यायालय को सौंप दिया गया। सत्र न्यायालय में सुनवाई के बाद मंगलवार (11 नवंबर 2025) को प्रधान जिला न्यायाधीश रिजवाना बुखारी की कोर्ट ने तीनों आरोपितों को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई।

कोर्ट ने क्या कहा?

फैसले में कोर्ट ने माना कि दोषियों ने यह जानते हुए भी कि गाय हिंदू धर्म का एक पवित्र प्रतीक है, गाय का वध किया और उनके पास से गोमांस भी बरामद हुआ। इसलिए आईपीसी की धारा 295 (किसी अन्य धर्म का अपमान करने के इरादे से समुदाय द्वारा पवित्र मानी जाने वाली वस्तुओं को नष्ट करना) और 429 (गोवंश की हत्या) के तहत अपराध बनता है।

इसके अलावा कोर्ट ने सभी को गुजरात पशु संरक्षण अधिनियम, 1954 की धारा 5, 6 (सी), 8 (2), 8 (4) और 10 के तहत भी दोषी ठहराया है। कोर्ट ने पशु संरक्षण अधिनियम, 1954 की धारा 8(2) और 10 का उल्लंघन करने पर सभी को आजीवन कारावास और 5 लाख रुपए जुर्माने की सजा सुनाई है।

इसके अलावा, आईपीसी की धारा 295 और 114 के तहत अपराध के लिए तीन साल की कैद और 3 हजार रुपए का जुर्माना, गुजरात पशु संरक्षण अधिनियम, 1954 की धारा 5 और 8(4) का उल्लंघन करने पर पाँच साल की कैद और 5 हजार रुपए का जुर्माना और सात साल की कैद और 1 लाख रुपए का जुर्माना शामिल है।

ये सभी सजाएँ एक साथ काटनी होंगी। इसके अलावा ये सभी फिलहाल जमानत पर बाहर थे, इसलिए इन्हें वापस जेल भेजने का आदेश दिया गया है।

यह तर्क कि पुलिस ने उन्हें फँसाया, निराधार

कोर्ट में सुनवाई के दौरान आरोपितों ने दावा किया कि वे निर्दोष हैं और पुलिस ने उन्हें झूठा फँसाया है। इसके लिए तर्क दिया गया कि पुलिस ने किसी स्वतंत्र गवाह से पंचनामा नहीं कराया था और वे लोग पुलिस के ही थे। पुलिस पर एकतरफा जाँच करने का भी आरोप लगाया गया।

लेकिन कोर्ट ने फैसला सुनाया कि कानून के अनुसार, पुलिस के गवाहों का साक्ष्य अन्य गवाहों के साक्ष्य जितना ही महत्वपूर्ण है और ऐसा कोई नियम नहीं है कि इसकी पुष्टि अन्य स्वतंत्र गवाहों से भी की जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस मामले में पुलिस पर अविश्वास करने का कोई कारण नहीं है और आरोपित ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकता।

इसके अलावा कोर्ट ने पशु चिकित्सक और एफएसएल के वैज्ञानिकों की रिपोर्ट को भी ध्यान में रखा, जिन्होंने भी स्पष्ट रूप से कहा था कि पशु का मांस गोमांस था। दूसरी ओर आरोपित इस बारे में कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे पाए कि गोमांस कहाँ से आया था।

जबकि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री और अन्य गवाहों के बयानों से यह स्पष्ट हो गया कि इन तीनों ने मिलकर गोहत्या की थी और यह कृत्य गोमांस बेचने के इरादे से किया गया था।

यदि कोर्ट उदार रुख अपनाएगा तो इसका समाज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा

आजीवन कारावास की सजा सुनाते हुए कोर्ट ने कहा कि सजा की मात्रा तय करते समय कोर्ट को सख्त रवैया नहीं दिखाना चाहिए, लेकिन साथ ही अगर उदार रवैया अपनाया जाता है, तो इसका समाज और आरोपितों की आपराधिक मानसिकता पर प्रतिकूल प्रभाव भी पड़ सकता है, इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसके बाद सभी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।

(यह रिपोर्ट मूल रुप से गुजराती में लिखी गई है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

जहाँ गिरा माँ सती का कंधा, वहाँ हर साल अपने आप बढ़ती है भैरव बाबा की मूर्ति: जानिए 51 शक्तिपीठों में से एक ‘महामाया मंदिर’ की कहानी, CM विष्णुदेव साय ने ‘कायाकल्प’ का लिया संकल्प

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने बुधवार (12 नवंबर 2025) को रतनपुर में कलचुरी कलार समाज के वार्षिक महोत्सव में हिस्सा लिया। सबसे पहले, मुख्यमंत्री ने माँ महामाया देवी के दरबार में पूजा-अर्चना की और प्रदेश की सुख, समृद्धि और विकास के लिए आशीर्वाद माँगा।

मुख्यमंत्री साय ने माँगा छत्तीसगढ़ के लिए आशीर्वाद

सीएम विष्णुदेव साय ने इस मौके पर कहा कि माँ महामाया की कृपा से छत्तीसगढ़ तेजी से विकास के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है। सीएम विष्णुदेव ने याद दिलाया कि कलचुरी राजवंश ने रतनपुर समेत देश में लगभग 1200 वर्षों तक शासन किया और उनका राज खुशहाली और समृद्धि का प्रतीक था।

मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि माँ महामाया मंदिर के विकास के लिए ‘भारत दर्शन योजना‘ में एक प्रस्ताव भेजा गया है, जिसके बाद रतनपुर का पूरी तरह कायाकल्प हो जाएगा। उन्होंने कहा कि खनिज, वन और जल जैसे संसाधनों से भरपूर छत्तीसगढ़ को हम सब मिलकर देश के अग्रणी राज्यों में शामिल करेंगे।

जनता को सौगात देते हुए सीएम साय ने ऐतिहासिक नगरी रतनपुर में 100 बिस्तर वाला अस्पताल खोलने का ऐलान किया। साथ ही, उन्होंने कलचुरी समाज के सामुदायिक भवन निर्माण के लिए 1 करोड़ रुपए देने की भी घोषणा की।

माँ महामाया मंदिर: जहाँ गिरा था देवी सती का दाहिना कँधा

मुख्यमंत्री के इस बयान के बाद रतनपुर का माँ महामाया देवी मंदिर देश भर में चर्चा का केंद्र बन गया है। यह मंदिर न सिर्फ प्राचीन कलचुरी राजवंश की राजधानी रहा है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी धार्मिक पहचान भी है।

यह पवित्र स्थान 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है और इसे ‘कौमारी शक्तिपीठ‘ के नाम से भी जाना जाता है। सदियों से यहाँ देवी महामाया की पूजा कोसलेश्वरी देवी यानी दक्षिण कोसल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में की जाती है।

पौराणिक मान्यता है कि भगवान शिव जब देवी सती के शरीर को लेकर तांडव करते हुए ब्रह्मांड में भटक रहे थे। उस वक्त भगवान विष्णु ने उनको वियोग मुक्त करने के लिए सुदर्शन चक्र से देवी सती के शरीर के टुकड़े कर दिये थे। माता सती के अंग जहाँ-जहाँ गिरे वहीं शक्तिपीठ स्थापित हुए।

मंदिर का निर्माण कलचुरी राजा रत्नदेव प्रथम ने लगभग 1050 ईस्वी में करवाया था। मंदिर की वास्तुकला 12वीं से 13वीं शताब्दी की अद्भुत कला को दर्शाती है। मंदिर मूल रूप से महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती तीनों देवियों को समर्पित था, लेकिन वर्तमान मंदिर में महालक्ष्मी और महासरस्वती की पूजा होती है। इसी परिसर में भगवान शिव और हनुमान जी के प्राचीन मंदिर भी मौजूद हैं, जो इसकी भव्यता को और बढ़ाते हैं।

भैरव बाबा का रहस्य और नवरात्रों की आस्था

यहाँ आने वाले भक्तों के लिए एक खास नियम है। वे माँ महामाया के दर्शन से पहले थोड़ी दूरी पर स्थित भैरव बाबा के मंदिर पर रुककर दर्शन करते हैं। स्थानीय लोगों के बीच यह विश्वास प्रचलित है कि भैरव बाबा की यह प्राचीन प्रतिमा की ऊँचाई हर साल अपने आप बढ़ती जा रही है, जो इसे रहस्य और आस्था का केंद्र बनाती है।

साल में दो बार आने वाले नवरात्रों के दौरान यहाँ विशेष उत्सव होता है। भक्त नौ दिनों तक उपवास रखते हैं और अपनी इच्छाएँ पूरी करने के लिए अखंड मनोकामना ज्योति कलश प्रज्वलित करते हैं, क्योंकि यहाँ की मान्यता है कि सच्चे मन से माँगी गई प्रार्थना कभी खाली नहीं जाती। रतनपुर का यह पवित्र धाम आस्था, संस्कृति और गौरव का एक अनूठा संगम है।

कैसे पहुँचे माँ महामाया के पवित्र दरबार तक?

रतनपुर स्थित माँ महामाया का यह पवित्र धाम छत्तीसगढ़ की धार्मिक पहचान और गौरव का प्रतीक है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के आगमन ने भी इस पवित्र नगरी के प्रति राज्य की प्रतिबद्धता को मजबूत किया है। यदि आप इस शक्तिपीठ के दर्शन के लिए जाना चाहते हैं, तो यहाँ तक पहुँचना बहुत ही आसान है।

हवाई यात्रा- अगर आप हवाई जहाज से आ रहे हैं, तो रतनपुर से सबसे नजदीकी एयरपोर्ट रायपुर एयरपोर्ट है, जो यहाँ से लगभग 156 किलोमीटर दूर है। एयरपोर्ट से उतरने के बाद, भक्त टैक्सी या कैब किराए पर लेकर सीधे मंदिर तक पहुँच सकते हैं। यह रास्ता आरामदायक और सुगम है।

रेल यात्रा- रतनपुर का सबसे नजदीकी और प्रमुख रेलवे स्टेशन बिलासपुर जंक्शन है, जो यहाँ से सिर्फ 33 किलोमीटर की दूरी पर है। बिलासपुर जंक्शन पहुँचने के बाद, मंदिर तक जाने के लिए आपको नियमित रूप से टैक्सी और बस सेवाएँ आसानी से मिल जाएँगी।

सड़क यात्रा- सड़क मार्ग से रतनपुर की कनेक्टिविटी बहुत अच्छी है। छत्तीसगढ़ के सभी बड़े शहरों से रतनपुर के लिए नियमित राज्य परिवहन बसें और निजी वाहन (टैक्सी) सेवाएँ हर समय उपलब्ध रहती हैं। सड़क का सफर आरामदायक और सुविधाजनक है। यह पवित्र धाम अपनी आस्था और भव्यता के कारण दूर-दूर से भक्तों को खींच लाता है।

आतंकियों की छवि सुधारने में लगी वामपंथी मीडिया, Al Jazeera-Guardian-CNN ने भी साधी इस्लामी टेरर पर चुप्पी: जानिए ‘भगवा’ को बदनाम करने वालों ने क्यों बदला दिल्ली ब्लास्ट पर अपना चश्मा

दिल्ली के लाल किले के पास हुए आतंकी कार ब्लास्ट ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। वहीं दूसरी ओर इस निंदनीय आतंकी घटना पर वामपंथी मीडिया अपना नैरेटिव चला रही है। टाइम्स ऑफ इंडिया, द वायर जैसे मीडिया पोर्टल दिल्ली बम धमाके में संदिग्ध मुस्लिमों के प्रति सहानुभूति दिखाकर उनकी छवि सुधारने में लगी हुई है।

उधर, CNN, अल जजीरा(Al Jazeera), द गार्जियन( The Guardian), डॉन (Dawn) जैसे विदेशी मीडिया संस्थानों ने दिल्ली में हुए कार ब्लास्ट को ‘घातक’ नाम देने में बिल्कुल नहीं हिचकिचाए। लेकिन यही विदेशी मीडिया संस्थानों ने धड़ल्ले से रिपोर्ट्स छापी कि कैसे भारत की सरकार दिल्ली ब्लास्ट के पीछे ‘साजिश’ तलाश रही है। इन रिपोर्ट्स में तीन एजेंडे साफ नजर आए-

  1. भारत सरकार जबरन मुस्लिमों को दिल्ली ब्लास्ट का आरोपित साबित करने में लगी है।
  2. दिल्ली में हुए कार ब्लास्ट जैसे ‘घातक’ हमले से पूरा भारत ‘डर’ गया है, यहाँ मोदी सरकार की नाकामी को दर्शाया गया।
  3. सवाल उठाए गए कि क्या भारत अप्रैल में हुए पहलगाम हमले के बाद तय की गई दुश्मन को सीधा जवाब देने वाली नीति पर कायम रहेगा?

इन सवाल और आरोपों के माध्यम से विदेशी मीडिया ने भारत सरकार को जमकर घेरा। यह विदेशी मीडिया का आम तरीका है भारत में मुस्लिम-पीड़ित को साबित करने का और वही घिसा-पीटा मोदी सरकार को ‘भगवा राजनीतिवाद’ दिखाने को और यह दर्शाने का कि मोदी सरकार ने जिन्हें बम धमाके का संदिग्ध बनाया है, इसका कारण केवल उनकी मुस्लिम पहचान है।

वामपंथी मीडिया का आतंकियों की छवि सुधारने का प्रोपेगेंडा

देश की वामपंथी मीडिया ने दिल्ली में आतंकी ब्लास्ट के संदिग्ध डॉक्टर मोहम्मद उमर नबी की छवि को सुधारने के मिशन पर उतर गई। जैसे उमर नबी एक सीधा व्यक्ति है और उसने अनजाने में दिल्ली में इतना बड़ा ब्लास्ट कर दिया हो।

द वायर ने अपने लेख में पुलवामा में रहने वाले उमर नबी के परिवार की पीड़ा प्रस्तुत की। यह लेख इस तरह लिखा गया है कि पढ़ने पर यह एहसास होता है मानो लेखक आतंक के आरोपों में शामिल लोगों को ‘पीड़ित’ के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहा हो।

The Wire का लेख

उमर नबी के परिवार में उसके अब्बू के कथनों को प्रमुखता देकर यह दिखाया गया है कि वे अन्याय और दुख झेल रहे हैं, जबकि यह तथ्य नजरअंदाज कर दिया गया है कि इन्हीं का बेटा दिल्ली धमाके का संदिग्ध है।

टाइम्स ऑफ इंडिया के इस रिपोर्ट की लेखन शैली का अंदाज साफतौर पर दिखाता है कि दिल्ली धमाके का संदिग्ध डॉक्टर मुजम्मिल अहमद ‘पीड़ित’ है। रिपोर्ट में डॉ. मुजम्मिल की कॉलेज सीनियर डॉ. मोनिका लांघेह की प्रतिक्रिया दिखाई गई, वह मुजम्मिल के बारे में जानकर स्तब्ध हुईं हैं और कहती हैं, “एक श्रेष्ठ पद के व्यक्ति को गिरते देखा।” यह रिपोर्ट एक तरह से पाठक में मुजम्मिल के प्रति सहानुभूति जगाती है।

टाइम्स ऑफ इंडिया का लेख

उधर, भारत की मीडिया में दिल्ली ब्लास्ट में शामिल आतंकी उमर नबी की भाभी और आतंकी मुजम्मिल की अम्मी की ‘विक्टिम कार्ड’ वीडियो भी खूब प्रसारित की।

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट

जहाँ उमर नबी की भाभी मुजमिल ने उमर नबी के बचपन और पढाई पर बात करते हुए उसे एक बेहतर बेटे और इंसान के रूप में पेश किया। यह माहौल बनाती है कि लोग सोच सकें- “ऐसा शांत-स्वभाव का व्यक्ति कैसे इतने बड़े आतंक जगत में शामिल हो गया?”

वहीं फरीदाबाद में 360 किलो विस्फोटक और हथियार के साथ पकड़े गए डॉ. मुजम्मिल, जो दिल्ली ब्लास्त का संदिग्ध भी है, उसकी अम्मी ने बेटे को बेगुनाह होने की बाते कहीं और आतंक के आरोपों को पूरी तरह नकारा। इस बयान के हवाले से Mint ने अपनी रिपोर्ट में आंतकी के परिवार को ‘बेबस’ और ‘अन्याय’ झेलने रूप में दर्शाया।

LiveMint की रिपोर्ट

आतंकी की अम्मी के दुख और भरोसे को, “मेरा बेटा ऐसा नहीं कर सकता, हमें तो किसी ने बताया कि उसे पकड़ लिया गया” जैसे बातें लिखकर पाठक के सामने आतंकी की छवि को साफ सुथरी प्रदर्शित करने की कोशिश की गई।

दिल्ली ब्लास्ट पर विदेशी मीडिया का प्रोपेगेंडा

दिल्ली ब्लास्ट पर विदेशी मीडिया ने भी अपने नैरेटिव को आगे बढ़ाया। तमाम तरीके के प्रोपेगेंडा चलाकर ब्लास्ट के दिल्ली धमाके को भारत की नाकामी दर्शाया गया। लेकिन मुस्लिम पहचान वाले संदिग्ध आरोपितों की बात तक नहीं की गई। यहाँ विदेशी मीडिया का इस्लामी कट्टरपंथी सोच सामने आती है। Dawn से लेकर अल जजीरा और द गार्जियन ने धड़ल्ले से दिल्ली ब्लास्ट को कवर करते हुए ऐसी रिपोर्ट्स छापी हैं।

द गार्जियन की इस रिपोर्ट में दिल्ली ब्लास्ट को एक बेहद घातक और डरावना हमला बताया गया है, जिससे पूरे भारत में दहशत फैल गई। लेख की शुरुआत ही इस तरह की भाषा से होती है कि यह घटना भारत की राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

द गार्जियन की रिपोर्ट

अल जजीरा की इस रिपोर्ट में सवाल उठाए गए कि कैसे भारत की मोदी सरकार दिल्ली ब्लास्ट पर इतने आनन-फानन में आरोप लगाने में जुटी हुई है। रिपोर्ट में पीएम मोदी का पहलगाम हमले के बाद दिए गए बयान- आतंकी हमले को ‘युद्ध की कार्रवाई’ माना जाएगा का हवाला देते हुए सवाल किया कि भारत ने पाकिस्तान के साथ संघर्ष शुरू किए बिना कथित अपराधियों को दोषी ठहरा दिया है।

अल जजीरा की रिपोर्ट

इस रिपोर्ट में दिल्ली ब्लास्ट को लेकर डर और असुरक्षा का माहौल उभारने की कोशिश की गई है। लेख में कहा गया, “दिल्ली धमाका ने पूरे देश को सतर्क कर दिया है।” यानी इस विस्पोट से पूरा देश सतर्क और डर गया है। इस तरह का वाक्य भारत को एक डर से घिरे देश के रूप में दिखाने की कोशिश है और भारत की सुरक्षा व्यवस्था को नाकाम बताने जैसा दावा है।

अल जजीरा की रिपोर्ट

अमेरिकन मीडिया CNN ने अपनी इस रिपोर्ट में दिल्ली में आतंकी ब्लास्ट और अगले ही दिन पाकिस्तान के इस्लामाबाद में हुए ब्लास्ट को समान बताने की कोशिश की गई। जबकि असलियत यह है कि दिल्ली ब्लास्ट में गिरफ्तार संदिग्धों के सीधे संबंध पाकिस्तान के आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद से पाए गए हैं। इसके बावजूद भारत ने अब तक पाकिस्तान को बिना ठोस सबूत के दोषी नहीं ठहराया है।

CNN की रिपोर्ट

उधर, आतंक को पनाह देने वाले पाकिस्तान के इस्लामाबाद में जो ब्लास्ट हुआ वह एक सुसाइड बॉम्बिंग है। जिसके तार अब तक भारत से दूर-दूर तक जुड़ने के कोई सबूत नहीं है। तब भी पाकिस्तान ने बिना तथ्यों के सीधा भारत पर हमले के आरोप लगा डाले।

दिल्ली ब्लास्ट और फरीदाबाद आतंकी मॉड्यूल

फिर बात करें दिल्ली ब्लास्ट के तारों की और फरीदाबाद में सामने आए आतंकी मॉड्यूल की तो इस ब्लास्ट में इस्तेमाल हुई कार, विस्फोट और संदिग्ध गतिविधियों से जुड़ी जाँच में यह साफ हुआ है कि यह एक बड़ा आतंकी नेटवर्क था। जाँच एजेंसियों को फरीदाबाद, सहारनपुर, लखनऊ समेत कुछ जिलों से 2900 किलो विस्फोटक सामग्री बरामद हुई, जो सीधे दिल्ली ब्लास्ट से जुड़ रही है।

इसके अलावा जिस i20 कार से ब्लास्ट हुआ, उसमें बैठा डॉक्टर मोहम्मद उमर नबी के तार भी आतंकी मॉड्यूल से जुड़े। उसके दोस्त सज्जाद अहमद और परिवार वालों से पूछताछ की गई तो सामने आया कि वह संदिग्ध आतंकी गतिविधियों में शामिल था। जाँच एजेंसियों को यह भी शक है कि फरीदाबाद से गिरफ्तार आतंकी मुजम्मिल की गर्लफ्रेंड डॉ. शाहीना का भी दिल्ली ब्लास्ट में बड़ा रोल हो सकता है। डॉ. शाहीना पाकिस्तान के आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद (JeM) की महिला ट्रेनर थी, उसके पास से एके-47 और हथियार बरामद हुए।

यहाँ तक कि भारत सरकार ने दिल्ली ब्लास्ट की घटना को आतंकी हमला बताने में कोई संकोच नहीं किया। सरकार ने कहा कि यह हमला निंदनीय था और पीएम मोदी ने भूटान के मंच से चेतावनी दी कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।

दिल्ली ब्लास्ट पर सरकार की कार्रवाई और इस्लामी कट्टरपंथ सोच

दिल्ली ब्लास्ट पर भारत की मोदी सरकार की कार्यवाही जारी है। जाँच एजेंसिया अब तक दोषियों के काफी करीब पहुँच चुकी है। यहाँ तक कि दिल्ली ब्लास्ट के फिदायीन उमर नबी और उसके परिवार पर भी जाँच एजेंसियों ने शिकंजा कसा है। हमले की जाँच में रोजाना नई परते खुल रही हैं। लखनऊ के सहारनपुर से गिरफ्तार डॉ. शाहीन को लेकर भी जाँच एजेंसियाँ बड़ा शक जता रही हैं क्योंकि वह जैश-ए-मोहम्मद की महिला विंग की कमांडर है।

इन सब सबूतों और जाँच से साफ स्पष्ट होता है कि भारत सरकार आतंक के खिलाफ कार्रवाई को लेकर कितनी सक्रिय है। वहीं अब तक कि जाँच से यह भी साफ है कि संदिग्ध आरोपितों की कौम एक ही है। सभी पकड़े गए लोगों की पहचान मुस्लिम ही है। वैसे ये कोई चौंकने वाली बात नहीं है क्योंकि भारत में अब तक जो भी आतंकी हमले या ब्लास्ट हुए हैं उसके पीछे इस्लामी कट्टरपंथी की विचारधारा ही है। फर्क सिर्फ यह है कि इस बार हमला देश के भीतर बैठे इस्लामी कट्टरपंथों के जरिए किया गया है।

विदेशी मीडिया की इस्लामी कट्टरपंथ पर चुप्पी

अब वापस आते हैं विदेशी मीडिया की दिल्ली ब्लास्ट को लेकर छापी गई रिपोर्ट्स पर। यहाँ बड़े-बड़े विदेशी मीडिया संस्थानों ने दिल्ली ब्लास्ट को लेकर बेहतर तरीके से खबरें छापीं और पाठकों को हर मिनट अपडेट किया लेकिन यह सब अपना नैरेटिव ध्यान में रखते हुए किया गया। कहीं दिल्ली ब्लास्ट को ‘घातक’ हमला करार दिया गया तो कहीं भारत की मोदी सरकार पर सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े किए गए। लेकिन संदिग्धा आरोपितों पर कोई खबरें नहीं छापी गईं, क्योंकि उनकी पहचान ‘मुस्लिम’ थी।

ये बिल्कुल वैसा ही है, जैसे विदेशी मीडिया हमेशा से करती आई है। एक बार फिर विदेशी मीडिया की इस्लामी कट्टरपंथी विचारधारा उजागर हुई है। ये मीडिया CAA, NRC और आर्टिकल 370 को मुस्लिमों के खिलाफ कार्यवाही बताने में नहीं हिचकिचाती है। तब भारत में मोदी सरकार की ‘भगवा राजनीति’ पर बड़े-बड़े लेख लिखे जाते हैं। लेकिन अब जब भारत की राजधानी में आतंकी हमला हुआ और आरोपित मुस्लिम हैं तो वे चुप्पी साधे बैठे हैं।

आरोप लगाए गए कि मोदी सरकार पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद अपनी नई नीति को साबित करने के लिए पाकिस्तान पर आरोप लगाने में जल्दबाजी कर रहा है। बता दें जिस नीति की बात हुई वह भारत की आतंकी हमले पर ‘युद्ध की कार्रवाई’ के कड़े संदेश हैं। तो विदेशी मीडिया को जान लेना चाहिए कि भारत अब चुप नहीं बैठता है, यह बयान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी दिया जा चुका है। आतंकवाद के खिलाफ लड़ने की बात आएगी तो भारत सबसे आगे रहेगा। इसका उदाहरण भारत की मोदी सरकार URI स्ट्राइक, ऑपरेशन सिंदूर और अन्य ऑपरेशन चलाकर दे चुकी है और आगे भी देती रहेगी।

भारत की वामपंथी मीडिया का दोहरा रवैया

यहाँ सिर्फ विदेशी मीडिया तक बात सीमित नहीं हो जाती है। बल्कि भारत के कुछ वामपंथी मीडिया संस्थान भी अपना नैरेटिव गढ़ने के लिए दिल्ली में हुए निंदनीय आतंकी धमाके पर प्रोपेगेंडा फैलाना शुरू कर देते हैं। इन मीडिया संस्थानों ने दिल्ली ब्लास्ट के संदिग्ध आरोपितों की छवि सुधारने को लेकर खबरें छापी। लोगों को इस भ्रम में डाला गया कि डॉ. मुजम्मिल और डॉ. उमर नबी जैसे आतंकी है तो आम इंसान ही लेकिन पता नहीं कैसे उन्होंने दिल्ली में ब्लास्ट कर दिया।

आतंकियों की छवि बदलने के लिए छापी गई खबरों का उद्देश्य साफतौर पर पारदर्शी था। वामपंथी मीडिया केवल यह साबित करने में लगी हुई थी कि इस्लामी कट्टरपंथी जैसा कुछ नहीं होता है और मुस्लिम को आतंकी बताना गलत है। इन मीडिया संस्थानों ने यहाँ जाँच एजेंसियों के उन पुख्ता सबूतों को नजरअंदाज किया, जिसमें साफ कहा गया है कि दिल्ली ब्लास्ट एक आतंकी महला था और इतना ही नहीं पकड़े गए आतंकियों ने भी कबूला कि वे इससे भी बड़ी साजिश रच रहे थे।

अब इतना तो साफ हो गया है कि चाहे भारत पर आतंकी हमला हो या युद्ध की स्थिति क्यों न आ जाए। देश का वामपंथी मीडिया अपना मुस्लिम पीड़ित वाला नैरेटिव गढ़ने के लिए आतंकियों को भी सफेद चोला पहनाने में नहीं कतराएगा। वहीं विदेशी मीडिया भी लगातार तथ्यों को जाँचे बिना भारत पर हमलावर रहेगा और इस्लामी कट्टरपंथी की विचारधारा को आगे बढ़ाता रहेगा।