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‘लोगों के जीवन की सुरक्षा हमारी प्राथमिकता है’: सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक जगहों और हाईवे से आवारा कुत्तों को हटाने के दिए निर्देश, जानें फैसले में क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने 07 नवंबर 2025 को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, खेल परिसर, बस अड्डे, रेलवे स्टेशन और सरकारी इमारतों से सभी आवारा कुत्तों को हटाएँ। कोर्ट ने कहा कि इन कुत्तों को ABC नियम 2023 के तहत नसबंदी और टीकाकरण के बाद निर्धारित शेल्टर होम में रखा जाए। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि इन कुत्तों को ‘जहाँ से पकड़ा गया है, उन्हें वहीं वापस नहीं छोड़ा जाएगा।’

यह आदेश सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने दिया, जिसमें जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया शामिल हैं। आदेश में सबसे पहले जिस मुद्दे पर चर्चा हुई वह था अनुपालन हलफनामें, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से दाखिल करने को कहा था लेकिन वे 27 अक्टूबर 2025 तक जमा नहीं कर पाए।

इस पर कोर्ट ने नाराजगी जताई और आदेश दिया कि सभी राज्यों के मुख्य सचिव 03 नवंबर 2025 को अगली सुनवाई में कोर्ट में उपस्थिथ रहने के आदेश दिए। इस आदेश के बाद न सिर्फ हलफनामे दाखिल किए गए बल्कि सभी अधिकारी भी कोर्ट में मौजूद हुए।

एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae) गौरव अग्रवाल ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के हलफनामों का सारांश तैयार किया, जिसमें कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की रिपोर्ट में गंभीर कमियाँ और गलतियाँ पाई गईं। कोर्ट ने नोटिस किया कि उनके आदेशों का या तो पालन नहीं किया गया या अधूरा किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे गौरव अग्रवाल की रिपोर्ट को ध्यान से पढ़ें और उसमें बताई गई कमियों को दूर करने के लिए जरूरी कदम उठाएँ।

कोर्ट ने यह भी कहा कि सभी राज्य अगली तारीख से पहले विस्तृत हलफनामा दाखिल करें, जिसमें यह बताया जाए कि उन्होंने कोर्ट के आदेशों का पालन करने के लिए क्या-क्या सुधारात्मक कदम उठाए हैं। कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि अग किसी ने इस मामले में लापरवाही बरती तो उसे गंभीरता से लिया जाएगा।

हाईवे से जानवरों का हटाने का कोर्ट का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दूसरा मुद्दा उन निर्देशों से जुड़ा बताया जो राजस्थान हाई कोर्ट की जोधपुर बेंच ने राज्य सरकार को दिए थे। इन निर्देशों में कहा गया था कि राज्य की सभी सड़कों और हाईवे से पशुओं और मवेशियों को हटाया जाए ताकि उनके कारण होने वाले सड़क हादसों को रोका जा सके। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह के हादसे अब देशभर में बहुत आम हो गए हैं और इनसे कई लोगों की जान जा चुकी है, गंभीर चोटें आई हैं और संपत्ति को भी नुकसान पहुँचा है। कोर्ट ने कहा कि यह स्थिति इस बात का संकेत है कि जन सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाले प्रशासनिक अधिकारी अपना काम सही तरीके से नहीं कर रहे हैं।

कोर्ट ने कहा कि नेशनल हाईवे , नेशनल एक्सप्रेसवे और स्टेट हाईवे पर पशुओं और आवारा जानवरों की अनियंत्रित मौजूदगी बहुत गंभीर खतरा है। खासकर रात के समय या तेज गति वाले क्षेत्रों यह समस्या ज्यादा भयावह हो जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लेख करते हुए कहा कि यह अनुच्छेद जीवन और सुरक्षा का अधिकार सुनिश्चित करता है। इसलिए यह जरूरी है कि नगर निकाय, सड़क एवं परिवहन विभाग, लोक निर्माण विभाग और हाईवे अथॉरिटी जैसी संबंधित एजेंसियाँ तुरंत मिलकर कार्रवाई करें।

इसी के तहत सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाई कोर्ट के निर्देशों की पुष्टि की और उन्हें पूरे देश में लागू करने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि अब ये निर्देश सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के नगर निगमों, सड़क और परिवहन विभागों, लोक निर्माण विभागों और नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) पर भी लागू होंगे।

फोटो साभार: सुप्रीम कोर्ट

कोर्ट ने विशेष तौर पर कहा कि जानवरों को हाईवे से हटाने के लिए मवेशियों को गौशाला में, कुत्ते या अन्य जानवर को शेल्टर में ट्रांसफर किया जाए। इसके साथ ही जानवरों को जरूरत की अनुसार खाना, पानी और इलाज प्रदान किया जाए, जैसा कि PCA एक्ट 1960 और ABC नियम 2023 के प्रावधानों में शामिल है।

सड़क पर घूमने वाले पशुओं और मवेशियों से होने वाली परेशानियों को रोकने के लिए अब 24 घंटे और 7 दिन काम करने वाली खास टीमें बनाई जाएँगी। ये टीमें लगातार निगरानी रखेंगी और जैसे ही किसी सड़क पर आवारा जानवरों की सूचना मिलेगी या किसी दुर्घटना की खबर आएगी, तुरंत कार्रवाई करेंगी। सभी नेशनल हाईवे, नेशनल एक्सप्रेसवे और स्टेट हाईवे पर पुलिस, NHAI और जिला प्रशासन के कंट्रोल रूम से जुड़े हेल्पलाइन नंबर नियमित दूरी पर लगाए जाएँगे ताकि यात्री सड़क पर आवारा जानवर दिखने या जानवरों की वजह से हुई दुर्घटनाओं की तुरंत शिकायत कर सकें।

कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों, NHAI के चेयरपर्सन और सड़क परिवहन व हाईवे मंत्रालय को निर्देश दिया है कि वे इस आदेश की तारीख से 8 हफ्तों के भीतर एक रिपोर्ट दाखिल करें। इस रिपोर्ट में यह रिपोर्ट सड़कों से आवारा जानवरों को हटाने और उन्हें आश्रय देने की क्या व्यवस्था की गई है, गश्ती दल कैसे और कब काम कर रहे हैं और हेल्पलाइन नंबरों व संकेत बोर्डों की क्या स्थिति है।

स्कूल-कॉलेज जैसे संस्थान परिसरों से आवारा कुत्तों को हटाएँ

सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का तीसरा और सबसे अहम हिस्सा कुत्तों को शिक्षण संस्थानों, अस्पतालों, खेल परिसरों, बस अड्डों, डिपो और रेलवे स्टेशनों से हटाने से जुड़ा था। कोर्ट ने कहा कि इन जगहों पर कुत्तों के काटने की घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। कोर्ट ने कहा, “स्कूलों, अस्पतालों और खेल स्थलों जैसे संस्थानों में ऐसी घटनाओं का बार-बार होना प्रशासन की लापरवाही और इन जगहों को खतरों से सुरक्षित रखने में पूरी व्यवस्था की नाकामी को दर्शाता है। इस स्थिति में न्यायिक दखल जरूरी है ताकि नागरिकों खासकर बच्चों, मरीजों और खिलाड़ियों के जीवन और सुरक्षा के मौलिक अधिकार की रक्षा की जा सके। जैसा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में दिया गया है।”

कोर्ट ने यह भी बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) जैसी संस्थाओं द्वारा किए गए वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया है कि भारत में हर साल जानवरों से जुड़ी मौतों का बड़ा हिस्सा रेबीज की वजह से होता है और इनमें से 90 प्रतिशत से अधिक मामले पालतू या आवारा कुत्तों के काटने से होते हैं।

कोर्ट ने कहा, “इस समस्या का सबसे अधिक असर बच्चों, बुज़ुर्गों और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों पर पड़ता है, जो पहले से ही असुरक्षित होते हैं और जिनके पास समय पर इलाज या टीके की सुविधा नहीं होती है।” इन समस्याओं के बारे में ऑपइंडिया ने भी आवारा कुत्तों पर लिखे आर्टिकल में लगातार जागरूक करने की कोशिश की है।

कोर्ट ने आगे कहा कि भले ही साल 2023 के ABC नियमों के तहत कुत्तों की आबादी पर नियंत्रण के लिए ‘पकड़ो-नसबंदी करो-टीका लगाओ छोड़ दो’ यानी CSVR मॉडल लागू किया गया है, लेकिन इसका सही तरह से अमल नहीं हो पा रहा है। नतीजा यह है कि आवारा कुत्तों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है और इससे ‘देश के कई हिस्सों में लोगों की सुरक्षा पर खतरा बना हुआ है।’

फोटो साभार: सुप्रीम कोर्ट

कोर्ट ने कई ऐसी घटनाओं का जिक्र किया जो मेनस्ट्रीम मीडिया में सामने आई थीं। इनमें वेल्स (Wales) देश के एक कारोबारी का मामला शामिल है, जिन्हें सुबह दौड़ते समय एक आवारा कुत्ते ने काट लिया था। केरल के वायनाड जिले के पनामारम इलाके में एक तीसरी कक्षा के छात्र को क्लासरूम के अंदर ही कुत्ते ने काट लिया। वहीं हरियाणा के हिसार जिले के सिसवाल गाँव के एक सरकारी प्राथमिक स्कूल में घुसे एक आवारा कुत्ते ने 6 बच्चों को काट लिया।

बेंगलुरु यूनिवर्सिटी परिसर के केंगेरी क्षेत्र में भी कई छात्रों को आवारा कुत्तों ने काटा। चेन्नई के आईएमएच किलपॉक (IMH Kilpauk) में कई मरीजों को आवारा कुत्तों ने काटा, जबकि कोच्चि के एर्नाकुलम जनरल हॉस्पिटल में पाँच लोगों पर कुत्ते ने हमला किया। ओडिशा के कटक में आचार्य हरिहर कैंसर इंस्टीट्यूट में भी मरीजों पर आवारा कुत्तों ने हमला किया। नागपुर के गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज और हॉस्पिटल में एक रेजिडेंट डॉक्टर पर कई आवारा कुत्तों ने हमला किया। लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी में दो डॉक्टरों, पैरामेडिकल स्टाफ और एक अटेंडेंट को आवारा कुत्ते ने काट लिया।

दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में 2025 की वर्ल्ड पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप के दौरान दो विदेशी कोचों को भी आवारा कुत्तों ने काट लिया। केरल के कन्नूर रेलवे स्टेशन पर 18 लोगों को, महाराष्ट्र के डोंबिवली रेलवे स्टेशन पर RPF अधिकारी समेत 9 लोगों को और केरल के अलप्पुझा रेलवे स्टेशन पर छह महीनों में 30 लोगों को आवारा कुत्तों ने काट लिया। उत्तर प्रदेश के संभल रेलवे स्टेशन पर 8 लोगों को एक रेबीज से ग्रस्त कुत्ते ने काटा। इसके अलावा केरल के कन्नूर बस स्टैंड पर 50 लोगों और कोट्टायम के KSRTC बस स्टैंड पर भी कई लोगों को आवारा कुत्तों ने काटा।

कोर्ट ने कहा कि आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या के पीछे कई वजहें हैं, इनमें नसबंदी कार्यक्रमों का ठीक से लागू न होना, खाने के कचरे का गलत तरीके से निपटान, संस्थानों के चारों ओर सुरक्षा घेराबंदी की कमी, विभागों के बीच तालमेल का न होना और लोगों में यह जागरूकता न होना कि कुत्ते के काटने से कैसे बचें और काटने के बाद क्या इलाज करें। इन सब कारणों से ही आवारा कुत्तों की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है।

कोर्ट ने कहा कि ABC नियमों, नगर निगम के उपनियमों, दिशा-निर्देशों और मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOPs) के बावजूद जमीनी स्तर पर इनके नतीजे संतोषजनक नहीं रहे हैं। कोर्ट ने यह भी बताया कि हर साल कुत्तों के काटने के मामलों का आँकड़ा बढ़ता जा रहा है। कोर्ट ने कहा, “यह समस्या लगातार बनी हुई है, इसलिए जरूरत है कि नगर निगमों, सार्वजनिक स्वास्थ्य विभागों और संस्थानों के प्रशासन के बीच मिलकर एक समग्र और समन्वित योजना बनाई जाए ताकि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार की रक्षा प्रशासन की लापरवाही या अक्षमता के कारण प्रभावित न हो।”

फोटो साभार: सुप्रीम कोर्ट

कोर्ट ने राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को दो हफ्तों का समय दिया है ताकि वे सभी सरकारी और निजी शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों, खेल परिसरों, बस अड्डों, डिपो और रेलवे स्टेशनों की पहचान कर सकें। इन संस्थानों के प्रशासनिक प्रमुखों को जिला मजिस्ट्रेट की निगरानी में स्थानीय या नगर निकाय अधिकारियों के साथ मिलकर इन जगहों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं। इसके लिए बाड़, दीवारें, गेट और अन्य संरचनात्मक या प्रशासनिक उपाय अपनाए जाएँ ताकि आवारा कुत्ते अंदर न आ सकें। यह पूरी प्रक्रिया जल्द से जल्द और संभव हो तो 8 हफ्तों के भीतर पूरी की जानी चाहिए।

इसके अलावा सभी शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों, खेल परिसरों, बस अड्डों, डिपो और रेलवे स्टेशनों के प्रबंधन को एक नोडल अधिकारी नियुक्त करने के निर्देश दिए गए हैं, जो परिसर की साफ-सफाई और रखरखाव का जिम्मेदार होगा और यह सुनिश्चित करेगा कि आवारा कुत्ते परिसर में प्रवेश न करें या वहाँ न रहें। इस अधिकारी का नाम और विवरण एंट्री गेट पर स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया जाना चाहिए।

हर तीन महीने में स्थानीय नगर निकाय और पंचायतों को ऐसे सभी परिसरों का निरीक्षण करना होगा ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वहाँ कोई आवारा कुत्ता नहीं है। कोर्ट ने कहा, “अगर इस संबंध में कोई लापरवाही पाई गई तो इसे गंभीरता से लिया जाएगा और जिम्मेदारी संबंधित नगर निकाय अधिकारियों या प्रशासनिक अधिकारियों पर तय की जाएगी।” कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि नगर निकाय की जिम्मेदारी है कि ऐसे सभी परिसरों में पाए जाने वाले आवारा कुत्तों को हटाकर उन्हें नसबंदी और टीकाकरण के बाद ABC नियम 2023 के अनुसार निर्धारित आश्रय स्थल पर भेजा जाए।

कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि पकड़े गए कुत्तों को उसी जगह वापस नहीं छोड़ा जाएगा, जहाँ से उन्हें पकड़ा गया था। कोर्ट ने कहा, “ऐसे आवारा कुत्तों को दोबारा उसी स्थान पर छोड़ना हमारी इस कार्रवाई के उद्देश्य को निष्फल कर देगा, जिसका मकसद इन संस्थागत परिसरों को आवारा कुत्तों की उपस्थिति से पूरी तरह मुक्त कराना है।”

फोटो साभार: सुप्रीम कोर्ट

इसके अलावा स्टेडियमों और खेल परिसरों के प्रबंधन को यह सुनिश्चित करने के लिए सुरक्षा कर्मी या ग्राउंड स्टाफ तैनात करने के निर्देश दिए गए हैं कि परिसर में कोई भी आवारा कुत्ता न हो। भारतीय पशु कल्याण बोर्ड को चार हफ्तों के भीतर एक विस्तृत मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) जारी करने के आदेश दिए गए हैं, जिसमें कुत्तों के काटने की घटनाओं की रोकथाम और संस्थागत परिसरों में आवारा कुत्तों के प्रबंधन के तरीके बताए जाएँ।

उल्लेखनीय है कि जब कोर्ट ने 07 नवंबर 2025 को यह आदेश सुनाया तब सुनवाई के दौरान कुछ NGO और खुद को ‘कुत्ता प्रेमी’ बताने वाले लोगों के वकीलों ने यह दलील दी कि अगर संस्थानों से कुत्तों को हटाया गया तो वहाँ खाली जगह बन जाएगी, जिससे नए कुत्ते वहाँ आने लगेंगे। लेकिन कोर्ट ने इस दलील पर ध्यान देने से साफ इनकार कर दिया।

इस आदेश के साथ कोर्ट ने मानव जीवन और सुरक्षा को प्राथमिकता देने की दिशा में एक बड़ा और निर्णायक कदम उठाया है। यह एक महत्वपूर्ण शुरुआत है लेकिन कोर्ट को अब इस बढ़ती हुई समस्या पर भी ध्यान देना होगा कि बंद सोसाइटियों, पार्कों और रिहायशी इलाकों में भी आवारा कुत्तों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, जहाँ बच्चे, बुज़ुर्ग और कमजोर लोग लगभग रोज हमलों का सामना कर रहे हैं।

इस आदेश को लेकर पशु कल्याण समूहों और खुद को ‘कुत्ता प्रेमी’ कहने वाले लोगों में चिंता देखी जा रही है। कुछ लोग 7 नवंबर 2025 के इस आदेश के खिलाफ अपील करने की तैयारी में हैं। उनका कहना है कि यह आदेश कुत्तों और दूसरे जानवरों जैसे मवेशियों के प्रति कठोर है क्योंकि अदालत ने उन्हें भी सड़कों और हाईवे से हटाने के निर्देश दिए हैं। आखिर में अब यह कोर्ट पर निर्भर करेगा कि वह जानवरों के प्रति करुणा और इंसानों के जीवन की सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाती है।

ऑपइंडिया आवारा कुत्तों की समस्या पर एक विशेष शृंखला चला रहा है, जिसे आप इस लिंक पर क्लिक कर देख सकते हैं।

(यह खबर मूलरूप से अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

PM मोदी की 14 रैलियों ने बिहार में बनाया माहौल: ‘करप्शन से कट्टा’ और ‘जंगलराज से परिवारवाद’ पर की चोट, आधी आबादी पर रहा फोकस

बिहार चुनाव में पीएम मोदी के उठाए मु्द्दों ने चुनाव की दशा और दिशा को बदलने का काम किया। 24 अक्टूबर को जननायक कर्पूरी ठाकुर के गाँव में उनके परिवार से मिलकर चुनावी रैलियों की शुरुआत की। इस दौरान महिलाओं को खास तौर पर उन्होंने अपील की, सामाजिक कल्याण के लिए चलाई जा रही फ्रीबीज योजनाओं को दोहराया।

विकास की रफ्तार को हवा दे रही सड़कों की खासतौर पर चर्चा की गई, जो विगत वर्षों में काफी अच्छी हो गई है। यानी लालू- राबड़ी राज की नाकामियाँ, यूपीए सरकार के घोटाले और डबल इंजन सरकार की उपलब्धियों को गिना कर पीएम मोदी ने जनता का दिल जीतने की कोशिश की।

पीएम मोदी ने बिहार में 14 रैलियाँ की और 7 बार दौरा किया। इस दौरान बेगूसराय, मुजफ्फरपुर, सहरसा, छपरा, कटिहार, आरा, नवादा, भागलपुर, अररिया, औरंगाबाद, भभुआ के बाद सीतामढ़ी और बेतिया गए। जबकि 2020 से पीएम मोदी 4 बार दौरा किया था और 12 सभाएँ की थी। पीएम मोदी ने लगभग हर दिन दो सभाओं को इस बार संबोधित किया।

महिलाएँ के हाथों में सत्ता की चाबी

पहले फेज के चुनाव में करीब 65 फीसदी वोटिंग हुई, लेकिन महिलाओं ने पुरुषों के मुकाबले 8 फीसदी ज्यादा वोटिंग किया। माना जा रहा है कि महिलाओं का वोटिंग में बढ़चढ़कर हिस्सा लेना, महिला कल्याण के लिए उठाए गए कदमों की वजह से है। खास कर हाल ही में महिलाओं के खातों में आए 10000 रुपए ने उन्हें ताकत दी है। बिजनेस के क्षेत्र में आगे बढ़ने पर 2 लाख तक का लोन देने का वादा भी महिलाओं को लुभा रहा है।

महिलाओं को मुफ्त राशन, स्कूलों में लड़कियों को मिल रही साइकिल समेत तमाम जेनरेशनल योजनाओं से हो रहे लाभों की ओर झुकाव देखा गया। इसलिए माना जा रहा है कि महिलाओं का रुझान एनडीए की ओर रहा है और इनलोगों ने बढ़चढ़ कर वोट किया।

अब सवाल ये उठता है कि क्या महिलाओं का वोट ही सरकार बनाने में निर्णायक साबित होगा? दरअसल 2005 में सत्ता में आए नीतीश कुमार ने महिलाओं को तरजीह दी और उनके लिए कई योजनाएँ शुरू की। यही वजह है कि महिलाएँ उन्हें ज्यादा संख्या में वोट देती आ रही हैं।

दूसरी बात ये भी है कि बिहार की महिलाएँ दूसरे राज्यों से ज्यादा राजनीतिक रूप से जागरूक मानी जाती है। 10 हजार रुपए खाते में आने के बाद तो उनमें ज्यादा उत्साह देखा गया।

बिहार चुनाव के बाद एनडीए सरकार अगर फिर से सत्तासीन होती है, तो इतना तो तय है कि इसका श्रेय महिलाओं को जाएगा। इससे महिलाओं को वोट बैंक के रूप में देखने का ट्रेंड देशभर में स्थापित हो सकता है।

छठ मैया के अपमान का मुद्दा

बिहार के सबसे बड़े पर्व ‘छठ के अपमान’ का मुद्दा भी पीएम मोदी ने उठाया। दरअसल ये पर्व ज्यादातर महिलाएँ करती हैं और इससे पूरे बिहार की आस्था जुड़ी हुई है। इसलिए पीएम मोदी ने लोगों को याद दिलाया कि कैसे महागठबंधन ने छठ का अपमान किया है और अपने प्रचार में धमकी भरे लहजे का इस्तेमाल करके वो साफ बता रहे हैं कि वो बिहार को क्या देने वाले हैं।

लालू-राबड़ी का ‘जंगलराज’ बना मुद्दा

2005 से पहले जिन लोगों ने लालू यादव और राबड़ी देवी के 15 साल का जंगलराज देखा है, वे लोग आज भी उस वक्त की अराजकता और खस्ता कानून व्यवस्था की चर्चा करते हैं। उन्होंने ये भी देखा है कि नीतीश सरकार के शासन काल में कैसे बिहार में कानून व्यवस्था बहाल करने की कोशिश की गई।

संगठित माफिया और राजनीति गठजोड़ पर वार करते हुए पीएम मोदी ने भी अपनी रैली में लोगों को लालू-राबड़ी के ‘जंगलराज‘ की याद दिलाया। माफिया शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा को सीवान से टिकट दिए जाने के बाद एनडीए ने जमकर पुराने दिनों की याद ताजा की। यहाँ तक कि नई पीढ़ी को भी पुरानी पीढ़ी से पूछने के लिए उस वक्त क्या-क्या होता था? कुल मिलाकर ‘जंगलराज’ की याद बिहारवासियों को दिलाने में एनडीए सफल रहा।

पहले चरण की वोटिंग के बाद पीएम मोदी ने सीतामढ़ी की सभा में 8 नवंबर 2025 को रैली की। उन्होंने जनता का मतदान में बढ़चढ़कर हिस्सा लेने के लिए आभार जताया। इस दौरान उन्होंने कहा कि “जंगलराज वालों को 65 वोल्ट का झटका लगा है।”

पीएम मोदी ने जंगलराज शब्द को परिभाषित करते हुए कहा, “जंगलराज का मतलब है कट्टा, क्रूरता, कटुता, कु:संस्कार और करप्शन।” उन्होंने साफ कहा कि बिहार को ऐसे कुशासन से मुक्ति चाहिए।

परिवारवाद और भ्रष्टाचार पर पीएम मोदी का वार

पीएम मोदी और सीएम नीतीश दोनों पर परिवारवाद और भ्रष्टाचार के मामले में बेदाग रहे हैं। ऐसे में दोनों नेताओं ने इस मुद्दे पर विपक्ष को जमकर घेरा। कॉन्ग्रेस के स्टार प्रचारक राहुल गाँधी और आरजेडी के स्टार प्रचार और सीएम पद का चेहरा तेजस्वी यादव पर पीएम मोदी ने अपनी ज्यादातर रैलियों में परिवारवाद और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए।

उन्होंने कहा, “ये सिर्फ दो परिवारों के ही इर्द-गिर्द सिमटी हुई पार्टियाँ हैं। एक बिहार का सबसे भ्रष्ट परिवार और दूसरा देश का सबसे भ्रष्ट परिवार।” उन्होंने कहा कि “चारा खाने वाले सोचते हैं कि बिहार को चरा जाएँगे, जमीन लेकर नौकरी देने वाले गरीबों को फिर बेवकूफ बनाएँगे। लेकिन अब बिहार की जनता सबको समझ गई है”

बिहार में छोटे किसानों की संख्या ज्यादा है। इसलिए पीएम मोदी ने उनके हितों की बात की पीएम ने कहा, बिहार के किसानों को अब तक क​रीब 30,000 करोड़ रुपये मिल चुके हैं….ये सारा पैसा बिना तट कमीशन के किसानों के खाते में जमा हुआ है।

अगर यही जंगलराज वाले होते तो और उनके साथी कॉन्ग्रेस वाले होते तो आपके हक का ये सारा पैसा लूटकर वो अपनी तिजोरी भर लेते। ये मैं नहीं कह रहा हूं बल्कि कॉन्ग्रेस के एक पीएम ने कहा था कि दिल्ली से 1 रुपया निकलता है तो गांव तक पहुँचते-पहुँचते ये 15 पैसा हो जाता है।”

इस दौरान पीएम मोदी मुफ्त अनाज, पक्के मकान, शौचालय से लेकर अपनी सरकार की सभी योजनाओं से गरीबों को होने वाले फायदे को गिनाना नहीं भूलते थे।

राष्ट्रवाद और घुसपैठिए का मुद्दा

‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान राहुल गाँधी द्वारा पूछे गए सेना के शॉर्य पर सवाल को पीएम मोदी जनता के बीच ले गए। उन्होंने कहा, “आतंकवादियों को ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान पाकिस्तान में घुसकर तबाह किया गया। सेना की ये कॉन्ग्रेस-RJD को पसंद नहीं आई, धमाके पाकिस्तान में हो रहे थे और नींद कॉन्ग्रेस के शाही परिवार की उड़ी हुई थी।”

उन्होंने कहा कि आज तक पाकिस्तान और कॉन्ग्रेस के नामदार दोनों ही ऑपरेशन सिंदूर के सदमे से बाहर नहीं निकल पाए। उन्होंने विपक्षी गठबंधन पर घुसपैठियों के प्रति नरम रुख रखने का आरोप लगाया और ‘घुसपैठिया मुक्त भारत’ बनाने का वादा किया

चुनाव बाद एक-दूसरे का माथा नोचेंगे महागठबंधन के घटक- पीएम मोदी

महागठबंधन में सीट शेयरिंग पर पूरी तरह बात नहीं बनने, राहुल गाँधी की बिहार यात्रा में तेजस्वी को सीएम चेहरा नहीं घोषित करने और बाद में दबाव के बीच सीएम पद का चेहरा तेजस्वी यादव को बनाए जाने पर पीएम मोदी ने जमकर चुटकी ली।

प्रधानमंत्री ने कहा, “कॉन्ग्रेस ने जंगलराज के युवराज को पैदल तो किया ही, सीएम पद के नाम पर कॉन्ग्रेस ने हामी तक नहीं भरी। इसके बाद आरजेडी ने भी कॉन्ग्रेस को सबक सिखाने की ठानी और बिहार कॉन्ग्रेस अध्यक्ष के खिलाफ ही अपना उम्मीदवार उतार दिया। ये दोनों दल एक-दूसरे के बाल नोचने में लगे हैं और तो खबर ये है कि हर बूथ पर कॉन्ग्रेस के लोगों ने आरजेडी को हराने की ठान ली है।”

ऐन चुनाव के वक्त बिहार छोड़ भाग गए थे राहुल गाँधी

राहलु गाँधी ने बिहार में चुनाव प्रचार तो पूरे जोश से शुरू की थी। राज्य में न्याय यात्रा भी निकाली और जनता से जुड़ने की कोशिश की। लेकिन जल्दी ही शांत हो गए। यहाँ तक कि जब चुनाव प्रचार पूरे शबाब पर था, तब राहुल गाँधी 57 दिनों तक बिहार से ‘गायब’ रहे। इस दौरान विदेश यात्रा से लेकर यूपी हरियाणा में समर्थकों के बीच जाने और दिल्ली में इमरती छानने तक की तस्वीरें आईं।

उन्होंने एसआईआर का विरोध किया और वोट चोरी के आरोप लगाए, लेकिन जनता को ये बताने में नाकाम रहे कि एसआईआर से जनता के ‘वोट कट’ गए। बिहार चुनाव के दौर में उन्होंने हरियाणा विधानसभा चुनाव के वक्त ‘वोट चोरी’ हुई थी, इसे साबित करने के लिए फर्जी फोटो का इस्तेमाल किया। यहाँ तक कि ब्राजीलियन मॉडल का वह फोटो वायरल हो गया, जिसे राहुल गाँधी ने हरियाणा का मतदाता बताया था। ये सारे फर्जीवाड़े वाले आरोप जनता को आकर्षित करने में नाकाम रहे।

नीतीश सरकार के प्रति गुस्सा नहीं दिखा

नीतीश कुमार के 20 साल के शासनकाल के बावजूद लोगों में उनके प्रति गुस्सा देखा नहीं गया, जो आम तौर पर लंबे वक्त तक सत्ता में रहने के बाद नेताओं के प्रति जनता का होता है। हालाँकि रोजगार के मुद्दे पर लोगों में नाराजगी दिखी। इसको भाँपते हुए एनडीए ने अपने संकल्प पत्र में बिहार में 1 करोड़ रोजगार देने का वादा किया था।

इसे पीएम मोदी ने भी अपनी रैली में दोहराया। यहाँ तक कि पलायन का मुद्दा भी बिहारवासियों के लिए अहम रहा है। इसको देखते हुए पीएम मोदी ने शिक्षा, कौशल विकास से लेकर ‘बिहार में ही काम करेगा, बिहार का ही नाम करेगा’ जैसे नारे देकर जनतो विश्वास दिलाया कि सरकार इन मुद्दों पर गंभीर है।

असीम मुनीर बनेगा डिफेंस फोर्सेस का प्रमुख, SC की शक्तियों में कटौती और नई ताकतवर FCC अदालत का गठन: जानें पाकिस्तान के 27वें संवैधानिक संशोधन विधेयक की ABCD

पाकिस्तानी फौज के हाथों में देश की कमान सौंपने के लिए शहबाज शरीफ सरकार सीनेट में लड़ाई लड़ रही है। दरअसल, सरकार संविधान में 27वाँ विधेयक को संशोधित करने की तैयारी में है। शनिवार (09 नवंबर 2025) को ही पाकिस्तान के सीनेट में 27वाँ संवैधानिक संशोधन विधेयक, 2025 पेश किया गया। इसके तहत पाकिस्तानी फौज में चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेस (CDF) पद बनाया जाएगा, जिसकी जिम्मेदारी फील्ड मार्शल असीम मुनीर को मिलेगी।

संशोधित बिल में पाकिस्तान की फौज, नेवी और एयरफोर्स को सीधे असीम मुनीर के ही आदेश पर चलने का अधिकार देता है। पूरे पाकिस्तान के सैन्य बलों में CDF को सर्वोच्च माना जाएगा। इससे असीम मुनीर की शक्तियाँ भी बढ़ जाएँगी। फिर यही असीम मुनीर पाकिस्तान में खुलेआम आतंकवाद को पनाह देगा, जो फील्ड मार्शल की तारीफ करते नहीं थकते हैं। ये पद भारत की नकल कर लाया गया है, जैसा यहाँ थलसेना का प्रमुख CDS होता है।

संशोधन विधेयक को लेकर जहाँ पाकिस्तानी सरकार का कहना है कि संशोधन से देश के प्रशासन और न्यायपालिका में संरचनात्मक सुधार लाएगा, वहीं विपक्ष और कानूनी विशेषज्ञों का आरोप है कि इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता, प्रांतीय स्वायत्तता और नागरिक शासन की शक्ति कमजोर होगी।

क्या है 27वाँ संवैधानिक संशोधन?

सीनेट में पेश किया गया 27वाँ संवैधानिक संशोधन विधेयक पाकिस्तान के संविधान में कई अहम बदलाव लाने की कोशिश है। प्रस्ताव में प्रमुख तौर पर संविधान के 5 अनुच्छेदों के संशोधन की बात कही गई है, इनमें अनुच्छेद 160 (3a), 213, 243, 191a और 200 में परिवर्तन शामिल हैं। पाकिस्तान सरकार का कहना है कि इससे देश की वित्तीय व्यवस्था, न्यायिक शक्तियों और प्रमुख अधिकारियों की नियुक्ति में बड़े बदलाव किए जाएँगे।

सरकार ने जो संशोधन ड्राफ्ट प्रस्तावित किया है, उसके अनुसार अनुच्छेद 160 (3a) में संघीय राजस्व में प्रांतो की हिस्सेदारी की सुरक्षा की संवैधानिक गारंटी वापस ली जा सकती है। इससे केंद्र को वित्तीय नियंत्रण (fiscal control) बढ़ेगा और प्रान्तों की स्वायत्तता (provincial autonomy) कम हो सकती है।

आर्टिकल 191a में न्यायिक पुनर्संरचना (judicial restructuring) के बदलाव का प्रस्ताव है। इसमें नया ‘संवैधानिक न्यायालय’ (Constitutional Court) बनाने की बात कही गई है, जिसमें केवल संविधान संबंधित मुद्दों की पैरवी की जाएगी। ये प्रस्ताव न्यायालयों का ढाँचा बदलेगा, खासकर पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट पर बोझ कम करेगा। यानि यह ‘संवैधानिक कोर्ट’ पाकिस्तान का सर्वोच्च न्यायालय कहलाएगा।

पाकिस्तान में चुनाव और न्यायपालिका कार्यों में बदलाव

संशोधन पाकिस्तान में चुनाव और न्यायपालिका पर भी असर डालता है। विधेयक के संशोधन में आर्टिकल 213 के तहत निर्वाचन चुनाव आयुक्त (Chief Election Commissioner) की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव का सुझाव दिया गया है। इससे चुनावी संस्थाओं की संयोजना (structure) बदल सकती है, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है।

वहीं अनुच्छेद 200 में उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के स्थानांतरण (transfer) संबंधित जुड़े प्रावधानों में बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं। इससे न्यायपालिका पर सरकार का नियंत्रण होगा। लेकिन सरकार का कहना है कि संशोधन से न्यायाधीशों की स्वतंत्रता, उनके स्थानांतरण की प्रक्रिया आदि पर प्रभाव पड़ सकता है, जिससे न्यायपालिका के स्वायत्तता का प्रश्न उठता है।

27वाँ संशोधन में पाकिस्तानी फौज के लिए बड़ा बदलाव

इस संशोधन का सबसे अहम अनुच्छेद 243 है, जिस पर बहस छिड़ी हुई है। इस अनुच्छेद में प्रस्तावित संशोधन में पाकिस्तान की सैन्य सेवाओं में शीर्ष समन्वय कार्यालय ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी (CJCSC) के अध्यक्ष पद को 27 नवंबर 2025 को समाप्त कर देता है। इसी दिन वर्तमान CJCSC जनरल साहिर शमशाद मिर्जा का कार्यकाल समाप्त हो रहा है।

सीनेट में संशोधित बिल पेश करने वाली पाकिस्तान की सरकार में कानून मंत्री आजम नजीर तरार ने बताया कि अब CJCSC पद पर कोई नई नियुक्ति नहीं की जाएगी क्योंकि फील्ड मार्शल असीम मुनीर सभी सुरक्षाबलों के प्रमुख के रूप में कार्यभार संभालेंगे, जो देश के पहले CDF बनेंगे। ये पद तीनों डिफेंस फोर्सेस को कमांड करेगा।

संशोधन के तहत, पाकिस्तान के राष्ट्रपति देश की आर्मी, नेवी और एयर फोर्स के चीफ प्रधानमंत्री की सलाह से ही नियुक्त कर सकेंगे, लेकिन संवैधानिक तौर पर CDF ही तीनों डिफेंस फोर्सेस का प्रमुख माना जाएगा।

न्यूक्लियर मिशन में CDF की भूमिका

सेना का नया कमांडर CDF की भूमिका पाकिस्तान के न्यूक्लियर मिशन में भी अहम होगी। कमांडर ही पाकिस्तान न्यूक्लियर और रणनीतिक श्त्रागार की देखरेख करेगा। Dawn की रिपोर्ट के अनुसार, कमांडर एक आर्मी ऑफिसर ही होना चाहिए, जिसे CDF की कहने पर प्रधानमंत्री ने नियुक्त किया हो।

इसके अलावा यह संशोधित विधेयक पाकिस्तानी फौज में फाइव-स्टार रैंक वाले ऑफिसर को विशेष अधिकार भी प्रस्तावित करता है, इनमें फील्ड मार्शल, मार्शल ऑफ एयर फोर्स और फ्लेट के एडमिरल शामिल हैं।

पाकिस्तानी फौज पर मेहरबान शहबाज शरीफ सरकार

इसके अलावा पाकिस्तान की फौजपरस्त सरकार का यह संशोधित विधेयक पाकिस्तानी फौज में फाइव-स्टार रैंक वाले ऑफिसर को विशेष अधिकार भी प्रस्तावित करता है, इनमें फील्ड मार्शल, मार्शल ऑफ एयर फोर्स और फ्लेट के एडमिरल शामिल हैं।

इन आर्मी ऑफिसर का जीवनभर के लिए वर्दी, रैंक और औदा बना रहेगा। रिटायरमेंट के बाद भी सरकार इन्हें अलग जिम्मेदारी प्रधान करेगी। ये ऑफिसर राष्ट्रपति के समान संवैधानिक छूट का आनंद ले सकते हैं। सबसे अहम संशोधन है कि इन्हें केवल संसद में महाभियोग प्रस्ताव पेश कर ही पद से हटाया जा सकता है।

27वें संवैधानिक संशोधन विधेयक पर पाकिस्तान में राजनीतिक बवाल

पाकिस्तान की शहबाज शऱीफ द्वारा सीनेट में पेश किए गए इस 27वें संवैधानिक संशोधन विधेयक पर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। पाकिस्तान में विपक्षी पार्टियाँ बिलावल भुट्टो जरदारी की PPP, इमरान खान की PT और जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम इसे ‘लोकतंत्र की कब्र’ बता रही हैं। उनका आरोप है कि यह संशोधन सेना और केंद्र सरकार की असीमित शक्तियाँ देने के लिए लाया गया है।

वहीं कई बार एसोसिएशनों ने इसे न्यायपालिका के खिलाफ साजिश करार दिया है। पाकिस्तान के कानूनी विश्लेषक अली दयाल ने कहा, “इस संशोधन के बाद पाकिस्तान दो हिस्सों में बंठ जाएँगा। एक संवैधानिक अदालत के हाथ में संविधान होगा और दूसरे के पास राजनीतिक सत्ता।”

पाकिस्तानी सीनेट में 27वाँ संशोधन विधेयक मंजूर होने में मुश्किल

पाकिस्तान की शहबाज शरीफ सरकार कैबिनेट की मंजूरी से संसद में 27वाँ संवैधानिक संशोधन विधेयक ले तो आई लेकिन विधेयक को कानून बनाने में मुश्किल झेल रही है। दरअसल, शहबाज शरीफ सरकार को पाकिस्तानी संसद की निचली सदन में बहुमत है लेकिन ऊपरी सदन में सीनेट में विधेयक को मंजूरी के लिए विपक्ष की सहायता की जरूरत है।

इस बीच शहबाज शरीफ सरकार PPP को मनाने में लगी हुई है। PPP के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो जरदारी ने खुलासा किया कि खुद प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ समेत PML-N के नेता ने संवैधानिक रिफॉर्म को सपोर्ट करने के लिए PPP से गुजारिश की है।

हालाँकि, सीनेट में पेश किए जाने के बाद विधेयक को पाकिस्तान की राष्ट्रीय असेंबली और सीनेट की कानून और न्याय संबंधी स्थायी समितियों के संयुक्त समीक्षा और विचार के लिए भेजा गया। संयुक्त समिति की बैठक के दौरान, जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल के दो सदस्यों और सीनेटर ने इस बैठक का बहिष्कार किया। उन्होंने कहा कि ड्राफ्ट लिस्ट में ऐसे प्रावधान शामिल हैं जो 26वें संशोधन विधेयक में पहले ही नामंजूर किया गया था।

क्या हैं ‘टिकटॉक इस्लामिज्म’ ग्रुप्स, जिन्हें कट्टरपंथी बता जर्मन सरकार ने किया बैन: लोकतंत्र के खिलाफ युवाओं का कर रहे थे ब्रेनवॉश

जर्मनी की सरकार ने देश में चरमपंथ को बढ़ावा देने और संविधान के खिलाफ काम करने के आरोप में दो इस्लामवादी समूहों पर बड़ा कदम उठाया है। इनमें से एक ‘इस्लामिक सेंटर हैम्बर्ग (IZH) है, जिसे ईरान और हिजबुल्लाह का समर्थन करने के आरोप में बैन किया गया। दूसरा समूह ‘मुस्लिम इंटरएक्टिव‘ है, जिस पर भी बैन लगा दिया गया है।

यह कदम इसलिए अहम है क्योंकि मुस्लिम इंटरएक्टिव जैसे समूह सोशल मीडिया, खासकर टिकटॉक का इस्तेमाल करके जर्मनी में खिलाफत (इस्लामी शासन) की माँग कर रहे थे और युवाओं में कट्टरपंथी विचार फैलाने की कोशिश कर रहे थे। जर्मन अधिकारियों ने इसे ‘आधुनिक टिकटॉक इस्लामिज्म‘ कहा है, यानी सोशल मीडिया के जरिए युवाओं को प्रभावित करने की रणनीति।

यह कार्रवाई जर्मनी के लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए जरूरी थी, क्योंकि ये समूह लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने की कोशिश कर रहे थे। सरकार ने इस पर सख्त कदम उठाकर यह साफ कर दिया है कि वह ऐसे चरमपंथी विचारों से निपटने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी।

क्या कार्रवाई हुई है?

जर्मन सरकार ने इस्लामिक सेंटर हैम्बर्ग (IZH) और उसके जुड़े समूहों पर बैन लगा दिया है। इसके बाद, जर्मनी में चार शिया मस्जिदों को बंद कर दिया गया और संगठन की संपत्तियाँ जब्त कर ली गईं। गृह मंत्री नैन्सी फेजर ने कहा कि यह समूह लोकतंत्र, मानवाधिकार और महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ था और इसका मकसद जर्मनी में इस्लामी शासन स्थापित करना था। इसके साथ ही, इसे Hezbollah जैसे आतंकवादी समूहों का समर्थन करने का भी आरोप लगा था।

इसके अलावा, पिछले साल नवंबर में पुलिस ने 55 जगहों पर छापे मारे थे, जिससे पता चला कि यह समूह गुपचुप तरीके से अपने राजनीतिक उद्देश्य पूरे कर रहा था। इस कार्रवाई का मकसद यह दिखाना था कि जर्मनी किसी भी प्रकार की कट्टरपंथी गतिविधि को नहीं सहन करेगा। सरकार ने यह भी साफ किया कि यह कदम शिया मुसलमानों के मजहबी अधिकारों के खिलाफ नहीं है, बल्कि इस्लामी कट्टरपंथियों के खिलाफ है।

क्या कर रहा था ‘ग्रुप’?

‘ग्रुप’ एक ऐसा समूह था जो जर्मनी में युवाओं को कट्टरपंथी विचारधारा से प्रभावित करने की कोशिश कर रहा था। इसके लिए इस समूह ने टिकटॉक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया। टिकटॉक की तरह के ऐप्स, जो तेज और मजेदार वीडियो दिखाते हैं, ऐसे प्लेटफॉर्म कट्टरपंथी विचार फैलाने के लिए आदर्श जगह बन गए हैं। ग्रुप का मकसद था कि वह युवाओं को इस्लामिक क्रांति के विचारों से जोड़ सके और उन्हें लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ विचारों में प्रभावित कर सके।

इसके अलावा, ‘ग्रुप’ का एक और बड़ा उद्देश्य था, वैश्विक खिलाफत की स्थापना करना। इसका मतलब था कि वे चाहते थे कि पूरी दुनिया में एक इस्लामिक शासन बने, जो लोकतांत्रिक देशों के खिलाफ हो। इस उद्देश्य को फैलाने के लिए, ग्रुप के सदस्य सोशल मीडिया के जरिए युवा लोगों को अपने विचारों के प्रति आकर्षित कर रहे थे और जर्मनी में इस्लामी शासन स्थापित करने की कोशिश कर रहे थे।

कौन चलाता है ग्रुप और क्या लक्ष्य है?

‘ग्रुप’ एक युवा संगठन चला रहा था, जो 2020 में बना था और अब इसे ‘हिजबुत तहरीर (HuT)’ से जोड़ा जा रहा है। हिजबुत तहरीर को 2003 में जर्मनी में बैन किया गया था। इस संगठन का मुख्य लक्ष्य ‘दुनिया भर में एक इस्लामिक शासन यानी खिलाफत की स्थापना करना और पश्चिमी लोकतांत्रिक व्यवस्था का विरोध करना था। ये लोग चाहते थे कि जर्मनी में इस्लामी कानून लागू हो और वे जर्मनी के संविधान का विरोध करते थे।

इस संगठन के विचार खासकर युवाओं को आकर्षित करते थे, क्योंकि वे अपने संदेश को सोशल मीडिया जैसे टिकटॉक के माध्यम से बहुत आसानी से फैलाते थे। उनका उद्देश्य था कि वे युवाओं को इन प्लेटफॉर्म्स पर अपने विचारों से प्रभावित करें और उन्हें कट्टरपंथी सोच अपनाने के लिए तैयार करें।

अन्य दो ग्रुप क्या कर रहे थे?

जर्मनी में ग्रुप के अलावा, दो और कट्टरपंथी समूह ‘जेनरेशन इस्लाम और रियलिटी इस्लाम‘ थे। ये दोनों समूह भी वही काम कर रहे थे जो ग्रुप करता था, यानी कट्टरपंथी विचारों को फैलाना। इन दोनों समूहों पर भी ग्रुप की तरह बैन लग सकता था, क्योंकि ये भी युवाओं को इस्लामिक कट्टरपंथ की तरफ खींचने की कोशिश कर रहे थे। जर्मनी की खुफिया एजेंसियों ने इन समूहों की गतिविधियों पर कड़ी नजर रखी और इनकी संपत्तियों की भी तलाशी ली।

हालाँकि, अभी तक इन समूहों पर कोई बैन नहीं लगाया गया है, लेकिन वे भी ग्रुप और मुस्लिम इंटरएक्टिव जैसे समूहों की तरह मुश्किल में पड़ सकते हैं। इनका भी उद्देश्य इस्लामिक शरिया कानून के तहत शासन स्थापित करना और लोकतांत्रिक व्यवस्था का विरोध करना था, इसलिए जर्मनी सरकार इन पर नजर बनाए रखे हुए है।

क्या जर्मनी में पहले भी बैन हुए हैं ऐसे ग्रुप?

हाँ, जर्मनी में पहले भी कई कट्टरपंथी समूहों पर बैन लगाया जा चुका है। इनमें से सबसे पहले 2003 में हिजबुत तहरीर (HuT) पर बैन लगाया गया था। यह समूह भी जर्मनी में कट्टरपंथी विचारों को फैलाने और शरिया कानून के तहत शासन स्थापित करने की कोशिश कर रहा था, इसलिए उसे देश में पूरी तरह से बैन कर दिया गया था।

इसके बाद, 2020 में हेजबोल्ला (Hezbollah) को भी आतंकवादी संगठन घोषित करते हुए जर्मनी में उस पर बैन लगा दिया था। यह समूह ईरान से जुड़ा हुआ था और जर्मनी के अंदर अपनी आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा दे रहा था।

इनके अलावा, हाल ही में 2023 में हमास (Hamas) के समर्थन में काम कर रहे समीदोन–पलस्तीनियन सॉलिडेरिटी नेटवर्क पर भी जर्मनी ने बैन लगा दिया। यह समूह इजरायल के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा दे रहा था और उसकी आतंकवादी गतिविधियों को समर्थन दे रहा था।

जर्मनी ने इन सभी समूहों के खिलाफ कार्रवाई की क्योंकि ये समूह जर्मन समाज के लिए खतरा पैदा कर रहे थे और लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने की कोशिश कर रहे थे। जर्मनी के लिए यह एक निरंतर प्रक्रिया बन चुकी है, जिसमें वह किसी भी प्रकार की इस्लामी कट्टरपंथी गतिविधियों से निपटने के लिए लगातार सक्रिय रहता है।

जर्मनी की सरकार का लक्ष्य है कि वह समाज में शांति बनाए रखे और किसी भी प्रकार के आतंकवाद या कट्टरपंथ को बढ़ावा न दे। इसलिए, जब भी कोई समूह लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ काम करता है, तो उस पर कड़ी कार्रवाई की जाती है।

क्या जर्मनी इस्लामी कट्टरपंथियों से जूझ रहा है?

हाँ, जर्मनी में इस्लामी कट्टरपंथ की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है। अब चरमपंथी संगठन पुराने तरीकों की बजाय नए डिजिटल रास्तों का इस्तेमाल कर रहे हैं। ‘टिकटॉक इस्लामिज्म‘ इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। ये समूह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे टिकटॉक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब का इस्तेमाल करके युवाओं को कट्टरपंथ की ओर खींच रहे हैं।

तेज, आकर्षक और भावनात्मक वीडियो बनाकर ये लोग युवाओं को यह महसूस कराते हैं कि पश्चिमी लोकतंत्र उनके धर्म के खिलाफ है और उन्हें इस्लामी शासन की ओर लौटना चाहिए। यह तरीका खासकर किशोरों और छात्रों पर असर डाल रहा है, जो सोशल मीडिया पर बहुत समय बिताते हैं।

जर्मनी की खुफिया एजेंसियाँ इन गतिविधियों पर लगातार नजर रख रही हैं। कई रिपोर्टों में यह पाया गया है कि ऐसे समूहों के जरिए नाबालिगों को प्रभावित किया जा रहा है और उन्हें समाज से अलग सोच अपनाने के लिए उकसाया जा रहा है। इस वजह से सरकार ने कई बार सख्त कदम उठाए हैं, जैसे मुस्लिम इंटरएक्टिव, जेनरेशन इस्लाम और रियलिटी इस्लाम जैसे संगठनों पर छापे और जाँचें। सरकार का कहना है कि ऐसे समूह मजहब के नाम पर नफरत फैला रहे हैं और लोकतंत्र को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं।

पिछले कुछ वर्षों में जर्मनी में इस्लामवादी-प्रेरित हमलों और साजिशों के कई मामले सामने आए हैं। खासकर गाजा युद्ध और मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने के बाद, इन घटनाओं में तेजी आई है। कई बार स्कूलों और मस्जिदों में ऐसे युवाओं के समूह मिले हैं जो सोशल मीडिया पर देखे गए वीडियो से प्रभावित होकर कट्टर विचारधारा अपनाने लगे थे। यही वजह है कि जर्मन सरकार अब इन डिजिटल नेटवर्क्स को लेकर और ज़्यादा सतर्क हो गई है।

जर्मनी की सरकार का मानना है कि मजहब का इस्तेमाल राजनीति या चरमपंथ के लिए नहीं होना चाहिए। इसलिए जब कोई संगठन मजहबी स्वतंत्रता के नाम पर हिंसा, नफरत या ‘खिलाफत’ की माँग करने लगता है तो उस पर तुरंत कार्रवाई की जाती है। हाल ही में सरकार ने कई समूहों की संपत्तियाँ जब्त कीं, उनके सोशल मीडिया चैनल बंद किए और सदस्यों पर कानूनी कार्रवाई शुरू की।

सरकार का लक्ष्य सिर्फ चरमपंथ को रोकना नहीं है, बल्कि युवाओं को सुरक्षित और सही जानकारी देना भी है। इसके लिए स्कूलों और सामुदायिक संगठनों के साथ मिलकर जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। अधिकारियों का कहना है कि ‘टिकटॉक इस्लामिज्म‘ जैसे रुझान केवल एक सुरक्षा चुनौती नहीं हैं, बल्कि ये समाज में विभाजन भी पैदा करते हैं।

इसलिए कहा जा सकता है कि जर्मनी इस समय एक दोहरी लड़ाई लड़ रहा है। एक ओर वह अपने देश को आतंकवाद और कट्टरपंथ से बचा रहा है और दूसरी ओर सोशल मीडिया के जरिए फैल रहे डिजिटल चरमपंथ को भी रोकने की कोशिश कर रहा है। सरकार के लिए यह आसान नहीं है, लेकिन जर्मनी का यह सख्त रुख यह दिखाता है कि वह अपने लोकतंत्र और समाज की सुरक्षा को लेकर कोई समझौता नहीं करेगा।

लाल आतंक पर वोट का प्रहार: बिहार में नक्सल प्रभावित भीमबाँध-कछुआ-बासकुंड में दशकों बाद हुई वोटिंग, नक्सलवाद को खत्म कर मोदी सरकार ने लौटाया ‘वोट का अधिकार’

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में कई ऐतिहासिक नजारे देखने को मिले। जहाँ एक ओर मतदान के पहले चरण में पहली बार  64.66% मतदान हुआ। यह पिछले चुनावों की तुलना में काफी अधिक है और ये अब तक का रिकॉर्ड है।

बिहार में मतदाताओं की संख्या 7.42 करोड़ है। इनमें पुरुष मतदाता 3.92 करोड़ और महिला मतदाता 3.50 करोड़ हैं। पहले चरण में कुल वोटर्स की संख्या 3.75 करोड़ से अधिक थी। अब दूसरे चरण में अधिकतम वोटर्स के मतदान बूथ तक पहुँचने की बारी है।

बिहार चुनाव के पहले चरण में कई ऐसे बूथ रहे जो कभी नक्सल प्रभावित हुआ करते थे, वहाँ दशकों बाद मतदाताओं ने अपने मत का प्रयोग कर वोट दिया।

बिहार के मुंगेर जिले में भीमबाँध समेत 7 मतदान केंद्रों में 20 साल बाद लोगों ने वोट डाला। इन जगहों पर 5 जनवरी 2005 को नक्सली हमले हुए थे। भीमबांध इलाके के पास बारूदी सुरंग विस्फोट कर मुंगेर के SP समेत 7 पुलिसकर्मियों को मार दिया गया था। इसके बाद उन इलाकों से मतदान केंद्रों को हटा दिया गया था।

भीमबाँध तारापुर विधानसभा के तहत आता है। इसके बूथ संख्या 310 पर 170 महिलाएँ और 204 पुरुषों समेत 374 मतदाता हैं। 20 वर्ष के बाद मतदान केंद्रों के लगने पर वहाँ केंद्रीय अर्धसैनिक बल को तैनात कर लगातार पेट्रोलिंग की जा रही है।

ऐसा नहीं है कि भीमबाँध पर मतदान नहीं हो रहे थे बल्कि नक्सली हमले के बाद वहाँ के बूथ को लगभग 20 किलोमीटर दूर लगा दिया गया था। इसके कारण गाँव के लोगों को मतदान केंद्रों तक पहुँचना मुश्किल हो गया था। कम लोग ही बूथ तक पहुँच पाते थे।

इसी तरह बिहार के कछुआ और बासकुंड गाँव के लोगों ने 16 साल बाद मतदान किया। नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने के कारण पहले मतदान संभव नहीं था। लखीसराय जिले के सूर्यगढ़ा विधानसभा क्षेत्र के चार गावों में मतदान बूथ बनाए गए।

लखीसराय जिले के 56 मतदान केंद्र नक्सल प्रभावित है। चानन प्रखंड के दो मतदान केंद्र संख्या 407 सामुदायिक भवन कछुआ में 363 मतदाता है। मतदान केंद्र संख्या 417 बासकुंड-कछुआ में 495 मतदाता हैं। नक्सल प्रभावित इन दोनों इलाकों में पहली बार EVM के जरिए मतदान हुए।

इन दोनों मतदान केंद्रों में वोट डालने के लिए मतदाताओं को 6 से 10 किलोमीटर दूर जाना पड़ता था। साथ ही इसके लिए लोगों को जंगल और पहाड़ पार कर पैदल जाना पड़ता था।

पिछले लोकसभा चुनाव में 5 माओवाद प्रभावित मतदान केंद्र को बदलकर मैदानी भाग में लाया गया था। नक्सल से मुक्त होने के बाद चुनाव आयोग ने उन 5 मतदान केंद्रों को उनके मूल स्थान पर बहाल किया है।

बिहार चुनाव-2025 के पहले चरण में ही लोकतांत्रिक इतिहास का नया अध्याय लिखा गया, जहाँ दशकों बाद लोग अपने ही गाँव में मतदान कर पाए। दोनों क्षेत्रों में मतदान होना यह दर्शाता है कि नक्सल प्रभाव का खात्मा हो चुका है और लोकतंत्र की बहाली हो रही है।

प्रशासन ने इन क्षेत्रों को नक्सल मुक्त घोषित कर दिया है। जिले के कुल 56 मतदान केंद्र नक्सल ग्रामीणों के लिए यह केवल वोट डालने का अवसर नहीं, बल्कि डर से मुक्ति और लोकतांत्रिक अधिकार की जीत है।

दूसरे चरण में भी बिहार चुनाव बनेगा ऐतिहासिक

प्रथम चरण ही नहीं दूसरे चरण में भी बिहार के कई उन क्षेत्रों में भी मतदान होगा जहाँ पिछले 75 साल में नहीं हुआ। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के दूसरे चरण यानी 11 नवंबर 2025 में जमुई जिले के 4 गाँवों में पहली बार मतदान होगा।

ये गाँव आजादी के बाद से अब तक (लगभग 77 साल) कभी भी अपने ही गाँव में मतदान नहीं कर पाए। इस बार यहाँ मतदान केंद्र बनाए गए हैं और ग्रामीणों को पहली बार लोकतंत्र का उत्सव अपने गाँव में मनाने का अवसर मिलेगा।

बिहार के दूसरे चरण के मतदान में 18 जिलों की 122 विधानसभा सीटों पर मतदान होगा। इन्हीं के तहत जमुई के 4 गाँव भी शामिल हैं। बिहार के लोकतांत्रिक इतिहास में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।

बिहार में चुनाव के दौरान इतिहास तो बन रहा है लेकिन इसका पूरा श्रेय मोदी सरकार की नक्सल खत्म करने वाले प्रयासों की ओर जाता है। नक्सल खत्म करने के लिए मोदी सरकार ने लगातार कई वर्षों तक काम किया।

इसके बाद जाकर भारत के कई जिले नक्सल के प्रभाव से मुक्त हुए हैं। इसके बाद ही बिहार के पहले चरण में भीमबाँस समेत अन्य जगहों पर कई जगहों बाद मतदान सफल तौर पर शांतिपूर्वक संपन्न हो पाए।

मोदी सरकार में संविधान-डेमोक्रेसी पर खतरा बताने वालों को जवाब देना चाहिए कि ये सारे प्रयास लोकतंत्र बचाने की भावना से नहीं किए गए तो किस मंशा से किए गए होंगे।

फिर विवादों में IIT गाँधीनगर: आतंकी याकूब मेमन के समर्थन में दया याचिका लिखने वाले एम के रैना को बनाया फैकल्टी, प्रोफेसर ने ‘वंदे मातरम’ का किया विरोध

हमेशा किसी न किसी विवाद में फँसा रहने वाला गुजरात का भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान गाँधीनगर (IIT गाँधीनगर) एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार मामला संस्थान में हुई नियुक्ति को लेकर है। सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है कि IIT गाँधीनगर ने गुप्त रूप से कुछ फैकल्टी की नियुक्ति की है, जिनमें अभिनेता एम के रैना का नाम भी शामिल है।

एम के रैना वही व्यक्ति हैं जिन्होंने आतंकी याकूब मेमन के लिए दया याचिका पर हस्ताक्षर किए थे। अब उनकी नियुक्ति सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोग IIT गाँधीनगर पर फिर से सवाल उठ रहे हैं। इसके अलावा, संस्थान के ही एक प्रोफेसर द्वारा ‘वंदे मातरम’ पर आपत्ति जताने की बात भी सामने आई है, जिससे विवाद और बढ़ गया है।

दरअसल, IIT गाँधीनगर का मानविकी विभाग पिछले कई सालों से विवादों में घिरा रहा है। आरोप लगते रहे हैं कि यह विभाग इस्लामी एजेंडा चलाने, देशविरोधी तत्वों और आतंक समर्थकों की नियुक्ति करने और वामपंथी विचारधारा को बढ़ावा देने में लगा हुआ है। इन तमाम कारणों से IIT गाँधीनगर बार-बार विवादों के केंद्र में रहा है।

याकूब मेमन की दया याचिका पर हस्ताक्षर

साल 1993 में मुंबई में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों ने पूरे देश को हिला दिया था। इन धमाकों में सैकड़ों लोगों की जान गई और देशभर में दहशत फैल गई थी। इस मामले में आतंकवादी याकूब मेमन को गिरफ्तार कर अदालत ने दोषी ठहराया और फाँसी की सजा सुनाई थी।

लेकिन जुलाई 2015 में, याकूब मेमन को बचाने के लिए राष्ट्रपति के नाम एक दया याचिका दायर की गई थी। इस याचिका पर अभिनेता एम के रैना सहित करीब 300 लोगों ने हस्ताक्षर किए थे। उन्होंने तर्क दिया था कि आतंकवादी को फांसी देना ‘अनुचित और कठोर’ है।

अब सोशल मीडिया पर एम के रैना के हस्ताक्षर वाली उस याचिका की तस्वीरें फिर से वायरल हो रही हैं। लोग सवाल उठा रहे हैं कि जो व्यक्ति पहले आतंकवादी के लिए दया की माँग कर चुका है, वही अब IIT गाँधीनगर में नियुक्त किया जा रहा है, क्या यह देश के शैक्षणिक संस्थानों में वामपंथी एजेंडे की घुसपैठ नहीं है?

मोदी सरकार के खिलाफ दुष्प्रचार

एम के रैना का विवाद सिर्फ उनकी पुरानी गतिविधियों तक सीमित नहीं है बल्कि उनके राजनीतिक बयानों ने भी लोगों का ध्यान खींचा है। साल 2016 में दिए गए एक इंटरव्यू में रैना ने मोदी सरकार पर तीखा हमला किया था। उन्होंने कहा था, “यह सरकार हमारा ब्रेन-डेड करना चाहती है।” इसके साथ ही उन्होंने परोक्ष रूप से सरकार को तानाशाह कहने की कोशिश की और आरोप लगाया कि विपक्ष की आवाज दबाई जा रही है तथा संस्थाओं को कमजोर किया जा रहा है।

अब सोशल मीडिया पर लोग सवाल उठा रहे हैं कि ऐसे राजनीतिक झुकाव रखने वाले व्यक्ति को IIT गाँधीनगर में नियुक्त करना क्या उचित है? कई यूजर्स ने इस विवाद को संस्थान की पिछली नियुक्तियों से जोड़ते हुए भी देखा है, जैसे कि फिल्ममेकर डॉन चाको पालथरा की नियुक्ति और आरोप लगाया है कि संस्थान में लगातार वामपंथी सोच वाले लोगों को जगह दी जा रही है।

इस विवाद के बाद IIT गाँधी नगर के भर्ती नियमों पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। लोग पूछ रहे हैं कि एक कलाकार पृष्ठभूमि वाला व्यक्ति तकनीकी संस्थान में फैकल्टी पद पर कैसे नियुक्त हुआ? अगर रैना को ‘आर्टिस्ट-इन-रेजिडेंस’ बनाया गया है, तो यह जानकारी वेबसाइट पर सार्वजनिक क्यों नहीं की गई? और आखिर इन पदों के लिए पात्रता और चयन के मानदंड क्या हैं? इन सवालों के जवाब न मिलने से IIT गाँधीनगर की पारदर्शिता और नीयत दोनों पर सवाल खड़े हो गए हैं।

एक अन्य प्रोफेसर को ‘वंदे मातरम’ से आपत्ति थी

IIT गाँधी नगर में एक और विवाद ने तूल पकड़ लिया है। सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है कि संस्थान के प्रोफेसर अरूप चक्रवर्ती ने ‘वंदे मातरम’ का विरोध किया है। एक वायरल पोस्ट में प्रोफेसर के ईमेल का स्क्रीनशॉट साझा किया गया है, जिसमें उन्होंने कथित रूप से कहा है कि ‘वंदे मातरम’ गीत की पंक्ति ‘त्वं हि दुर्गा दशप्रहरंधारिणीम्’ में भारत माता के उल्लेख पर उन्हें आपत्ति है।

आरोप है कि उन्होंने यह भी कहा कि यह गीत धार्मिक भावना से जुड़ा है, इसलिए आम लोगों को इसे नहीं गाना चाहिए। इस मेल में कथित तौर पर अन्य विवादित बातें भी लिखी गई हैं, जिससे सोशल मीडिया पर लोगों का गुस्सा भड़क गया है।

अब नेटिजन्स का कहना है कि IIT गाँधी नगर में यह कोई पहली बार नहीं हुआ है, संस्थान पहले भी विवादित नियुक्तियों और वामपंथी एजेंडे को लेकर चर्चा में रहा है। कई यूजर्स ने सरकार से IIT गाँधी नगर के खिलाफ सख्त कार्रवाई और जाँच की माँग की है, ताकि यह पता चल सके कि देश के प्रतिष्ठित संस्थान में आखिर यह कैसी विचारधारा पनप रही है।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से गुजराती में लिखी गई है जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)


जिस माली में हो रहे भारतीय लोग किडनैप, क्या वहाँ होने वाला है अल-कायदा का कब्जा: जानिए इस्लामी आतंकियों ने अफ्रीकी देश में कैसे जमाईं जड़ें

गृह युद्ध की मार झेल रहे अफ्रीकी देश माली से फिर एक बुरी खबर आई है। पश्चिमी माली के कोबरी इलाके में गुरुवार (6 नवंबर 2025) को अज्ञात बंदूकधारियों ने 5 भारतीय कामगारों का अपहरण कर लिया। शक है यह हरकत अल-कायदा और ISIS से जुड़े आतंकवादी समूहों ने की है। माली में अल-कायदा से जुड़ा आतंकी संगठन जमात नुसरत अल-इस्लाम वल-मुसलमीन (JNIM) सक्रिय है।

यह कोई पहला मौका नहीं है जब वहाँ भारतीयों का अपहरण हुआ हो, वहाँ आए दिन ऐसी घटनाएँ आम हो गई हैं। बीते जुलाई में माली में 3 भारतीयों का अपहरण हुआ था। तब इसकी जिम्मेदारी जमात नुसरत अल-इस्लाम वल-मुसलमीन (JNIM) ने ही ली थी।

इस आतंकी संगठन की माली में मौजूदगी का असर समझने के लिए ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ की 30 अक्टूबर 2025 की एक रिपोर्ट पढ़िए। यह रिपोर्ट कहती है, “अल-कायदा के आतंकवादी माली की राजधानी बमाको पर कब्जा करने के और करीब पहुँच रहे हैं। अगर माली पर कब्जा हो जाता है, तो यह अमेरिका द्वारा घोषित आतंकवादी समूह द्वारा शासित दुनिया का पहला देश बन जाएगा।” इस्लामी कट्टरपंथ ने कैसे माली में अपनी जड़े जमाईं वो जानने से पहले समझते हैं कि आखिर JNIM है क्या?

क्या है जमात नुसरत अल-इस्लाम वल-मुसलमीन?

अमेरिकी न्याय विभाग से जुड़ी एक आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक, माली, नाइजर और बुर्कीना फासो में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने वाले जमात नुसरत अल-इस्लाम वल-मुसलमीन (JNIM) ने खुद को माली में अल-कायदा की आधिकारिक शाखा बताया है। वेबसाइट पर बताया गया है कि 2017 में अल-कायदा इन द इस्लामिक मगरिब की सहारा शाखा (AQIM), अंसार अल-डाइन और मकीना लिबरेशन फ्रंट (FLM) ने साथ मिलकर JNIM का गठन किया गया था। अमेरिका-ऑस्ट्रेलिया जैसे कई देशों ने इसे आतंकी घोषित किया हुआ है।

आस्ट्रेलिया की राष्ट्रीय सुरक्षा की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक, JNIM सलाफी-जिहादी संगठन है जो पश्चिम अफ्रीका में एक सलाफी-इस्लामी राज्य बनाने की कोशिश में लगा है। JNIM का लक्ष्य यहाँ पश्चिमी प्रभाव को कम करना था और यह United Nations Multidimensional Integrated Stabilization Mission in Mali (MINUSMA) के साथ भिड़ गया। पिछले एक दशक में JNIM के हमलों में MINUSMA से जुड़े 300+ सैनिक मारे गए हैं।

पश्चिम अफ्रीका में JNIM की गतिविधियों ने इसे वहाँ सक्रिय इस्लामिक स्टेट (IS) के गुटों के साथ टकराव की स्थिति में ला दिया है। 2017 से 2019 के बीच दोनों के बीच संबंध सामान्य रूप से सहयोगात्मक थे। इसे ‘साहेल अपवाद’ कहा जाता था क्योंकि दुनिया के बाकी हिस्सों में अल-कायदा और इस्लामिक स्टेट के गुट आपस में लड़ रहे थे लेकिन साहेल क्षेत्र (अफ्रीका का एक इलाका) में दोनों मिलकर काम कर रहे थे। हालाँकि, 2019 के बाद से इन दोनों संगठनों के रिश्ते बिगड़ गए। अब दोनों गुट लगातार एक-दूसरे से इलाके पर कब्जे के लिए लड़ रहे हैं। 2019 के मध्य से शुरू हुई इस लड़ाई में हजारों आतंकी मारे जा चुके हैं।

कौन चलाता है JNIM?

इयाद अग गली ने 2017 में JNIM बनने के बाद इसके मुख्य अमीर यानी मुखिया के रूप में काम करना शुरू किया था और वही इसका कर्ता धर्ता है। इयाद अग गली माली के किडाल क्षेत्र के रहने वाले तुआरेग समुदाय से है। 1990 के दशक में हुए तुआरेग विद्रोह में उसने भाग लिया था और 2006 में उसने एक छोटा सा विद्रोह भी चलाया लेकिन वह ज्यादा समय तक नहीं चला। 2007 में वे माली सरकार की सलाहकार संस्था हाई काउंसिल ऑफ टेरिटोरियल कलेक्टिविटीज का सदस्य बन गया।

2010 तक अग गली माली सरकार के लिए बंधक वार्ताकार (hostage negotiator) के तौर पर काम करता रहा। इस दौरान उसने AQIM (अल-कायदा इन द इस्लामिक मघरेब) के कई नेताओं से नजदीकी संबंध बना लिए। बाद में AQIM के कुछ लोगों ने उसे अंसार अल-दीन नाम का संगठन बनाने के लिए कहा ताकि AQIM उत्तरी माली में अपनी गतिविधियाँ बढ़ा सके। 25 फरवरी 2013 को UN ने अग गाली को प्रतिबंधित सूची में डाला। अमेरिका ने भी उसे वैश्विक आतंकी घोषित कर दिया था। कभी रॉक म्यूजिक का शौकीन रहे गली अब कट्टर इस्लामी नेता बन चुका है और उसने अपने कब्जे वाले इलाकों में संगीत पर प्रतिबंध लगा दिया है।

इयाद अग गली (फोटो: AFP)

इयाद अग गली ने अमादू कूफा के साथ मिलकर JNIM बनाया था। अमादू कूफा अब JNIM का डिप्टी है। माली के निआफुंके इलाके में जन्मे अमादू कूफा ने 2015 में FLM बनाया था और बाद में JNIM में शामिल हो गया। JNIM बनने के बाद से कूफा के FLM गुट ने सबसे अधिक हिंसक घटनाएँ की हैं और इनके हाथों सबसे ज्यादा लोगों की मौतें हुई हैं। इसका गुट दूसरे गुटों की तुलना में अधिक आम नागरिकों को निशाना बनाता है। 4 फरवरी 2020 को UN ने कूफा का नाम आईएसआईएल (दाएश) और अल-कायदा से जुड़े प्रतिबंधित लोगों की सूची में शामिल किया था।

अमादू कूफा (JNIM का डिप्टी)

आस्ट्रेलिया की राष्ट्रीय सुरक्षा की वेबसाइट के मुताबिक, JNIM के करीब 2000 लड़ाके माली के मध्य और उत्तरी इलाकों में सक्रिय हैं। यह संगठन स्थानीय लोगों से जुड़ने की कोशिश करता है और उन समुदायों की नाराजगी का फायदा उठाता है जो खुद को हाशिए पर या उपेक्षित महसूस करते हैं। यह संगठन खुद को पश्चिम अफ्रीकी सरकारों के विकल्प के तौर पर पेश करता है।

JNIM अपनी फंडिंग के लिए फिरौती के लिए अपहरण, जबरन वसूली और टैक्स (जैसे जकात) वसूलने जैसे तरीकों का इस्तेमाल करता है। बताया जाता है कि JNIM उन तस्करों और अपराधियों से भी टैक्स वसूलता है जो इसके कब्जे वाले इलाकों से गुजरते हैं। इसके अलावा, JNIM ने हथियार भी उन सैन्य ठिकानों और स्थानीय सशस्त्र समूहों से हासिल किए हैं, जिन पर उसने हमला किया था।

JNIM द्वारा किए गए आतंकी हमले (फोटो: Australian National Security)

माली में हिंसा की शुरुआत

कभी अपेक्षाकृत शांत देश माने जाने वाला माली 2011 के आखिर से लगातार बढ़ती हिंसा और आतंकी हमलों की चपेट में है। हालात इतने बिगड़े कि देश दो अलग-अलग लेकिन आपस में जुड़े संघर्षों में उलझ गया, इसमें एक तरफ थे तुआरेग अलगाववादी तो वहीं दूसरी तरफ थे अल-कायदा से जुड़े इस्लामिक आतंकी संगठन। नवंबर 2011 में लीबिया के तानाशाह मुअम्मर गद्दाफी के लिए लड़ चुके तुआरेग योद्धा हथियारों के साथ माली लौटे और ‘मूवमेंट फॉर द लिबरेशन ऑफ अजावाद’ (MNLA) नाम का संगठन बनाया। उनका मकसद था ‘अजावाद’ नाम का अलग तुआरेग देश बनाना। यह माली में नए और हिंसक दौर की शुरुआत थी।

2012 में राष्ट्रपति अमादू तौमानी तुरे को सेना ने तख्तापलट में हटा दिया, जिससे देश में सत्ता का खालीपन पैदा हुआ। इसी मौके का फायदा उठाकर तुआरेग विद्रोहियों ने सरकार के खिलाफ हथियार उठा लिए। इसी समय अल-कायदा से जुड़े दूसरे संगठन MUJAO और अंसार दिने भी अपनी खुद की इस्लामी शासन व्यवस्था लागू करने की माँग को लेकर हिंसा फैला रहे थे। शुरुआत में तुआरेग और इस्लामिक गुटों ने मिलकर सरकार के खिलाफ लड़ाई लड़ी लेकिन बाद में दोनों के रास्ते अलग हो गए।

वजह साफ नहीं थी लेकिन माना जाता है कि MNLA का सेक्युलर रुख और इस्लामी गुटों द्वारा आम लोगों पर बढ़ती हिंसा इसका कारण बना। जब दोनों के बीच झड़पें बढ़ीं, तो उत्तरी माली के बड़े हिस्सों पर इस्लामिक गुटों का नियंत्रण हो गया। माली की सेना के पास विद्रोहियों से मुकाबले के लिए पर्याप्त हथियार नहीं थे। हालात संभालने के लिए माली सरकार ने फ्रांस से मदद माँगी। 2013 में फ्रांस ने सैन्य कार्रवाई कर गाओ, किदाल और टिंबकटू जैसे इलाकों से आतंकियों को खदेड़ दिया लेकिन उन्हें पूरी तरह खत्म नहीं कर सका।

स्थिति सामान्य करने के लिए चुनाव कराए गए और 2015 की शुरुआत में शांति समझौता भी हुआ लेकिन आतंकी हमले रुक नहीं पाए। आज भी माली की सरकार कमजोर है और अब तो कई विशेषज्ञय दावा कर रहे हैं कि अल-कायदा से जुड़ा JNIM इस पर कब्जा करने के लिए तैयार बैठा है।

क्या JNIM का होगा माली पर कब्जा?

अलग-अलग मीडिया रिपोर्ट्स में JNIM के माली पर कब्जा करने से जुड़े दावे किए जा रहे हैं। द टेलीग्राफ से लेकर वॉशिंगटन पोस्ट जैसे अखबारों ने भी इस विषय पर विस्तार से लिखा है। द टेलीग्राफ की एक रिपोर्ट बताती है कि JNIM अब राजधानी बमाको तक अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। आतंकियों ने ईंधन की सप्लाई रोक दी है और शहरों की नाकेबंदी कर दी है। इससे डर बढ़ गया है कि कहीं माली अल-कायदा के सीधे शासन वाला पहला देश न बन जाए।

बीते कुछ हफ्तों से JNIM ने राजधानी बमाको की ओर जाने वाले ईंधन काफिलों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। माली की सेना, जो 2021 के तख्तापलट के बाद से सत्ता में है, अब तक इस संकट को काबू में नहीं कर पाई है। स्कूल बंद कर दिए गए हैं, पेट्रोल पंप सूख चुके हैं और राजधानी की सड़कों पर लंबी लाइनें लग रही हैं।

माली की सेना-नेतृत्व वाली सरकार पहले से ही अंतरराष्ट्रीय दबाव और आंतरिक अस्थिरता से जूझ रही है। संयुक्त राष्ट्र, फ्रांस और अमेरिका के सैनिक पहले ही देश छोड़ चुके हैं। अब रूस और तुर्की ही माली की मुख्य सुरक्षा ताकत हैं। लेकिन हालात यह संकेत दे रहे हैं कि देश धीरे-धीरे एक और बड़े संकट की ओर बढ़ रहा है। जहाँ आतंकवादी न सिर्फ हथियारों से बल्कि ईंधन और अर्थव्यवस्था पर पकड़ बनाकर पूरे माली को अपने कब्जे में लेने की कोशिश कर रहे हैं।


Ground Report: सीमांचल में PM मोदी की रैली के लिए सड़कों पर उतरी भीड़, GenZ से लेकर 90 साल के बुजुर्ग तक उमड़े

बिहार चुनाव के दूसरे चरण में ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट टीम सीमांचल पहुँची। कटिहार में पीएम मोदी की रैली में इतनी भारी भीड़ उमड़ी कि पंडाल फुल होने के बाद लोग सड़कों पर खड़े होकर भाषण सुनते रहे। जेन-जेड युवा से लेकर 90 साल के बुजुर्ग तक सब मौजूद रहे।

पीएम मोदी की रैली में शामिल होने के बाद एक बुजुर्ग बोले, “मोदी जी 100 साल जियो, हम आपके साथ हैं।” रिपोर्टर अनुराग मिश्रा ने कैमरे पर कैद किया कि बाहर के लोग स्पीकर से जुड़े, तालियाँ बजाते रहे।

रैली में नीतीश कुमार और मोदी के साथ चिराग पासवान के समर्थक जोर-शोर से नजर आए। कई युवाओं ने चिराग को अगला सीएम बताते हुए नारे लगाए। एक समर्थक ने कहा, “चिराग भैया युवा हैं, बिहार को नई दिशा देंगे। एनडीए में चिराग का रोल बड़ा होगा।”

मुस्लिम बहुल इलाके में भी पीएम मोदी की तारीफ दिखी। यहाँ एमवाई समीकरण टूटता दिखा। दूसरे चरण की सीटों पर माहौल गरम है। कटिहार, पूर्णिया, अररिया, किशनगंज में एनडीए लहर साफ दिखती है।

क्या हैं दूसरे चरण की सीटों के हाल, देखिए ग्राउंड रिपोर्ट में

‘वंदे मातरम्’ ने जगाई क्रांति की ज्वाला, लेकिन राष्ट्रगान बनने के आड़े आ गए जवाहरलाल नेहरू: जानें- बंकिम चंद्र चटर्जी की मूल रचना को कॉन्ग्रेस ने क्यों किया छोटा

भारत के राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ की रचना के 150 वर्ष पूरे हो चुके हैं। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय (बंकिमचंद्र चटर्जी) की यह अमर रचना उस युग की पुकार थी, जब हर भारतीय के हृदय में स्वतंत्रता का सपना पल रहा था। इस गीत ने क्रांति की ज्वाला भड़काई, राष्ट्रभक्ति को स्वर दिया और माँ भारती के चरणों में असीम श्रद्धा अर्पित की। अंग्रेजी हुकूमत के दौर में यह स्वर साहस का प्रतीक बना और आज भी ‘वंदे मातरम्’ हर भारतीय के हृदय में मातृभूमि के प्रति प्रेम का अमर गीत बन गूँजता है।

वंदे मातरम्: राष्ट्रभक्ति का अमर स्वर

‘वंदे मातरम्’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत की आत्मा की धड़कन है। वंदे मातरम् की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। यह पहली बार 7 नवंबर 1875 को उनकी साहित्यिक पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में प्रकाशित हुआ था। बाद में इसे उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ (1882) में शामिल किया गया। इस उपन्यास ने न केवल भारतीय साहित्य में नया युग प्रारंभ किया बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना को भी जन्म दिया।

अंग्रेजों के लिए भय का प्रतीक

1905 में जब स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत हुई, तब ‘वंदे मातरम्’ उसका युद्धघोष बन गया। कोलकाता में ‘बंदे मातरम् संप्रदाय’ की स्थापना हुई, जिसके सदस्य मातृभूमि को देवी स्वरूप मानकर हर रविवार प्रभात फेरी में यह गीत गाते थे। इस आंदोलन में रवींद्रनाथ टैगोर, बिपिन चंद्र पाल, और अरविंदो घोष जैसे महान नेता शामिल हुए।

(फोटो साभार: फ्रीपिक)

1906 में ‘वंदे मातरम्’ नामक अखबार की शुरुआत हुई जिसने देश में आत्मनिर्भरता, एकता और स्वतंत्रता का संदेश फैलाया। ब्रिटिश शासन इस गीत से इतना भयभीत था कि उसने इसे स्कूलों में गाने पर प्रतिबंध लगा दिया। छात्रों को सजा दी गई, लेकिन गीत की गूंज को कोई दबा न सका।

विदेश में पहली बार फहराया गया ‘वंदे मातरम्’ वाला तिरंगा

1907 में मैडम भीकाजी कामा ने जर्मनी के स्टटगार्ट में भारत का पहला तिरंगा फहराया, जिस पर ‘वंदे मातरम्’ अंकित था। यह उस युग का वह क्षण था जब यह गीत भारत की सीमाओं से बाहर भी स्वतंत्रता का प्रतीक बन गया।

भारत की स्वतंत्रता के बाद, 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा में पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि ‘वंदे मातरम्’ को ‘जन गण मन’ के समान ही सम्मान और दर्जा प्राप्त होगा। यह राष्ट्र के लिए उस गीत के योगदान की आधिकारिक मान्यता थी।

कभी ‘इस्लाम विरोधी’ तो कभी ‘सेकुलरिज्म’ के नाम पर अस्वीकार करते आ रहे मुस्लिम

जब यह गीत स्वतंत्रता की पहचान बन रहा था, 1908 में मुस्लिम लीग ने इसके विरोध की शुरुआत की। अमृतसर अधिवेशन में सैयद अली इमाम ने कहा कि यह गीत इस्लाम विरोधी है, क्योंकि इसमें मातृभूमि की तुलना देवी-देवताओं से की गई है। बाद में खिलाफत आंदोलन के दौरान यह भावना और गहरी होती गई।

इस विरोध के बीच, 1937 में कॉन्ग्रेस ने जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति बनाई, जिसमें मौलाना अबुल कलाम आजाद भी शामिल थे। आजाद ने गीत का अध्ययन किया और निष्कर्ष दिया कि इसके शुरुआती दो पद केवल मातृभूमि की वंदना करते हैं और इनमें किसी मजहबी भावना का विरोध नहीं है। नतीजतन, कॉन्ग्रेस कार्यसमिति ने निर्णय लिया कि राष्ट्रगीत के रूप में केवल दो ही पद स्वीकार किए जाएँ।

नेहरू की अध्यक्षता में कॉन्ग्रेस ने संक्षिप्त संस्करण अपनाने का फैसला किया था, जिसमें से जानबूझकर माँ दुर्गा की स्तुति करने वाले छंद हटा दिए गए थे। ऐसा करते हुए कॉन्ग्रेस ने अपने सांप्रदायिक एजेंडे के लिए फैजपुर अधिवेशन में वंदे मातरम् के छोटे स्वरूप को अपनाया।

कॉन्ग्रेस कार्यसमिति से जुड़े मिनट्स में फैसले का जिक्र

जवाहर लाल नेहरू ने अली सरदार जफरी को पत्र लिखा था। उसमें उन्होंने लिखा था, “मैं समझता हूँ कि पूरा गाना किसी को ठेस पहुँचाने वाला नहीं है। लेकिन मैं ये भी सोचता हूँ कि ये गाना राष्ट्रगान के ‘लायक’ नहीं है। इसके कुछ शब्द लोगों को समझ में नहीं आएँगे। क्योंकि इसमें व्यक्त भावनाएँ आज के राष्ट्रवाद के अनुकूल नहीं है। हमें आसान शब्दों वाले दूसरे राष्ट्रगान की तलाश करनी चाहिए।”

अली सरदार जफरी को लिखे पत्र में नेहरू का वंदे मातरम् के प्रति स्टैंड

यही नहीं, नेताजी सुभाष चंद्र बोस को लिखे नेहरू की 1937 की चिट्ठी में भी इस मुद्दे को लेकर सफाई दी गई है। चिट्ठी में नेहरू ने कथित तौर पर कहा था कि वंदे मातरम के बैकग्राउंड से मुस्लिमों को नाराज कर सकती है। एक सितंबर 1937 को लिखी इस चिट्ठी में नेहरू ने कटुता से लिखा कि ‘वंदे मातरम’ के शब्दों को किसी देवी से जोड़कर देखना बेतुका है। उन्होंने व्यंग्यपूर्ण ढंग से यह भी कहा कि ‘वंदे मातरम’ राष्ट्रीय गान के रूप में उपयुक्त नहीं है। 20 अक्टूबर 1937 को भी नेहरू ने नेताजी बोस को पत्र लिखकर दावा किया कि ‘वंदे मातरम’ की पृष्ठभूमि मुस्लिमों को नाराज कर सकती है।

नेहरु के पत्र में वंदे मातरम् को लेकर उनके विचार

फिर भी, मोहम्मद अली जिन्ना ने 1938 में The New Times of Lahore में वंदे मातरम् का विरोध करते हुए लिखा कि मुस्लिम किसी भी रूप में इस गीत को स्वीकार नहीं कर सकते। धीरे-धीरे यह विरोध धार्मिक से राजनीतिक रंग में बदल गया और देश विभाजन तक पहुँच गया।

आज भी समय के साथ नाम और बहाने बदल गए हैं, लेकिन मानसिकता वही है। कभी इसे इस्लाम विरोधी कहा जाता है, तो कभी सेकुलरिज्म के नाम पर अस्वीकार किया जाता है। बिहार विधानसभा में ओवैसी की पार्टी के विधायकों ने वंदे मातरम् गाने से इनकार किया, तो समाजवादी पार्टी के सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने संसद में इसे ‘इस्लाम के खिलाफ’ बताया।

बर्क का यह रवैया नया नहीं था, 1997, 2013 और 2019 में भी उन्होंने यही तर्क दोहराया। इसी तरह राजद नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी ने कहा, “जो एकेश्वर में विश्वास रखता है, वह वंदे मातरम् नहीं गा सकता।”

यह सोच केवल राजनीति तक सीमित नहीं रही। 2019 में देवबंद के मदरसे जामिया हुसैनिया के मुफ्ती तारिक कासमी ने आदेश जारी कर वंदे मातरम् और भारत माता की जय बोलने पर पाबंदी लगा दी, यह कहते हुए कि ‘इस्लाम में केवल अल्लाह की इबादत होती है।”

वंदे मातरम्: एक स्वर जो आज भी भारत की माटी से गूँजता है और हर बार कहता है ‘माँ, तुझे प्रणाम’

वंदे मातरम् किसी धर्म, मजहब या राजनीति का विषय नहीं, यह भारत की आत्मा की आवाज है। यह वह गीत है जिसने गुलामी की बेड़ियों में जकड़े लोगों को आजादी का सपना दिया। इसे गाना किसी पूजा का नहीं, बल्कि देश की मिट्टी के प्रति सम्मान का प्रतीक है।

150 वर्षों के बाद भी ‘वंदे मातरम्’ उतना ही प्रासंगिक है जितना स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में था। यह हर भारतीय के हृदय में गर्व, प्रेम और देशभक्ति की भावना जगाता है। यह गीत हमें याद दिलाता है कि हमारी मातृभूमि के प्रति समर्पण ही सच्चा राष्ट्रधर्म है।

‘हर इंडियन को US से भगाओ’: US में भारतीयों-हिंदुओं के खिलाफ आग उगलने वाले मैट फोर्नी से मीडिया हाउस ने जोड़े हाथ, जहरीले पोस्ट देख नौकरी से निकाला

अमेरिका में हिंदू और भारतीयों के प्रति जहर उगलने वाले मैट फोर्नी ने बुधवार (5 नवंबर 2025) को सोशल मीडिया पर दावा किया था कि वह टेक्सास स्थित मीडिया आउटलेट ‘द ब्लेज़’ में बतौर रिपोर्टर शामिल हो रहा है। लेकिन (7 नवंबर 2025) को उसी फोर्नी ने खुद बताया कि उसे ‘द ब्लेज़’ ने निकाल दिया है।

यह वही व्यक्ति है जिसने बार-बार भारतीयों और हिंदू संस्कृति के खिलाफ नफरत भरी टिप्पणियाँ की हैं, कभी दिवाली का मजाक उड़ाया, तो कभी हर भारतीय को देश से ‘निर्वासित’ करने की माँग की। ऐसे में ‘द ब्लेज़’ द्वारा उसे मौका देना और फिर तुरंत हटाना, इस बात का प्रमाण है कि उसकी जहरीली विचारधारा न सिर्फ समाज के लिए, बल्कि मीडिया संस्थानों की साख के लिए भी खतरा बन चुकी है।

कौन है मैट फोर्नी और उसे भारतीयों से क्या है दिक्कत

मैट फोर्नी खुद को लेखक और पत्रकार कहता है, लेकिन उसकी लिखावट और बयानबाजी किसी पत्रकारिता से नहीं, बल्कि नफरत से भरी विचारधारा से निकलती है। उसका अतीत विवादों से भरा है, महिलाओं को लेकर अपमानजनक लेख लिखना, अश्लील किताबें प्रकाशित करना और अब भारतीयों के खिलाफ नस्लभेदी बातें फैलाना, ये उसका ‘कॅरियर प्रोफाइल’ है।

पिछले कुछ महीनों में उसने सोशल मीडिया पर लगातार भारत, हिंदुओं और भारतीय प्रवासियों को निशाना बनाया। उसने न सिर्फ भारत की आलोचना की, बल्कि भारतीयों के प्रति गहरी नफरत जाहिर करते हुए ट्वीट किया “DEI means Deport every Indian” यानी विविधता (Diversity), समानता (Equity) और समावेश (Inclusion) जैसे सकारात्मक शब्दों को भी उसने नफरत के हथियार में बदल दिया।

ऐसा लगता है कि भारत के विकास, तकनीकी बढ़त और वैश्विक स्तर पर बढ़ते प्रभाव से मैट फोर्नी जैसे लोगों की नींद उड़ गई है। पश्चिम में बैठे कुछ कट्टरपंथी अब यह बर्दाश्त नहीं कर पा रहे कि भारतवासी सिर्फ आउटसोर्सिंग मजदूर नहीं, बल्कि विश्व राजनीति और तकनीक के नेतृत्वकर्ता बन रहे हैं।

द ब्लेज ने नफरत को पत्रकारिता में बदल दिया

असली सवाल ये है की अगर कोई व्यक्ति खुलेआम भारतीयों के निर्वासन की बात करता है, तो कोई मीडिया संगठन उसे ‘भारतीय मामलों का रिपोर्टर’ क्यों बनाता है? यही हुआ द ब्लेज के साथ, जो खुद को एक रूढ़िवादी मीडिया संगठन बताता है।

फोर्नी ने हाल ही में दावा किया कि उसे द ब्लेज में भारत से संबंधित रिपोर्टिंग का काम मिला है। लेकिन विडंबना यह रही कि जैसे ही उसने झूठ फैलाना शुरू किया भारत ने पाकिस्तान पर हमला किया जैसे फेक ट्वीट किए, उसे तुरंत ही Community Notes ने झूठा करार दे दिया। यानी जिसे भारतीय मुद्दों की समझ सिखानी थी, वह खुद बुनियादी तथ्यों से अनजान निकला।

इस घटना ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि पश्चिमी मीडिया अपने पत्रकारों की भर्ती में किस नैतिक स्तर तक गिर चुका है। जो व्यक्ति भारत के लोगों से नफरत करता है, वह भारतीय समाज पर रिपोर्टिंग कैसे कर सकता है? क्या पश्चिमी मीडिया अब ‘हिंदूफोबिया’ को भी ‘स्वतंत्र अभिव्यक्ति’ के नाम पर बेचने लगा है?

हिंदू विरोध की नई परंपरा: मजाक, झूठ और नस्लवाद

मैट फोर्नी के कई पुराने ट्वीट देखें तो पता चलता है कि उसका एजेंडा सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक नफरत से भरा है। उसने हिंदुओं के त्योहारों, खासकर दीवाली का मजाक उड़ाया, यहाँ तक कहा कि भारतीयों के कारण अमेरिका की IT कंपनियों का स्तर गिर गया है।

उसने कई बार यह भी इशारा किया कि भारतीय अमेरिकी नागरिक अमेरिकी नौकरियाँ छीन रहे हैं, जो वही पुरानी नस्लवादी सोच है जो कभी अश्वेतों और अब एशियाई लोगों पर थोप दी जाती है। यानी फोर्नी के लिए भारतीय सिर्फ एक समस्या हैं, चाहे वे डॉक्टर हों, इंजीनियर हों या शिक्षक।

पश्चिमी मीडिया का दोहरा चेहरा

पश्चिमी मीडिया अक्सर भारत को असहिष्णु देश बताने में सबसे आगे रहता है। लेकिन यही मीडिया तब खामोश हो जाता है जब उनके अपने पत्रकार हिंदुओं और भारतीयों के खिलाफ खुलेआम नफरत फैलाते हैं।

भारत में अगर कोई छोटा बयान भी किसी समुदाय के खिलाफ चला जाए, तो उसे तुरंत ‘hate speech’ बता दिया जाता है। मगर जब अमेरिका में कोई पत्रकार पूरे समुदाय के निर्वासन की बात करता है, तो वही बात ‘freedom of expression’ कहलाती है। यही है पश्चिमी उदारवाद का असली चेहरा दोहरे मानदंडों से भरा हुआ।

‘स्वतंत्र भाषण’ के नाम पर नफरत की आजादी

फोर्नी जैसे लोग ‘free speech’ का झंडा उठाते हैं, लेकिन इस झंडे के नीचे वे सिर्फ एक धर्म और एक समुदाय हिंदुओं पर वार करते हैं। वे जानते हैं कि हिंदू समाज शांतिप्रिय है, जवाब में हिंसा नहीं करेगा, इसलिए ये लोग हिंदू धर्म को निशाना बनाकर अपनी साहसिक पत्रकारिता का तमगा कमाते हैं।

लेकिन अगर यही बातें किसी और धर्म के खिलाफ कही जातीं, तो शायद फोर्नी अब तक अमेरिकी न्याय विभाग की जाँच का सामना कर रहा होता। यह दिखाता है कि अमेरिका और यूरोप में हिंदूफोबिया न केवल सामान्य है, बल्कि कई जगहों पर ‘acceptable hate’ बन चुका है।

भारतीयों के विकास से बौखलाहट

पिछले दशक में भारत का जो वैश्विक प्रभाव बढ़ा है, तकनीकी आर्थिक और रणनीतिक स्तर पर उसने कई पश्चिमी बुद्धिजीवियों की नींद उड़ा दी है। अमेरिका में भारतीय मूल के सीईओ, प्रोफेसर, वैज्ञानिक और राजनयिक अब शक्ति के केंद्रों में हैं।

फोर्नी जैसे लोग इस उभार को खतरा मानते हैं, क्योंकि यह उनकी पुरानी धारणाओं को तोड़ता है कि एशियाई सिर्फ आदेश पालन करने वाले लोग हैं। इसलिए वे भारत के खिलाफ डर फैलाने की कोशिश करते हैं कभी आईटी आउटसोर्सिंग का डर, कभी इमिग्रेशन का डर, कभी हिंदू राष्ट्रवाद का डर। असल में यह डर भारत की ताकत का प्रमाण है, क्योंकि जो देश कमजोर होता है, उसके खिलाफ कोई प्रचार नहीं करता।

सोशल मीडिया से सड़कों तक नफरत का असर

फोर्नी जैसे लोगों की नफरत सिर्फ ट्वीट तक सीमित नहीं रहती। अमेरिका और कनाडा में कई बार भारतीय मंदिरों पर हमले हुए, हिंदू विद्यार्थियों को कैंपस में अपमानित किया गया और ब्राह्मण कहकर निशाना बनाया गया।

यह माहौल सोशल मीडिया से बनता है, जब एक पत्रकार भारत के खिलाफ खुलेआम गालियाँ देता है, तो आम लोग उसी नफरत को सही ठहराने लगते हैं। इसलिए यह केवल ऑनलाइन ट्रोलिंग नहीं, बल्कि हिंसा की वैचारिक तैयारी है।

क्या यही है भारत पर रिपोर्टिंग?

फोर्नी जैसे व्यक्ति को भारत पर रिपोर्टिंग का जिम्मा देना वैसा ही है जैसे किसी नस्लभेदी को अफ्रीकी देशों पर रिपोर्टिंग का काम सौंपना। यह पश्चिमी मीडिया के नैतिक पतन का प्रतीक है।

जो व्यक्ति कहता है कि हर भारतीय को देश से बाहर निकालो, वह भारत के समाज, संस्कृति और राजनीति को निष्पक्ष नजर से कैसे देख सकता है? उसकी कलम पहले से ही जहर में डूबी है।