सुप्रीम कोर्ट ने 07 नवंबर 2025 को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, खेल परिसर, बस अड्डे, रेलवे स्टेशन और सरकारी इमारतों से सभी आवारा कुत्तों को हटाएँ। कोर्ट ने कहा कि इन कुत्तों को ABC नियम 2023 के तहत नसबंदी और टीकाकरण के बाद निर्धारित शेल्टर होम में रखा जाए। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि इन कुत्तों को ‘जहाँ से पकड़ा गया है, उन्हें वहीं वापस नहीं छोड़ा जाएगा।’
यह आदेश सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने दिया, जिसमें जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया शामिल हैं। आदेश में सबसे पहले जिस मुद्दे पर चर्चा हुई वह था अनुपालन हलफनामें, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से दाखिल करने को कहा था लेकिन वे 27 अक्टूबर 2025 तक जमा नहीं कर पाए।
इस पर कोर्ट ने नाराजगी जताई और आदेश दिया कि सभी राज्यों के मुख्य सचिव 03 नवंबर 2025 को अगली सुनवाई में कोर्ट में उपस्थिथ रहने के आदेश दिए। इस आदेश के बाद न सिर्फ हलफनामे दाखिल किए गए बल्कि सभी अधिकारी भी कोर्ट में मौजूद हुए।
एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae) गौरव अग्रवाल ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के हलफनामों का सारांश तैयार किया, जिसमें कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की रिपोर्ट में गंभीर कमियाँ और गलतियाँ पाई गईं। कोर्ट ने नोटिस किया कि उनके आदेशों का या तो पालन नहीं किया गया या अधूरा किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे गौरव अग्रवाल की रिपोर्ट को ध्यान से पढ़ें और उसमें बताई गई कमियों को दूर करने के लिए जरूरी कदम उठाएँ।
कोर्ट ने यह भी कहा कि सभी राज्य अगली तारीख से पहले विस्तृत हलफनामा दाखिल करें, जिसमें यह बताया जाए कि उन्होंने कोर्ट के आदेशों का पालन करने के लिए क्या-क्या सुधारात्मक कदम उठाए हैं। कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि अग किसी ने इस मामले में लापरवाही बरती तो उसे गंभीरता से लिया जाएगा।
हाईवे से जानवरों का हटाने का कोर्ट का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दूसरा मुद्दा उन निर्देशों से जुड़ा बताया जो राजस्थान हाई कोर्ट की जोधपुर बेंच ने राज्य सरकार को दिए थे। इन निर्देशों में कहा गया था कि राज्य की सभी सड़कों और हाईवे से पशुओं और मवेशियों को हटाया जाए ताकि उनके कारण होने वाले सड़क हादसों को रोका जा सके। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह के हादसे अब देशभर में बहुत आम हो गए हैं और इनसे कई लोगों की जान जा चुकी है, गंभीर चोटें आई हैं और संपत्ति को भी नुकसान पहुँचा है। कोर्ट ने कहा कि यह स्थिति इस बात का संकेत है कि जन सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाले प्रशासनिक अधिकारी अपना काम सही तरीके से नहीं कर रहे हैं।
कोर्ट ने कहा कि नेशनल हाईवे , नेशनल एक्सप्रेसवे और स्टेट हाईवे पर पशुओं और आवारा जानवरों की अनियंत्रित मौजूदगी बहुत गंभीर खतरा है। खासकर रात के समय या तेज गति वाले क्षेत्रों यह समस्या ज्यादा भयावह हो जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लेख करते हुए कहा कि यह अनुच्छेद जीवन और सुरक्षा का अधिकार सुनिश्चित करता है। इसलिए यह जरूरी है कि नगर निकाय, सड़क एवं परिवहन विभाग, लोक निर्माण विभाग और हाईवे अथॉरिटी जैसी संबंधित एजेंसियाँ तुरंत मिलकर कार्रवाई करें।
इसी के तहत सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाई कोर्ट के निर्देशों की पुष्टि की और उन्हें पूरे देश में लागू करने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि अब ये निर्देश सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के नगर निगमों, सड़क और परिवहन विभागों, लोक निर्माण विभागों और नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) पर भी लागू होंगे।

कोर्ट ने विशेष तौर पर कहा कि जानवरों को हाईवे से हटाने के लिए मवेशियों को गौशाला में, कुत्ते या अन्य जानवर को शेल्टर में ट्रांसफर किया जाए। इसके साथ ही जानवरों को जरूरत की अनुसार खाना, पानी और इलाज प्रदान किया जाए, जैसा कि PCA एक्ट 1960 और ABC नियम 2023 के प्रावधानों में शामिल है।
सड़क पर घूमने वाले पशुओं और मवेशियों से होने वाली परेशानियों को रोकने के लिए अब 24 घंटे और 7 दिन काम करने वाली खास टीमें बनाई जाएँगी। ये टीमें लगातार निगरानी रखेंगी और जैसे ही किसी सड़क पर आवारा जानवरों की सूचना मिलेगी या किसी दुर्घटना की खबर आएगी, तुरंत कार्रवाई करेंगी। सभी नेशनल हाईवे, नेशनल एक्सप्रेसवे और स्टेट हाईवे पर पुलिस, NHAI और जिला प्रशासन के कंट्रोल रूम से जुड़े हेल्पलाइन नंबर नियमित दूरी पर लगाए जाएँगे ताकि यात्री सड़क पर आवारा जानवर दिखने या जानवरों की वजह से हुई दुर्घटनाओं की तुरंत शिकायत कर सकें।
कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों, NHAI के चेयरपर्सन और सड़क परिवहन व हाईवे मंत्रालय को निर्देश दिया है कि वे इस आदेश की तारीख से 8 हफ्तों के भीतर एक रिपोर्ट दाखिल करें। इस रिपोर्ट में यह रिपोर्ट सड़कों से आवारा जानवरों को हटाने और उन्हें आश्रय देने की क्या व्यवस्था की गई है, गश्ती दल कैसे और कब काम कर रहे हैं और हेल्पलाइन नंबरों व संकेत बोर्डों की क्या स्थिति है।
स्कूल-कॉलेज जैसे संस्थान परिसरों से आवारा कुत्तों को हटाएँ
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का तीसरा और सबसे अहम हिस्सा कुत्तों को शिक्षण संस्थानों, अस्पतालों, खेल परिसरों, बस अड्डों, डिपो और रेलवे स्टेशनों से हटाने से जुड़ा था। कोर्ट ने कहा कि इन जगहों पर कुत्तों के काटने की घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। कोर्ट ने कहा, “स्कूलों, अस्पतालों और खेल स्थलों जैसे संस्थानों में ऐसी घटनाओं का बार-बार होना प्रशासन की लापरवाही और इन जगहों को खतरों से सुरक्षित रखने में पूरी व्यवस्था की नाकामी को दर्शाता है। इस स्थिति में न्यायिक दखल जरूरी है ताकि नागरिकों खासकर बच्चों, मरीजों और खिलाड़ियों के जीवन और सुरक्षा के मौलिक अधिकार की रक्षा की जा सके। जैसा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में दिया गया है।”
कोर्ट ने यह भी बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) जैसी संस्थाओं द्वारा किए गए वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया है कि भारत में हर साल जानवरों से जुड़ी मौतों का बड़ा हिस्सा रेबीज की वजह से होता है और इनमें से 90 प्रतिशत से अधिक मामले पालतू या आवारा कुत्तों के काटने से होते हैं।
कोर्ट ने कहा, “इस समस्या का सबसे अधिक असर बच्चों, बुज़ुर्गों और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों पर पड़ता है, जो पहले से ही असुरक्षित होते हैं और जिनके पास समय पर इलाज या टीके की सुविधा नहीं होती है।” इन समस्याओं के बारे में ऑपइंडिया ने भी आवारा कुत्तों पर लिखे आर्टिकल में लगातार जागरूक करने की कोशिश की है।
कोर्ट ने आगे कहा कि भले ही साल 2023 के ABC नियमों के तहत कुत्तों की आबादी पर नियंत्रण के लिए ‘पकड़ो-नसबंदी करो-टीका लगाओ छोड़ दो’ यानी CSVR मॉडल लागू किया गया है, लेकिन इसका सही तरह से अमल नहीं हो पा रहा है। नतीजा यह है कि आवारा कुत्तों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है और इससे ‘देश के कई हिस्सों में लोगों की सुरक्षा पर खतरा बना हुआ है।’

कोर्ट ने कई ऐसी घटनाओं का जिक्र किया जो मेनस्ट्रीम मीडिया में सामने आई थीं। इनमें वेल्स (Wales) देश के एक कारोबारी का मामला शामिल है, जिन्हें सुबह दौड़ते समय एक आवारा कुत्ते ने काट लिया था। केरल के वायनाड जिले के पनामारम इलाके में एक तीसरी कक्षा के छात्र को क्लासरूम के अंदर ही कुत्ते ने काट लिया। वहीं हरियाणा के हिसार जिले के सिसवाल गाँव के एक सरकारी प्राथमिक स्कूल में घुसे एक आवारा कुत्ते ने 6 बच्चों को काट लिया।
बेंगलुरु यूनिवर्सिटी परिसर के केंगेरी क्षेत्र में भी कई छात्रों को आवारा कुत्तों ने काटा। चेन्नई के आईएमएच किलपॉक (IMH Kilpauk) में कई मरीजों को आवारा कुत्तों ने काटा, जबकि कोच्चि के एर्नाकुलम जनरल हॉस्पिटल में पाँच लोगों पर कुत्ते ने हमला किया। ओडिशा के कटक में आचार्य हरिहर कैंसर इंस्टीट्यूट में भी मरीजों पर आवारा कुत्तों ने हमला किया। नागपुर के गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज और हॉस्पिटल में एक रेजिडेंट डॉक्टर पर कई आवारा कुत्तों ने हमला किया। लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी में दो डॉक्टरों, पैरामेडिकल स्टाफ और एक अटेंडेंट को आवारा कुत्ते ने काट लिया।
दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में 2025 की वर्ल्ड पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप के दौरान दो विदेशी कोचों को भी आवारा कुत्तों ने काट लिया। केरल के कन्नूर रेलवे स्टेशन पर 18 लोगों को, महाराष्ट्र के डोंबिवली रेलवे स्टेशन पर RPF अधिकारी समेत 9 लोगों को और केरल के अलप्पुझा रेलवे स्टेशन पर छह महीनों में 30 लोगों को आवारा कुत्तों ने काट लिया। उत्तर प्रदेश के संभल रेलवे स्टेशन पर 8 लोगों को एक रेबीज से ग्रस्त कुत्ते ने काटा। इसके अलावा केरल के कन्नूर बस स्टैंड पर 50 लोगों और कोट्टायम के KSRTC बस स्टैंड पर भी कई लोगों को आवारा कुत्तों ने काटा।
कोर्ट ने कहा कि आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या के पीछे कई वजहें हैं, इनमें नसबंदी कार्यक्रमों का ठीक से लागू न होना, खाने के कचरे का गलत तरीके से निपटान, संस्थानों के चारों ओर सुरक्षा घेराबंदी की कमी, विभागों के बीच तालमेल का न होना और लोगों में यह जागरूकता न होना कि कुत्ते के काटने से कैसे बचें और काटने के बाद क्या इलाज करें। इन सब कारणों से ही आवारा कुत्तों की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है।
कोर्ट ने कहा कि ABC नियमों, नगर निगम के उपनियमों, दिशा-निर्देशों और मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOPs) के बावजूद जमीनी स्तर पर इनके नतीजे संतोषजनक नहीं रहे हैं। कोर्ट ने यह भी बताया कि हर साल कुत्तों के काटने के मामलों का आँकड़ा बढ़ता जा रहा है। कोर्ट ने कहा, “यह समस्या लगातार बनी हुई है, इसलिए जरूरत है कि नगर निगमों, सार्वजनिक स्वास्थ्य विभागों और संस्थानों के प्रशासन के बीच मिलकर एक समग्र और समन्वित योजना बनाई जाए ताकि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार की रक्षा प्रशासन की लापरवाही या अक्षमता के कारण प्रभावित न हो।”

कोर्ट ने राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को दो हफ्तों का समय दिया है ताकि वे सभी सरकारी और निजी शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों, खेल परिसरों, बस अड्डों, डिपो और रेलवे स्टेशनों की पहचान कर सकें। इन संस्थानों के प्रशासनिक प्रमुखों को जिला मजिस्ट्रेट की निगरानी में स्थानीय या नगर निकाय अधिकारियों के साथ मिलकर इन जगहों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं। इसके लिए बाड़, दीवारें, गेट और अन्य संरचनात्मक या प्रशासनिक उपाय अपनाए जाएँ ताकि आवारा कुत्ते अंदर न आ सकें। यह पूरी प्रक्रिया जल्द से जल्द और संभव हो तो 8 हफ्तों के भीतर पूरी की जानी चाहिए।
इसके अलावा सभी शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों, खेल परिसरों, बस अड्डों, डिपो और रेलवे स्टेशनों के प्रबंधन को एक नोडल अधिकारी नियुक्त करने के निर्देश दिए गए हैं, जो परिसर की साफ-सफाई और रखरखाव का जिम्मेदार होगा और यह सुनिश्चित करेगा कि आवारा कुत्ते परिसर में प्रवेश न करें या वहाँ न रहें। इस अधिकारी का नाम और विवरण एंट्री गेट पर स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया जाना चाहिए।
हर तीन महीने में स्थानीय नगर निकाय और पंचायतों को ऐसे सभी परिसरों का निरीक्षण करना होगा ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वहाँ कोई आवारा कुत्ता नहीं है। कोर्ट ने कहा, “अगर इस संबंध में कोई लापरवाही पाई गई तो इसे गंभीरता से लिया जाएगा और जिम्मेदारी संबंधित नगर निकाय अधिकारियों या प्रशासनिक अधिकारियों पर तय की जाएगी।” कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि नगर निकाय की जिम्मेदारी है कि ऐसे सभी परिसरों में पाए जाने वाले आवारा कुत्तों को हटाकर उन्हें नसबंदी और टीकाकरण के बाद ABC नियम 2023 के अनुसार निर्धारित आश्रय स्थल पर भेजा जाए।
कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि पकड़े गए कुत्तों को उसी जगह वापस नहीं छोड़ा जाएगा, जहाँ से उन्हें पकड़ा गया था। कोर्ट ने कहा, “ऐसे आवारा कुत्तों को दोबारा उसी स्थान पर छोड़ना हमारी इस कार्रवाई के उद्देश्य को निष्फल कर देगा, जिसका मकसद इन संस्थागत परिसरों को आवारा कुत्तों की उपस्थिति से पूरी तरह मुक्त कराना है।”

इसके अलावा स्टेडियमों और खेल परिसरों के प्रबंधन को यह सुनिश्चित करने के लिए सुरक्षा कर्मी या ग्राउंड स्टाफ तैनात करने के निर्देश दिए गए हैं कि परिसर में कोई भी आवारा कुत्ता न हो। भारतीय पशु कल्याण बोर्ड को चार हफ्तों के भीतर एक विस्तृत मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) जारी करने के आदेश दिए गए हैं, जिसमें कुत्तों के काटने की घटनाओं की रोकथाम और संस्थागत परिसरों में आवारा कुत्तों के प्रबंधन के तरीके बताए जाएँ।
उल्लेखनीय है कि जब कोर्ट ने 07 नवंबर 2025 को यह आदेश सुनाया तब सुनवाई के दौरान कुछ NGO और खुद को ‘कुत्ता प्रेमी’ बताने वाले लोगों के वकीलों ने यह दलील दी कि अगर संस्थानों से कुत्तों को हटाया गया तो वहाँ खाली जगह बन जाएगी, जिससे नए कुत्ते वहाँ आने लगेंगे। लेकिन कोर्ट ने इस दलील पर ध्यान देने से साफ इनकार कर दिया।
J Mehta: Third directions relates to institutional areas…having regard to rising incidents of dog bites, this Court deems necessary to direct:
— Live Law (@LiveLawIndia) November 7, 2025
State govts/UTs within 2 weeks identify all govt institutions, including district hospitals, public sport complexes, railway…
इस आदेश के साथ कोर्ट ने मानव जीवन और सुरक्षा को प्राथमिकता देने की दिशा में एक बड़ा और निर्णायक कदम उठाया है। यह एक महत्वपूर्ण शुरुआत है लेकिन कोर्ट को अब इस बढ़ती हुई समस्या पर भी ध्यान देना होगा कि बंद सोसाइटियों, पार्कों और रिहायशी इलाकों में भी आवारा कुत्तों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, जहाँ बच्चे, बुज़ुर्ग और कमजोर लोग लगभग रोज हमलों का सामना कर रहे हैं।
इस आदेश को लेकर पशु कल्याण समूहों और खुद को ‘कुत्ता प्रेमी’ कहने वाले लोगों में चिंता देखी जा रही है। कुछ लोग 7 नवंबर 2025 के इस आदेश के खिलाफ अपील करने की तैयारी में हैं। उनका कहना है कि यह आदेश कुत्तों और दूसरे जानवरों जैसे मवेशियों के प्रति कठोर है क्योंकि अदालत ने उन्हें भी सड़कों और हाईवे से हटाने के निर्देश दिए हैं। आखिर में अब यह कोर्ट पर निर्भर करेगा कि वह जानवरों के प्रति करुणा और इंसानों के जीवन की सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाती है।
ऑपइंडिया आवारा कुत्तों की समस्या पर एक विशेष शृंखला चला रहा है, जिसे आप इस लिंक पर क्लिक कर देख सकते हैं।
(यह खबर मूलरूप से अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)


