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ईसाई मिशनरियाँ अब नहीं बदलवाती नाम, सरकारी योजनाओं-आरक्षण का लाभ लेने के लिए जारी रखते हैं पुरानी पहचान: पूर्वांचल में धर्मांतरण का सीक्रेट ट्रेंड, आशा वर्कर बन रही हथियार

पूर्वांचल के कई जिलों में धर्मांतरण का एक नया ट्रेंड सामने आया है। अब ईसाई मिशनरियाँ धर्म परिवर्तन कराने वालों से नाम या सरनेम बदलने को नहीं कह रही हैं। लोग अपनी पहचान, जाति और सरकारी दस्तावेज वही रखते हैं लेकिन धर्म बदल चुके होते हैं। ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि सरकारी योजनाओं, आरक्षण और अन्य सुविधाओं का लाभ पहले की तरह मिलता रहे और किसी को शक भी न हो।

धर्मांतरण का नया तरीका

जाँच में खुलासा हुआ है कि मिशनरियाँ अब सीधे तौर पर प्रचार नहीं कर रहीं, बल्कि स्थानीय लोगों के बीच रहकर गुप्त तरीके से धर्मांतरण करवा रही हैं। इसके लिए उन्होंने आशा कार्यकर्ताओं, स्थानीय महिलाओं और कुछ बिचौलियों को जोड़ रखा है।

अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, जौनपुर की एक आशा कार्यकर्ता ने खुद धर्म बदला है और अब दूसरों को भी जोड़ने का काम कर रही है। वह कहती है, “पहचान वही है, बस एक लॉकेट पहन लिया है जो कपड़ों के अंदर रहता है। नाम बदलने की कोई जरूरत नहीं, बस प्रभु का नाम दिल में रखो।”

आशा कार्यकर्ता ने कहा कि जौनपुर में सख्ती के कारण सब लोग वाराणसी जाते हैं। पिछली बार 10-11 लोग टेंपो से बनारस के भुल्लनपुर क्षेत्र में गए थे। वहाँ 250 से 300 लोग जुटे थे। इस रविवार को फिर जाना है।

इतना ही नहीं अब ‘चंगाई सभा’ (प्रार्थना सभा) का तरीका भी बदल गया है। पुलिस की सख्ती के बाद अब ये सभाएँ ऑनलाइन या मोबाइल के जरिए होती हैं। हर रविवार और शुक्रवार को मुंबई से वीडियो के माध्यम से नए-नए लोगों को जोड़ा जाता है।

पैसे और सहानुभूति से धर्मांतरण

जाँच में पता चला है कि गरीब, दलित और पिछड़े वर्गों को निशाना बनाया जा रहा है। मिशनरियाँ सीधे परिवारों को नहीं, बल्कि उनके बच्चों के जरिए प्रवेश करती हैं। शिक्षा, शादी या इलाज के नाम पर आर्थिक मदद देकर सहानुभूति हासिल की जाती है।

एक व्यक्ति का धर्म परिवर्तन करवाने पर 25 से 50 हजार रुपए तक का कमीशन तय होता है। धीरे-धीरे परिवार चर्च की सभाओं में शामिल होने लगता है और अंततः धर्मांतरण कर लेता है। जौनपुर के वीरेंद्र विश्वकर्मा ने बताया कि उनसे इलाज और शादी के बहाने धर्म परिवर्तन करवाया गया था।

वह अब अपने मूल धर्म में लौट चुके हैं। उनका कहना है कि हर गुरुवार को सुबह और शाम सभाएँ होती हैं, जहाँ लोगों को ‘यीशु के नाम का पानी’ पिलाया जाता है और नाम रजिस्टर में दर्ज किए जाते हैं।

पुलिस की सख्ती और मिशनरियों की नई रणनीति

जौनपुर पुलिस ने इस साल धर्मांतरण के चार केस दर्ज किए और कई लोगों को गिरफ्तार किया। एसपी डॉ कौस्तुभ का कहना है, “जहाँ भी लोभ-लालच देकर धर्मांतरण के मामले सामने आते हैं, वहाँ छापेमारी कर सख्त कार्रवाई की जाती है।”

हालाँकि पुलिस की सख्ती के बावजूद मिशनरियों ने अब और चालाकी अपनाई है। अब वे सरनेम नहीं बदलवातीं, ताकि सरकारी रिकॉर्ड में व्यक्ति हिंदू ही दिखाई दे और आरक्षण व सरकारी लाभ जारी रहे।

छत्तीसगढ़ में भी खुलासा

ऐसा ही पैटर्न छत्तीसगढ़ के कोरबा और जांजगीर जिलों में भी सामने आया था। वहाँ महिला प्रचारक (लेडी मिशनरी) अपनी असली पहचान छिपाकर चंगाई सभा के नाम पर महिलाओं और बच्चियों को धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित कर रही थीं।

वो पहले दोस्ती करतीं, फिर बीमारियों और परेशानियों से जूझ रही महिलाओं को प्रार्थना के जरिए मुक्ति का रास्ता बतातीं। जब महिलाएँ चर्च जाने लगतीं, तो वहाँ आवेदन भरवाकर हर रविवार ‘प्रभु की प्रार्थना’ का वादा लिया जाता। 90% महिलाएँ धीरे-धीरे ईसाई महजब अपनातीं, जबकि 10% तब लौट आतीं जब कोई लाभ नहीं दिखता।

पूर्वांचल से लेकर छत्तीसगढ़ तक, धर्मांतरण का तरीका अब बदल चुका है। अब न नाम बदले जा रहे हैं, न कपड़े या रूप-रंग बस आस्था बदली जा रही है। सरकारी दस्तावेजों में लोग हिंदू दिखते हैं, मगर दिल से किसी और धर्म के अनुयाई बन चुके होते हैं।

शशांकासन का नमाज से नहीं कोई लेना-देना, फिर भी पकड़े जाने पर ‘मजहबी टीचर’ देते हैं एक ही तर्क: जानिए ‘सजदा’ और ‘योग’ की मुद्राओं में कैसे है जमीन-आसमान का अंतर

अक्सर ऐसे मामले सामने आते हैं जहाँ स्कूलों में मुस्लिम शिक्षकों पर हिंदू छात्रों को योग की कक्षाओं के बहाने नमाज जैसी मुद्राएँ सिखाने के आरोप लगते हैं। अभिभावकों की शिकायत के बाद शिक्षक पकड़े जाते हैं, लेकिन हर बार बचाव में एक ही तर्क दिया जाता है, कि बच्चों से कराया जा रहा आसन तो केवल एक योगासन था।

हाल ही में ऐसा ही एक मामला सामने आया है। मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले के देवहारी गाँव के एक सरकारी स्कूल के शिक्षक जबूर अहमद पर हिंदू छात्रों को योग और सूर्य नमस्कार के दौरान नमाज के आसन सिखाने का गंभीर आरोप लगा। विवाद बढ़ने पर मुस्लिम टीचर को तुरंत सस्पेंड कर दिया गया और जाँच शुरू हो गई है।

आरोपित शिक्षक जबूर अहमद ने अपनी सफाई में कहा कि वह छात्रों को केवल ‘शशांकासन’ सिखा रहा था। उसका यह तर्क है कि इस आसन की मुद्रा नमाज जैसी दिख सकती है, पर यह शुद्ध रूप से योग है। आइए, जानते हैं कि आखिर नमाज और योग की मुद्राओं में क्या अंतर है और क्यों कुछ कट्टरपंथी लोग जानबूझकर इसी ‘भ्रम’ का सहारा लेते हैं?

शशांकासन और नमाज की मुद्रा में स्पष्ट अंतर

आरोपित शिक्षकों द्वारा बार-बार दिए जाने वाले ‘शशांकासन’ के तर्क की जाँच करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि नमाज की मुद्रा और इस योगासन की मुद्रा में कई बुनियादी अंतर हैं, जो किसी भी भ्रम की गुंजाइश को खत्म कर देते हैं। दोनों की प्रक्रिया और मुद्रा-विन्यास में स्पष्ट भिन्नता है।

नमाज की ‘सजदा’ मुद्रा

नमाज पढ़ने की प्रक्रिया में जो मुद्रा सबसे ज्यादा विवादित होती है, वह ‘सजदा’ है, जहाँ नमाजी अपना माथा जमीन पर टेकता है। इस मुद्रा में शरीर के अलग-अलग हिस्सों पर जोर पड़ता है और उनका विशिष्ट स्थान निर्धारित होता है। सजदे के दौरान, शरीर का संतुलन मुख्य रूप से पाँच बिंदुओं पर बना होता है। दोनों पैर की उंगलियाँ, दोनों घुटने, दोनों हथेलियाँ और माथा।

नमाज अदा करने की मुद्रा

इस मुद्रा में कोहनियों को जमीन से ऊपर उठा हुआ और शरीर से दूर रखा जाता है, ताकि बाँहों का निचला हिस्सा जमीन से न छू सके। वहीं, पैरों की स्थिति भी निर्धारित होती है। पैर की उँगलियाँ मुड़ी हुई होती हैं और जमीन पर लगी रहती हैं, जबकि टखने मुड़े हुए होते हैं और एड़ियाँ जमीन से ऊपर उठी रहती हैं।

शशांकासन (खरगोश मुद्रा)

शशांकासन एक लाभदायक योगासन है। इसका नाम संस्कृत शब्द ‘शशांक’ से आया है, जिसका अर्थ है ‘खरगोश’, क्योंकि इस मुद्रा में शरीर खरगोश जैसी आकृति बना लेता है। यह आसन आंतों के लिए बहुत लाभकारी है और कब्ज को दूर करने में मदद करता है। इसके अलावा, यह अस्थमा-मधुमेह-हृदय रोग में भी फायदेमंद माना जाता है, क्योंकि यह नस-नाड़ियों को शांत करता है।

शशांकासन (खरगोश मुद्रा) की तस्वीर

इस आसन को करने के लिए सबसे पहले पद्मासन (या वज्रासन) में बैठकर रीढ़ की हड्डी को सीधा रखना होता है। फिर दोनों घुटनों को दूर-दूर फैलाया जाता है। इसके बाद, दोनों बाँहें सिर के ऊपर उठाकर, साँस छोड़ते हुए और बाँहें सीधी रखते हुए, कमर से आगे की ओर झुकना होता है। इस मुद्रा में ठोड़ी और बाँहें फर्श पर टिकी होनी चाहिए। कुछ देर रुकने के बाद, साँस लेते हुए धीरे-धीरे वापस शुरुआती अवस्था में आ जाते हैं। इस प्रक्रिया को 3 से 5 बार दोहराया जा सकता है। हाथ और कोहनी की यह स्थिति, नमाज में कोहनी को ऊपर उठाने की आवश्यकता से पूरी तरह अलग है।

पुरानी घटनाएँ भी देती हैं गवाही

यह पहला अवसर नहीं है जब मुस्लिम शिक्षकों या कार्यक्रम आयोजकों पर योग और सूर्य नमस्कार की आड़ में हिंदू छात्रों को नमाज की मुद्राएँ सिखाने के गंभीर आरोप लगे हों। यह पैटर्न बार-बार सामने आया है, जो बताता है कि यह केवल एक स्थानीय भ्रम का मामला नहीं हो सकता।

ऐसी ही एक बड़ी घटना अप्रैल 2025 गुरु घासीदास सेंट्रल यूनिवर्सिटी (GGU) के NSS कैंप में सामने आई थी। वहाँ 155 हिंदू छात्रों ने यूनिवर्सिटी के स्टाफ (7 शिक्षकों और एक छात्र लीडर) पर उन्हें जबरन नमाज पढ़ने के लिए मजबूर करने का गंभीर आरोप लगाया।

छात्रों ने खुलकर दावा किया था कि उन्हें सुबह की ‘योगा क्लास’ में नमाज की मुद्राएँ दोहराने का सीधा आदेश दिया गया था और विरोध करने पर उन्हें अनुशासनात्मक कार्रवाई की धमकी दी गई थी। इस मामले में पुलिस ने कठोरता दिखाते हुए 8 लोगों के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज किया था।

योग का बहाना नहीं, फिर भी स्कूलों में हिंदू छात्रों से जबरन नमाज पढ़वाई

कई मामले ऐसे भी हैं, जहाँ मुस्लिम शिक्षकों पर हिंदू छात्रों को नमाज पढ़ने के लिए मजबूर करने के आरोप लगे हैं, भले ही इसके लिए सीधे तौर पर योग का बहाना न लिया गया हो। एक मामला यूपी के हाथरस से सामने आया था। इस मामले में आरोप लगे थे कि स्कूल में हिंदू छात्रों को कड़क 40 डिग्री तापमान में खड़ा करके उनसे नमाज अदा करवाई गई और उनसे फातिहा (इस्लामी दुआ) पढ़वाई गई।

इतना ही नहीं, हिंदू बच्चियों को कथित तौर पर बुर्का पहनाया गया और सभी छात्रों से जबरन ‘अल्ला-हु-अकबर’ के नारे भी लगवाए गए। इन गंभीर आरोपों के सामने आने के बाद इलाके में भारी विरोध प्रदर्शन हुआ था।

इसके अलावा, गुजरात के कर्णावती स्थित केलोरेक्स फ्यूचर स्कूल पर हिंदू अभिभावकों ने अपने बच्चों को नमाज पढ़ाने का आरोप लगाया था। मामला सामने आने पर हड़कंप मच गया और गुजरात सरकार ने तुरंत जाँच के आदेश दिए। सरकार ने यह सुनिश्चित करने के लिए सख्त कदम उठाए कि किसी भी स्कूल में बच्चों पर जबरन कोई धार्मिक गतिविधि न थोपी जाए।

ये मामले बुरहानपुर के ‘शशांकासन’ विवाद से अलग हैं, लेकिन ये सभी इस बात को रेखांकित करते हैं कि स्कूलों में हिंदू छात्रों को इस्लामी तौर-तरीके सिखाने की शिकायतें अब एक पैटर्न बन चुकी हैं, जिस पर सख्त कार्रवाई की आवश्यकता है।

‘गलतफहमी’ या बहाना?

शशांकासन और नमाज की मुद्रा की तुलना करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि दोनों में बुनियादी शारीरिक और प्रक्रियात्मक अंतर मौजूद हैं। खास तौर पर, शरीर के वजन का वितरण, कोहनी और हाथों की स्थिति में कोई समानता नहीं है। शशांकासन में वजन नितंबों पर होता है, जबकि नमाज में यह कई बिंदुओं (हथेली, घुटना, पैर की उंगलियाँ, माथा) पर बँटा होता है।

यह देखते हुए, आरोपित मुस्लिम शिक्षकों द्वारा बार-बार यह दावा करना कि छात्रों से कराई जा रही मुद्रा केवल एक योग ‘शशांकासन’ थी और यह ‘गलतफहमी’ का नतीजा है, पूरी तरह से संदेह के घेरे में आता है। दोनों मुद्राओं में इतना स्पष्ट अंतर होने के बावजूद, हर बार पकड़े जाने पर एक ही तर्क को दोहराना इस बात की ओर दृढ़ता से इशारा करता है कि यह किसी जानबूझकर दिए गए बहाने से कम नहीं है। यह लगता है कि यह तर्क आरोपों से बचने और अपने कृत्यों को योग जैसे सेक्युलर आवरण में छिपाने के लिए एक तैयार रणनीति का हिस्सा है।

21 साल की उम्र में परमवीर चक्र, बलिदान के बाद भी जिसकी दुश्मन करता है तारीफ: जानें अरुण खेत्रपाल की कहानी, जिसने आमने-सामने की लड़ाई में मार गिराए 10 अमेरिकी पैंटन टैंक

अरुण खेत्रपाल एक भारतीय सेना अधिकारी थे जिन्हें 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उनकी वीरता के लिए मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था। उनकी जीवनी पर बनी फिल्म इक्कीस अब सिनेमाघरों में आने के लिए तैयार है। 21 साल में अपना सर्वोच्च बलिदान देने वाले महानायक को देश याद कर रहा है।

सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल का जन्म 14 अक्टूबर 1950 में पुणे में हुआ था। उनका परिवार सेना से जुड़ा रहा है। वे ब्रिगेडियर एम.एल. खेत्रपाल और श्रीमती माहेश्वरी खेत्रपाल के दो पुत्रों में बड़े थे।

अरुण के परदादा सिख खालसा रेजिमेंट के हिस्से के रूप में अंग्रेजों की सेना में थे। उनके दादा प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश इंडियन आर्मी में थे। बड़े होते हुए अरुण ने अपने पिता से अपने परिवार की वीरता की कहानियाँ सुनी थी।

अरुण खेत्रपाल का परिवार (फोटो साभार- Honourpoint)

अरुण ने हिमाचल प्रदेश के कसौली की पहाड़ियों में स्थित लॉरेंस स्कूल, सनावर से अपनी स्कूली शिक्षा प्राप्त की। वे पढ़ाई और खेल दोनों में ही तेज थे। उन्होंने स्कूल के आदर्श वाक्य ‘कभी हार न मानो’ को अपने जीवन में आत्मसात कर लिया था। बचपन से ही मजबूत इच्छाशक्ति वाले अरुण के व्यक्तित्व की गूँज युद्ध के मैदान में भी दिखाई दी।

अरुण खेत्रपाल के सेना में शामिल होने की कहानी

अरुण ने अपने पिता और दादा-परदादा की तरह सेना में भर्ती होकर अपने बचपन के सपने को साकार किया। जून 1967 में उन्होंने राष्ट्रीय रक्षा अकादमी यानी एनडीए ज्वाइन की। जहाँ वे फॉक्सट्रॉट स्क्वाड्रन के 38वें कोर्स में शामिल हुए। इस कोर्स के दौरान उनके नेतृत्व कौशल निखर कर सामने आए और वे उस बैच के स्क्वाड्रन कैडेट कैप्टन बने।

एनडीए से पास होने के बाद उन्होंने इंडियन मिलिट्री एकेडमी, देहरादून ज्वाइन किया।13 जून 1971 को भारतीय सेना में एक अधिकारी के रूप में खेत्रपाल को कमीशन मिला। इस दौरान उनके दोनों कँधों पर एक-एक स्टार लगाया गया। उन्हें बख्तरबंद कोर की 17वीं पूना हॉर्स रेजिमेंट में तैनात किया गया। अरुण अब एक घुड़सवार सेना इकाई में सेकंड लेफ्टिनेंट थे, जो अपने वीरतापूर्ण इतिहास और उपलब्धियों के लिए जानी जाती थी। पूना हॉर्स भारत की सबसे प्रतिष्ठित बख्तरबंद रेजिमेंटों में से एक थी और है।

युवा अधिकारी को कमीशन मिलने के छह महीने के भीतर ही भारतीय उपमहाद्वीप को युद्ध के साये ने घेर लिया। दिसंबर 1971 की शुरुआत में, पाकिस्तान के साथ दुश्मनी युद्ध में बदल गई। उस समय, अरुण अहमदनगर में युवा अधिकारियों के साथ प्रशिक्षण ले रहे थे, वहाँ से उन्हें अग्रिम मोर्चे पर भेज दिया गया।

वह जिस वक्त रेजिमेंट में शामिल हो गए, उससे कुछ दिन पहले ही उन्होंने अपना 21वाँ जन्मदिन मनाया था।

वह अपने गोल्फ क्लब साथ लेकर चलते थे, यह बात उनके लिए मशहूर है। जब उनसे पूछा गया कि क्या वह युद्ध के मैदान में गोल्फ खेलेंगे, तो उन्होंने कहा, “सर, मैं लाहौर में गोल्फ खेलने की योजना बना रहा हूँ। और मुझे यकीन है कि युद्ध जीतने के बाद वहाँ एक डिनर नाइट होगी, इसलिए मुझे ब्लू ड्रेस की भी जरूरत होगी।”

हल्के फुल्के मजाक में उन्होंने ये बात अपने दोस्त से कही थी। उस वक्त वो नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर अपनी ट्रेन का इंतजार कर रहे थे। स्टेशन पर उनकी माँ उन्हें विदा करने पहुँची थीं।

पहला युद्ध, अंतिम मोर्चा

जब 1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध छिड़ा तो पश्चिमी क्षेत्र में उनके ब्रिगेड की तैनाती हुई। वे 17 पूना हॉर्स के 47वीं इन्फैंट्री ब्रिगेड का हिस्सा थे, जिसे ‘ब्लैक एरो’ ब्रिगेड भी कहा जाता है। इसकी तैनाती सियालकोट के पास शकरगढ़ बल्ज में हुई। दिसंबर तक ब्रिगेड ने पाकिस्तानी क्षेत्र में बसंतर नदी पर पुलहेड स्थापित करने में सफल रहा।

अमेरिकी पैटन टैंकों से लैस पाकिस्तान के13वीं लांसर्स रेजिमेंट की बख्तरबंद सेना ने पुल को ध्वस्त करने के मकसद से हमला कर दिया। जरपाल गाँव में भारत ने जो पुल बनाया था, उसके पास धुआँ उठ रहा था। पाकिस्तानियों की कोशिश थी कि इस पुल को नष्ट कर दिया जाए, ताकि भारतीय सेना का आगे बढ़ना रुक जाए।

जरपाल पर कब्जा जमाए पूना हॉर्स स्क्वाड्रन उस वक्त भारी दबाव में था और उसने तत्काल अतिरिक्त सहायता की माँग की। जब लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल ने रेडियो पर संकट की सूचना सुनी, तो उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के युद्धग्रस्त स्क्वाड्रन को मज़बूत करने के लिए अपने टैंकों की टुकड़ी के साथ आगे बढ़ने की पेशकश की। हालाँकि उस वक्त वे रिज़र्व अधिकारी थे। अरुण ने अपने सेंचुरियन MK7 टैंक से युद्ध का नेतृत्व किया। इस टैंक का नाम रेजिमेंट ने बाद में फामागुस्टा रख दिया।

जैसे ही अरुण की छोटी टुकड़ी युद्ध में कूदी, बसंतर नदी पार करते समय वे दुश्मन की भारी गोलाबारी की चपेट में आ गए। पाकिस्तानी सैनिकों ने एंटी-टैंक गन और मशीन-गन बंकरों के साथ अपनी जगह बना ली थी, जो अभी भी मज़बूती से टिके हुए थे।

अरुण और उनके साथियों के लिए समय बहुत महत्वपूर्ण था। अगर पाकिस्तानी बख्तरबंद हमले को तुरंत नाकाम नहीं किया गया, तो भारतीय पुल का मुख्य द्वार ढह सकता था। अरुण बेहद साहस के साथ आगे बढ़े और दुश्मन के उन मज़बूत ठिकानों पर हमला करने का आदेश दिया, जो उनके रास्ते में बाधा बन रहे थे। उनके टैंक दहाड़ते हुए आगे बढ़े और पाकिस्तानी बंकरों पर धावा बोल दिया।

अरुण की छोटी-सी टुकड़ी ने दुश्मन की सुरक्षा को ध्वस्त कर दिया था। तोपों के ठिकानों को ध्वस्त कर दिया और यहाँ तक कि कुछ दुश्मन सैनिकों को भी पकड़ लिया। इन नज़दीकी मुठभेड़ों के दौरान अरुण के साथी कमांडर बलिदान हो गए। हालाँकि, अरुण ने आगे बढ़ना जारी रखा।

उनकी आक्रामक कार्रवाई और साहसिक नेतृत्व ने दुश्मन की किलेबंदी को बेअसर कर दिया। उन्होंने समय रहते बी स्क्वाड्रन से संपर्क किया, क्योंकि पाकिस्तानी टैंक अपने शुरुआती हमले के बाद संभवतः भारतीय जवाबी कार्रवाई से घबराकर क्षण भर के लिए पीछे हट गए थे।

हालाँकि लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई थी। पाकिस्तानी बख्तरबंद सैनिकों ने एक बार फिर हमला कर दिया। उनका मुकाबला लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल, कैप्टन वी. मल्होत्रा ​​और लेफ्टिनेंट अवतार अहलावत की अगुवाई वाले भारतीय टैंकों के कब्जे वाले क्षेत्र पर था। इसके बाद जो हुआ, वह युद्ध की सबसे भीषण टैंक मुठभेड़ों में एक माना जा सकता है।

भारतीय टैंक और गोला-बारूद कम थे, फिर भी वीर डटे रहे। फटते हुए गोले और जलते हुए ढाँचों के बीच सीमा के नजदीक भयंकर लड़ाई हुई। इस लड़ाई को टैंकों के बीच लड़ी गई सबसे घातक लड़ाई में से एक माना जाता है। खेत्रपाल और उनके साथियों ने एक के बाद एक कई दुश्मन टैंकों को नष्ट कर दिया। इस भीषण युद्ध में 10 पाकिस्तानी टैंकों को नष्ट कर दिया गया, जिनमें से चार को अकेले लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल के नष्ट किया था।

दुश्मन की बढ़ती संख्या का असर साफ़ दिख रहा था। लेफ्टिनेंट अहलावत के टैंक पर सीधा हमला हुआ और वह बर्बाद हो गया। कैप्टन मल्होत्रा ​​के टैंक की मुख्य तोप जाम हो गई, जिससे वह फायर नहीं कर पा रहा था। उस महत्वपूर्ण आधे घंटे तक अरुण खेत्रपाल पाकिस्तानी हमले के रास्ते में अकेले खड़े रहे, अपने क्षेत्र में कार्यरत आखिरी टैंक होने के बावजूद भारी चुनौतियों का सामना करते हुए भी वे अडिग थे।

अत्यंत साहस के साथ 21 वर्षीय अरुण ने अकेले ही लड़ाई जारी रखी। उनका टैंक फामागुस्टा वन-टैंक आर्मी की तरह बन गया, जिसने दुश्मन के बख्तरबंद बेड़े के एक पूरे स्क्वाड्रन से सीधी लड़ाई लड़ी। अरुण का संकल्प अटल था। उनकी निगरानी में एक भी दुश्मन टैंक को आगे नहीं बढ़ने दिया जाएगा।

इस बीच फामागुस्टा पर दुश्मन का एक गोला गिरा और उसमें आग लग गई। इस हमले में अरुण घायल हो गए। उनके स्क्वाड्रन लीडर ने खतरे को भाँप लिया और उन्हें जलते हुए टैंक को छोड़ने का आदेश दिया। अरुण ने पीछे हटने से इनकार कर दिया। रेडियो पर उन्होंने एक संदेश भेजा, जो अमर हो गया। उन्होंने कहा, “नहीं महोदय, मैं अपना टैंक नहीं छोड़ूँगा। मेरी मुख्य तोप अभी भी काम कर रही है और मैं इन बा$#%र्स को मार गिराऊँगा।”

फिर उन्होंने आगे दिए जाने वाले आदेशों को न सुनते हुए अपना रेडियो हेडसेट उतार दिया और लड़ाई जारी रखी। अपने शब्दों के अनुसार गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद अरुण ने गोलीबारी जारी रखी। उन्होंने बिल्कुल पास से एक और पाकिस्तानी टैंक को नष्ट कर दिया।

तब तक ये लड़ाई एक-दम आमने सामने की हो चुकी थी। पाकिस्तानी सेना के टैंकों से महज 100 मीटर की दूसरी अरुण के टैंक की थी। आखिरी पाकिस्तानी टैंक को उन्होंने इसी दूरी से नष्ट किया था। लेकिन इसके ठीक बाद उनके टैंक पर सीधा हमला हुआ और उनका फामागुस्टा शांत हो गया। इस हमले में लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल गंभीर रूप से घायल हो गए और फिर उन्होंने अपने टैंक पर ही दम तोड़ दिया।

खेत्रपाल की वीरता ने बसंतर में भारत के लिए दिन बचा लिया। जब तक वह शहीद हुए, पाकिस्तानी आक्रमण टूट चुका था। दुश्मन का एक भी टैंक उस स्थिति में नहीं था कि वह पुल पार कर सके। दुश्मन को वह सफलता नहीं मिली, जिसकी उसे बेसब्री से तलाश थी। उनके असाधारण वीरतापूर्ण रुख ने शेष भारतीय सैनिकों को प्रेरित किया, जिन्होंने सभी मोर्चों पर पाकिस्तानी सेना को खदेड़ते हुए लड़ाई जारी रखी।

बसंतर का युद्ध भारत की निर्णायक जीत के साथ समाप्त हुआ। उसी दिन 16 दिसंबर 1971 क, पाकिस्तान की पूर्वी कमान ने ढाका में औपचारिक रूप से आत्मसमर्पण कर दिया, जिससे बांग्लादेश का निर्माण हुआ। लेकिन यह जीत एक भारी कीमत पर मिली। 13 दिनों तक चले इस संघर्ष में भारत ने कई बहादुर सैनिकों को खोया, जिनमें सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल भी शामिल थे। उन्होंने 21 साल में बसंतर के युद्धक्षेत्र में अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।

एक नायक की विरासत

सेकेंडरी लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल को उनके “निडर साहस, दृढ़ संकल्प और सर्वोच्च बलिदान” के लिए मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। आधिकारिक प्रशस्ति पत्र में कहा गया है कि उनके अदम्य साहस ने दिन बचा लिया। दुश्मन के बख्तरबंद हमले को निर्णायक रूप से विफल कर दिया गया और दुश्मन का एक भी टैंक उनके क्षेत्र से होकर नहीं गुजरा पाया।

इस युवा अधिकारी ने कर्तव्य की सीमा से कहीं बढ़कर ‘दुश्मन के सामने नेतृत्व, दृढ़ता और असाधारण साहस’ का प्रदर्शन किया। अरुण खेत्रपाल ने अपना नाम इतिहास में दर्ज करवाया। परमवीर चक्र पाने वाले अब तक के सबसे कम उम्र के व्यक्ति बन गए और आज भी हैं।

अरुण खेत्रपाल की विरासत कई मायनों में अनोखी है। उस युद्ध के दौरान अपनी क्रूरता और निडरता के सम्मान में उन्हें “शेर-ए-बसंतर” उपनाम मिला, जिसका अर्थ है बसंत का बाघ। सेना के अधिकारी और जवान गोलाबारी के बीच उनकी अदम्य बहादुरी की कहानी से प्रेरणा लेते रहते हैं।

ऐसा माना जाता है कि उस दिन पाकिस्तानी टैंक इकाई के कमांडर, मेजर ख्वाजा नासर ने खेत्रपाल के टैंक पर घातक गोली चलाई थी। यहाँ तक कि वे भी उस शहीद भारतीय नायक का सम्मान करने लगे। दशकों बाद अरुण के पिता ब्रिगेडियर एमएल खेत्रपाल ने उस पाकिस्तानी अधिकारी से मुलाकात की, जो युद्धभूमि में अरुण के सामने था और उसकी गोलीबारी से ही अरुण ने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। उन्होंने अरुण की वीरता की गाथा उनके पिता को बताई और अपना सम्मान प्रदर्शित किया।

सेंचुरियन टैंक फामागुस्टा (सीनियर नंबर- आईसी 202) बाद में बरामद किया गया। खेत्रपाल के इस ‘प्यार’ की बाद में मरम्मत कराई गई। यह अहमदनगर के आर्मर्ड कॉर्प्स सेंटर एंड स्कूल में उनकी वीरता के गौरवशाली अध्याय के रूप में संरक्षित किया गया।

(फोटो साभार- immortalsacrifice/FB)

सेकेंड लेफ्टिनेंट खेत्रपाल का स्मारक युद्ध के मैदान के बाहर भी मौजूद हैं। 1971 युद्ध की 50वीं वर्षगांठ पर 2021 में अरुण खेत्रपाल और 1971 के अन्य नायकों के सम्मान में जम्मू के सांबा जिले के वीर भूमि पार्क (बसंतर युद्धक्षेत्र के पास) में एक नए युद्ध स्मारक का अनावरण किया गया।

नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर, भारत के महानतम युद्ध नायकों के बीच परम योद्धा स्थल गैलरी में अरुण खेत्रपाल की एक कांस्य प्रतिमा स्थापित की गई है। एनडीए भी अपने सबसे प्रतिभाशाली और बहादुर पूर्व कैडेटों में से एक के रूप में उन्हें याद करता है।

करीब 54 बरस बीत चुके हैं, लेकिन अरुण की वीरता की गाथा आज भी भारत को प्रेरित करती है। अब उनकी जीवन गाथा आगामी फिल्म ‘इक्कीस’ के साथ सिनेमा के रूप में दर्शकों तक पहुँचने वाली है। श्रीराम राघवन द्वारा निर्देशित और मैडॉक फिल्म्स द्वारा निर्मित आगामी फिल्म ‘इक्कीस’ (21) में उन वीरता भरे पलों को फिर से जीवंत किया गया है। इस फिल्म में बॉलीवुड अभिनेता अमिताभ बच्चन के पोते अगस्त्य नंदा अरुण की भूमिका निभा रहे हैं, जबकि दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र ब्रिगेडियर एम. एल. खेत्रपाल की भूमिका में हैं। फिल्म का ट्रेलर रिलीज हो चुका है।

(ये लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

24 घंटे में दूसरी बार राहुल गाँधी ने छठ पूजा पर उठाए सवाल: मुजफ्फरपुर के बाद नालंदा जाकर भी उगला जहर; क्या कॉन्ग्रेस नेता की हरकत को भुला पाएँगे बिहारी?

छठ पूजा पर राहुल गाँधी के बयान पर छिड़े विवाद के बाद भी कॉन्ग्रेस नेता बाज नहीं आ रहे हैं। 24 घंटे के भीतर ही एक बार फिर उन्होंने छठ पूजा को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा। राहुल गाँधी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद मोदी ने यमुना में नहाने का निर्णय लिया इसीलिए स्वच्छ तालाब बना दिया गया और दूसरी तरफ प्रदूषण से भरी यमुना दिखाई दी।

इससे पहले भी बिहार के मुजफ्फरपुर में गुरुवार (29 अक्टूबर 2025) को जनसभा को संबोधित करते हुए राहुल गाँधी ने कहा था, “छठ पूजा वोट हासिल करने के लिए किया गया नाटक है और मोदी वोट के लिए मंच पर नाच भी सकते हैं। उन्होंने कहा कि मोदी को छठ पूजा या बिहार की परंपरा से कोई लेना-देना नहीं है। उनका मकसद केवल वोट लेना है।”

राहुल गाँधी के छठ पूजा पर बयान का विरोध

राहुल गाँधी के छठ पूजा की विधि पर लगातार दिए जा रहे विवादित बयानों पर बिहार में विरोध है। बिहार की जनता ने उनपर छठ पूजा का अपमान करने का आरोप लगाया और माफी माँगने को कहा। बीजेपी ने भी राहुल गाँधी के इस बयान को आड़े हाथों लिया है।

अब राहुल गाँधी के बयान पर पीएम नरेंद्र मोदी ने गुरुवार (30 अक्टूबर 2025) को मुजफ्फरपुर से जवाब दिया है। पीएम मोदी ने कहा, “कॉन्ग्रेस औऱ RJD के लोग छठी मैया का अपमान कर रहे हैं। आप बताएँ क्या कोई वोट पाने के लिए छठ मैया का अपमान करेगा, क्या माताएँ निर्जला उपवास करती हैं, क्या वो सहन करेंगी क्या?”

पीएम ने कहा, “बेशर्मी से बोल रहे हैं, उनके लिए छठ पूजा नौटंकी है, ड्रामा है। ऐसे लोगों को सजा दोगे कि नहीं। जो माताएँ निर्जला व्रत रखती हैं, गंगाजी में खड़ी होती हैं, वो तो उनकी नजर में ड्रामा करती हैं। क्या बिहार की माताएँ-बहनें छठ मैया का अपमान बर्दाश्त करेंगी? यह हर उस व्यक्ति का अपमान है जो छठी मैया में श्रद्धा रखता है। मैं जानता हूँ, इस अपमान को सैकड़ों साल तक बिहार नहीं भूलेगा।”

वहीं, गृह मंत्री अमित शाह ने भी राहुल गाँधी के बयान पर पलटवार करते हुए कहा, “राहुल बाबा ने बिहार आकर कहा कि छठ करने वाले नौटंकी करते हैं। आपकी माँ कभी छठ के महत्व को समझ नहीं पाएँगी।”

तेज प्रताप यादव राहुल गाँधी को दिया करारा जवाब

तेज प्रताप यादव ने भी राहुल गाँधी के छठ पूजा के बयान को बिहारी के लिए अपमान करार दिया। साथ ही सवाल किया कि आखिर विदेश में घूमने वाले राहुल गाँधी छठ पूजा की जानकारी कैसे रख सकते हैं, यही वजह है कि वे छठी मैया के बारे में ऐसे अपशब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं।

पटना में तेज प्रताप यादव ने भी राहुल गाँधी के छठ पूजा के बयान का विरोध करते हुए कहा, “राहुल गाँधी को क्या पता छठ पर्व के बारे में… राहुल गाँधी छठ किए हैं, जो छठ के बारे में बोल रहे हैं। उनको कुछ पता है राहुल गाँधी जी को। जो आदमी विदेश भाग जाता हो, उसे छठ पर्व की क्या जानकारी होगी।”

राहुल गाँधी के बयान से बिहारी आहत

यूँ तो राहुल गाँधी अपने छठ पूजा पर अपमानित बयान से चारो ओर से घिर चुके हैं। खासतौर पर जिस तरह राहुल गाँधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नीचा दिखाने की चाह में जिस तरह छठ पूजा की विधि पर सवाल उठाया है उससे हर बिहारी आहत है।

सोशल मीडिया पर राहुल गाँधी के ‘छठ पूजा को ड्रामा’ बताने वाले बयान पर बिहारी विरोध जता रहे हैं। उन्होंने इस अपमान का बदला वोट से लेने का ऐलान किया है। कई जगह छठ पूजा पर दिए गए इस बयान को लेकर राहुल गाँधी से माफी माँगने की भी बात कही गई।

राहुल गाँधी का जाननी होगी छठ पूजा विधि

राहुल गाँधी कहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने एक अलग से स्वीमिंग पूल बनवाकर उसमें छठ पूजा करने का ढोंग किया, लेकिन क्या वो ये जानते हैं कि अपने घरों से दूर रहने वाले बिहारी दूर दराज शहरों में छठ कैसे मनाते हैं? या उन्हीं के महागठबंधन से जुड़े लालू परिवार के घर छठ की पूजा कैसे होती है।

राहुल गाँधी को ये मालूम होना चाहिए कि पीएम मोदी ने छठ पूजा के लिए यमुना में डुबकी लगाने की बात नहीं कही थी, मगर राहुल गाँधी ने अपनी कुंठा निकालने के लिए छठी मैया का अपमान जरूर किया है। सवाल यही है कि क्या उनकी इस हरकत के लिए बिहारी कभी माफ कर पाएँगे।

राहुल गाँधी का सीएम नीतीश कुमार को पर भी हमला

राहुल गाँधी ने नालंदा में रैली में यह भी कहा कि सीएम नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रिमोट दबाने से चलते हैं। उन्होंने कहा, “पीएम मोदी के हाथ में बिहार के सीएम नीतीश कुमार का रिमोट है। उन्होंने कहा, “बिहार को नीतीश नहीं चलाते हैं। सरकार अमित शाह और पीएम मोदी चलाते हैं।”

कड़ाके की ठंड, सीमित हथियार और हजारों चीनी दुश्मनों के सामने 120 जवानों ने रेजांग-ला में लहराया तिरंगा: पढ़ें उस युद्ध की शौर्यगाथा जिस पर बनी फिल्म ‘120 बहादुर’; जानिए सड़कों पर क्यों उतरा अहीर समाज

हाल ही में, अभिनेता-निर्माता फरहान अख्तर की आने वाली फिल्म ‘120 बहादुर’ देश में एक बड़े विवाद का कारण बन गई है। रविवार (26 अक्तूबर 2025) को, अहीर समाज के सैकड़ों लोगों ने फिल्म के विरोध में दिल्ली-NH-48 हाईवे पर एक विशाल पैदल मार्च निकाला। इस विरोध के कारण हाईवे पर कई किलोमीटर लंबा जाम लग गया। ये प्रदर्शनकारी संयुक्त अहीर रेजिमेंट मोर्चा के बैनर तले एकजुट हुए थे।

अहीर समाज का विरोध इसलिए है, क्योंकि यह फिल्म 1962 के भारत-चीन युद्ध की एक महान गाथा ‘लद्दाख के रेजांग ला दर्रे की लड़ाई’ पर आधारित है। इस लड़ाई में 13 कुमाऊं रेजिमेंट की ‘सी’ कंपनी के 120 अहीर जवानों ने अद्भुत वीरता दिखाते हुए अपनी जान की बाजी लगाई थी। प्रदर्शनकारियों का मानना है कि फिल्म का नाम ‘120 बहादुर’ इन 120 वीर अहीर जवानों के बलिदान और विशिष्ट पहचान को सही तरीके से नहीं दिखा रहा है।

विरोध कर रहे अहीर समाज की मुख्य माँग है कि फिल्म का नाम तुरंत बदला जाए। वे चाहते हैं कि नाम को ‘120 वीर अहीर’ रखा जाए ताकि यह उनके समुदाय के विशेष योगदान को दर्शाए। प्रदर्शनकारियों ने साफ चेतावनी दी है कि जब तक यह नाम नहीं बदला जाता, तब तक वे हरियाणा समेत उन सभी राज्यों में फिल्म को रिलीज नहीं होने देंगे, जहाँ अहीर समुदाय के लोग रहते हैं। इस विरोध ने एक बार फिर रेजांग ला की ऐतिहासिक और भावनात्मक कहानी को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का केंद्र बना दिया है।

भारत-चीन युद्ध 1962: रेजांग ला का सामरिक महत्व

1962 का भारत-चीन युद्ध भारतीय इतिहास का एक पीड़ादायक अध्याय है, लेकिन इसी संघर्ष में रेजांग ला की लड़ाई भारतीय सेना के अदम्य साहस और शौर्य का प्रतीक बनकर उभरी। इस युद्ध की जड़ें 1961 में पनपनी शुरू हो गईं थीं। उस समय, भारत चीनी अतिक्रमणों से बुरी तरह त्रस्त था। विशेष रूप से तब, जब चीन द्वारा भारतीय क्षेत्र से होते हुए शिनजियांग और तिब्बत को जोड़ने वाली एक सामरिक सड़क बनाने की खबरें सामने आईं।

इस स्थिति का मुकाबला करने के लिए, तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने एक साहसिक निर्णय लिया, जिसे ‘फॉरवर्ड पॉलिसी’ नाम दिया गया। यह एक जोखिमभरा दाँव था, जिसके तहत भारतीय सेना को निर्देश दिया गया कि वे विवादित सीमा पर, यहाँ तक कि चीनी चौकियों के ठीक सामने भी, अपनी छोटी सैन्य चौकियाँ स्थापित करें और डटकर खड़े रहें।

इस नीति के परिणामस्वरूप सीमा पर तनाव चरम पर पहुँच गया। जबकि चीन ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ के कूटनीतिक नारे की आड़ में अपनी सैन्य ताकत को तेजी से बढ़ा रहा था। अंततः, 20 अक्टूबर 1962 को, यह बढ़ता तनाव एक पूर्ण युद्ध में बदल गया, जब चीन ने एक साथ कई भारतीय चौकियों पर विनाशकारी हमला बोल दिया।

लेह की अंतिम सुरक्षा दीवार

नवंबर 1962 तक, भारतीय सेना को पीछे हटकर लद्दाख की राजधानी लेह तक आना पड़ा था। अब सारी तैयारी लेह को बचाने की थी। लेह की सुरक्षा का सबसे जरूरी ठिकाना था रेजांग ला। रेजांग ला कोई आम जगह नहीं थी। यह करीब 18,000 फीट (लगभग 5,500 मीटर) की बहुत ऊँची पहाड़ी पर मौजूद एक दर्रा था।

यह दर्रा चुशूल घाटी की हिफाजत करता था। अगर चीन चुशूल घाटी तक पहुँच जाता, तो लेह तक जाने का रास्ता उसके लिए खुल जाता। इसलिए, चीन के लिए रेजांग ला को पार करना बेहद जरूरी था और भारत के लिए यह दर्रा किसी भी कीमत पर बचाना आखिरी और सबसे बड़ी चुनौती थी।

रेजांग ला के रक्षक: ‘चार्ली कंपनी’ के 120 सूरमा

रेजांग ला की हिफाजत करने का मुश्किल काम 13 कुमाऊं रेजिमेंट की ‘चार्ली कंपनी’ को मिला था। इस कंपनी की कमान मेजर शैतान सिंह भाटी संभाल रहे थे। इस कंपनी में कुल 120 जाँबाज जवान थे। इन जवानों में से ज्यादातर सैनिक हरियाणा के अहीर (यादव) समुदाय से थे। उनके पास जंग लड़ने के लिए बहुत कम सामान था। बस पुरानी राइफलें, मोर्टार और उनकी सबसे बड़ी ताकत, यानी हार न मानने का पक्का इरादा। ये जवान इस बेहद मुश्किल चुनौती का सामना करने के लिए तैयार थे।

18 नवंबर 1962: बर्फीली रात, जब चीनियों ने हमला बोला

18 नवंबर 1962 की सुबह, करीब 3:00 बजे का वक्त था। वहाँ बर्फीली हवाएँ चल रही थीं और तापमान माइनस 25 डिग्री से भी नीचे था। लांस नायक हुकुम सिंह के साथ चार जवानों की एक छोटी-सी चौकी (लिस्निंग पोस्ट) तैनात थी। घने कोहरे के बीच, उन्हें दिखाई दिया कि सैकड़ों चीनी सैनिक चुपके से पहाड़ी की तरफ बढ़ रहे हैं।

चीनी अपनी भारी तोपों (मोर्टार) की मदद से हजारों की संख्या में हमला करने आ रहे थे। हुकुम सिंह के बहादुर जवानों ने फौरन इसकी खबर अपनी मुख्य कंपनी को पहुँचाई। हुकुम सिंह जानते थे कि उनके सामने सैकड़ों दुश्मन हैं, फिर भी उन्होंने पीछे हटने से साफ मना कर दिया।

हुकुम सिंह ने कहा, “हम दुश्मन को जितनी देर तक रोकेंगे और उन्हें मारेंगे, हमारी कंपनी को जीतने का उतना ही अच्छा मौका मिलेगा।” जैसे ही हुकुम सिंह ने आदेश दिया, उनकी बंदूकों से गोलियाँ बरसने लगीं। चीनी सेना की पहली कतार इस अचानक हमले से पूरी तरह हैरान रह गई।

आखिरी साँस तक लोहा: जब जवानों ने खाली हाथों से भी लड़ी जंग

जैसे ही चीनियों का बड़ा हमला भारतीय मोर्चे पर शुरू हुआ, मेजर शैतान सिंह अपनी जगह पर मजबूती से खड़े हो गए। दुश्मन ने तीन तरफ से हमला किया और ‘चार्ली कंपनी’ को घेरने की पूरी कोशिश की। लेकिन, हर तरफ से हो रहे हमले का जवाब भारतीय जवानों ने गोलियों की जबरदस्त बौछार से दिया।

नाएब सूबेदार सूरजा की 7 नंबर की टुकड़ी (प्लाटून) पर करीब 400 चीनी सैनिकों ने धावा बोला। भारतीय जवानों की मोर्टार (एक तरह की तोप) से हुई फायरिंग ने चीनियों को भारी नुकसान पहुँचाया। फिर भी, चीनी सैनिक अपने मारे गए साथियों की परवाह किए बिना लगातार आगे बढ़ते रहे।

एक वक्त ऐसा भी आया, जब कुछ अहीर जवानों का गोला-बारूद खत्म हो गया। तब भी वे नहीं रुके, उन्होंने खाली हाथों से ही दुश्मन से लड़ाई शुरू कर दी। दो जवान तो चीनी सैनिकों की मशीनगन पोस्ट की तरफ दौड़ पड़े, लेकिन शहीद हो गए।

एक ताकतवर अहीर जवान ने एक चीनी सिपाही को पकड़ा और उसे उठाकर रेजांग ला की चट्टानों से नीचे फेंक दिया। जब नाएब सूबेदार सूरजा के सिर में गोली का टुकड़ा (छर्रा) लगा, तो उनके आखिरी शब्द थे- ‘लड़ते रहो, 13 कुमाऊं का नाम ऊँचा रखो’।

कमांडर का हौसला: मेजर शैतान सिंह का सबसे बड़ा बलिदान

जब चारों तरफ गोलियाँ और गोले बरस रहे थे, तब भी मेजर शैतान सिंह डटे रहे। वह लगातार एक चौकी से दूसरी चौकी पर जाते रहे। उनका काम था जवानों का हौसला बनाए रखना, टूटे हुए बचाव को ठीक करना और दुश्मन की तरफ फायरिंग का सही निशाना लगवाना। लड़ते-लड़ते वह खुद एक मशीनगन के फटने से बुरी तरह घायल हो गए।

परमवीर मेजर शैतान सिंह की तस्वीर

मगर, मेजर शैतान सिंह ने अपनी जगह से हटने या इलाज के लिए जाने से साफ मना कर दिया। मेजर सिंह ने अपने जवानों को आदेश दिया कि उन्हें वहीं छोड़कर वे लड़ाई जारी रखें। मेजर सिंह के आखिरी शब्द थे- ‘बटालियन को बताना कि कंपनी कितनी बहादुरी से लड़ी।’

तीन महीने बाद, उनका शरीर ठीक उसी जगह बर्फ में मिला। देश के लिए इस सबसे बड़े साहस, शानदार नेतृत्व और अंतिम बलिदान के लिए, उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र दिया गया, जो भारत का सबसे बड़ा वीरता सम्मान है।

रेजांग ला का इतिहास: ट्रिगर पर जमी उंगलियों की दास्तान

सुबह 8 बजे तक, रेजांग ला की भीषण लड़ाई खत्म हो चुकी थी। सिर्फ पाँच घंटों की इस लड़ाई में, 13 कुमाऊं की ‘चार्ली कंपनी’ ने बहादुरी की एक ऐसी कहानी लिख दी, जो सेना के इतिहास में बहुत कम सुनने को मिलती है।

मेजर शैतान सिंह के सभी जवान अपनी आखिरी साँस तक लड़े। 120 बहादुर सैनिकों में से 114 जवान शहीद हो गए। सिर्फ चार जवान ही बच पाए। 1963 में, जब बर्फ पिघली और जवानों के शव मिले, तो हैरान करने वाला नजारा था। ज्यादातर जवान अभी भी अपनी बंदूकें पकड़े हुए थे और उनका रुख दुश्मन की तरफ था। उन्हें गोलियों और संगीनों से कई गहरे घाव लगे थे।

इस छोटी-सी भारतीय टुकड़ी ने चीन को भारी नुकसान पहुँचाया। मेजर जनरल जगजीत सिंह के मुताबिक, चीन के लगभग 500 सैनिक मारे गए थे। इस लड़ाई ने यह साबित कर दिया कि भारतीय सैनिक कितने पक्के इरादे वाले होते हैं। रेजांग ला की यह लड़ाई आज भी देश के लिए अदम्य साहस की निशानी है।

रेजांग ला का गौरव: शहीदों को सलाम

रेजांग ला की लड़ाई हमारे देश की सेना के इतिहास में बहादुरी की सबसे बड़ी मिसालों में से एक है। इन शहीदों को सम्मान देने के लिए, रेजांग ला में एक युद्ध स्मारक (वॉर मेमोरियल) बनाया गया है। 18 नवंबर 2021 को, इस लड़ाई की 59वीं सालगिरह पर इस स्मारक को नया रूप दिया गया। देश के रक्षा मंत्री ने इसका उद्घाटन किया था। यह स्मारक आज भी उन 120 वीर अहीर जवानों के बलिदान और भारतीय सेना के अटूट साहस की कहानी दुनिया को बताता है।

प्राइवेट पार्ट पर मारा हाथ, विरोध करने पर की पिटाई: कोलकाता के 5 सितारा होटल में गैंगरेप दोषी नासिर खान ने महिला को छेड़ा; जानिए ममता राज में कितनी असुरक्षित हैं महिलाएँ

पार्क स्ट्रीट गैंगरेप के दोषी नासिर खान पर कोलकाता के एक पाँच सितारा होटल में एक महिला से छेड़छाड़ करने और उस पर हमला करने का आरोप लगाया है। यह घटना रविवार (26 अक्टूबर) सुबह करीब 4:15 बजे होटल हयात रीजेंसी में हुई। बिधाननगर दक्षिण पुलिस स्टेशन में नासिर खान और उसके भतीजे जुनैद खान के खिलाफ जानबूझकर चोट पहुँचाने, मारपीट करने समेत कई धाराओं में केस दर्ज किया है।

पीड़िता द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत के अनुसार, वह अपने पति, भाई और कुछ दोस्तों के साथ हयात रीजेंसी के प्ले बॉय क्लब में घूम रही थी। तभी आरोपित वहाँ पहुँचे और झगड़ा करने लगे। इनलोगों ने महिला पर बीयर की बोतलें फेंकी और गलत तरीके से छूने की कोशिश की।

पीड़िता ने शिकायत में कथित तौर पर कहा, “जब मेरे भाई ने मुझे बचाने की कोशिश की, तो उन्होंने हम पर काँच की बोतलें फेंकनी शुरू कर दीं। हमने होटल से सुरक्षित भागने की कोशिश की, लेकिन जुनैद खान ने लगभग 20 लड़कों को बुला लिया और हम पर हमला करना शुरू कर दिया।”

महिला ने कहा, “मैंने 100 नंबर पर कॉल किया, लेकिन उन्होंने सारे दरवाजे बंद कर दिए। कुछ लड़कों ने मुझे धक्का देना शुरू कर दिया और मेरे गुप्तांगों को छूने लगा। मैंने मेडिकल रिपोर्ट भी संलग्न कर दी है, और आप रेस्टोरेंट क्लब के सीसीटीवी कैमरे में हमले के सभी वीडियो देख सकते हैं।” पुलिस ने अभी तक किसी को गिरफ्तार नहीं किया है।

पीड़िता के मुताबिक, वह लगभग आधे घंटे तक छिपी रही, फिर पुलिस ने उसे शराबखाने से बचाया। वह उस वक्त छिपी हुई थी।

नासिर खान कौन हैं?

व्यवसायी नासिर खान उन पाँच लोगों में शामिल थे जिन्हें 2012 में कोलकाता के पॉश इलाके पार्क स्ट्रीट में चलती कार में 40 वर्षीय एंग्लो-इंडियन महिला सुजेट जॉर्डन के साथ गैंगरेप का दोषी पाया गया था। दो बेटियों की माँ, इस महिला का फरवरी 2012 में एक नाइट क्लब के सामने से एक कार में आरोपियों ने अपहरण कर लिया और चलती कार में घंटों तक उसके साथ सामूहिक बलात्कार करते रहे। इसके बाद महिला को उस जगह से कुछ किलोमीटर दूर एक चौराहे के पास फेंक दिया।

महिला को बेहोशी की हालत में वहाँ से उठाया गया था। नासिर खान को इस मामले में 10 साल जेल की सजा हुई थी। लेकिन 2022 में, ‘अच्छे व्यवहार’ का हवाला देते हुए एक साल पहले उसे रिहा कर दिया गया।

पश्चिम बंगाल में यौन हिंसा के बढ़ते मामले

पश्चिम बंगाल में एक महिला मुख्यमंत्री होने के बावजूद महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा के मामले बढ़ रहे हैं। ऐसी घटनाओं में पीड़ितों के प्रति मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और टीएमसी नेताओं के उदासीन रवैये से स्थिति और बिगड़ गई है। राज्य में महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा को रोकने के लिए जवाबदेही सुनिश्चित करने के बजाय, महिला मुख्यमंत्री या तो पीड़ितों को ही दोषी ठहराती हैं या घटनाओं को अपनी सरकार के खिलाफ साजिश बताकर खारिज कर देती हैं।

हाल ही में, पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर में हुए एक सामूहिक बलात्कार मामले में, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने यौन हिंसा की पीड़िता पर ही दोष मढ़ दिया। ओडिशा की रहने वाली और दुर्गापुर मेडिकल कॉलेज में पढ़ने वाली द्वितीय वर्ष की एमबीबीएस छात्रा के साथ शुक्रवार (10 अक्टूबर) की रात पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर में एक जंगल में अपू बाउरी, फिरदौस सेख, सेख रियाजुद्दीन और दो अन्य लोगों ने सामूहिक बलात्कार किया।

विडंबना यह है कि इस घटना पर दुख व्यक्त करते हुए, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बलात्कार के लिए पीड़िता को ही दोषी ठहराया। उन्होंने कहा कि महिलाओं को रात में कॉलेज से बाहर जाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए और महिलाओं को अपनी सुरक्षा खुद करनी चाहिए।

यह पहली बार नहीं था जब मुख्यमंत्री ने बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को कम करके आँका हो। 2012 के पार्क स्ट्रीट सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद भी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसी तरह की असंवेदनशीलता दिखाई थी। उन्होंने घटना को ‘मनगढ़ंत’ करार दिया और अपनी सरकार को बदनाम करने की साजिश बताकर खारिज कर दिया। मुख्यमंत्री की ऐसी संवेदनहीनता और जवाबदेही की कमी अपराधियों के हौसले बढ़ाती है और पीड़ितों को न्याय के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती हैं।

दुर्गापुर सामूहिक बलात्कार मामले से एक महीने पहले हुए एक अन्य मामले में, कोलकाता के हरिदेवपुर इलाके में एक युवती के साथ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के एक कार्यकर्ता और उसके सहयोगी ने बलात्कार किया। आरोपियों ने उसे अपना जन्मदिन मनाने के लिए बुलाया था। आरोपियों ने पीड़िता को पूरी रात एक कमरे में बंद रखा और बारी-बारी से उसके साथ बलात्कार किया। इससे पहले इसी साल जुलाई में एक और गैंगरेप का मामला सामने आया।

पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के साउथ कलकत्ता लॉ कॉलेज में तीन लोगों ने 24 वर्षीय एक छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार किया। यह भयावह घटना आरजी कर मेडिकल कॉलेज में हुए जघन्य बलात्कार और हत्या मामले के एक साल से भी कम समय में हुई। आरजी कॉलेज में एक 31 वर्षीय पीजी ट्रेनी डॉक्टर के साथ मेडिकल कॉलेज में ड्यूटी के दौरान बेरहमी से बलात्कार किया गया और उसकी हत्या कर दी गई थी।

2013 में, पश्चिम बंगाल विधानसभा में राज्य में बलात्कार के बढ़ते मामलों पर एक बहस के दौरान मुख्यमंत्री ने इशारे-इशारों में इसके लिए राज्य की बढ़ती आबादी को दोषी बताया। उन्होंने रेप के बढ़ते मामलों के लिए आधुनिकीकरण, शॉपिंग मॉल और मल्टीप्लेक्स की बढ़ती संख्या को भी जिम्मेदार ठहराया था। 2024 के संदेशखाली की घटना को ‘मामूली’ बता कर कमतर आँकने की कोशिश की। इसमें ममता बनर्जी ने तृणमूल कॉन्ग्रेस के गुंडें शामिल थे।

एनसीआरबी के आँकड़े बता रहे राज्य की स्थिति

पश्चिम बंगाल में महिला सुरक्षा की गंभीर स्थिति राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की वर्ष 2023 की रिपोर्ट से उजागर हुई है। एनसीआरबी की ‘भारत में अपराध’ रिपोर्ट से पता चलता है कि पश्चिम बंगाल में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और विशेष एवं स्थानीय कानूनों (एसएलएल) के तहत महिलाओं के खिलाफ अपराध के 34,691 मामले दर्ज किए गए। हालाँकि यह 2022 के 34,738 मामलों की तुलना में थोड़ी कम है। लेकिन, यह संख्या देश में सबसे अधिक है। ये आँकड़े प्रति लाख महिला आबादी पर 71.3 मामलों की अपराध दर दर्शाते हैं।

एनसीआरबी के आँकड़े यह भी दर्शाते हैं कि वर्ष 2023 तक देश में होने वाले सभी एसिड हमलों में से 27.5% अकेले पश्चिम बंगाल में हुए। 2022 में, देश भर में हुए 202 मामलों में से, पश्चिम बंगाल में 48 एसिड हमले दर्ज किए गए, जिनमें से 52 पीड़ित थे। इस अपराध श्रेणी में, टीएमसी शासित राज्य 2018 से देश में अग्रणी है।

2023 तक बलात्कार/सामूहिक बलात्कार के साथ हत्या के 7 मामले, दहेज हत्या के 350 मामले और महिलाओं को आत्महत्या के लिए उकसाने की 419 घटनाएँ दर्ज की गईं।

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अहमदाबाद के जिस मिशनरी स्कूल में घोंपा गया हिंदू छात्र को चाकू, उसे सरकार के नियंत्रण में देने की सिफारिश: जानिए ‘सेवेंथ डे स्कूल’ की जाँच के बाद रिपोर्ट में क्या-क्या हुए खुलासे, पढ़ें Exclusive डिटेल

गुजरात के अहमदाबाद स्थित सेवेंथ डे स्कूल में हिंदू छात्र की मुस्लिम सहपाठी द्वारा हत्या मामले में जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा नियुक्त समिति ने रिपोर्ट सौंप दी है। रिपोर्ट में बताया गया कि स्कूल प्रशासन ने लापरवाही बरती है और कई नियमों का उल्लंघन भी किया है। समिति ने स्कूल को सरकार के नियंत्रण में लेने की भी सिफारिश की है। शिक्षा अधिकारी ने यह रिपोर्ट राज्य सरकार को भेज दी है। अब सरकार आगे की कार्रवाई करेगी।

रिपोर्ट के अनुसार, जाँच में सामने आया कि स्कूल ने मान्यता के लिए सरकारी नियमों का उल्लंघन किया और अतिरिक्त कक्षाओं के लिए अनुमति नहीं ली गई थी। प्रबंधन और स्कूल परिसर में किए गए बदलाव के लिए भी जरूरी मंजूरी नहीं ली गई। इसके अलावा स्कूल के प्रबंधन में भी कई गड़बड़ियाँ मिली हैं। समिति की जाँच में यह भी पता चला कि अल्पसंख्यक स्कूल का दर्जा प्राप्त करने में कुछ अनियमितताएँ बरती गई थीं।

नियमों का उल्लंघन और गड़बड़ियाँ

जाँच में यह भी सामने आया कि है कि जिस जमीन पर स्कूल चल रहा है, उस जमीन को अहमदाबाद नगर निगम ने साल 2003 में लीज पर दिया था। लेकिन स्कूल ने 80 के दशक में कुछ कक्षाओं के लिए मंजूरी ली थी। वह जगह अब मौजूद नहीं है और न ही इस जगह पर कक्षाओं की मंजूरी के लिए समिति के सामने कोई आधार प्रस्तुत किया गया है। इसीलिए समिति ने प्रथम दृष्टया इस स्कूल को अवैध घोषित कर दिया था।

इसके अतिरिक्त, बाद में स्कूल में कुछ अतिरिक्त कक्षाएँ शुरू की गईं, जिनके लिए नियमानुसार बोर्ड से पहले एप्रूवल की आवश्यकता होती है लेकिन स्कूल ने इस नियम का पालन नहीं किया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि नियमों के अनुसार, प्रबंधन, ट्रस्ट या स्कूल परिसर में कुछ बदलाव करने के लिए संबंधित बोर्ड से अनुमति लेना जरूरी है लेकिन इस मामले में ऐसा कोई दस्तावेज जमा नहीं किया गया। इसके अलावा अगर स्कूल दो पालियों में भी चलाना है तो भी पहले बोर्ड से अनुमति लेनी जरूरी है। इस मामले में भी बिना अनुमति के ही दो पालियों में कक्षाएँ चलाई जा रही थीं।

जाँच में यह भी सामने आया है कि स्कूल का संचालन किस ट्रस्ट या सोसायटी द्वारा किया जा रहा है। इसकी साफ जानकारी नहीं दी गई है। समिति के सामने रखे गए दस्तावेजों में स्कूल संचालक के रूप में अलग-अलग नाम दिए गए हैं। इनमें इंडिया फाइनेंशियल एसोसिएशन ऑफ सेवेंथ डे एडवेंटिस्ट्स, काउंसिल ऑफ सेवेंथ डे एडवेंटिस्ट्स एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन्स और एशलोक एजुकेशन ट्रस्ट शामिल हैं। इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि वास्तव में कौन-सा ट्रस्ट या संस्था स्कूल का संचालन कर रही है।

साथ ही स्कूल ने अल्पसंख्यक दर्जा (माइनॉरिटी स्टेटस) पाने के लिए कई नियमों का पालन नहीं किया। रिपोर्ट के अनुसार, एशलोक एजुकेशन सोसायटी ने सितंबर 2020 में अहमदाबाद जिला शिक्षा अधिकारी के कार्यालय में अल्पसंख्यक दर्जा पाने के लिए आवेदन किया था। यह सोसायटी पुणे में पंजीकृत है और इसे महाराष्ट्र सरकार ने 14 मार्च 2013 को ‘माइनॉरिटी स्टेटस’ दिया था, जो सिर्फ महाराष्ट्र के लिए मान्य है।

इसके अलावा, रिपोर्ट में कहा गया कि संस्था ने प्राथमिक विभाग के लिए अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था होने का प्रमाण भी स्पष्ट रूप से प्रस्तुत नहीं किया। इसी कारण से आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के 25 प्रतिशत बच्चों को प्रवेश नहीं दिया गया, जो कि RTE (शिक्षा का अधिकार) अधिनियम का उल्लंघन है।

लीज एग्रीमेंट का उल्लंघन

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि स्कूल ने लीज एग्रीमेंट का उल्लंघन किया है। जिस जमीन पर स्कूल बना हुआ है, उसे नगर निगम ने द इंडिया फाइनेंशियल एसोसिएशन ऑफ सेवेंथ डे एडवेंटिस्ट्स को शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए लीज पर दिया था। लेकिन स्कूल का प्रबंधन अलग-अलग संस्थाओं द्वारा किया जा रहा है। यानी जमीन किसी और संस्था को लीज पर दी गई थी और स्कूल का प्रबंधन अलग संस्थाएँ कर रही हैं।

यहाँ तक कि स्कूल ने शुल्क (फीस) नियमों का भी उल्लंघन किया है। रिपोर्ट में बताया गया कि संस्था ने फीस नियामक समिति को किराया ₹1,59,000 दिखाया जबकि वास्तव में नगर निगम ने जमीन केवल ₹10,000 के किराए पर दी थी।

स्कूल परिसर में MBA और BSc के साथ आर्ट्स कॉलेज भी चलाए जा रहे हैं। नियम के अनुसार, ऐसा करने के लिए संबंधित बोर्ड से NOC(अनापत्ति प्रमाणपत्र) लेना जरूरी होता है। स्कूल ने 2022 में ICSE बोर्ड से NOC तो ले ली थी, लेकिन गुजरात माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक शिक्षा बोर्ड से NOC नहीं ली।

इसके अलावा, कुछ और गड़बड़ियाँ भी मिली हैं। जैसे कि नियमों के मुताबिक स्कूल परिसर में किताबें बेचना मुनाफाखोरी माना जाता है लेकिन ऑडिट रिपोर्ट में पाया गया कि स्कूल में किताबें बेची जा रही थीं, जो नियमों का उल्लंघन है।

स्कूल प्रशासन पर सरकारी अधिग्रहण की सिफारिश

जाँच रिपोर्ट में समिति ने कहा है कि सभी पहलुओं पर विचार करने पर यह साफ है कि स्कूल ने मान्यता की शर्तों का उल्लंघन किया है। इसके साथ ही रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि झूठे आधार प्रस्तुत करके धोखाधड़ी की गई है, जिससे शिक्षा विभाग, FRC, अभिभावकों और छात्रों का विश्वास टूटा है।

समिति ने सरकार से सिफारिश की है कि स्कूल में पढ़ने वाले 10 हजार से ज्यादा छात्रों के हितों को ध्यान में रखते हुए स्कूल का प्रशासन सरकार को सौंप दिया जाएगा या फिर इसे किसी अन्य ट्रस्ट को सौंप दिया जाए। शिक्षा अधिकारी ने यह रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है। आने वाले समय में और भी बड़े फैसले लिए जा सकते हैं।

क्या है पूरा मामला?

गौरतलब है कि अगस्त 2025 में 10वीं कक्षा में पढ़ने वाले एक हिंदू छात्र नयन संतानी को उसी स्कूल में पढ़ने वाले एक मुस्लिम छात्र ने चाकू मारकर हत्या कर दी थी। इस घटना के बाद अभिभावकों में आक्रोश था और स्कूल पर गंभीर आरोप लगाए गए। स्कूल में पहले भी कुछ ऐसी ही घटनाएँ सामने आ चुकी हैं, जिसके चलते स्कूल प्रशासन पर सवाल खड़े होते रहे हैं।

घटना के बाद जिला शिक्षा अधिकारी ने जाँच के आदेश दिए। हालाँकि, स्कूल ने इसके खिलाफ गुजरात उच्च न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया, लेकिन कोर्ट ने भी कोई राहत नहीं दी और जाँच में सहयोग करने का निर्देश दिया। अब समिति द्वारा जाँच रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद मामला जिला शिक्षा अधिकारी और सरकार के फैसले का इंतजार है।

(मूलरूप से यह रिपोर्ट गुजराती भाषा में लिखी गई है, जिसे विस्तार में पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

तेहरान में हुआ 13 लोगों का अपहरण, भारत ने जाकर छुड़ाया: जानिए अमेरिका-कनाडा-ऑस्ट्रेलिया जाने के सपने देखने वाले भारतीय कैसे फँसते हैं किडनैपर्स के चंगुल में, क्या होता है उनके साथ?

विदेश जाने का सपना देख रहे भारतीय अब किडनैपिंग का शिकार हो रहे हैं। डंकी रूट से कनाडा अमेरिका और यूके जाने वाले युवा ईरान जैसे दूसरे देश में ट्रैप हो रहे हैं और उसके परिवार वालों से भारी फिरौती माँगी जा रही है।

एक ऐसा ही मामला गुजरात से आया है। जहाँ के 13 नौजवान ऑस्ट्रेलिया में अवैध तरीके से जा रहे थे। इन्हें फिरौती के लिए ईरान में बंधक बना लिया गया। इनमें से अभी भी 6 वहाँ फँसे हुए हैं, बाकियों की वतन वापसी हो गई है।

अपहरणकर्ताओं ने बंधकों का एक वीडियो उन्हें ऑस्ट्रेलिया भेजने वाले एजेंट और उनके परिवारों को भेजकर करोड़ों रुपये की फिरौती माँगी। मामला सामने आने पर मानसा से भाजपा विधायक जयंती पटेल ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर मदद माँगी। इसके बाद बंधकों की रिहाई संभव हो पाई।

19 अक्टूबर को मानसा के बापूपुरा गाँव की प्रिया चौहान, अजय चौधरी, अनिल चौधरी और निखिल चौधरी ऑस्ट्रेलिया के लिए रवाना हुए। उन्हें दिल्ली से थाईलैंड, वहाँ से दुबई और फिर अमीरात एयरलाइंस के जरिए ईरान की राजधानी तेहरान ले जाया गया। ईरान पहुँचने के बाद, उन्हें एक टैक्सी में बिठाकर किसी अज्ञात स्थान पर ले जाया गया।

इसके बाद, उन्हें बंधक बना लिया गया और बेरहमी से पीटा गया। इन लोगों के दो वीडियो ऑनलाइन सामने आए। एक वीडियो में दो युवकों को नंगा करके पीटा जा रहा था। इन दो वीडियो के अलावा, अपहरणकर्ताओं ने एक जोड़े की तस्वीर भी साझा की, जिसमें उनके हाथ और मुँह बंधे हुए थे। इस वीडियो और तस्वीरों को दिखाते हुए पीड़ितों के परिवारों से ₹2 करोड़ की फिरौती माँगी गई।

डंकी मार्ग, फिरौती के लिए अपहरण: हताशा और धोखे की कहानी

हालाँकि, यह कोई पहला मामला नहीं है जब विदेश में अवैध रूप से पहुँचने की कोशिश करते समय भारतीय नागरिकों का अपहरण किया गया हो। जुलाई 2023 में, एक ऐसा ही मामला सामने आया था जिसमें एक गुजराती दंपति, डॉ. पंकज और निशा पटेल का ईरान में वसीम नाम के एक व्यक्ति ने अपहरण कर लिया था। ये लोग जो ‘डंकी मार्ग’ से अमेरिका जा रहे थे। दंपति को प्रताड़ित किया गया और अपहरणकर्ताओं ने उनके एजेंट से 10 लाख रुपए की फिरौती माँगी।

सितंबर 2024 में, केरल के 26 वर्षीय हिमांशु नाम के एक व्यक्ति का ईरान में इसी तरह अपहरण कर लिया गया था। उसके परिवार द्वारा 20 लाख रुपये की फिरौती देने के बाद ही युवक को रिहा किया गया था। हिमांशु हरियाणा के करनाल के अमन राठी नाम के एक एजेंट के संपर्क में आया। राठी ने हिमांशु को ऑस्ट्रेलिया में वर्क वीजा दिलाने का झाँसा दिया।

इसके बाद हिमांशु को नोएडा ले जाया गया और 15 दिनों का प्रशिक्षण दिया गया। उसे इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता भेज दिया गया। तीन हफ़्ते बाद, वह दिल्ली लौटा। फिर उसे ईरान भेज दिया गया। चाबहार पहुँचने के बाद हिमांशु का अपहरण कर लिया गया। पाकिस्तानी मानव तस्करों ने भारतीय नागरिक पर हमला किया और उसे प्रताड़ित किया। हिमांशु के परिवार से एक करोड़ रुपए की फिरौती माँगी गई। बातचीत में 20 लाख रुपए पर सहमति बनी और हिमांशु के परिवार ने उसकी रिहाई के लिए 20 लाख दे दिए।

इस साल जून में, संगरूर के हुसनप्रीत सिंह, एसबीएस नगर के जसपाल सिंह और होशियारपुर के अमृतपाल सिंह नामक तीन भारतीय तेहरान पहुँचने के कुछ ही समय बाद गायब हो गए। होशियारपुर के एक एजेंट ने उन्हें दुबई और ईरान के रास्ते ऑस्ट्रेलिया में जॉब देने का सब्जबाग दिखाया था। उसे तेहरान में अस्थायी तौर पर रहने के लिए कहा गया।

परिवार के मुताबिक तेहरान पहुँचते ही उनका अपहरण कर लिया गया था। अपहरणकर्ताओं ने एक करोड़ रुपए की फिरौती माँगी। इनलोगों ने काफी दर्दनाक वीडियो परिजनों को भेजा। इसमें बंधकों को पीली रस्सियों से बाँधा गया था और खून बह रहा था। लापता भारतीयों से आखिरी बार 11 मई को संपर्क हुआ था। भारत सरकार के हस्तक्षेप और ईरानी पुलिस के सक्रिय होने के बाद तीनों भारतीयों को बचाया जा सका।

हाल ही में, एक पंजाबी परिवार का सीमा पार के एक गिरोह ने अपहरण कर लिया था। 4 अक्टूबर 2025 को धरमिंदर सिंह, उनकी पत्नी संदीप कौर और उनका 12 साल का बेटा तब रिहा हुआ, जब 80 लाख रुपए की फिरौती और गहने पाकिस्तानी गिरोह को दिए।

पंजाब के राहों का यह परिवार एक एजेंट के संपर्क में आया। एजेंट ने उन्हें कहा कि वे सीधे भारत से कनाडा नहीं भेज सकते हैं, लेकिन ईरान के रास्ते कनाडा में बसाया जा सकता है।

परिवार के मुताबिक, “एजेंट ने कहा कि परिवार को चिंता करने की जरूरत नहीं है। कनाडा पहुँचने के बाद ही पूरा भुगतान करना होगा। तब तक का खर्च वह उठाएगा,”

ठेके पर ज़मीन लेने वाले किसानी करने वाले धरमिंदर ने बात मान ली। धरमिंदर सिंह ने एजेंट के हवाले से कहा, “पूरे परिवार के लिए कुल खर्च 26 लाख रुपए हैं, लेकिन भुगतान कनाडा पहुँचने के बाद ही होगा।”

25 सितंबर को, सिंह परिवार चंडीगढ़ से कोलकाता, फिर दुबई और फिर तेहरान के लिए रवाना हुआ। वे इमाम खुमैनी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर टैक्सी ड्राइवर का इंतज़ार कर रहे थे। एजेंट उन्हें टैक्सी देने वाला था। इस दौरान एक टैक्सी ड्राइवर आया और भारतीय नागरिकों को एक दूर दराज के स्थान पर ले गया। वहाँ भारतीय परिवार के पासपोर्ट और मोबाइल फोन छीन लिए गए। पीड़ित परिवार को पता चला कि उन्हें पाकिस्तान से संचालित अंडरवर्ल्ड से जुड़े एक गिरोह ने अगवा कर लिया है। पाकिस्तानी गिरोह ने 1.5 करोड़ रुपए की फिरौती माँगी।

सिंह परिवार को पाकिस्तानी गिरोह की कैद से अपनी रिहाई के लिए 80 लाख रुपये का इंतजाम करना पड़ा, गहने देने पड़े और जमीन बेचनी पड़ी।

हाल के दिनों में ऐसे मामलों में वृद्धि हुई है, जिसमें धोखेबाज एजेंट हताश लोगों को विदेश में नौकरी और आकर्षक करियर का झाँसा देकर ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और अमेरिका भेजने के नाम पर फँसाते हैं। मानव तस्करों और फिरौती माँगने वाले ऐसे लोगों की तलाश में रहते हैं जो विदेश जाने का सपना देखते हैं और इसे पूरा करने के लिए ‘कुछ भी’ करने को तत्पर रहते हैं। ‘डंकी रूट’ ऐसे ही लोगों की वजह से फलफूल रहा है।

हाल ही में, पंजाब पुलिस ने एक ऐसे ही रैकेट का भंडाफोड़ किया और लीबिया से पाँच युवकों को छुड़ाया। इस मामले में भी कार्यप्रणाली कुछ अलग नहीं थी। हताश लोगों को विदेश में बेहतर जीवन और अवसरों का लालच देकर, उन्हें अवैध रास्ता अपनाने के लिए राजी करना, उन्हें उनके मनमुताबिक देश भेजने के बहाने, उनका अपहरण करना, यातनाएँ देना और फिर फिरौती माँगना।

काम के लिए विदेश जाने में कोई बुराई नहीं है, बशर्ते रास्ते सही हों। वीजा प्रक्रिया में देरी से हताश भारतीय धोखे, विश्वासघात, यातना, आर्थिक नुकसान और सबसे बढ़कर जान गँवाने की स्थिति में ये लोग फँस रहे हैं। ये कुछ ऐसे मामले हैं जो मीडिया के जरिए बाहर आ पाई हैं। ऐसी कई घटनाएँ हुई हैं, जो रिपोर्ट ही नहीं की गईं।

इस खतरे की जड़ में ‘डंकी रूट’ है। डंकी पंजाबी में एक शब्द है जिसका अर्थ है एक जगह से दूसरी जगह कूदना। समय के साथ, यह उन लोगों द्वारा अपनाए जाने वाले अवैध रास्ते के लिए इस्तेमाल होने लगे, जो बिना कागजात के दूसरे देश में एंट्री करते हैं।

कई एजेंट डंकी रूट के जरिए भारतीयों को विदेश भेजने का लालच देते हैं। जो लोग डंकी रूट चुनते हैं, उनका पहले पासपोर्ट और वीजा बनवाया जाता है। अक्सर अवैध रास्तों पर काम करने वाले एजेंट पैसे लेकर किसी यूरोपीय देश या लैटिन अमेरिका के किसी देश का वीजा बनवा देते हैं।

ज्यादातर मामलों में यह पर्यटक वीजा होता है। इसके जरिए डंकी रूट के लोगों को भारत से निकाला जाता है। उन्हें नेपाल, दुबई या किसी अन्य देश में कुछ दिनों की यात्रा करवाई जाती है और उनकी यात्रा की पूरी कहानी सुनाई जाती है। कई लोग शरण लेने के लिए अमेरिका, कनाडा या ऑस्ट्रेलिया जाना चाहते हैं। अक्सर गैरकानूनी काम करने वाले एजेंट पैसे लेकर किसी यूरोपीय देश या लैटिन अमेरिका के किसी देश का वीज़ा बनवा देते हैं। इसमें प्रति व्यक्ति 25-50 लाख रुपये तक का खर्च आता है। साथ ही पुलिस द्वारा पकड़े जाने, अपहरण किए जाने, आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने के लिए मजबूर किए जाने या जान गँवाने का भी जोखिम रहता है।

इसी तरह के आपराधिक गिरोह म्यांमार और अन्य देशों में भी सक्रिय हैं। हज़ारों भारतीयों को दक्षिण पूर्व एशिया में कॉल सेंटर और डेटा एंट्री जैसी नौकरियों के फर्जी विज्ञापनों और वादों के जरिए 1-3 लाख रुपए की अग्रिम राशि देकर ठगा जाता है। ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें इस जाल में फँसे भारतीयों के पासपोर्ट जब्त कर लिए गए और उन्हें ‘स्कैम फॉर्म’ में कैद कर दिया गया। न केवल भारतीय, बल्कि अन्य देशों के लोगों को भी निवेश घोटाले या संदिग्ध क्रिप्टो योजनाओं जैसे ऑनलाइन धोखाधड़ी चलाने के लिए इन स्कैम फ़ार्मों में काम करने के लिए मजबूर किया जाता है।

बात नहीं मानने पर प्रताड़ना झेलना पड़ता है। भूखे रखा जाता है और शरीर के अँग काटने की धमकियाँ दी जाती हैं। पीड़ितों को प्रतिदिन कोटा या लक्ष्य दिए जाते हैं और उन्हें पूरा न कर पाने पर उनसे मारपीट किया जाता है। हाल ही में, भारत ने कंबोडिया और थाईलैंड से अपने सैकड़ों नागरिकों को बचाया है।

जैसा कि ऑपइंडिया ने दिसंबर 2023 में बताया था, क्रिस्टल मेथामफेटामाइन की तस्करी का केंद्र होने के अलावा, म्यांमार का उत्तरी शान राज्य चीनी सीमा से लगी चौकियों में कई अन्य अवैध गतिविधियों का भी केंद्र है।

पिछले जुलाई में, म्यावाड्डी के हपा लू स्थित एक स्कैम सेंटर में काम कर रहे आठ भारतीय नागरिकों को बचाकर संबंधित म्यांमार पुलिस और आव्रजन अधिकारियों को सौंप दिया गया था।

ऐसी खबरें आईं कि कई अपहृत भारतीय नागरिकों को एक सशस्त्र समूह द्वारा ऑनलाइन धोखाधड़ी करने के लिए मजबूर किया जा रहा था। उनके परिवारों ने विदेश मंत्रालय से शिकायत कर उनकी रिहाई के लिए हस्तक्षेप की माँग की।

म्यावाडी में सक्रिय एक समूह ने तमिलनाडु के कम से कम 60 लोगों सहित 300 से ज्यादा भारतीयों पर साइबर क्राइम में शामिल होने का दबाव डाला। इन पीड़ितों को धमकियाँ दी गईं, प्रताड़ित किया गया और उन्हें रोजाना 15 घंटे से ज्यादा काम करने के लिए मजबूर किया गया। उन्होंने आगे बताया कि जब उन्होंने गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल होने से इनकार किया, तो उन्हें शारीरिक हिंसा और बिजली के झटके दिए गए।

यह एक दुष्चक्र है जिसमें विदेश में रहने का काल्पनिक सपना और इस सपने को साकार करने की असाध्य हताशा कई भारतीयों को शिकारियों का आसान शिकार बना देती है। अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया या किसी भी यूरोपीय देश तक पहुँचने के लिए किसी भी हद तक जाने की कमज़ोरियाँ और इच्छाशक्ति भारतीय नागरिकों को अपहरण के लिए फिरौती गिरोहों, नौकरी और ऑनलाइन घोटालों, और आधुनिक गुलामी के जाल में फँसा रही है।

लोगों को एजेंटों को लेकर बेहद सतर्क रहने की जरूरत है। कोई शॉटकट नहीं अपनाना चाहिए बल्कि वैध तरीके से ही विदेश जाने की योजना बनानी चाहिए। चाहे इसमें जितना भी वक्त लगे। जब तक उनके पास स्पष्ट, मान्य अनुबंध न हों, तब तक कोई भी पैसा देने से बचना चाहिए।

इसके अलावा, इन घोटालों के बारे में जागरूकता बढ़ाना बेहद जरूरी है, और अगर किसी को भी संदेह है कि वह या उसका कोई परिचित इसका शिकार हो सकता है, तो तुरंत अधिकारियों को इसकी सूचना देनी चाहिए। इस खतरे को खत्म करने के लिए, सरकार को भी कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। जागरूकता कार्यक्रम शुरू करने चाहिए और सहयोगी देशों से सहयोग बढ़ाने के लिए प्रेरित करना चाहिए। भारतीयों को येन केन प्रकारेण विदेश जाना और इसके लिए अवैध तरीके अपनाना बंद करना होगा।

(ये लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

बेगूसराय में ऑपइंडिया टीम पर नशे की हालत में RJD समर्थकों ने बोला हमला, पत्रकारों को धमकाया: लालू के जंगलराज की यादें हुई ताजा

बिहार के बेगूसराय में ऑपइंडिया की टीम रिपोर्टिंग करने गई तो वहाँ नशे में धुत कुछ RJD समर्थक हिंसक हो गए। उन्होंने BJP समर्थकों के साथ बदसलूकी की और पत्रकारों को भी धमकाने लगे। कैमरे के सामने ये सब करते हुए उन्होंने पूरी बातचीत को जैसे हाईजैक कर लिया। स्थानीय लोगों को ये देखकर लालू यादव के जंगलराज के डरावने दिन याद आ गए।

अनुराग मिश्रा की ग्राउंड रिपोर्ट में दिखा कि कैसे ये लोग गुस्से में थे। RJD वाले नशे की हालत में थे और विरोध करने वालों पर टूट पड़े। पत्रकारों ने वीडियो बनाया तो धमकी दी।

बिहार चुनाव 2025 के बीच ये घटना बता रही है कि राजनीतिक तनाव कितना बढ़ गया है। जंगलराज का मतलब था कानून-व्यवस्था का दम निकलना, वही सीन दोबारा लग रहा था। रिपोर्ट में साफ दिखा कि कैसे समर्थक बेकाबू हो जाते हैं। ये वीडियो देखकर समझ आता है कि बिहार में माहौल किस तरह से बिगाड़ा जा रहा है।

ऑपइंडिया की पूरी रिपोर्ट आप नीचे देख सकते हैं:

बिहार चुनाव में महागठबंधन का घोषणा पत्र निकाल देगा राज्य की आर्थिकी का तेल, क्या वादे सिर्फ इसलिए कि सत्ता में आना ही नहीं है तो बड़ी बातों से क्यों हटे पीछे?

बिहार चुनाव में महागठबंधन ने तेजस्वी प्रण के नाम से साझा घोषणा पत्र जारी किया। इसमें बेरोजगारों के लिए सरकारी नौकरी से लेकर किसानों, महिलाओं समेत भी से वादे किए गए हैं। लेकिन इन वादों को पूरा करने पर जो खर्च आएगा, उसे वहन करना बिहार जैसे राज्य के लिए संभव ही नहीं है।

आखिर हम ऐसा क्यों कह रहे हैं, आइये समझते हैं। महागठबंधन के मेनिफेस्टो में सबसे बड़ा वादा हर परिवार के एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी देने का है और वह भी सत्ता में आते ही, सिर्फ 20 महीनों में।

सरकारी नौकरी पर खर्च सालाना 5.5 लाख करोड़ रुपए

2023 की जातिगत सर्वे के मुताबिक, बिहार की जनसंख्या 13,07,25,310 है और यहाँ 2.7 करोड़ परिवार रहते हैं। यानी हर परिवार को नौकरी दी गई तो ये संख्या होगा 2.7 करोड़। फिलहाल बिहार में अभी 20 लाख लोग सरकारी नौकरी कर रहे हैं। इन लोगों को अगर घटा दिया जाए तो भी 2.5 करोड़ लोगों को सरकारी नौकरी देनी होगी।

अगर इतने लोगों को चतुर्थ वर्ग का कर्मचारी भी बनाया जाए तो उन्हें कम से कम 18000 रुपए देने होंगे। यानी हर महीने राज्य को 45 हजार करोड़ रुपए अतिरिक्त खर्च करने होंगे। सालाना खर्च की बात की जाए तो ये होगा करीब 5.5 लाख करोड़ रुपए।

बेरोजगारी भत्ता पर खर्च करीब 10 हजार करोड़ रुपए

बिहार के ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट कर चुके बेरोजगारों को हर महीने क्रमश: 2000 रुपए और 3000 रुपए बेरोजगारी भत्ता देने की बात कही गई है।

अगर मान लें कि आधे ग्रेजुएट और आधे पोस्ट ग्रेजुएट को सरकारी नौकरी मिल जाती है, तो बच जाते हैं आधे। 2023 की जातिगत जनगणना के मुताबिक, राज्य में 7989528 लोग ग्रेजुएट हैं। जबकि राज्य में स्नातकोत्तरों की कुल संख्या 1076700 है, जो कुल जनसंख्या का 0.82 प्रतिशत है।

इनमें से आधे लोग नौकरी में चले भी गए तो करीब 45 लाख लोगों को बेरोजगारी भत्ता देना होगा। ये खर्च आएगा कम से कम 10 हजार करोड़ रुपए।

स्वास्थ्य बीमा पर खर्च आएगा कम से कम 5 हजार करोड़ रुपए

महागठबंधन के वादों में एक वादा स्वास्थ्य को लेकर भी किया गया है। यानी महागठबंधन हर गरीब और लोअर मिडिल क्लास के परिवार को 25 लाख का बीमा कराएगा। एक अनुमान के मुताबिक बिहार में 94 लाख परिवार गरीबी रेखा से नीचे जीवन व्यतीत करते हैं। यानी राज्य में कम से कम 94 लाख परिवारों को स्वास्थ्य बीमा दिया जाएगा।

आयुष्मान के आधार पर इसपर होने वाले खर्च का भी अनुमान लगाया जा सकता है। आयुष्मान धारकों में हर साल करीब 47 फीसदी लोग क्लेम करते हैं। उस हिसाब से अगर बिहार में 44 लाख परिवार औसतन क्लेम करते हैं। ये खर्च अगर 12 हजार रुपए प्रति परिवार भी हैं, तो खर्च आएगा करीब 5 हजार करोड़ रुपए।

200 यूनिट फ्री बिजली पर खर्च 16 हजार करोड़ रुपए सालाना

बिहार में बिजली रेट है कम से कम 7.42 रुपए यानी 200 यूनिट महीने का खर्च आएगा करीब 1500 रुपए प्रति परिवार। अगर बिहार में सिर्फ गरीब परिवारों को ही फ्री बिजली दिया गया तो 94 लाख परिवारों पर हर महीने खर्च आएगा करीब ₹1400 करोड़। यानी सालाना 16 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा।

इसके अलावा भी कई वादे किए गए हैं, जिसका असर राज्य की कमाई पर पड़ेगा। इनको जोड़ दिया जाए तो कम से कम ये खर्च आएगा 5 लाख 80 हजार करोड़ रुपए। सरकारी सब्सिडी के वादे को जोड़ा जाए तो ये बजट और ऊपर जाएगा, क्योंकि इसमें भी जनता की गाढ़ी कमाई ही इस्तेमाल होती है।

अब सवाल ये है कि इतना खर्च आएगा कहाँ से? राज्य का 2023-24 का बजट देखा जाए तो ये है करीब 3 लाख 16 हजार करोड़ रुपए का। यानी महागठबंधन ने राज्य की जनता से जो वादे किए हैं, उस पर बिहार के बजट का दोगुने से ज्यादा खर्च आएगा।

महागठबंधन ये पैसे कहाँ से ला पाएगा, इस पर न तो कॉन्ग्रेस कुछ कहती है और न ही आरजेडी। महागठबंधन के इस वादे से तो बड़े बड़े उनके समर्थक भी हिल गए हैं। अजीम अंजुम ने खर्च का हिसाब बताया है 9 लाख करोड़ रुपए।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि जब सत्ता में आना ही नहीं है तो वादा करने से गुरेज क्यों? जनता से जितना चाहे वादे कर डालो, पूरा करना तो है नहीं।

कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश सरकार का बुरा हाल

कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश जैसे कॉन्ग्रेस शासित राज्यों का बुरा हाल है। कैग की 2023-24 की रिपोर्ट के मुताबिक, कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार की पाँच “गारंटी” योजनाओं ने खर्च में 36,538 करोड़ रुपए की वृद्धि की, जो कुल खर्च का लगभग 15% है, जबकि राजस्व में बमुश्किल 2% की वृद्धि हुई।

कर्नाटक का राजकोषीय घाटा बढ़कर 65,522 करोड़ रुपए हो गया, जिससे सरकार को बाजार से 63,000 करोड़ रुपये उधार लेने पड़े। हिमाचल प्रदेश भी वित्तीय संकट को देखते हुए वेतन में कटौती और मुफ्त सुविधाओं को वापस ले रहा है।