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अहमदाबाद के जिस मिशनरी स्कूल में घोंपा गया हिंदू छात्र को चाकू, उसे सरकार के नियंत्रण में देने की सिफारिश: जानिए ‘सेवेंथ डे स्कूल’ की जाँच के बाद रिपोर्ट में क्या-क्या हुए खुलासे, पढ़ें Exclusive डिटेल

रिपोर्ट के अनुसार, जाँच में सामने आया कि स्कूल ने मान्यता के लिए सरकारी नियमों का उल्लंघन किया और अतिरिक्त कक्षाओं के लिए अनुमति नहीं ली गई थी। प्रबंधन और स्कूल परिसर में किए गए बदलाव के लिए भी जरूरी मंजूरी नहीं ली गई। इसके अलावा स्कूल के प्रबंधन में भी कई गड़बड़ियाँ मिली हैं।

गुजरात के अहमदाबाद स्थित सेवेंथ डे स्कूल में हिंदू छात्र की मुस्लिम सहपाठी द्वारा हत्या मामले में जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा नियुक्त समिति ने रिपोर्ट सौंप दी है। रिपोर्ट में बताया गया कि स्कूल प्रशासन ने लापरवाही बरती है और कई नियमों का उल्लंघन भी किया है। समिति ने स्कूल को सरकार के नियंत्रण में लेने की भी सिफारिश की है। शिक्षा अधिकारी ने यह रिपोर्ट राज्य सरकार को भेज दी है। अब सरकार आगे की कार्रवाई करेगी।

रिपोर्ट के अनुसार, जाँच में सामने आया कि स्कूल ने मान्यता के लिए सरकारी नियमों का उल्लंघन किया और अतिरिक्त कक्षाओं के लिए अनुमति नहीं ली गई थी। प्रबंधन और स्कूल परिसर में किए गए बदलाव के लिए भी जरूरी मंजूरी नहीं ली गई। इसके अलावा स्कूल के प्रबंधन में भी कई गड़बड़ियाँ मिली हैं। समिति की जाँच में यह भी पता चला कि अल्पसंख्यक स्कूल का दर्जा प्राप्त करने में कुछ अनियमितताएँ बरती गई थीं।

नियमों का उल्लंघन और गड़बड़ियाँ

जाँच में यह भी सामने आया कि है कि जिस जमीन पर स्कूल चल रहा है, उस जमीन को अहमदाबाद नगर निगम ने साल 2003 में लीज पर दिया था। लेकिन स्कूल ने 80 के दशक में कुछ कक्षाओं के लिए मंजूरी ली थी। वह जगह अब मौजूद नहीं है और न ही इस जगह पर कक्षाओं की मंजूरी के लिए समिति के सामने कोई आधार प्रस्तुत किया गया है। इसीलिए समिति ने प्रथम दृष्टया इस स्कूल को अवैध घोषित कर दिया था।

इसके अतिरिक्त, बाद में स्कूल में कुछ अतिरिक्त कक्षाएँ शुरू की गईं, जिनके लिए नियमानुसार बोर्ड से पहले एप्रूवल की आवश्यकता होती है लेकिन स्कूल ने इस नियम का पालन नहीं किया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि नियमों के अनुसार, प्रबंधन, ट्रस्ट या स्कूल परिसर में कुछ बदलाव करने के लिए संबंधित बोर्ड से अनुमति लेना जरूरी है लेकिन इस मामले में ऐसा कोई दस्तावेज जमा नहीं किया गया। इसके अलावा अगर स्कूल दो पालियों में भी चलाना है तो भी पहले बोर्ड से अनुमति लेनी जरूरी है। इस मामले में भी बिना अनुमति के ही दो पालियों में कक्षाएँ चलाई जा रही थीं।

जाँच में यह भी सामने आया है कि स्कूल का संचालन किस ट्रस्ट या सोसायटी द्वारा किया जा रहा है। इसकी साफ जानकारी नहीं दी गई है। समिति के सामने रखे गए दस्तावेजों में स्कूल संचालक के रूप में अलग-अलग नाम दिए गए हैं। इनमें इंडिया फाइनेंशियल एसोसिएशन ऑफ सेवेंथ डे एडवेंटिस्ट्स, काउंसिल ऑफ सेवेंथ डे एडवेंटिस्ट्स एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन्स और एशलोक एजुकेशन ट्रस्ट शामिल हैं। इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि वास्तव में कौन-सा ट्रस्ट या संस्था स्कूल का संचालन कर रही है।

साथ ही स्कूल ने अल्पसंख्यक दर्जा (माइनॉरिटी स्टेटस) पाने के लिए कई नियमों का पालन नहीं किया। रिपोर्ट के अनुसार, एशलोक एजुकेशन सोसायटी ने सितंबर 2020 में अहमदाबाद जिला शिक्षा अधिकारी के कार्यालय में अल्पसंख्यक दर्जा पाने के लिए आवेदन किया था। यह सोसायटी पुणे में पंजीकृत है और इसे महाराष्ट्र सरकार ने 14 मार्च 2013 को ‘माइनॉरिटी स्टेटस’ दिया था, जो सिर्फ महाराष्ट्र के लिए मान्य है।

इसके अलावा, रिपोर्ट में कहा गया कि संस्था ने प्राथमिक विभाग के लिए अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था होने का प्रमाण भी स्पष्ट रूप से प्रस्तुत नहीं किया। इसी कारण से आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के 25 प्रतिशत बच्चों को प्रवेश नहीं दिया गया, जो कि RTE (शिक्षा का अधिकार) अधिनियम का उल्लंघन है।

लीज एग्रीमेंट का उल्लंघन

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि स्कूल ने लीज एग्रीमेंट का उल्लंघन किया है। जिस जमीन पर स्कूल बना हुआ है, उसे नगर निगम ने द इंडिया फाइनेंशियल एसोसिएशन ऑफ सेवेंथ डे एडवेंटिस्ट्स को शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए लीज पर दिया था। लेकिन स्कूल का प्रबंधन अलग-अलग संस्थाओं द्वारा किया जा रहा है। यानी जमीन किसी और संस्था को लीज पर दी गई थी और स्कूल का प्रबंधन अलग संस्थाएँ कर रही हैं।

यहाँ तक कि स्कूल ने शुल्क (फीस) नियमों का भी उल्लंघन किया है। रिपोर्ट में बताया गया कि संस्था ने फीस नियामक समिति को किराया ₹1,59,000 दिखाया जबकि वास्तव में नगर निगम ने जमीन केवल ₹10,000 के किराए पर दी थी।

स्कूल परिसर में MBA और BSc के साथ आर्ट्स कॉलेज भी चलाए जा रहे हैं। नियम के अनुसार, ऐसा करने के लिए संबंधित बोर्ड से NOC(अनापत्ति प्रमाणपत्र) लेना जरूरी होता है। स्कूल ने 2022 में ICSE बोर्ड से NOC तो ले ली थी, लेकिन गुजरात माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक शिक्षा बोर्ड से NOC नहीं ली।

इसके अलावा, कुछ और गड़बड़ियाँ भी मिली हैं। जैसे कि नियमों के मुताबिक स्कूल परिसर में किताबें बेचना मुनाफाखोरी माना जाता है लेकिन ऑडिट रिपोर्ट में पाया गया कि स्कूल में किताबें बेची जा रही थीं, जो नियमों का उल्लंघन है।

स्कूल प्रशासन पर सरकारी अधिग्रहण की सिफारिश

जाँच रिपोर्ट में समिति ने कहा है कि सभी पहलुओं पर विचार करने पर यह साफ है कि स्कूल ने मान्यता की शर्तों का उल्लंघन किया है। इसके साथ ही रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि झूठे आधार प्रस्तुत करके धोखाधड़ी की गई है, जिससे शिक्षा विभाग, FRC, अभिभावकों और छात्रों का विश्वास टूटा है।

समिति ने सरकार से सिफारिश की है कि स्कूल में पढ़ने वाले 10 हजार से ज्यादा छात्रों के हितों को ध्यान में रखते हुए स्कूल का प्रशासन सरकार को सौंप दिया जाएगा या फिर इसे किसी अन्य ट्रस्ट को सौंप दिया जाए। शिक्षा अधिकारी ने यह रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है। आने वाले समय में और भी बड़े फैसले लिए जा सकते हैं।

क्या है पूरा मामला?

गौरतलब है कि अगस्त 2025 में 10वीं कक्षा में पढ़ने वाले एक हिंदू छात्र नयन संतानी को उसी स्कूल में पढ़ने वाले एक मुस्लिम छात्र ने चाकू मारकर हत्या कर दी थी। इस घटना के बाद अभिभावकों में आक्रोश था और स्कूल पर गंभीर आरोप लगाए गए। स्कूल में पहले भी कुछ ऐसी ही घटनाएँ सामने आ चुकी हैं, जिसके चलते स्कूल प्रशासन पर सवाल खड़े होते रहे हैं।

घटना के बाद जिला शिक्षा अधिकारी ने जाँच के आदेश दिए। हालाँकि, स्कूल ने इसके खिलाफ गुजरात उच्च न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया, लेकिन कोर्ट ने भी कोई राहत नहीं दी और जाँच में सहयोग करने का निर्देश दिया। अब समिति द्वारा जाँच रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद मामला जिला शिक्षा अधिकारी और सरकार के फैसले का इंतजार है।

(मूलरूप से यह रिपोर्ट गुजराती भाषा में लिखी गई है, जिसे विस्तार में पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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