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बिहार चुनाव में महागठबंधन का घोषणा पत्र निकाल देगा राज्य की आर्थिकी का तेल, क्या वादे सिर्फ इसलिए कि सत्ता में आना ही नहीं है तो बड़ी बातों से क्यों हटे पीछे?

बिहार चुनाव में महागठबंधन ने तेजस्वी प्रण के नाम से साझा घोषणा पत्र जारी किया। इसमें बेरोजगारों के लिए सरकारी नौकरी से लेकर किसानों, महिलाओं समेत भी से वादे किए गए हैं। लेकिन इन वादों को पूरा करने पर जो खर्च आएगा, उसे वहन करना बिहार जैसे राज्य के लिए संभव ही नहीं है।

आखिर हम ऐसा क्यों कह रहे हैं, आइये समझते हैं। महागठबंधन के मेनिफेस्टो में सबसे बड़ा वादा हर परिवार के एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी देने का है और वह भी सत्ता में आते ही, सिर्फ 20 महीनों में।

सरकारी नौकरी पर खर्च सालाना 5.5 लाख करोड़ रुपए

2023 की जातिगत सर्वे के मुताबिक, बिहार की जनसंख्या 13,07,25,310 है और यहाँ 2.7 करोड़ परिवार रहते हैं। यानी हर परिवार को नौकरी दी गई तो ये संख्या होगा 2.7 करोड़। फिलहाल बिहार में अभी 20 लाख लोग सरकारी नौकरी कर रहे हैं। इन लोगों को अगर घटा दिया जाए तो भी 2.5 करोड़ लोगों को सरकारी नौकरी देनी होगी।

अगर इतने लोगों को चतुर्थ वर्ग का कर्मचारी भी बनाया जाए तो उन्हें कम से कम 18000 रुपए देने होंगे। यानी हर महीने राज्य को 45 हजार करोड़ रुपए अतिरिक्त खर्च करने होंगे। सालाना खर्च की बात की जाए तो ये होगा करीब 5.5 लाख करोड़ रुपए।

बेरोजगारी भत्ता पर खर्च करीब 10 हजार करोड़ रुपए

बिहार के ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट कर चुके बेरोजगारों को हर महीने क्रमश: 2000 रुपए और 3000 रुपए बेरोजगारी भत्ता देने की बात कही गई है।

अगर मान लें कि आधे ग्रेजुएट और आधे पोस्ट ग्रेजुएट को सरकारी नौकरी मिल जाती है, तो बच जाते हैं आधे। 2023 की जातिगत जनगणना के मुताबिक, राज्य में 7989528 लोग ग्रेजुएट हैं। जबकि राज्य में स्नातकोत्तरों की कुल संख्या 1076700 है, जो कुल जनसंख्या का 0.82 प्रतिशत है।

इनमें से आधे लोग नौकरी में चले भी गए तो करीब 45 लाख लोगों को बेरोजगारी भत्ता देना होगा। ये खर्च आएगा कम से कम 10 हजार करोड़ रुपए।

स्वास्थ्य बीमा पर खर्च आएगा कम से कम 5 हजार करोड़ रुपए

महागठबंधन के वादों में एक वादा स्वास्थ्य को लेकर भी किया गया है। यानी महागठबंधन हर गरीब और लोअर मिडिल क्लास के परिवार को 25 लाख का बीमा कराएगा। एक अनुमान के मुताबिक बिहार में 94 लाख परिवार गरीबी रेखा से नीचे जीवन व्यतीत करते हैं। यानी राज्य में कम से कम 94 लाख परिवारों को स्वास्थ्य बीमा दिया जाएगा।

आयुष्मान के आधार पर इसपर होने वाले खर्च का भी अनुमान लगाया जा सकता है। आयुष्मान धारकों में हर साल करीब 47 फीसदी लोग क्लेम करते हैं। उस हिसाब से अगर बिहार में 44 लाख परिवार औसतन क्लेम करते हैं। ये खर्च अगर 12 हजार रुपए प्रति परिवार भी हैं, तो खर्च आएगा करीब 5 हजार करोड़ रुपए।

200 यूनिट फ्री बिजली पर खर्च 16 हजार करोड़ रुपए सालाना

बिहार में बिजली रेट है कम से कम 7.42 रुपए यानी 200 यूनिट महीने का खर्च आएगा करीब 1500 रुपए प्रति परिवार। अगर बिहार में सिर्फ गरीब परिवारों को ही फ्री बिजली दिया गया तो 94 लाख परिवारों पर हर महीने खर्च आएगा करीब ₹1400 करोड़। यानी सालाना 16 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा।

इसके अलावा भी कई वादे किए गए हैं, जिसका असर राज्य की कमाई पर पड़ेगा। इनको जोड़ दिया जाए तो कम से कम ये खर्च आएगा 5 लाख 80 हजार करोड़ रुपए। सरकारी सब्सिडी के वादे को जोड़ा जाए तो ये बजट और ऊपर जाएगा, क्योंकि इसमें भी जनता की गाढ़ी कमाई ही इस्तेमाल होती है।

अब सवाल ये है कि इतना खर्च आएगा कहाँ से? राज्य का 2023-24 का बजट देखा जाए तो ये है करीब 3 लाख 16 हजार करोड़ रुपए का। यानी महागठबंधन ने राज्य की जनता से जो वादे किए हैं, उस पर बिहार के बजट का दोगुने से ज्यादा खर्च आएगा।

महागठबंधन ये पैसे कहाँ से ला पाएगा, इस पर न तो कॉन्ग्रेस कुछ कहती है और न ही आरजेडी। महागठबंधन के इस वादे से तो बड़े बड़े उनके समर्थक भी हिल गए हैं। अजीम अंजुम ने खर्च का हिसाब बताया है 9 लाख करोड़ रुपए।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि जब सत्ता में आना ही नहीं है तो वादा करने से गुरेज क्यों? जनता से जितना चाहे वादे कर डालो, पूरा करना तो है नहीं।

कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश सरकार का बुरा हाल

कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश जैसे कॉन्ग्रेस शासित राज्यों का बुरा हाल है। कैग की 2023-24 की रिपोर्ट के मुताबिक, कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार की पाँच “गारंटी” योजनाओं ने खर्च में 36,538 करोड़ रुपए की वृद्धि की, जो कुल खर्च का लगभग 15% है, जबकि राजस्व में बमुश्किल 2% की वृद्धि हुई।

कर्नाटक का राजकोषीय घाटा बढ़कर 65,522 करोड़ रुपए हो गया, जिससे सरकार को बाजार से 63,000 करोड़ रुपये उधार लेने पड़े। हिमाचल प्रदेश भी वित्तीय संकट को देखते हुए वेतन में कटौती और मुफ्त सुविधाओं को वापस ले रहा है।

वैचारिक विरोधियों को ब्लॉक करता है वामपंथी प्रोपेगेंडा वाला विकिपीडिया, को-फाउंडर जिमी वेल्स ने खुद किया स्वीकार: पूर्वाग्रहों के आधार पर करता है काम

पॉलिटिक्स होम ने 27 अक्टूबर 2025 को एक नया इंटरव्यू छापा। इसमें विकिपीडिया के को-फाउंडर (सह-संस्थापक) जिमी वेल्स ने ब्रिटेन सरकार के साथ ‘राजनीतिक झगड़े’ की चेतावनी दी, जो ऑनलाइन सेफ्टी कानून को लेकर है। उन्होंने इस कानून को ‘बुरा सोचा हुआ’ बताया और कहा कि ये इंटरनेट को ‘ओपन’ रखने में खतरा पैदा करेगा। क्योंकि ये प्लेटफॉर्मों को लोगों की पहचान बताने और उम्र चेक करने के लिए मजबूर करेगा। उन्होंने कहा कि विकिपीडिया ने तुर्की या चीन सरकारों की ऐसी माँगों के आगे सिर नहीं झुकाया।

लेकिन उसी बातचीत में वेल्स ने बिना पछतावे के विकिपीडिया की अपनी अंदरूनी सेंसरशिप का बचाव किया। यानी उन स्रोतों को ब्लैकलिस्ट करना जिन्हें उन्होंने खुद पहले गलत माना है। उन्होंने कहा कि “ऐसी साइट्स को लेना जो हमेशा पागल साजिश की कहानियाँ और बकवास छापती हैं, ये बिल्कुल बेवकूफी है।” उन्होंने ब्लैकलिस्ट वाले प्रकाशनों को ‘साजिश की कहानियाँ और बकवास’ का इतिहास बताया। लेकिन हकीकत में ज्यादातर दक्षिणपंथी झुकाव वाले प्रकाशन को विकिपीडिया ने स्रोत के तौर पर लेने से बैन कर दिया था। इसका मतलब ये स्रोत ऑनलाइन, यूजर-बनाई ‘ज्ञानकोश’ के लेखों में इस्तेमाल नहीं हो सकते।

विरोधाभास साफ दिखता है। वेल्स ने सरकार के बोलने पर नियंत्रण को ठुकराया, लेकिन विकिपीडिया की सूचना पर विचारधारा आधारित पहरेदारी को पूरी तरह ठीक बताया। मुद्दा ये नहीं कि विकिपीडिया को गुणवत्ता चेक करनी चाहिए, जो हर प्लेटफॉर्म को चाहिए। बल्कि ये है कि क्या ये चेक (जाँच) एक विचारधारा (वामपंथ) को दुनिया भर में बढ़ावा देने और दूसरी (दक्षिणपंथ) को बाहर करने का हथियार बन गया है।

विकिपीडिया की जाँच सिर्फ नाम भर की, हकीकत-विरोधियों को दबाना

वेल्स ने आगे कहा कि ब्लैकलिस्ट और पुराने स्रोतों की व्यवस्था सिर्फ ‘गुणवत्ता’ के बारे में है, राजनीति के बारे में नहीं। उन्होंने कहा, “ये डेली मेल के राजनीतिक विचार के बारे में नहीं – ये उसकी छपाई की गुणवत्ता के बारे में है।” उन्होंने द सन और द डेली मेल जैसे मुख्यधारा प्रकाशनों को पुराना (आर्काइव) करने का बचाव किया। साथ ही माना कि ब्रेटबार्ट न्यूज और द हेरिटेज फाउंडेशन जैसे रूढ़िवादी (परंपरावादी) जगहों को पूरी तरह ब्लैकलिस्ट कर दिया गया है।

लेकिन असल में इसका मतलब पूरे विचारधारा वाले सिस्टम को मिटा देना है। वेल्स ने माना कि ब्लैकलिस्ट हटाना नामुमकिन है। उन्होंने विकिपीडिया में लेफ्टिस्ट विचारों का पक्षपात होने की आलोचना को नकार दिया और कहा कि वो खुद ‘बीच का रास्ता’ अपनाते हैं। उनकी ये नकारना ‘मिडिल्ड मॉडरेशन’ के आसान नाम से ढका था। यही वो बहाना जो बड़ी टेक कंपनियाँ अक्सर पक्षपात को जायज ठहराने के लिए इस्तेमाल करती हैं, जबकि खुद की तटस्थता का नाटक करती हैं।

असहमत मीडिया को ‘पागल साजिश वाली साइट्’ कहकर वेल्स ने इशारा किया कि कोई रूढ़िवादी (परंपरावादी-राष्ट्रवादी-दक्षिणपंथी) प्रकाशन (पब्लिकेशन) विकिपीडिया के नॉलेज सिस्टम में बराबर जगह नहीं पाता। ये सोच ही विकिपीडिया की लंबे दावे वाली तटस्थता को तोड़ देती है।

अल जज़ीरा से ऑपइंडिया तक- कैसे चुनिंदा भरोसा बदलता है नरेटिव का खेल

सितंबर 2024 में ऑपइंडिया ने विकिपीडिया पर एक रिपोर्ट जारी की। इसमें दिखाया गया कि विचारधारा का पक्षपात वेल्स की नई बातों से बहुत पहले से था। ये दिखाता है कि विकिपीडिया का कंटेंट सीधे संपादक के आदेश से नहीं, बल्कि ‘भरोसेमंद’ और ‘न भरोसेमंद’ स्रोतों के बाँटने के खेल से जुड़ा होता है। ये जिसे जिस लिस्ट में डाल दें।

मिसाल के तौर पर लेफ्टिस्टि यानी वापमंथी झुकाव वाली और वैश्विक सोच वाली जगहें जैसे अल जज़ीरा, बीबीसी, द गार्जियन और द वायर को ‘भरोसेमंद’ कहा जाता है। जबकि दक्षिणपंथी, मध्यमार्गी या राष्ट्रवादी जैसे ऑपइंडिया, स्वराज्य और रिपब्लिक को ब्लैकलिस्ट या गैर-भरोसेमंद के टैग में बदल दिया जाता है।

ये बाँटने का खेल खुद भी चलता रहता है। एक बार ‘भरोसेमंद’ स्रोत को हाँ मिल जाए, तो उसकी झूठी खबर को भी सच्ची गलती बता दिया जाता है। द वायर का ही उदाहरण ले लें। द वायर ने एक फेक ऐप ‘टेक फॉग’ पर आधारित झूठी खबरें कीं। और एक लेख में कहा कि बीजेपी के पास मेटा के तहत सोशल मीडिया पर कंटेंट रोकने का तरीका है। दोनों बातें गलत साबित हुईं जब मेटा पर आरोप लगाया और जानकारों ने बीच में आए।

रिपोर्ट ने कई जगहों का जिक्र किया जहाँ द वायर की साबित झूठी खबरों को बचाया गया। क्योंकि विरोधी सबूत ब्लैकलिस्ट वाली जगहों से आए थे।

एक और मिसाल में एक रिटायर्ड नौसेना अधिकारी ने खुलेआम द वायर पर इल्जाम लगाया कि उसने भारत की नौसेना कामयाबी को छोटा दिखाने वाले लेख में उसके बात को गलत लिखा। लेकिन उसका बयान द वायर के विकिपीडिया पेज पर नहीं डाला जा सका। क्यों? क्योंकि ट्विटर पर उसकी सफाई को ‘खुद का स्रोत’ कहा गया। और ऑपइंडिया जिसने उसके जवाब की खबर की थी, उसे ब्लैकलिस्ट रखा गया। नतीजा ये हुआ कि द वायर की फेक न्यूज बिना रोक-टोक के फैलती रही।थ ये विकिपीडिया के तटस्थ नजरिए के गिरने का साफ उदाहरण है, जब तटस्थता विचारधारा से तय होती है।

एक और उदाहरण दें, पुलिस के आधिकारिक अकाउंट्स ने द वायर की कहानियों को झूठा बताया, तो विकिपीडिया वाले संपादकों ने उनका कोट तक शामिल करने से मना कर दिया। उनका तर्क था कि पुलिस के बयान को ‘दूसरा भरोसेमंद स्रोत’ साबित करे। लेकिन वो सभी दूसरी जगहें ऑपइंडिया, रिपब्लिक और स्वराज्य सहित ब्लैकलिस्ट थीं। तो सच्चाई को व्यवस्था से दबा दिया गया।

ये तर्क और बेतुका हो जाता है क्योंकि विकिपीडिया अल जज़ीरा की भारत-विरोधी झूठी रिपोर्ट को ‘कन्फ्यूजन या युद्ध की रिपोर्टिंग में होने वाली आम गलतियाँ’ बता माफ कर देता है। लेकिन ऑपइंडिया की साबित सच्ची बातों को शुरू से ही गैर-भरोसेमंद कह देता है।

ब्लैकलिस्टिंग के खेल से पक्षपात को संस्थागत का रूप देना

ऑपइंडिया की विकिपीडिया रिपोर्ट ने विस्तार से दिखाया कि ब्लैकलिस्ट प्रक्रिया खुद पक्षपात को संस्थागत रूप देने का तरीका बनी। इसने विकिपीडिया संपादकों के बार-बार कोशिशों का रिकॉर्ड सामने रखा, जो वाम झुकाव वाली मीडिया खासकर द वायर जैसों की फेक न्यूज को उजागर करने से रोकते थे। जब एक संपादक ने द वायर के खिलाफ एफआईआर का उद्धरण डालने की कोशिश की, जो पूर्वोत्तर में झूठ फैलाकर हिंसा भड़काने वाली थी, तो दूसरे बड़े संपादक ने कहा ‘एफआईआर तो आम बात हैं।’

रिपोर्ट ने देखा कि विकिपीडिया उन प्रकाशनों के एफआईआर को बड़ा दिखाता था जिन्हें नापसंद करता था। लेकिन ‘भरोसेमंद’ वापमंथी स्रोतों पर एफआईआर को या तो छोड़ देता या हल्का कर देता। ऐसी दोहरी छाप ने रूढ़िवादी या राष्ट्रवादी जगहों को हमेशा के लिए गैर-भरोसेमंद बना दिया, जबकि विचारधारा के साथियों को बहानों से बचाया।

ये सिर्फ बेतरतीब संपादक का काम नहीं था। ये तटस्थता का नाटक बनाए रखने का बना बनाया पैटर्न है, ताकि चुनिंदा सच्ची खबरों को सामने आने से रोका जा सके। वेल्स का इस सिस्टम का नया बचाव बताता है कि ये कभी बागी ‘वालंटियर्स’ का काम नहीं था, बल्कि पहले से चल रहा एक अनकहा नियम था।

न्यूजलिंगर से मिलिए- जिसने पैसे लेकर भी विकिपीडिया के प्लेटफॉर्म को बना दिया ‘बायस्ड’

रिपोर्ट के सबसे साफ हिस्सों में न्यूजलिंगर नाम के संपादक की पहचान की गई, जो विकीमीडिया का एडमिन है। उसने गैर-वाम स्रोतों को पुराना करने और सच्चे सुधारों को रोकने के लिए जोरदार कोशिश की। रिपोर्ट के मुताबिक, विकीमीडिया फाउंडेशन ने खुद न्यूजलिंगर को विकीक्रेड प्रोग्राम से पैसे दिए। ये प्रोग्राम ‘सूचना सिस्टम में भरोसेमंदी मजबूत करने’ वाले प्रोजेक्ट्स को 10,000 डॉलर तक देता था।

न्यूजिंगर का प्रोजेक्ट ‘सोर्सरर: विकिपीडिया कम्युनिटी का झूठ के खिलाफ प्लेटफॉर्म’ नाम का था। इसमें ब्राउजर टूल और एपीआई बनाने का प्लान था जो विकिपीडिया की पुरानी स्रोत सूची, यानी ब्लैकलिस्ट से इंटरनेट पर साइट्स को नाम देता। उसके पैसे के विवरण में कहा गया कि ये टूल विकिपीडिया से ‘भरोसेमंद’ साइट्स के लिए निशान दिखाएगा। इससे विकिपीडिया की विचारधारा पर रोक उसके पेजों से बाहर फैल जाएगी।

उसने फख्र किया कि सोर्सरर बोट सूची को खुद स्कैन और अपडेट करेगा। एक और फीचर से संपादक ‘गैर-भरोसेमंद’ स्रोतों के उद्धरण कुछ बटन दबाकर हटा सकेंगे। आसान शब्दों में पैसे लेने वाले विकिपीडिया एडिमिनिस्ट्रेटर ने असहमति वाले सबूतों को हटाने का सिस्टम बनाया। साथ ही विचारधारा वाले साथियों को बड़ा बताया। ये सब उसने विकीमीडिया फाउंडेशन से मंजूर हुए पैसों के जरिए किया।

विकीमीडिया का पैसे देना बताता है कि पक्षपात ऊपर से मंजूर था

यहीं जिमी वेल्स की नई बातें अहम हैं। जब वो कहते हैं, ‘ऐसी साइट्स को लेना जो हमेशा पागल साजिश और बकवास छापती हैं, बेवकूफी है’ तो वो वही सोच दोहरा रहे हैं जिसे न्यूजलिंगर को पैसे देकर लिखवाया गया।

न्यूजलिंगर को पैसे देना कोई छोटी गलती नहीं थी। ये संस्था का समर्थन था। ‘भरोसेमंद सूची’ को हथियार बनाने वाले प्रोजेक्ट को चेक कर पैसे देकर, विकीमीडिया ने उसके नीचे के संपादक फैसलों से रजामंदी दिखाई। इसलिए विकिपीडिया की विचारधारा उनके स्वयंसेवकों का पक्षपात का संयोग नहीं। बल्कि ऊपर से सोची, पैसे दी गई और सही तरीके से अपनाई गई नीति है।

जब वेल्स ब्लैकलिस्ट बचाते हैं, तो वो उसी पैसे के नतीजे का बचाव कर रहे हैं। उनकी बातें रिपोर्ट की पुरानी चेतावनी साबित करती हैं कि विकिपीडिया का पक्षपात ऊपर से मँजूर और बनाया गया था, कुछ बागी संपादकों का नहीं।

यह सेंसरशिप मॉडल सत्य और लोकतंत्र के लिए क्यों खतरनाक है

यहाँ खतरा एक प्लेटफॉर्म से परे फैलता है। विकिपीडिया पत्रकारों, छात्रों और यहाँ तक कि उसके डेटा पर आधारित एआई मॉडल्स के लिए डिफॉल्ट संदर्भ बिंदु बना हुआ है। जब ऐसा एक प्लेटफॉर्म पूरे विचारधाराओं को ब्लैकलिस्ट करता है, तो यह केवल तथ्यों को फिल्टर नहीं करता, यह सार्वजनिक समझ को तार-तार कर देता है।

एक छात्र भारतीय राजनीति ढूँढेगा तो द वायर, स्क्रॉल और बीबीसी को खूब ‘कोट’ कर पाएगा, लेकिन ऑपइंडिया और स्वराज्य गायब दिखेंगे। ये गायबगी मिटाने जैसी है। ‘भरोसेमंद’ स्रोतों की दोहराई झूठी कहानी को सच्चाई मान लिया जाता है। जबकि ब्लैकलिस्ट वाली जगह से सच्चा सुधार भुला दिया जाता है।

तटस्थता बन जाती है प्रोपेगेंडा- विचारधारा को लेकर खुलेपन की जरूरत

जिमी वेल्स ने कहा था कि विकिपीडिया का काम ‘सारे इंसानी ज्ञान को सबके लिए पहुँचाना’ है। आज ये काम शर्तों वाला लगता है, ज्ञान तभी ठीक अगर राजनीतिक तौर पर एक तरफ से मेल खाए। ऐसे में ‘तटस्थ नजरिया’ वाला नियम अनदेखा कर दिया जाता है, क्योंकि तटस्थता अब इस पर टिकी है कि कौन से स्रोत उस लेख में आने दिए जाते हैं।

जैसा ऑपइंडिया की रिपोर्ट में कहा गया है, “अगर भरोसेमंद स्रोतों का समूह ही वैचारिक पक्षपात से भरा है, तो ‘तटस्थ नजरिया’ सिर्फ नियम है जहाँ लेफ्ट विचारधारा ही चलती है।”

एलन मस्क का ग्रोकिपीडिया लॉन्च, जो विकिपीडिया का एआई वाला विकल्प है, सही समय पर आया। वेल्स सरकारी रोक की चेतावनी देते हैं, लेकिन उनका प्लेटफॉर्म लंबे समय से मॉडरेशन के नाम पर हल्की तानाशाही का नमूना है। अगर ग्रोकिपीडिया असहमति को ब्लैकलिस्ट न कर कई विचारों को जगह देता रहे, तो विकिपीडिया की तथाकथित तटस्थता की कमजोरी खुल जाएगी।

अब विकिपीडिया के रीडर्स को उसके फाउंडरों से भरोसेमंद और गैर-भरोसेमंद सोर्स को लेकर लेक्चर पाने की जरूरत नहीं है, बल्कि जरूरत है तो उनके ये मानने की कि उनकी अंदरुनी व्यवस्था में ही सेंसरशिप जैसा जाल है। ट्रांसपेरेंसी वहीं से शुरू होगी, जिसमें एक पक्ष को रोकने को तटस्थता कहना बंद कर दिया जाए।

मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

योगी आदित्यनाथ को तो ‘नकली बाबा’ कह दिया, कभी किसी मुस्लिम नेता को ‘नकली मौलवी’ कह पाओगे तेजस्वी यादव?

बिहार में विधानसभा चुनाव के लिए सरगर्मी तेज है और नेता अलग-अलग मंचों-टीवी चैनलों पर जाकर अपनी बातें रख रहे हैं। एक इंटरव्यू के दौरान बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और RJD प्रमुख लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजस्वी यादव ने ‘रैपिड फायर राउंड’ में योगी आदित्यनाथ को लेकर सवाल पूछे जाने पर उन्हें ‘नकली बाबा‘ बता दिया।

योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री तो है हीं, साथ ही वो हिंदुओं की पवित्र गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर भी हैं। तेजस्वी यादव को अगर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पर कोई राजनीतिक हमला करना था तो वो उनके काम को लेकर सवाल उठा सकते थे लेकिन उन्होंने योगी आदित्यनाथ पर हमले के लिए उनकी धार्मिक पहचान को चुना।

असल में तेजस्वी यादव ने उत्तर योगी आदित्यनाथ को ‘नकली बाबा’ कहकर न सिर्फ एक व्यक्ति पर हमला किया है बल्कि पूरे हिंदू समाज की धार्मिक पहचान पर प्रहार करने की कोशिश की है। यह बयान केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं है, यह उस मानसिकता की झलक है जो दशकों से हिंदू प्रतीकों, संतों और सनातन परंपराओं का मजाक उड़ाने में आनंद महसूस करती आई है।

योगी आदित्यनाथ एक हजार साल पुरानी नाथ परंपरा के उत्तराधिकारी है। उनकी साधु या बाबा की पहचान कोई राजनीतिक मुखौटा नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक जीवन का प्रतीक है। लेकिन तेजस्वी यादव जैसे नेताओं के लिए हिंदू साधु का सम्मान कोई मायने नहीं रखता क्योंकि उनकी राजनीति का ईंधन ही हिंदू विरोध है।

अब सवाल उठता है कि क्या तेजस्वी यादव किसी मुसलमान नेता को ‘नकली मौलाना’ कह सकते हैं? क्या वे किसी मौलवी या इमाम के वस्त्र पर व्यंग्य कर सकते हैं? क्या वे किसी मुस्लिम नेता से कह सकते हैं कि उसकी टोपी, दाढ़ी या नमाज दिखावा है? इसका जवाब आपको, हमें सभी को पता है कि वह ऐसा नहीं करेंगे। अगर उन्होंने ऐसा करने की हिम्मत भी दिखाई तो पूरा सेक्युलर कुनबा और मीडिया की तथाकथित प्रगतिशील जमात उन पर टूट पड़ेगी।

हिंदुओं के मामले में भावनाओं के आहत होने से जुड़ा कोई नियम लागू नहीं होता है। केवल तेजस्वी ही नहीं, उनकी जमात के दूसरे नेता भी हिंदुओं को निशाने पर रखते हैं। तेजस्वी और उन जैसे नेताओं को ये अच्छी तरह से पता है कि हिंदू अपने विवेक में विश्वास रखता और इसलिए बार-बार उसे अपमानित किया जा सकता है। वो जानते हैं कि हिंदू ऐसा कहने पर कभी सड़क पर नहीं उतरेगा, हिंसा नहीं करेगा। हिंदुओं की इसी सहिष्णुता को ये नेता अपनी ढाल बनाते हैं।

योगी आदित्यनाथ की धार्मिक पहचान पर हमला कोई नई बात नहीं है। तेजस्वी और उनकी पूरी कथित सेक्युलर ब्रिगेड के लोग योगी आदित्यनाथ को अजय सिंह बिष्ट कहकर बुलाते रहे हैं। संत बनने के बाद कोई शख्स अपनी पुरानी पहचान, अपना परिवार छोड़ देता है लेकिन राजनीतिक मर्यादा तो छोड़िए ये ब्रिगेड धार्मिक परंपराओं का सम्मान तक नहीं करती है।

इन्हीं तेजस्वी यादव को चुनाव में मुस्लिम वोट बैंक को साधना है तो ये उनके पक्ष में वक्फ बिल तक को कूड़ेदान में फेंकने की बात कर रहे हैं। ये उस वोट बैंक के लिए टोपी भी लगाते हैं लेकिन हिंदुओं का सम्मान उनके लिए कोई मायने नहीं रखता है।

तेजस्वी यादव जैसे नेता शायद भूल जाते हैं कि योगी आदित्यनाथ जैसे संत न केवल राजनीतिक पद पर हैं बल्कि लाखों लोगों के लिए आस्था और प्रेरणा के प्रतीक हैं। योगी आदित्यनाथ ने जिस अनुशासन और तपस्या से खुद को इस परंपरा का उत्तराधिकारी बनाया है क्या वो कोई ‘नकली बाबा’ कर सकता है। मगर तेजस्वी यादव के लिए ये बातें मायने नहीं रखतीं क्योंकि उनके लिए सत्ता और वोट बैंक ही सर्वोपरि हैं। उन्हें इस देश की सनातन आत्मा से कोई लेना-देना नहीं है।

यह भी सच है कि ऐसे बयान हिंदू समाज को भावनात्मक रूप से चोट पहुँचाते हैं। दुर्भाग्य है कि हमारे यहाँ हिंदू अस्मिता की रक्षा को लेकर कोई सामाजिक या राजनीतिक एकजुटता नहीं बन पाती है। अब वक्त आ गया है कि हिंदू समाज इस तरह के दोहरेपन को पहचानें। लोकतंत्र में आलोचना और असहमति रहे, रहती भी है लेकिन हिंदुओं की धार्मिक पहचान पर प्रहार लंबे समय तक एजेंडा नहीं बन सकता है।

भारत के विकास का ‘जल मार्ग’: जिस ‘ब्लू इकोनॉमी’ की हुई अनदेखी, उसे PM मोदी ने बनाया ‘टॉप एजेंडा’, जानें क्या है मैरीटाइम विजन 2030?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुधवार (29 अक्टूबर 2025) को देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में एक बहुत बड़े कार्यक्रम में हिस्सा लिया। यह कार्यक्रम ‘इंडिया मैरीटाइम वीक 2025’ है, जो मुंबई के नेस्को एग्जीबिशन सेंटर में चल रहा है। पीएम मोदी ने यहाँ ‘मैरीटाइम लीडर्स कॉन्क्लेव’ को संबोधित किया और दुनिया भर की बड़ी समुद्री कंपनियों के मुखियाओं के ‘ग्लोबल मैरीटाइम सीईओ फोरम’ की अध्यक्षता की।

क्या है यह ‘मैरीटाइम वीक’?

जानकारी के अनुसार, ‘इंडिया मैरीटाइम वीक’ एक पाँच दिन का (27 से 31 अक्टूबर 2025) बड़ा अंतर्राष्ट्रीय मेला है। इसका नारा ‘सागर एक, दृष्टि एक’ है। इस आयोजन में दुनिया के 85 से ज्यादा देशों से 1 लाख से अधिक लोग (प्रतिनिधि, कंपनी मालिक, एक्सपर्ट) हिस्सा ले रहे हैं। इसका सीधा मतलब है कि यह मंच भारत के समंदर से जुड़े व्यापार (जिसे ब्लू इकॉनोमी कहते हैं) को नई दिशा देने के लिए दुनिया भर के बड़े खिलाड़ियों को एक साथ ला रहा है।

पीएम मोदी का इस कार्यक्रम में शामिल होना दिखाता है कि वह भारत के समुद्री क्षेत्र को बदलने के लिए कितने गंभीर हैं। पीएम मोदी का लक्ष्य भारत को ‘समुद्री अमृत काल विजन 2047’ के तहत एक ऐसी समुद्री ताकत बनाना है, जो दुनिया में सबसे आगे हो। यह कॉन्क्लेव और फोरम इसी सपने को पूरा करने की ओर पहला कदम है। यहाँ जिन बड़े मुद्दों पर बात होगी, उनमें ‘हरित नौवहन, सतत विकास, लचीली सप्लाई चेन शामिल है।

बता दें, कि हरित नौवहन का मतलब, पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना जहाजों को चलाना और समुद्री विकास करना। वहीं, सतत विकास का मतलब, ऐसा विकास जो लंबे समय तक चले और लचीली सप्लाई चेन का मतलब, यह सुनिश्चित करना कि दुनिया भर में माल पहुँचाने का काम बिना रुके और आसानी से चलता रहे। कुल मिलाकर, इस आयोजन का मकसद भारत को सिर्फ एक समुद्री व्यापारिक केंद्र ही नहीं, बल्कि वैश्विक समुद्री व्यापार और बंदरगाह विकास में अगुआ बनाना है।

समंदर बनेगा भारत की शक्ति: जानिए ‘मैरीटाइम इंडिया विजन 2030’ की पूरी कहानी

हमारे देश भारत का समुद्री किनारा बहुत विशाल है। यही वजह है कि समंदर का रास्ता हमारी अर्थव्यवस्था के लिए प्राणवायु की तरह है। जरा सोचिए, भारत का करीब 95 प्रतिशत व्यापार (वजन के हिसाब से) और 70 प्रतिशत व्यापार (पैसे के हिसाब से) सिर्फ समुद्री रास्तों से होता है। यानी, समुद्र ही हमारे वाणिज्य की असली ताकत है।

इसी बड़ी ताकत को समझते हुए, भारत सरकार ने साल 2021 में एक बहुत बड़ा और खास प्लान बनाया, जिसका नाम ‘मैरीटाइम इंडिया विजन (MIV) 2030’ है। यह सिर्फ कागजी योजना नहीं है, बल्कि देश के समुद्री क्षेत्र को पूरी तरह से बदलने का एक मास्टरप्लान है।

MIV 2030 का मुख्य मकसद बहुत सीधा है। भारत को साल 2030 तक दुनिया की सबसे ताकतवर, सबसे समृद्ध और सबसे आधुनिक समुद्री शक्तियों में शामिल करना। इस लक्ष्य को पाने के लिए, सरकार ने 2030 तक इस क्षेत्र में 3 से 3.5 लाख करोड़ रुपए के भारी-भरकम निवेश के साथ 150 से ज्यादा बड़े कदम उठाने का फैसला किया है।

इस पूरे विजन की खास बात यह है कि यह सिर्फ पैसा कमाने पर ध्यान नहीं देता, बल्कि पर्यावरण की सुरक्षा और लोगों को हुनरमंद बनाने (कौशल विकास) पर भी पूरा ध्यान केंद्रित करता है। यानी, यह विजन केवल सामान ढोने का रास्ता नहीं है, बल्कि देश में नया व्यापार, बड़ा निवेश और लाखों रोजगार पैदा करने का इंजन है।

MIV 2030 के 4 आधार स्तंभ: समंदर से समृद्धि का रास्ता

‘मैरीटाइम इंडिया विजन 2030’ (MIV 2030) एक मजबूत इमारत की तरह है, जो चार मुख्य खंभों (स्तंभों) पर खड़ी है। इन चारों पर एक साथ काम करके ही भारत समुद्री दुनिया का लीडर बन पाएगा।

पोर्ट को बनाना सुपरपावर (पोर्ट-आधारित विकास)- पहला स्तंभ हमारे बंदरगाहों को आधुनिक और विश्वस्तरीय बनाने पर टिका है। सरकार का लक्ष्य है कि हमारे बंदरगाह इतने कुशल हो जाएँ कि विदेशी बंदरगाहों को टक्कर दे सकें। पिछले दस सालों में हमारे बंदरगाहों की सामान संभालने की क्षमता 140 करोड़ मीट्रिक टन से बढ़कर 276.2 करोड़ मीट्रिक टन यानि दोगुनी हो गई है।

बंदरगाहों पर जहाजों के रुकने और माल लादने-उतारने में लगने वाला औसत समय 93 घंटे से घटकर सिर्फ 48 घंटे रह गया है, यानी काम लगभग आधे समय में हो रहा है। बंदरगाहों का सालाना मुनाफा भी 1026 करोड़ रुपए से बढ़कर 9352 करोड़ रुपए हो गया है। MIV 2030 के तहत बंदरगाहों को कई तरह के परिवहन (सड़क, रेल, जल) को जोड़ने वाले स्मार्ट हब में बदला जा रहा है, जिससे व्यापार की लागत कम हो जाएगी।

अपने जहाज बनाना और चलाना (नौवहन और जहाज निर्माण)- दूसरा स्तंभ कहता है कि भारत को जहाज चलाने की अपनी क्षमता बढ़ानी होगी और देश में ही जहाज बनाने के उद्योग को फिर से जिंदा करना होगा। भारत के पास अपने झंडे वाले जहाजों की संख्या 1205 से बढ़कर 1549 हो गई है। जहाजों की कुल माल ढोने की क्षमता भी 1 करोड़ सकल टन से बढ़कर 1.35 करोड़ सकल टन हो गई है।

जहाज निर्माण को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने हाल ही में 69,725 करोड़ रुपए का एक बड़ा आर्थिक पैकेज घोषित किया है। इसके अलावा, जहाज बनाने और खरीदने के लिए 25,000 करोड़ रुपए का एक खास समुद्री विकास कोष (MDF) भी बनाया गया है। विशाखापत्तनम में एक खास केंद्र ‘भारतीय जहाज प्रौद्योगिकी केंद्र’ बनाया जा रहा है, जहाँ जहाज डिजाइन और रिसर्च का काम होगा।

माल की आसान आवाजाही (निर्बाध आपूर्ति शृंखला और आसान लॉजिस्टिक्स)- तीसरा स्तंभ देश में माल ढुलाई की लागत कम करने और परिवहन को आसान, सस्ता और पर्यावरण के अनुकूल बनाने पर ध्यान देता है। तटीय इलाकों में जहाजों से माल ढोने का काम दोगुना हो गया है। देश की नदियों और नहरों (अंतर्देशीय जलमार्ग) का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। इन रास्तों से माल ढुलाई 2014 के मुकाबले 710 प्रतिशत ज्यादा हो गई है। चालू जलमार्गों की संख्या 3 से बढ़कर 29 हो गई है।

‘सागरमाला कार्यक्रम’ इस काम का मुख्य हिस्सा है। यह 5.8 लाख करोड़ रुपए की लागत से समुद्री और नदी परिवहन नेटवर्क को मजबूत कर रहा है, ताकि माल ढुलाई का खर्च कम हो और रोजगार पैदा हों।

कुशल कारीगर तैयार करना (समुद्री कौशल निर्माण)- चौथा और सबसे जरूरी स्तंभ समुद्र से जुड़े कामों के लिए हुनरमंद लोग (मानव संसाधन) तैयार करने पर केंद्रित है। पिछले एक दशक में भारत में समुद्री कामगारों (नाविकों और अन्य स्टाफ) की संख्या 1.25 लाख से बढ़कर 3 लाख से अधिक हो गई है। भारत अब प्रशिक्षित नाविकों के मामले में दुनिया के टॉप 3 सप्लायरों में से एक बन गया है। MIV 2030 का लक्ष्य है कि कौशल विकास से देश और विदेश में जहाज चलाने, रसद (लॉजिस्टिक्स) और अन्य समुद्री उद्योगों में बड़े अवसर पैदा किए जाएँ।

पर्यावरण का ख्याल (हरित नौवहन)- इन चार स्तंभों के अलावा, MIV 2030 और IMW 2050 का सबसे बड़ा जोर हरित टेक्नोलॉजी पर है। भारत अब समुद्री क्षेत्र में हरित नेतृत्वकर्ता बनना चाहता है। सरकार हरित गलियारे बना रही है। बंदरगाहों पर जहाजों के लिए हरित हाइड्रोजन जैसे साफ ईंधन की व्यवस्था की जा रही है। मेथनॉल जैसे कम प्रदूषण वाले ईंधन से चलने वाले जहाजों को बढ़ावा दिया जा रहा है। यह दिखाता है कि भारत की आर्थिक तरक्की को पर्यावरण के साथ जोड़कर चल रहा है।

‘अमृत काल’ का समुद्री सपना: 2047 तक भारत बनेगा दुनिया का ‘सी-किंग’

‘मैरीटाइम इंडिया विजन 2030’ असल में एक बहुत बड़ी यात्रा की शुरुआत है, जिसका अंतिम पड़ाव ‘समुद्री अमृत काल विजन 2047’ है। सरल शब्दों में 2047 तक, जब भारत अपनी आजादी के 100 वर्ष पूरे करेगा, सरकार का सपना है कि हमारा देश जहाज निर्माण और समुद्री शक्ति के मामले में दुनिया के टॉप देशों में शामिल हो जाए। यह सपना बहुत विशाल है, जिसके लिए 80 लाख करोड़ रुपए से भी ज्यादा के बड़े निवेश की तैयारी की गई है।

इस विजन को जमीन पर उतारने का काम शुरू हो चुका है। हाल ही में, अलग-अलग कंपनियों और सरकार के बीच 27 बड़े समझौते हुए हैं। इनमें 66,000 करोड़ रुपए से ज्यादा के निवेश के रास्ते खुल गए हैं। उदाहरण के लिए, ओडिशा में 21,500 करोड़ रुपए की लागत से एक बिल्कुल नया, इको-फ्रेंडली ‘ग्रीनफिल्ड बंदरगाह’ बन रहा है। इसके अलावा, पटना में 908 करोड़ रुपए की शानदार ‘जल मेट्रो परियोजना’ पर काम चल रहा है। इसमें पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए इलेक्ट्रिक नावें चलाई जाएँगी।

भारत अब सिर्फ दर्शक नहीं, लीडर है

प्रधानमंत्री मोदी का मुबंई दौरा और ‘इंडिया मैरीटाइम वीक 2025’ का इतना सफल आयोजन यह साफ कर देता है कि भारत अब अपने समुद्री भविष्य को लेकर बहुत ज्यादा गंभीर है। यह अब सिर्फ इतना नहीं चाहता कि वैश्विक व्यापार में हमारा देश बस एक भागीदार बना रहे। बल्कि, भारत ने संकल्प लिया है कि वह भविष्य के समुद्री व्यापार की दिशा को तय करने वाला और पूरी दुनिया की आपूर्ति श्रृंखला को आकार देने वाला एक ‘निर्णायक खिलाड़ी’ बनेगा।

आजादी के बाद समंदर को भुला दिया गया

आजादी मिलने के बाद, हमारे देश का सारा ध्यान अपनी सीमाओं की सुरक्षा और जमीन से जुड़े खतरों पर रहा। यही वजह थी कि हमने समंदर की शक्ति और समुद्री रास्तों को लगभग भुला दिया। इंदिरा गाँधी की सरकार ने दुनिया के बड़े देशों से हिंद महासागर को खाली रखने की बात तो की, लेकिन बंदरगाहों को सुधारने या नए समुद्री ढाँचे पर कोई खास काम नहीं किया गया। उस समय की सरकारों ने समुद्र को केवल सुरक्षा के नजरिए से देखा, व्यापार और विकास के नजरिए से नहीं।

1990 के दशक तक आते-आते, भारत के सारे बंदरगाह पुराने और कमजोर हो चुके थे। यहाँ माल उतारने-चढ़ाने की क्षमता दुनिया के बाकी देशों के मुकाबले बहुत पीछे थी। बाद में, यूपीए सरकार (2004-2014) ने कुछ कोशिशें जरूर कीं, जैसे कि ‘सागरमाला’ नाम की योजना शुरू की, लेकिन यह भी सिर्फ कागजों तक सिमटकर रह गई। जरूरी पैसा नहीं मिला और सरकारी कामकाज की रुकावटों के चलते काम बहुत धीमा रहा।

नतीजा क्या हुआ?

हमारे बंदरगाहों पर किसी भी जहाज को माल उतारने या लादने में 2 से 3 दिन लग जाते थे, जबकि सिंगापुर जैसे देश यह काम चंद घंटों में निपटा देते थे। इस देरी से व्यापार की लागत बहुत बढ़ गई। गुजरात में लोथल और धोलावीरा जैसे हमारी पुरानी समुद्री विरासत के स्थल भी ध्यान न दिए जाने के कारण खराब होते चले गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2024 में खुद कहा था कि आजादी के बाद दशकों तक हमने अपनी समृद्ध विरासत और इतिहास को अनदेखा किया।

केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने भी माना कि पिछली सरकारों ने भारत के समुद्री इतिहास को दशकों तक उपेक्षित रखा। इस उपेक्षा ने देश को आर्थिक रूप से भारी नुकसान पहुँचाया। हमारा 95% आयात-निर्यात समंदर पर निर्भर है, लेकिन समुद्री ढाँचे की कमी से लागत हमेशा ज्यादा बनी रही।

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भारत निर्वाचन आयोग ने घोषणा की है कि अगले चरण में 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूची का विशेष गहन संशोधन कराया जाएगा। आयोग ने एसआईआर अभियान का शेड्यूल घोषित कर दिया है। आने वाले एसआईआर में पश्चिम बंगाल जैसे चुनावी राज्यों को शामिल किया गया है लेकिन 2026 में चुनाव होने वाले असम को इन 12 राज्यों में शामिल नहीं किया गया है।

बिहार और पश्चिम बंगाल में एसआईआर से लेफ्टिस्ट्स और उसके साथी एंटी-बीजेपी इकोसिस्टम को जलन हुई थी, वही लोग अब आयोग के असम में एसआईआर न कराने के फैसले से बौखला गए हैं।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने सोमवार (27 अक्टूबर 2025) को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में मीडिया को बताया कि असम के लिए नागरिकता का नियम ‘देश के बाकी हिस्सों से अलग’ है, इसलिए असम में एसआईआर के लिए अलग आदेश जारी किया जाएगा।

असम को अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की तरह एसआईआर न कराने की वजह बताते हुए सीईसी कुमार ने कहा, “चुनाव आयोग असम में एसआईआर कराने के लिए अलग आदेश जारी करेगा। नागरिकता अधिनियम के तहत असम में नागरिकता के लिए अलग प्रावधान हैं। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में नागरिकता जाँच का काम लगभग पूरा होने वाला है। 24 जून का एसआईआर आदेश पूरे देश के लिए था। ऐसी स्थिति में यह असम पर लागू नहीं होता।”

उन्होंने आगे जोड़ा, “असम के लिए अलग संशोधन आदेश जारी किए जाएँगे और अलग एसआईआर तारीख घोषित की जाएगी।”

यह ध्यान रखना जरूरी है कि असम 1955 के नागरिकता अधिनियम और 1985 के असम समझौते की अलग प्रावधानों के कारण अलग नियमों पर चलता है। साल 1985 के असम समझौते के बाद जोड़ी गई नागरिकता अधिनियम की धारा 6ए कहती है कि 1 जनवरी 1966 से पहले बांग्लादेश से असम में घुसे प्रवासियों को भारतीय नागरिक माना जाएगा, जबकि 1 जनवरी 1966 और 25 मार्च 1971 के बीच घुसे लोगों को नागरिकता के लिए योग्य माने जाने के लिए कुछ शर्तें पूरी करनी होंगी।

असम का विशेष नागरिकता कानून विदेशियों को वोटिंग या नागरिकता अधिकारों से रोकता है। ऐसे में आयोग एक समान एसआईआर लागू नहीं कर सकता, खासकर बिना असम के विशेष प्रावधानों से टकराए। क्योंकि 2003 की कटऑफ वाली एसआईआर सत्यापन अनजाने में उससे ओवरलैप या कमजोर कर सकती है।

इसके अलावा साल 2013 से सुप्रीम कोर्ट के आदेश और निगरानी वाला असम एनआरसी लगभग पूरा होने वाला है। हालाँकि अंतिम अपीलें और पुन:सत्यापन बाकी हैं। असम एनआरसी ने पहले ही 19 लाख से ज्यादा लोगों को ‘संदिग्ध नागरिक’ के रूप में बाहर कर दिया है, जिससे विपक्ष भड़का है। इसलिए अब एसआईआर कराना दोहरी हटाने, डुप्लिकेट मेहनत का जोखिम और सुप्रीम कोर्ट के एनआरसी टाइमलाइन में हस्तक्षेप का मतलब होगा। चूँकि असम में नागरिकता का फैसला सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चल रहा है, इसलिए एसआईआर से समानांतर संशोधन करना अव्यवहारिक होगा।

‘बिहार और बंगाल में SIR बुरा तो रोके सुप्रीम कोर्ट और असम में SIR अच्छा, इसलिए चुनाव आओग NRC को नजरअंदाज कर कराए SIR: वापमंथियों का पाखंड अलग ही स्तर का

लेफ्टिस्ट्स को किसी चीज पर गुस्सा होना और अपनी सुविधा के हिसाब से उसे गले लगाना पसंद है। बिहार में वे चुनाव आयोग के मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) को या तो न कराने या सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में कराने चाहते थे। लेकिन असम में वही लेफ्टिस्ट्स गुट चाहता है कि आयोग सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अवहेलना करके एसआईआर करे, सिर्फ इसलिए क्योंकि लेफ्टिस्ट्स ऐसा चाहते हैं।

याद रखना चाहिए कि इस साल की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट में कई विपक्षी नेताओं जैसे टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा, AAP के पूर्व सह-संस्थापक योगेंद्र यादव, आरजेडी सांसद मनोज झा और संगठनों जैसे पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज, और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) द्वारा चुनाव आयोग के बिहार में एसआईआर कराने के बारे में याचिकाओं का एक बैच दायर किया गया था।

इन लोगों ने सुप्रीम कोर्च से SIR पर रोक लगाने की अपील की थी, दावा किया कि यह बड़ी संख्या में मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करने की साजिश है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनका तर्क खारिज कर दिया और एसआईआर पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, मान लिया कि यह नकली मतदाताओं को हटाकर मतदाता सूची अपडेट करने का रूटीन अभ्यास है और आयोग को संवैधानिक रूप से ऐसा करने का अधिकार है। अदालत ने याचिकाकर्ताओं के सामूहिक मताधिकार चुराने के आरोपों को ‘विश्वास की कमी’ का मामला बताया।

अब वही इच्छाधारी प्रदर्शनकारी योगेंद्र यादव असम में एसआईआर न होने से नाराज है। 27 अक्टूबर को एक एक्स पोस्ट में योगेंद्र यादव ने लिखा, “असम इकलौता चुनावी राज्य है जहाँ एसआईआर नहीं होगा। सोचता हूँ क्यों।”

इसी तरह, डीएमके प्रवक्ता सरवनन अन्नादुरई ने भी पूछा कि असम में एसआईआर क्यों नहीं हो रहा। उन्होंने आयोग की ईमानदारी पर भी शक जताया और कहा, ‘…आयोग ने बिहार के अनुभव से क्या सीखा और इन 12 राज्यों में कैसे लागू करेगा? असम को इस एसआईआर से क्यों बाहर रखा गया? एसआईआर कब नागरिकता अभ्यास बन गया? आयोग नागरिकता के मानदंड क्यों लाने की कोशिश कर रहा है? क्या आयोग नागरिकता ढूँढने वाली यूनिट है?’

इस बीच, कॉन्ग्रेस प्रवक्ता शमा मोहम्मद ने भी आयोग की सफाई को खारिज कर दिया कि एससी-आदेशित एनआरसी प्रक्रिया चल रही है इसलिए एसआईआर उचित नहीं। उन्होंने इसे महज ‘बहाना’ बताया।

मोहम्मद ने कहा, “अगले साल चार राज्य चुनाव लड़ेंगे-केरल, तमिलनाडु, और पश्चिम बंगाल को एसआईआर में शामिल किया गया, लेकिन असम को नहीं। क्यों? असम बांग्लादेश से सीमा साझा करता है और इसमें संदिग्ध घुसपैठियों की बड़ी संख्या है। सीईसी ने एनआरसी का बहाना दिया लेकिन एनआरसी में क्या हुआ? 19 लाख बाहर हुए लोगों में से सिर्फ 7 लाख मुसलमान थे, और 12 लाख गैर-मुस्लिम। 1600 करोड़ से ज्यादा टैक्सपेयर्स का पैसा बर्बाद करने के बाद एनआरसी को चुपचाप ड्रॉप कर दिया गया। आयोग बिहार में मिले घुसपैठियों की संख्या क्यों नहीं बता रहा? और 47 लाख डिलीट वोटर्स की लिस्ट क्यों जारी नहीं की? लोग कैसे जानेंगे कि उनके नाम डिलीट हुए हैं और तभी तो आपत्ति उठा सकेंगे?”

द प्रिंट ने भी आयोग के असम को मतदाता सूची के दूसरे दौर के एसआईआर से बाहर रखने पर अपना ’50 वर्ड एडिट’ निकाला। उसने लिखा, “चुनाव आयोग का असम को मतदाता सूची के दूसरे दौर के एसआईआर से बाहर रखने की सफाई उलझी हुई और तर्कहीन है। इसे एनआरसी से जोड़कर मौजूदा वोटर्स लिस्ट को संदिग्ध बना दिया। इससे नई उलझन और साजिश सिद्धांतों का मैदान तैयार हो गया। आयोग एसआईआर पर खुद को उलझा लिया है।”

हालाँकि कॉन्ग्रेस पार्टी और उसके समर्थक इकोसिस्टम सुविधाजनक रूप से भूल जाते हैं कि चुनाव आयोग का काम अयोग्य मतदाताओं की पहचान करना और उनकी मतदाता सूची से नाम हटाना है। चुनाव आयोग का काम अवैध प्रवासियों को पकड़ना-निकालना, नागरिकता जारी करना या नागरिकताओं की वैधता और कानूनी स्थिति जाँचना नहीं है। बिहार एसआईआर में लगभग 6.5 मिलियन वोटर्स की लिस्ट से हटाए गए। लेकिन सभी हटाए नाम अवैध प्रवासी नहीं थे। हटाए गए में मृत वोटर्स, भारत के नागरिक साबित न करने वाले, स्थाई रूप से अन्य जगह चले गए और एक से ज्यादा लिस्ट में मौजूद वोटर्स शामिल थे।

इसके बावजूद विपक्षी दल और लेफ्टिस्ट्स अन्य राज्यों में एसआईआर का विरोध करने से असम में ‘यहाँ क्यों नहीं?’ पूछने लगे। यह साफ पाखंड इस तथ्य से उपजता है कि बिहार में कॉन्ग्रेस और अन्य एंटी-बीजेपी पार्टियाँ डर रही थीं कि उनकी वोट बैंक में अवैध, खासकर बांग्लादेशी मुस्लिम प्रवासी, मतदाता सूची से साफ हो जाएँगे।

असम में विपक्ष चाहता है कि आयोग सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ जाकर एसआईआर करे ताकि वे अपना एजेंडा चला सकें कि आयोग बीजेपी के साथ मिलकर सुप्रीम कोर्ट की अनदेखी कर रहा है सिर्फ मुसलमानों और बीजेपी-विरोधी परंपरागत लोगों को निशाना बनाने और मताधिकार से वंचित करने के लिए। वे जानते हैं कि एसआईआर उनके अवैध मुस्लिम वोटर-बेस को साफ कर सकता है लेकिन बीजेपी के एंटी-घुसपैठिया प्लैंक को भी वैध बना सकता है।

मोटे तौर पर अगर एसआईआर होता तो कॉन्ग्रेस और लेफ्टिस्ट्स चिल्लाते कि आयोग-बीजेपी मिलकर मुसलमानों को मताधिकार से वंचित करने की साजिश रच रहे, लेकिन चूँकि इस साल नहीं हो रहा, वे चिल्ला रहे कि चुनाव से पहले एसआईआर क्यों नहीं। विपक्षी दल सुझा रहे हैं कि आयोग असम में एसआईआर टाल रहा क्योंकि 2019 एनआरसी में 19 लाख बाहर हुए में 7 लाख मुसलमान और 12 लाख गैर-मुस्लिम (यानी हिंदू, भारतीय और बांग्लादेशी दोनों) थे, बीजेपी उन हिंदुओं को मतदाता सूची से हटने से बचाने की कोशिश कर रही जो एनआरसी में छूट गए।

लंबे समय से NRC का लटके रहना सिर्फ इसलिए है क्योंकि लिस्ट में कथित शामिल और बाहर करने पर व्यापक चिंताएँ उठीं। सीएम सरमा ने पहले इस पर चिंता जताई थी। असम सरकार का कहना है कि मौजूदा रूप में एनआरसी में कई विदेशी शामिल हैं और कई स्वदेशी लोग बाहर। इसके अलावा एनआरसी की कटऑफ डेट 24 मार्च 1971 के बाद अवैध रूप से घुसे लोगों की संख्या 19 लाख से कहीं ज्यादा है।

चुनाव आयोग ने साफ कर दिया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश और निगरानी वाली नागरिकता जाँच का काम लगभग पूरा होने वाला है, इसलिए असम के लिए अलग एसआईआर घोषित किया जाएगा। फिर भी विपक्ष फर्जी नैरेटिव फैलाना चाहता है कि आयोग बीजेपी के इशारे पर असम में एसआईआर टाल रहा है।

यह विपक्ष की सुविधा की राजनीति है, वही एसआईआर जो बिहार और बंगाल में लोकतंत्र के लिए ‘खतरा’ था, वो असम में लोकतंत्र और चुनावी पवित्रता का ‘रक्षक’ बन जाता है।

यह दिलचस्प है कि आयोग ने कहा है कि असम के लिए अलग तारीख घोषित की जाएगी। असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा है कि उनकी सरकार आयोग के साथ सहयोग करने को तैयार है जब भी चुनाव आयोग एसआईआर कराने का फैसला करे।

मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

वामपंथी नेता ने शादीशुदा मुस्लिम से तलाकशुदा बेटी के ‘इश्क’ को बताया लव जिहाद, घर में किया कैद: इसी ने ‘केरल स्टोरी’ को बताया था ‘RSS का प्रोपेगेंडा’

केरल के एक कम्युनिस्ट नेता की बेटी मुस्लिम लड़के से शादी करना चाहती है और अब पिता लव जिहाद का रोना रो रहा है। ये सुनने में अजीब लगता है न? लेकिन यही हकीकत है।

केरल के कासरगोड में सीपीएम के एरिया कमिटी मेंबर पीवी भास्करन की बेटी संगीता ने एक वीडियो जारी किया है। इसमें वो बताती है कि उसके पिता ने उसे घर में कैद कर रखा है, बुरी तरह पीटा जा रहा है, मेडिकल ट्रीटमेंट नहीं दे रहे। संगीता पैरालाइज्ड है, एक्सीडेंट के बाद कमर से नीचे लकवा मार गया। वो राशिद नाम के मुस्लिम लड़के से शादी करना चाहती है, बस इसी बात पर घर में हंगामा मच गया।

संगीता का कहना है कि तलाक के बाद मिले पैसे उसके पिता और भाई ने हड़प लिए। पिता ने धमकी दी कि ‘कम्युनिज्म यहाँ नहीं चलेगा, मार दूँगा और केस से बच जाऊँगा’। संगीता ने कोर्ट में हैबियस कॉर्पस की पिटीशन डाली, लेकिन पुलिस ने रिपोर्ट में कहा कि वो माता-पिता के साथ है। लोकल पुलिस ने पिता के राजनीतिक प्रभाव से बात नहीं सुनी।

अब पिता भास्करन का दावा है कि राशिद पहले से शादीशुदा है और संगीता की 1.5 करोड़ की प्रॉपर्टी के लिए उसे फँसाया है। भास्करन वही नेता हैं, जो पहले ‘द केरल स्टोरी’ फिल्म को संघ परिवार का प्रोपगैंडा बताते थे। ये फिल्म लव जिहाद पर बेस्ड है, जो केरल में नॉन-मुस्लिम लड़कियों को टारगेट करने के नेटवर्क्स को दिखाती है। केरल में लेफ्ट और कॉन्ग्रेस दोनों ही लव जिहाद को फर्जी बताते हैं, वोट बैंक के चक्कर में। लेकिन अब जब खुद की बेटी का मामला आया, तो भास्करन को लव जिहाद याद आ गया। ये दोहरा चरित्र नहीं तो क्या है?

सोचिए कि जो वामपंथी नेता जनता को लेक्चर देते हैं कि धर्म के नाम पर कुछ नहीं होता, सब प्रोपगैंडा है। लेकिन जब घर की इज्जत दांव पर लगे, तो वही लव जिहाद का शोर मचाते हैं। ये सिर्फ भास्करन का मामला नहीं। केरल में ही एक और केस हुआ था, जहाँ एक क्रिश्चियन सीपीएम कैडर की बेटी या रिश्तेदार मुस्लिम लड़के से रिलेशनशिप में थी। कोर्ट ने कपल को साथ रहने की इजाजत दी, लेकिन कम्युनिस्टों का ग्रुप ने मुस्लिम लड़के को कोर्ट के सामने पीट दिया।

यही लोग बाहर से कहते हैं कि इंटरफेथ मैरिज फ्रीडम है, लेकिन जब अपना परिवार हो, तो असलियत सामने आ जाती है। वामपंथी खुद को सेकुलर बताते हैं, लेकिन अंदर से परिवार की रक्षा के लिए वही बातें करते हैं जो आम हिंदू या क्रिश्चियन परिवार करते हैं।

लव जिहाद क्या है, ये केरल तो जानता ही है। वहाँ सबसे बड़े नेटवर्क्स का खुलासा हो चुका है। आईएसआईएस जैसे वैश्विक आतंकवाद से जुड़े केस सामने आए। ‘द केरल स्टोरी’ ने इन्हीं हकीकतों को दिखाया, लेकिन वामपंथियों ने विरोध किया। फिल्म को बैन करने की माँग की, प्रोपगैंडा कहा। क्यों? क्योंकि अल्पसंख्यक वोट बैंक को नाराज नहीं करना।

केरल में लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट दोनों ही लव जिहाद को झूठ बताते हैं। लेकिन रियलिटी ये है कि मुस्लिम लड़के नॉन-मुस्लिम लड़कियों को टारगेट करते हैं। पहले दोस्ती, फिर लव, फिर कन्वर्जन और निकाह। संपत्ति, परिवार तोड़ना सब इन्वॉल्व। केरल स्टोरी जैसी फिल्में हकीकत बयान करती हैं, लेकिन पॉलिटिशियंस इसे दबाते हैं।

ऐसे मामले सिर्फ केरल तक सीमित नहीं। पूरे देश में फैले हैं। पश्चिम बंगाल में भी वामपंथी शासन के समय कई केस हुए, जहाँ हिंदू लड़कियाँ मुस्लिम लड़कों के जाल में फँसती रहीं। ममता बनर्जी की तृणमूल कॉन्ग्रेस ने भी लव जिहाद को डिबेट ही नहीं होने दिया। लेकिन प्राइवेट में कई लेफ्ट फैमिलीज ने अपनी बेटियों को बचाने के लिए चुपके से एक्शन लिया।

एक उदाहरण लीजिए केरल के ही सीएम पिनारायी विजयन की बेटी वीणा का केस। वो डीवाईएफआई के मुस्लिम प्रेसिडेंट मुहम्मद रियास से शादी कर ली। ये पॉजिटिव तरीके से पेश किया गया, लेकिन क्या ये असली लव था या पॉलिटिकल वैल्यू? वामपंथी इसे सेकुलरिज्म का प्रतीक बताते हैं, लेकिन अगर कोई आम लड़की ऐसा करे और बाद में परेशानी हो, तो वो प्रोपगैंडा। दोहरा मापदंड साफ दिखता है।

वामपंथियों का असली चेहरा ये केस खोलते हैं। वो खुद को धर्म-विरोधी बताते हैं, लेकिन घर में पूजा-पाठ करते हैं। कई नेता नमाज पढ़ते पकड़े गए। जनता को दिखाने के लिए कट्टर कम्युनिस्ट, लेकिन परिवार बचाने के लिए रिलिजन मैटर्स। ये फर्जीवाड़ा है। सेकुलरिज्म का मतलब ये नहीं कि अपनी बेटी को खतरे में डालो। लव जिहाद एक सिस्टम है- जहाँ लड़के ट्रेनिंग लेते हैं, लड़कियों को फँसाते हैं। केरल, यूपी, हरियाणा हर जगह केस सामने आए हैं। लेकिन वामपंथी मीडिया और पॉलिटिक्स इसे कवर-अप करते हैं। क्यों? वोट के लिए। अल्पसंख्यक वोट बैंक को खुश रखना।

संगीता का केस दुखद है। वो पैरालाइज्ड है, मदद की जरूरत है, लेकिन परिवार संपत्ति के चक्कर में उसे सताने लगा। राशिद का बैकग्राउंड संदिग्ध लगता है- पहले से शादी, प्रॉपर्टी का लालच। भास्करन ने सही कहा हो या गलत, लेकिन उनका डर जायज है। आम परिवारों में यही होता है। लेकिन वही लोग जो बाहर से कहते हैं ‘लव इज लव’, घर में डरते हैं। ये दिखाता है कि लव जिहाद रियल है, फिल्में झूठ नहीं बोलतीं। पुलिस का रोल भी शक के घेरे में है कि उसने पॉलिटिकल इन्फ्लुएंस से केस को दबा कर रखा। संगीता ने डीएसपी और कलेक्टर तक से शिकायत की, लेकिन अभी तक कोई एक्शन नहीं। ये केरल के पुलिसिया सिस्टम की भी नाकामी है।

भास्करन का केस एक आईना है। वामपंथी सेकुलरिज्म फेक है। असली सेकुलरिज्म परिवार की सुरक्षा है, न कि वोट बैंक की गुलामी। ऐसे लव जिहाद को नकारना बंद करें और असलियत को स्वीकार कर कार्रवाई के लिए सामने आएँ, वर्ना फर्जी वामपंथ के चक्कर में तमाम परिवार बर्बाद होते ही रहेंगे।

शहाबुद्दीन के सीवान में अब भी लोगों को जंगलराज से होती है सिहरन

ऑपइंडिया की बिहार ग्राउंड रिपोर्ट टीम सीवान पहुँची। यहाँ के लोग लालू प्रसाद यादव के जंगलराज को याद कर आज भी सिहर जाते हैं। उस दौर में लोग घोटाले, जातिवादी झगड़े, लूटमार और सुविधाओं की कमी से परेशान थे। नीतीश कुमार ने सब मुक्ति दिलाई।

आम लोगों ने लालू के बेटे तेजस्वी यादव के तीन करोड़ रोजगार देने के वादे पर जनता ने तीखा तंज कसा। कहा ये तो सिर्फ चुनावी जुमला है, कुछ नहीं होगा। भूरा बाल साफ करो के नारे से लेकर शहाबुद्दीन के मजहबी तुष्टिकरण तक, हर मुद्दे पर लोग बेबाकी से बोले। शहाबुद्दीन के राज में सीवान दहशत में था, अब NDA के राज में शांति है।

सीवान की जनता अब विकास और सुरक्षा चाहती है, पुराने जंगलराज को दोबारा नहीं आने देगी।

क्या है क्लाउड सीडिंग, कैसे होती है ‘आर्टिफिशियल रेन’: क्या इससे स्वच्छ होती है हवा?

दिल्ली में पहली बार बिना इंद्रदेव की मर्जी से बारिश होने जा रही है। इस बार बादल बुलाने के लिए आसमान की ओर नजरें उठाने की नहीं बल्कि विज्ञान की मदद ली जा रही है। इसे ‘आर्टिफिशियल रेन’ नाम दिया गया है। यह बारिश प्रकृति नहीं, तकनीक करवाएगी। मंगलवार (28 अक्टूबर 2025) को राजधानी के उत्तर पश्चिम क्षेत्र और बुराड़ी में ये आर्टिफिियल बारिश कराने की योजना है। यह कदम दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण को कम करने के लिए उठाया गया है।

दिल्ली की जहरीली हवा को धोने के लिए अब आसमान में विमान उड़ान भरेंगे, जो बादलों में बारिश करवाने वाला रसायन छोड़ेंगे। वैज्ञानिकों की यह कोशिश न सिर्फ दिल्ली की हवा को साफ करेगी बल्कि यह साबित करेगी कि जब इंसान और विज्ञान मिलें तो इंद्रदेव भी पीछे छूट सकते हैं। तो अब समझते हैं कि आखिर यह ‘आर्टिफिशियल रेन’ होती कैसे है और इसकी पूरी तकनीक क्या है।

क्लाउड सीडिंग से होती है आर्टिफिशियल बारिश

दरअसल आर्टिफिशियल बारिश लाने की इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक भाषा में ‘क्लाउड सीडिंग’ (Cloud Seeding) कहा जाता है। यानी बादलों को इस तरह तैयार करना कि वे बरसने लगें। इसके लिए जरूरी है कि आसमान में पहले से बादल मौजूद हों और उनमें नमी हो। वैज्ञानिक विमान, रॉकेट या अन्य किसी मशीन के जरिए उन बादलों में सिल्वर आयोडाइड, नमक या अन्य रासायनिक कण छोड़ते हैं। ये कण बादलों के भीतर जाकर नमी को आकर्षित करते हैं, जिससे जलकण आपस में मिलकर भारी बूंदों में बदल जाते हैं और बारिश शुरू हो जाती है।

इस प्रक्रिया में बादलों की तापमान स्थिति, हवा की दिशा और नमी की मात्रा का सही होना बहुत जरूरी होता है, क्योंकि गलत परिस्थिति में यह प्रयोग विफल भी हो सकता है। विशेषज्ञों का यहा भी कहना है कि इस आर्टिफिशियल बारिश का पानी सेहत के लिए नुकसानदायक नहीं है। इसे लेकर जाँच और रिसर्च पूरी की जा चुकी हैं।

क्यों होती है क्लाउड सीडिंग?

क्लाउड सीडिंग दो मकसद से कराई जाती है। इसके पहला उद्देश्य है उन इलाकों में बारिश करवाना, जहाँ सूखा या पानी की कमी हो। दूसरा उद्देश्य प्रदूषण को कम करना है। दिल्ली में इसका उपयोग प्रदूषण को कम कराने के लिए किया जा रहा है। जब आर्टिफिशियल बारिश होती है तो हवा में तैरते सूक्ष्म प्रदूषक कण, धूल और जहरीली गैसें पानी के साथ जमीन पर बैठ जाती हैं। इससे हवा साफ होती है और साँस लेने में थोड़ी राहत मिलती है। यही वजह है कि दिल्ली सरकार ने प्रदूषण के चरम स्तर को देखते हुए यह कदम उठाया है।

हालाँकि यह तकनीक नई नहीं है। भारत में क्लाउड सीडिंग की शुरुआत कई दशक पहले हो चुकी थी। 1980 के दशक में तमिलनाडु ने सूखे से राहत पाने के लिए इसका प्रयोग किया था। 2003 में महाराष्ट्र और कर्नाटक में भी इसे आजमाया गया। तेलंगाना में भी कुछ साल पहले बारिश बढ़ाने के लिए यह प्रयोग हुआ था।

लेकिन दिल्ली का मामला खास है क्योंकि यहाँ इसका इस्तेमाल पहली बार प्रदूषण कम करने के लिए किया जा रहा है, न कि बारिश बढ़ाने के लिए। यानी यह प्रयोग मौसम नहीं बल्कि वातावरण को साफ करने के मकसद से किया जा रहा है।

क्या सच में होगी आर्टिफिशियल बारिश?

वैज्ञानिकों का कहना है कि यह तकनीक पूरी तरह मौसम पर निर्भर है। अगर बादल अनुकूल हों तो बारिश की संभावना 60 से 70 फीसदी तक रहती है। लेकिन अगर नमी या तापमान ठीक न हो तो सारा प्रयास बेकार जा सकता है। यही वजह है कि मौसम वैज्ञानिक इस प्रक्रिया के लिए सही दिन और सही बादलों का इंतजार करते हैं।

दिल्ली में यह कदम ऐसे समय पर उठाया जा रहा है जब वायु गुणवत्ता सूचकांक ‘गंभीर’ स्तर पर है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के मुताबिक मंगलवार (28 अक्टूबर 2025) को दिल्ली का AQI 319 दर्ज किया गया, जो ‘बहुत खराब’ श्रेणी में है।

आर्टिफिशियल बारिश से खत्म होगा प्रदूषण?

प्रदूषण से निजात पाने लिए जब सभी उपाय नाकाम नजर आए तो अब उम्मीद आसमान से लगाई गई है। लेकिन क्या सच में आर्टिफिशियल बारिश से प्रदूषण खत्म हो जाएगा? देखा जाए तो यह पहल न सिर्फ प्रदूषण से जूझ रही दिल्ली के लिए राहत बन सकती है बल्कि भविष्य में उन शहरों के लिए भी मिसाल बन सकती है, जहाँ हवा सांस लेने लायक नहीं रह गई है।

हालाँकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि आर्टिफिशियल बारिश कोई स्थायी समाधान नहीं है। यह अस्थायी राहत तो देती है, लेकिन जब तक असली कारण जैसे वाहन प्रदूषण, पराली जलाना और औद्योगिक धुआँ नहीं रोका जाता है तब तक या समस्या फिर लौट आएगी।

फिर भी दिल्ली की बीजेपी सरकार ने प्रदूषण से निजात पाने के लिए बेहतरीन कदम उठाने का प्रयास किया है, जो पिछले सरकारें केवल हवा-हवाई वादों में ही प्रदूषण को भगाने का समाधान ढूँढती थी। लेकिन आर्टिफिशियल बारिश कराने के इस कदम से वाकई में दिल्ली में प्रदूषण स्तर ठीक होने की उम्मीद है।

जिनको शहाबुद्दीन ने तेजाब से नहलाया, उनके भाई का इंटरव्यू

ऑपइंडिया की बिहार ग्राउंड रिपोर्ट टीम सिवान पहुँची। यहाँ माफिया शहाबुद्दीन ने चंदा बाबू के दो बेटों पर एसिड डलवाया था। पत्रकार रोहित पांडेय ने चंदा बाबू के चौथे बेटे नीतीश से खास बातचीत की। नीतीश ने पहली बार किसी डिजिटल चैनल को इंटरव्यू दिया। वे मीडिया से दूर रहते हैं, लेकिन अब उन्होंने बताया कि भाइयों की जान बचाने के लिए कितना संघर्ष किया।

शहाबुद्दीन के गुंडाराज में सिवान कैसे दहशत में जीता था। लोग घर से निकलने से डरते थे। नीतीश ने न्याय की लड़ाई और परिवार की तकलीफें साझा कीं। सिवान में अब हालात बदले, लेकिन पुराने जख्म अभी ताजा हैं।

Wikipedia से मुकाबले के लिए एलन मस्क ने लॉन्च किया Grokipedia, जानिए कैसे करता है काम और इसे कैसे बता सकते हैं सुधार

मशहूर उद्योगपति एलन मस्क ने 27 अक्टूबर 2025 को ग्रोकिपीडिया लॉन्च किया। ये विकिपीडिया ( Wikipedia) की पक्षपातपूर्ण रवैये का एक विकल्प है। ग्रोकिपीडिया एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) द्वारा निर्मित ऑनलाइन रिसर्च इंजन है, जिसे मस्क की कंपनी xAI ने विकसित किया है।

यह प्लेटफॉर्म लेखों को खुद से बनाने, एडिट करने और क्यूरेट करने के लिए ग्रोक AI मॉडल का उपयोग करता है। एलन मस्क के अनुसार, ग्रोकिपीडिया का लक्ष्य विकिपीडिया जैसे पारंपरिक क्राउड-सोर्स्ड प्लेटफॉर्म में देखे जाने वाले राजनीतिक पूर्वाग्रहों को खत्म करना है, ताकि सही जानकारी लोगों तक पहुँच सके।

ग्रोकिपीडिया संस्करण 0.1 में अँग्रेजी में 6.8 मिलियन से अधिक लेख हैं, साथ ही चीनी, स्पेनिश और जर्मन जैसी भाषाओं के लिए लेख भी काफी हैं। अब तक, यूजर्स ने इसकी तथ्यात्मक सटीकता और विकिपीडिया प्रविष्टियों में लंबे समय से चली आ रही त्रुटियों के सुधारों की ओर ध्यान दिलाया है।

उदाहरण के लिए, विकिपीडिया और ग्रोकिपीडिया में जेंडर की परिभाषा में अंतर है। ग्रोकिपीडिया में ‘पुरुष’ और ‘महिला’ दो वर्गों का ही उल्लेख है। जबकि विकिपीडिया में तीसरी श्रेणी भी है।

Source: Wikipedia/Grokipedia

इसके अलावा, विकिपीडिया में जॉर्ज फ्लॉयड पर लिखे गए पेज के शुरुआती पैराग्राफ में उनके आपराधिक रिकॉर्ड का कोई जिक्र नहीं है। इसमें लिखा है, “जॉर्ज फ्लॉयड एक अफ्रीकी-अमेरिकी व्यक्ति थे, जिनकी 25 मई, 2020 को मिनियापोलिस, मिनेसोटा में एक श्वेत पुलिस अधिकारी ने हत्या कर दी थी। यह गिरफ्तारी तब हुई जब एक स्टोर क्लर्क ने शक जाहिर किया कि फ्लॉयड ने नकली बीस डॉलर के नोट का इस्तेमाल किया।”

Source: Wikipedia/Grokipedia

दूसरी ओर, ग्रोकिपीडिया उनके बारे में तथ्यात्मक जानकारी देते हुए कहता है, “जॉर्ज पेरी फ्लॉयड जूनियर (14 अक्टूबर, 1973 – 25 मई, 2020) एक अमेरिकी व्यक्ति था, जिसका लंबा आपराधिक रिकॉर्ड था, जिसमें 1997 से 2007 तक टेक्सास में सशस्त्र डकैती, ड्रग कब्जे और चोरी के लिए सजा शामिल थी। 25 मई, 2020 को फ्लॉयड को मिनियापोलिस, मिनेसोटा में गिरफ्तार किया गया था, जब एक स्टोर क्लर्क ने बताया कि उसने सिगरेट खरीदने के लिए नकली 20 डॉलर के नोट का इस्तेमाल किया था।”

Source: Grokipedia

ग्रोकिपीडिया में आगे बताया गया है कि उनकी हत्या कैसे हुई, लेकिन इसे वामपंथी और पक्षपातपूर्ण लहजे में प्रस्तुत नहीं किया गया है, जिससे पूरी तरह से पुलिस पर दोष मढ़ा जा सके। यह विकिपीडिया पर दिख रही पूर्वाग्रह के बिल्कुल अलग है। मस्क ने ग्रोकिपीडिया को ‘निष्पक्ष ज्ञान के माध्यम से ब्रह्मांड’ को समझने के xAI के मिशन की दिशा में एक कदम के रूप में स्थापित किया है।

ग्रोकिपीडिया पर जानकारी कैसे खोजें और त्रुटियाँ कैसे सुधारें

ग्रोकिपीडिया पर लेख ढूँढने का तरीका काफी आसान है और विकिपीडिया से काफी मिलती-जुलती है। सबसे पहले, आपको grokipedia.com पर जाना होगा। फिलहाल, यह प्लेटफॉर्म केवल वेब ब्राउजर के माध्यम से ही उपलब्ध है।

Source: Grokipedia

वेबसाइट पर जाने के बाद, आपको होम पेज पर एक सर्च बार दिखाई देगा। उस शब्द को खोजें जिसके बारे में आप पढ़ना चाहते हैं। ग्रोकिपीडिया बातचीत के बजाय विषय-आधारित प्रविष्टियों पर ज्यादा ध्यान देता है, इसलिए किसी विषय के नाम के आगे ‘मुझे इसके बारे में बताएँ’ लिखने पर परिणाम अलग आ सकते हैं। अगर आप कोई विषय खोजना चाहते हैं, तो सिर्फ़ विषय लिखें। उदाहरण के लिए, ‘मुझे भारत के बारे में बताएँ’ न लिख कर सिर्फ ‘भारत’ टाइप करें, और यह आपको शीर्षक में ‘भारत’ वाले विषयों की एक सूची देगा।

Source: Grokipedia

ग्रोक एआई मॉडल आधिकारिक स्रोतों, शोध पत्रों और एक्स पर सत्यापित पोस्टों से रीयल-टाइम डेटा का उपयोग करके तुरंत लेख तैयार करता है। सामग्री पाठ-केंद्रित है, जिसमें संबंधित विषयों के लिए आंतरिक लिंक और सत्यापन के लिए संदर्भ शामिल हैं।

ग्रोकिपीडिया पर गलत जानकारी सुधारना

ग्रोकिपीडिया, अभी तक डायरेक्ट एडिटिंग की अनुमति नहीं देता है। हालाँकि यूजर्स एआई-सहायता प्राप्त रिपोर्टिंग सुविधा के माध्यम से सुधार से संबंधित सुझाव दे सकते हैं। किसी त्रुटि को सुधारने के लिए, लेख खोलें और गलत पाठ का चयन करें। आपको पाठ के ऊपर ‘यह गलत है’ लेबल वाला एक संकेत दिखाई देगा।

इस पर क्लिक करें। इसके बाद एक पॉप-अप विंडो दिखाई देगा, जहाँ आप उपलब्ध स्रोतों के साथ सही जानकारी प्रस्तुत कर सकते हैं। सबमिट करने के बाद, अगर सिस्टम जानकारी की पुष्टि कर लेता है, तो वह लेख को अपडेट कर देगा। हालाँकि, AI को परिवर्तनों को सत्यापित करने और उन्हें दर्शाने में कुछ समय लग सकता है।

सर्वोत्तम परिणामों के लिए, सुनिश्चित करें कि आपका सुधार तथ्यात्मक रूप से समर्थित और संक्षिप्त हो। यदि कुछ समय बाद भी त्रुटि बनी रहती है, तो आप अधिक प्रमाणों के साथ अपनी रिपोर्ट पुनः प्रस्तुत कर सकते हैं। ग्रोकिपीडिया ओपन-सोर्स है और लगातार विकसित हो रहा है, इसलिए यूजर्स एआई की सटीकता और विश्वसनीयता में सुधार करने में मदद कर सकते हैं।

ग्रोकिपीडिया कैसे अलग हैं विकिपीडिया से

ग्रोकिपीडिया और विकिपीडिया ऑनलाइन दो अलग-अलग फिलोसफी का प्रतिनिधित्व करते हैं। जहाँ विकिपीडिया मानवीय सहयोग पर निर्भर करता है, वहीं ग्रोकिपीडिया सूचना को खुद से अपडेट करके कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग करता है, ताकि इसे पूर्वाग्रह-मुक्त बनाया जा सके। उल्लेखनीय रूप से, एलन मस्क ने एक्स पर एक पोस्ट में स्वीकार किया कि ग्रोकिपीडिया कभी भी पूर्ण नहीं हो सकता, बल्कि इसे हमेशा अपडेट किया जाएगा।

कंटेंट और एडिटिंग की प्रक्रिया सिस्टम खुद करता है

ग्रोकपीडिया लेख खुद से ग्रोक मॉडल में जेनरेट, एडिट करता है। सिस्टम रियल टाइम डेटा का इस्तेमाल करता है, जो ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से लेता है। खुद में सुधार करने की क्षमता भी इसमें है।

विकिपीडिया से अलग इसमें कई लोग एडिट नहीं कर सकते, बल्कि एआई लगातार इसके कंटेंट को अपडेट करता रहता है ताकि नई जानकारी जुड़े और प्रासांगिक बना रहे। ग्रोकिपीडिया का मकसद आदर्शवाद और राजनीतिक दखलदांजी को कम कर ‘सच दिखाने’ पर केन्द्रित है। इसका उद्देश्य सही डाटा पर आधारित जानकारी देना है।

(ये लेख मूल रूप से अँग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)