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न मिलाया हाथ-न की कोई बात, दरवाजा भी मुँह पर बंद किया: पाकिस्तानी खिलाड़ियों के साथ भारतीय टीम का बर्ताव देख रोया ‘आतंकिस्तान’, ACC के पास जाकर गिड़गिड़ाया

पहलगाम आतंकी हमले के बाद पहली बार भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट का मुकाबला खेला गया। इस मैच में भारत ने पाकिस्तान को करारी हार दी। लेकिन मुकाबले की सबसे खास बात थी, भारतीय टीम का पाकिस्तान की टीम से हाथ ना मिलाना। अब इस No Handshake पर पाकिस्तानी क्रिकेटर और मुल्क की आवाम तिलमिला गई है।

पाकिस्तानी क्रिकेट बोर्ड (PCB) ने तो अपना रोना लेकर एशियन क्रिकेट काउंसिल (ACC) तक पहुँच गए, जिसके अध्यक्ष मोहसिन नकवी खुद पाकिस्तान से हैं। PCB ने एक बयान में कहा, “मैच रेफरी एंडी पाइक्रॉफ्ट ने टॉस के समय कप्तान सलमान अली आगा से भारतीय टीम के कप्तान से हाथ न मिलाने को कहा था। पाकिस्तानी टीम मैनेजमेंट ने इस व्यवहार को खेल भावना के विरुद्ध बताते हुए अधिकारिक विरोध दर्ज कराया है।”

भारतीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तानी टीम से हाथ मिलाने से बचने का टीम इंडिया का फैसला प्रशंसकों के लिए भले ही एक नई बात हो लेकिन मैच रेफरी एंडी पाइक्रॉफ्ट को इसकी जानकारी पहले ही दे दी गई थी। मैच रेफरी ने भी पाकिस्तान को भारत के इरादे के बारे में पहले ही बता दिया था और सलमान अली आगा को भी सूर्यकुमार और अन्य भारतीय खिलाड़ियों से हाथ मिलाने से बचने की सलाह दी थी।

पाकिस्तानी क्रिकेट जगत में बौखलाहट

पाकिस्तानी के क्रिकेट जगत से भी भारतीय टीम के No Handshake पर खूब प्रतिक्रियाएँ सामने आईं। पूर्व पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब अख्तर जो भारत के खिलाफ जहर उगलते हैं, उनको यह घटना काफी दुखद लगी और उनका दिल पसीज गया।

शोएब अख्तर ने कहा, “यह निराशाजनक और अवाक है, यह दुखद है, पता नहीं क्या कहूँ। इस पर राजनीति मत करो। हमने तुम्हारे बारे में अच्छी बातें कही हैं, बस हाथ मिलाओ यार, क्रिकेट का खेल है। थोड़ी शालीनता दिखाओ। घर-घर में भी झगड़े होते हैं लेकिन हाथ न मिलाकर बात को आगे मत बढ़ाओ।”

वहीं, मैच के बाद सेरेमनी में शामिल न होने के पाकिस्तानी टीम के कप्तान सलमान आगा के फैसले को शोएब अख्तर ने सही बताया, “वो नहीं गए, ठीक किया। बहुत अच्छा।”

पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के कोच माइक हेसन ने कहा, “हम हाथ मिलाने के लिए आगे बढ़े थे लेकिन तब तक वे ड्रेसिंग रूम जा चुके थे। यह मैच का निराशाजनक अंत था। हम अपने खेल से पहले ही निराश थे लेकिन हम हाथ मिलाने के लिए तैयार थे।”

पाकिस्तान के एक और पूर्व क्रिकेटर कामरान अकमल ने भी एक डिबेट के दौरान कहा, “हम इस काबिल नहीं हैं कि शीर्ष की पाँच छह टीमों के साथ खेल पाएँ। सबसे निचले पायदान पर रहने वाली टीमों जैसे बांग्लादेश के साथ खेलते हुए हम अच्छे लगते हैं।”

पाकिस्तान मीडिया ने बताया ‘छोटी हरकत’

भारतीय टीम के कैप्टन सूर्य कुमार ने मुकाबले की शुरुआत में टॉस के वक्त भी पाकिस्तान के कैप्टन सलमान से हाथ मिलाने से परहेज किया। इसके बाद मैच के अंत में भारत की जीत के बाद खिलाड़ी बिना हाथ मिलाए पाकिस्तान टीम के मुँह पर ड्रेसिंग रूम का दरवाजा बंद कर चले गए। उधर, पाकिस्तानी खिलाड़ी स्टेडियम में इंतजार करती रही।

अब भारतीय टीम की इस No Handshake मोमेंट पर पाकिस्तानी मीडिया विश्लेषण तैयार कर रही है। कुछ क्रिकेट एक्सपर्ट्स को डिबेट में बिठाकर भारतीय खिलाड़ियों को कम आँक रहे हैं। कुछ पाकिस्तानी एक्सपर्ट ने तो इसे भारतीय क्रिकेट टीम की ‘छोटी हरकत’ करार दिया।

ऐसे ही एक पाकिस्तानी एक्सपर्ट, जो भारत-पाकिस्तान मुकाबले का एनालिसिस करने बैठे थे, वो कहते हैं, “आप (भारतीय क्रिकेट टीम) हाथ नहीं मिलाएँगे तो क्या हीरो बन जाएँगे। जो क्रिकेट को जानता है वो कभी इसकी सराहना नहीं करेगा।”

अन्य पाकिस्तानी क्रिकेट एक्सपर्ट तो यह तक बोलने लगे, “इससे क्रिकेट की बेकदरी हुई है। बेचारे प्लेयर्स की रेप्युटेशन खराब हो रही है। मैं इसे छोटी हरकत समझता हूँ। वो (भारतीय क्रिकेट टीम) बेचारे मजबूर हुए हैं ऐसा करने पर, उन पर दबाव था ये करने का।

सोशल मीडिया पर पाकिस्तान आवाम की प्रतिक्रिया

जहाँ पाकिस्तानी क्रिकेटर और मीडिया ने भारतीय टीम के No Handshake पर खूब रोना रोया। वहीं सोशल मीडिया पर पाकिस्तानी यूजर्स ने भारत-पाकिस्तान के बीच खराब रिश्ते को और बढ़ावा दिया। सोशल मीडिया पर एक तरफ पाकिस्तान टीम को दरियादिल दर्शाया गया और भारतीय टीम को दुश्मन बताया गया।

निर्बाज रमजान नाम की यूजर ने कहा, “मैच के बाद हाथ नहीं मिलाया। पाकिस्तान टीम इंडिया के हाथ मिलाने का इंतजार कर रही थी लेकिन वे नहीं आए।” इस रिएक्शन में पाकिस्तानी क्रिकेट टीम को ‘महान’ बनाकर पेश किया गया।

मर्यम नाम की यूजर ने एक्स पर लिखा, “भारतीय कप्तान ने टॉस और मैच के बाद हाथ मिलाने से इनकार कर दिया, जो पाकिस्तान का साफतौर पर अपमान है। फिर भी पंजाबी कहते हैं कि “भारत नहीं, अफगनिस्तान दुश्मन है” जबकि अफगान टीम ने हमारी टीम का गर्मजोशी से स्वागत किया। अजीब बात है कि हकीकत हर बार उन्हें गलत साबित करती है।”

सिम्बा नाम से एक्स यूजर ने कहा, “क्रिकेट को हमेशा से सज्जनों का खेल कहा जाता रहा है लेकिन आज भारत ने एक साधारण हाथ मिलाने से इनकार करके इसके इमोशन पर दाग लगा दिया, जो स्पोर्ट्समैनशिप के बिल्कुल खिलाफ है। इसके विपरीत, पाकिस्तान ने शालीनता से आगे बढ़कर साबित कर दिया कि असल में दिल किसका होता है। आगे बढ़ो, लड़कों, दिल जीतते रहो।”

जहानजैब दुर्रानी नाम की यूजर ने कहा, “मैच के बाद हाथ मिलाने से इनकार करके और दरवाजा बंद करके, भारतीय टीम ने दिखा दिया कि वे कितने बेढंगे और तुच्छ हैं। छोटे दिल, छोटा दिमाग!!! ठीक यही वजह है कि जिन्ना ने कहा था कि हमारे बीच कुछ भी समान नहीं है। शुक्र है कि हमने अपनी आजादी ले ली और हमें उनके साथ नहीं रहना पड़ रहा। छोटे लोग हैं।”\

जहानजैब दुर्रानी के कमेंट का स्क्रीनशॉट

भारतीय खिलाड़ियों के No Handshake ने दर्शाया देशप्रेम

भारतीय टीम के हाथ ना मिलाने पर पाकिस्तान ने रोना शुरू कर दिया। इससे साफ नजर आता है कि पाकिस्तान अब भी भारत के सामने झुका हुआ है। भारतीय टीम का रवैया पाकिस्तान को ‘छोटी हरकत’ लगा, तो मुल्क का आतंकी को पनाह देना किस हद तक सही है। शायद पाकिस्तान भूल गया है कि भारत का यह रवैया देशप्रेम है, ये उन पीड़ितों का सम्मान है, जिन्होंने पहलगाम आतंकी हमले में अपनी जान गवा दी। वही हमला, जिसके बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर से पाकिस्तान को शिकस्त दी।

भारतीय क्रिकेट टीम के कोच गौतम गंभीर ने भी इस हैंडशेक विवाद पर बात करते हुए कहा, “यह मैच हमारे लिए महत्वपूर्ण था क्योंकि हम पहलगाम हमले के पीड़ितों और उनके परिवारों के साथ एकजुटता दिखाना चाहते थे और उन्होंने जो कुछ भी सहा, उसके लिए भी। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि हम भारतीय सेना को उनके सफल ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के लिए उन्हें धन्यवाद देना चाहते हैं। हम अपने देश को गौरवान्वित और खुश करने की कोशिश करेंगे।”

टीम के कप्तान सूर्य कुमार यादव ने भी मैच के बाद दिए बयान में कहा, “पहलगाम आतंकी हमले के पीड़ित परिवारों के साथ खड़े हैं, हम अपनी एकजुटता व्यक्त करते हैं और इस जीत को आर्म्ड फोर्सेस को समर्पित करना चाहते हैं।

सूर्या ने पाकिस्तान के ख‍िलाड़‍ियों संग हाथ ने म‍िलाने की वजह भी स्पष्ट की। उन्होंने कहा, “हमारी सरकार और BCCI पूरी तरह से एकमत थे। हमने फैसला लिया कि हम सिर्फ खेल खेलने आए हैं और पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब दिया।

देशप्रेम में भारतीय खिलाड़ियों ने पाकिस्तानी टीम से हाथ नहीं मिलाया। इसके बावजदू अगर पाकिस्तान इसे ‘छोटी हरकत’ समझता है तो समझता रहे। लेकिन भारत द्वारा पाकिस्तान के किसी भी ‘शांतिप्रिय’ बयान को माना नहीं जाएगा। देशप्रेम में भारत अब पाकिस्तान को बॉयकॉट भी करना चाहे तो करेगा, चाहे वह क्रिकेट जैसे लोकप्रिय खेल में ही क्यों न हो। पाकिस्तान और भारत बहुत अलग हैं।

‘हिंदू-मुसलमान कुछ नहीं होता’ कहने वाली हिंदू Insta इन्फ्लुएंसर को यूट्यूबर मेराज ने इस्तेमाल करके छोड़ा, रोते-रोते Video बनाई: बोली- लोग समझाते थे ये जिहादी है

सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर वन्नू डी ग्रेट ने इंस्टाग्राम पर वीडियो पोस्ट कर इंसाफ की गुहार लगाई है। उसका कहना है कि वह इंस्टाग्राम इंफ्लुएंसर और यूट्यूबर मनी मेराज के साथ काम करती थी। मनी मेराज ने उसे अपने प्यार में फँसाया। उसका शारीरिक शोषण किया। धर्म परिवर्तन करा कर निकाह किया। अब उसे धोखा देकर दूसरी बार निकाह करने जा रहा है।

पीड़िता ने अपने वीडियो में कहा है, “वह कहता था कि बीवी हो, तुम्हारे साथ जबरदस्ती नहीं करूँगा, तो किसके साथ करूँगा।” रोते हुए अब वह कह रही है कि उसके साथ धोखा हुआ है, क्योंकि मनी मेराज दूसरी बार निकाह करने जा रहा है। मनी मेराज का फोन भी स्विच ऑफ है।

मुस्लिम यूट्यूबर 9 सितंबर 2025 से फरार है। पीड़िता का कहना है कि जब उसने आरोपित के परिजनों से मिलने बिहार के मुजफ्फरपुर पहुँची और मिली, तो उसे डराया-धमकाया गया। यूट्यूबर के अब्बू ने कहा कि पुलिस और मुखिया उनकी तरफ है और वो वही करेंगे, जो उन्हें कहा जाएगा।

इंस्टाग्राम पर वन्नू डी ग्रेट ने कहा है, “जो आरोप लगाए हैं, उसके सारे साक्ष्य मेरे पास मौजूद हैं। उसे किस तरह से यूट्यूबर मनी मेराज ने अपने प्रेम में फँसाया और चुपके से निकाह किया। लेकिन अब उसे धोखा दे रहा है। ” इस्लाम कबूल करने को लेकर भी अब वह पछता रही है। उसका कहना है, “मैंने गलती की गलत इंसान पर विश्वास किया और इस्लाम कबूल करके निकाह कर लिया। मेरी सजा तो मुझे मिल गई है, लेकिन मनी मेराज की सजा अब आप लोग या कानून तय करेगा।”

वह खुद कह रही है कि एक मुस्लिम लड़के से निकाह करने से पहले कुछ हिंदुओं ने उसे जिहादियों से दूर रहने की सलाह दी थी, लेकिन वह नहीं समझी और अब उसे अपने किए का अंजाम भुगतना पड़ रहा है।

इंस्टाग्राम इंफ्लोएंसर मनी मेराज के 7.1 मिलियन फॉलोअर्स हैं। वह खुद को एक्टर, डांसर, कॉमिडियन और गायक कहता है। वह भोजपुरी फिल्मों में अपनी किस्मत आजमा रहा है। यूट्यूब पर उसके 10k फोलोअर्स हैं।

बिहार में शिक्षा की आड़ में धर्मांतरण और यौन शोषण का जाल: जेम्स इंग्लिश स्कूल में गरीब परिवार की बच्चियों को बनाया जा रहा निशाना, केंद्र सरकार को भेजी गई रिपोर्ट

बिहार के रोहतास जिले के सासाराम में शिक्षण संस्थान में जबरन धर्मांतरण और रेप के मामले का खुलासा हुआ है। इंद्रपुरी के सिकरिया गाँव में स्थित जेम्स इंग्लिश स्कूल और उससे जुड़े जेम्स टेलरिंग इंस्टीट्यूट में धर्मांतरण और नाबालिग बच्चियों के यौन शोषण की घटना सामने आई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह खुलासा रोहतास जिला बाल कल्याण समिति की जाँच में हुआ है। समिति ने हाल ही में स्कूल परिसर की जाँच की थी और अपनी रिपोर्ट में गंभीर आरोप लगाए हैं। रिपोर्ट भारत सरकार के गृह सचिव, डीएम समेत कई अधिकारियों को भेजी गई है और उच्चस्तरीय जाँच की सिफारिश की गई है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, जाँच के दौरान समिति को पता चला कि जेम्स टेलरिंग इंस्टीट्यूट में गरीब परिवार के बच्चों को झांसा देकर लाया जाता था और उनका धर्मांतरण करा दिया जाता था।

मामला कैसे आया सामने?

27 अगस्त 2025 को गया जिले की एक किशोरी लापता हो गई थी। उसकी माँ ने 30 अगस्त को इंद्रपुरी थाने में FIR दर्ज कराई। इसके बाद बाल कल्याण समिति ने 8 सितंबर 2025 को स्कूल परिसर में जाँच की। जाँच टीम में समिति के अध्यक्ष संतोष कुमार, सदस्य ददन पांडेय, गायत्री कुमारी, इंद्रपुरी की थानाध्यक्ष माधुरी कुमारी और प्रधान प्रोबेशन पदाधिकारी प्रशांत सिंह विष्ट शामिल थे।

जब समिति के लोग जेम्स टेलरिंग इंस्टीट्यूट पहुँचे तो वहाँ 7-8 बच्चियों को सिलाई सिखाई जा रही थी। जाँच के दौरान बच्चियों का नामांकन रजिस्टर, हाजिरी पंजी या अन्य कोई वैध दस्तावेज नहीं मिला। संस्था कब से चल रही है, किस आधार पर बच्चियों को रखा गया है इसका भी कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला।

इस दौरान टीम ने देखा कि एक लड़की जोर-जोर से रो रही थी और दो लोग उसे खींचकर ले जा रहे थे। पूछने पर कहा गया कि उसके पेट में दर्द है। बताया गया कि वह ऐसे ही करती रहती है। इंद्रपुरी थानाध्यक्ष व समिति सदस्य गायत्री कुमारी ऊपर गई। लड़की को चुप कराकर नीचे आ गईं।

इसके बाद लड़की को पीटा जाने लगा। टीम ने उसे रेस्क्यू कर गंभीर अवस्था में इलाज के लिए भेजा, लेकिन डॉक्टर ने इलाज करने से मना कर दिया। इसके बाद उसे समिति में लाया गया। महिला काउंसलर से बात करने पर लड़की ने बताया कि चार लोगों ने उसके साथ रेप किया था। मेडिकल जाँच के बाद उसे बालिका गृह भेजा गया।

आगे की कार्रवाई

9 सितंबर 2025 को समिति की सदस्य गायत्री कुमारी की निगरानी में जिला बाल संरक्षण इकाई, चाइल्ड हेल्पलाइन और इंद्रपुरी थाना अध्यक्ष की टीम ने वहाँ से कुल सात बच्चियों को मुक्त कराया। समिति ने बताया कि इन सभी बच्चियों को बालिका गृह में शिफ्ट कर दिया गया है।

टीम द्वारा दी गई रिपोर्ट में बच्चियों के बयान दर्ज हैं। उनमें से कई बच्चियों ने नामांकन फॉर्म में जो जानकारी दी थी, उससे यह संदेह हुआ कि वहाँ धर्मांतरण से जुड़ी गतिविधियाँ चल रही थीं। इस आधार पर समिति ने जिलाधिकारी से माँग की है कि एक उच्चस्तरीय जाँच समिति बनाई जाए और पूरे मामले की गहराई से जाँच की जाए।

सासाराम के एसपी रौशन कुमार ने भी कहा है कि डीएम स्तर से जाँच टीम का गठन किया जाएगा और रिपोर्ट आने के बाद जरूरी कार्रवाई की जाएगी।

बिलासपुर से दुर्ग तक प्रार्थना सभा की आड़ में धर्मांतरण को लेकर बवाल: मिशनरियों ने फाड़े हिन्दू महिला के कपड़े, विरोध में 10 घंटे तक प्रदर्शन और चर्च के सामने भजन-कीर्तन

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में धर्मांतरण को लेकर तनाव बना हुआ है। 13 सितंबर 2025 को प्रार्थना सभा में करीब 300 लोगों को ईसाई बनाने के लिए प्रार्थना सभा का आयोजन किया गया था। वहीं दुर्ग में भी धर्मांतरण के विरोध में हिन्दू संगठन सड़क पर आ गए।

बिलासपुर में प्रार्थना सभा में करीब 300 लोग मौजूद थे। इनलोगों का धर्मांतरण कराया जा रहा था। इस मामले में सीपत पुलिस ने 7 लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया है। इसको लेकर ईसाईयों ने जमकर बवाल किया।

प्रार्थना सभा की आड़ में धर्मांतरण

हिन्दू संगठन ने भी धर्मांतरण के विरोध में करीब 10 घंटे तक प्रदर्शन किया। इस लोगों ने मसीही समाज के लोगों के खिलाफ कार्रवाई की माँग की है। हिन्दू संगठनों का कहना है कि लगातार प्रार्थना सभा की आड़ में हिन्दुओं को लालच और पैसे देकर धर्मांतरण कराया जा रहा है। इनलोगों ने ईसाईयत और पुलिस प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी की।

हिन्दू संगठनों ने थाने के सामने हनुमान चालीसा का पाठ भी किया। पुलिस के मुताबिक, प्रार्थना सभा की आड़ में धर्मांतरण की सूचना मिली थी। इसके आधार पर पुलिस घटनास्थल पर पहुँची और 7 ईसाईयों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर वैधानिक कार्रवाई की जा रही है।

बिलासपुर में धर्मांतरण का ये कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले बीते 28 अगस्त 2025 को प्रार्थना सभा की आड़ में धर्मांतरण की कोशिश की जा रही थी। हिन्दू संगठनों को जानकारी मिलने पर वे मस्तूरी थाना क्षेत्र के पेंड्री पहुँचे। यहाँ एक बंद पड़े पोल्ट्री फॉर्म में 15-20 लोगों का धर्मांतरण किया जा रहा था। इसके लिए प्रार्थना सभा का आयोजन किया गया था। पुलिस ने इस मामले में पास्टर संजीव सूर्यवंशी समेत 8 लोगों को गिरफ्तार किया था।

दुर्ग में भी धर्मांतरण को लेकर तनाव

छत्तीसगढ़ के दुर्ग के पद्मनाभपुर में रविवार (14 सितंबर 2025) को चर्च में प्रार्थना सभा का आयोजन किया गया था। इसको लेकर आस पास के लोगों ने हिन्दू संगठनों को जानकारी दी कि यहाँ धर्मांतरण के लिए लोगों को जुटाया गया है। इसके बाद हिन्दू संगठन वहाँ पहुँच गए और चर्च के बाहर हंगामा किया। मौके पर पहुँची पुलिस ने प्रार्थना सभा में मौजूद लोगों के नाम और पता नोट किए। हिन्दू समुदाय ने इस दौरान चर्च के बाहर भजन-कीर्तन किया।

विवाद बढ़ने पर पुलिस ने दोनों पक्षों को थाने लेकर गई। हिन्दुओं का कहना है कि चर्च से जुड़े जॉन को धर्मांतरण के लिए बाहर से फंडिंग होती है। उसकी बैंक खातों की जाँच की जानी चाहिए। उसे जिला बदर किया जाना चाहिए। इनका कहना है कि जॉन ने अपने गुर्गों के साथ मिलकर मारपीट किया और गालियाँ दी।

इनलोगों ने बजरंग दल कार्यकर्ता निर्मित कौर को धक्का दिया। यहाँ तक की उसके कपड़े फाड़ दिए। इसके बाद जॉन को बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने पीटा। फिलहाल जॉन को नजदीक के अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

दाता त्रयनाथ को बनाया अब्दुल रहमान, लक्ष्मी बनी सलमा: UP के देवरिया में ‘छांगुर पीर’ जैसा धर्मांतरण का सिंडिकेट, उस्मान गनी अपने मॉल के कर्मियों को बना रहा था मुस्लिम

उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में एक बड़े धर्मांतरण सिंडिकेट का खुलासा हुआ है, जिसकी तुलना छांगुर पीर के मामले से की जा रही है। इस सिंडिकेट का मुख्य सरगना उस्मान गनी बताया जा रहा है। वह SS मॉल और EG मार्ट का संचालक है।

SS मॉल का मालिक उस्मान गनी, उसकी बीवी तरन्नुम और साले गौहर अली पर उसी मॉल में काम करने वाली एक युवती ने धर्मांतरण और यौन शोषण के गंभीर आरोप लगाए थे। इस मामले में FIR दर्ज है, लेकिन अब तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई थी। वहीं, अब सामने आया है कि रविवार (14 सितंबर 2025) को उस्मान गनी और उसकी बीवी दोनों मॉल में ताला बंद कर फरार हो गए हैं।

फिलहाल पुलिस दोनों आरोपितों को गिरफ्तार करने के लिए जगह-जगह दबिश दे रही है। इसी बीच EG मार्ट का एक नया मामला सामने आया है। यहाँ काम करने वाले दाता त्रयनाथ मद्धेशिया नाम के कर्मचारी ने अपने पूरे परिवार के साथ इस्लाम धर्म कबूल कर लिया है। अब वह अब्दुल रहमान बन चुका हैं। इस बात की पुष्टि ग्राम प्रधान राम नारायण गुप्ता और एडवोकेट विजय तिवारी ने की है।

एक और खुलासे के तहत यह भी सामने आया है कि खुखुंदू थाना क्षेत्र के रहने वाले उमेश सिंह की बेटी लक्ष्मी सिंह को उस्मान गनी के साले गौहर अली ने बहलाकर निकाह किया और धर्म बदलवाकर उसका नाम सलमा रख दिया। इस मामले में गौहर अली को जेल भेज दिया गया है। लक्ष्मी के पिता का कहना है कि उनकी बेटी को गुमराह किया गया है और अब वह उसी का साथ दे रही है।

आरोप है कि ये लोग युवतियों को लग्जरी लाइफ का लालच देकर व्यापारियों को सप्लाई करते थे। वहीं अब पीड़ित परिवारों को धमकियाँ भी दी जा रही हैं। मामले में सदर विधायक शलभ मणि त्रिपाठी ने कहा है कि जिले में छांगुर पीर जैसे सिंडिकेट को पनपने नहीं दिया जाएगा।

उन्होंने जिला प्रशासन को सख्त कार्रवाई के आदेश दिए हैं और SS मॉल और EG मार्ट की जाँच की माँग की जा रही है। पिछले कुछ दिनों से लगातार खुलासों के बाद अब SS मॉल और EG मार्ट पर स्थानीय लोगों द्वारा भी जाँच की माँग उठाई जा रही है। विधायक के अनुसार, उस्मान गनी, उसकी बीवी और साले, सभी इस धर्मांतरण गिरोह में शामिल हैं और सुनियोजित तरीके से काम कर रहे हैं।

इस्लामी कट्टरपंथियों के बाद ईसाई मिशनरियों को खुश करने में जुटी सिद्धारमैया सरकार, धर्मांतरण की साजिशों को दी ‘क्लीन चिट’: कर्नाटक CM ने कहा- हिंदुओं में नहीं समानता

इस्लामी कट्टरपंथियों को लेकर कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार का रुख तो लंबे वक्त से साफ रहा है। आरक्षण से लेकर मुस्लिम कॉलोनियाँ बनाने तक तुष्टिकरण के लिए वो कुछ भी कर गुजरने को तैयार है। अब उनका प्रेम ईसाई मिशनरियों पर उमड़ता दिख रहा है।

कुछ दिनों पहले बेंगलुरु में शिवाजी नगर मेट्रो स्टेशन का नाम सेंट मेरी बेसिलिका के नाम पर रखने की घोषणा करने वाले कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को अब हिंदू धर्म में सारी खामियाँ नजर आने लगी हैं। हिंदुओं के धर्मांतरण की जो साजिश चल रही है, उसे सिद्धारमैया ने जाति व्यवस्था से जोड़ दिया है। उन्हें हिंदू धर्म में असमानता की बात भी दिखने लगी है।

सिद्धारमैया ने क्या कहा?

सिद्धारमैया ने धर्मांतरण पर अपनी बात रखते हुए बड़ी सफाई से यह बताने की कोशिश की है कि जो लोग धर्मांतरण करते हैं वो असल में व्यवस्थाओं से परेशान हैं। उन्होंने कहा, “भले ही हम कहें कि धर्मांतरण मत करो लेकिन कुछ लोग व्यवस्था के कारण ऐसा करते हैं। हमारे हिंदू समुदाय में, अगर समानता और समान अवसर होते, तो कोई धर्मांतरण क्यों करता?”

उन्होंने आगे कहा कि क्या हिंदू समाज ने छुआ छूत नहीं बनाई। कर्नाटक सीएम ने कहा, “इस्लाम या ईसाई धर्म या किसी अन्य धर्म में भी असमानताएँ हो सकती हैं। हमने या बीजेपी ने किसी को धर्मांतरण करने के लिए नहीं कहा, यह लोगों का अधिकार है और वह अपने मन से ऐसा करते हैं।”

क्या वाकई समानता और समान अवसर ना होने के चलते हो रहा धर्मांतरण?

सिद्धारमैया ने धर्मांतरण पर हिंदुओं को लेकर जो आसानी से कह दिया और जो असमानता की बात उन्होंने कह दी है। उस पर क्या वो किसी और मजहब से सवाल पूछ पाएँगे। जाहिर है, ऐसा नहीं होगा। क्योंकि उनके लिए हिंदुओं पर सवाल उठाना एक आसान टार्गेट है।

अब आते हैं समानता और समान अवसरों से धर्मांतरण पर, क्या ईसाई या मुस्लिम समाज पूरी तरह समानता और अवसरों से भरे हुए हैं? वहाँ भी जातीय, वर्गीय और आर्थिक भेद साफ-साफ दिखते हैं। फिर भी क्या दुनिया में उनका धर्मांतरण उस स्तर पर होता है?

इतिहास गवाह है कि मध्यकालीन आक्रांताओं का दौर रहा हो या ब्रिटिश हुकूमत के दौर में मिशनरियों का अभियान, उस दौरान में जो धर्मांतरण हुए वे राजनीतिक या आर्थिक दबाव के कारण हुए थे। गरीबों और वंचितों को शिक्षा, स्वास्थ्य और पैसे का लालच देकर धर्म बदलने के लिए प्रेरित किया गया।

वहीं, अगर समान अवसर की बात करें तो यह संवैधानिक तौर पर सरकार का काम है कि वो लोगों को समान अवसर दे। अगर समान अवसर ना मिलने के कारण लोगों को धर्मांतरण के लिए मजबूर होना पड़ रहा है तो इसके लिए उनकी खुद की सरकार कितनी जिम्मेदार है?

सिद्धारमैया का बयान ‘मिशनरियों और कट्टरपंथियों को क्लीन चिट’

यह बयान जिस तरह से दिया गया है वह बहुत खतरनाक है। सिद्धारमैया का यह तर्क उन मिशनरियों और कट्टरपंथी संगठनों को खुला लाइसेंस देने जैसा है जो दशकों से गरीबों, दलितों और वंचितों को लालच और झूठे वादों के जरिए हिंदू समाज से तोड़ने में लगे हुए हैं।

क्या यह सच नहीं कि ईसाई मिशनरियाँ शिक्षा, स्वास्थ्य और सहायता के नाम पर गरीबों को पहले निर्भर बनाती हैं और फिर मजबूरी के हालात में धर्मांतरण करवा लेती हैं? क्या यह सच नहीं कि इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों द्वारा ‘लव जिहाद’ और पैसों के लालच से हजारों युवतियों और परिवारों को फँसाया गया है?

समाज के तौर पर अगर कुछ कमियाँ हैं भी तो क्या उन्हें ठीक नहीं करने की कोशिशें हुई हैं? क्या मुस्लिम या ईसाई बनना ही इसका समाधान है? हिंदुओं ने सुधार के लिए जितना काम किया है, उतना किसी अन्य पंथ ने नहीं किया होगा।

आज करोड़ों दलित और पिछड़े वर्ग से आने वाले लोग हिंदू समाज में ही रहते हुए राजनीति, शिक्षा और अन्य क्षेत्रों में ऊँचाइयों तक पहुँचते हैं। देश के शीर्ष पदों पर आसीन लोगों से इसका साफ पता चलता है।

आज जरूरत है कि ऐसे नेताओं की बयानबाजी को बेनकाब किया जाए। अगर हिंदू समाज की कुछ कमियाँ हैं, तो उनका हल समाज-सुधार और शिक्षा है, न कि धर्मांतरण। हर बार हिंदू धर्म को कठघरे में खड़ा करके मिशनरियों को क्लीन चिट देना, असल में राष्ट्र और संस्कृति पर सीधा हमला है।

10% मुस्लिमों के दम पर भारत को इस्लामी मुल्क बनाने की साजिश, RSS-PM मोदी का जिक्र: जानें महबूब आलम की गिरफ्तारी से चर्चा में आए PFI के ‘इंडिया विजन 2047’ की कहानी

नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) ने शनिवार (14 सितंबर 2025) को पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) के बिहार राज्य अध्यक्ष महबूब आलम उर्फ महबूब आलम नदवी को गिरफ्तार कर लिया। यह कार्रवाई 2022 के फुलवारीशरीफ़ आपराधिक साजिश मामले से जुड़ी हुई है।

महबूब आलम, जो बिहार के कटिहार जिले के हसनगंज इलाके के रहने वाले हैं, उनको किशनगंज से पकड़ा गया। वह इस मामले में गिरफ्तार और चार्जशीट किए गए कुल 26 आरोपितों में से 19वें व्यक्ति हैं। यह केस PFI की उन गतिविधियों से जुड़ा है, जिनका मकसद धार्मिक नफरत फैलाकर समाज में डर और आतंक का माहौल बनाना और देश विरोधी साजिशों को अंजाम देना था।

NIA के मुताबिक, यह मामला शांति और सौहार्द बिगाड़ने, लोगों में असंतोष फैलाने और देश के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा देने से जुड़ा है। यह मुकदमा सबसे पहले स्थानीय पुलिस ने 26 संदिग्धों के खिलाफ दर्ज किया था। एजेंसी ने बताया कि आरोपित अवैध और देश विरोधी गतिविधियों में शामिल थे, जिनका लक्ष्य था, धार्मिक उन्माद भड़काना, समाज में अशांति फैलाना और हिंसा को हथियार बनाकर अपने मकसद पूरे करना।

जाँच एजेंसी ने खुलासा किया कि महबूब आलम और दूसरे आरोपित PFI के उस विजन डॉक्यूमेंट पर काम कर रहे थे, जिसे 11 जुलाई 2022 को फुलवारीशरीफ़ स्थित अहमद पैलेस से बरामद किया गया था। इसी दस्तावेज में संगठन की गुप्त योजना का जिक्र था।

NIA ने बताया कि महबूब आलम इस साजिश का हिस्सा था और उसने भर्ती, ट्रेनिंग, बैठकों और अन्य देशविरोधी गतिविधियों में भाग लिया। इतना ही नहीं, उसने फंड भी जुटाया और इसे अपने साथियों और PFI कार्यकर्ताओं तक पहुँचाया। एजेंसी ने कहा कि इस मामले की जाँच BNS और UAPA (गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम) के तहत जारी है।

जाँच में पता चला कि आलम और उसके साथी एक गुप्त विजन डॉक्यूमेंट पर काम कर रहे थे। इसका नाम इंडिया विजन 2047 था।

क्या है इंडिया विजन 2047

बिहार पुलिस ने जुलाई 2022 में आठ पन्नों का एक दस्तावेज जब्त किया था। जिस दस्तावेज का मकसद साफ था, वे 2047 तक भारत में इस्लामी शासन स्थापित करने की योजना बना रहे थे। इसमें कहा गया कि अगर कुल मुस्लिम आबादी का मात्र 10% भी उनका साथ दे दे तो वे बहुसंख्यक समुदाय को दबाकर अपना वर्चस्व कायम कर लेंगे।

डायरेक्ट रोडमैप में भर्ती और प्रशिक्षण पर जोर था। खासकर एक PE विंग बनाकर उन्हें तलवार, डंडे और अन्य हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी जाएगी ताकि आक्रमक व रक्षात्मक दोनों काम कर सकें। साथ ही सरकारी विभागों, कोर्ट, पुलिस और सेना में विश्वासी मुसलमान घुसाने की रणनीति बताई गई थी। दस्तावेज ने विरोधियों को अलग-थलग करने और जरूरत पड़ी तो हटा देने तक की बात कही थी।

PFI का डॉक्यूमेंट

रणनीति में मीडिया-आउटरीच, हर इलाके में PFI की मौजूदगी और संघ या परिवार के नेताओं के खिलाफ जानकारी इकट्ठा करने जैसे कदम भी बताए गए थे। आखिरी हिस्से में कहा गया कि सीधी लड़ाई की स्थिति में विदेशों, खासकर तुर्की जैसे मित्र इस्लामी देशों से मदद ली जाएगी।

इस दस्तावेज में लिखा था कि 2047 तक भारत को इस्लामी राष्ट्र बनाने की योजना है। इस दस्तावेज में पीएम मोदी पर हमले की साजिश का भी जिक्र था। दस्तावेज में साफ लिखा था कि सिर्फ 10% मुस्लिमों की मदद से भी ‘कायर हिंदुओं’ को दबाया जा सकता है।

योजना में विदेशी इस्लामी देशों, खासकर तुर्की से मदद लेकर भारत के खिलाफ हथियारबंद विद्रोह खड़ा करने की बात थी। इसके बाद NIA ने 17 राज्यों में छापेमारी की। इसमें बम बनाने के मैनुअल, ट्रेनिंग मॉड्यूल, विजन 2047 डॉक्यूमेंट और एक सीडी जब्त की गई।

इन सबका मकसद था भारत में दहशत फैलाना और इस्लामी शासन थोपना। इन खुलासों के बाद सितंबर 2022 में केंद्र सरकार ने PFI और उसके सहयोगी संगठनों पर 5 साल का बैन लगा दिया।

सरकार ने साफ कहा कि ये सभी संगठन यूएपीए कानून के तहत अवैध गतिविधियों में शामिल हैं। बैन किए गए संगठनों में ऑल इंडिया इमाम्स काउंसिल, कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया (CFI), रहाब इंडिया फाउंडेशन, NCHRO, नेशनल वीमेन फ्रंट, जूनियर फ्रंट, एम्पावर इंडिया फाउंडेशन और रहाब फाउंडेशन, केरल भी शामिल हैं।

सेलिब्रिटी के लिए अलग नियम नहीं हो सकते: गुजरात HC ने यूसुफ पठान के सरकारी जमीन पर कब्जे को बताया ‘अवैध’, जानें क्या है वडोदरा में TMC सांसद के प्लॉट हड़पने का मामला

गुजरात हाईकोर्ट ने हाल ही में पूर्व क्रिकेटर और टीएमसी सांसद यूसुफ पठान की जमीन विवाद से जुड़ी याचिका खारिज कर दी। जस्टिस मौना भट्ट की सिंगल बेंच ने पठान को सरकारी जमीन पर अतिक्रमणकारी घोषित किया।

दरअसल, वडोदरा नगर निगम ने यूसुफ पठान को सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा करने के आरोप में नोटिस भेजा था। इसके बाद पठान ने नगर निगम के नोटिस और राज्य सरकार के आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

ऑपइंडिया के पास मौजूद आदेश की कॉपी में कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि यूसुफ पठान द्वारा सरकारी जमीन पर कब्जा करना अवैध और जबरदस्ती है और इसे किसी भी हालत में वैध नहीं माना जा सकता।

मामले का इतिहास

यह मामला 2012 से शुरू हुआ। यूसुफ पठान ने अपने बंगले के पास 978 वर्ग मीटर का प्लॉट नंबर 90 को 99 साल की लीज पर लेने के लिए वडोदरा नगर निगम में आवेदन दिया। नगर आयुक्त और निगम की स्थायी समिति ने इसे मंजूरी दी। 8 जून 2012 को निगम की आम सभा ने भी प्रस्ताव मंजूर कर लिया।

चूँकि यह जमीन बिना सार्वजनिक नीलामी के दी जानी थी, इसलिए इसे राज्य सरकार के पास भेजा गया। सरकार ने प्रस्ताव को खारिज कर दिया। इसके बावजूद यूसुफ पठान ने जमीन पर कब्जा कर लिया।

वीएमसी ने तुरंत कार्रवाई नहीं की लेकिन 2024 में विवाद फिर चर्चा में आया और निगम ने पठान को नोटिस भेजकर जमीन खाली करने को कहा। इसके बाद यूसुफ पठान ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

यूसुफ पठान के क्या हैं तर्क?

पठान के वकील ने कहा कि नगर निगम एक स्वतंत्र निकाय है और अधिनियम 1949 के तहत निगम आयुक्त को जमीन पट्टे पर देने का अधिकार है। राज्य सरकार की मंजूरी लेना आवश्यक नहीं है। उन्होंने संविधान के 74वें संशोधन का हवाला देते हुए कहा कि नगर निगम जैसे स्थानीय निकायों में राज्य का हस्तक्षेप उचित नहीं है।

यूसुफ पठान ने यह भी कहा कि वह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर और सांसद हैं, जमीन का मौजूदा बाजार मूल्य चुकाने को तैयार हैं और निगम ने 12 साल तक कोई आपत्ति नहीं जताई, इसलिए उनका कब्जा वैध मानना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि विवादित जमीन उनके बंगले के पास है, इसलिए सुरक्षा का मामला भी है।

सरकार और निगम का तर्क

नगर निगम और सरकार के वकील ने कहा कि किसी को भी सरकारी या निगम की जमीन पर कब्जा करने का अधिकार नहीं है। जमीन बिना नीलामी के दी जानी थी, इसलिए राज्य सरकार की मंजूरी जरूरी थी। पठान ने चारदीवारी बनाकर कब्जा कर लिया जबकि कोई औपचारिक आदेश नहीं था।

सरकार ने यह भी कहा कि पठान ने निगम को एक भी रुपया नहीं दिया और सुरक्षा का कोई सबूत भी नहीं पेश किया। निगम ने अदालत से कहा कि अगर पठान सचमुच जमीन चाहते हैं, तो उन्हें सार्वजनिक नीलामी में हिस्सा लेना चाहिए, जैसा हर नागरिक करता है।

हाई कोर्ट का फैसला

जस्टिस मौना भट्ट ने कहा कि 9 जून 2014 को राज्य सरकार ने जमीन का प्रस्ताव खारिज कर दिया था। इसके बाद यूसुफ पठान का कोई कानूनी अधिकार नहीं बचा। कोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक कब्जा बनाए रखने से किसी को भी जमीन पर अधिकार नहीं मिल जाता।

कोर्ट ने पठान के बाजार मूल्य चुकाने की दलील भी खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि यूसुफ पठान जैसी हस्तियाँ और सांसद समाज के आदर्श होते हैं और उनसे आम नागरिकों से अधिक कानून का पालन करने की उम्मीद होती है। कानून तोड़ने के बाद भी विशेष सुविधाएँ मिलें, तो समाज को गलत संदेश जाएगा।

अदालत ने यह भी कहा कि निगम की लापरवाही यूसुफ पठान को लाभ नहीं पहुँचा सकती। अंतिम आदेश में याचिका खारिज कर दी गई और कहा गया कि जमीन पर अवैध कब्जा तुरंत हटाना चाहिए। नगर निगम को आदेश दिया गया कि कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई की जाए। यूसुफ पठान का कब्जा अवैध था और इसे कोई भी विशेष दलील वैध नहीं बना सकती। कोर्ट ने साफ कहा कि प्रसिद्धि या पद से कानून पर अलग नियम नहीं हो सकते हैं।

UP में किसानों की डिजिटल क्रांति, योगी सरकार सोशल मीडिया से सीधे अन्नदाताओं तक पहुँचाएगी खेती से जुड़ी जानकारी: ‘रूफ टॉप गार्डनिंग योजना’ को भी मिली मंजूरी

उत्तर प्रदेश सरकार अब राजस्थान की तरह इंटरनेट मीडिया का उपयोग कर किसानों को तकनीकी जानकारी, मौसम की जानकारी, कृषि सलाह और बाजार की स्थिति जैसे जरूरी अपडेट देने की तैयारी में है।

राजस्थान में वाट्सऐप, यूट्यूब, इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म का उपयोग करके कृषि से जुड़ी जानकारी सीधे किसानों तक पहुँचाई जा रही है। वहाँ किसानों के वाट्सएप ग्रुप बनाए गए हैं जिनमें स्थानीय अधिकारी और कृषि विशेषज्ञ भी जुड़े होते हैं। इससे किसानों की समस्याओं का तुरंत समाधान किया जा रहा है।

वहीं, यूट्यूब चैनल के जरिए किसानों को नई तकनीकें और उपकरणों का लाइव प्रदर्शन दिखाकर जानकारी दी जाती है, जिससे वे आधुनिक खेती के तरीकों को आसानी से सीख सकें।

फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर किसानों को उपभोक्ताओं से सीधे जोड़ने की कोशिश हो रही है। इससे बिचौलियों की भूमिका खत्म होती है और किसानों को अपनी उपज का सीधा और ज्यादा मुनाफा मिलता है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस मॉडल की जानकारी देने के लिए हाल ही में राजस्थान के कृषि अधिकारी उत्तर प्रदेश आए थे और उन्होंने कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही को अपनी योजना की प्रस्तुति दी। मंत्री ने इस मॉडल को प्रदेश में लागू करने के निर्देश दिए हैं।

अब यूपी कृषि विभाग राजस्थान के मॉडल का अध्ययन कर उसकी तर्ज पर योजना बना रहा है और जल्द ही इसके लिए एक टीम राजस्थान भेजने की तैयारी कर रहा है।

‘रूफ टॉप गार्डनिंग योजना’ को भी मिली मंजूरी

दूसरी ओर उत्तर प्रदेश सरकार अब शहरी इलाको में भी खेती को बढ़ावा देने के लिए काम कर रही है। उद्यान राज्य मंत्री दिनेश प्रताप सिंह ने हाल ही में एक बैठक में ‘रूफ टॉप गार्डनिंग योजना’ (छत पर बागवानी) की घोषणा की है। इस योजना के तहत लोग अपने घर की छतों पर सब्जियाँ, फल, मसाले और औषधीय पौधे उगा सकेंगे।

इससे शहरी इलाकों में हरियाली बढ़ेगी, पर्यावरण को फायदा होगा और लोगों को जैविक फल-सब्जियाँ घर पर ही मिलेंगी। यह तरीका खासतौर पर सीमित जगह वाले घरों के लिए बहुत फायदेमंद है। इस योजना को पहले लखनऊ, वाराणसी और गोरखपुर जैसे शहरों में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू किया जाएगा।

इसके लिए आईआईवीआर वाराणसी से तकनीकी मदद ली जा रही है और योजना को भारत सरकार से अनुमोदन दिलाने की तैयारी चल रही है। लोगों को फ्री किट और प्रशिक्षण भी दिए जाएँगे ताकि वे आसानी से इस योजना से जुड़ सकें। बैठक में अपर मुख्य सचिव बीएल मीणा और उद्यान निदेशक डॉ बीपी राम सहित कई वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए।

झूठी कहानी, उत्पीड़न का रोना और विक्टिम कार्ड: कनाडा में शरणार्थी बनने के लिए खालिस्तानी लगातार कर रहे प्रयास, प्रदीप सिंह के आवेदन को ओंटारियो कोर्ट ने नकारा

कनाडा के टोरंटो (ओंटारियो) स्थित फेडरल कोर्ट ने शनिवार (6 सितंबर 2025) को भारतीय नागरिक प्रदीप सिंह का शरण का दावा खारिज कर दिया। दरअसल, प्रदीप सिंह नवंबर 2024 में वर्क परमिट खत्म होने के बाद कनाडा में रुकने के लिए शरण दिए जाने का दावा कर रहा था।

कोर्ट के दस्तावेजों के अंश साझा करने वाले पत्रकार OnTheNewsBeat के अनुसार, प्रदीप सिंह फरवरी 2023 में ‘स्पाउस वर्क परमिट’ पर कनाडा पहुँचा था।

वर्क परमिट खत्म होने के बाद प्रदीप ने एक्सटेंशन के लिए आवेदन करने के बजाय शरण का दावा किया। लेकिन उसका आवेदन ‘इमीग्रेशन एंड रिफ्यूजी प्रोटेक्शन एक्ट’ के तहत खारिज कर दिया गया था।

गौरतलब है कि 2014 से 2019 के बीच वह ऑस्ट्रेलिया में भी शरण लेने की कोशिश कर चुका था। सिंह ने इस बार भी वही चाल चलने की कोशिश की और खालिस्तान कार्ड खेलते हुए दावा किया कि भारत लौटने पर उसे उत्पीड़न का सामना करना पड़ेगा।

16 नवंबर 2024 को दाखिल किया गया शरण का यह दावा पहले की कोशिशों के आधार पर तुरंत खारिज कर दिया गया। फरवरी 2025 में प्रदीप सिंह को Pre-Removal Risk Assessment (PRRA) के लिए आवेदन करने की सूचना दी गई।

यह प्रक्रिया कनाडा में निर्वासन का सामना कर रहे लोगों को आखिरी अवसर देती है कि वे नए सबूत पेश करें और साबित करें कि अपने देश लौटने पर उन्हें जान का खतरा, यातना या अमानवीय व्यवहार झेलना पड़ेगा।

प्रदीप सिंह ने PRRA का विकल्प अपनाया लेकिन 15 अगस्त 2025 को उनका आवेदन भी खारिज हो गया। 25 अगस्त को कनाडा बॉर्डर सर्विस एजेंसी (CBSA) ने उसे सूचना दी कि 8 सितंबर 2025 को निर्वासित कर दिया जाएगा।

प्रदीप सिंह ने अदालत में Application for Leave and Judicial Review (ALJR) दाखिल कर निर्वासन टालने की कोशिश की लेकिन 2 सितंबर 2025 को यह भी खारिज कर दिया गया।

कोर्ट ने नोट किया कि प्रदीप सिंह ने अपने पक्ष में हलफनामे और दस्तावेज जमा किए थे। यहाँ तक कि उनके माता-पिता ने भी संयुक्त हलफनामा दिया। लेकिन अधिकारियों ने पाया कि इसमें किसी भी ठोस घटना, कथित धमकियों या गिरफ्तारी की परिस्थितियों का ब्योरा नहीं था।

इसके बजाय, कनाडाई अधिकारियों ने सोशल मीडिया से जुटाए सबूत पेश किए, जिनसे पता चला कि सिंह भारत में किसान आंदोलन से जुड़ा था और कनाडा में लगातार खालिस्तान समर्थक गतिविधियों में शामिल था। यही कारण रहा कि अदालत ने उसके हलफनामों को महत्व न देकर ऑनलाइन गतिविधियों और सार्वजनिक संबंधों को निर्णायक माना।

पुराना है कथित शरणार्थियों का यह पैटर्न

प्रदीप सिंह के दावे को खारिज किए जाने से एक पुराना और परिचित तरीका फिर सामने आया है। बहुत से पंजाबी युवक, जो स्किल्ड कैटेगरी में कानूनी रूप से विदेश नहीं जा पाते, वे शरण (asylum) का रास्ता चुनते हैं। इसके लिए वे अक्सर तथाकथित खालिस्तान कार्ड का इस्तेमाल करते हैं।

इस रणनीति के दो रूप होते हैं। कुछ लोग खुद को बाहर से खालिस्तान समर्थक दिखाते हैं ताकि यह साबित कर सकें कि भारत में उन्हें धार्मिक और राजनीतिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। वहीं, कुछ वास्तव में खालिस्तानी विचारधारा के समर्थक होते हैं और उसी आधार पर शरण पाने की कोशिश करते हैं।

इसका तर्क सीधा है वे खुद को खालिस्तान आंदोलन से जुड़े उत्पीड़न का शिकार बताते हैं और पश्चिमी देशों से सहानुभूति की उम्मीद करते हैं, क्योंकि ये देश अक्सर खुद को अल्पसंख्यकों का रक्षक बताते हैं।

कई बार ये दावे सफल भी हो जाते हैं, जैसे कि मारे गए खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर के मामले में हुआ। लेकिन सिंह का केस यह दिखाता है कि हर कोशिश कामयाब नहीं होती। अगर कोई बार-बार अलग-अलग देशों में दावा करे, सबूत न दे पाए या सोशल मीडिया पर उसकी गतिविधियाँ उसके असली इरादों को उजागर कर दें और यह लगे कि वह सिर्फ मौके का फायदा उठाना चाहता है, तो उसकी पूरी कहानी तुरंत कमजोर पड़ जाती है।

‘खालिस्तान कार्ड’ और उसके समर्थक

शरण लेने की प्रक्रिया का दुरुपयोग करना कोई नई बात नहीं है। पंजाब में तो यह एक तरह की इंडस्ट्री बन चुकी है। यहाँ के एजेंट युवाओं को सिखाते हैं कि किस तरह उत्पीड़न की झूठी कहानी तैयार करनी है, कौन-से शब्द इस्तेमाल करने हैं, विदेशों में किन संगठनों से संपर्क करना है, और कैसे हलफनामे (affidavits) जुटाने हैं।

इसके बाद कनाडा, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसे देशों में वकील इन्हें शरण याचिका (asylum petition) में बदल देते हैं और इसके लिए मोटी रकम वसूलते हैं।

यह समस्या दो तरफा है। एक तरफ तो झूठे दावों के जरिए विदेशी धरती पर टिकने का रास्ता बनाया जाता है और दूसरी तरफ खालिस्तान आंदोलन के असली समर्थक जिनमें से ज्यादातर या तो घोषित आतंकवादी हैं या आतंक के हमदर्द भारत की कानून व्यवस्था से बचकर कनाडा जैसे देशों में पनाह पा जाते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि अपराधियों को सौंपने (extradition) की संधि होने के बावजूद कनाडा ने भारत की बार-बार की गई माँगों को खालिस्तान समर्थकों के मामले में नजरअंदाज़ किया है।

सोशल मीडिया पर कनाडा, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले कई युवा खुलेआम खालिस्तानी आतंकियों की प्रशंसा करते हैं, अलगाववादी प्रोपेगेंडा चलाते हैं और सिख्स फॉर जस्टिस (SFJ) जैसे संगठनों की विचारधारा को बढ़ावा देते हैं, जिसे भारत में आतंकी संगठन घोषित किया गया है। इसके बावजूद, इन देशों की सरकारें अक्सर इन्हें सुरक्षा देती हैं, जबकि यह उनके लिए भी खतरे का कारण बन सकता है।

शरण की व्यवस्था और उसका दुरुपयोग

सिद्धांत के तौर पर देखें तो शरण देने का उद्देश्य उन लोगों की रक्षा करना है जिन्हें अपने देश में सचमुच उत्पीड़न, हिंसा, यातना या मौत का खतरा हो। यह अंतरराष्ट्रीय कानून पर आधारित एक मानवीय व्यवस्था है। लेकिन जब इस सिस्टम का बार-बार दुरुपयोग किया जाता है, तो यह कमजोर पड़ने लगता है।

झूठे दावों के कारण असली पीड़ितों को सुरक्षा मिलने में देरी होती है। साथ ही, जब शरण लेने की कहानी उग्रवादी विचारधारा पर आधारित हो, तो यह मेजबान देश के लिए भी सुरक्षा का बड़ा खतरा बन जाता है। कनाडा इसका ताजा उदाहरण है।

खालिस्तानी आंदोलन को समर्थन देकर उसने न सिर्फ अपनी सुरक्षा को जोखिम में डाला है, बल्कि भारत जैसे दोस्ताना देश के साथ अपने कूटनीतिक रिश्ते भी खराब कर लिए हैं। इस तरह के फैसलों का असर सिर्फ घरेलू स्तर पर ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी गंभीर परिणाम लेकर आता है।

कनाडा में पंजाबी युवाओं के शरण लेने के दावे

कनाडा को सालों से बड़ी संख्या में पंजाबी युवाओं के शरण से जुड़े दावों का सामना करना पड़ा है। ये दावे अक्सर इस आधार पर किए जाते हैं कि उन्हें खालिस्तान समर्थक होने के शक में भारत में उत्पीड़न झेलना पड़ सकता है। कई मामलों में ये दावे सफल भी हो जाते हैं।

पूर्व संगरूर सांसद सिमरनजीत सिंह मान ने तो यहाँ तक दावा किया था कि उन्होंने हजारों लोगों को आश्रय के लिए समर्थन पत्र जारी किए। कहा जाता है कि इनमें से कई पत्र पैसे लेकर दिए गए थे। इन पत्रों में आवेदकों को सरकारी दमन का संभावित शिकार दिखाया जाता था, ताकि उनका दावा मजबूत लगे और कागजी सबूत भी तैयार हो जाएँ।

प्रदीप सिंह का मामला एक चेतावनी

प्रदीप सिंह का मामला कोई अनोखा नहीं है, बल्कि वही पुराना पैटर्न दोहराता है, अस्थायी वीजा पर आना, वीजा की अवधि खत्म होने के बाद शरण का दावा करना, खालिस्तान कार्ड का इस्तेमाल करना और अंत में दावे का खारिज होना।

हालाँकि, इसका मतलब यह नहीं कि फेडरल कोर्ट हमेशा इन दावों को पूरी तरह नकार देती है। कई बार तकनीकी वजहों से कुछ मामले बच भी जाते हैं। हाल ही में टोरंटो फ़ेडरल कोर्ट ने कई केसों में अलग-अलग फैसले दिए हैं, जैसे गुरचरण सिंह के मामले को मौखिक गवाही में खामियों के चलते दोबारा सुनवाई के लिए भेजा गया, इकबाल सिंह ढिल्लोंवाल का केस CBSA की अहम रिपोर्ट नजरअंदाज होने के कारण वापस भेजा गया, जबकि अमनदीप सिंह और कंवलदीप कौर के खालिस्तान-आधारित दावे को झूठा मानते हुए खारिज कर दिया गया।

इन उदाहरणों से साफ है कि खालिस्तान से जुड़े दावों की कहानी अब भी जिंदा है और हर मामले में नतीजा अलग-अलग निकल सकता है। पर्दीप सिंह के मामले में कनाडाई अधिकारियों ने यह भी बताया कि उसने पहले ऑस्ट्रेलिया में भी आश्रय का दावा किया था, जिससे यह साफ हो गया कि उसकी कोशिश कोई एक बार की नहीं थी, बल्कि एक पैटर्न का हिस्सा थी। अब उसके हिस्से में डिपोर्टेशन आया है, लेकिन खालिस्तानी समर्थक उसके मामले को बहाना बनाकर नीतियों में बदलाव के लिए दबाव बनाने की कोशिश जरूर करेंगे।

निष्कर्ष

पर्दीप सिंह का असफल आश्रय दावा केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। पिछले दो महीनों में ही इसी तरह के तीन मामलेन सामने आए हैं, जो दिखाते हैं कि आज की प्रवासन (migration) राजनीति में  खालिस्तान कार्ड  एक रणनीति भी बन गया है और एक बोझ भी। कई लोग अलग-अलग देशों में बार-बार शरण का दावा करते हैं, अलगाववादी कहानियों का सहारा लेते हैं और खुद को उत्पीड़ित दिखाने की कोशिश करते हैं। यह अब एक जाना-पहचाना पैटर्न बन चुका है।

दिक्कत यह है कि जब ऐसे लोग सिस्टम से खिलवाड़ करते हैं, तो असली पीड़ित, जिन्हें सचमुच जान का खतरा है और जिन्हें सुरक्षा की जरूरत है, उनकी आवाज दब जाती है और उनका हक पीछे छूट जाता है।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है जिसे विस्तार से पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)