बिहार में चुनावी बिगुल बज चुका है, दोनों प्रमुख गठबंधन अपनी-अपनी तैयारी में जुटे हैं और पूर्व चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर अपनी नए नवेले दल ‘जन सुराज’ के सहारे तीसरा मोर्चा बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इस चुनाव में खुद को दोनों प्रमुख गठबंधनों से अलग दिखाने के नाम पर प्रशांत किशोर ने आक्रामकता का सहारा लिया है।
प्रशांत गुस्से में हर किसी को चुनौती दे रहे हैं। चुनाव लड़ने और चुनावी तैयारियों को लेकर भी आक्रामक हैं। उन्होंने तो यहाँ तक एलान कर दिया था कि वो बिहार में सबसे पहले अपने उम्मीदवारों का एलान कर देंगे। चुनावों की तारीखों का एलान हो गया है लेकिन अब तक प्रशांत के उम्मीदवारों का कहीं अता-पता नहीं है। अलबत्ता उम्मीदवारी को लेकर जन सुराज के नेता-कार्यकर्ता अभी से आपस में भिड़ने लगे हैं।
जन सुराज: लोकतंत्र नहीं भीड़तंत्र
जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने जब राजनीतिक दल बनाने का एलान किया था तो उन्होंने दल के भीतर सबसे अधिक लोकतंत्र बनाने जैसे दावे किए थे। इसके अलावा अलग-अलग मंचों पर भी वह ऐसे दावे करते रहे हैं। यहाँ तक कि उम्मीदवारों के चयन में पूरी पारदर्शिता बरतने का भी उन्होंने दावा किया था।
प्रशांत किशोर ने अपने दल को लोकतांत्रिक दिखाने के लिए तय किया कि वह उम्मीदवारों का चयन भी लोगों की मर्जी से ही करेंगे। तय हुआ कि वह इसके लिए लोगों की राय लेंगे। इसके लिए उनके दल द्वारा ‘प्रत्याशी सुझाव प्रपत्र’ छपवाए गए हैं, इन पर उस विधानसभा क्षेत्र के कई संभावित उम्मीदवारों के नाम होते हैं। लोगों को इसमें से अपनी राय रखते हुए अपने द्वारा समर्थित जन सुराज के उम्मीदवार के नाम पर मुहर लगानी होती है।
जन सुराज द्वारा दिए जा रहे प्रत्याशी सुझाव प्रपत्र
यूँ तो इन पर्चे से जन सुराज अपनी पार्टी का लोकतंत्र दिखाना चाहती थी लेकिन इन्हीं की वजह से पार्टी के भीतर मौजूद भीड़ तंत्र का चेहरा सामने आ गया। बिहार में कई जगहों पर इन पर्चों को लेकर संभावित प्रत्याशियों के समर्थक ही आपस में भिड़ गए। कहीं, एक ही संभावित प्रत्याशी के समर्थकों को ज्यादा पर्चे दिए जाने की बात पर हंगामा हुआ तो कहीं अपने लोग बंद कमरे में अपने चहेते प्रत्याशी के नाम पर दनादन पर्चे भरते दिखे।
मुजफ्फरपुर के औराई विधानसभा का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है जिसमें एक कमरे में बैठे 3-4 लोग अपने पसंदीदा प्रत्याशी के नाम के दर्जनों-सैकड़ों फॉर्म भरते नजर आ रहे हैं। इस वीडियो में फॉर्म भर रहे ये लोग खुद इस बात को मान भी रहे हैं कि किसके समर्थन में वो पर्चे भर रहे हैं। यह वीडियो सामने आने के बाद दावा किया जा रहा है कि प्रशांत किशोर की पार्टी के ये प्रपत्र लोगों तक पहुँच ही नहीं रहे हैं। संभावित प्रत्याशी खुद ही अपने नाम पर मुहर लगवा रहे हैं।
इसमें जब वीडियो बना रहे लोगों ने मुहर लगा रहे लोगों से पूछा कि आप खुद ही क्यों छाप रहे हैं तो इस पर उन्होंने कहा कि जनता को पता ही नहीं है इसलिए हम खुद ही यह कर रहे हैं। ये लोग करीब 300 पर्चों पर मुहर लगा रहे थे।
अध्यक्ष जी,आपका प्रत्याशी खुद अपना वोट अपने कार्यकर्ताओं से डलवा कर खुद प्रत्याशी बन रहे हैं। जनता को मौका ही नहीं दिया जा रहा है प्रत्याशी चुनने का। यह वीडियो मुजफ्फरपुर के औराई विधानसभा का है। @ManojBhartiJSPhttps://t.co/TNLkQfPuZJpic.twitter.com/yL6RsQd01l
यह कोई अकेली-इकलौती घटना नहीं है, ऐसा कई जगहों पर हुआ है और यह आम होता जा रहा है। दरभंगामें भी ऐसा ही मामला देखने को मिला। वहाँ भी प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया के दौरान जमकर बवाल हुआ है। बैलेट पर हस्ताक्षर को लेकर शुरू हुआ विवाद मारपीट में बदल गया और कार्यकर्ता एक-दूसरे पर कुर्सियाँ फेंकने लगे। इस घटना में कई लोग घायल भी हो गए हैं।
बेनीपुर में हंगामा कर रहे लोगों ने यह दावा किया कि उनको पर्चे नहीं दिए गए हैं। लोगों ने धांधली का आरोप भी लगाया है। एक शख्स ने दावा किया कि एक व्यक्ति के समर्थकों को बंडल के बंडल दिए गए हैं। खूब गाली गलौज तक की गई है। एक अन्य शख्स के दावा कि कुछ-कुछ लोगों को 6-6 पर्चे दिए जा रहे हैं जबकि कुछ लोगों को एक भी नहीं मिल रहा है।
बिस्फी में भी जन सुराज के कार्यकर्ता सम्मेलन में वोटिंग को लेकर जमकर हंगामा हुआ है। बिस्फी में नागेंद्र यादव, मोहम्मद कलीन और वशिष्ठ नारायण को पार्टी की तरफ से संभावित प्रत्याशी बनाया गया है। तीनों के नाम के पर्चे जनता को दिए गए लेकिन वे आपस में ही भिड़ गए। संभावित प्रत्याशियों ने एक-दूसरे पर गुंडे तक बुलाने का आरोप लगा दिया है। दावा किया गया है कि यहाँ वशिष्ठ नारायण को पहले ही इस वोटिंग को लेकर बता दिया गया था लेकिन अन्य संभावित प्रत्याशियों को इसकी जानकारी नहीं दी गई थी।
वशिष्ठ नारायण झा का कहना है कि वो वोटिंग के समर्थन में थे और वो ताल ठोककर तैयार हैं। उन्होंने कहा कि अगर कोई गुंडागर्दी करेगा तो उसे गुंडे की तरह पीसकर छोड़ दिया जाएगा। अन्य संभावित उम्मीदवारों ने नाराजगी जताई है।
अब यह आपसी फूट ही जन सुराज की हकीकत बन गया है। यानी बड़े-बड़े दावे करने वाले प्रशांत किशोर अपनी पार्टी के भीतर ही लोकतंत्र नहीं बना पा रहे हैं।
क्यों टिकट बँटवारे में हुई देरी
प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने बिहार में अपनी बड़ी उपस्थिति और ‘नई राजनीति’ का दावा तो बहुत पहले कर दिया था लेकिन जब बात टिकट बाँटने की बारी आई तो पार्टी के अंदर ही कई परतें खुलने लगीं।
हालाँकि, प्रशांत किशोर ने महीनों पहले ऐलान किया था कि जन सुराज अपने दम पर चुनाव लड़ेगी, सबसे पहले टिकटों की घोषणा होगी मगर अब तक टिकटों की घोषणा नहीं हो पाई है। इसके पीछे कई वजहें हैं।
इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि जन सुराज को खुद भी एहसास है कि फिलहाल उसका जनाधार वोट कटवा से ज्यादा नहीं है। पार्टी के भीतर भी कई कार्यकर्ता इस बात को समझते हैं कि अगर टिकट बाँटे गए और चुनाव लड़ा गया, तो अधिकतर सीटों पर मुकाबला तीसरे या चौथे स्थान से आगे नहीं बढ़ पाएगा। ऐसे में प्रशांत किशोर अभी भी अन्य दलों के जनाधार वाले बागियों की आस में बैठे हैं।
दूसरी वजह है जन सुराज के संगठन को चलाने वाले स्थानीय लोग। जन सुराज का पूरा संगठन उन्हीं लोगों के हाथ में है जो शुरू से इस अभियान से जुड़े रहे हैं। इन कार्यकर्ताओं ने गाँव-गाँव में सर्वे किए, बैठकें कीं और पार्टी की नींव डाली। यही लोग जमीन पर पैसा भी खर्च करते हैं।
अब जब टिकट वितरण की घड़ी आई है, तो वही पुराने कार्यकर्ता खुद दावेदार बन बैठे हैं। ऐसे में अगर किसी को टिकट नहीं मिला या पक्षपात दिखा, तो बगावत तय है। ऐसे में प्रशांत किशोर इस बगावत से अपनी पार्टी को बचाने के लिए सही वक्त का इंतजार कर रहे हैं। खुद को अलग दिखाने का दावा करने वाले प्रशांत के सामने अभी पूरी तैयार भी ना हो सके संगठन को संभालने की जिम्मेदारी है।
बिहार में विधानसभा चुनाव इस बार दो चरणों में हो रहे है। पहला चरण 6 नवंबर 2025 को इसके 5 दिनों बाद 11 नवंबर को दूसरे चरण के लिए वोट डाले जाएँगे। एक वक्त था जब 5-7 चरणों में भी मतदान होते थे। बिहार की चुनावी हिंसा सुर्खियाँ बटोरती थी। लेकिन अब शांतिपूर्वक चुनाव संपन्न हो रहे हैं। ये भी राज्य की कानून व्यवस्था में सुधार की गवाही देता है। इस बार बिहार चुनाव और भी खास है, क्योंकि 22 साल बाद हुए एसआईआर के माध्यम से वोटर लिस्ट अपडेट किया गया है।
लालू राज में निकलते थे बैलेट बॉक्स से ‘जिन्न’
लालू राज में चुनाव के दौरान बैलेट बॉक्स खुलते ही जिन्न निकलता था। यानी वोट से पहले के माहौल कुछ और बयां करते थे और जीत का सेहरा किसी और के सिर सजता था। बूथ लूट तो आम बात थी। हत्या, अपहरण की खबरों से पेपर पटे रहते थे। ये वह दौर था, जब चुनाव लोकतंत्र का उत्सव नहीं बल्कि डर और दहशत बन चुका था।। खुलेआम वोटरों को डराया धमकाया जाता था। मतदाताओं के वोट पहले ही पड़ चुके होते थे, उन्हें वापस भेज दिया जाता था।
90 का दशक तो खास तौर पर बूथ कैप्टरिंग के लिए कुख्यात रहा। 2004 तक चुनाव में हिंसा, हत्या, लूट, अपहरण, डराना-धमकाना आम था। अपराधियों की दबंगई से लोगों में निराशा और हताशा घर कर गई थी। अपराधियों को खुलेआम राजनीतिक संरक्षण मिल रहे थे। चुनाव का प्रभावित करने और मतदान अपने पक्ष में कराने के लिए इनका खूब इस्तेमाल किया जाता था। दरअसल दबंगों को कानून का कोई खौफ नहीं था। खुलेआम हत्याएँ होती थी। बारा नरसंहार, शंकर बिगहा नरसंहार जैसे कई सामूहिक नरसंहारों ने राज्य को हिला कर रख दिया था।
दबंगों के डर से वोट डालने के लिए विवश हुई जनता
ऐसे में आम आदमी दबंगों के डर से वहीं वोट डालते थे, जिसकी तरफ इनका इशारा होता था। मतदाताओं के लिए यह दशक हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा। उम्मीदवारों के लिए भी यह कम चुनौतीपूर्ण नहीं था। ऐसे में मतदान निष्पक्ष हो पाएगा कि नहीं, इसकी आशंका हमेशा बनी रहती थी। चुनाव में चाहे कोई उम्मीदवार जीते, लेकिन मतदाता हमेशा हारता था। चुनावी गड़बड़ियों पर पार पाने के लिए चुनाव आयोग कई चरणों में यहाँ चुनाव कराता था, लेकिन हिंसा और हत्या पर काबू पाना काफी मुश्किल रहा।
‘जंगल राज’ में सैकड़ों जानें चुनावी हिंसा में गई
1990 के चुनाव में 520 हिंसा की घटनाएँ हुई, जबकि 87 लोगों की जान गई। बिहार में लालू राज की शुरुआत हुई। साल 1995 में 1270 हिंसा की घटनाएं घटी और 54 लोगों की मौत हुई। 2000 के चुनाव में 61 लोग मारे गए। कुल मिलाकर 1990 से 2004 के बीच बिहार में 9 चुनाव हुए। इनमें करीब 641 लोगों की जान गई।
सबसे ज्यादा रक्तपात तो 2001 के पंचायत चुनाव में हुआ। राज्य में 23 साल के बाद पंचायत चुनाव हो रहा था। इसलिए पार्टियों ने पूरा जोर लगाया। नतीजा रहा 196 लोगों की मौत। 2004 के लोकसभा चुनाव में भी 28 लोगों की मौत हुई। बिहार में 1990 में एक चरण में चुनाव हुए थे। इसके बाद 1985 में 2 चरणों में वोटिंग हुई। 2000 और 2005 में तीन चरणों में चुनाव हुए जबकि 1995, 2005 में 5 चरणों में चुनाव हुए।
देश में पहली बार बूथ कैप्चरिंग बिहार में हुआ
देश में पहली बार बूथ कैप्चरिंग की खास घटना 1957 में बिहार के बेगूसराय के रचियाही में हुआ था। घटना की जानकारी दूसरे दिन लोगों को अखबार से पता चला। 1957 की इस घटना ने बिहार में राजनीति की दिशा ही बदल दी। राज्य के चुनाव पर माफिया हावी होने लगे। राजनीतिज्ञों और माफियाओं के साँठगाँठ की शुरुआत भी हो गई। 1980 तक आते-आते चुनाव में बाहुबलियों का बोलबाला देखा जाने लगा। हालाँकि देश में चुनाव सुधारों की चर्चा भी होने लगी। 1957 की घटना के बाद चुनाव आयोग ने सुरक्षाबलों की तैनाती पर जोर देना शुरू किया। धीरे-धीरे केंद्रीय बलों की मौजूदगी जरूरी हो गई।
‘बूथ लूट’ पर शेषन-राव की जोड़ी ने लगाया लगाम
बिहार में चुनावी हिंसा और बूथ लूट की घटनाओं पर लगाम लगाने का श्रेय जाता है मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन और के जे राव को। केजे राव बिहार विधानसभा चुनाव के विशेष पर्यवेक्षक बनाए गए थे। 2005 में दोनों की सख्ती से बिहार के चुनाव हिंसा पर काफी हद तक लगाम लगा। हालाँकि इसके बाद 2010 में 5 लोगों की चुनावी हिंसा में मौत हुई।
बैलेट पेपर की जगह 2006 में ईवीएम ने ले ली। इसके साथ ही बूथ कैप्चरिंग और बैलेट पेपर लूटने जैसी घटनाओं पर विराम लगा। EVM से वोट कराने के तरीके में भी काफी बदलाव आया है। वोटरों की विश्वसनीयता को कायम रखने के लिए EVM के साथ VVPAT को जोड़ा गया। पोलिंग स्टेशन के आसपास सीसीटीवी कैमरे लगाए गए। फ्लाइंग स्क्वॉड जैसे तकनीकी उपायों का प्रयोग शुरू हो गया।
बिहार विधानसभा चुनाव में तो उम्मीदवारों की रंगीन फोटो और बड़े अक्षरों में नाम दिखेगी, ताकि वोटरों को पहचाने में कोई दिक्कत न हो। हर पोलिंग स्टेशन की 100 फीसदी वेबकास्टिंग की जाएगी ताकि आँकड़ों में कोई गड़बड़ी न हो और तेजी से जुटाया जा सके। यहाँ तक कि पोस्टल बैलेट को गिनती पूरी होने से 2 राउंड पहले गिन लिया जाए, ताकि नतीजों पर किसी तरह की दुविधा न रहे। हर बूथ पर 1200 से कम वोटर होंगे। सीसीटीवी कैमरे और सुरक्षा बल तो रहेंगे ही।
चुनाव प्रक्रिया में लगातार हो रहे बदलाव के बावजूद विपक्ष चुनाव आयोग को कटघरे में खड़े कर रहा है। सरकार पर ‘वोट चोरी’ का इल्जाम लगाया जा रहा है। जबकि 2004 से पहले बिहार में ‘वोट चोरी’ नहीं बल्कि ‘वोट लूट’ होती थी। इसके प्रमाण सोशल मीडिया में तैर रहे हैं।
पीएम मोदी ने 2001 के शपथग्रहण की तस्वीर पोस्ट करते हुए जनसेवा के 25वें साल में प्रवेश करने पर जनता का आभार जताया है। उन्होंने एक्स पर लिखा, “2001 में आज ही के दिन, मैंने पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी। देशवासियों के निरंतर आशीर्वाद से, मैं सरकार के मुखिया के रूप में अपनी सेवा के 25वें वर्ष में प्रवेश कर रहा हूँ।”
On this day in 2001, I took oath as Gujarat’s Chief Minister for the first time. Thanks to the continuous blessings of my fellow Indians, I am entering my 25th year of serving as the head of a Government. My gratitude to the people of India. Through all these years, it has been… pic.twitter.com/21qoOAEC3E
2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री बनने के दिनों को याद करते हुए उन्होने ट्वीट किया, “मेरी पार्टी ने मुझे बेहद चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में गुजरात के मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी सौंपी थी। उसी साल राज्य एक भीषण भूकंप से जूझ रहा था। पिछले वर्षों में एक महाचक्रवात, लगातार सूखे और राजनीतिक अस्थिरता देखी गई थी। इन चुनौतियों ने लोगों की सेवा करने और नए जोश और आशा के साथ गुजरात के पुनर्निर्माण के संकल्प को और मज़बूत किया।”
पीएम मोदी ने कहा, “जब मैंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तो मुझे याद है कि मेरी माँ ने मुझसे कहा था – मुझे तुम्हारे काम की ज़्यादा समझ नहीं है, लेकिन मैं बस दो चीज़ें चाहती हूँ। पहला, तुम हमेशा गरीबों के लिए काम करोगे और दूसरा, तुम कभी रिश्वत नहीं लोगे। मैंने लोगों से यह भी कहा था कि मैं जो भी करूँगा, वो नेक इरादे से करूँगा और कतार में खड़े आखिरी व्यक्ति की सेवा करने के विजन से प्रेरित रहूँगा।”
सूखाग्रस्त गुजरात बना कृषि में अग्रणी राज्य
25 साल तक मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के रूप में अपने अनुभवों को साझा करते हुए पीएम मोदी ने कहा है कि हमने मिलकर उल्लेखनीय प्रगति की है। सीएम पद की शपथ वाले दिन को भी उन्होंने याद किया और कहा कि उन्हें आज भी याद है कि जब वे मुख्यमंत्री बने थे, तब ऐसा माना जाता था कि गुजरात अब कभी आगे नहीं बढ़ पाएगा। किसानों समेत आम नागरिक बिजली और पानी की कमी की शिकायत करते थे। कृषि मंदी की चपेट में थी और औद्योगिक विकास ठप था। लेकिन सभी ने मिलकर गुजरात को सुशासन का केंद्र बनाने के लिए काम किया और सफल हुए।
उन्होंने कहा, “सूखाग्रस्त गुजरात, कृषि क्षेत्र में अग्रणी राज्य बन गया। व्यापार की संस्कृति का विस्तार मज़बूत औद्योगिक और विनिर्माण क्षमताओं में हुआ। नियमित कर्फ्यू अब अतीत की बात हो गई। सामाजिक और भौतिक बुनियादी ढाँचे को बढ़ावा मिला। इन परिणामों को प्राप्त करने के लिए लोगों के साथ मिलकर काम करना बेहद संतोषजनक रहा।”
2014 के दिनों को पीएम ने किया याद
गुजरात से निकल कर 2013 में पहली बार जब बीजेपी ने 2014 लोकसभा चुनाव के लिए प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया। उन दिनों को याद करते हुए पीएम मोदी ने कहा, “देश विश्वास और शासन के संकट से जूझ रहा था। तत्कालीन यूपीए सरकार भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और नीतिगत पंगुता के सबसे बुरे रूप का पर्याय बन चुकी थी। भारत को वैश्विक व्यवस्था में एक कमज़ोर कड़ी के रूप में देखा जा रहा था। लेकिन, भारत की जनता की सूझबूझ ने हमारे गठबंधन को प्रचंड बहुमत दिलाया और यह भी सुनिश्चित किया कि हमारी पार्टी को तीन दशकों के बाद पहली बार पूर्ण बहुमत मिले।”
देश की बागडोर संभालने के 11 साल को लेकर पीएम मोदी ने कहा कि हमने इन वर्षों में कई बदलाव किए और देश को सशक्त बनाया। उन्होंने कहा, “पिछले 11 वर्षों में, हम भारत के लोगों ने मिलकर काम किया है और कई बदलाव हासिल किए हैं। हमारे अभूतपूर्व प्रयासों ने पूरे भारत के लोगों, विशेषकर हमारी नारी शक्ति, युवा शक्ति और मेहनती अन्नदाताओं को सशक्त बनाया है।”
25 करोड़ लोग गरीबी से हुए मुक्त
इन 11 सालों में देश की 25 करोड़ आबादी गरीबी की रेखा से ऊपर आई है। भारत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में एक बन गया है। भारत उन देशों में शामिल है, जहाँ दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ हैं। हमारे किसान तरह-तरह के बदलाव लाकर यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि हमारा राष्ट्र आत्मनिर्भर बने।
उन्होंने कहा, ” हमने व्यापक सुधार किए हैं और सभी क्षेत्रों में भारत को आत्मनिर्भर बनाने की जनभावना है, जो ‘गर्व से कहो, यह स्वदेशी है’ के आह्वान में परिलक्षित होती है।”
जनता की सेवा करते-करते 25वें साल में प्रवेश पर उन्होंने जनता के उनपर विश्वास बनाए रखने के लिए आभार भी जताया। उन्होंने कहा, “मैं एक बार फिर भारत की जनता को उनके निरंतर विश्वास और स्नेह के लिए धन्यवाद देता हूँ। अपने प्रिय राष्ट्र की सेवा करना सर्वोच्च सम्मान है, एक ऐसा कर्तव्य जो मुझे कृतज्ञता और उद्देश्य से भर देता है। हमारे संविधान के मूल्यों को अपना निरंतर मार्गदर्शक मानते हुए, मैं आने वाले समय में विकसित भारत के हमारे सामूहिक स्वप्न को साकार करने के लिए और भी अधिक परिश्रम करूँगा।”
महाराष्ट्र के भिवंडी में अमेरिकी नागरिक 58 वर्षीय जेम्स वॉटसन को शुक्रवार (3 अक्टूबर 2025) को गिरफ्तार किया गया। उस पर स्थानीय हिंदुओं को ईसाई बनाने के लिए धर्मांतरण रैकेट चलाने का आरोप है। जिस वक्त उसे गिरफ्तार किया गया, वह महाराष्ट्र के दो लोगों के साथ मिल कर प्रार्थना सभा कर रहा था।
अमेरिकी नागरिक वॉटसन भारत में व्यावसायिक वीजा पर रह रहा था। उसकी गिरफ्तारी ठाणे के हीरानंदानी एस्टेट में एक धार्मिक सभा के दौरान हुई। वह ठाणे और पालघर जिले के जनजातीय किसानों को बहला-फुसला कर एक व्यवस्थित धर्मांतरण रैकेट चला रहा था।
जनजातीय लोगों को लालच देकर स्थानीय निवासियों ‘सैनाथ गणपति सरपे’ और ‘मनोज गोविंद कोल्हा’ के साथ मिलकर वॉटसन ‘चिंबीपाडा गाँव’ में प्रार्थना सभाओं के नाम पर हिंदू धर्म की निंदा करता था और ईसाई धर्म अपनाने के लिए लालच दे रहा था। इन आरोपियों ने झूठे चमत्कारी उपचार का दावा करते हुए गरीब जनजातीय समुदाय का शोषण किया।
Maharashtra Police arrests US national James Watson from Bhiwandi for luring villagers to convert to Christianity. pic.twitter.com/A7GpcMgF61
अमेरिकी नागरिक नहीं, सक्रिय सेना अधिकारी निकला जेम्स वॉटसन
गिरफ्तारी के बाद सामने आए एक बड़े खुलासे में यह बात पक्की हुई है कि जेम्स वॉटसन सिर्फ एक अमेरिकी नागरिक नहीं बल्कि अमेरिकी सेना का अधिकारी है। OpIndia की जाँच में उसके अमेरिकी सेना से कई लिंक मिले हैं, जिनसे उनकी पहचान मेजर के तौर पर हुई है।
कई सूत्रों के मुताबिक, मेजर जेम्स वॉटसन अमेरिकी सेना की 2nd Battalion, 44th Air Defence Artillery (ADA) के एक्जीक्यूटिव ऑफिसर है, जो फोर्ट कैंपबेल, केंटकी में तैनात है। यह वही यूनिट है जो उसके अपने लेख के अनुसार, ऑपरेशन फ्रीडम्स सेंटिनल (Operation Freedom’s Sentinel) में आगामी तैनाती की तैयारी कर रही थी।
वॉटसन की सक्रिय सैन्य भूमिका के और भी सबूत हैं। उसने साल 2020 में “Owning the Skies, Winning the Fight” शीर्षक से एक लेख लिखा था। इस लेख में उसने अनमैन्ड एरियल सिस्टम्स (UAS) यानी ड्रोन तकनीक से जुड़ी चुनौतियों और खतरों पर विस्तार से चर्चा की थी।
(फोटो साभार- DVIDS)
वॉटसन ने बताया था कि कैसे आधुनिक तकनीक के इस युग में दुश्मन सस्ते कॉमर्शियल ड्रोन में विस्फोटक लगाकर हमले करते हैं। उन्होंने चेताया था कि इस तरह के ‘लो एंड स्लो’ यानी कम ऊँचाई पर उड़ने वाले क्वाडकॉप्टर जैसे ड्रोन आज की सबसे गंभीर सुरक्षा चुनौती बन चुके हैं।
अपने लेख के निष्कर्ष में वॉटसन ने जोर दिया था कि एयर डिफेंस आर्टिलरी (ADA) को ड्रोन से निपटने की रणनीति पर पूरी तरह नियंत्रण रखना चाहिए।
अमेरिका के रक्षा विभाग की वेबसाइट पर मौजूद सबूत
मेजर जेम्स वॉटसन की सैन्य पृष्ठभूमि का संबंध सिर्फ उसके लिखे गए लेखों तक ही सीमित नहीं है। अमेरिका के रक्षा विभाग की आधिकारिक वेबसाइट Defence Visual Information Distribution Service (DVIDS) पर वॉटसन की कई तस्वीरें और एक वीडियो क्लिप भी मौजूद हैं। इन तस्वीरों में वह अमेरिकी सेना की यूनिफॉर्म पहने दिखाई देता हैं। एक वीडियो में वो साफ-साफ कहता सुनाई देता हैं, “मैं मेजर जेम्स वॉटसन, हरलबर्ट फील्ड, फ्लोरिडा से हूँ। सेना को 246वें स्थापना दिवस की शुभकामनाएँ देता हूँ।”
भारत में अवैध धर्मांतरण गतिविधियों के आरोप में एक सक्रिय अमेरिकी सेना के मेजर की गिरफ्तारी अपने आप में गंभीर मामला है। वो बिजनेस वीजा पर भारत आया था और यह गिरफ्तारी वीजा के दुरुपयोग और अमेरिकी सेना में सेवा के दौरान उनकी गतिविधियों को लेकर भी कई बड़े सवाल खड़े करती है।
यह मामला तब सामने आया जब रवींद्र भुरकुट (27) नामक निवासी ने भिवंडी तालुका पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई। उसने एक घर के बाहर लगभग 30-35 ग्रामीणों को ईसाई धर्म का प्रचार करते हुए देखा।
कथित तौर पर, जेम्स हिंदू धर्म के बारे में अपमानजनक टिप्पणी कर रहा था, उसे अंधविश्वास पर आधारित धर्म बता रहा था, और कह रहा था कि ईसाई धर्म अपनाकर ही सुख और सफलता प्राप्त की जा सकती है।
(मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में प्रकाशित हुई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
जब एक पुरुष तलाक का सामना करता है, तो उसका आर्थिक संतुलन बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। ‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 42% पुरुष गुज़ारा भत्ता (alimony) चुकाने के लिए ऋण लेने पर मजबूर हुए हैं। यह सिर्फ एक संख्या नहीं है, यह उन हजारों पुरुषों की सच्चाई बयां करती है, जो कानूनी दायित्व निभाने के लिए अपनी बचत और सम्मान, दोनों खो रहे हैं।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि करीब 49% पुरुषों ने तलाक की प्रक्रिया में 5 लाख रुपए से अधिक खर्च किए जबकि कई को अपनी आर्थिक स्थिरता वापस पाने में वर्षों लग जाते हैं। सोचिए, एक आदमी जो अपने परिवार का भरण-पोषण करने की जिम्मेदारी उठाता है, अचानक कर्ज में डूब जाता है। वह न केवल अपनी बचत खोता है बल्कि कई मामलों में अपने जीवन स्तर को बनाए रखने के लिए भी संघर्ष करता है।
मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर
तलाक केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी पुरुषों को तोड़ देता है। कई पुरुष खुद को अकेला महसूस करते हैं, और उनके आत्म-सम्मान में कमी आती है। अध्ययनों से पता चला है कि तलाक के बाद पुरुषों में अवसाद (depression) और चिंता (anxiety) की दर तेज़ी से बढ़ जाती है।
वे अक्सर सोचते हैं कि समाज में उनकी पहचान अब क्या रह गई है। यह अकेलापन और असुरक्षा उन्हें और भी गंभीर मानसिक समस्याओं की ओर धकेल देती है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि पुरुष अपनी भावनाएँ साझा नहीं कर पाते क्योंकि समाज उनसे हमेशा मज़बूत बने रहने की उम्मीद करता है।
बच्चों से दूरी: एक पिता का सबसे बड़ा दर्द
बच्चे भी इस प्रक्रिया के शिकार होते हैं। माता-पिता के बीच तनाव उनके मानसिक और भावनात्मक विकास पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।
एक पिता, जो अपने बच्चों के लिए हर संभव कोशिश करता है, अचानक खुद को उनकी ज़िंदगी से दूर पाता है। कई बार, तलाक के बाद पिता को बच्चों की कस्टडी नहीं मिलती, जिससे उनका भावनात्मक संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाता है। बच्चे भी इस स्थिति को समझ नहीं पाते और इससे उन्हें भी गंभीर मानसिक आघात पहुँचता है।
सामाजिक कलंक और पुरुषों की पहचान
तलाक के बाद पुरुषों को समाज में कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। उन्हें अक्सर ‘असफल’ या ‘दोषी’ के लेबल के साथ देखा जाता है। यह सामाजिक कलंक उनकी मानसिक स्थिति को और भी बिगाड़ देता है।
कई पुरुषों का मानना है कि तलाक के बाद उनकी पहचान ही खत्म हो गई है, जिससे वे और अधिक अकेलापन महसूस करते हैं। अक्सर उन्हें अपने दोस्तों और परिवार से भी भावनात्मक समर्थन नहीं मिलता।
अब समय है समान न्याय की दिशा में कदम बढ़ाने का
तलाक एक जटिल सामाजिक और कानूनी मुद्दा है जो केवल महिलाओं को नहीं, बल्कि पुरुषों को भी गहराई से प्रभावित करता है। हमें इस भेदभावपूर्ण दृष्टिकोण के खिलाफ आवाज़ उठानी चाहिए और समान न्याय सुनिश्चित करने के लिए एकजुट होना चाहिए।
गुज़ारा भत्ता और अन्य कानूनी नीतियाँ निष्पक्ष होनी चाहिए ताकि दोनों पक्षों की वास्तविक आर्थिक स्थिति का ध्यान रखा जा सके। हमें एक ऐसे समाज की आवश्यकता है, जहाँ दोनों पक्षों की समस्याओं को समान रूप से समझा जाए और उन्हें सुलझाने के लिए उचित उपाय किए जाएँ। ताकि तलाक की प्रक्रिया में हर किसी की आवाज़ सुनी जाए और कोई भी व्यक्ति इस कठिनाई में अकेला न महसूस करे।
दुनिया भर में ‘फैक्ट चेक’ का ठेका लेकर दूसरों को ज्ञान बाँटने वाला मोहम्मद जुबैर अब खुद अपने ही झूठ के जाल में फँस गया है। जिसने सालों तक हिंदू संगठनों, पत्रकारों और नेताओं को ‘फेक न्यूज फैलाने वाला’ बताया अब वही जुबैर अपनी ही पूर्व कर्मचारी को लेकर झूठ बोलता पकड़ा गया है। सोशल मीडिया पर लोग उसे आईना दिखा रहे हैं। स्क्रीनशॉट, पुराने ट्वीट और सबूतों के साथ उसका फैक्ट चेक कर रहे हैं।
क्या है सुमैया शेख से जुड़ा विवाद?
इस विवाद की जड़ छिपी है लद्दाख हिंसा में, लद्दाख में 24 सितंबर 2025 को हिंसा हुई। इसका सूत्रधार बताया गया ‘एक्टिविस्ट’ सोनम वांगचुक को। इसके बाद पुलिस ने वांगचुक को गिरफ्तार कर लिया और विदेशी फंडिंग मामले में वांगचुक की NGO का FCRA लाइसेंस रद्द कर दिया गया।
विदेशी फंडिंग को लेकर बहस के बीच 27 सितंबर को जुबैर ने एक ट्वीट किया। इसमें पत्रकार आदित्य राज कौल के एक ट्वीट का स्क्रीनशॉट था जिसमें जुुबैर की विदेशी फंडिंग की जाँच करने की बात कही गई थी। इस स्क्रीनशॉट को शेयर करते हुए जुबैर ने लिखा, “विदेशी फंडिंग से याद आया, उन्हें अभी यह साबित करना है।”
जुबैर के इस ट्वीट पर ‘ऑनली फैक्ट इंडिया’ के फाउंडर और खोजी पत्रकार विजय पटेल ने जवाब दिया। विजय ने लिखा, “कट्टरपंथी जुबैर, मैं तुम्हारी विदेशी फंडिंग साबित कर दूँ। तुम्हारे दो पत्रकारों को अमेरिका स्थित ठाकुर परिवार फाउंडेशन से 50 लाख रुपए मिले थे। अब विक्टिम कार्ड खेलने के लिए तैयार हो जाओ!” इसके साथ विजय ने कुछ स्क्रीनशॉट भी शेयर किए थे जिसमें सुमैया शेख और सरफरोज सतनी (Sharfaroz Satani) का नाम था।
Let me prove you foreign funding radical Zubair.
Your two journalists had received Rs.50 Lakh from the USA based Thakur family foundation.
इसके बाद जुबैर ने अपना कुचक्र रचना शुरू किया। पोल खुलने से खफा जुबैर गाली-गलौज पर उतर आया। उसने विजय के पोस्ट पर जवाब देते हुए लिखा, “अबे सस्ते देसी भां**, थोड़ा और रिसर्च कर ले। ये लोग ऑल्ट न्यूज के कर्मचारी नहीं बल्कि कॉन्ट्रीब्यूटर थे।”
विजय को जुबैर का जवाब
विजय ने इसके बाद ‘ऑल्ट न्यूज’ की वेबसाइट का स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए लिखा, “ये तुम्हारी वेबसाइट का स्क्रीनशॉट है। जिसमें सुमैया को एडिटर के तौर पर दिखाया गया है, कॉन्ट्रीब्यूटर नहीं।” इस पर फिर जुबैर ने फिर लिखा कि वह ‘ऑल्ट न्यूज’ की कर्मचारी नहीं थी बल्कि कॉन्ट्रीब्यूटर थी।
‘ऑल्ट न्यूज’ की वेबसाइट पर सुमैया को लेकर क्या लिखा है?
‘ऑल्ट न्यूज’ की वेबसाइट पर मौजूद सुमैया शेख की वेबसाइट में उसे ‘ऑल्ट न्यूज साइंस’ की संस्थापक संपादक (Founding-Editor) बताया गया है। ‘ऑल्ट न्यूज’ की वेबसाइट पर लिखा है, “डॉ. शेख 2017 से 2021 तक ‘ऑल्ट न्यूज साइंस’ की संस्थापक संपादक रहीं। उनकी मुख्य भूमिका एक न्यूरोसाइंटिस्ट के रूप में हिंसक उग्रवाद और मनोरोग विज्ञान पर शोध करना है।”
‘ऑल्ट न्यूज’ की वेबसाइट पर मौजूद सुमैया की प्रोफाइल
जुबैर के इस दावे को लोगों ने झूठा बताकर उसका मजाक उड़ाना शुरू कर दिया। विवाद के बाद हमने सुमैया खान की X प्रोफाइल तलाशी तो उसमें कुछ पुराने पोस्ट मिले जिसमें उसने खुद को ‘ऑल्ट न्यूज साइंस’ का संपादक बताया था। यानी लोगों के दावे हवा-हवाई नहीं थे। मार्च 2019 के इस ट्वीट में सुमैया ने लिखा, “मैं भारत स्थित एक फैक्ट चेकिंग साइंस पोर्टल (ऑल्ट न्यूज साइंस) की संपादक हूँ।”
Except that I do. I am the editor of a fact-checking science portal @AltNews@AltNewsScience based in India and write regularly for Indian publications. Sick? Get well soon? https://t.co/fsMw9ISKvn
जाहिर है कि किसी संस्थान का ‘फाउंडिग एडिटर’ होना और उस संस्था का कर्मचारी ना होना और भी गंभीर सवाल खड़े करता है। ऐसा अगर था तो यह केवल मुखौटा था, इससे ज्यादा कुछ नहीं। अगर जुबैर का दावा सही भी है तो इसकी गंभीरता से जाँच किए जाने की जरूरत है। अब फिर सुमैया को मिली फंडिंग पर लौटते हैं।
सुमैया को मिली फंडिंग
असल में विवाद सुमैया को मिली फंडिंग को लेकर था। विजय ने जुबैर के एक ट्वीट का जवाब देते हुए लिखा, “तो क्या कॉन्ट्रीब्यूटर (योगदानकर्ताओं) को वेबसाइट पर सिर्फ 10 से 15 प्रोपेगेंडा लेख लिखने के लिए ₹50 लाख का विदेशी चंदा मिला? अगर वे वेबसाइट के लिए लेख लिखने के लिए विदेशी चंदा लेती भी हैं, तो यह भी गैरकानूनी है। यह कोई छोटी रकम नहीं है।”
जुबैर ने इस पर लिखा, “वो भारतीय नागरिक नहीं है। उसने ‘ऑल्ट न्यूज’ के लिए योगदान दिया है, कर्मचारी नहीं। उसे अपने शोध के लिए फाउंडेशन से अनुदान मिला है। ऑल्ट न्यूज़ को लिखने के लिए नहीं।” जुबैर ने खुद को कूल दिखाने के लिए अपने ट्वीट में जोकर की इमोजी भी चिपका दी।
Lol. Try harder. She isn't an Indian Citizen. She contributed for Alt News, Not an employee. She got grant from the foundation for her research. Not for writing to Alt News. ?
जब ‘ठाकुर फाउंडेशन’ की वेबसाइट की जाँच करने पर सामने आया कि असल में जुबैर का दावा पूरी तरह झूठ था। वेबसाइट के इम्पैक्ट सेक्शन में संस्था द्वारा जनवरी 2020 में दिए गए धन का जिक्र था। ठाकुर फाउंडेशन ने लिखा है, “हमने न्यूरोसाइंटिस्ट और लेखिका डॉ. सुमैया शेख को साक्ष्य-आधारित चिकित्सा से संबंधित उनके तथ्य-जांच दावों का समर्थन करने के लिए पुरस्कार दिया।”
ठाकुर फाउंडेशन की वेबसाइट का स्क्रीनशॉट
इस वेबसाइट पर जनवरी 2020 के सेक्शन लिंक में सुमैया शेख के कम-से-कम 14 लेखों का जिक्र था और ये सभी ‘ऑल्ट न्यूज’ की वेबसाइट के लिए लिखे गए थे। यानी जो दावा जुबैर ने करने की कोशिश की थी वो धराशायी हो गया।
ठाकुर फाउंडेशन की वेबसाइट पर सुमैया के ‘ऑल्ट न्यूज’ के लिए लिखे गए लेख
फाउंडेशन की वेबसाइट पर सरफरोज सतनी को भी मार्च 2020 में फंड दिए जाने का जिक्र है। इसमें लिखा है, “हमने वैज्ञानिक और चिकित्सीय गलत सूचनाओं का मुकाबला करने में डॉ. सुमैया शेख के काम में सहायता के लिए शोधकर्ता डॉ. सरफरोज सतनी को एक अवॉर्ड दिया।” इसमें भी 11 लिंक्स का जिक्र किया गया है जिसमें से 10 लिंक्स ‘ऑल्ट न्यूज’ की वेबसाइट की थीं और एक लिंक गूगल शीट का था जो लॉक थी।
ठाकुर फाउंडेशन की वेबसाइट पर सरफरोज के ‘आल्ट न्यूज’ के लिए लिखे गए आर्टिकल
भारत विरोधी कार्यों में संलिप्त ठाकुर फाउंडेशन
जुबैर के लिए लेख लिखने वाले पत्रकारों को जिस ठाकुर फाउंडेशन से पैसा मिला है वो खुद भारत को निशाने बनाने को लेकर सवालों में है। इसका कर्ताधर्ता दिनेश ठाकुर है जो खुद को पब्लिक हेल्थ एक्टिविस्ट बताता है लेकिन उस पर कई गंभीर आरोप लगे हैं। The DisinfoLab ने दिनेश ठाकुर के काले कारनामों को लेकर एक लंबी चौड़ी रिपोर्ट बनाई है।
‘द प्रोपेगेंड पिल’ नाम से 2024 में प्रकाशित इस रिपोर्ट में कहा गया है, “ठाकुर एक ऐसे उद्यम का मुखौटा जो कई स्तरों पर निशाना साध रहा है। पहले स्तर पर, यह रैनबैक्सी जैसी व्यक्तिगत कंपनियों को निशाना बनाता है, जिनका अमेरिकी कंपनियों के साथ विवाद चल रहा है। इसी को आधार बनाकर, अगला स्तर भारतीय जेनेरिक दवाओं को निशाना बनाता है, जो आम तौर पर अमेरिकी बड़ी दवा कंपनियों के लिए एक खतरा हैं।”
इसमें ठाकुर को लेकर लिखा गया, “इस पूरे अभियान का अंतिम लक्ष्य भारत की वैश्विक छवि को नुकसान पहुँचाना है। ठाकुर ने ऐसे लोगों और संगठनों को फंड दिया है जो खुले तौर पर भारत-विरोधी एजेंडे पर काम करते हैं, जैसे सुचित्रा विजयन् जिनके प्रोजेक्ट Polis का सोशल मीडिया एक पाकिस्तानी व्यक्ति चलाता है।”
ठाकुर फैमिली फाउंडेशन की फंडिंग (फोटो -The DisinfoLab)
ऑल्ट-न्यूज और ठाकुर फाउंडेशन का नेक्सस
DisinfoLab की रिपोर्ट में ऑल्ट न्यूज और ठाकुर फाउंडेशन के नेक्सस का भी खुलासा किया गया है। रिपोर्ट में लिखा गया है, “सरफरोज ने 2020 में कोविड-19 की पहली लहर के दौरान करीब 8 लेख लिखे थे। उसके लेखों का विषय मुख्य रूप से कोविड-19 से जुड़े घरेलू नुस्खों और अफवाहों की पड़ताल था। इस काम के लिए सरफरोज को साल 2020-21 के बीच कुल $5907 का भुगतान किया गया।”
रिपोर्ट में आगे कहा गया है, “सुमैया शेख को भी ठाकुर फैमिली फाउंडेशन ने काम पर रखा था। उन्होंने कुल 10 लेख लिखे, जिनमें से कुछ डॉ. सतानी के साथ मिलकर लिखे गए थे। इन लेखों के बदले सुमैया शेख को TFF से 2021 में $23,740 और 2022 में $35,260 का भुगतान किया गया।” रिपोर्ट यह भी दावा करती है कि 2020 के बाद से ठाकुर फैमिली ने व्यक्तियों/पत्रकारों/कार्यकर्ताओं को भारत में धन भेजने के लिए वित्तीय सेवा संस्थानों को काम पर रख लिया था।
ठाकुर फाउंडेशन द्वारा भारतीय पत्रकारों को दिया गया धन
कोविड-19 के दौर में ‘फैक्ट चेक’ की जाँच की माँग
पैसे के बदले आर्टिकल लिखने के आरोपों के बाद अब लोग इसकी जाँच किए जाने की माँग कर रहे हैं। ‘द हॉक आई’ नामक एक यूजर ने लिखा, “क्या यह FCRA का उल्लंघन हो सकता है और हितों का टकराव भी हो सकता है? योगदानकर्ता या कर्मचारी, ऑल्ट न्यूज के दो पूर्व पत्रकारों को कोविड के दौरान कुछ तथ्य-जाँच लेखों के लिए बड़ी दवा कंपनी के पैरवीकार ठाकुर फाउंडेशन से ₹50 लाख का अनुदान मिला। इसकी जाँच होनी चाहिए।”
कथित फैक्ट चेकर जुबैर पर पहले भी फंडिंग को लेकर कई तरह के आरोप लगते रहे हैं। अब इन सवालों के बाद नया विवाद शुरू हो गया है। जुबैर बचने की कितनी भी कोशिश करे लेकिन सत्य कभी तो बाहर आ ही जाता है। अगर विदेशी फंडिंग को लेकर लोगों को संदेह है तो जरूरी है कि इनकी जाँच की जाए और स्थितियाँ स्पष्ट कर दी जाएँ।
भारत में टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में एक नाम उभरा है, Zoho कॉर्पोरेशन। इस देसी कंपनी के खिलाफ साजिश रची जा रही है। सोशल मीडिया पर इसे ‘सरकारी एजेंट’ बता कर बहिष्कार की अपील की जा रही है। वही ‘डेटा लीक’ को लेकर शक जताया जा रहा है। यहाँ तक कि इसके ऐप Arattai को भी निशाना बनाया गया है। इसके खिलाफ वामपंथी प्रोपेगेंडा की वजह पीएम मोदी द्वारा इसके इस्तेमाल की अपील भी है।
कंपनी के फाउंडर श्रीधर वेंबू का इंटरव्यू करने वाले पत्रकार अर्नब गोस्वामी को लेकर भी वामपंथी नाराज हैं। वामपंथियों को मिर्ची इसलिए भी लग रही है क्योंकि कई सरकारी और निजी संस्थान zoho को अपना चुके हैं। केन्द्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने माइक्रोसॉफ्ट और गुगल जैसे विदेशी प्लेटफॉर्म छोड़कर जोहो को अपनाया। भारत की डिजिटल आत्मनिर्भरता का ये प्रतीक बन गया है।
I will never, ever use Zoho. It’s a government trap to spy on everyone.
If Arnab, Sudhir, Chitra, Devgan, Rubika, or Anjana oppose someone, it means that person is on the right side.
If anyone praises these jokers, it means that person is either mentally retarded or working… pic.twitter.com/wvttfqjvZC
जोहो प्लेटफॉर्म को लेकर कई तरफ की अफवाहें फैलाई जा रही है। मसलन सरकार इसके माध्यम से लोगों पर नजर रखेगी, डेटा को विदेशी सर्वर में सेव किया जा रहा है, जिससे इसके लीक होने का खतरा है। वामपंथियों ने कंपनी का रिश्ता आरएसएस से भी जोड़ दिया है।
कंपनी ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। कंपनी का कहना है कि हर देश का डेटा उसी देश में स्टोर हो रहा है। ये पूरी तरह सुरक्षित और सीक्रेट है।
"The hare can win. The tortoise can also win. But not trying never wins."
Our co-founder Kumar Vembu sums up Zoho's journey with this old Tamil saying. Amidst all the love and adoption we’re receiving, he also reflects on the principles that have helped us grow. ?… pic.twitter.com/CQhLyqznzU
ऑफिस सॉफ्टवेयर की दुनिया में गुगल और माइक्रोसॉफ्ट का अब तक दबदबा रहा है। भारत के यूजर्स भी इसे ही इस्तेमाल करते रहे हैं। लेकिन जोहो ने इस एकाधिकार को चुनौती देते हुए न सिर्फ भारत के बाजार में बल्कि वैश्विक बाजार में भी अपनी जगह बना ली है। इस देशी सॉफ्टवेयर का जैसे-जैसे विस्तार होगा, भारत मजबूत होगा। इसे अपनाने से विदेशी निर्भरता कम होगी और घरेलू टेक इकोसिस्टम को मजबूती मिलेगा। कंपनी का टैक्स भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहा है। इससे उन भारतीय टेक कंपनियों को भी नहीं राह मिलेगी, जो विश्व बाजार में उतरने के लिए तैयार हैं।
गुगल, माइक्रोसॉफ्ट जैसे विदेशी कंपनी पर लगते रहे हैं आरोप
विदेशी टेक कंपनियों पर डेटा प्राइवेसी को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। इनके सर्वर से ‘डेटा लीक’ होने को लेकर खबरें भी आई हैं। इन कंपनियों का डेटा ज्यादातर अमेरिका में सेव होता है। लेकिन जोहा का भारत के लोगों का डेटा देश में ही स्टोर होता है। इससे डेटा सुरक्षित रहने के ज्यादा चांसेज हैं। ये भारत के ‘डेटा संप्रभुता’ के सिद्धांत को भी मजबूत बनाता है।
क्या है Zoho
Zoho कॉरपोरेशन एक भारतीय टेक्नोलॉजी कंपनी है, जो बिजनेस सॉफ्टवेयर और वेब आधारित टूल्स बनाती है। कंपनी ऑनलाइन ऑफिस सुइट सेवा देने के लिए लोकप्रिय है। 1996 में कंपनी की शुरुआत श्रीधर वेम्बू और टोनी थॉमस ने की थी। कंपनी का मुख्यालय चेन्नई में है। इसका हेडऑफिस अमेरिका के टेक्सास में है। 9 देशों में कंपनी के ऑफिस हैं।
कंपनी में 2023 तक श्रीधर वेम्बू के भाई शेकर वेम्बू 35.2% और बहन राधा वेम्बू के पास 47.8 % शेयर थे। जबकि श्रीधर वेम्बू के पास 5 फीसदी और सह संस्थापक टोनी थॉमस के पास 8 फीसदी हिस्सेदारी थी। फिलहाल कंपनी के संस्थापक श्रीधर वेम्बू ने सीईओ पद से इस्तीफा दिया है। वे मुख्य वैज्ञानिक के तौर पर कंपनी से जुड़ गए हैं, ताकि AI और दूसरे शोध पर ध्यान दिया जा सके।
Zoho क्या-क्या दे रही है सुविधाएँ
कंपनी की स्थापना 1996 में अमेरिका के न्यूजर्सी में हुई। कंपनी ने छोटे बिजनेस पर फोकस किया और जापान में 2001 में ऑफिस खोला। 2005 में जोहो सीआरएम और जोहो राइटर लॉन्च किया। 2006 में जोहो प्रोजेक्ट, क्रिएटर, शीट और शो आए। 2007 में कंपनी ने सहयोगी टूल्स लॉन्च किए। इनमें जोहो Docs और जोहो Meeting शामिल हैं। 2008 तक कंपनी ने इनवॉइसिंग और मेल एप्लीकेशन लॉन्च किए। 2009 में कंपनी का नाम Zoho Corporation हो गया।
2017 में Zoho One लॉन्च किया गया। ये 40 से अधिक इंटीग्रेटेड एप्लीकेशंस का सुइट था। 2022 तक कंपनी 160 से ज्यादा देशों में 50,000 से अधिक व्यवसायिक संस्थानों के साथ काम कर रही थी। जनवरी 2020 तक Zoho के पास 5 करोड़ यूजर्स थे, जो जुलाई 2022 में बढ़कर 8 करोड़ हो गया।
Zoho का Arattai ऐप दे रहा WhatsApp को टक्कर
Zoho कॉर्पोरेशन का Arattai ऐप धूम मचा रहा है। इसने WhatsApp को भी पीछे कर दिया है। 2021 में ऐप के लॉन्च होते ही 3 दिनों में ही 100 गुणा ज्यादा साइन अप हो चुके थे। यहाँ तक प्ले स्टोर पर डाउनलोड्स 10 लाख पार कर गए थे। सरकार स्वदेशी को बढ़ावा दे रही है। केन्द्रीय मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने Arattai मैसेजिंग ऐप को लेकर एक्स पर पोस्ट किया। बज क्रिएट होते ही इससे जुड़ने वालों की संख्या काफी बढ़ गई।
डेटा को लेकर कंपनी ने पूरी जानकारी दी। कंपनी के फाउंडर श्रीधर वेंबू ने खुद बताया है कि डेटा कहाँ होस्ट होता है, कौन होस्ट करता है। कहाँ बनते हैं कंपनी के प्रोडक्ट्स आदि। इसके बावजूद Arattai को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है।
So Arattai can actually implement the 'Amit Shah has read it' third tick on the message info.
पूरी तरह देशी जोहो कंपनी का मुख्यालय चेन्नई में है और ये ग्लोबल इनकम का भारत में टैक्स चुकाते हैं। दुनिया के 80 देशों में कंपनी के कर्मचारी हैं और अमेरिका जैसे देशों में इसकी अच्छी मौजूदगी है।
कौन करता है डेटा सेव
भारतीय कस्टमर का डेटा भारत में ही होस्ट किया जाता है। इसमें दिल्ली, मुंबई और चेन्नई अहम हैं। कंपनी किसी भी देश के लोगों का डेटा किसी दूसरे देश में होस्ट नहीं करती है। दुनियाभर में कंपनी के 18 डेटा सेंटर्स हैं , जहाँ इसे होस्ट किया जाता है। कंपनी की सभी सेवाएँ उनकी अपनी हार्डवेयर पर चलती हैं। सभी सेवाएँ उनकी अपनी सॉफ्टवेयर फ्रेमवर्क पर हैं, जो कंपनी ने विकसित किए हैं।
अमेरिका में कंपनी का क्यों है पता
कंपनी के जोहो डेवलपर अकाउंट में ऐप स्टोर और प्ले स्टोर पर अमेरिका के ऑफिस का पता है। इसकी वजह कंपनी ने ये बताया है कि ये अकाउंट उन स्टोर्स के शुरुआती दिनों की है। इसे अमेरिकी कर्मचारी ने टेस्टिंग के लिए रजिस्टर कराया था। कंपनी ने अब तक इसे नहीं बदला है।
कुछ दिन पहले, भारतीय जनता पार्टी (BJP) परिवार ने अपने सबसे वरिष्ठ नेताओं में से एक, विजय कुमार मल्होत्रा को खो दिया। उन्होंने अपने जीवन में बहुत-सी उपलब्धियाँ हासिल कीं। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण ये है कि उन्होंने कठोर परिश्रम, दृढ़ निश्चय और सेवा से भरा जीवन जिया।
उनके जीवन को देखकर समझा जा सकता है कि RSS, जनसंघ और BJP के मूल संस्कार क्या हैं। विपरीत परिस्थितियों में साहस का प्रदर्शन, स्वयं से ऊपर सेवा भावना, साथ ही राष्ट्रीय और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति गहरी प्रतिबद्धता, यह उनके व्यक्तित्व की बहुत बड़ी पहचान रही।
वीके मल्होत्रा के परिवार ने विभाजन का भयावह दौर झेला। उस आघात और विस्थापन ने उन्हें कड़वा या आत्मकेंद्रित नहीं बनाया। इसके बजाए उन्होंने स्वयं को दूसरों की सेवा में समर्पित कर दिया। उन्हें RSS और जनसंघ की विचारधारा में राष्ट्रसेवा का रास्ता नजर आया। बँटवारे का वो समय बहुत चुनौतीपूर्ण था।
मल्होत्रा ने सामाजिक कार्यों को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। उन्होंने उन हजारों विस्थापित परिवारों की मदद की, जिन्होंने सब कुछ खो दिया था। उनका जीवन सँवारने और उन्हें फिर से खड़े होने में मदद की। यही जनसंघ की प्रेरणा थी। उन दिनों उनके साथी मदनलाल खुराना और केदारनाथ साहनी भी बढ़-चढ़कर सेवा कार्यों में शामिल होते थे। उन लोगों की निस्वार्थ सेवा को आज भी दिल्ली के लोग याद करते हैं।
1967 के लोकसभा और कई राज्यों के विधानसभा चुनाव तब अपराजेय मानी जाने वाली कॉन्ग्रेस के लिए चौंकाने वाले रहे थे। इसकी बहुत चर्चा होती है लेकिन एक कम चर्चित चुनाव भी हुआ। वो था, दिल्ली मेट्रोपॉलिटन काउंसिल का पहला चुनाव।
राष्ट्रीय राजधानी में जनसंघ ने शानदार जीत दर्ज की। आडवाणी काउंसिल के चेयरमैन बने और मल्होत्रा को चीफ एग्जीक्यूटिव काउंसलर की जिम्मेदारी दी गई, जो मुख्यमंत्री के लगभग बराबर का पद था। तब उनकी उम्र केवल 36 वर्ष थी। उन्होंने अपने कार्यकाल को दिल्ली की जरूरतों, खासकर इंफ्रास्ट्रक्चर और लोगों से जुड़े मुद्दों पर फोकस किया।
इस जिम्मेदारी ने मल्होत्रा का दिल्ली से जुड़ाव और मजबूत कर दिया। जनहित से जुड़े हर मुद्दे पर मल्होत्रा सक्रिय रूप से जनता के साथ खड़े होते और उनकी आवाज बुलंद करते। उन्होंने 1960 के दशक में गौ रक्षा आंदोलन में भी हिस्सा लिया, जहाँ उनके साथ पुलिस की ज्यादतियाँ भी खूब हुईं। आपातकाल विरोधी आंदोलन में भी उनकी सक्रिय भागीदारी रही।
दिल्ली की सड़कों पर जब सिखों का बेरहमी से कत्लेआम हो रहा था तब वे शांति और सद्भावना की आवाज बनकर सिख समुदाय के साथ पूरी मजबूती से खड़े रहे। उनका मानना था कि राजनीति, चुनावी सफलता के अलावा सिद्धांतों, मूल्यों और लोगों की रक्षा के लिए भी है, जब उन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है।
1960 के दशक के उत्तरार्ध में वीके मल्होत्रा सार्वजनिक जीवन का एक स्थायी चेहरा बन गए थे। बहुत कम नेता ऐसा दावा कर सकते हैं कि उनके पास लोगों के बीच रहकर काम करने का इतना लंबा और ठोस अनुभव है।
वो एक अथक कार्यकर्ता, उत्कृष्ट संगठनकर्ता और एक संस्था निर्माता थे। उनमें चुनावी राजनीति और संगठनात्मक राजनीति, दोनों में समान रूप से सहजता के साथ काम करने की अद्भुत क्षमता थी। उन्होंने जनसंघ और BJP की दिल्ली इकाई को स्थिर नेतृत्व दिया।
अपने लंबे सेवाकाल में मल्होत्रा ने सिविक एडमिनिस्ट्रेशन संभाला, राज्य विधानसभा में भी पहुँचे और देश की संसद में भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। 1999 के लोकसभा चुनाव में डॉ. मनमोहन सिंह के खिलाफ उनकी शानदार जीत समर्थकों और विरोधियों के बीच आज भी याद की जाती है। ये एक बेहद हाई-प्रोफाइल चुनाव था।
कॉन्ग्रेस की पूरी ताकत उनके दक्षिण दिल्ली क्षेत्र में उतर आई थी। लेकिन मल्होत्रा ने कभी बहस का स्तर नीचे नहीं किया। उन्होंने पॉजिटिव कैंपेन चलाया। गालियों और हमलों को नजरअंदाज किया और 50 प्रतिशत से ज्यादा वोटों के साथ जीत हासिल की।
ये जीत सिर्फ प्रचार के दम पर नहीं मिली थी। ये जीत मल्होत्रा की जमीन पर मजबूत पकड़ की वजह से मिली थी। कार्यकर्ताओं से आत्मीय संबंध बनाकर रखने और मतदाताओं के मन की थाह लेने में वो माहिर थे।
मल्होत्रा संसद में सटीक तैयारी के साथ अपनी बात रखते थे। वो पूरी रिसर्च करके आते थे और प्रभावी ढंग से अपनी बात रखते थे। UPA-1 के दौरान विपक्ष के उपनेता के रूप में उन्होंने जिस तरीके से काम किया, वो राजनीति में आने वाले युवाओं के लिए एक मूल्यवान सबक की तरह है।
उनसे बहुत कुछ सीखा जा सकता है। उन्होंने भ्रष्टाचार और आतंकवाद को लेकर UPA सरकार का प्रभावी ढंग से विरोध किया। उन दिनों मैं गुजरात का मुख्यमंत्री था और अक्सर मल्होत्रा से बातचीत होती। वो हमेशा गुजरात की विकास यात्रा के बारे में जानने को उत्सुक रहते थे।
राजनीति, वीके मल्होत्रा के व्यक्तित्व का केवल एक पहलू थी। वो एक उत्कृष्ट शिक्षाविद भी थे। उनके परिवार से मुझे पता चला कि उन्होंने स्कूल में डबल प्रमोशन हासिल किया। उन्होंने मैट्रिक और ग्रेजुएशन निर्धारित समय से पहले पूरी कर ली। उनकी हिंदी पर इतनी अच्छी पकड़ थी कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के भाषणों का हिंदी अनुवाद प्रायः वही करते थे।
उन्हें नई संस्थाएँ और नई व्यवस्थाएँ बनाने के लिए भी जाना जाता है। वे RSS से जुड़ी कई संस्थाओं के संस्थापक और संरक्षक रहे। उनके प्रयासों से अनेक सांस्कृतिक, शैक्षिक और सामाजिक संस्थाओं का विकास हुआ और मार्गदर्शन मिला।
इन संस्थाओं के माध्यम से कई प्रतिभाओं को आगे बढ़ने का अवसर मिला। उनके मार्गदर्शन में बनी संस्थाएँ प्रतिभा और सेवा की पाठशालाएँ बनीं। उन्होंने एक ऐसे समाज का विजन दिया, जो आत्मनिर्भर हो और मूल्यों पर टिका हो।
मल्होत्रा ने राजनीति और अकादमिक जीवन से परे, खेल जगत में भी अमिट छाप छोड़ी। तीरंदाजी उनका गहरा शौक था और वो कई दशकों तक आर्चरी एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष रहे। उनके नेतृत्व में भारतीय तीरंदाजी को ग्लोबल पहचान मिली।
उन्होंने खिलाड़ियों को मंच और अवसर दिलाने के लिए निरंतर अथक प्रयास किए। खेल प्रशासन में भी उन्होंने वही गुण दिखाए जो सार्वजनिक जीवन में थे। यानी समर्पण, संगठन क्षमता और उत्कृष्टता की निरंतर खोज।
वीके मल्होत्रा को आज लोग उनके द्वारा संभाले गए पदों के साथ ही उनकी संवेदनशीलता के लिए भी याद कर रहे हैं। उनकी पहचान एक ऐसे व्यक्तित्व की रही, जो हमेशा लोगों की मुश्किलों में उनके साथ खड़े रहे। जहाँ भी मदद की जरूरत पड़ी, वहाँ उन्होंने खुद आगे बढ़कर योगदान दिया। विपरीत परिस्थितियों में भी अपने दायित्वों से पीछे नहीं हटे। वे आदर्श पार्टी कार्यकर्ता थे, कभी ऐसा कुछ नहीं बोलते थे जिससे हमारे कार्यकर्ताओं या विचारधारा को ठेस पहुँचे।
कुछ दिन पहले मैं दिल्ली BJP के नए मुख्यालय के उद्घाटन कार्यक्रम में शामिल हुआ था। वहाँ मैंने स्नेहपूर्वक वीके मल्होत्रा को याद किया था। इस वर्ष तीन दशक बाद जब BJP ने दिल्ली में सरकार बनाई तो वो बहुत उत्साहित थे। उनकी अपेक्षाएँ बहुत बड़ी थीं, जिन्हें हम पूरी करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। आने वाली पीढ़ियाँ उनके जीवन और उपलब्धियों से प्रेरणा पाती रहेंगी।
कुछ महीने पहले, रटगर्स विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर सिक्योरिटी, रेस एंड राइट्स (CSRR) ने ‘अमेरिका में हिंदुत्व’ के विषय को लेकर एक रिपोर्ट जारी की और इसी को लेकर एक रोडशो भी निकाला गया था। इस रिपोर्ट ने हिंदुत्व को एक दक्षिणपंथी (फार-राइट) योजना के रूप में पेश किया, प्रवासी भारतीय समूहों को RSS के प्रतिनिधि माना और यह दावा किया कि हिंदुत्व अमेरिकी बहुलतावाद (pluralism) के लिए खतरा है।
1/n ?On October 27th, @RutgersU will platform open Hindu hate on college campus.
This is not an academic exercise. It’s blatant bigotry that calls for a federal investigation against American Hindu organizations and accuses them of being foreign agents.
— CoHNA (Coalition of Hindus of North America) (@CoHNAOfficial) October 4, 2025
17 जून को CSRR के यूट्यूब चैनल पर लॉन्च का वीडियो प्रकाशित किया गया था जिसमें 27 अक्टूबर की इस रिपोर्ट के आधार पर एक चर्चा आयोजित की गई थी। इस पैनल में रटगर्स विश्वविद्यालय की लॉ प्रोफेसर सहार अजीज, डॉक्टोरल छात्रा निकायता मल्होत्रा और हिंदू विरोधी इतिहासकार ऑड्रे ट्रुश्के शामिल थी।
ट्रुश्के हिंदू धर्म के तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने के लिए जानी जाती हैं और सोशल मीडिया पर उन्होंने भगवान राम के खिलाफ भी आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की हैं। इस पैनल के जरिए संदेश साफ है कि वे बिना किसी ठोस सबूत के हिंदूओं की वकालत (advocacy) को सुरक्षा समस्या के रूप में पेश करना चाहते हैं।
रिपोर्ट क्या है और इसमें क्या कहा गया है
इस दस्तावेज में दावा किया गया है कि हिंदू संगठनों ने 9/11 के बाद उभरी इस्लामोफोबिया की लहर का फायदा उठाकर अपना ‘जातीय-राष्ट्रवादी’ (ethnonationalist) का एजेंडा स्वीकार्य बनाने की कोशिश की। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में यह आंदोलन दो काम करता है:- मुसलमानों को संदिग्ध दिखाना और शैक्षणिक स्वतंत्रता (academic freedom) को दबाना।
रिपोर्ट का कहना है कि अधिकारियों और स्थानीय निकायों को उन हिंदू संगठनों से सारे रिश्ते तोड़ लेने चाहिए जो उसे पसंद नहीं हैं। साथ ही केंद्र सरकार से यह माँग की गई है कि जिन संगठनों को रिपोर्ट RSS के ‘प्रॉक्सी’ मानती है, उन पर जबरदस्ती FARA कानून लागू किया जाए। इसके अलावा, जो चैरिटी संस्थाएँ किसी भी रूप में हिंदू राष्ट्रवाद से जुड़ी हैं, उन्हें अपने विदेशी संपर्कों की पूरी जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए। रिपोर्ट यह भी चाहती है कि अमेरिकी प्रशासन ऐसे लोगों के वीजा पर रोक लगाए जिन पर भारत में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा में मदद करने के आरोप हैं।
साथ ही, विश्वविद्यालयों को ‘हिंदुत्व-प्रेरित भेदभाव’ के मुद्दे पर ट्रेनिंग देने की बात भी कही गई है ताकि वहाँ के प्रोफेसर और छात्र इससे ‘सुरक्षित’ रह सकें। कुल मिलाकर, अगर इन सुझावों को देखा जाए तो यह पूरा अभियान किसी ‘ब्लैकलिस्ट’ की तरह ही लगता है, जहाँ बीमारी ढूँढने से पहले ही इलाज तय कर लिया गया है।
स्रोत: csrr.rutgers.edu
इस रिपोर्ट में हम मुख्य रूप से उस चर्चा पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, जो इस साल जून में प्रकाशित शुरुआती वीडियो में की गई थी। इसके बाद हम आगे चलकर उस प्रकाशित शोध-पत्र पर भी बात करेंगे।
फ़्रेमिंग समस्या
यह तर्क उस वक्त ही हवा हो गया जब ‘हिंदू’, ‘हिंदुत्व’, ‘RSS’ और ‘BJP’ सबको एक ही खाँचे में रखकर एक जैसा मान लिया। उनका दावा था कि जो भी हिंदू धर्म से जुड़ा है चाहे वह हिंदुत्व हो, आरएसएस हो या भाजपा और यहाँ तक कि कोई आम हिंदू व्यक्ति भी, ये सब नागपुर से निकलने वाली तथाकथित राजनीतिक शाखाओं का हिस्सा हैं, जहाँ RSS का मुख्यालय स्थित है।
RSS, VHP और इनसे जुड़ी अन्य संस्थाएँ, भारत और विदेश दोनों जगह समाजसेवी और सामुदायिक संगठन हैं। ये वैसे ही प्रवासी संगठनों की तरह हैं जैसे दुनिया भर में अन्य समुदाय अपने सांस्कृतिक और सामाजिक हितों के लिए बनाते हैं। लेकिन जब बात हिंदू संगठनों की आती है, तो इन्हीं संस्थाओं को जातिवादी नीतियाँ फैलाने वाले, गैर-हिंदू समुदायों के खिलाफ नफरत भड़काने वाले और हिंसा को बढ़ावा देने वाले संगठनों के रूप में पेश किया गया। सबसे चिंताजनक बात यह रही कि यह कोई निष्पक्ष विश्लेषण नहीं था बल्कि जानबूझकर की गई एक समान श्रेणी में बाँधने की कोशिश थी।
स्पीकर दीपा सुंदरम ने हिंदू संगठनों और उनकी विचारधारा की तुलना पश्चिमी दुनिया के ‘फार राइट’, ‘फासिस्ट’, ‘व्हाइट नेशनलिस्ट’ और ‘क्रिश्चियन ज़ायनिस्ट’ जैसे विचारों से करके, भारत के ‘राइट विंग’ और पश्चिम के ‘राइट विंग’ के बीच की गहरी वैचारिक रेखा को धुंधला कर दिया।
सावरकर और RSS के बारे में गलत जानकारी
इस चर्चा का सबसे दिलचस्प पहलू यह था कि शुरुआत में ही सुंदरम ने एक बड़ी गलती कर दी। उन्होंने वीर सावरकर को RSS का संस्थापक बता दिया। लेकिन सावरकर RSS के संस्थापक नहीं थे, यह संगठन 1925 में केशव बालिराम हेडगेवार ने स्थापित किया था। अगर वे किसी संगठन के इतिहास पर कोई बड़ी थ्योरी बनाना चाहते हैं, तो कम से कम उसका सही इतिहास जानना आवश्यक है।
‘एंटी-हिंदू संगठन’ वाली धारणा (HAF और CoHNA)
इसके बाद चर्चा में अमेरिका में सक्रिय हिंदू संगठनों, जैसे हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन (HAF) और कोएलिशन ऑफ हिंदूज ऑफ नॉर्थ अमेरिका (CoHNA), पर निशाना साधा गया। सुंदरम ने इन संगठनों को हिंदुत्व के ‘खतरनाक मोर्चे’ के रूप में पेश किया।
वास्तव में, HAF और CoHNA अमेरिका में पंजीकृत और खुले तौर पर काम करने वाले नागरिक अधिकार संगठन हैं। ये हिंदू विरोधी घृणा की घटनाओं पर नजर रखते हैं, कानून निर्माताओं को जानकारी देते हैं, मंदिरों की सुरक्षा का समर्थन करते हैं और अमेरिकी हिंदू समुदाय की आवाज बनते हैं, जो वहाँ अल्पसंख्यक है।
सुंदरम और ट्रुश्के जैसे तथाकथित शिक्षाविदों की इन संगठनों से वैचारिक असहमति हो सकती है, खासकर ट्रुश्के की, जो औरंगजेब की प्रशंसक मानी जाती हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे इस असहमति को बदनामी में बदल दें और सच्चे हिंदू संगठनों को भारत के हिंदुओं की किसी साजिश के रूप में पेश करें।
इस्लामोफोबिया का सर्वव्यापी प्रभाव
चर्चा के दौरान ‘इस्लामोफोबिया’ का मुद्दा बार-बार उठाया गया, जिसमें भारत और अमेरिका दोनों जगह के हिंदुओं पर मुसलमानों से नफरत करने का आरोप लगाया गया। ऐसा क्यों? क्योंकि हिंदू संगठन अक्सर कट्टर इस्लाम, पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी समूहों या प्रवासी इस्लामी दबाव की आलोचना करते हैं।
कई बार ऐसा हुआ है जब हिंदू खुले तौर पर इस्लामी उग्रवाद का निशाना बने, चाहे वह लव जिहाद के मामले हों, आतंकवाद या अन्य घटनाएँ। इसका ताजा उदाहरण पहलगाम आतंकी हमला है, जिसमें पाकिस्तान समर्थित इस्लामी आतंकियों ने धार्मिक पहचान पूछकर 26 निर्दोष हिंदुओं की हत्या कर दी।
खालिस्तानियों को पीड़ित के रूप में पेश करना
अब बात आती है चर्चा के अगले हिस्से की, जहाँ खालिस्तानी आतंकियों को निर्दोष एक्टिविस्ट के रूप में पेश करने की कोशिश की गई। इसे ट्रांसनेशनल रेप्रेशन यानी विदेशी दमन के नाम पर नया रूप देने का प्रयास किया गया।
उदाहरण के तौर पर, हरदीप सिंह निज्जर का मामला लिया गया। 2023 में कनाडा की राजधानी ओटावा ने भारत पर आरोप लगाया कि उसने कनाडा में निज्जर की हत्या करवाई। भारत ने इस आरोप को सख्ती से खारिज किया। समस्या सिर्फ कूटनीतिक नहीं थी, असली मुद्दा यह था कि कनाडा ने बिना किसी ठोस सबूत के भारत पर एक खालिस्तानी आतंकी की हत्या का आरोप लगाया। अब तक कनाडा भारतीय एजेंसियों को कोई पुख्ता सबूत नहीं दे पाया है।
निज्जर कोई निर्दोष व्यक्ति नहीं था। वह एक खालिस्तानी आतंकी था, जिसने 1990 के दशक में झूठा हिंदू नाम लेकर भारत से फरार होकर कनाडा में शरण माँगी थी। वीजा और नागरिकता आवेदन कई बार खारिज हुए, लेकिन वह किसी न किसी तरीके से वहाँ रहकर नागरिकता पाने की कोशिश करता रहा। भारत ने कई बार उसके प्रत्यर्पण (extradition) की माँग की, लेकिन कनाडा ने हर बार इनकार किया। उसकी हत्या के बाद ही यह सामने आया कि कनाडा ने उसे नागरिकता दे दी थी। निज्जर पाकिस्तान भी गया था और वहाँ खालिस्तानी आतंकियों से मिला था। वह हथियारों के साथ देखा गया था और कनाडा में एक ट्रेनिंग कैंप भी चला रहा था।
चर्चा में वक्ता जोत सिंह ने एक और नाम लिया, खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नून का, जो सिख्स फॉर जस्टिस (SFJ) नामक प्रतिबंधित संगठन का संस्थापक है। भारत सरकार ने SFJ को 2019 में बैन किया और 2020 में पन्नून को व्यक्तिगत रूप से आतंकी घोषित किया।
पन्नून कोई शांतिप्रिय कार्यकर्ता नहीं है। उसने भारत और विदेशों में सिखों को भारत सरकार के खिलाफ भड़काया है। उसके समर्थक भारतीय झंडे जलाते हैं, भारत विरोधी नारे लगाते हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर और अन्य भारतीय राजनयिकों को धमकियाँ दे चुके हैं। उसने सरकारी इमारतों को नुकसान पहुँचाने, 15 अगस्त को प्रधानमंत्री को झंडा फहराने से रोकने के लिए इनामों की घोषणा की, नकली खालिस्तान के नक्शे जारी किए और कई देशों में रेफरेंडम आयोजित किए।
भारत की आपत्तियों और अनुरोधों के बावजूद, पन्नून अब भी खुद को एक्टिविस्ट बताकर खुलेआम भारत विरोधी अभियान चला रहा है। निज्जर और पन्नून जैसे आतंकियों को एक्टिविस्ट बताना न केवल वक्ताओं की नीयत पर सवाल उठाता है, बल्कि यह दिखाता है कि हिंदुत्व विरोध के बहाने एक गहरा भारत-विरोधी नैरेटिव गढ़ा जा रहा है।
‘हिंदुत्व फासीवाद’ प्रवासी समुदाय के बारे में क्या भूल जाता है?
अमेरिका में हिंदू समुदाय की विविधता को जानबूझकर एक ही रंग में दिखाने की कोशिश की जा रही है। यह कहा जाता है कि हिंदू संगठन ‘व्हाइट नेशनलिज़्म’ और ‘क्रिश्चियन सायोनिज़्म’ से जुड़े हैं। सिर्फ इसलिए क्योंकि किसी भारतीय ने किसी कंजरवेटिव कॉन्फ्रेंस में भाषण दिया था और उसके कुछ मिनट बाद एक अमेरिकी सीनेटर ने अपनी बाइबल का ज़िक्र कर दिया। यह कोई विश्लेषण नहीं, बल्कि बिना आधार की कहानी है जिसे ज़बरदस्ती थ्योरी बनाया जा रहा है।
असलियत यह है कि अमेरिका में हिंदू संगठन इंटरफेथ (धर्मों के बीच संवाद) कार्यक्रम चलाते हैं, बाकी चैरिटी संगठनों की तरह नियमित ऑडिट कराते हैं और एक अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में अपने सामाजिक दायित्व निभाते हैं। जैसे नफरत से जुड़े अपराधों की निगरानी, स्कूलों में हिंदू धर्म की सही जानकारी देना, दिवाली के समय सुरक्षा दिशानिर्देश जारी करना और मंदिरों में तोड़फोड़ जैसी घटनाओं पर प्रतिक्रिया देना।
तो क्या ‘हिंदूफोबिया’ मनगढ़ंत है?
अगर आप आँखें बंद कर लें, तभी यह नजर नहीं आएगा। अमेरिका, कनाडा, नीदरलैंड, आयरलैंड, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन में हिंदुओं के खिलाफ नफरत से जुड़ी घटनाएँ हाल के वर्षों में रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ी हैं, खासकर जब राजनीतिक माहौल गर्म हुआ।
हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन (HAF) और अन्य संगठनों को कई सालों तक अधिकारियों से यह मनवाने के लिए संघर्ष करना पड़ा कि सरकारी भाषा में ‘हिंदू विरोधी पूर्वाग्रह’ (anti-Hindu bias) को स्वीकार किया जाए।
‘हिंदूफोबिया’ को इसलिए नकार देना क्योंकि आपको यह शब्द पसंद नहीं है, कोई तर्क नहीं बल्कि सच्चाई से आंखें मूंदने जैसा है। हिंदूफोबिया के बारे में और जानने के लिए Hinduphobia Tracker पर जाएँ।
अकादमिक-कार्यकर्ताओं के गुट
‘अमेरिका में हिंदुत्व’ का नैरेटिव आगे बढ़ाने वाले कई समूह खुद खुले तौर पर एक्टिविस्ट हैं। उदाहरण के तौर पर, Hindus for Human Rights (HfHR) एक हफ्ते में ब्लॉग लिखकर HAF को ‘फार-राइट संगठन’ कहता है, और अगले ही हफ्ते खुद को निष्पक्ष संस्था के रूप में पेश करता है। चर्चा में शामिल एक वक्ता, प्रणय सोमयाजुला, इसी साल जुलाई तक HfHR में काम कर रहे थे।
एक्टिविस्ट होना गलत नहीं है, लेकिन अगर आप खुद किसी पक्ष में हैं, तो राज्य से अपने विरोधियों को ‘ब्लैकलिस्ट’ करने की माँग करते हुए खुद को निष्पक्ष मध्यस्थ बताना उचित नहीं। अगर आपका असली उद्देश्य ‘बहुलतावाद’ (pluralism) है, तो विश्वविद्यालयों, पुलिस और राजनेताओं से हिंदू संगठनों से सारे संबंध तोड़ने की अपील करना इस सोच के बिल्कुल उलट है।
हिंदू विरोधी रिपोर्ट के पीछे और समर्थन करने वाले संगठन
IAMC
चर्चा में ‘इस्लामोफोबिया’ का मुद्दा सबसे ज़्यादा उठाने वाली वक्ता सफा अहमद थी, जो इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (IAMC) की मीडिया और कम्युनिकेशन की एसोसिएट डायरेक्टर हैं।
हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन (HAF) के अनुसार, IAMC का संबंध प्रतिबंधित इस्लामी आतंकवादी संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (SIMI) से रहा है। इसके अलावा, इस संगठन के संस्थापक शेख उबैद के जरिए IAMC के रिश्ते लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और जमात-ए-इस्लामी (JeI) से भी जुड़े हैं। IAMC वास्तव में जमात-ए-इस्लामी समर्थित लॉबिस्टसंगठन है, जो खुद को ‘ह्यूमन राइट्स एडवोकेसी ग्रुप’ बताता है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, IAMC ने पहले अमेरिका में कई संगठनों के साथ मिलकर और उन्हें पैसा देकर अमेरिका की धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF) से भारत को ब्लैकलिस्ट करवाने की कोशिश की थी। यह संगठन भारत के खिलाफ फेक न्यूज और भ्रामक जानकारी फैलाने में भी पकड़ा गया है। साल 2021 में IAMC पर UAPA (गैरकानूनी गतिविधि निवारण अधिनियम) के तहत मामला दर्ज किया गया था।
HfHR
जो लोग Hindus for Human Rights (HfHR) संगठन से परिचित नहीं हैं, उन्हें इसका नाम सुनकर लग सकता है कि यह हिंदू समुदाय के हितों के लिए काम करने वाला संगठन है। लेकिन असल में, यह ‘भेड़ की खाल में भेड़िया’ साबित हुआ है।
यह संगठन अमेरिका और ब्रिटेन में हिंदू विरोधी नैरेटिव फैलाने में सबसे आगे रहा है। खुद को ‘मानवाधिकारों का रक्षक’ बताने वाला यह समूह एक छिपे हुए एजेंडे पर काम करता है। इसे Tides Foundation जैसी संस्थाओं से फंडिंग मिलती है जो अमेरिकी विश्वविद्यालयों में हमास समर्थक प्रदर्शनों से जुड़ी मानी जाती है। HfHR के कई कदम अलगाववादी और उग्रवादी संगठनों की सोच से मेल खाते हैं, जो हिंदू हितों के खिलाफ हैं।
वास्तव में, HfHR एक खुला हिंदू और भारत विरोधी संगठन है, जो अमेरिका से संचालित होता है। यह हिंदू प्रतीकों और शिक्षाओं का इस्तेमाल कर अपने एजेंडे को आगे बढ़ाता है, जबकि लगातार हिंदू परंपराओं और मान्यताओं की आलोचना करता है। इसके बयानों और गतिविधियों से साफ झलकता है कि इसका असली उद्देश्य मानवाधिकारों की रक्षा नहीं, बल्कि हिंदू पहचान को कमजोर करना और झूठे आरोपों से उसे बदनाम करना है।
HfHR की स्थापना 2019 में Indian American Muslim Council (IAMC) और Organization for Minorities of India (OFMI) ने मिलकर की थी। इन तीनों ने मिलकर Alliance for Justice and Accountability (AJA) नाम का एक और संगठन बनाया था, जिसने सितंबर 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ह्यूस्टन यात्रा के खिलाफ प्रदर्शन किया था। इसकी सह-संस्थापक सुनीता विश्वनाथ ने 2019 में भारत में NRC को लेकर मुस्लिम समुदाय में डर और भ्रम फैलाने की कोशिश की थी।
2021में, HfHR ने ‘Dismantling Global Hindutva’ नामक खुले हिंदू विरोधी सम्मेलन का समर्थन किया। 2023 में, प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान इस संगठन ने उनके खिलाफ प्रचार चलाने के लिए एक ‘स्पेशल टूलकिट‘ जारी किया।
जून 2023 में, राहुल गाँधी को Hudson Institute के एक कार्यक्रम में सुनीता विश्वनाथ के साथ बैठे देखा गया था। वहीं, अक्टूबर 2023 में, भारत सरकार की कानूनी कार्रवाई के बाद HfHR का X (Twitter) अकाउंट भारत में ब्लॉक कर दिया गया।
निष्कर्ष
इस पूरी बहस का सार बहुत सीधा है, रिपोर्ट में हिंदुत्व को ‘फार-राइट फासीवाद’ बताना, प्रवासी हिंदू संगठनों को ‘आरएसएस की शाखाएँ’ कहना और हिंदू वकालत को ‘मुस्लिम विरोधी’ बताना, ये सब एकतरफा सोच, गलत तथ्यों और पक्षपात से भरा है
यहाँ समस्या RSS में नहीं है। RSS उन संगठनों में से एक है जो भारत के लोगों के साथ हर विपत्ति में, चाहे वह प्राकृतिक हो या अन्य कोई, बिना किसी जाति, धर्म या नस्ल के भेदभाव के खड़े रहे हैं। RSS, VHP और इनके सहायक संगठन हमेशा जरूरतमंदों की मदद के लिए आगे आए हैं। चाहे वह बाढ़ हो, महामारी हो, भूकंप हो या युद्ध, इन संगठनों के हिंदू सदस्यों ने हर परिस्थिति में सभी की सहायता की है।
सच्ची समस्या उन संगठनों और व्यक्तियों में है जो ‘अकादमिक’ होने का दिखावा करते हुए हिंदू-विरोधी नरेटिव फैलाते हैं। ऑड्रे ट्रुशके, जोत सिंह, दीपा सुंदरम और प्रणय सोमयाजुला जैसे लोग दुनिया भर में हिंदुओं के खिलाफ नफरत का माहौल बना रहे हैं, जिसे तुरंत चुनौती देने की जरूरत है।
(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते है)
नवरात्रि और दशहरा बीत गया है। एक बार फिर इस्लामी कट्टरपंथियों ने हिंदू आस्था को अपने आतंक से डराने की पूरी कोशिश की। हर बार की तरह वही कहानी फिर दोहराई गई, श्रद्धा और शोभायात्राओं के बीच कट्टरपंथियों ने पत्थरों की बारिश शुरू कर दी। कहीं, काँच की बोतलें फेंकी गईं। हर बीतते साल के साथ हिंदू त्योहारों पर कट्टरपंथियों की हिंसा बढ़ती जा रही है।
किसने पत्थर फेंके ये तो हमने देख लिया लेकिन फिर एक सवाल सामने आता है कि पत्थर क्यों फेंके गए? हर बार निशाने पर सिर्फ हिंदू त्योहार ही क्यों आते हैं? क्या कभी किसी ने सुना कि हनुमान चालीसा पढ़ने गए लोगों ने किसी पर पथराव किया हो? नहीं सुना, क्योंकि यह असहिष्णुता एकतरफा है।
नेपाल में भी दुर्गा विसर्जन के दौरान शोभायात्रा पर हमला किया गया। इससे साफ पता चलता है कि यह भारत की समस्या नहीं है बल्कि यह एक मानसिकता की समस्या है। यह मानसिकता क्या है? यह मानसिकता अपने मजहब को दूसरों की आस्था के ऊपर दिखाने की जिद है। यह मजहबी कट्टरता के साथ-साथ अपनी पहचान को आक्रामकता से दिखाने का सवाल भी है।
पहचान के संकट ने कट्टरपंथियों के अकीदे को हिंसा का हथियार बना दिया है। जब किसी समाज का एक हिस्सा अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और अपने भविष्य पर भरोसा खो देता है, तो वह अपनी असुरक्षा को आक्रामकता से ढकने की कोशिश करता है।
त्यौहारों पर झंडे लहराने वाले, पत्थर चलाने वाले और नारे लगाने वाले खुद को बहादुर समझते हैं जबकि असल में वे अपनी पहचान के संकट को चीख-चीखकर जाहिर कर रहे होते हैं।
भारत में यह प्रवृत्ति केवल सामाजिक नहीं रही, इसे राजनीतिक संरक्षण मिला है, जिससे यह और भी खतरनाक होती जा रही है। यह कट्टरपंथ राजनीति की गोद में पल रहा है। वोट बैंक की लालच में राजनीतिक दलों ने वर्षों से इस असहिष्णुता को ‘संवेदनशीलता’ का नाम दिया है।
देश में लगभग 15-16 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं, और यही संख्या कई राज्यों में जीत-हार तय कर सकती है। यही वजह है कि राहुल गाँधी हों या अखिलेश यादव, ममता बनर्जी हों या असदुद्दीन ओवैसी ये सब एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में लगे हैं कि कौन खुद को बड़ा ‘मुस्लिम हितैषी’ दिखा सके।
बरेली में हाल में जो हुआ, वह इसका ताजा उदाहरण है। I Love Muhammad के नाम पर दंगाइयों ने उपद्रव किया। पुलिस पर गोली चलाई गईं, पत्थराव किया गया। जिसके बाद समाजवादी पार्टी का दल वहाँ दौड़ पड़ा, वो भी आरोपितों का पक्ष लेने के लिए। इन्हें दंगाई बेगुनाह नजर आते हैं और पुलिस-प्रशासन को ये अत्याचारी बताते हैं।
यह वही राजनीति है जिसने दंगाइयों को यह भरोसा दिला दिया है कि चाहे कुछ भी कर लो, ‘वोट बैंक’ के लिए कुछ दल तुम्हारे साथ खड़े हैं। तुम्हारे लिए वकील खड़े होंगे, तुम्हें बचाने वाले बयान आएँगे और मीडिया का एक हिस्सा तुम्हें पीड़ित दिखाने में जुट जाएगा।
यह सिलसिला नया नहीं है। दशकों से यही खेल चल रहा है। मजहब की आड़ में एक वर्ग ने आक्रामकता को सामान्य बना दिया है और यही सबसे खतरनाक है। क्योंकि जब समाज का कोई हिस्सा यह मान ले कि कानून से ऊपर उसकी मजहबी भावनाएँ हैं, तो फिर राज्य की सत्ता भी बेबस दिखने लगती है।
अब यह समझना होगा कि हर बार पत्थर चलने के बाद सिर्फ कुछ गिरफ्तारियाँ और बयान काफी नहीं हैं। यह मानसिकता तब तक नहीं बदलेगी जब तक समाज और राज्य मिलकर इसे वैचारिक स्तर पर चुनौती नहीं देंगे। यह कह देना कि ‘हर धर्म में कुछ कट्टर लोग होते हैं’ अब बहाना बन गया है।
क्योंकि यहाँ समस्या ‘कुछ’ की नहीं बल्कि एक मानसिकता की है जो हर उत्सव, हर धार्मिक पर्व पर आतंक का अपना चेहरा दिखाती है।