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UAPA में जमानत पर बाहर ‘पत्रकार’ सिद्दीकी कप्पन पर केरल में FIR, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के खिलाफ पोस्ट करने वाली शीबा के समर्थन में कर रहा था रैली: 10 अन्य लोगों पर भी केस दर्ज

केरल की कोच्चि पुलिस ने पत्रकार सिद्दीकी कप्पन और 10 अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। इन लोगों पर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को लेकर विवादित टिप्पणी करने वाली रीजास एम शीबा सिद्दीकी की गिरफ्तारी के खिलाफ बिना अनुमति के प्रदर्शन करने का आरोप है।

यह प्रदर्शन ‘रीजास सॉलिडेरिटी फोरम’ द्वारा आयोजित किया गया था और कप्पन इसमें मुख्य वक्ता था। यह कार्यक्रम हाई कोर्ट जंक्शन के पास आयोजित किया गया था।

पुलिस के अनुसार, इन सभी पर गैरकानूनी सभा, सार्वजनिक रास्ते में बाधा डालना, शांति भंग करना और पुलिस से झड़प करने के आरोप लगाए गए हैं। पुलिस का कहना है कि इस सभा के लिए न तो अनुमति ली गई थी और न ही साउंड सिस्टम के इस्तेमाल की मंजूरी ली गई थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस प्रदर्शन में लगभग 30 लोग शामिल थे, जिन्होंने रीजास के समर्थन में नारेबाजी की। जब पुलिस ने उन्हें हटने को कहा तो कथित तौर पर झड़प हो गई और पुलिस ने बल प्रयोग करके भीड़ को हटाया। इसमें दो लोगों को हिरासत में लिया गया, जबकि अन्य मौके से फरार हो गए। FIR में जिन लोगों का नाम है, उनमें एडवोकेट प्रमोद पुझनकरा, सीपी राशिद, साजिद खालिद, डॉ हरी, भाबुराज भगवती, अम्बिका, मृदुला भवानी शामिल हैं।

इससे पहले बीजेपी नेताओं ने पुलिस से शिकायत की थी कि सिद्दीकी कप्पन ने अपनी जमानत की शर्तों का उल्लंघन किया है और इस कार्यक्रम को रोका जाना चाहिए। पूर्व DGP और बीजेपी समर्थक टी पी सेनकुमार ने फेसबुक पर लिखा, “जो राजनीतिक पार्टी इस तरह के कार्यक्रमों का विरोध करना चाहिए, वो चुप है क्योंकि कप्पन से करीबी एक व्यक्ति उस पार्टी के मुख्यालय में है। फिर ऐसे उग्रवादियों से हमें सुरक्षा कहाँ से मिलेगी?”

रीजास एम शीबा सिद्दीकी, एक छात्र कार्यकर्ता और स्वतंत्र पत्रकार है, जिसे महाराष्ट्र ATS ने मई 2025 में नागपुर से गिरफ्तार किया था। उस पर ऑपरेशन सिंदूर और ऑपरेशन कगार (जो एक विरोधी-माओवादी अभियान है) के खिलाफ सोशल मीडिया पोस्ट करने और भारत विरोधी नारे लगाने का आरोप है।

सिद्दीकी कप्पन को अक्टूबर 2020 में हाथरस गैंगरेप केस की रिपोर्टिंग के लिए जाते समय यूपी पुलिस ने गिरफ्तार किया था और उसके खिलाफ UAPA लगाया गया था। वो वर्तमान में जमानत पर बाहर हैं।

EC ने मतदाता सूची में सुप्रीम कोर्ट के दखल को बताया ‘शक्तियों का उल्लंघन’, हलफनामा दायर कर कहा- वोटर लिस्ट में बदलाव का अधिकार सिर्फ हमारा

चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में एक बड़ा दावा किया है। आयोग ने एक हलफनामा दायर कर कहा है कि किसी भी चुनाव से पहले मतदाता सूचियों में सुधार (Revision) करने का पूरा अधिकार सिर्फ EC के पास है। यह चाहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) हो या सामान्य पुनरीक्षण, इसका निर्णय चुनाव आयोग ही करेगा, कोई और नहीं। आयोग ने कहा कि अगर कोर्ट इस मामले में दखल देता है तो यह उसकी कानूनी शक्तियों का उल्लंघन होगा।

क्यों दाखिल किया गया हलफनामा?

यह हलफनामा (Affidavit) सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय की एक जनहित याचिका (PIL) के जवाब में दायर किया गया है। उपाध्याय ने अपनी याचिका में सुप्रीम कोर्ट से माँग की थी कि वह चुनाव आयोग को सभी राज्यों में, खासकर जहाँ बांग्लादेशी घुसपैठ ज्यादा होती है, नियमित रूप से मतदाता सूचियों में सुधार करने का निर्देश दे।

इसके जवाब में चुनाव आयोग ने कहा कि समय-समय पर मतदाता सूची में सुधार करने का अधिकार सिर्फ उसके पास है और इस मामले में कोर्ट का कोई भी निर्देश उसकी विशेष शक्तियों में दखल होगा। आयोग ने बताया कि मतदाता सूचियों में सुधार करना उसका दायित्व है और यह हर आम चुनाव, विधानसभा चुनाव या उपचुनाव से पहले पूरा किया जाता है।

मतदाता सूची में सुधार का अधिकार और कानून

चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21 और मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के नियम 25 का हवाला दिया। आयोग ने कहा कि इन नियमों के तहत, उसे यह तय करने का पूरा अधिकार है कि वोटर लिस्ट में गहन या सामान्य सुधार कब और कैसे किया जाए।

आयोग ने यह भी बताया कि 1 जुलाई 2025 को उसने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य चुनाव अधिकारियों को वोटर लिस्ट में सुधार की तैयारी शुरू करने का निर्देश दिया है, जिसमें 1 जनवरी 2026 को कट-ऑफ तारीख माना गया है।

आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह वोटर लिस्ट की शुद्धता और अखंडता बनाए रखने के अपने दायित्व को लेकर पूरी तरह से जागरूक है और इस दिशा में लगातार काम कर रहा है।

चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से यह भी कहा कि उसकी याचिका खारिज की जाए, क्योंकि नियमित समय-समय पर वोटर लिस्ट में सुधार करने का निर्देश देना उसके अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन होगा।

‘विधायक हो तो क्या, अलग से नहीं होगा ट्रायल’: नूहँ हिंसा केस में कॉन्ग्रेस MLA मामन खान को सुप्रीम कोर्ट ने फटकारा, HC के फैसले पर लगाई रोक

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में यह साफ कर दिया है कि किसी राजनेता को सिर्फ उसके पद के आधार पर कोई विशेष सुविधा नहीं दी जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें हरियाणा कॉन्ग्रेस विधायक मामन खान के लिए अलग से ट्रायल चलाने की बात कहीं गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विधायक होना अलग ट्रायल का आधार नहीं हो सकता। कानून की नजर में सभी बराबर हैं।

नूहँ हिंसा मामले में हुआ था अलग ट्रायल का आदेश

यह मामला 2023 की नूहँ हिंसा से जुड़ा है, जिसमें छह लोगों की मौत हुई थी। इस हिंसा को भड़काने के आरोप में विधायक मामन खान और अन्य लोगों पर केस दर्ज किया गया था। ट्रायल कोर्ट ने विधायक खान के लिए अलग से सुनवाई का आदेश दिया, जिसे पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने भी सही ठहराया था।

हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के इस फैसले को पलट दिया। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने कहा कि सिर्फ राजनीतिक पद के आधार पर किसी को अलग से ट्रायल की अनुमति देना संविधान के अनुच्छेद 14 में दिए गए समानता के सिद्धांत के खिलाफ है।

क्यों नहीं हो सकता अलग ट्रायल?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कुछ अहम बातें बताईं हैं। कोर्ट ने कहा कि सभी आरोपित कानून के सामने बराबर हैं। विधायक होना अलग ट्रायल का आधार नहीं हो सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस मामले में विधायक खान और अन्य आरोपितों के खिलाफ सबूत एक जैसे हैं। अलग-अलग ट्रायल चलाने से गवाहों को बार-बार बुलाना पड़ेगा, जिससे बेवजह देरी होगी और विरोधाभासी फैसले आने का खतरा भी रहेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भले ही विधायकों से जुड़े मामलों का जल्द निपटारा होना चाहिए, लेकिन यह निष्पक्ष सुनवाई की कीमत पर नहीं होना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी आरोपित को केवल राजनीतिक पद के कारण अलग ट्रायल की अनुमति देना सही नहीं है। इस फैसले के बाद, विधायक मामन खान का मामला दोबारा ट्रायल कोर्ट को भेज दिया गया है, जहाँ विधायक का ट्रायल अब बाकी आरोपितों के साथ ही होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने तय किए जॉइंट ट्रायल के प्रिंसिपल

सुप्रीम कोर्ट ने इसी फैसले में कुछ जॉइंट ट्रायल के प्रिंसिपल भी तय किए है। सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि आमतौर पर हर आरोपित का ट्रायल अलग-अलग होता है, लेकिन अगर अपराध एक ही घटना का हिस्सा हों, तो जॉइंट ट्रायल हो सकता है। यह फैसला जज की बुद्धिमानी पर निर्भर करता है।

सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि जॉइंट या अलग ट्रायल का फैसला शुरुआत में ही किया जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि फैसला लेते समय यह देखना जरूरी है कि क्या जॉइंट ट्रायल से किसी आरोपित को कोई नुकसान हो सकता है या इससे सुनवाई में देरी होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि एक ट्रायल में जिन सबूतों का इस्तेमाल किया गया है, वहीं सबूत दूसरे ट्रायल में इस्तेमाल नहीं हो सकते हैं। इसलिए, अलग-अलग ट्रायल से कानूनी प्रक्रिया में दिक्कतें आ सकती हैं।

कोर्ट ने कहा कि कोई भी फैसला सिर्फ इसलिए रद्द नहीं किया जाएगा कि जॉइंट या अलग ट्रायल संभव था। कोर्ट तभी दखल देगा जब आरोपित असलियत में कोई नुकसान हुआ हो।

‘अपने लिए जहर निगल लेता हूँ, किसी का अपमान नहीं सहा जाता’: भूपेन हजारिका के अनादर को लेकर कॉन्ग्रेस पर बरसे PM मोदी, असम को दी ₹18530 करोड़ की सौगात

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार (14 सितंबर 2025) को असम में 18,530 करोड़ रुपए की परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया है। इनमें मेडिकल से लेकर ऊर्जा क्षेत्र की कई परियोजनाएँ शामिल हैं। इस दौरान पीएम मोदी ने दरांग में एक जनसभा को भी संबोधित किया और कॉन्ग्रेस पर जमकर हमला बोला है।

कॉन्ग्रेस पर बरसे पीएम मोदी

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में भूपेन हजारिका को भारत रत्न दिए जाने पर कॉन्ग्रेस अध्यक्ष के बयान का जिक्र कर कॉन्ग्रेस को खूब खरी-खरी सुनाई। पीएम मोदी ने कहा, “जिस दिन भारत सरकार ने इस देश के महान सपूत और असम के गौरव भूपेन दा हजारिका जी को भारत रत्न से सम्मानित किया, उसी दिन कॉन्ग्रेस पार्टी के अध्यक्ष ने बयान दिया था कि मोदी ‘नाचने-गाने वालों को’ भारत रत्न दे रहा है।”

उन्होंने कहा, “1962 में चीन के साथ जो युद्ध हुआ था, उसके बाद पंडित नेहरू ने जो कहा था, नॉर्थ-ईस्ट के लोगों के वे घाव आज भी भरे नहीं हैं और उस घाव पर कॉन्ग्रेस की वर्तमान पीढ़ी भी नमक छिड़कने का काम कर रही है।”

मैं सारा जहर निगल लेता हूँ: PM

पीएम मोदी ने कहा, “आम तौर पर मुझे कितनी भी गालियाँ दें, मैं तो भगवान शिव का भक्त हूँ, सारा जहर निगल लेता हूँ लेकिन जब बेशर्मी के साथ किसी और का अपमान होता है, तब मुझसे रहा नहीं जाता।”

उन्होंने कहा, “मैं जानता हूँ, कॉन्ग्रेस का पूरा इकोसिस्टम आज मुझ पर टूट पड़ेगा कि मोदी फिर से रोना रोने लगा। मेरे लिए तो जनता-जनार्दन ही मेरा भगवान है, और मेरे भगवान के पास जाकर मेरी आत्मा की आवाज नहीं निकलेगी तो और कहाँ निकलेगी।” पीएम ने कहा, “यही मेरे मालिक हैं, यही मेरे पूजनीय हैं, यही मेरा रिमोट कंट्रोल हैं और कोई मेरा रिमोट कंट्रोल नहीं है।”

पीएम मोदी ने कहा, “21वीं सदी के 25 साल बीत चुके हैं। अब 21वीं सदी का ये अगला हिस्सा ईस्ट का है, नॉर्थ ईस्ट का है।”

‘ऑपरेशन सिंदूर’ में मिला माँ कामाख्या का आशीर्वाद: PM मोदी

पीएम मोदी ने अपने भाषण के दौरान कहा, “ऑपरेशन सिंदूर के बाद कल मेरी असम की पहली यात्रा थी। माँ कामाख्या के आशीर्वाद से ऑपरेशन सिंदूर बहुत बड़ी सफलता रही।” उन्होंने कहा, “आज माँ कामाख्या की इस धरती पर आकर मुझे एक अलग ही पवित्र अनुभूति हो रही है और ये भी सोने पे सुहागा है कि आज इस क्षेत्र में जन्माष्टमी भी मनाई जा रही है।”

उन्होंने आगे कहा, “लाल किले से मैंने कहा था, मुझे चक्रधारी मोहन याद आए। मुझे श्री कृष्ण याद आए, और मैंने भविष्य की सुरक्षा नीति में एक सुदर्शन चक्र का विचार लोगों के सामने रखा है।”

पाकिस्तान के साथ खड़ी होती है कॉन्ग्रेस: PM

पीएम मोदी ने कॉन्ग्रेस पर पाकिस्तान के साथ खड़े होने का आरोप लगाते हुए कहा, “जब कॉन्ग्रेस सत्ता में थी, तब पूरा देश आतंक से लहूलुहान होता था और कांग्रेस चुपचाप खड़ी रहती थी।”

उन्होंने कहा, “कॉन्ग्रेस के लोग हमारी सेना की बजाय आतंकियों को पालने वालों के एजेंडों को आगे बढ़ाते हैं। पाकिस्तान का झूठ कॉन्ग्रेस का एजेंडा बन जाता है। इसलिए आपको कॉन्ग्रेस के प्रति हमेशा सतर्क रहना चाहिए।”

पीएम मोदी ने किन परियोजनाओं की दी सौगात?

पीएम मोदी ने जिन परियोजनाओं का शिलान्यास किया उनमें दरांग मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, जीएनएम स्कूल और बीएससी नर्सिंग कॉलेज शामिल हैं। इसके अलावा उन्होंने गुवाहाटी रिंग रोड परियोजना और ब्रह्मपुत्र नदी पर कुरुवा-नरेंगी पुल परियोजना का शामिल हैं। इसके अलावा उन्होंने गोलाघाट के नुमालीगढ़ में नुमालीगढ़ रिफाइनरी लिमिटेड (एनआरएल) में असम बायोएथेनॉल संयंत्र का उद्घाटन किया है।

नाक फोड़ी, दाँत तोड़े और पुलिस को मारे लात-घूँसे: लंदन की सड़कों पर एक साथ उतरे 1.5 लाख अंग्रेज, जानें क्यों निकाली गई ‘यूनाइट द किंगडम’ रैली

ब्रिटेन के लंदन में शनिवार (13 सितंबर 2025) को 1.50 लाख से ज्यादा लोग ‘यूनाइट द किंगडम’ के बैनर लिए सड़क पर उतरे। इस रैली का नेतृत्व एंटी इमिग्रेशन एक्टिविस्ट टॉमी रॉबिन्सन ने किया। लंदन के व्हाइट हॉल के पास प्रदर्शनकारियों और पुलिस की झड़प भी हुई, जिसमें 26 पुलिसकर्मी घायल हो गए, इनमें 4 की हालत गंभीर है।

प्रदर्शनकारियों ने ब्रिटेन और अमेरिका के झंडे में लिपटे हुए ‘Stop the Boats’, ‘Send Them Home’ और ‘We Want Our Country Back’ जैसे नारे लगाए। असिस्टेंट कमिश्नर मैट ट्विस्ट ने कहा, “बहुत लोग शांतिपूर्ण तरीके से आए थे लेकिन बड़ी संख्या में लोग हिंसा फैलाने की नीयत से पहुँचे थे। उन्होंने पुलिस पर लात-घूँसों से हमला किया और सुरक्षा घेरे को तोड़ने की कोशिश की। कई पुलिसकर्मी के दाँत टूटे हैं और नाक भी फोड़ी गई। “

इस रैली में अमेरिकी एक्टिविस्ट चार्ली किर्क को भी याद किया गया। उनकी याद में एक मिनट का मौन रखा गया और बगपाइपर ने ‘अमेजिंग ग्रेस’ धुन बजाई।

‘यूनाइट द किंगडम’ प्रदर्शन की वजह क्या है ?

ब्रिटेन में ‘यूनाइट द किंगडम’ प्रदर्शन देश में अवैध अप्रवासन के खिलाफ किया जा रहा है। इस प्रदर्शन की माँग है कि अवैध प्रवासियों को देश से बाहर किया जाए। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस साल 28 हजार से ज्यादा प्रवासी इंग्लिश चैनल के रास्ते नावों से ब्रिटेन पहुँचे हैं।

टॉमी रॉबिन्सन ने बुलाई रैली

टॉमी रॉबिन्सन का असली नाम स्टीफन याक्सली-लेनन है। रॉबिन्सन ने इंग्लिश डिफेंस लीग की स्थापना की है और लगातार एंटी मुस्लिम और एंटी इमिग्रेशन मामले में आवाज उठा रहे हैं। रॉबिन्सन ने ही एंटी-इमिग्रेशन के खिलाफ लंदन में भीड़ जुटाई।

रॉबिन्सन ने भीड़ से कहा कि प्रवासियों को अदालत में ‘ब्रिटिश जनता, जो इस राष्ट्र के निर्माता हैं’ से अधिक अधिकार प्राप्त हैं। उनके आह्वान पर लाखों की संख्या में लोग सड़कों पर उतरे। इस दौरान टॉमी रॉबिन्सन ने एक्स पर पोस्ट में कहा, “आज लाखों लोग यूनाइटेड द किंगडम फ़्री स्पीच फ़ेस्टिवल में शामिल होने के लिए आ रहे हैं!!!!”

टॉमी रॉबिन्सन ने आगे लिखा, “कोई भी मेनस्ट्रीम मीडिया जो इसके अलावा कुछ भी छापता है, वह झूठ बोल रहा है। तो बेझिझक उनकी बकवास पर उन्हें फटकार लगाएँ और यह वीडियो उन्हें भेजें।”

ब्रिटेन में अप्रवासन बड़ा राजनीतिक मुद्दा

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ब्रिटेन में अप्रवासन एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनकर सामने आया है। इस मुद्दे से देश की लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था की चिंताए दब गई हैं क्योंकि देश में शरण के लिए काफी संख्या में लोग आ रहे हैं। साल 2025 में अब तक 28000 से ज्यादा प्रवासी छोटी नावों में चैनल पार करके पहुँच चुके हैं।

हिन्दी में 100/100 अंक लाने वाले छात्रों की तेजी से बढ़ रही तादाद: दुनियाभर में 60 करोड़ लोग करते हैं इसी भाषा का इस्तेमाल, जानें कैसे बढ़ रही लोकप्रियता

एक समय था जब हिंदी में पूरे अंक लाना एक बहुत बड़ी बात मानी जाती थी। बाकी विषयों में तो लोग टॉप कर लेते थे, लेकिन हिंदी में 100 में से 100 नंबर लाने वाले विद्यार्थी बहुत कम मिलते थे। अब यह तस्वीर पूरी तरह से बदल गई है। इसका एक उदाहरण राजस्थान है जहाँ हिंदी भाषा को लेकर छात्रों में उल्लेखनीय उत्साह देखा गया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस साल 2025 राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की परीक्षाओं में 3054 विद्यार्थियों ने हिंदी में पूरे 100 नंबर हासिल किए हैं। यह आँकड़ा चौंकाने वाला है, क्योंकि 2014 में सिर्फ 16 विद्यार्थियों ने यह उपलब्धि हासिल की थी। यानी 12 सालों में यह संख्या 191 गुना बढ़ गई है। यह छात्र सरकारी और प्राइवेट, दोनों तरह के स्कूलों से हैं।

हिंदी दिवस पर सम्मान समारोह

हिंदी दिवस के अवसर पर हर साल उन छात्रों को सम्मानित किया जाता है, जिन्होंने हिंदी में 100% अंक लाए हों। इसकी शुरुआत 2014 से हुई थी। इस साल यह समारोह रविवार (14 सितंबर 2025) को जयपुर के एसएमएस मेडिकल कॉलेज में होगा।

हालाँकि, इस बार एक नई चुनौती सामने आई है। 3000 से ज़्यादा छात्रों को एक साथ सम्मानित करना संभव नहीं था, इसलिए इस बार सिर्फ़ 342 विद्यार्थियों को ही बुलाया गया है।

हिंदी से बढ़ता जुड़ाव

हिंदी के व्याख्याता शशिभूषण शर्मा का कहना है कि हाल के सालों में छात्रों का रुझान हिंदी की तरफ बढ़ा है। सोशल मीडिया, ऑनलाइन कंटेंट, पत्रिकाओं और डिजिटल माध्यमों ने युवाओं को अपनी मातृभाषा से और जोड़ा है।

इस शानदार सफलता में सरकारी स्कूलों के छात्रों की भी बड़ी संख्या है, जबकि इन स्कूलों में हिंदी शिक्षकों की भारी कमी है। राज्य में 10वीं और 12वीं कक्षा के लिए 30,815 पद स्वीकृत हैं, लेकिन अभी 8,881 पद खाली हैं। हालाँकि, 2,400 नए पदों पर भर्ती चल रही है, फिर भी शिक्षकों की कमी बनी रहेगी।

इन सब चुनौतियों के बावजूद, हिंदी में छात्रों की यह सफलता बताती है कि अब हिंदी सिर्फ एक भाषा नहीं रही, बल्कि विद्यार्थी इसे गंभीरता से ले रहे हैं और इसमें टॉप पर पहुँच रहे हैं। यह दिखाता है कि हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है।

हिंदी दिवस: भाषा से बढ़कर भारतीय संस्कृति का सम्मान

हर साल 14 सितंबर को मनाया जाने वाला हिंदी दिवस सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि हमारी मातृभाषा के गौरव और सम्मान का प्रतीक है। यही वह दिन है जब 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिंदी को भारत की राजभाषा के तौर पर अपनाया था। तब से यह दिन हिंदी के महत्व को याद दिलाता आ रहा है।

हिंदी सिर्फ एक भाषा नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, सभ्यता और भावनाओं को दर्शाती है। यह भारत की विविधता में एकता का सबसे बड़ा उदाहरण है। देश में करोड़ों लोग इसे बोलते, पढ़ते और समझते हैं। हिंदी साहित्य ने प्रेम और शांति के संदेशों से दुनिया को हमेशा प्रभावित किया है।

विदेशों में भी हिंदी की धूम

आज के दौर में हिंदी सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसकी लोकप्रियता दुनियाभर में बढ़ रही है। अमेरिका, कनाडा, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, नेपाल, फिजी, मॉरिशस और सूरीनाम जैसे देशों में इसे पढ़ाया जा रहा है। कई विदेशी विश्वविद्यालय भी हिंदी भाषा और साहित्य के कोर्स चला रहे हैं।

यूट्यूब, फ़िल्मों और सोशल मीडिया ने भी हिंदी को दुनिया के कोने-कोने तक पहुँचाया है। अब तो हर भाषा की फ़िल्मों को हिंदी में डब किया जाता है, ताकि ज्यादा से ज़्यादा लोग उन्हें देख सकें।

दुनियाभर में 60 करोड़ से ज़्यादा लोग हिंदी बोलते हैं, जिस वजह से यह दुनिया की तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा बन गई है। हिंदी केवल भारत की आत्मा नहीं है, बल्कि विदेशों में भी भारतीय संस्कृति और पहचान का प्रतिनिधित्व कर रही है।

भारत ही नहीं, इन देशों में भी गूंजती है हिंदी

हिंदी अब सिर्फ भारत की भाषा नहीं रही, बल्कि यह एक वैश्विक भाषा बन चुकी है। 10 से भी ज़्यादा ऐसे देश हैं, जहाँ बड़ी संख्या में लोग हिंदी बोलते हैं। यह भाषा सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया के कई देशों में भारतीय संस्कृति और लोगों के दिलों से जुड़ी हुई है।

नेपाल: भारत का पड़ोसी देश नेपाल हिंदी को दूसरी सबसे लोकप्रिय भाषा मानता है। वहाँ की आधिकारिक भाषा नेपाली है, फिर भी लोग आसानी से हिंदी बोलते और समझते हैं। यहाँ मैथिली और भोजपुरी बोलने वाले भी अच्छी संख्या में हैं।

कनाडा: कनाडा में इंग्लिश और फ्रेंच के साथ-साथ हिंदी भी बोली जाती है। टोरंटो और वैंकूवर जैसे शहरों में हिंदी बोलने वालों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है।

मॉरीशस: मॉरीशस में लगभग एक-तिहाई लोग हिंदी बोलते हैं। भले ही यहाँ संसद में इंग्लिश और फ्रेंच का इस्तेमाल होता है और लोग क्रियोल भाषा बोलते हैं, फिर भी स्कूलों में हिंदी पढ़ाई जाती है और यह वहाँ की एक अहम भाषा है।

अमेरिका: अमेरिका में हिंदी बोलने वालों की संख्या 6 लाख से ज़्यादा है, जिससे यह वहाँ की 11वीं सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा बन गई है। यहाँ रहने वाले भारतीय प्रवासी इसे घरों में बोलकर ज़िंदा रखे हुए हैं।

हिंदी दिवस हमें यह याद दिलाता है कि हमें अपनी मातृभाषा पर गर्व करना चाहिए। हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम हिंदी को अपनाएँ, उसका सम्मान करें और आने वाली पीढ़ियों तक इसे गर्व के साथ पहुँचाएँ।

BEEF के लिए लार, आवारा कुत्तों पर प्यार: कौन हैं ये दोगलई दिखाने वाले ‘एनिमल लवर’, प्रधानमंत्री मोदी के बयान से फिर चर्चा में आए

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हाल में एक वीडियो वायरल हुई जिसमें वे पशु प्रेम के नाम पर पाखंड करने वाले लोगों पर तंज कसते दिखाई दे रहे हैं। इस वीडियो में वे कहते हैं कि कुछ दिन पहले उनकी मुलाकात एनिमल लवर्स से हुई थी, उन एनिमल लवर्स की विशेषता यह थी कि वह गाय को एनिमल ही नहीं मानते…।

प्रधानमंत्री मोदी ने यह बयान 12 सितंबर 2025 को विज्ञान भवन में दिया था। अब ये वीडियो जगह-जगह चर्चा में है। लोग एक बार फिर ‘एनिमल लवर्स’ पर सवाल उठा रहे हैं, जिन्हें आवारा कुत्तों की चिंता सताती है, लेकिन गाय को वो ‘माता’ तो दूर की बात है, उन्हें पशु भी नहीं मानते।

बीफ में फ्लेवर- कुत्ते के लवर

इस बात को आसान भाषा में समझने के लिए तथाकथित कॉमेडियन वीर दास के 2 ट्वीट देखिए। एक ट्वीट उस समय का है जब कोर्ट ने स्ट्रे डॉग्स को लेकर फैसला दिया था और दूसरा आज से 10 साल पहले का है। पुराने ट्वीट में वो मैगी को बीफ फ्लेवर लॉन्च करने की सलाह दे रहे हैं।

वीर दास का दोहरा रवैया- आवारा कुत्तों के लिए आवाज उठाते और BEEF देख लार टपकाते

दुखद बात ये है कि वीर दास अकेला ऐसा नाम नहीं है। पिछले दिनों ऐसे कई दोगले एनिमल लवर आपको स्ट्रे डॉग्स के लिए चिंता जताते हुए दिखे होंगे जो आम दिनों में गाय खाने को अपना अधिकार मानते हैं, उसके लिए बहस करते हैं। उन्हें चिंता इस बात की होती है कि लोग क्यों रेबीज जैसे मुद्दे को उजागर कर रहे हैं, दूसरी तरफ ये खुशी होती है कि डिनर में वह मटन-चिकन खाएँगे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ये मुद्दा इसीलिए उठाया गया ताकि समाज का एक वर्ग ये समझ सके कि ‘एनिमल लवर’ कहलाना तब उपलब्धि है जब हर पशु के प्रति एक प्रकार का स्नेह हो। न कि खुद को पशु प्रेमी बताकर पशुओं के प्रति ही भेदभाव करना।

प्रधानमंत्री मोदी अक्सर गायों के साथ देखे जाते हैं, उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होती रही हैं, जहाँ वे गायों को खाना खिलाते और दुलारते दिखते हैं। हिंदू धर्म में गाय को पवित्र माना जाता है और ‘गौ माता‘ के रूप में पूजा जाता है।

गौ माता से पीएम मोदी का रिश्ता

मोदी सरकार ने 2014 से गायों की सुरक्षा के लिए कई योजनाएँ भी शुरू की हैं। 2019 में ‘राष्ट्रीय कामधेनु आयोग’ (RKA) की स्थापना की गई थी। यह आयोग मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के तहत काम करता है। इसका मुख्य उद्देश्य गायों और उनकी नस्लों का संरक्षण, सुरक्षा और विकास करना है।

प्रधानमंत्री का यह बयान दिखाता है कि वे पशु प्रेम को लेकर कुछ लोगों के दोहरे रवैये पर कटाक्ष कर रहे थे। एक तरफ लोग कुत्तों के लिए आवाज उठाते हैं, लेकिन दूसरी तरफ वे अन्य जानवरों को उतनी अहमियत नहीं देते।

आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश और विवाद

कुछ समय पहले ही, दिल्ली में आवारा कुत्तों को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया था। सुप्रीम कोर्ट ने 11 अगस्त 2025 को एक आदेश जारी किया, जिसमें दिल्ली-NCR के सभी आवारा कुत्तों को पकड़कर स्थायी रूप से शेल्टरों में रखने का निर्देश दिया गया। कोर्ट ने यह आदेश कुत्तों के काटने और रेबीज के बढ़ते मामलों को देखते हुए दिया था, जिसमें बच्चे और बुजुर्ग भी शामिल थे।

इस आदेश का पशु अधिकार कार्यकर्ताओं और कई मशहूर हस्तियों ने कड़ा विरोध किया। उन्होंने इस आदेश को ‘अवैज्ञानिक’ बताया और कहा कि यह पशु जन्म नियंत्रण नियमों के खिलाफ है। इस विरोध को देखते हुए, चीफ जस्टिस ने मामले को तीन-न्यायाधीशों की पीठ के पास भेज दिया।

नई पीठ ने पुराने आदेश में बदलाव किया और निर्देश दिया कि कुत्तों को नसबंदी और टीकाकरण के बाद उसी जगह वापस छोड़ा जाए, जहाँ से उन्हें पकड़ा गया था। इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी कहा कि सार्वजनिक सड़कों पर कुत्तों को खाना खिलाने की अनुमति नहीं होगी, बल्कि इसके लिए नगर निगमों को विशेष ‘फीडिंग ज़ोन’ बनाने होंगे।

कनाडा ने पन्नू के करीबी इंद्रजीत गोसल को दी सुरक्षा, हिंदू मंदिर पर हमले का आरोपी है खालिस्तानी आतंकी: बिना सबूत भारत पर लगाए हत्या की साजिश के आरोप

कनाडा लगातार खालिस्तानी तत्वों को पनाह और सहयोग देता रहा है। इसी कड़ी में ताजा मामला खालिस्तानी आतंकी इंद्रजीत गोसल का है। कनाडाई प्रशासन ने हाल ही में गोसल को उसकी जान पर मंडरा रहे कथित खतरे से बचाने के लिए सुरक्षा उपलब्ध कराई है।

शुक्रवार (11 सितंबर 2025) को ग्लोबल न्यूज को दिए इंटरव्यू में गोसल ने दावा किया कि रॉयल कैनेडियन माउंटेड पुलिस (RCMP) ने औपचारिक तौर पर उसे चेतावनी दी है कि उसकी जान को गंभीर खतरा है। गोसल के अनुसार, पुलिस ने उसे बीते महीने भी चेताया था कि आने वाले हफ्तों में उसकी हत्या हो सकती है। 8 सितंबर को उसे फिर से ड्यूटी-टू-वार्न नोटिस जारी किया गया।

गोसल का कहना है कि वह खालिस्तान जनमत-संग्रह का आयोजक है और इसी कारण उसकी जान को भारत सरकार के एजेंटों और प्रॉक्सी से खतरा है। पुलिस ने उसे गवाह संरक्षण कार्यक्रम में शामिल होने की पेशकश की, लेकिन गोसल ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि इससे उसकी सक्रियता प्रभावित होगी।

भारत पर आरोप, कनाडाई पुलिस का संरक्षण

गोसल ने यह भी आरोप लगाया कि उसकी जान को जो भी खतरा है, वह भारत सरकार से ही जुड़ा है। उसने कहा, “ये सब भारत सरकार से आता है। आदेश वहीं से दिए जाते हैं।” गोसल ने कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी से माँग की कि भारत के राजनयिकों और खुफिया एजेंसियों की गतिविधियों के खिलाफ तुरंत कार्रवाई की जाए।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, 2022 से ही कनाडाई पुलिस खालिस्तानी तत्वों को इस तरह के ड्यूटी-टू-वार्न नोटिस जारी कर रही है। अक्टूबर 2024 में RCMP ने भारत पर आरोप लगाया था कि कनाडा में खालिस्तानी आतंकियों पर हुए हमलों के पीछे भारतीय एजेंसियों का हाथ है। RCMP ने कहा था कि भारतीय राजनयिक जानकारी जुटाकर RAW को सौंपते हैं, जिसके जरिए संगठित अपराधियों से हमले करवाए जाते हैं।

कौन है इंद्रजीत गोसल?

इंद्रजीत गोसल कनाडा के ब्रैम्पटन में रहता है और खालिस्तानी आतंकी संगठन सिख्स फॉर जस्टिस (SFJ) का प्रमुख आयोजक है। भारत में यह संगठन प्रतिबंधित है। गोसल पर नवंबर 2024 में ग्रेटर टोरंटो एरिया के ब्रैम्पटन में एक हिंदू मंदिर पर हमले का आरोप लगा था। हालांकि, स्थानीय पुलिस ने उसे कुछ शर्तों के साथ रिहा कर दिया।

गोसल, 2023 में मारे गए खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर का उत्तराधिकारी माना जाता है। निज्जर की हत्या को कनाडाई सरकार ने बिना सबूत भारत पर थोप दिया था, जिससे दोनों देशों के रिश्तों में खटास आ गई। गोसल, SFJ के जनरल काउंसल और भारत में घोषित आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू का करीबी माना जाता है। उसने पहले भी कहा था कि वह खालिस्तान की स्थापना के लिए जान देने से नहीं डरता।

भारत-कनाडा रिश्तों की पृष्ठभूमि

पिछली ट्रूडो सरकार के दौरान भारत-कनाडा रिश्ते बेहद खराब हुए थे। ट्रूडो ने भारत पर निज्जर की हत्या में शामिल होने का आरोप लगाया था, जिसके बाद दोनों देशों ने एक-दूसरे के राजनयिकों को निकाल दिया।

हालांकि, इस साल प्रधानमंत्री बने मार्क कार्नी ने आर्थिक और व्यवहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए रिश्तों को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश शुरू की है, लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि खालिस्तानी तत्वों को रोकने के लिए अब तक कनाडा ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया है।

मोदी सरकार के प्रयासों से ‘राजभाषा’ को मिल रहा विस्तार, PM ने हिंदी को वैश्विक मंचों पर बनाया भारत की आवाज; जानें क्यों 14 सितंबर को मनाया जाता है ‘हिंदी दिवस’

“राष्ट्रीय व्यवहार में हिंदी को काम में लाना देश की एकता और
उन्नति के लिए आवश्यक है।”
महात्मा गाँधी

हिंदी भारत की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी और भारत में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए 14 सितंबर को राष्ट्रीय हिंदी दिवस मनाया जाता है। देश में भाषा को लेकर बेशक विवाद होते हों लेकिन हिंदी को हमेशा एक ऐसी भाषा के तौर पर विकसित किए जाने का प्रयास होता रहा है जो भारत को एकता के सूत्र में जोड़ सके।

14 सितंबर को ही क्यों मनाया जाता है हिंदी दिवस?

आजादी के बाद भारत का अपना संविधान बनाया जाना था और उसी दौर में भाषा को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई थी। राजभाषा विभाग की त्रैमासिक पत्रिका ‘राजभाषा भारती’ के अप्रैल-जून 1995 के अंक के मुताबिक, 14 सितंबर 1946 को संविधान सभा की नियम समिति मे यह फैसला हुआ कि संविधान सभा का कामकाज हिंदुस्तानी या अंग्रेजी में किया जाना चाहिए।

इसके बाद जब 14 जुलाई 1947 को जब संविधान सभा का सत्र शुरू हुआ, तब दूसरे ही दिन यह संशोधन आया कि हिंदुस्तानी के स्थान पर हिंदी शब्द रखा जाए। 16 जुलाई को इस पर विचार शुरू हुआ और मतदान के दौरान हिंदी के पक्ष में 63 वोट और हिंदुस्तानी के पक्ष में 32 वोट पड़े।

बहुभाषी होने के चलते कई समस्याएँ भी आ रही थीं। इस बीच 2 सितंबर 1949 को संविधान सभा के सदस्य एनजी आयंगर और केएम मुंशी की सहमति से एक फॉर्मूला पेश किया गया। इसमें कहा गया कि हिंदी को संघ की आधिकारिक भाषा और देवनागरी को उसकी लिपि मना जाए। साथ ही, अदालतों, विधेयकों और अधिनियमों आदि की भाषा अंग्रेजी में ही रखने की बात कही गई थी।

इस बार वाद विवाद चलता रहा, उधर संविधान सभा में भाषा संबंधी उपबंधों को लेकर चर्चा होनी थी। यह चर्चा 12 सितंबर से 14 सितंबर तक चली। 12 सितंबर को मुंशी-आयंगर फॉर्मूले से जुड़े संशोधन पेश किए गए।

13 तारीख की बहस में श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पंडित जवाहर लाल नेहरू जैसे सदस्यों ने भाग लिया और 14 सितंबर 1949 को शाम 6 बजे तक हिंदी को भारत की राजभाषा बनाने की स्वीकृति दे दी गई। संविधान निर्माताओं ने तय किया कि अनुच्छेद 343 के तहत देवनागरी में लिखी गई हिंदी भाषा, भारत की राजभाषा होगी।

1953 में पहली बार 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाने का फैसला लिया गया था और तब से यह सिलसिला अनवरत जारी है।

हिंदी वर्णमाला का विकास

संविधान में हिंदी की स्थिति?

संविधान के भाग 17 में राजभाषा का जिक्र किया गया है। इसके अध्याय 1 (संघ की भाषा) के तहत अनुच्छेद 343 (1) में कहा गया है, “संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी, संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा।”

वहीं, संविधान के अनुच्छेद 351 में हिंदी भाषा के विकास के लिए निर्देश की बात कही गई है। इसमें लिखा है, “संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे जिससे वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके…उसके शब्द-भंडार के लिए मुख्यतः संस्कृत से और गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे।”

इसके अलावा अनुच्छेद 120 में ‘संसद में प्रयोग की जाने वाली भाषा’ को लेकर कहा गया है कि भाग 17 में किसी बात के होते हुए भी अनुच्छेद 348 के उपबंधों के अधीन रहते हुए संसद में कार्य हिंदी में या अंग्रेजी में किया जाएगा। वहीं, अनुच्छेद 210 में कहा गया है, “भाग 17 में किसी बात के होते हुए भी, किंतु अनुच्छेद 348 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, राज्य के विधान-मंडल में कार्य राज्य की राजभाषा या राजभाषाओं में या हिंदी में या अंग्रेजी में किया जाएगा।”

हिंदी को कैसे आगे बढ़ा रही है मोदी सरकार?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यूँ तो खुद गुजराती भाषी हैं लेकिन उन्होंने हिंदी को ना केवल देश में आगे बढ़ाने के लिए बल्कि वैश्विक स्तर पर उसका सम्मान बढ़ाने के लिए कई काम किए हैं। किसी के हस्ताक्षर उसकी पहचान होते हैं और पीएम मोदी अपने साइन हिंदी में ही करते हैं।

आज दुनिया के कई राष्ट्राध्यक्ष सोशल साइट्स पर भारत से जुड़े संवाद के लिए हिंदी का इस्तेमाल करते हैं। संयुक्त राष्ट्र भी पिछले कई वर्षों से हिंदी में लोगों को जानकारी दे रहा है।

भारतीय भाषाओं की समृद्धि को लेकर पीएम मोदी का लगातार आग्रह रहा है। पिछले दिनों भी स्वतंत्रता दिवस पर अपने संबोधन के दौरान उन्होंने लाल किले से कहा था, “हमारी भाषाएँ जितनी विकसित होंगी, हमारी सभी भाषाएँ जितनी समृद्ध होगी, हमारे नॉलेज के सिस्टम को भी उतना ही बल मिलने वाला है।”

वैश्विक मंचों पर हिंदी को बढ़ावा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 के बाद से देश के भीतर तो हिंदी को सरकारी कामकाज की भाषा बनाने पर जोर दिया ही है। इसके साथ ही वह संयुक्त राष्ट्र, जी-20 सम्मेलन या विदेशों में प्रवासी सम्मेलन हों, उन्होंने वैश्विक मंचों पर हिंदी में अपनी बात रही है।

सितंबर 2014 में जब वह पहली बार बतौर प्रधानमंत्री संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित कर रहे थे तो उन्होंने हिंदी में ही अपना भाषण दिया। दुनिया के तमाम राष्ट्राध्यक्षों के सामने वह मजबूती से हिंदी में अपनी बात रखते नजर आते हैं।

दुनियाभर में हिंदी को लेकर लोगों का जुनून बढ़ रहा है। दुनिया की कई बड़ी और नामी यूनिवर्सिटीज़ में हिंदी पढ़ाई जा रही है। हाल ही में रूस के मंत्री कॉन्स्टेंटिन मोगिलेव्स्की ने माना था कि उनके देश में हिंदी की लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है।

नई शिक्षा नीति से हिंदी को बढ़ावा

मोदी सरकार ने नई शिक्षा नीति (2020) के तहत हिंदी को विस्तार देने की कोशिश की है। इस नीति में तीन भाषाओं का फॉर्मूला दिया गया है। नीति में इस फॉर्मूले को इस तरह डिजाइन किया गया है कि इसमें तीन में से दो भारतीय भाषाओं के सीखने पर जोर रहे। इस फॉर्मूले के तहत हिंदी का दायरा और बढ़ गया है। इसमें क्षेत्रीय भाषा और अंग्रेजी के अलावा हिंदी को जगह मिलने की अधिक संभावनाएँ हैं।

हिंदी में मेडिकल-इंजीनियरिंग की पढ़ाई

मोदी सरकार ने प्रोफेशनल कोर्सेज को भी हिंदी भाषा में पढ़ाने पर जोर दिया है। जिसके तहत सरकार द्वारा मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई हिंदी भाषा में कराई जा रही है। मध्य प्रदेश के जबलपुर में देश का पहला हिंदी-माध्यम MBBS कॉलेज स्थापित किया जा रहा है और यह संस्थान 2027–28 शैक्षणिक सत्र से शुरू होने की उम्मीद है।

‘केंद्रीय हिंदी समिति’ का पुनर्गठन और ‘हिंदी शब्द सिंधु’ शब्दकोश का निर्माण

सरकारी स्तर पर ‘केंद्रीय हिंदी समिति’ का पुनर्गठन किया गया, जिसकी अध्यक्षता पीएम मोदी स्वयं कर रहे हैं। इस समिति ने हिंदी साहित्य को बढ़ावा देते हुए ‘हिंदी शब्द सिंधु’ शब्दकोश का निर्माण शुरू किया, जो दुनिया की सबसे बड़ी डिक्शनरी बनने जा रही है।

2024 में गृह मंत्री अमित शाह ने हिंदी दिवस पर ‘भारतीय भाषा अनुभाग’ की स्थापना की घोषणा की, जो हिंदी के साथ अन्य भारतीय भाषाओं के बीच समन्वय स्थापित करेगा। इसके अलावा विभिन्न शहरों में राजभाषा सम्मेलनों के आयोजन के जरिए हिंदी को संपर्क भाषा बनाने की दिशा में लगातार काम किया जा रहा है।

डिजिटल तरीके से हिंदी सीखने की सुविधा

मोदी सरकार ने डिजिटल युग में भी हिंदी सीखने को आसान बनाने के लिए लर्निंग इंडियन लैंग्‍वेज विद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (लीला) प्लैटफॉर्म लॉन्च किया है। इस पर लोग खेल-खेल में हिंदी भाषा सीख रहे हैं और यह नए लोगों को हिंदी के पास लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इसके अलावा ‘भाषिनी’ AI प्लेटफॉर्म भी लॉन्च किया गया है, यह लाइव अनुवाद की सुविधा के जरिए हिंदी को अन्य भाषाओं से जोड़ रहा है।

2024 में सरकार ने जारी किया था स्मारक डाक टिकट

पिछले वर्ष हिंदी भाषा को देश की आधिकारिक भाषा के रूप में अपनाए जाने की 75वीं वर्षगाँठ के मौके पर ‘हीरक जयंती’ मनाई गई थी। इस मौके पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक स्मारक डाक टिकट जारी किया था। इसे देश को एकजुट करने और विविध भाषाई समुदायों की सेवा करने में हिंदी की स्थाई भूमिका को श्रद्धांजलि बताया गया था।

ग्लोबल होती हिंदी

आज दुनिया भर में हिंदी भाषा की धूम मच रही है। एथ्नोलॉग की रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में हिंदी दुनिया की तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा बन चुकी है, जिसमें 609 मिलियन से अधिक वक्ता शामिल हैं। यह आँकड़ा भारत की बढ़ती सॉफ्ट पावर को भी दिखाता है।

दक्षिण एशिया के अलावा, हिंदी अब अमेरिका, मॉरीशस, फिजी, नेपाल और खाड़ी देशों में भी गूँज रही है। अमेरिका में करीब 6 लाख लोग हिंदी बोलते हैं, जहाँ यह 11वीं सबसे लोकप्रिय भाषा है। फिजी में हिंदी आधिकारिक भाषा का दर्जा रखती है। वहीं, मॉरीशस, नेपाल, कनाडा, ब्रिटेन में भी हिंदी भाषियों की संख्या बढ़ रही है।

डुओलिंगो लैंग्वेज रिपोर्ट 2024 के मुताबिक, दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में हिंदी सीखने वालों की संख्या में शानदार बढ़ोतरी दर्ज की गई है। विश्वभर के युवा भारत की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने के लिए हिंदी को अपना रहे हैं।

2011 की जनगणना बताती है कि भारत में हिंदी समझने और बोलने वाले लोगों की संख्या करीब 60 करोड़ हैं। भारत के बाहर भी बड़ी संख्या में लोग हिंदी बोलते समझते हैं। हालाँकि, गैर हिंदी भाषी राज्यों द्वारा मुख्यत: राजनीतिक हमलों के तहत हिंदी सीखने को थोपने की साजिश बताने की कोशिश की जाती है।

वो लोग ये भूल जाते हैं कि जिन पर वह हिंदी थोपने का आरोप लगा रहे हैं, वे खुद गैर हिंदी भाषी हैं। उनके लिए भाषा संवाद का एक माध्यम है और देश में सबसे अधिक बोले जाने वाली भाषा होने के नाते हिंदी ही संवाद की भाषा बनने के लिए मौजूदा समय में सबसे उपयुक्त दिखाई देती है। हिंदी को विरोध के नजरिए से देखने के बाद संवाद स्थापित करने के लिए एकता के सूत्र के तौर पर देखे जाने की जरूरत है।

गौर करने वाली बात ये भी है कि आजादी के पहले से लेकर अब तक हिंदी को राष्ट्र की भाषा बनाने के लिए आग्रह करने वाले बहुत लोग गैर हिंदी भाषी रहे हैं। केशव वामा से लेकर महात्मा गाँधी तक और सुभाष चंद्र बोस से लेकर माधव सदाशिव गोलवलकर तक, गैर हिंदी भाषी क्षेत्रों से आने वाले लोगों ने हिंदी को आगे बढ़ाया है।

कलकत्ता में जन्मे महर्षि अरविंद ने तो यहाँ तक कहा था,

“भारत के विभिन्न प्रदेशों के बीच हिंदी प्रचार के द्वारा एकता स्थापित करने वाले लोग सच्चे भारतबंधु हैं।”

नेपाल में हिंसक प्रदर्शनों के बाद सामान्य होता जनजीवन, आगजनी-तोड़फोड़ के बाद रंगाई-पुताई में जुटे GenZ: कर्फ्यू हटा, Discord ऐप से चुनी गईं सुशीला कार्की से बदलाव की उम्मीद

नेपाल में भ्रष्टाचार के खिलाफ हुए भीषण विरोध प्रदर्शनों के बाद अब हालात धीरे-धीरे सामान्य होने लगे हैं। शनिवार (13 सितंबर 2025) को कर्फ्यू भी हटा दिया गया और अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में सुशीला कार्की के शपथ लेने के बाद काठमांडू में जिंदगी सामान्य पटरी पर लौटती दिखाई दी। दुकानों, बाजारों और सड़कों पर फिर से हलचल शुरू हो गई है।

गौरतलब है कि पिछले कुछ दिनों में हुई हिंसा के कारण सेना को सड़कों पर तैनात किया गया था लेकिन अब सेना की मौजूदगी कम की जा रही है। इस विरोध प्रदर्शन के दौरान संसद भवन, सुप्रीम कोर्ट, प्रधानमंत्री कार्यालय को आग लगाई गई और सरकार गिरा दी गई। लेकिन अब युवाओं ने सड़कों और डिवाइडरों की रंगाई-पुताई तक खुद से करना आरंभ कर दिया है।

यह विरोध 2008 में गृहयुद्ध और राजशाही के अंत के बाद से सबसे बड़ा बताया जा रहा है। इसमें अब तक कम से कम 51 लोगों की जान जा चुकी है, जिनमें एक भारतीय नागरिक और तीन पुलिसकर्मी भी शामिल हैं।

शुक्रवार (12 सितंबर 2025) की शाम, 73 वर्षीय पूर्व चीफ जस्टिस सुशीला कार्की ने नेपाल की पहली महिला प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। उन्हें एक अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में नियुक्त किया गया है, जिनका मुख्य काम है शांति बहाल करना और जनता की माँगों, जैसे भ्रष्टाचार खत्म करना और जवाबदेह शासन स्थापित करना, को पूरा करना।

उनकी नियुक्ति को जनता और खासकर युवाओं का बड़ा समर्थन मिला है। हजारों युवा कार्यकर्ताओं ने Discord ऐप पर चर्चा की और कार्की को अगला नेता चुना। सेना प्रमुख जनरल अशोक राज सिग्देल और राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने मिलकर इस नियुक्ति को अंतिम रूप दिया।

कई लोगों को कार्की से बदलाव की उम्मीद है। सामाजिक कार्यकर्ता सुरज भट्टाराई ने कहा, “नेपाल को उसकी पहली महिला प्रधानमंत्री मिल गई है। हमें भरोसा है कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़े कदम उठाएँगी।”

इसी तरह काठमांडू की एक दुकानदार दुर्गा मगर ने कहा, “चाहे Gen Z हो या कोई और, अब यह सब रुकना चाहिए। जो भी बदलाव लाए, बस देश में शांति चाहिए।” हालाँकि, भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करना आसान नहीं होगा। सुरक्षा की दृष्टि से भी चुनौती बड़ी है, क्योंकि हिंसा के दौरान करीब 12,500 कैदी जेल से फरार हो गए हैं।

सरकार ने शनिवार (13 सितंबर) को कर्फ्यू हटाने और राहत के कदम उठाने की घोषणा की। सरकारी इमारतों की सफाई और मरम्मत का काम शुरू हो गया है, जिन्हें हाल ही में प्रदर्शनकारियों ने जला दिया था।

सबसे ज्यादा नुकसान काठमांडू के हिल्टन होटल को हुआ है, जिसे 8 अरब से ज्यादा की क्षति पहुँची है। इसके अलावा नेपाल सरकार ने विदेशी नागरिकों की मदद के लिए अस्थायी उपाय किए हैं, जो कर्फ्यू के चलते नेपाल में फँसे हुए थे।