उत्तर प्रदेश के बरेली के थाना किला क्षेत्र में एक महिला ने आरोप लगाया है कि रेहान नामक शख्स ने अपना नाम बिट्टू बताकर पहले उससे दोस्ती की और बाद में निकाह और धर्म परिवर्तन का दबाव बनाने लगा। मना करने पर महिला पर जानलेवा हमला कर उसके कान और उँगलियाँ काट दी। आरोपित ने महिला की चार साल की बच्ची को अगवा करने की कोशिश भी की।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पीड़िता ने बताया कि करीब 6-7 महीने पहले वह कोहरापीर पुलिया स्थित रेहान की दुकान पर मिक्सी ठीक कराने गई थी। इस दौरान उसने अपना नाम बिट्टू बताया था। यहाँ उसने महिला उसका नंबर ले लिया और फिर लगातार फोन कर बातें करने लगा। यह बातचीत धीरे-धीरे प्रेम संबंधों में बदलने लगी।
दोनों के बीच प्रेम संबंध के कुछ दिन बाद महिला को पता चला कि वह मुस्लिम है और उसका नाम रेहान है, तो उसने आरोपित से दूरी बनाने की कोशिश शुरू कर दी। रेहान के इस काले कारनामे में साथ देने के लिए पूरा परिवार उसके साथ आ गया।
रेहान की अम्मी, बहन-बहनोई ने महिला को धोखे से घर बुला लिया। इसके बाद सभी ने मिलकर उस पर दबाव बनाया कि वह धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम बन जाए और रेहान से निकाह करे। मना करने पर पूरे परिवार को जान से मारने की धमकी दी गई।
शनिवार (6 सितंबर) को पीड़िता अपनी चार साल की बेटी के साथ बाजार जा रही थी, तभी रेहान ने पीछे से आकर उस पर लोहे की रॉड और धारदार हथियार से हमला कर दिया। रेहान ने उसका कान और उसकी उँगलियाँ भी काट दी।
लहूलुहान होकर महिला सड़क पर गिर गई, इस बीच आरोपित ने उसकी मासूम बच्ची को भी उठाकर ले जाने की कोशिश की, लेकिन बच्ची की चीख सुनकर आसपास के लोगों ने उसे छुड़ा लिया।
महिला का कहना है कि वह दो दिन तक पुलिस थाने के चक्कर काटती रही, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। अंत में मामले की जानकारी मिलने के बाद हिंदू संगठनों ने थाने पहुँचकर मामले की शिकायत की, जिसके बाद पुलिस ने रेहान सहित कुल 7 लोगों पर पर मुकदमा दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है। मुख्य आरोपित रेहान फिलहाल फरार बताया जा रहा है।
छत्तीसगढ़ के बालोद में धर्मांतरण का मामला सामने आया है। रविवार (7 सितंबर 2025) को गुंडरदेही धमतरी रोड पर एक घर में ईसाईयों की प्रार्थना सभा चल रही थी। इसमें हिन्दुओं का धर्मांतरण किया जा रहा था। पूछताछ के बाद पास्टर समेत 8 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। वहीं एक और मामले में पत्नी ने अपने पति पर ईसाइयत स्वीकार करने के लिए दबाव डालने का आरोप लगाया। पुलिस ने मामला दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है।
40-50 हिन्दुओं के धर्मांतरण की कोशिश
बालोद के गुंडरदेही धमतरी मेन रोड पर पंचराम नाम के व्यक्ति के घर पर ईसाईयों की प्रार्थना सभा चल रही थी। हिन्दू संगठनों का कहना है कि प्रार्थना सभा की आड़ में 40-50 हिन्दुओं का धर्मांतरण कराया जा रहा था। इसकी खबर मिलने के बाद संगठन के लोग घटनास्थल पर पहुँच गए और जमकर बवाल किया। पुलिस के साथ उनकी बहस भी हुई। पुलिस करीब 22 लोगों को थाने लेकर आई और पूछताछ के बाद पास्टर समेत 8 लोगों को गिरफ्तार कर लिया।
गरीब- बीमार लोग टारगेट पर- वीएचपी नेता
हिन्दू संगठनों का कहना है कि बीमार और गरीब हिन्दुओं को चमत्कार दिखा कर फुसलाया जाता है। उन्हें आर्थिक मदद करने का भरोसा दिया जाता है और धर्मांतरण के लिए बरगलाया जाता है। विश्व हिन्दू परिषद के जिलाध्यक्ष बलराम गुप्ता का कहना है कि यहाँ धर्मांतरण का रैकेट चल रहा है। उन्होंने कहा कि जिस घर में रविवार को प्रार्थना हो रही थी, वहाँ पादरी को बैठने के लिए खास आसन बनाया गया था। लोगों को हर तरीके से प्रभावित करने की कोशिश हो रही थी। उन्होंने कहा कि पुलिस धर्मांतरण को रोकने के लिए सख्त एक्शन ले, वरना संगठन धर्मांतरण के खिलाफ आंदोलन करेगा।
धर्मांतरण के लिए पति ने डाला दबाव- महिला
वहीं एक और मामले में एक महिला ने अपने पति पर जबरन ईसाइयत स्वीकार करने के लिए दबाव डालने का आरोप लगाया। सिविल लाइन के भारतीय नगर में रहने वाली महिला अपने बेटे के साथ थाने पहुँची और पति के खिलाफ मामला दर्ज करवाया। महिला का कहना है कि उसका पति पूरे परिवार को ईसाईयों के प्रार्थना सभा में ले जाना चाहता है। मना करने पर घर पर ही ईसाईयों की तरह प्रार्थना करने का दबाव डालता है। वह चाहता है कि पूरा परिवार ईसाई बने। पुलिस ने केस दर्ज कर लिया है और पूरे मामले की जाँच करने की बात कही है।
कर्नाटक के मांड्या में रविवार (7 सितंबर 2025) को गणपति विसर्जन के दौरान जमकर बवाल हुआ है। इस दौरान हिंसक झड़प और शोभायात्रा पर पथराव भी हुआ, जिसमें कम-से-कम 8 लोगों के गंभीर रूप से घायल होने की खबर है। वहीं, कर्नाटक के ही शिवमोग्गा में विसर्जन के दौरान दो मुस्लिम युवकों द्वारा भगवान गणेश की प्रतिमा पर थूके जाने का मामला सामने आया है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, मांड्या में गणपति के विसर्जन के लिए निकाली जा रही शोभायात्रा पर जब एक मस्जिद के पास पहुँची तो उस पर मस्जिद से पथराव कर दिया गया। इसके बाद शोभायात्रा में शामिल लोग भी भड़क गए और दोनों समुदायों के बीच हालात तनावपूर्ण हो गए। दोनों तरफ से पथराव हुआ और इसमें 8 लोग घायल हो गए।
गणपति विसर्जन करने के लिए जा रहे लोगों ने भगवान गणेश की प्रतिमा पर भी हमला किए जाने का आरोप लगाया है। झड़प के बाद मौके पर भारी पुलिस बल की तैनाती की गई है और घायलों को अस्पताल में भर्ती करा दिया है। वहीं, पुलिस ने हिंसा और पथराव मामले में कार्रवाई करते हुए 21 लोगों को गिरफ्तार कर लिया है। वहीं, विवाद के बाद पूरे इलाके में धारा 163 लागू कर दी गई है।
पिछले साल भी मांड्या में हुआ था बवाल
मांड्या जिले में गणपति विसर्जन के दौरान साम्प्रदायिक झड़पें कोई नई बात नहीं हैं। वर्ष 2024 में नागमंगला में गणेश विसर्जन जुलूस के दौरान दो समुदायों के बीच खूनी संघर्ष हुआ था, जिसमें जमकर पथराव और हिंसा देखने को मिली थी। इस दौरान कई दुकानों और वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया था, जिससे पूरे इलाके में दहशत का माहौल बन गया।
हालात बिगड़ने पर पुलिस को धारा 144 लागू करनी पड़ी और अतिरिक्त बल की तैनाती करनी पड़ी। तब 50 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया था। इससे पहले भी गणपति विसर्जन के अवसर पर इसी तरह की झड़पें हो चुकी थीं, जो इस क्षेत्र में सांप्रदायिक तनाव की लगातार मौजूदगी को दर्शाती हैं।
शिवमोग्गा में गणेश प्रतिमा पर थूका
इसके अलावा, शिवमोग्गा जिले के सागर नगर में जय भुवनेश्वरी युवा संघ द्वारा निकाले गए गणेश विसर्जन जुलूस के दौरान एक घटना ने पूरे इलाके में तनाव फैला दिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, जब जुलूस जन्नत नगर की ओर बढ़ रहा थ तभी दूसरी समुदाय के दो बच्चों ने भगवान गणेश की प्रतिमा पर कथित रूप से थूक दिया।
इस घटना के बाद लोगों में गुस्सा और आक्रोश फैल गया। जुलूस में शामिल भक्तों ने प्रशासन से घटना में शामिल लोगों पर कड़ी कार्रवाई की माँग की है। इस दौरान पुलिस मौके पर पहुंची और प्रदर्शनकारियों को आश्वासन दिया कि उचित कानूनी कदम उठाए जाएंगे। पुलिस ने लोगों से क्षेत्र में शांति और सौहार्द बनाए रखने की अपील की है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने लव जिहाद और धर्मांतरण को सामाजिक सद्भाव के लिए गंभीर खतरा बताया है। RSS ने ऐसी घटनाओं को रोकने पर जोर दिया और समस्या के समाधान पर बात की।
RSS के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने कहा, “जबरदस्ती, प्रलोभन या धोखे से किया गया धर्मांतरण उचित नहीं है। इससे समाज में अशांति फैल सकती है। इन्हें हर हाल में रोकना ही हमारा लक्ष्य है। इस समस्या का समाधान एक लंबी प्रक्रिया है लेकिन हमें विश्वास है कि जल्द ही अनुकूल परिस्थितियों बनेंगी।”
यह बातें RSS के जोधपुर में आयोजित तीन दिवसीय अखिल भारतीय समन्वय बैठक के समापन के बाद पत्रकार वार्ता के दौरान कही गई। इस दौरान शिक्षा, सामाजिक चुनौतियों, आंतरिक सुरक्षा और संघ की आने वाली योजनाओं पर विस्तार से जानकारी दी गई।
आंबेकर ने सबसे पहले चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) पहल का समर्थन किया। उन्होंने कहा, “स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की रीढ़ हैं और इस तरह की पहल मतदाता सूची की पारदर्शिता और विश्वसनीयता बढ़ाती है।” संघ ने देशव्यापी स्तर पर SIR को लागू करने की जरूरत पर जोर दिया।
बैठक में शिक्षा नीति पर भी चर्चा हुई। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) को लागू करने में आ रही चुनौतियों और उसके अनुभव साझा किए गए। संघ से जुड़े विभिन्न शैक्षिक संगठनों ने कहा कि प्राथमिक से उच्च शिक्षा तक मातृभाषा को बढ़ावा देने और भारतीय भाषाओं को सम्मान दिलाने के प्रयास जारी हैं। किताबों का पुनर्लेखन, शिक्षक प्रशिक्षण और भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा में शामिल करने पर भी काम चल रहा है। आंबेकर ने कहा कि अंग्रेजी का विरोध नहीं है लेकिन भारतीय भाषाओं को शिक्षा और शासन में उचित स्थान मिलना चाहिए।
बैठक में देश की सामाजिक परिस्थितियों पर भी चर्चा हुई। पंजाब में युवाओं में फैलते नशे और धर्मांतरण को लेकर चिंता जताई गई। संघ और उसके सहयोगी संगठन नशा मुक्ति अभियान और समाज जागरण कार्यक्रम चला रहे हैं। पश्चिम बंगाल में बांग्लादेश से हो रही घुसपैठ और बिगड़ती कानून-व्यवस्था पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई। आंबेकर ने कहा कि अपराध और घुसपैठ की घटनाएँ लोगों के लिए बड़ी चुनौती बन गई हैं।
पूर्वोत्तर राज्यों को लेकर आंबेकर ने कहा कि वहाँ हिंसा में कमी आई है और विकास के नए अवसर खुल रहे हैं। मणिपुर में हाल की घटनाओं के बाद संघ ने संवाद और सामंजस्य पर जोर दिया। स्थानीय समुदायों के बीच बातचीत और गृह मंत्रालय की पहल, जैसे राजमार्गों का फिर से खुलना, सकारात्मक संकेत माने गए।
जनजातीय क्षेत्रों को लेकर भी चर्चा हुई। नक्सली और माओवादी हिंसा में कमी आने को सकारात्मक माना गया लेकिन अभी भी भ्रम फैलाने की कोशिशें जारी हैं। वनवासी कल्याण आश्रम द्वारा छात्रावास और शिक्षा के क्षेत्र में किए गए कामों का उल्लेख किया गया।
महिलाओं की भागीदारी को लेकर भी संघ ने अपने दृष्टिकोण रखे। आंबेकर ने बताया कि महिला कार्यकर्ताओं द्वारा ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के अंतर्गत 887 कार्यक्रम आयोजित किए गए और महिलाओं की भूमिका लगातार बढ़ रही है। क्रीड़ा भारती जैसे संगठनों के माध्यम से महिला खिलाड़ियों को योग और अध्ययन से जोड़ा जा रहा है।
संघ शताब्दी वर्ष की तैयारियों पर भी चर्चा हुई। 2 अक्टूबर 2025 को नागपुर से इसका औपचारिक शुभारंभ होगा। पर्यावरण संरक्षण, कुटुंब प्रबोधन और नागरिक कर्तव्य जैसे विषयों पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाएँगे। अंत में, आंबेकर ने कहा कि देश की दिशा सकारात्मक है, लेकिन कई विषयों पर अभी और कार्य करने की आवश्यकता है।
अमेरिका के साथ टैरिफ वॉर के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी झुके नहीं। भारत ने रूस से तेल लेना चालू रखा। यहाँ तक की चीन और रूस से दोस्ती गहरी की। अब पीएम मोदी की इस दिलेरी की दुनिया तारीफ कर रही है। इजरायल ने खुद के लिए इसे सबक बताया है और पीएम मोदी से सीखने की बात कही है।
इजरायली मीडिया पोर्टल The Jerusalam Post ने एक लेख में बताया है कि इजरायल को पीएम मोदी से सीखने की जरूरत है कि कैसे वो राष्ट्रीय सम्मान को सर्वोपरि रखते हैं। इस रिपोर्ट की हेडलाइन से समझ आता है कि पीएम मोदी विश्वभर के ताकतवर नेताओं में से एक हैं- “What Israel can Learn from Modi: National honor as strategic asset”
The Jerusalam Post के लेख का स्क्रीनशॉट
जकी शालोम द्वारा लिखी गई इस रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि भारत से सीख मिलती है, ‘राष्ट्रीय सम्मान कोई विलासिता नहीं बल्कि एक दूरगामी रणनीतिक संपत्ति है।’ इससे साफ है कि कैसे भारत के पीएम नरेंद्र मोदी ने अपने नेतृत्व में राष्ट्रीय सम्मान और आत्मविश्वास को बढ़ावा दिया है, जो एक महत्वपूर्ण रणनीतिक संपत्ति बन गया है।
डोनाल्ड ट्रंप की भारत पर तीखी बयानबाजी
इजरायल की रिपोर्ट में अमेरिका और भारत के रिश्तों पर भी बात की गई। रिपोर्ट में बताया गया कि भारत-अमेरिका के बीच रिश्तों में गंभीर विश्वास की कमी आई है, जिसका कारण ‘टैरिफ’, भारत-रूस संबंध और अमेरिका का भारत-पाकिस्तान सीमा विवाद पर नजरिया बताया गया है।
रिपोर्ट में इस बात को भी उल्लेख किया गया कि कैसे डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि भारत के अमेरिका पर ‘दुनिया में सबसे ज्यादा’ टैरिफ लगाने के जवाब में ही भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ बढ़ाया। इसके अलावा डोनाल्ड ट्रंप के भारत को ‘डेड इकोनॉमी’ बताने और पीएम मोदी पर यूक्रेन को व्यापारिक मदद देने की भी बात पर जोर डाला।
जकी शालोम लिखते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप ने भारत-पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता का भी दावा किया। इसके बाद पाकिस्तान ने भी इस मामले में ट्रंप की तारीफ की और नोबेल पुरस्कार देने की बात कही। लेकिन भारत ने कभी अमेरिका की मध्यस्थता को नहीं माना, जिससे दोनों देशों के बीच दरार आई।
इन सब तकरारों के बावजूद पीएम मोदी ने अमेरिका की ओर सख्त रुख अपनाया। इजरायली रिपोर्ट में पीएम मोदी की तारीफ करते हुए लिखा मोदी का यह रुख आर्थिक या सैन्य कारणों से नहीं था बल्कि यह भारत की राष्ट्रीय और व्यक्तिगत सम्मान की भावना से भी जुड़ा था। इजरायली मीडिया लिखती हैं कि इस मामले में इजरायल को भी कुछ सीख मिलती है।
खान यूनिस हमले में इजरायल का रुख
जकी शालोम ने खान यूनिस हमले का उदाहरण देते हुए इजरायल को पीएम मोदी से सीख लेने की बात कही। वे लिखते हैं खान यूनिस में इजरायली गोलीबारी में 20 लोग मारे गए, जिनमें पत्रकार भी शामिल थे। घटना के तुरंत बाद इजरायली सेना ने इसे ‘दुखद घटना’ बताते हुए माफी माँगी।
रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया इजरायली सेना ने पूरी जानकारी के बिना हमले की जिम्मेदारी स्वीकार कर ली जबकि मृतकों में हमास के सदस्य भी शामिल थे, जिससे संदेश गया कि इजरायल ने मासूम नागरिकों की हत्या की है।
इस घटना के बाद इजरायली मीडिया अपने प्रशासन को तंज कसते हुए पीएम मोदी की तारीफ करती है।
पीएम मोदी की तारीफ
इजरायली मीडिया पीएम मोदी का उदाहरण बताते हुए लिखती है कि ट्रंप ने जब भारत पर लगातार मौखिक हमले किए तब मोदी ने माफी नहीं माँगी। बल्कि उन्होंने मजबूती से जवाब दिया और देश का सम्मान बचाया।
जकी शालोम कहते हैं कि पीएम मोदी से इजरायल को सीखना चाहिए कि राष्ट्रीय सम्मान को हमेशा प्राथमिकता देनी चाहिए। इजरायल प्रशासन को तंज कसते हुए वह लिखते हैं कि जल्दी जिम्मेदारी मान लेना कमजोरी समझा जा सकता है और दुश्मन इसका फायदा उठा सकते हैं। अंत में वह लिखते हैं कि भारत की तरह सम्मान को रणनीतिक संपत्ति मानना चाहिए, जिसे बनाए रखना जरूरी है।
जम्मू कश्मीर के श्रीनगर के हजरतबल दरगाह में अशोक स्तंभ का चिह्न तोड़े जाने की घटना के बाद पूरे देश में विवाद खड़ा हो गया है। इस मामले में पुलिस ने 26 लोगों को हिरासत में लिया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, दरगाह में हाल ही में हुए सौंदर्यीकरण के दौरान एक बोर्ड लगाया गया था, जिस पर राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ का चिह्न बना था। कुछ लोगों ने इसे इस्लामी सिद्धांतों के खिलाफ बताते हुए पत्थरों से तोड़ दिया। उनका कहना था कि धार्मिक स्थल पर किसी भी तरह का प्रतीक या मूर्ति बनाना इस्लाम में मान्य नहीं है।
इस घटना के बाद बीजेपी नेताओं ने इसे राष्ट्रीय प्रतीक का अपमान बताते हुए दोषियों पर सख्त कार्रवाई की माँग की है। वहीं उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती ने वक्फ बोर्ड पर सवाल उठाया कि धार्मिक स्थल पर अशोक चिह्न क्यों लगाया गया, जबकि देशभर के किसी भी धार्मिक स्थान पर ऐसा नहीं होता।
पुलिस ने इस मामले में बीएनएस की कई धाराओं और राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम, 1971 के तहत केस दर्ज किया है। अब तक 26 लोगों को हिरासत में लिया जा चुका है और कुछ अन्य से पूछताछ जारी है।
कानून विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति राष्ट्रीय प्रतीक का अपमान करता है, तो उसे तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। वहीं अगर प्रतीक का अनुचित उपयोग या तोड़फोड़ की जाती है, तो दो साल तक की सजा और 5,000 रुपये तक का जुर्माना भी हो सकता है।
वक्फ बोर्ड की चेयरपर्सन और बीजेपी नेता दरख्शां अंद्राबी ने इसे संविधान और राष्ट्रीय प्रतीक पर हमला बताया है और इसे आतंकी मानसिकता से जोड़ते हुए केंद्र सरकार से सख्त कार्रवाई की माँग की है।
वहीं, नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी ने वक्फ बोर्ड पर बिना संवेदनशीलता के काम करने का आरोप लगाया है। फिलहाल, पुलिस जाँच कर रही है, लेकिन यह मामला सिर्फ धार्मिक भावना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान और राजनीतिक मतभेदों से भी जुड़ गया है।
ओडिशा पुलिस ने राहुल गाँधी के ‘इंडियन स्टेट से लड़ रहे’ वाले बयान के खिलाफ दर्ज FIR में जाँच आगे बढ़ा दी है। पुलिस की जाँच अब राजीव गाँधी फाउंडेशन (RGF) तक पहुँच गई है। फाउंडेशन को फाइनेंशियल रिकॉर्ड पेश करने का नोटिस भेजा गया है। इसमें इस्लामी कट्टरपंथी जाकिर नाइक और चीन से फंडिंग का ब्योरा माँगा गया है।
ओडिशा की झारसुगुडा पुलिस मामले की जाँच कर रही है। पुलिस ने 03 सितंबर 2025 को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS),2023 की धारा 94 के तहत RGF को नोटिस भेजा है। SDPO उमाशंकर सिंह द्वारा RGF के वित्त निदेशक संदीप आनंद को जारी किए गए नोटिस में माँग की:
1991 से विदेशी योगदान का पूरा रिकॉर्ड।
बैंक खाता विवरण और अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता।
लेखा परीक्षकों के नाम और संपर्क।
FCRA लाइसेंस की कॉपी।
जाकिर नाइक (2011) और चीन से 2005-6 के बीच ₹2.49 करोड़ के कथित दान पर स्पष्टीकरण।
UPA शासन के दौरान PM राहत कोष के कथित दुरुपयोग पर स्पष्टीकरण।
ओडिशा पुलिस द्वारा राजीव गाँधी फाउंडेशन को जारी किए गए नोटिस के पहले पन्ने का स्क्रीनशॉट
RGF को 04 नवंबर 2025 तक इन सब जानकारियों के साथ दस्तावेज जमा करने होंगे। नोटिस का पालन न करने पर BNS की धारा 210 के तहत कार्रवाई करने की भी चेतावनी दी गई है।
मामले की जानकारी देते हुए IG संबलपुर हिमांशु लाल ने बताया, “जाँच अब उस चरण में पहुँच गई है जहाँ राजीव गाँधी फाउंडेशन (RGF) जैसी संबंधित संस्थाओं को रिकॉर्ड प्रस्तुत करने होंगे। यह एक कानूनी प्रक्रिया है। कानून अपना काम करेगा।”
गौरतलब है कि राहुल गाँधी भी राजीव गाँधी फाउंडेशन के बोर्ड सदस्यों में से एक हैं। इस फाउंडेशन की अध्यक्ष सोनिया गाँधी है। बोर्ड के अन्य सदस्यों में प्रियंका गाँधी वाड्रा, पी. चिदंबरम, सुमन दुबे, अशोक गांगुली, मोंटेक सिंह अहलूवालिया और विजय महाजन शामिल हैं।
राहुल गाँधी के खिलाफ FIR
यह नोटिस राहुल गाँधी पर जनवरी 2025 में दर्ज FIR से जुड़ा है। जब हिंदू संगठनों और BJP नेताओं ने राहुल गाँधी के ‘इंडियन स्टेट’ वाले विवादित बयान पर ओडिशा के झारसुगुडा में पुलिस से शिकायत की थी।
शिकायत में बताया गया कि राहुल गाँधी के बयान से भारत की एकता और अखंडता को खतरा है। शिकायतकर्ता राम हरि पुजारी ने कहा कि गाँधी ने ‘इंडियन स्टेट’ के खिलाफ युद्ध घोषित कर देशद्रोह भड़काया है।
मामले की जाँच के बाद IG हिमांशु लाल ने आरोपों को सही पाया और FIR दर्ज करने का निर्देश दिया था। यह मामला झारसुगुडा थाने में धारा 152 (भारत की एकता और संप्रभुता को खतरा) और धारा 197(1)(d) (झूठी या भ्रामक सूचना फैलाना) के तहत दर्ज हुआ।
राहुल गाँधी का देश-विरोधी बयान
यह पूरा विवाद राहुल गाँधी के 15 जनवरी 2025 को दिए गए बयान से शुरू हुआ। जब दिल्ली के कोटला रोड स्थित कॉन्ग्रेस मुख्यालय के उद्घाटन समारोह में राहुल गाँधी ने भाषण के दौरान देश-विरोधी बयान दिया। उन्होंने कहा था कि BJP और RSS ने देश के हर एक संस्थान पर कब्जा कर लिया है और कॉन्ग्रेस, BJP, RSS और ‘इंडियन स्टेट’ के खिलाफ संघर्ष कर रही है।
राहुल गाँधी ने कहा था, “मुझे नहीं लगता कि हम एक निष्पक्ष लड़ाई लड़ रहे हैं। इसमें कोई निष्पक्षता नहीं है। अगर आप मानते हैं कि हम BJP या RSS नामक किसी राजनीतिक संगठन से लड़ रहे हैं, तो आप समझ नहीं पाए हैं कि क्या हो रहा है। BJP और RSS ने हमारे देश की हर संस्था पर कब्ज़ा कर लिया है। अब हम BJP, RSS और इंडियन स्टेट से ही लड़ रहे हैं।”
#WATCH | Delhi: Lok Sabha LoP and Congress MP Rahul Gandhi says "Do not think that we are fighting a fair fight. There is no fairness in this. If you believe that we are fighting a political organisation called the BJP or RSS, you have not understood what is going on. The BJP and… pic.twitter.com/wuZRnxDysB
इस बयान का हिंदू संगठनों और बीजेपी ने कड़ा विरोध किया। इसे भारतीय राज्य के खिलाफ और राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा बताया।
जाँच में अब मामला गहराया गया है और राजीव गाँधी फाउंडेशन की फाइनेंसियल हिस्ट्री की भी पड़ताल की जा रही है। विदेशी और विवादित फंडिंग के आरोप साबित होने पर राजनीतिक और कानूनी गंभीर परिणाम हो सकते हैं। फाउंडेशन को नवंबर तक जरूरी दस्तावेज जमा करने के लिए कहा गया है।
अब यह मामला केवल भाषण नहीं, बल्कि गाँधी परिवार से जुड़े संस्थान की जाँच में बदल गया है।
एक आज का दौर है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में आम आदमी को टैक्स से बड़ी राहत मिली है। एक वो दौर था, जब इंदिरा-नेहरू के दौर में कॉन्ग्रेस की सरकार लोगों की मेहनत की कमाई पर बेतहाशा टैक्स वसूलती थीं। यह भारत के उस ‘काले दौर’ से ‘मुक्ति’ का प्रतीक है। एक तरफ पीएम मोदी का ‘विकास और विश्वास’ का मॉडल है, जिसने 12 लाख रुपए तक की आय को टैक्स-फ्री किया। वहीं, दूसरी तरफ कॉन्ग्रेस का ‘समाजवादी’ जुमला था, जिसने लोगों को कंगाल कर उनकी मेहनत पर खुद का साम्राज्य खड़ा किया।
नेहरू का दौर: 12 लाख की कमाई पर 3-10 लाख टैक्स
एक आज का समय है, जब 2025 के बजट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आम आदमी को राहत देते हुए ऐतिहासिक फैसला किया। मोदी सरकार ने ऐलान किया कि अब ₹12 लाख तक की आय पर किसी भी प्रकार का कोई टैक्स नहीं लगेगा। यह फैसला सीधे तौर पर मीडिल-क्लास परिवारों को बहुत बड़ी राहत देने वाला साबित हुआ।
एक वो दौर था जब जवाहरलाल नेहरू के शासन में 12 लाख की इनकम पर 2 लाख से ज्यादा की वसूली की जाती थी। पीएम मोदी ने कहा कि अगर उस समय ₹12 लाख की आय होती, तो सरकार को ₹10 लाख टैक्स के रूप में दे दिए जाते थे। यह वह वक्त था जब टैक्स दरें इतनी ऊँची थीं कि एक आम आदमी की कमाई का बड़ा हिस्सा कॉन्ग्रेस सरकार के पास चला जाता था।
#WATCH | #DelhiAssemblyElection2025 | At Delhi's RK Puram public meeting, PM Modi says, "…If someone had a salary of Rs 12 lakhs at the time of Jawaharlal Nehru – one-fourth would have gone to tax; if today have been the govt of Indira Gandhi – Rs 10 lakhs of your 12 lakh would… pic.twitter.com/gR3dQflckZ
इसके साथ ही पीएम मोदी ने कॉन्ग्रेस शासनकाल पर यह कहते हुए निशाना साधा कि ‘आज 12 लाख तक की आय पर कोई टैक्स नहीं लगता, जबकि कॉन्ग्रेस के समय यह रकम ₹2.6 लाख तक पहुँच जाती थी।’
इंदिरा का टैक्स राज: जब कमाई पर लगता था 97.5% कर
नेहरू के शासन में टैक्स की दरें बहुत ज्यादा थीं, लेकिन इंदिरा गाँधी के दौर में टैक्स की दरों ने तो हिला कर रखा दिया था। आजादी के बाद से ही देश पर कॉन्ग्रेस ने राज किया था। उस समय ‘समाजवाद’ के नाम पर इंदिरा गाँधी जनता पर भारी-भरकम टैक्स लादती थी। 1970 के दशक को याद करें, जब प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के राज में आयकर की दरें आसमान छूती थीं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, 1970 में आयकर की दर 93.5% थी, जो 1973-74 तक बढ़कर 97.5% हो गई।
इसका मतलब था कि अगर आप 100 रुपए कमाते थे, तो सरकार 97.5 रुपए टैक्स के तौर पर ले लेती थी। उस समय की सरकार का मानना था कि अमीरों पर भारी टैक्स लगाकर गरीबी खत्म की जा सकती है। लेकिन, यह नीति बुरी तरह से फेल हो गई।
इतनी ज्यादा टैक्स दरों से कोई भी कमाई नहीं करना चाहता था। लोग ईमानदारी से टैक्स भरने की बजाय चोरी करने लगे। इस वजह से सरकार का राजस्व बढ़ने के बजाय घट गया। अंत में, सरकार को अपनी इस गलत नीति को वापस लेना पड़ा। यह कॉन्ग्रेस का वह शासन था, जहाँ जनता को टैक्स के जाल में फँसाकर लूटा जाता था और अमीरों पर शिकंजा कसने के नाम पर पूरे देश को बर्बाद किया जा रहा था।
अब अगर हम नेहरू और इंदिरा गाँधी के समय की तुलना मोदी सरकार से करें, तो यह बहुत स्पष्ट होता है कि पीएम मोदी ने टैक्स नीति में सुधार के मामले में बड़ी राहत दी है। जहाँ नेहरू और इंदिरा गाँधी के समय में टैक्स दरें इतनी अधिक थीं कि लोग अपनी पूरी कमाई टैक्स में दे देते थे, वहीं मोदी सरकार ने जनता की तकलीफों को समझते हुए टैक्स को बहुत ही सामान्य और आसान बना दिया है। इससे लोग अब अपनी कमाई अपनी जेब में रख सकेंगे ओर टैक्स चुकाने वालों के लिए यह सम्मान और राहत की बात होगी।
एक महिला अपने घर से काम पर निकलती है। बीच रास्ते में उसे एक नंगा युवक गन्ने के खेत में खींचने की कोशिश करता है। यह घटना मेरठ की है। जहाँ पिछले कई दिनों से ‘न्यूड गैंग’ का आतंक पसरा हुआ है।
पीड़ितों की मानें तो इस गैंग के लड़के नंगे होते हैं। उनके बाल लंबे और घने होते हैं। बदन में तेल पोते होते हैं ताकि कोई पकड़ ना सके।
ये उसी तरह का खौफ है। जैसे कुछ साल पहले दिल्ली में ‘काला बंदर’ का था। कानपुर में ‘मुँह नोंचवा बंदर’ का था। पर मेरठ का मामला इन दोनों से अलग है। दिल्ली और कानपुर के मामले कहीं न कहीं सामूहिक भय और अफवाह से पैदा हुए थे और लोगों को घरों में कैद कर दिया था।
लेकिन मेरठ के मामले में एक पीड़िता FIR दर्ज करवा चुकी है। FIR दर्ज होने के बाद कई और पीड़िताएँ भी सामने आई है। जो कहती हैं कि उन्होंने बदनामी के डर से उन पर बीती घटनाओं के बारे में किसी को नहीं बताया था।
पुलिस सादी वर्दी में गन्ने के खेतों में इस गैंग के लोगों की तलाश कर रही है। ड्रोन से निगरानी की जा रही है। पुरुष खुद पहरा दे रहे हैं। पर अभी तक कुछ ठोस हाथ नहीं लगा है।
मेरठ के भराला और इकलौता गाँव में नंगे युवकों ने बनाया निशाना
‘न्यूड गैंग’ का ये आतंक मेरठ के भराला और इकलौता गाँव में पैर पसार रहा है। इन दोनों गाँवों में महिलाओं को निशाना बनाया गया। दो घटनाओं में FIR हुई हैं। एक महिला को नौकरी पर जाते वक्त तो अन्य 3 छात्राओं को स्कूल से घर लौटते वक्त नंगे युवकों ने खेत की तरफ खींचा।
भराला गाँव में जिस महिला को गन्ने के खेत की ओर खींचा था, उसने युवक का शरीर देखा था। महिला ने बताया कि युवक ने कपड़े नहीं पहने थे और मुँह को ढका हुआ था। महिला के चींखने पर जब उसे बचाने पास में काम कर रहे मजदूर दौड़े हुए आए तो युवक भाग निकला।
वहीं इकलौता गाँव में दोपहर के समय 3 छात्राएँ घर लौट रही थी जब अचानक गन्ने के खेत से एक युवक निकला। छात्राओं ने भी यही बताया कि युवक ने कपड़े नहीं पहने थे। छात्रा जब चिल्लाने लगी तो युवक भाग गए। इस बार भी युवक का चेहरा नहीं देखा गया।
महिलाएँ-बेटियों ने शर्म से नहीं बनाई आपबीती, अब सुरक्षा का डर
सिर्फ दो मामलों में FIR दर्ज की गई है। जबकि कई और महिलाओं ने मामला सामने आने के बाद आपबीती सुनाई है, जो शर्म से पहले चुप बैठी थीं। गाँव की बाकी महिलाएँ घटनाएँ सुनकर खौफ में आ गई हैं। अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं।
दैनिक भास्कर से बातचीत में गाँव के निवासी विनीत भराला बताते हैं कि महिलाओं ने अब गाँव से बाहर निकलना बंद कर दिया है, सिर्फ मजबूरी में बाहर आती हैं। घर से बाहर भी अब महिलाओं ने समूह बनाकर निकलना शुरू कर दिया है।
भराली गाँव की पीड़िता की सास संतोष खुद डंडा लेकर घर के बाहर पहरा दे रही हैं। संतोष कहती हैं हमारे घर में और भी बहन-बेटियाँ हैं, सबकी सुरक्षा जरूरी है, इसीलिए मैं खुद लाठी लेकर बाहर खड़ी हो जाती हूँ।
पुलिस ने चलाया तलाशी अभियान
पुलिस भी ‘न्यूड गैंग’ की दहशत के बाद अलर्ट हो गई है। पूरे गाँव में तलाशी अभियान चलाया गया है। खेतों के ऊपर ड्रोन से निगरानी की जा रही है। पुलिसकर्मी लाठी-डंडे लेकर गाँव की सीमा पर पहरा दे रहे हैं। दिन में तीन बार QRT की गाड़ियाँ गाँव में गश्त कर रही हैं। पूरे गाँव में सीसीटीवी लगाए गए हैं।
SSP विपिन टाडा ने बताया कि गाँववालों की सूचना के बाद ही पुलिस ने तलाशी अभियान शुरू किया है, अब तक कोई संदिग्ध गतिविधि नहीं देखी गई है।
भारत के अंग्रेजी-भाषी उदारवादी एलिट वर्ग के बारे में एक अजीब सी बात है। जब भी पश्चिमी देश भारत के खिलाफ नाराजगी जताते हैं, ये लोग तुरंत विदेशी मीडिया की ओर दौड़ पड़ते हैं और ‘मैंने तो पहले ही कहा था’ वाला प्रवचन शुरू कर देते हैं। इसमें भी वे भारत को ही दोषी ठहराते हैं।
मुकुल केसवन भी ऐसे ही लोगों में शामिल हैं, जिन्होंने हाल ही में The Guardian में एक कॉलम लिखा। इसमें उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भारत-अमेरिका संबंधों में तनाव के लिए जिम्मेदार ठहराया।
कॉलम का हेडलाइन ही खुद में औपनिवेशिक सोच को दर्शाती है- “Blindsided by Trump, Modi is learning hard lessons about India’s place in the new world order” दूसरे शब्दों में, “भारत बराबरी की बात सोचना बंद करो, अपनी जगह पहचानो और अमेरिका के साथ वैसा ही व्यवहार करो, जैसे 50 के दशक में होता था। टैरिफ का सामना करो।”
The Guardian ने हाल ही में मुकुल केसवन द्वारा लिखा गया एक अपमानजनक लेख प्रकाशित किया, जिसमें बताया गया कि अमेरिकी के खिलाफ खड़ा होना भारत की गलती थी
लेकिन शायद इस पूरे प्रकरण का सबसे खास पहलू ट्रंप का अहंकार या पश्चिमी देश के नेताओं की मौकापरस्ती है, जो चीन को बख्शते हुए भारत को निशाना बनाते हैं। यह भारत के अपने ही केसवन जैसे ‘ब्राउन सेपॉय’ की सोच है, जो उस अहंकार को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं और उसे ‘बुद्धिमानी’ के रूप में दर्शाते हैं।
विदेशों की धौंस के खिलाफ अपने देश के साथ खड़े होने के बजाए, वे खुशी-खुशी उस धौंस का साथ देते हैं, अपने पाठकों को यह विश्वास दिलाते हैं कि भारत ने अपने सम्मान की रक्षा करके और एक खुद की प्रशंसा करने वाले अहंकारी को संतुष्ट ना करके एक बड़ी भूल की है।
ट्रम्प के टैरिफ: नीति नहीं बल्कि धमकाने का हथियार
The Guardian में अपने लेख में मुकुल केसवन ने ट्रंप द्वारा भारत पर टैरिफ लगाए जाने को इस तरह से बताया है मानों यह ‘राजनीति’ का कोई अहम सबक हो, जिसे पीएम मोदी समझ नहीं पाए। वे इस तथ्य को आसानी से नजरअंदाज कर देते हैं कि ये टैरिफ आर्थिक मामला नहीं बल्कि सजा के तौर पर लगाया गया था।
अप्रैल 2025 में डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया, जो कि अमेरिका के सहयोगियों की तुलना में काफी ज्यादा है। जब भारत ने झुकने से इनकार कर दिया तो टैरिफ दोगुना करके 50 प्रतिशत कर दिया गया। वजह क्या थी? यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत द्वारा रूस से कच्चे तेल की खरीद, रिफाइनिंग और पुनर्नियात।
रूस से तेल लेने वालों में अब तक चीन सबसे बड़ा खरीदार है। इसके बावजूद चीन पर टैरिफ नहीं बढ़ाया गया। क्यों? क्योंकि अमेरिका अच्छे से जानता है कि उसकी इकोनॉमी चीन की सप्लाई चेन पर निर्भर है, इसीलिए बीजिंग से व्यापार-संघर्ष शुरू करने से खुद को बचाया। दूसरी ओर अमेरिका ने भारत को ऐसा देश समझा, जिसको आसानी से दबाया जा सकता है।
लेकिन अमेरिका का सारा जोड़-घटाव धरा रह गया। भारत अब भी अपने नागरिकों के लिए सस्ती ऊर्जा और एक स्थिर रिफाइनिंग उद्योग सुनिश्चित कर रहा है। वास्तव में वैश्विक अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचाने के बजाए भारत के रिफाइनरियों ने वैश्विक ईंधन आपूर्ति को स्थिर करने में मदद की। विडंबना यह है कि यूरोप इसका सबसे बड़ा लाभार्थी रहा है। पश्चिमी देश, जिन्होंने रूस के कच्चे तेल पर प्रतिबंध लगा दिया था, अंत में उन्हें भी भारत का रिफाइन्ड तेल खरीदना पड़ा।
चाहे कुछ भी हो, भारत ने यूरोप को उसके ऊर्जा संकट से बचाया तो है। फिर भी केसवन के अनुसार, भारत को सजा मिलनी चाहिए और मोदी को अपमान सहना चाहिए।
अंबानी और ‘ब्राह्मण’ पर हमला: भारत की जातिगत दरारों का फायदा उठाना
डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ सिर्फ एक रणनीति का हिस्सा था। बाकी तो भारत के एलिट वर्ग के खिलाफ एक संगठित बदनामी करने वाला अभियान था। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेन्ट ने मुकेश अंबानी को निशाना बनाया। उसने कहा कि भारत का सबसे अमीर परिवार रूसी कच्चे तेल से मुनाफा कमा रहा है। इसका संकेत स्पष्ट था: अंबानी को आलोचनाओं के केन्द्र में लाओ, उन्हें खलनायक बनाओ और भारत में विभाजन की सोच बढ़ाओ।
डोनाल्ड ट्रंप के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने भारत की जातिगत राजनीति का हवाला देते हुए ‘ब्राह्मणों’ पर भारत की जनता की कीमत पर मुनाफा कमाने का आरोप लगाया। सोचिए एक वरिष्ठ व्हाइट हाउस अधिकारी ने भारत की आंतरिक जातिगत दरारों को वैश्विक व्यापार वार्ताओं में आसानी से शामिल कर लिया।
इस अहंकार में एक और स्वर जोड़ते हुए अमेरिका के वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लुटनिक ने हाल ही में घोषणा की कि भारत एक या दो महीने में डोनाल्ड के आदेशों का विरोध करने के लिए ‘माफी माँगेगा।’ यह टिप्पणी वॉशिंगटन की विशेषाधिकार वाली मानसिकता को ही उजागर करती है। भारत से एक जागीरदार देश की तरह पेश आने की अपेक्षा करना। यह दिखाता है कि कैसे केसवन जैसे लोग इस दबाव को ‘राजनीति की हकीकत’ कहकर बढ़ावा देते हैं। वास्तव में मोदी सरकार ने संयम और परिपक्वता का प्रदर्शन किया। इस तरह की अहंकारपूर्ण बातों पर प्रतिक्रिया न देकर भारत ने अपनी परिपक्वता का परिचय दिया।
यह कूटनीति नहीं थी। यह एक मनोवैज्ञानिक ऑपरेशन था। यह भारत की सामाजिक दरारों को हथियार बनाकर मोदी सरकार पर व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने का दबाव डालने की सोची-समझी साजिश थी। उम्मीद यह थी कि भारत के अंदर मोदी विरोधी इन हमलों को और बढ़ाएँगे, जिससे मोदी अलग-थलग पड़ जाएँगे।
और देखिए, मुकुल केसवन ने इस भूमिका को बखूबी निभाया। ट्रंप के सलाहकारों की नस्लवादी और जातिवादी बयानबाज़ी की आलोचना करने के बजाए उन्होंने The Guardian में एक लेख लिखा, जिसमें मोदी पर ‘हद से ज्यादा हस्तक्षेप’ और ‘गलत आकलन’ के आरोप लगाए। केसवन के लिए असली विवाद यह नहीं है कि अमेरिकी अधिकारियों ने भारत की जातिगत संरचना का मजाक उड़ाया, बल्कि यह है कि भारत ने झुकने से इनकार कर दिया।
पाकिस्तान के साथ झूठी तुलना: पुरानी अमेरिकी रणनीति
केसवन के तर्क का एक और पहलू है, जिसमें उन्होंने ट्रंप की बात को दोहराया है कि भारत और पाकिस्तान ‘झगड़ालू ‘दक्षिण एशियाई पड़ोसी” हैं। पुलवामा आतंकी हमले के बाद भारत ने तेजी और निर्णायक प्रतिक्रिया दी। ट्रंप और उनके उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इसे ऐसे पेश करने की कोशिश की, जैसे उनके फोन कॉल ने युद्ध रुक गया। जब भारत ने सीजफायर के दावे का समर्थन करने से इनकार कर दिया, तो व्हाइट हाउस नाराज हो गया।
केसवन इसे मोदी की नाकामी बताते हैं। लेकिन अमेरिकी की दशकों से भारत- पाकिस्तान को एक तराजू में तौलने की रणनीति रही है। वॉशिंगटन भारत और पाकिस्तान को एक साथ रखना चाहता है, जिससे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को एक आतंकवाद-प्रायोजित देश के बराबर समझा जाए।
मोदी ने इस झूठी तुलना को सिरे से नकार दिया। भारत अपनी आतंकवाद-रोधी नीतियों को नोबेल पुरस्कार के लिए बेताब किसी अमेरिकी राष्ट्रपति के हाथों में कभी नहीं जाने देगा। फिर भी केसवन के लिए भारत का इस मामले में शामिल ना होना एक कूटनीतिक चूक है। उन्हें ट्रंप द्वारा भारत को अपमानित करने से कम मोदी द्वारा इस अपमान को चुपचाप स्वीकार करने का ज्यादा दुख है।
भारत दबाव में आए बिना रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखेगा
केसवन के लेख का मुख्य मुद्दा यह है कि मोदी के नेतृत्व में भारत गलत तरीके से अमेरिका के बहुत करीब आ गया है, जो कि गलत है। उनका मानना है कि भारत ने अमेरिका के साथ बहुत ज्यादा नजदीकी बढ़ाई है, यह सोचकर कि उसे पश्चिमी देशों का समर्थन मिल जाएगा। यह ऐतिहासिक रूप से गलत और विश्लेषणात्मक रूप से बेईमानी भरी बात है।
मोदी के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति काफी सुसंगत रही है। भारत ने अमेरिका के साथ संबंध मजबूत किए हैं, लेकिन अपनी संप्रभुता की कीमत पर कभी नहीं। इसीलिए भारत रूसी तेल खरीदता है, फ्रांस के साथ रक्षा संबंध बढ़ाता है, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ Quad में शामिल होता है और पुतिन और शी जिनपिंग के साथ SCO शिखर सम्मेलन में भी हिस्सा लेता है।
यह रणनीतिक स्वायत्तता है। यही वो सिद्धांत है, जिसने शीत युद्ध के समय भारत की गुटनिरपेक्षता को बढ़ाया और अब इसे 21वीं सदी की मल्टीपोलर दुनिया के हिसाब से बदल लिया गया है।
विडंबना यह है कि केसवन खुद कहते हैं, “आज गुटनिरपेक्षता रणनीतिक स्वायत्तता के तले झंडे फहरा रही है।” लेकिन फिर वे इसे आलोचना में बदल देते हैं, जैसे कि मोदी को इसके लिए माफी माँगनी चाहिए। जबकि नेहरू से लेकर वाजपेयी तक सभी भारतीय राजनेता यही चाहते थे- एक ऐसा भारत जो अपने साझेदार खुद चुने और किसी गुट के निर्देश पर ना चले।
विडंबना यह भी है कि ट्रंप ने खुद स्वीकार किया कि अमेरिका ने “भारत और रूस को चीन के हाथों खो दिया है।” उन्होंने यह नहीं कहा कि उनकी धौंस, उनके टैरिफ, उनके जातिवादी ताने, भारतीय व्यापार पर उनके हमले ही थे, जिन्होंने भारत को बहुध्रुवीयता को अपनाने के लिए प्रेरित किया।
केसवन का गुस्सा इस बात पर नहीं है कि मोदी ने अमेरिका को ‘खो दिया’ बल्कि इस बात पर है कि मोदी ने अमेरिका को खुश करने के लिए भारत की गरिमा को खोने से इनकार कर दिया।
मौन की गरिमा बनाम सेपॉय की कायरता
तमाम टैरिफ, अंबानी पर हमले, ब्राह्मणों पर कटाक्ष और धमकियों के बावजूद, भारत ने एक सम्मानजनक चुप्पी बनाए रखी है। हाल ही में जब ट्रंप ने शांति की पेशकश की, तो मोदी ने भी उन्हें अपना ‘अच्छा दोस्त’ बताया। यही तो कूटनीति है। कीचड़ में घसीटे जाने से इनकार करना, अल्पकालिक नफा-नुकसान से ऊपर लंब समय तक की रणनीतिक हितों को ध्यान में रखना।
पीएम मोदी के इस आकर्षक प्रहार को शायद केसवन कमजोरी समझेंगे। लेकिन जिसे वे कमजोरी कह रहे हैं, वह दरअसल परिपक्वता है। आत्मविश्वास से भरे भारत को X पर बयान देने की जरूरत नहीं है। भारत लंबे समय की रणनीति बना रहा है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि वैचारिक पूर्वाग्रहों से ग्रस्त और बौद्धिक छीछलेपन से भरे केसवन जैसे लोग इस बारीकी को समझने की क्षमता नहीं रखते हैं।
केसवन का लेख उनकी अपरिपक्वता को दिखाता है, क्योंकि वे प्रगतिशील विचारों के नाम पर औपनिवेशिक सोच वाले मंच The Guardian की ओर भागते हैं और भारत को अपनी जगह समझाने के बारे में व्याख्यान देते हैं।
‘ब्राउन सेपॉय’ की असलियत यही है, जब भारत का अपमान पश्चिम देश करते है तो चुप्पी लेकिन जब भारत झुकने से मना करता है तो गुस्सा।
ऐतिहासिक तुलना: नेहरू के समय से लेकर मोदी के नेतृत्व तक
इस विरोधाभास को समझने के लिए इतिहास पर नजर डालते हैं। 1962 में चीन ने भारत पर हमला किया तब नेहरू ने अमेरिका से सैन्य मदद माँगी। लेकिन अमेरिका ने अपमानजनक शर्तें रखीं, भारत की समाजवादी नीतियों पर उपदेश दिए और बदले में कश्मीर पर मध्यस्थता की बात कही। नेहरू ने यह अपमान सह लिया क्योंकि उनके पास कोई और विकल्प नहीं था।
1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान इंदिरा गाँधी को भी अमेरिकी अहंकार का सामना करना पड़ा। रिचर्ड निक्सन और हेनरी किसिंजर ने उन्हें गालियाँ दीं, सातवाँ बेड़ा बंगाल की खाड़ी में भेजा और भारत को डराने की कोशिश की। लेकिन इंदिरा ने नेहरू की तरह हार नहीं मानी। भारत ने बांग्लादेश को आजाद कराया और दक्षिण एशिया का नक्शा बदल दिया।
अब साल 2025 में मोदी को भी ऐसी ही धमकी का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन इस बार टैरिफ और तेल कूटनीति के जरिए। मोदी भी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। वह भारत के हितों को सबसे ऊपर रखते हैं। चाहे रूसी तेल खरीदना हो या दूसरा व्यापार समझौता करना।
यही सेपॉय, जिन्होंने एक समय पर नेहरू के अपमान को सराहा, वही अब मोदी की ललकार की आलोचना कर रहे हैं। ये भारत के उदारवादी एलिट वर्ग का उलटा रूप है। आत्मसमर्पण ‘परिष्कार’ है लेकिन संप्रभुता ‘अहंकार’ है।
असली ‘कठिन सबक’
The Guardian की हेडलाइन व्यंग्यात्मक लहजे में कहती है कि “मोदी दुनिया में भारत की स्थिति को लेकर कठिन सबक सीख रहे हैं।” लेकिन सच्चाई इसके उलट है। असली कठिन सबक वॉशिंगटन में सीखा जा रहा है कि भारत अब आसानी से पराजित नहीं हो सकता।
ट्रंप को यह बात समझ आ रही है कि भारत और पाकिस्तान को एक साथ जोड़ना एक बड़ी भूल थी। मोदी, असीम मुनीर जैसे व्यक्ति नहीं हैं, जिन्हें सिर्फ व्हाइट हाउस में शानदार भोजन के लिए आमंत्रित करने से आसानी से प्रभावित किया जा सके।
भारत को यह नहीं बताया जाना चाहिए कि वह किसके साथ व्यापार करेगा। भारत सस्ता तेल खरीदने के लिए माफी नहीं माँगेगा। भारत कभी भी पाकिस्तान के साथ एक ही श्रेणी में रखा जाना स्वीकार नहीं करेगा। भारत सिर्फ इसलिए कोई खराब व्यापार समझौता नहीं करेगा क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति चाहते हैं।
अगर इससे ट्रंप को निराश होते हैं, तो ठीक है। अगर इससे मुकुल केसवन को औपनिवेशिक हैंगओवर से घुटन होती है, तो और भी अच्छा है।
क्योंकि ये 2025 का भारत है। गौरवान्वित, दृढ़निश्चयी और सभ्यतागत रूप से आत्मविश्वासी। यह जानता है कि पश्चिम की ‘नियम-आधारित व्यवस्था’ हमेशा पश्चिमी प्रभुत्व का दूसरा नाम रही है। और यह भी जानता है कि बहुध्रुवीय विश्व अब स्थायी हो गया है।
सेपॉय और पश्चिम के लिए सीख: झुकने को कहने पर भी भारत नहीं झुकेगा
मुकुल केसवन और उनके जैसे लोग भारत के झुकने से इनकार को राष्ट्रवादी अपमान नहीं बल्कि असफलता मानते हैं। वे सफलता का आकलन इस बात से नहीं करते कि भारत अपने लोगों के लिए क्या हासिल करता है बल्कि इस बात से करते हैं कि पश्चिमी देशों को भारत कितना स्वीकार्य है।
प्रधानमंत्री मोदी के आलोचक चाहे कुछ भी कहें, वे सफलता को अलग तरह से मापते हैं। उनके लिए भारत की गरिमा सर्वोपरि है। और यही कारण है कि सेपॉय वर्ग उनसे घृणा करता है: क्योंकि वे उस दुनिया में उनकी अप्रासंगिकता को उजागर करते हैं, जहाँ भारत को अब उनके औपनिवेशिक समर्थन की जरूरत नहीं है।
तो आइए साफ तौर पर समझते हैं: मोदी ‘अंधे’ नहीं हैं। भारत ‘अपनी जगह’ नहीं सीख रहा है। असल में ट्रंप और उनके सेपॉय सीखना चाहिए कि नए विश्व में भारत झुकने को तैयार नहीं है। यह सबको याद दिलाता है कि मोदी के नेतृत्व में भारत अब डरपोक नहीं है बल्कि एक आत्मविश्वासी शक्ति है, जो दबाव के सामने खड़ी रहती है और अपने हितों की रक्षा करती है।
मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में Jinit Jain ने लिखी है। इस रिपोर्ट को पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ें।