क्या देश के किसी हिस्से में मुस्लिम 70 साल तक प्रताड़ित हुए हों तो वहाँ हिंदुओं की जनसंख्या में हिस्सा 12% कम होना चाहिए? क्या मुस्लिम व्यापारियों से अगर धंधा छीना जाए तो किसी बनवारी लाल गुप्ता के परिवार को अपना दशकों में बनाया हुआ बिजनेस और घरबार छोड़ कर भागना पड़ेगा?
क्या आम मुस्लिम पीड़ित होगा तो किसी गौरीशंकर मंदिर पर 44 साल तक ताला पड़ा रहेगा? आपका जवाब होना चाहिए कि यह कैसे संभव है कि पीड़ित मुस्लिम बताया जा रहा है जबकि जनसंख्या हिंदुओं की घट रही है, बिजनेस छोड़ कर हिंदू भाग रहे हैं और मंदिर हिंदुओं के ही बंद हो रहे हैं।
ये सबकुछ आसिम अली नाम का एक व्यक्ति कह रहा है जो एक कॉलमनिस्ट हैं, पोलिटिकल रिसर्चर हैं और टेलीग्राफ से लेकर न्यूजलॉंड्री तक सब कहीं लिखते रहते हैं। एक ट्वीट में आसिम अली ने अगस्त 1980 में मुरादाबाद में UP PAC द्वारा मुस्लिम नमाजियों के नरसंहार को जलियांवाला बाग शैली के नरसंहार से तुलना करते हुए लिखा, “यहाँ मारे गए लोगों की संख्या 1903 के किशिनव यहूदी नरसंहार से भी अधिक थी, जिसके बारे में अधिकांश शिक्षित यूरोपीय जानते हैं। यहाँ न तो कोई स्मारक बनाया गया, न ही किसी को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया गया। दंगे के बाद दंगे।”
Passage on the Jalianwala Bagh style massacre of Muslim worshippers by UP PAC in Moradabad, Aug 1980. More killed here than say 1903 Kishinev pogrom of Jews, which most educated European know about. No memorialization, let alone accountability, here. MJ Akbar, Riot after Riot. https://t.co/DrfK2Fk996
— Asim Ali (@AsimAli6) October 23, 2026
इस ट्वीट के अलावा हाल ही में आसिम अली ने एक और जिहादी शरजील को बचाते हुए एक अख़बार में कॉलम लिखा है।

लेकिन आसिम अली और उनके कारनामों पर कभी और बात की जाएगी। आज हम जिस मुरादाबाद की कहानी में आसिम मुस्लिमों को विक्टिम पेंट कर रहा है, वहाँ की सच्चाई जानेंगे। सबूत के साथ जानेंगे कि हर बार दंगा करके कैसे मुरादाबाद से हिंदुओं को बहुसंख्यक से अल्पसंख्यक बनाया गया और यही नहीं बल्कि उनके धंधे छीन लिए गए, उनके पुजारी मार दिए गए और उनके मंदिरों पर ताले जड़ दिए गए। जिस कहानी में मुस्लिमों को विक्टिम बताया जा रहा है असल में वहाँ सबसे ज़्यादा नुकसान में हिंदू ही हैं।
मुरादाबाद में हिंदुओं की घटती आबादी के आँकड़े
आसिम अली एक इंसिडेंट के बारे में बात करते हैं, जहाँ 1980 में कथित तौर पर PAC की फायरिंग में मुस्लिम की मौत हुई थी।

अब आसिम अली के ट्वीट को क्वोट करते हुए कुछ लोग दुहाई देते हैं कि कैसे मुस्लिम मुरादाबाद में पीड़ित हो गए और उनके धंधे छीने गए।
MP Jyotirmoy Basu addressed the Lok Sabha presenting the horrifying details of Moradabad Muslim massacre (1980) and the state bigotry.🧵 He revealed an economical factor involving Congress MLA Daudyal Khanna, apart from UP PAC’s depravity. In Moradabad, annual brassware exports were valued at ₹5 crore, of which Muslim artisans and exporters reportedly accounted for over ₹3 crore (60%). MLA Daudayal Khanna, a prominent Hindu exporter, was accused by MP Jyotirmoy Basu of participating in the riots. Around 650 Muslim-owned houses and shops were reportedly looted. The human toll was also severe: according to Basu, at least 300 Muslims were killed on the spot by police firing, excluding the ones killed later.
— Indian Muslim Archives (@Rustum_0) October 23, 2026
लेकिन इसकी हकीकत कुछ और है। आजादी के बाद पहली साल 1951 की जनगणना में मुरादाबाद जिले के आँकड़े बताते हैं कि जिले की कुल आबादी में लगभग 61.41% हिंदू थे, मुस्लिमों का हिस्सा तब 37.06% था। बाक़ी लगभग 2%-3% आबादी सिखों, ईसाइयों और बौद्धों की हुआ करती थी। यानी आजादी के तुरंत बाद जब धूल थमी थी तब मुरादाबाद एक हिंदू बहुल जिला हुआ करता था।
वहीं, मुरादाबाद जिले की आधिकारिक वेबसाइट में लिखा गया है कि मुरादाबाद से संभल ज़िला अलग होने के बाद यहाँ की कुल जनसंख्या 31,26,507 थी। इन 31.26 लाख लोगों में से 15,88, 297 लोग मुस्लिम थे। यानी 50.8% जनसंख्या मुस्लिम थी।
यानी साल 2012 आते आते हिंदू यहाँ 50% से नीचे आ चुके थे। दूसरे शब्दों में कहें तो अल्पसंख्यक हो चुके थे। लेकिन अगर 70 साल यहाँ मुस्लिम को पीड़ित किया गया तो आख़िर हिंदुओं का मुरादाबाद की आबादी में हिस्सा लगभग 12-13% क्यों गिर गया और मुस्लिम बहुसंख्यक कैसे हो गए?
ऐसा तो नहीं हो सकता कि कोई पीड़ित भी होता रहे, उसके पलायन की बात होती रहे, उसके कारोबार छीने जाने की बात भी होती रहे और इसके बाद भी उसकी आबादी बढ़ती रहे और जो हिंदू यहाँ शोषक दिखाए जाएँ, उनकी आबादी साल दर साल घटती रहे। ये दोनों बातें तो मेल नहीं खातीं?
यानी साफ़ है कि मुस्लिम यहाँ फलते फूलते रहे जबकि हिंदू या तो बाहर पलायन करते रहे या उस हिसाब से अपनी जनसंख्या नहीं बढ़ा पाए, जैसे मुस्लिमों ने बढ़ाई। मतलब ये है कि आसिम अली असल में मुस्लिमों को फेक विक्टिम पेंट कर रहा है, मुरादाबाद जैसी जगहों के असली पीड़ित तो हिंदू हैं।
हिंदुओं को अल्पसंख्यक बनाने की राजनीतिक साजिश
मुरादाबाद में हिंदुओं को अल्पसंख्यक बनाने में सिर्फ़ डेमोग्राफी ही नहीं बल्कि एक राजनीतिक खेल भी छुपा है। साल 2011 में बसा सुप्रीमो मायावती और फिर साल 2012 में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मुरादाबाद की संभल तहसील को अलग करके जिला बना दिया था। इससे पहले तक 2011 की जनगणना के अनुसार, मुरादाबाद में हिंदू 51% हुआ करते थे लेकिन संभल के जिला बनने के बाद ये नंबर भी गिर गया और हिंदू अल्पसंख्यक हो गए।
बनवारी लाल गोयल हत्या: मुरादाबाद में कैसे अल्पसंख्यक हुए हिंदू?
अब जानिए कि आख़िर यहाँ हिंदू अल्पसंख्यक हुए कैसे? आख़िर कैसे उनको एक एक करके धंधों से बाहर कर दिया गया। कैसे यहाँ बांग्लादेशी लाए गए ताकि हिंदुओं को टेरराइज किया जा सके।
अब सबसे पहले बात साल 1978 के संभल दंगे की। तब संभल जिला मुरादाबाद का ही हिस्सा हुआ करता था। होली के बाद एक अफ़वाह को मुस्लिम भीड़ ने मार्च के अंत में बहाना बनाया। इसके बाद एक एक करके हिंदुओं को टारगेट किया जाने लगा। इस दंगे में मुस्लिम भीड़ ने स्पेसिफिकली हिंदू बिजनेसेज को निशाना बनाया।
दंगे में 23 हिंदुओं की लाशें गिरी। लेकिन सबसे ज्यादा डरवाना केस बनवारी लाल गोयल का है। बनवारी लाल के बेटे विनीत गोयल ने बताया है कि तब उनका संभल में बहुत बड़ा एक अहाता था, जिसमें व्यापार होता था। दंगाइयों ने ट्रैक्टर लगाकर उस अहाते का गेट तोड़ दिया फिर अंदर आके हिंदुओं को ढूँढने लगे।
यहीं पर विनीत गोयल के पिता बनवारी लाल भी बाकी लोगों के साथ छुपे हुए थे। यह सभी दंगों के चलते दूसरी मंजिल की कोठरी में थे। दंगाइयों को जब यह बात पता लगी तो वह बनवारी लाल समेत सबको नीचे ले आए। इसके बाद बनवारी लाल के हाथ पैर दंगाइयों ने काट दिए।।
उनकी पूरी दुकान और अहाते में पेट्रोल और मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी गई। यहाँ पर टायरों में आग लगाई गई और विनीत गोयल के पिता समेत बाकी लोगों को इसी आग में झोंक दिया गया। इसी आग में जलकर सारे लोग मारे गए। किसी की हड्डियां तक नहीं बची।
विनीत गोयल ने बताया कि इस कारण से उनको अपने पिता की अस्थियाँ तक नहीं मिली थी। दंगे के एक महीने के बाद उन्होंने फूल-पत्तों पर आटा लपेटकर उनका सांकेतिक दाह संस्कार किया था। इस दंगे का ऐसा ट्रॉमा यहाँ के हिंदुओं पर हुआ कि वो पलायन करने लगे। विनीत गोयल ख़ुद भी संभल छोड़ कर दिल्ली-NCR मूव हो गए।
दशकों तक बनाया उनका बिजनेस एक झटके में दंगाइयों ने बर्बाद कर दिया और विनीत गोयल को वापस जीरो से शुरू करना पड़ा। तो जो लोग मुरादाबाद में मुस्लिम कारोबारियों को पीड़ित बताते हैं उन्हें एक बार बनवारी लाल गोयल की कहानी पर भी गौर करना चाहिए। संभल में हिंदू सिर्फ़ कारोबार से ही बाहर नहीं हुए बल्कि वहाँ उनके मंदिर भी छीने गए।
यहाँ एक मंदिर 1978 के ही दंगे से बंद पड़ा था। दरवाज़े पर ताला था और दशकों से देवता अपने भक्तों का इंतज़ार कर रहे थे। योगी सरकार ने इस मंदिर को वापस खुलवाया और पूजा अर्चना शुरू करवाई। संभल की ये कहानी ये जानने के लिए काफी है कि आखिर दशकों तक यहाँ से हिंदू पलायन करते रहे हैं।
ईद पर हिंदू-विरोधी दंगे
लेकिन हिंदुओं की प्रताड़ना यहीं नहीं रुकती। आसिम अली के दावे के उलट मुरादाबाद में भी हर बार हिंदू ही निशाना बने हैं। अब साल 1980 में लौटते हैं। इस बार मुरादाबाद में ही हिंदुओं के ऊपर कहर बरपाया गया। संभल में होली के बाद जहाँ हिंदू दंगे की चपेट में आए थे तो यहाँ मुरादाबाद में मौका ईद का था। इन दंगों में 83 मौतें हुईं।
मुरादाबाद के इस पूरे दंगे की कहानी जस्टिस एमपी सक्सेना की जाँच रिपोर्ट ने सामने लाई, जिसे योगी सरकार ने पब्लिक किया। ये दंगे 13 अगस्त 1980 में भड़के थे। इस रिपोर्ट में गवाह दयानंद के मुताबिक हिंसा की शुरुआत 13 अगस्त 1980 को मुरादाबाद के ईदगाह से हुई थी। बहाना बनाया था कि ईदगाह की नमाज़ के दौरान एक सुअर मुस्लिमों के बीच घुस गया।
भाजपा नेता हरिओम शर्मा ने उस दिन को याद करते हुए बयान में बताया है कि ईद के मौके पर ईदगाह के पास लगाए गए शिविरों में इसके बाद मुस्लिमों की भीड़ ने आग लगा दी। इसमें उन 2 शिविरों को छोड़ दिया गया, जिन्हें मुस्लिम लीग चला रही थी। उनके पास जो भी हथियार थे, उनसे भीड़ ने हिंदुओं पर हमले किए। इस दौरान सभी मुस्लिम नेता उस भीड़ के समर्थन में थे।
हरिओम शर्मा ने अपने बयान में कहा कि इन सब कामों के लिए मुस्लिम नेताओं को पाकिस्तान व अन्य बाहरी देशों से मदद मिली थी। एक और अफवाह फैलाई गई कि पुलिस ने सैकड़ों मुस्लिमों को ईदगाह के अंदर मार दिया है, इस अफ़वाह से हिंसा और भी भड़की।
एक और गवाह संतोष सरन ने बताया दंगे भड़कने से पहले 30,000 से अधिक अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों को सोची समझी साजिश के तहत यहाँ लाकर बसाया गया था। इन्हें मुरादाबाद के मुस्लिम बहुल गाँवों में रखा गया था ताकि डेमोग्राफी बदले और दंगों के दौरान हिंदुओं के ख़िलाफ़ हिंसा करने में जिहादियों को मदद मिले।
इन दंगों की प्लानिंग भी लंबे समय से चल रही थी क्योंकि दंगे से ठीक पहले भी कई घटनाएँ हुई थीं। हरिओम शर्मा के अनुसार कॉन्ग्रेस और मुस्लिम लीग ने वोट बैंक और दबदबे की राजनीति के लिए कई गलत काम किए। इनमें 13 अगस्त 1980 के दंगे से तीन माह पहले से ही कई हिंसक वारदातों को अंजाम देने की साजिश भी शामिल थी।
रियाज नाम के एक मुस्लिम ने 1980 में एक दलित लड़की का अपहरण करने के बाद गैंगरेप किया था। यहाँ मुस्लिम नेता शमीम उस रेपिस्ट को बचाने की पूरी कोशिश करता है। पुलिस ने बहुत कोशिश के बाद उस लड़की को बरामद किया और उसके परिवार के हवाले कर दिया। बस इसी बात पर मुस्लिम भड़क गए और दलितों के लिए रंजिश लेकर बैठ गए।
इसके बाद आता है 31 मई का दिन जब चुनाव के दौरान कॉन्ग्रेस के हाफिज मोहम्मद सिद्दीकी के मुस्लिम गुंडों ने जमकर हिंसा की। सिद्दीकी के समर्थक जिहादियों ने तब ‘आधी रोटी खाएँगे, पाकिस्तान बनाएँगे’… ‘पंजाबियों को भगाएँगे, और ‘नया असम बनाएँगे’ जैसे जहरीले नारे मुरादाबाद टाउन हॉल के बाहर लगाए।
हिंदुओं के खिलाफ 1980 के दौर की दर्दनाक घटनाएँ
एक अन्य घटना में जावेद नाम के एक गुंडे ने जून 1980 में रोडरेज की एक घटना में जानबूझकर झगड़ा किया था। इस लड़ाई में वो काफी चोटिल हो गया था। इसके बाद पुलिस जब उसे बचाकर ले जा रही होती है उसी दौरान वो रास्ते में दम तोड़ देता है। खुद को मुस्लिमों का सबसे बड़ा हमदर्द साबित करने के लिए इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग का शमीम अहमद खान इसे पुलिस के द्वारा की गई हत्या बताने लगता है और जावेद के शव के साथ कब्रिस्तान तक एक जुलूस निकालता है।
इस जुलूस में कॉन्ग्रेस नेता मोहम्मद सिद्दीकी भी शामिल होता है। नफ़रती नारों के साथ मुस्लिम भीड़ को उकसाया जाता है जो अंत में जाकर एक पुलिस थाने पर हमला कर देती है। इस हमले में पुलिस वालों को बुरी तरह से पिता जाता है। पूरे मुरादाबाद में ऐसे ही अनेक हमले किए गए।
जिहादी हिंसा का सतर आप इसी बात से समझ सकते हैं कि एडिशनल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट यानी ADM डीपी सिंह को मुरादाबाद के एसपी और डीएम के सामने ही पीट-पीट कर मार डाला गया। जिहादी भीड़ ने गलशहीद पुलिस चौकी पर हमला बोलकर 2 पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी और हथियार लूट ले गए। थाने को भी आग के हवाले कर दिया गया।
इसी कड़ी में अगला मामला उसी दलित समाज की बच्ची से जुड़ा था, जिसे अगवा करके रियाज ने गैंगरेप किया था। पुलिस पर हमले की घटनाओं के बाद बच्ची के परिजन डर गए और लड़की की शादी तय कर दी। 27 जुलाई को जब बारात इंदिरा चौक पहुँची तो मुस्लिम भीड़ ने उन पर पत्थरबाजी शुरू कर दी। इस दौरान हथियारबंद मुस्लिमों की भीड़ ने दलितों के घरों में आग लगा दी। इस हिंसा में कई लोग घायल हो गए, जिसमें बनवारी नाम के युवक की मौत भी हो गई।
मुरादाबाद दंगों के एक गवाह दयानंद गुप्ता ने बताया कि मुस्लिमों ने शहर भर में सुअरों को जहर देकर मारना शुरू कर दिया. इन सब घटनाओं का मिलाजुला परिणाम ये रहा कि मुरादाबाद में सांप्रदायिक तनाव चरम पर पहुँच गया।
इसी तनाव का फायदा इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग और कॉन्ग्रेस के नेताओं ने 13 अगस्त 1980 को ईद के दिन उठाया। उन्होंने अपने समर्थकों के माध्यम से सुअरों वाली घटना को अंजाम दिया और पूरे मुरादाबाद को दंगों की आग में धकेल दिया।
इस दंगे में गौरी शंकर मंदिर के पुजारी की भी हत्या हो गई और मंदिर बंद हो गया। 44 सालों तक इस मंदिर का दरवाजा भी वापस किसी ने नहीं खोला। साल 2024 में जाकर मंदिर का वापस जीर्णोद्धार हुआ।
यानी हर मौके पर मुरादाबाद में पिछले 70 वर्षों मे हिंदू ही निशाना बनते रहे और इसके बाद भी आसिम अली जैसे लोग चाहते हैं कि हम उनकी मुस्लिम विक्टिम वाली थ्योरी मान लें। दरअसल आसिम अली जैसे लोग सिर्फ़ और सिर्फ़ जिहादी शरजील जैसे लोगों का दूसरा रूप हैं। शरजील ने अपनी बातें साफ़ तौर पर बता दी, आसिम अली उसे शुगरकोट करता है। दोनों का टारगेट एक ही है, टारगेट है हिंदुओं को इस देश में दूसरे दर्जे का नागरिक बना देना।


