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10 साल में 24.6% की रेट से बढ़े मुस्लिम, जानिए कैसे घुसपैठ से बदल रहा भारत: किन राज्यों में संकट गंभीर, क्यों PM मोदी लेकर आए ‘हाई-पावर डेमोग्राफी मिशन’?

स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त 2025) को जब पूरा देश आज़ादी का जश्न मना रहा था, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से एक अहम बात कही। उन्होंने कहा कि देश की जनसंख्या की बनावट यानी जनसांख्यिकी को लेकर एक बड़ा खतरा सामने आ रहा है। पीएम मोदी ने बताया कि सीमावर्ती इलाकों में यह बदलाव तेजी से हो रहा है और यह सिर्फ एक सामाजिक समस्या नहीं है, बल्कि यह देश की सुरक्षा के लिए भी गंभीर खतरा है।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि कुछ लोग एक साजिश के तहत देश की जनसांख्यिकी को बदलना चाहते हैं। यह सिर्फ जनसंख्या का मुद्दा नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक सोची-समझी चाल है। उन्होंने बताया कि घुसपैठिए देश में आकर न सिर्फ भारत के युवाओं की नौकरी और रोज़गार छीनते हैं, बल्कि देश की बहनों और बेटियों को भी निशाना बनाते हैं।

पीएम मोदी ने कहा कि ये लोग भोले-भाले जनजातीय लोगों को धोखा देकर उनकी जमीन भी हड़प लेते हैं। यह सब कुछ सोच-समझकर किया जा रहा है और अगर समय रहते इसे रोका नहीं गया तो यह भारत के भविष्य के लिए बड़ी मुसीबत बन सकता है। इसी के साथ पीएम मोदी ने ‘उच्च-शक्ति जनसांख्यिकी मिशन‘ की शुरुआत का ऐलान किया, ताकि इस खतरे का मुकाबला किया जा सके। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि देश अब यह सब और बर्दाश्त नहीं करेगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में एक बहुत गंभीर बात कही। उन्होंने कहा कि अगर देश के सीमावर्ती इलाकों में जनसंख्या की बनावट बदलती है तो यह सिर्फ सामाजिक मुद्दा नहीं होता, यह देश की सुरक्षा के लिए खतरा बन जाता है। उन्होंने साफ कहा कि किसी भी सरकार को यह अधिकार नहीं है कि वह अपने देश के इलाके पर घुसपैठियों को कब्जा करने दे।

यह बात उन्होंने ऐसे समय में कही जब केंद्र सरकार पहले से ही बांग्लादेशी और रोहिंग्या जैसे अवैध घुसपैठियों के खिलाफ पूरे देश में अभियान चला रही है। खासकर सीमावर्ती राज्यों में ये लोग तेजी से बसते जा रहे हैं, जिससे स्थानीय आबादी और सुरक्षा दोनों पर असर पड़ रहा है।

केंद्र सरकार ने इन अवैध प्रवासियों का पता लगाने, उन्हें हिरासत में लेने और वापस भेजने के लिए ‘ऑपरेशन पुशबैक‘ शुरू किया है। इसी बीच यह नया जनसांख्यिकी मिशन इस संकट के प्रति सरकार की गंभीरता को दर्शाता है।

प्रधानमंत्री ने यह भी संकेत दिया कि यह खतरा सिर्फ बाहरी घुसपैठियों तक सीमित नहीं है। भारत के भीतर भी कुछ संगठन और समूह देश की धार्मिक बनावट को बदलने में लगे हुए हैं। जैसे, कुछ कट्टरपंथी मुस्लिम धर्मांतरण के लिए विदेशी पैसों से काम कर रहे हैं। छांगुर पीर जलालुद्दीन जैसे लोग इसमें शामिल पाए गए हैं। वहीं, कुछ ईसाई मिशनरी भी ‘प्रार्थना सभा‘ के नाम पर गरीब लोगों को धर्म बदलने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री ने इन सब बातों को जोड़ते हुए देश को चेतावनी दी कि अब समय आ गया है कि इस तरह की साजिशों को रोका जाए। वरना जो नुकसान होगा, उसकी भरपाई मुश्किल होगी।

असम और बंगाल में बढ़ते घुसपैठिए

जनसंख्या में यह बदलाव सिर्फ गैर-कानूनी तरीके से आए लोगों की वजह से नहीं हो रहा है। इसके पीछे कुछ स्थानीय कारण भी हैं, जैसे कि अलग-अलग मजहबों के लोगों के बीच बच्चे पैदा करने की दर में अंतर।

असम में अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों पर कार्रवाई– असम में भारत और बांग्लादेश की सीमा खुली है, जिसकी वजह से बहुत से अवैध बांग्लादेशी मुस्लिम गैर-कानूनी तरीके से भारत में घुस पाते हैं। ये लोग आधार कार्ड, राशन कार्ड आदि जैसे नकली कागजात बनवाकर भारत में ही रहने लगते हैं।

ऐसे में भाजपा सरकार असम में अवैध बांग्लादेशी मुस्लिम प्रवासियों की पहचान करने, उन्हें हिरासत में लेने और देश से बाहर भेजने के लिए सख्त कदम उठा रही है। साल 2019 में, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) की प्रक्रिया में असम के 19 लाख लोगों को रजिस्टर से बाहर कर दिया गया था। इसका मतलब है कि ये लोग अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पाए थे।

2011 की जनगणना के मुताबिक, असम में मुस्लिमों की आबादी 2001 के 30.9% से बढ़कर 34% हो गई है। इसी कारण, धुबरी, बारपेटा और गोलपाड़ा जैसे जिले मुस्लिम-बहुल बन गए हैं।

पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों में अवैध घुसपैठियों की समस्या- पश्चिम बंगाल में भी बांग्लादेशी की अवैध घुसपैठ एक बड़ी समस्या है। इस घुसपैठ के कारण उत्तर 24 परगना, मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे जिलों में मुस्लिम आबादी बहुत तेज़ी से बढ़ी है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि पश्चिम बंगाल की तृणमूल कॉन्ग्रेस सरकार (TMC) पर आरोप लगते रहे हैं कि वह राजनीतिक फायदे के लिए इन अवैध मुस्लिम घुसपैठियों के साथ सख्ती से पेश नहीं आती है। पश्चिम बंगाल के अलावा, त्रिपुरा, झारखंड और जम्मू-कश्मीर जैसे अन्य सीमावर्ती राज्यों में भी अवैध प्रवासियों के आने की समस्या देखी गई है।

भारत में धार्मिक जनसंख्या में बदलाव पर रिचर्स

एक रिसर्च पेपर के अनुसार, भारत की धार्मिक पॉपुलेशन की संरचना में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव देखे गए हैं। इस स्टडी को इकोनॉमिस्ट और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की सदस्य प्रोफेसर शमिका रवि और उनके साथियों ने मिलकर किया है। इस स्टडी में 2001 से 2011 तक की जनगणना के आँकड़ों का विश्लेषण किया गया, जिसमें भारत के 640 जिलों की धार्मिक स्ट्रक्चर को देखा गया।

2001 से 2011 के बीच भारत की जनसंख्या में महत्वपूर्ण बदलाव देखे गए हैं। इस दौरान देश की कुल जनसंख्या 17.7% बढ़ी। इस वृद्धि के बावजूद, धार्मिक-मजहबी समूहों की जनसंख्या बढ़ने की गति अलग-अलग रही। सबसे तेज़ी से बढ़ने वाला समूह मुस्लिमों का था, जिनकी जनसंख्या 24.6% बढ़ी। वहीं, जैन समुदाय की जनसंख्या सबसे धीमी गति से बढ़ी, जो केवल 5.4% थी।

इस दशक में, भारत की कुल आबादी में हिंदुओं का हिस्सा थोड़ा कम हो गया। यह 2001 में 80.46% से घटकर 2011 में 79.8% हो गया। इसके विपरीत, मुस्लिमों का हिस्सा 13.43% से बढ़कर 14.23% हो गया। एक और दिलचस्प बात यह सामने आई कि जिन लोगों ने जनगणना में अपना धर्म नहीं बताया, उनकी संख्या तीन गुना से ज़्यादा बढ़ गई। इससे पता चलता है कि समाज में कुछ और बदलाव भी हो रहे हैं, जिनका संबंध धार्मिक पहचान बताने से नहीं है।

पश्चिम बंगाल में अवैध घुसपैठ और कुछ जिलों में मुस्लिम पॉपुलेशन में बढ़ोतरी के कारण जनसांख्यिकी में बदलाव देखा गया है। मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर और उत्तर और दक्षिण 24 परगना जैसे जिलों में मुस्लिम पॉपुलेशन हिंदू पॉपुलेशन की तुलना में तेजी से बढ़ी है। यह सिर्फ एक प्राकृतिक बढ़ोतरी नहीं है, बल्कि सीमा पार से हो रही अवैध घुसपैठ भी इसमें एक बड़ा कारण है।

इस बदलाव के कारण, कुछ जिलों में हिंदुओं की आबादी एक प्रतिशत से ज़्यादा घट गई है, जो राष्ट्रीय स्तर पर आबादी में होने वाले बदलाव की तुलना में काफी ज़्यादा है। यह स्थिति राज्य के इन हिस्सों में सामाजिक और राजनीतिक संतुलन को प्रभावित कर रही है।

असम के कई जिलों में मुस्लिमों की आबादी पहले से ज़्यादा हो गई है। खासकर वे जिले जो बांग्लादेश की सीमा के पास हैं, वहाँ यह बढ़ोतरी साफ देखी गई है। धुबरी, बारपेटा, ग्वालपाड़ा और मोरीगाँव जैसे जिलों में मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ी है। यह बदलाव अचानक नहीं हुआ है, बल्कि कई कारणों से धीरे-धीरे हुआ है।

एक बड़ा कारण अवैध प्रवासन है। बांग्लादेश से लोग बिना अनुमति के सीमा पार करके असम में आते रहे हैं। इनमें ज़्यादातर लोग मुस्लिम समुदाय से होते हैं। इसके अलावा कुछ जगहों पर धर्मांतरण भी हुआ है, जिससे मुस्लिम आबादी और बढ़ी है।

इस बदलाव से स्थानीय लोगों में चिंता बढ़ी है। उन्हें लगता है कि इससे उनकी पहचान और जीवनशैली पर असर पड़ेगा। बहुत से लोगों को डर है कि कहीं उनकी संस्कृति और धर्म खतरे में न पड़ जाए। साथ ही, रोज़गार और ज़मीन जैसे संसाधनों पर दबाव बढ़ने की भी आशंका है। इस वजह से लोगों में नाराज़गी और असुरक्षा की भावना बढ़ी है।

अगर हम भारत के अलग-अलग जिलों में हिंदू, मुस्लिम और ईसाई आबादी के बढ़ने की रफ्तार देखें, तो हमें कुछ खास बातें पता चलती हैं। एक शोध में यह पाया गया कि 458 जिलों में मुस्लिमों की जनसंख्या में बढ़ोतरी की दर 18% से ज़्यादा थी। यह देश के कुल जिलों का 72% है।

इसके मुकाबले, हिंदुओं की जनसंख्या में बढ़ोतरी की दर 268 जिलों (42%) में 18% से ज़्यादा थी, जबकि ईसाइयों की जनसंख्या में बढ़ोतरी की दर 417 जिलों (65%) में 18% से ज़्यादा पाई गई।

यह भी देखा गया कि 79 जिलों में ईसाइयों की आबादी कम हुई, जबकि हिंदुओं के मामले में यह संख्या 50 और मुस्लिमों के लिए 28 थी। इसके अलावा, शोध में यह भी पता चला कि 238 जिलों में ईसाई आबादी 50% से भी ज़्यादा बढ़ी। हिंदुओं के लिए यह संख्या केवल 23 और मुस्लिमों के लिए 55 थी।

एक अध्ययन में 2001 से 2011 तक के बीच ईसाइयों, हिंदुओं और मुस्लिमों की आबादी में आए बदलावों को ध्यान से देखा गया। इस दौरान यह देखा गया कि देश के ज़्यादातर जिलों में मुस्लिम आबादी का हिस्सा बढ़ा है। कुल 80% जिलों में मुस्लिमों की जनसंख्या का अनुपात पहले से ज़्यादा हो गया है।

हिंदुओं की बात करें तो केवल 27% जिलों में ही उनकी आबादी का हिस्सा बढ़ा है। ईसाई आबादी का हिस्सा 69% जिलों में बढ़ा। यानी ईसाई और मुस्लिम समुदाय की जनसंख्या ज़्यादातर जिलों में बढ़ी है, जबकि हिंदुओं की अपेक्षाकृत कम जिलों में।

अगर आबादी के हिस्से में बढ़ोतरी को थोड़ा गहराई से देखें, तो पाया गया कि 150 जिलों में मुस्लिम आबादी का हिस्सा 0.8% से ज़्यादा बढ़ा है। हिंदुओं के लिए यह बढ़त केवल 60 जिलों में हुई और ईसाइयों के लिए सिर्फ 50 जिलों में। इसका मतलब है कि सबसे तेज़ बढ़ोतरी मुस्लिम आबादी में हुई है।

अब गिरावट की बात करें तो 227 जिलों में हिंदुओं की आबादी का हिस्सा 0.7% से ज़्यादा घट गया है। वहीं, मुस्लिमों की आबादी में ऐसी गिरावट सिर्फ 24 जिलों में और ईसाइयों की सिर्फ 32 जिलों में दर्ज की गई है।

पूर्वोत्तर भारत के कुछ राज्यों में ईसाई आबादी बहुत तेज़ी से बढ़ी है। नागालैंड, मिज़ोरम, मेघालय और अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों में यह बदलाव साफ देखा गया है। 2001 से 2011 के बीच, देश के 238 जिलों में ईसाई आबादी में 50% से ज़्यादा की बढ़ोतरी हुई है। इन इलाकों में ईसाई मिशनरियाँ काफी सक्रिय रही हैं। कहा जाता है कि वे गरीब और गैर-ईसाई जनजातीय लोगों को आर्थिक मदद, नौकरी, शिक्षा और इलाज का वादा देकर धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित कर रही हैं।

दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों में हिंदुओं की आबादी में गिरावट देखी गई है। यही हाल उत्तर प्रदेश के उत्तर-पश्चिमी हिस्सों में भी है। महाराष्ट्र, कर्नाटक के तटीय जिले और केरल का मालाबार क्षेत्र भी इस बदलाव का हिस्सा रहे हैं। यहाँ भी हिंदू आबादी कम हुई है। इसके अलावा, महाराष्ट्र, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच के जिलों में भी हिंदू आबादी में कमी आई है।

पेपर में यह भी बताया गया है कि कुछ खास इलाकों में मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ी है, जैसे- महाराष्ट्र के बीच के जिले, कर्नाटक और मालाबार के तटीय इलाके और पश्चिम बंगाल व असम के पूर्वी जिले। यहाँ मुस्लिम आबादी के अनुपात में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

इन सब बातों को अगर एक नक्शे में देखें तो भारत में धर्म के आधार पर जनसंख्या में जो बदलाव आ रहे हैं, वो चिंता पैदा करने वाले हैं। यह दिखाता है कि कुछ जगहों पर जनसंख्या का संतुलन तेजी से बदल रहा है और इससे सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव भी पड़ सकते हैं।

इस विश्लेषण में यह बताया गया है कि भारत में धार्मिक बदलाव सिर्फ राष्ट्रीय या राज्य स्तर पर देखने से पूरी तस्वीर साफ नहीं होती। जिला स्तर पर जो बदलाव हो रहे हैं, वे कई बार नजरअंदाज कर दिए जाते हैं। जबकि असली बदलाव वहीं से शुरू होते हैं।

धार्मिक जनसंख्या में जो परिवर्तन होता है, वह केवल यह नहीं दिखाता कि कितने लोग बढ़े हैं। यह भी देखना जरूरी होता है कि किस धर्म की आबादी कितनी तेजी से बढ़ रही है। यानी बात केवल कुल संख्या की नहीं, बल्कि बढ़ने की रफ्तार की भी है।

साथ ही, यह बात भी मायने रखती है कि किसी जिले में किसी धर्म की शुरूआती हिस्सेदारी कितनी थी। अगर किसी धर्म की जनसंख्या पहले से कम थी, लेकिन वह तेजी से बढ़ी तो उसका असर ज्यादा दिखाई देगा। इसलिए धार्मिक बदलाव को समझने के लिए सिर्फ बड़ी तस्वीर नहीं, बल्कि छोटे-छोटे इलाकों की स्थिति को भी ध्यान से देखना जरूरी है।

जनवरी 2025 में एक रिपोर्ट आई थी जिसे सेंटर फॉर पॉलिसी स्टडीज़ (CPS) नाम के थिंक-टैंक ने जारी किया था। इसमें बताया गया कि भारत के कई राज्यों में धर्म के आधार पर जनसंख्या का संतुलन बदल रहा है। खासकर केरल में यह बदलाव साफ दिखता है। केरल में मुस्लिमों की जनसंख्या 2011 में 27% थी, लेकिन 2015 के बाद पैदा होने वाले बच्चों में उनकी हिस्सेदारी हिंदुओं से ज़्यादा हो गई।

2019 में केरल में जितने बच्चों का जन्म हुआ, उनमें 44% मुस्लिम थे और 41% हिंदू। यह बदलाव अचानक नहीं आया। 2008 से 2021 के बीच मुस्लिमों की हिस्सेदारी धीरे-धीरे बढ़ती गई। कई सालों में तो उनकी हिस्सेदारी हिंदुओं से ज़्यादा हो गई। वहीं, ईसाइयों की हिस्सेदारी भी कम होती गई।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि 2008 से 2019 के बीच मुस्लिमों की हिस्सेदारी 36% से बढ़कर 44% हो गई। इसी दौरान हिंदुओं की हिस्सेदारी 45% से घटकर 41% और ईसाइयों की 17% से घटकर 14% रह गई। इसका मतलब है कि जन्म के आँकड़ों में मुस्लिमों की संख्या, उनकी कुल जनसंख्या से कहीं ज्यादा है। यानी उनकी आबादी तेजी से बढ़ रही है।

एक और अध्ययन प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद ने किया था। इसमें बताया गया कि 1950 से 2015 के बीच, भारत में हिंदुओं की हिस्सेदारी 84% से घटकर 78% हो गई। वहीं, मुस्लिमों की हिस्सेदारी 9.8% से बढ़कर 14% हो गई। यानी मुस्लिमों की आबादी में बहुत तेज बढ़ोतरी हुई है। इसके साथ ही ईसाई और सिख आबादी भी थोड़ी बढ़ी है।

ये सारे आँकड़े दिखाते हैं कि मुस्लिमों की जनसंख्या लगातार बढ़ रही है। जबकि हिंदुओं की कुल मिलाकर घट रही है। भारत की कुल प्रजनन दर अब 2 से भी कम हो गई है और कुछ राज्यों में यह और भी नीचे है। यह जनसंख्या संतुलन के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है।

इस बदलाव के पीछे धर्मांतरण, लालच और अन्य सामाजिक दबावों की भूमिका पर भी सवाल उठे हैं। कुछ लोगों का मानना है कि यह केवल जनसंख्या नहीं, बल्कि सोच-समझकर किया गया एक रणनीतिक बदलाव है। इसलिए यह विषय सिर्फ आँकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ा हुआ है।

बदलती जनसांख्यिकी: भारत की संस्कृति, सुरक्षा और धर्मनिरपेक्षता पर गहराता संकट

यह बात शायद बार-बार सुनने को मिलती है, लेकिन सच यही है कि ‘जनसांख्यिकी’ यानी लोगों की संख्या और उनकी बनावट बहुत मायने रखती है। इतिहास में देखा गया है कि जहाँ भी हिंदू लोग कम हो गए, वहाँ धर्मनिरपेक्षता यानी सभी धर्मों को समान मानने की नीति खत्म हो गई। भारत का जो धर्मनिरपेक्ष स्वभाव है, वह इसलिए बना हुआ है क्योंकि यहाँ हिंदू बहुसंख्यक हैं।

जब जनसंख्या में बदलाव होता है, जैसे सीमाओं के पास अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुस्लिम घुसपैठिए आने लगते हैं या मुस्लिमों की संख्या जल्दी बढ़ने लगती है तो इससे देश की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है। कई बार ये अवैध लोग सीमा पार तस्करी करते हैं, हिंसा फैलाते हैं और धर्म परिवर्तन भी कराते हैं। साथ ही, वे स्थानीय लोगों की नौकरियाँ, आजीविका और संसाधनों पर कब्ज़ा कर लेते हैं। इससे भारत के अपने लोगों के लिए मुश्किलें बढ़ जाती हैं और उनका भविष्य खतरे में आ जाता है।

इसके अलावा, जिन इलाकों में मुस्लिम ज्यादा हैं, वहाँ हिंदू मंदिरों को नुकसान पहुँचाने की कई घटनाएँ हुई हैं। इन घटनाओं में हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों को तोड़ा गया और मंदिरों के पास गायों के सिर और बाकी हिस्से भी फेंके गए। जैसे, जून 2025 में धुबरी में हनुमान मंदिर में बकरीद के बाद गाय का कटा हुआ सिर मिला था।

जनसंख्या में इन बदलावों से भारत की संस्कृति को भी खतरा है। त्रिपुरा में देखा गया है कि वहाँ की हिंदू जनजातीय आबादी, मुस्लिमों के मुकाबले कमजोर हो गई है। इन बदलावों के कारण हिंदुओं के खिलाफ हिंसा भी बढ़ रही है। अपनी ताकत दिखाने के लिए मस्लिम मंदिरों को नुकसान पहुँचा रहे हैं, गोहत्या कर रहे हैं और भीड़ बनाकर हिंदुओं पर हमला कर रहे हैं।

कई जगहों पर ऐसा देखा गया है कि जहाँ मुस्लिम आबादी बहुत अधिक है, वहाँ हिंदू और अन्य गैर-मुस्लिम लोग खुलकर अपने त्योहार या परंपराएँ नहीं निभा पाते। ऐसे इलाके ‘मुस्लिम क्षेत्र’ जैसे बन जाते हैं, जहाँ बाकी समुदायों को डर लगता है।

कई बार ऐसा हुआ है कि हिंदू लोग जब अपने धार्मिक जुलूस लेकर मुस्लिम इलाकों से गुजरे तो उन पर पथराव हुआ। कुछ मामलों में तो मस्जिदों से ऐलान कर लोगों को जमा किया गया और फिर भीड़ ने हमला किया। सिर्फ त्योहार ही नहीं, अगर कोई हिंदू क्रिकेट मैच जीतने की खुशी मना रहा हो, तब भी उस पर हमला कर दिया गया।

ऐसे मामलों की रिपोर्टिंग कई बार हुई है। रामनवमी, हनुमान जयंती, कावड़ यात्रा जैसे धार्मिक कार्यक्रमों के समय हिंसा की घटनाएँ सामने आईं। यहाँ तक कि जब देश ने क्रिकेट विश्व कप जीता या किसी फिल्म में इस्लामी हमलावरों को सच दिखाया गया, तब भी प्रतिक्रिया हिंसक रही। इन घटनाओं से पता चलता है कि कुछ लोगों को दूसरों की धार्मिक अभिव्यक्ति या जीत की खुशी भी सहन नहीं होती।

धार्मिक जनसंख्या में बदलाव धीरे-धीरे होता है। लेकिन इसके असर बहुत गहरे और दूरगामी होते हैं। कई जगहों पर देखा गया है कि जहाँ मुस्लिमों की संख्या ज़्यादा हो गई, वहाँ हिंदू त्योहारों को खुलेआम मनाने में दिक्कत आने लगी। जैसे होली, दिवाली, दुर्गा पूजा, गणेशोत्सव जैसे त्योहारों पर आपत्ति जताई गई। कई बार हिंदुओं को धमकाया गया, मारा गया या दबाव डाला गया कि वे अपने त्योहार न मनाएँ।

ऐसा सिर्फ मुस्लिम बहुल इलाकों में ही नहीं, बल्कि मिली-जुली आबादी वाले क्षेत्रों में भी हुआ है। ये घटनाएँ बताती हैं कि कुछ इलाकों में धार्मिक असहिष्णुता इतनी बढ़ गई है कि लोग डरकर जीने लगे हैं।

उत्तर प्रदेश के संभल जिले में एक बड़ा उदाहरण मिला। वहाँ एक मस्जिद के सर्वे को लेकर बड़ा हंगामा हुआ। कहा गया कि वह मस्जिद असल में एक पुराना हरिहर मंदिर था। उस इलाके में मुस्लिम बहुसंख्यक हैं। वहाँ के कई हिंदू मंदिर अब सुनसान और बंद पड़े हैं। वजह ये है कि मुस्लिमों ने उन इलाकों में धीरे-धीरे कब्जा कर लिया और हिंदू समुदाय को या तो वहाँ से हटना पड़ा या चुपचाप रहना पड़ा।

जब किसी जगह पर मुस्लिमों की आबादी ज़्यादा हो जाती है, तो वहाँ की राजनीति भी बदलने लगती है। मुस्लिम आमतौर पर एकजुट होकर वोट करते हैं। इसलिए कई राजनीतिक पार्टियाँ उनका समर्थन पाने के लिए तुष्टिकरण की राजनीति करने लगती हैं। इससे इस्लामवादियों को ताकत मिलती है। उन्हें लगता है कि उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता क्योंकि उनके पीछे राजनीतिक ताकत खड़ी है।

हिंदू या दूसरे गैर-मुस्लिम समुदाय इतनी एकता से वोट नहीं करते। इसलिए उनका असर धीरे-धीरे कम होने लगता है। जैसे-जैसे जनसंख्या में बदलाव होता है, वैसे-वैसे चुनाव के नतीजे भी बदल जाते हैं। जो समुदाय ज़्यादा होता है, उसका प्रतिनिधित्व बढ़ जाता है और बाकियों की आवाज दब जाती है।

ऐसा पहले भी हो चुका है। आजादी से पहले बंगाल और पंजाब जैसे इलाकों में मुस्लिमों की आबादी बढ़ी। वहाँ सांप्रदायिक तनाव भी बढ़ने लगे। इस माहौल का फायदा मुस्लिम लीग ने उठाया। उन्होंने माँग की कि मुसलमानों को अलग से चुनाव में सिर्फ मुस्लिम उम्मीदवारों को ही वोट देने का अधिकार मिले।

अंग्रेजों ने इस माँग को मान लिया। उन्होंने ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनाई। 1909 में मॉर्ले-मिंटो सुधारों के जरिए मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचिकाएँ बन गईं। फिर 1935 में भारत सरकार अधिनियम के जरिए इन्हें और बढ़ा दिया गया। इस तरह मुस्लिमों को खास राजनीतिक अधिकार मिल गए, जबकि हिंदुओं को ऐसा कुछ नहीं मिला। यही चीज़ें बाद में भारत के बँटवारे की वजह बनीं।

1876 में सैयद अहमद खान ने ‘द्वि-राष्ट्र सिद्धांत’ का विचार सामने रखा था। इसका मतलब था कि हिंदू और मुस्लिम दो अलग-अलग राष्ट्र हैं। यानी वे एक साथ नहीं रह सकते। यह सोच मुस्लिमों के बीच अलगाव की भावना को जन्म देती गई। जब बाद में मुस्लिमों को पृथक निर्वाचिका यानी अलग से सिर्फ मुस्लिम उम्मीदवारों को वोट देने का अधिकार मिला तो इस सोच को और मजबूती मिली।

इस्लाम में गैर-मुस्लिमों को खास सम्मान नहीं दिया जाता। मूर्ति पूजने वाले हिंदुओं को तो ‘मुशरिक’ यानी सबसे बड़ा पापी कहा गया है। इसलिए अगर कुछ मुस्लिम हिंदुओं, सिखों या दूसरे गैर-मुस्लिमों को पसंद नहीं करते तो यह बहुत चौंकाने वाली बात नहीं है। मुस्लिम लीग ने इस सोच का फायदा उठाया। उन्हें जो राजनीतिक अधिकार मिले थे, उनका इस्तेमाल भारत को बाँटने की माँग करने में किया गया। इससे देश में अलगाव की भावना और बढ़ गई।

आज कई लोग कहते हैं कि 1947 में भारतीय मुस्लिमों ने भारत को चुना, पाकिस्तान को नहीं। लेकिन सच्चाई यह है कि 1946 के चुनावों में ज़्यादातर मुस्लिमों ने मुस्लिम लीग को वोट दिया था। मुस्लिम लीग उस समय एक अलग इस्लामी देश की माँग कर रही थी। उनका कहना था कि हिंदू और मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते। इसलिए मुसलमानों को आजादी के बाद अपना अलग देश चाहिए। यही माँग बाद में पाकिस्तान के निर्माण की वजह बनी।

1946 में जब भारत आज़ादी की दहलीज पर खड़ा था, तब मुस्लिम लीग ने एक बड़ा राजनीतिक फैसला लिया। उस साल हुए प्रांतीय चुनावों में उन्होंने कुल 87% मुस्लिम सीटें जीत लीं। यह दिखाता है कि ज़्यादातर मुसलमान उस समय लीग के साथ थे, जो भारत को धर्म के आधार पर बाँटकर एक अलग इस्लामी देश की माँग कर रही थी।

इसी सोच के तहत जिन्ना ने ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ का ऐलान किया। इसके बाद देश में हिंसा भड़क गई। जगह-जगह खून बहा, बलात्कार हुए, आगजनी हुई और चारों तरफ अराजकता फैल गई। लाखों निर्दोष लोग मारे गए और इन्हीं लाशों के ऊपर पाकिस्तान बना।

इस इतिहास को याद करना जरूरी है क्योंकि आज भी कई जगह वही सोच फिर से दिखने लगी है। जहाँ कहीं मुस्लिमों की आबादी ज़्यादा हो जाती है, वहाँ वे अपना वर्चस्व कायम करने की कोशिश करते हैं। चाहे वह कोई छोटी बस्ती हो या कोई पूरा इलाका। कई बार वे सरकार पर दबाव बनाने के लिए हिंसा का सहारा लेते हैं, जैसा हाल ही में वक्फ विधेयक के विरोध के दौरान देखा गया, जहाँ हिंदुओं को निशाना बनाया गया। कुछ जगहों पर वे आरक्षण जैसी विशेष माँगें भी करने लगते हैं।

विभाजन का घाव आज भी भारत के मन में ताजा है। खासकर हिंदू समाज अब ऐसी किसी भी सोच या योजना को स्वीकार नहीं कर सकता, जो भारत की एकता और अखंडता को चोट पहुँचाए। देश के कुछ मुस्लिम बहुल इलाके अब ‘मिनी पाकिस्तान’ जैसे बनते जा रहे हैं, जहाँ देश की मुख्यधारा से अलग सोच हावी होती दिखती है। यही चिंता का विषय है।

जब भारत कोई बड़ा क्रिकेट मैच जीतता है, तो देशभर में लोग खुशी मनाते हैं। लेकिन कुछ मुस्लिम बहुल इलाकों में जब हिंदू लोग जीत का जश्न मनाते हैं तो उन पर हमला किया जाता है। ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहाँ मुस्लिम भीड़ ने हिंदुओं पर हिंसा की। इसी तरह, कई जगहों पर जब हिंदू अपने त्योहार जैसे दीवाली, होली या रामनवमी मनाते हैं तो मुस्लिम समुदाय उसका विरोध करता है। लेकिन इसके बावजूद, अक्सर यह दिखाया जाता है कि मुस्लिम ही पीड़ित हैं, जबकि सच्चाई उलटी होती है।

प्रधानमंत्री मोदी ने जनसंख्या में हो रहे बदलाव को लेकर जो चिंता जताई है, वह सही है। 2021 में एक सर्वे हुआ था जिसमें 74% भारतीय मुस्लिमों ने कहा था कि वे भारत के कानूनों से ज़्यादा शरिया कानून को मानते हैं। यह दिखाता है कि बहुत से मुस्लिम भारत की न्याय व्यवस्था से खुद को नहीं जोड़ते। उनकी सोच मुख्य समाज से अलग है। अगर मुस्लिम आबादी तेज़ी से बढ़ती रही तो इसका सबसे बुरा असर हिंदुओं पर पड़ेगा।

बांग्लादेश में जब हाल ही में सरकार बदली और चरमपंथी ताकतें मज़बूत हुई तो वहाँ हिंदुओं पर हमले शुरू हो गए। यही हाल भारत के कुछ हिस्सों में भी देखने को मिला, जैसे मुर्शिदाबाद, जहाँ वक्फ कानून का विरोध करते समय हिंदुओं पर हमला हुआ। इन सभी घटनाओं में एक बात साफ है कि ‘जब मुस्लिम प्रभुत्व बढ़ता है तो सबसे पहले हिंदू समुदाय को ही उसका शिकार बनना पड़ता है।’

भारत का विभाजन सिर्फ जमीन का बँटवारा नहीं था, यह सोच और विचारधारा का भी टकराव था। उस समय, कई मुस्लिमों ने हिंदुओं और सिखों पर अत्याचार किए, लेकिन खुद को दुनिया के सामने पीड़ित बताने की कोशिश की। यह सब इस्लामी सोच से प्रेरित था, जिसमें वे अपने मजहब को दूसरों से ऊँचा मानते थे। दुर्भाग्य से, उस समय भारत के धर्मनिरपेक्ष नेताओं ने इस कट्टरपंथी सोच के सामने झुकाव दिखाया। इसी झुकाव के कारण भारत का बँटवारा हुआ।

अब भारत अपनी आज़ादी की 79वीं सालगिरह मना रहा है। इतने सालों में भारत ने हर क्षेत्र में प्रगति की है और तकनीक, शिक्षा, सेना, अर्थव्यवस्था, हर जगह आगे बढ़ा है। दूसरी ओर, पाकिस्तान एक असफल देश बनकर रह गया, जिसका 1971 में खुद ही बँटवारा हो गया और बांग्लादेश बना।

लेकिन चिंता की बात यह है कि अगर भारत की जनसंख्या की बनावट यानी जनसांख्यिकी बदली गई तो हमारी सारी तरक्की व्यर्थ हो जाएगी। अगर मुस्लिम आबादी कुछ इलाकों में बहुत ज़्यादा बढ़ती गई और अवैध प्रवासियों को समय पर रोका नहीं गया तो देश का सामाजिक संतुलन बिगड़ जाएगा।

सरकार ने इस पर ध्यान देना शुरू किया है। एक जनसांख्यिकी मिशन की शुरुआत की गई है। इसके साथ-साथ जरूरी है कि अवैध घुसपैठियों को देश से बाहर निकाला जाए। साथ ही, जो लोग हिंदुओं, सिखों या अन्य गैर-मुस्लिमों का जबरन धर्मांतरण कराना चाहते हैं, उनके खिलाफ सख्त कानून बने और लागू हों।

आज भारत धर्मनिरपेक्ष है, यानी हर धर्म को बराबरी दी जाती है। लेकिन यह इसलिए संभव है क्योंकि यहाँ हिंदू बहुसंख्या में हैं। अगर हिंदू ही कम हो गए तो भारत का चेहरा भी बदल जाएगा। फिर यह देश वैसा नहीं बचेगा, जैसा आज है, बल्कि यह एक और पाकिस्तान बनने की दिशा में बढ़ सकता है।

मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी भाषा में श्रद्धा पाण्डेय ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

न खुदा मिला, न विसाल-ए-सनम… बिना सीजफायर-बिना डील के खत्म हो गई अलास्का में ट्रंप-पुतिन की बैठक: अमेरिकी राष्ट्रपति ने जेलेंस्की पर डाला ‘शांति’ का जिम्मा

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की अलास्का के एंकोरेज में शुक्रवार (15 अगस्त 2025) को हुई बैठक रूस-यूक्रेन संघर्ष पर बिना किसी ठोस समझौते के खत्म हो गई।

हैरानी की बात यह रही कि दोनों देशों के बीच पुराने दुश्मनी भरे रिश्तों के बावजूद इस मुलाकात के दौरान ट्रंप और पुतिन के बीच काफी गर्मजोशी दिखी। इससे पहले ट्रंप ने रूस को धमकी दी थी कि अगर उसने यूक्रेन के साथ युद्धविराम नहीं किया तो अमेरिका उस पर कड़े प्रतिबंध लगाएगा।

ट्रंप का रूस को लेकर रुख अधिकतर आक्रामक ही रहा है इसलिए पुतिन का उन्होंने जिस तरह खुले दिल से स्वागत किया, वह पूरी दुनिया के लिए चौंकाने वाला था।

ट्रंप जब दूसरी बार सत्ता में आए थे तब से ही वे बार-बार रूस-यूक्रेन युद्ध खत्म करने पर जोर देते रहे हैं। राष्ट्रपति बनने के बाद उनका पहला बड़ा वादा यही था कि वे 24 घंटे के अंदर इस युद्ध को खत्म कर देंगे।

पुतिन से मुलाकात से पहले भी ट्रंप ने कहा था कि अगर रूस ने शुक्रवार तक यूक्रेन के साथ युद्ध नहीं रोका तो उस पर प्रतिबंध लगा दिए जाएंगे। हालाँकि, उन्होंने स्पष्ट नहीं किया था कि ये प्रतिबंध किस तरह के होंगे। इससे पहले ही ट्रंप ने भारत और चीन जैसे रूस के व्यापारिक साझेदारों को भी ‘सेकेंडरी टैरिफ’ लगाने की धमकी दी थी। अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने को लेकर पहले ही भारत पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगा दिया है।

ट्रंप को सत्ता में आए हुए 6 महीने हो चुके हैं लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध अभी भी खत्म नहीं हुआ है। अब पुतिन और ट्रंप की मुलाकात के बाद यह साफ हो गया है कि अमेरिका के जरिए युद्धविराम की जो उम्मीद बची हुई थी वो भी लगभग खत्म हो गई है।

ट्रंप ने बैठक को बताया ‘सार्थक’

बैठक के बाद मीडिया को संबोधित करते हुए ट्रंप ने मुलाकात को ‘बेहद सार्थक‘ बताया है। हालाँकि, इसमें रूस-यूक्रेन युद्ध पर किसी ठोस समझौते की घोषणा नहीं हुई है। ट्रंप ने कहा, “हमारी बैठक बेहद उपयोगी रही। कई मुद्दों पर सहमति बनी है, बस कुछ ही मुद्दे ऐसे हैं जिन पर बात बाकी है। हम वहाँ (युद्ध विराम) तक नहीं पहुँचे हैं लेकिन वहाँ तक पहुँचने की पूरी संभावना है।”

पुतिन ने भी इस बैठक के बाद बयान दिया। उन्होंने यूक्रेन संघर्ष को लेकर टिप्पणी करते हुए यूक्रेन और यूरोपीय देशों को चेतावनी दी कि वे ‘किसी तरह की रुकावटें न डालें’ और ‘इस प्रगति को उकसावे या चालों से बिगाड़ने की कोशिश न करें’। पुतिन ने कहा, “हमें उम्मीद है कि जो सहमति बनी है, वह यूक्रेन में शांति का रास्ता खोलेगी।” हालाँकि, दोनों ने प्रेस से कोई सवाल नहीं लिए।

बैठक में मौजूद ही नहीं था यूक्रेन

दिलचस्प बात यह रही कि यह बैठक रूस-यूक्रेन युद्ध खत्म करने के लिए आयोजित की गई थी लेकिन इसमें यूक्रेन को बुलाया ही नहीं गया। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि जब युद्ध में शामिल एक पक्ष ही बैठक में मौजूद ना हो तो शांति समझौता आखिर कैसे हो सकता था?

यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने भी इस पर चिंता जताई थी। अमेरिका-रूस बैठक से पहले ही उन्होंने कहा कि असली शांति समझौता तभी संभव है जब तीनों देश यूक्रेन, रूस और अमेरिका एक साथ बैठें।

जेलेंस्की ने कहा, “रूस को वह जंग खत्म करनी होगी जिसे उसी ने शुरू किया और सालों से खींच रहा है। हत्याएँ बंद होनी चाहिए। नेताओं की बैठक जरूरी है जिसमें कम से कम यूक्रेन, अमेरिका और रूस शामिल हों। इसी तरह के प्रारूप में ही सही फैसले लिए जा सकते हैं। सुरक्षा की गारंटी चाहिए, स्थाई शांति चाहिए। सबको पता है कि मुख्य लक्ष्य क्या हैं। मैं उन सबका धन्यवाद करता हूँ जो असली नतीजे लाने में मदद कर रहे हैं।”

कई देशों के बीच शांति कराने का दावा कर खुद को नोबेल शांति पुरस्कार का दावेदार बता रहे ट्रंप, रूस-यूक्रेन युद्ध में भी मध्यस्थ बनकर नाम कमाना चाहते थे। उनकी रूस और यूक्रेन के बीच कराई गई बैठक से कोई नतीजा नहीं निकला। इसके बाद ट्रंप ने पूरा जिम्मा यूक्रेन पर डाल दिया और कहा कि अब शांति स्थापित करना उसकी जिम्मेदारी है।

ट्रंप ने पुतिन से हुई अपनी बैठक को ’10 में से 10′ अंक दिए और कहा कि रूस-यूक्रेन युद्ध को खत्म करने की जिम्मेदारी अब यूक्रेन की है। Fox News के मुताबिक, ट्रंप ने इस वार्ता के बाद कहा, “अब यह राष्ट्रपति जेलेंस्की के ऊपर है कि वो इसे सुलझाएँ। यूरोपीय देशों को भी इसमें शामिल होना चाहिए लेकिन असली जिम्मेदारी जेलेंस्की की है।”

इस बैठक से रूस-यूक्रेन युद्ध में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया लेकिन भारत के लिए थोड़ी राहत की खबर जरूर निकली। बैठक के बाद ट्रंप ने कहा कि वो फिलहाल उन देशों पर कोई ‘सेकेंडरी टैरिफ’ लगाने के बारे में नहीं सोच रहे हैं जो रूस से तेल खरीदते हैं। इन देशों में भारत भी शामिल है।

ट्रंप ने कहा, “हो सकता है मुझे दो-तीन हफ्ते में इसके बारे में सोचना पड़े लेकिन अभी इसकी जरूरत नहीं है। मुझे लगता है कि बैठक बहुत अच्छी रही।”

गुजरात नर्क, आपदा का पर्याय… सोशल मीडिया में ‘लेक्चर’ दे रहे थे IIT गाँधीनगर के प्रोफेसर, संस्थान ने किया बर्खास्त: ऑपइंडिया की रिपोर्टिंग से उजागर हुआ था ‘ज्ञान’

IIT गाँधीनगर ने अपने एक प्रोफेसर डॉ. आशीष खाखा को सेवा से हटा दिया है। यह जानकारी खुद संस्थान ने RTI के जवाब में दी है। पहले एक RTI के जरिए यह पूछा गया था कि डॉ आशीष खाखा अब संस्थान में कार्यरत हैं या नहीं, जिस पर जवाब आया कि उन्हें सेवा से मुक्त कर दिया गया है।

मई 2025 में ऑपइंडिया ने एक रिपोर्ट में डॉ खाखा की सोशल मीडिया एक्टिविटी पर सवाल उठाए थे। इसके बाद उन्होंने अपना सोशल मीडिया अकाउंट डिएक्टिवेट कर दिया था, लेकिन बाद में वह फिर से सक्रिय हो गए।

डॉ आशीष खाखा सोशल मीडिया पर कॉन्ग्रेस नेताओं जैसे राहुल गाँधी, प्रियंका गाँधी के पोस्ट्स को लगातार शेयर करते हैं। उनके हैंडल से फिलिस्तीन के समर्थन में भी पोस्ट किए गए हैं। उन्होंने पत्रकार मोहम्मद जुबैर, यूट्यूबर ध्रुव राठी जैसे लोगों के पोस्ट भी रीपोस्ट किए हैं।

एक पोस्ट में उन्होंने कहा था कि लोगों को सड़क पर उतर कर लोकतंत्र को वापस लाना होगा। इसे भड़काऊ और उकसाने वाला बयान माना गया। उनके कुछ पोस्ट्स में गुजरात और वहाँ के लोगों को लेकर आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग किया गया है।

उन्होंने गुजरात को ‘hellhole’, ‘scam society’, ‘करप्शन की खान’ और ‘त्रासदी का पर्याय’ जैसे शब्दों से संबोधित किया है। एक पोस्ट में उन्होंने यह भी कहा है कि ‘गुजरात तबाही का पर्याय’ है।

आशीष खाखा ने एक पोस्ट को रीपोस्ट किया और लोगों से उन्हें पढ़ने का आग्रह किया। इसमें दो प्रकाशन थे, ‘कोलोनाइजिंग कश्मीर’ और ‘कोलोनाइजिंग फिलिस्तीन’। पूर्व प्रोफेसर का साफ इशारा था कि भारत ने कश्मीर को ‘कोलोनाइज’ कर लिया है।

एक अन्य पोस्ट में उन्होंने लिखा, “अगर राहुल गाँधी नहीं, तो और कौन?” यानी राहुल गाँधी को भारत का उद्धारक बताया। इसके आलावा एक वायरल पोस्ट में उन्होंने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का मजाक उड़ाने वाले एक ट्वीट को भी रीपोस्ट किया।

एक पोस्ट में एक यूजर ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का मजाक उड़ाते हुए लिखा, “उनसे इस्तीफा कैसे माँगा जा सकता है? उन्हें बताइए कि भारत ‘अनियन ऑफ स्टेट्स’ है।” इस पोस्ट को पूर्व प्रोफेसर ने भी रीपोस्ट किया है।

एक सोशल मीडिया यूजर ने उन पर अनुचित व्यवहार का आरोप लगाया और कहा कि बाद में डॉ खाखा ने उन्हें ब्लॉक कर दिया। यह पोस्ट भी सोशल मीडिया पर वायरल हुई।

उनकी एक रिसर्च ‘Covid-19 and the Indigenous Migrants Question in Urban India’ नामक लेख 2025 में लंदन से प्रकाशित एक पुस्तक ‘Governing the Crisis: Narratives of Covid-19 in India’ में छपी थी।

इसमें उन्होंने कोविड लॉकडाउन के दौरान प्रवासी मजदूरों की परेशानियों पर लिखा था। लेख में पर्याप्त चिकित्सा सुविधाओं की कमी, गरीबी और पानी की समस्या और पर्याप्त डॉक्टरों की कमी के कारण मृत्यु दर ज्यादा बताई गई थी।

हालाँकि लेख में उन्होंने झारखंड और छत्तीसगढ़ (जो उस समय INDI गठबंधन शासित राज्य थे) की तारीफ की। उन्होंने हेमंत सोरेन और भूपेश बघेल जैसे नेताओं की व्यक्तिगत सराहना की, जबकि अन्य राज्यों के प्रयासों का उल्लेख नहीं किया गया।

इससे यह सवाल उठता है कि क्या यह लेख किसी राजनीतिक झुकाव से प्रेरित था, क्योंकि उस समय सभी राज्य कोविड से निपटने के लिए प्रयासरत थे।

यह रिपोर्ट मूल रूप से गुजराती में लिखी गई है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

भारत में अवैध घुसपैठ: क्यों है अमेरिका की ICE जैसी एजेंसी की जरूरत? PM मोदी ने भी किया डेमोग्राफिक संतुलन की ओर इशारा

अमेरिका के सबसे ग्लैमरस शहर लॉस एंजेलिस से भयावह तस्वीरें सामने आई। सैकड़ों गाड़ियों को आगे के हवाले कर दिया गया, स्टोर्स लूटे गए और पूरा शहर जल उठा। ये तस्वीरें अवैध अप्रवासियों को बाहर निकालने की पॉलिसी के खिलाफ हिंसक प्रदर्शनों की थी।

ना केवल भारत बल्कि दुनिया में अवैध घुसपैठ एक बड़ी समस्या बनी हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी शुक्रवार (15 अगस्त 2025) को लाल किले से अपने भाषण के दौरान अवैध घुसपैठ जैसी दिक्कतों से हो रहे डेमोग्राफिक बदलाव को लेकर एक बड़ी पहल शुरू करने की बात कही है।

अमेरिका में अवैध अप्रवासियों का इतिहास

अमेरिका में अवैध अप्रवासियों का इतिहास पुराना है। 1986 में अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने आव्रजन सुधार और नियंत्रण अधिनियम (Immigration Reform and Control Act) पास किया। इसके बाद 30 लाख अवैध प्रवासियों को ग्रीन कार्ड देकर उनके लिए अमेरिकी नागरिकता का रास्ता साफ हो गया। जिन्हें अमेरिकी नागरिकता मिली उनमें से अधिकर प्रवासी लैटिन अमेरिकी देशों से आए थे।

इस कानून से अमेरिका महाद्वीप के 90 से 95% लोगों को नागरिकता मिली। आगे चलकर यही नियम अमेरिका के पड़ोसी देशों में रहने वालों के लिए अवैध प्रवास का एक बड़ा रास्ता बन गया। लोगों को लगा कि अवैध रूप से घुसने पर भी माफी तो मिल ही जाएगी।

इसी सोच से ‘सैंक्च्यूरी शहर’ की अवधारणा का जन्म हुआ। इन्हें हम आसान भाषा में शरणार्थी शहर के तौर पर समझ सकते हैं। यहाँ की सरकारें अवैध प्रवासियों के खिलाफ केंद्रीय एजेंसियों को ही काम नहीं करने देती हैं।

सांस्कृतिक मार्क्सवाद से कैसे बिखरा अमेरिका?

इसका एक और सिरा सांस्कृतिक मार्क्सवाद से जुड़ता है। 1930 के दशक में हिटलर ने जर्मनी से कुछ वामपंथी प्रोफेसरों को निष्कासित कर दिया। ये प्रोफेसर अमेरिका के कोलंबिया यूनिवर्सिटी में आकर बस गए। इनका मकसद समाज में लगातार संघर्ष बनाए रखने का था।

यह संघर्ष अमीर बनाम गरीब से आकर बढ़कर श्वेत बनाम अश्वेत, पुरुष बनाम महिला, नागरिक बनाम अप्रवासी तक पहुँच गया था। आगे चलकर नए-नए जेंडर्स का ईजाद किया गया। इस आंदोलन को सांस्कृतिक मार्क्सवाद का नाम दिया गया, यह आंदोलन क्रांति की शक्ल में समाज को तोड़ रहा है।

60 का दशक आते-आते यह साजिश अमेरिका में अपना असली रंग दिखाने लगी। यह हिप्पी आंदोलन, स्टूडेंट प्रोटेस्ट और एंटी एस्टब्लिशमेन्ट प्रोटेस्ट का दौर था। इसके पीछे भी सांस्कृतिक मार्क्सवाद की ही साजिश थी। जर्मनी से बाहर निकाले गए प्रोफेसर अमेरिका में बैठकर ‘वैचारिक युद्ध’ लड़ रहे थे और इसका हथियार शिक्षा को बनाया गया था। इन प्रोफेसरों के छात्र टीचर्स के ट्रेनिंग सेंटर्स में घुसे और उनका लक्ष्य शिक्षकों का ब्रेन वॉश करना ही था।

21वीं सदी के पहले दशक में बिल एयर्स और बर्नाडिन डोहर्न ने इस वैचारिक बम को अमेरिकी सिस्टम में पूरी तरह फिट कर दिया था। बिल एयर्स कहता था कि ‘अमीरों को मार दो, उनकी कारें फूंक दो, क्रांति को घर ले आओ। और हाँ, अपने माता-पिता को भी मार दो’। बर्नाडिन डोहर्न को एफबीआई ने अमेरिका का सबसे खतरनाक महिला बताया था। ये दोनों ओबामा दंपति (बराक और मिशेल ओबामा) के बेहद करीबी थी।

ओबामा के कार्यकाल में अमेरिका की सोच बदलने लगी। कानून तोड़ने वाले को ‘व्यवस्था का शिकार’ और पुलिस को ‘फासीवादी’ बताया जाने लगा। कैलिफोर्निया जैसे राज्यों में पुलिस का बजट काटा गया। साथ ही, जो लोग अव्यवस्था कर रहे थे, दुकानों को लूट रहे थे उन्हें ‘फ्रस्ट्रेटेड यूथ’ कहा गया। यह वैसा ही है जैसे भारत में पत्थरबाजी करने वाले मुस्लिम युवाओं को भटके हुए नौजवान कहा जाता है। ऐसे दंगइयों को प्रदर्शनों को ‘पीसफुल प्रोटेस्ट’ कहा गया। कमल हैरिस जैसी बड़े अमेरिकी नेता ने भी इन्हें समर्थन दिया था।

इन दिनों अमेरिका में आव्रजन और सीमा शुल्क प्रवर्तन (Immigration and Customs Enforcement- ICE) और ‘सैंक्च्यूरी शहर’ का मामला गर्म है। यह एजेंसी अवैध अप्रवासियों को पकड़कर, डिटेन कर उन्हें डिपोर्ट करती है। हालाँकि कैलिफोर्निया जैसी ‘सैंक्च्यूरी शहरों’ में एजेंसी को काम नहीं करने दिया जा रहा है।

‘सैंक्च्यूरी शहरों’ को आप ऐसे ही समझ सकते हैं जैसे कोई पार्क या जंगल, जहाँ हर तरह के पक्षी-पशु आकर बस जाते हैं। कोई शिकारी या सुरक्षा गार्ड उन्हें रोकने नहीं आता। बल्कि वहाँ के स्थानीय रेंजर (यानी लोकल सरकार) खुद ही कहती है, “हम इन्हें नहीं निकालेंगे, ये यहीं रहेंगे।”

इसका नतीजा ये होता है, कि आज अमेरिका में लाखों ऐसे लोग रह रहे हैं, जिनके पास कोई वैध दस्तावेज़ नहीं है, और इनमें से बड़ी संख्या को डेमोक्रेटिक पार्टी वोट बैंक की तरह देखती है। जब इन लोगों को निकालने की बात आती है तो स्थानीय सरकार इन्हें ‘व्यवस्था का शिकार’ बता देती है।

आज अमेरिका में लाखों अवैध अप्रवासी नागरिक बन चुके हैं। ये लोग डेमोक्रेटिक पार्टी का मजबूत वोट बैंक हैं। साल 2020 में LA काउंटी में बाइडन को 71% वोट और ट्रंप को सिर्फ 27% मिले। साल 2024 में ट्रंप ने बढ़त ली और 31.9% तक आये लेकिन यहाँ पर डेमोक्रेट्स का पलड़ा अब भी भारी हैं।

क्योंकि वोटिंग पावर अब ‘संख्याबल’ से आती है, नीतियों से नहीं। लाखों अवैध अप्रवासी जिन्हें ओबामा और उनके पहले के या बाद के डेमोक्रेट सरकारों ने नागरिकता दी थी, आज वही डेमोक्रेट्स की एक मजबूत वोट बैंक हैं।

भारत के सामने कितनी बड़ी समस्या हैं अवैध अप्रवासी?

इसे आप भारत के उन हिस्सों से मिलकर देखिए, जहाँ मुस्लिम आबादी आज बहुसंख्यक है और कौन जीतेगा और कौन हारेगा, ये उनके वोट पर निर्भर करता है और इसका उदाहरण है- उत्तराखंड का बनभुलपुरा, दिल्ली की सीलमपुर, पश्चिम बंगाल की सीमाएँ।

सब जगह एक ही पैटर्न है, एक ही चीज कॉमन है और वो है अवैध प्रवासियों की समस्या। अब भारत की स्थिति देखिए। हम दुनिया और एशिया महाद्वीप की भी सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था हैं।

हमारे चारों तरफ बसे देश पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, म्यांमार या तो आर्थिक रूप से कमजोर हैं या राजनीतिक रूप से अस्थिर हैं। इसका मतलब साफ है कि प्रवासन का अगला टारगेट भारत है। यूएन का अनुमान है कि 2060 तक भारत की जनसंख्या 166 करोड़ हो सकती है।

अब पाकिस्तान की जनसंख्या वर्तमान में लगभग 24 करोड़ है और अनुमान है कि साल 2075 तक 46 करोड़ से अधिक हो जाएगी। लेकिन वहां रोजगार, शिक्षा, और संसाधनों की भारी कमी है। इतनी आबादी लेकिन पाकिस्तान के पास न पैसे हैं, न नीति है, न रोजगार है। ऐसे में क्या होगा? ये लोग सोचेंगे कि ठिकाना बदलते हैं और सबसे नजदीकी और सुरक्षित देश कौन सा है? सिर्फ और सिर्फ भारत।

प्रोग्रेसिव वामपंथियों की वो थ्योरी आप जानते होंगे जिनमें वो समय समय पर अपनी सुविधा के अनुसार कहते हैं कि दुनिया की कोई बाउंड्री नहीं होती हैं। और इन्हें ये अधिकार है कि ये किसी भी देश में घुसें और उनके संसाधनों का दोहन करें।

अब सोचिए कि ये लोग दूसरे पड़ोसी देशों को छोड़कर भारत क्यों आएँगे? यहाँ इन्वेस्टमेंट है, शिक्षा की व्यवस्था है, रोजगार है सेफ्टी है और सबसे जरूरी बात विविधता के लिए स्पेस है।

इंटरनेशनल प्रोपेगेंडा कोई भी हैशटैग चलाए कि भारत में लोग सुरक्षित नहीं हैं लेकिन सच्चाई ये है कि भारत दुनिया का शायद सबसे टॉलरेंट देश है। हर धर्म, हर जाति, हर मानसिकता, भारत सबको जगह देता है। वरना चीन भी एशिया में ही आता है और आप खुद सोचिये कि वहां पर जरा सी भी आवाज बुलंद करने वालों के साथ क्या होता है।

अब आप कहेंगे, प्रवासी आ भी गए तो दिक्कत क्या है? दिक्कत तब शुरू होती है जब इनका रिकॉर्ड नहीं होता और ये घुसपैठ करके अपने गुट बनाते हैं। फिर एक वक्त ऐसा आता है जब प्रशासन भी कुछ नहीं कर पाता यानी ठीक वैसा ही जैसा सांस्कृतिक मार्क्सवाद का पैटर्न था।

साल 1960 के दशक में सांस्कृतिक मार्क्सवाद के विचारों से प्रभावित छात्रों ने अमेरिका और फ्रांस में छात्रों का बड़ा आंदोलन खड़ा किया। बाद में उन्होंने यूनिवर्सिटीज, स्कूलों और मीडिया में घुसपैठ की। और उनके टारगेट पर शिक्षक थे। उनका लक्ष्य था कि ‘अगर शिक्षक बदल गया, तो पूरी पीढ़ी बदल जाएगी’।

यही मॉडल आज भारत में दोहराया जा रहा है। जहाँ शिक्षा, मीडिया और न्याय के मंचों पर एक ही नैरेटिव फैलाया जा रहा है कि ‘कानून तोड़ने वाला पीड़ित है, और कानून लागू करने वाला फासीवादी’। CAA विरोधी दंगों में यही नैरेटिव चला।

हर्ष मंदर ने कहा था, “अब न्याय सड़कों पर मिलेगा।” और सचमुच, दिल्ली की सड़कों पर आग लगी। अमेरिका के लॉस एंजेल्स से इन घटनाओं को आप जोड़ सकते हैं।

अब बड़ा सवाल है कि क्या भारत के पास ICE जैसी कोई एजेंसी है? और इसका जवाब है- नहीं। भारत में अवैध प्रवासियों की निगरानी के लिए कोई सेंट्रलाइज्ड एजेंसी नहीं है। NIA और CBI जैसे संस्थान राज्यों की अनुमति से काम करते हैं, जिनमें बंगाल जैसे राज्य तो उन्हें घुसने भी नहीं देते। अगर कल कोई दंगा हुआ या किसी शहर में आतंकी हमले की साजिश पकड़ी गई, तो कौन जिम्मेदार होगा?

ऑपरेशन सिंदूर के बाद से देश के अलग अलग हिस्सों में पाकिस्तानी जासूस निकल रहे हैं। ठाणे के पडघा में अगर पुलिस साकिब नाचन के ठिकानों पर छापा न मारती तो पता ना चलता कि 2.5 फ्रंट कबसे बारूद और हथियार बना रहा था और मुंबई हमलों को दोहराने की तैयारी में लगा था। सरकार लंबे समय से राज्यों की पुलिस से बोलती जा रही थी कि रोहिंग्या निकालो लेकिन किसी ने काम नहीं किया। दो चार दिन ड्राइव चलती है, फिर सब सो जाते हैं।

अगर लॉस एंजेलिस को आज इस तरह से जलाया जा रहा है तो कल के दिन इनके लिए भारत के अलग अलग शहरों को इसी तरह से जला देना कौनसी बड़ी बात है? और भारत में मोहब्बत का केरोसिन बाँटने वालों ने इसे कई बार कई बहानों से जलाया भी है। दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगे इसका उदाहरण हैं और वो दंगे नागरिकता के नाम पर बन रहे कानून के लिए भड़काए गए थे।

इसलिए एक नई राष्ट्रीय एजेंसी की जरूरत है जो Bureau of Immigration ( BoI) के साथ कोऑर्डिनेट करे। डिटेंशन से लेकर डिपोर्टेशन तक पूरा प्रोसेस मैनेज करे और ये संस्था राज्यों की राजनीतिक सीमाओं से ऊपर हो

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने विश्व शरणार्थी दिवस से पहले ही एक बयान में कह दिया है कि भारतीय सरकार को तुरंत सभी रोहिंग्या पुरुषों, महिलाओं और बच्चों की देश से निकाले जाने की प्रक्रिया (निर्वासन) को रोक देना चाहिए, उन्हें शरणार्थी के रूप में मान्यता देनी चाहिए और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के तहत उन्हें सम्मान और सुरक्षा देनी चाहिए।

आज अगर हम इस खतरे को नहीं पहचानेंगे तो कल भारत के शहर भी वही हालत भुगतेंगे जो आज लॉस एंजेलेस भुगत रहा है। जब आज हम हाईवे बना रहे हैं, तो लोग परेशान होते हैं। सड़कें बंद होती हैं, ट्रैफिक रुकता है, धूल उड़ती है। लेकिन ये दिक्कतें क्यों हो रही हैं? क्योंकि 30 साल पहले किसी के पास विज़न ही नहीं था कि ये बनाना चाहिए।

अगर तब सोच लिया होता, तो आज समस्या इतनी बड़ी न होती। वैसे ही अगर आज अवैध प्रवासन को लेकर एक संस्थागत विजन नहीं बना तो कल ये समस्या बेकाबू हो जाएगी।

हाल ही में सोशल मीडिया पर राष्ट्रवादियों ने कावेरी इंजन का टॉपिक उठाया था। अब खुद गृहमंत्री और रक्षा मंत्री ने इस पर विचार करने की बात कहीं है। अब एक ऐसी नई मुहिम की जरूरत है उसका नाम IllegalFreeIndia होना चाहिए। जब कोई ये कहे कि ये सब ‘अमानवीय’ है, तो याद रखिए कि कानून का पालन ही मानवता है और अव्यवस्था से ज्यादा अमानवीय चीज कुछ नहीं हो सकती।

एक केंद्रीय जिम्मेदार संस्था का होना क्यों आवश्यक है उसकी वजह ये हैं कि क्योंकि हर बार जब भी अवैध प्रवासियों को पकड़ने या चिह्नित करने की बारी आती है तो संस्थाओं की आपसी फुटबॉल शुरू हो जाती है।

गृह मंत्रालय किसी स्टेट से कि कहता है कि उन्हें अवैध प्रवासियों की डिटेल्स भेजे, तो सभी एक दूसरे का मुँह देखने लगेंगे, टाल मटोल करते हुए पुलिस वाले थोड़ी बहुत कार्रवाई करेंगे और कुछ दिन बाद चुप हो जाएँगे, दूसरी संस्थाएं कहेंगी कि ये तो उनका काम ही नहीं है और ऐसे में ये सब ठंडे बस्ते में चला जाएगा क्योंकि सभी की जिम्मेदारी मतलब किसी की भी जिम्मेदारी नहीं।

जरूरी है कि केंद्र सरकार एक ऐसी ठोस संवैधानिक बॉडी तैयार करे, जिसका सिर्फ यही काम हो कि अवैध प्रवासियों की पहचान कर उन्हें देश से बाहर का रास्ता दिखाना है। क्यूँकि भारत सिर्फ भारतीयों का है और भारतीयों के लिए है, अवैध घुसपैठियों के लिए नहीं।

पूर्वोतर की जिस तलवार से टकराने के बाद जान बचाकर भागा खिलजी, कामरूप के उस हिंदू शासक के नाम होगा गुवाहाटी का सबसे लंबा फ्लाईओवर: जानिए राजा पृथु को

भारत के 79वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने एक बड़ी घोषणा की है। इसके तहत गुवाहाटी में बन रहा सबसे लंबा फ्लाईओवर (दीघलीपुखुरी से नूनमाटी तक) अब महाराजा पृथु के नाम पर रखा जाएगा।

मुख्यमंत्री ने कहा कि यह फैसला असम की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और आने वाली पीढ़ियों को हमारे वीरतापूर्ण इतिहास से प्रेरित करने के उद्देश्य से लिया गया है।

मुस्लिम आक्रांता मोहम्मद बिन खिलजी को हराने वाले महाराजा पृथु

महाराजा पृथु को राजा पृथु या विश्वसुंदर देव के नाम से भी जाना जाता है। वे 12वीं और 13वीं सदी में प्राचीन कामरूप (वर्तमान असम) के शासक थे। राजा पृथु ने 1206 ईस्वी में दिल्ली सल्तनत के सिपहसालार मोहम्मद बिन बख्तियार खिलजी को हराया था।

बख्तियार खिलजी वही आक्रांता था, जिसने नालंदा और विक्रमशिला जैसे शिक्षा के बड़े केंद्रों को नष्ट कर दिया था और 10,000 से ज्यादा बौद्ध भिक्षुओं की हत्या की थी। बिना किसी खास प्रतिरोध के पूर्व की ओर बढ़ने के बाद, जब खिलजी की फौज ने कामरूप में प्रवेश करने का प्रयास किया, तो उसे भयंकर प्रतिरोध का सामना करना पड़ा।

मिनहाज सिराज-अल-दीन द्वारा लिखित फ़ारसी इतिहास ‘तबाकत-ए-नासिरी’ सहित ऐतिहासिक स्रोतों और कनाई बसासी और कन्हाई बोरोक्सी बुआ जिल जैसे स्थलों के शिलालेखों में उल्लेख है कि आक्रमणकारी फौज का पूरी तरह से सफाया कर दिया गया था और असम की संप्रभुता सुरक्षित रही। कई फौजी पीछे हटने से पहले ही दुर्गम इलाकों में मारे गए थे।

उसने बिना किसी युद्ध के बंगाल पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद उसने 1206 ईस्वी में तिब्बत पर आक्रमण करने की योजना बनाई, ताकि बौद्ध मठों के खजाने को लूट सके। वह दक्षिण पूर्व एशिया के साथ कामरूप और सिक्किम से होकर जाने वाले पारंपरिक व्यापार मार्ग पर भी कब्जा करना चाहता था।

खिलजी ने राजा पृथु और उनकी सेना की वीरता के बारे में सुना था और जानता था कि उनके राज्य से होकर गुजरना असंभव होगा। अतः उसने कामरूप के विरुद्ध लड़ने के बजाय, तिब्बत पर आक्रमण करने के लिए राजा पृथु के पास हाथ मिलाने का पैगाम भेजा।

कामरूप राजा ने खिलजी के साथ सहमति जताते हुए कहा कि वह भी रेशम मार्ग पर नियंत्रण के लिए दक्षिणी तिब्बत पर भी आक्रमण करना चाहते हैं। इसके बाद खिलजी और राजा पृथु संयुक्त आक्रमण के लिए सहमत हो गए, लेकिन राजा पृथु ने सलाह दी कि मॉनसून के मौसम में पहाड़ों से होकर जाना खतरनाक होगा, इसलिए कुछ समय इंतजार करना चाहिए।

जब तक खिलजी के आदमी राजा पृथु का संदेश लेकर लौटे, तब तक वह काफी आगे बढ़ चुका था और वर्तमान सिलीगुड़ी के पास डेरा डाले हुए था। खिलजी ने उनकी सलाह को नजरअंदाज कर दिया और एक स्थानीय गाइड ‘मेच’ के जरिए भूटान के रास्ते से तिब्बत जाने की कोशिश की। यात्रा शुरू होने से पहले खिलजी ने मेच का धर्मांतरण करा दिया था।

रास्ते में तिब्बती गुरिल्ला सेनाओं ने उसकी फौज पर हमला कर दिया। भारी बारिश और बीमारियों के चलते उसकी फौज कमजोर हो गई। कई फौजी बीमारी से मर गए। हालात इतने खराब थे कि बख्तियार खिलजी की फौज ने घोड़ों को खाने के लिए मार डाला। उसी रास्ते से वापस लौटने में असमर्थ, खिलजी ने कामरूप के रास्ते लौटने का फैसला किया।

राजा पृथु की युद्धनीति

राजा पृथु को इस घटनाक्रम की जानकारी थी क्योंकि उनके जासूस नियमित रूप से जानकारी दे रहे थे। वह अपनी सलाह की अनदेखी करने के लिए खिलजी से पहले से ही क्रोधित थे और उन्हें अंदेशा था कि आक्रमणकारी उनके राज्य को लूटकर अपनी आपूर्ति बढ़ाएँगे। 

जब खिलजी लौटने के लिए कामरूप की ओर बढ़ा, तो राजा पृथु ने पहले ही सारी तैयारी कर रखी थी। उन्होंने स्कॉर्च्ड अर्थ रणनीति अपनाई और यानी रास्ते में सभी संसाधनों को नष्ट कर दिया, ताकि दुश्मन को कोई मदद न मिल सके। पुलों को तोड़ दिया गया और राशन समेत रास्तों को जला दिया गया।

युद्ध में लगभग 12,000 घुड़सवार और 20,000 पैदल पौजी मारे गए। खिलजी किसी तरह जान बचाकर कुछ सौ फौजियों के साथ भाग निकला। इसके बाद खिलजी ने नए क्षेत्रों पर विजय पाने का उत्साह खो दिया और फिर कभी किसी युद्ध में नहीं गया। अंत में खिलजी अपने ही एक सिपहसालार अली मर्दान खिलजी के हाथों मारा गया।

राजा पृथु ने असम की भूमि को बाहरी आक्रमणों से बचाया। हालाँकि 1228 में दिल्ली सल्तनत के शासक इल्तुतमिश के बेटे नासिरुद्दीन महमूद से युद्ध में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। हार स्वीकारने के बजाय उन्होंने अपने किले के एक जलकुंड में कूदकर स्वाभिमानपूर्वक जीवन त्याग दिया।

आज भी 27 मार्च को असम में ‘महाविजय दिवस’ मनाया जाता है। यह वही दिन है जब पृथु ने बख्तियार खिलजी की फौज को हराया था। महाविजय दिवस मध्यकालीन भारत के सबसे आक्रामक सैन्य अभियानों में से एक के विरुद्ध राज्य के प्रतिरोध और उत्तरजीविता का स्मरणोत्सव है।

सीएम ने कहा- राजा पृथु ने असम को दिल्ली सल्तनत का हिस्सा होने से बचाया

मुख्यमंत्री शर्मा ने कहा कि राजा पृथु का योगदान बहुत कम जाना जाता है, जबकि उन्होंने असम को दिल्ली सल्तनत का हिस्सा बनने से बचाया। उन्होंने कहा कि जैसे अहोम साम्राज्य के सेनापति लाचित बरफुकन को मुगलों के खिलाफ जीत के लिए जाना जाता है, वैसे ही पृथु को भी उनके साहस और रणनीति के लिए याद किया जाना चाहिए।

नए फ्लाईओवर का नाम महाराजा पृथु के नाम पर रखने से पहले हेमंत बिस्वा शर्मा सरकार द्वारा गुवाहाटी में एक नए फ्लाईओवर का नाम महाभारत कालीन राजा भगदत्त के नाम पर रखने का निर्णय लिया गया था। भगदत्त असुर राजा नरकासुर के पुत्र थे और कुरुक्षेत्र महायुद्ध में कौरवों की ओर से भाग लिया था। उन्होंने हाथियों के एक बड़े दल सहित एक अक्षौहिणी सेना का योगदान दिया था।

अब दिघलीपुखुरी–नूनमाटी फ्लाईओवर को महाराजा पृथु फ्लाईओवर नाम देकर सरकार उनके अदम्य साहस को सम्मान दे रही है, साथ ही नई पीढ़ी को उनके बारे में जागरूक करने का प्रयास कर रही है।

(यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में राजू दास ने लिखी है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। इसका अनुवाद सौम्या सिंह ने किया है। )

जिस ‘तलाक-ए-हसन’ की वैधता की SC के पास पहुँची जाँच, उसे इस्लाम में माना जाता है सबसे ‘माकूल’: जानें क्या है ये, जिसे मुस्लिम औरतों ने दी है चुनौती

‘तलाक-ए-हसन’ इस्लाम में तलाक देने की वो प्रक्रिया है, जिसमें शौहर अपनी बीवी को तीन महीने में हर महीने में एक बार ‘तलाक’ कहने से निकाह तोड़ सकता है। लेकिन यह ‘तीन तलाक’ से अलग है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में असंवैधानिक घोषित करते हुए तीन साल की सजा का प्रावधान दिया था। अब यही सुप्रीम कोर्ट ‘तलाक-ए-हसन’ की वैधता की जाँच कर रही है।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, यह जाँच सुप्रीम कोर्ट में ‘तलाक-ए-हसन’ मामले में दाखिल की गई 9 याचिकाओं पर विचार करते हुए शुरू की गई है। मामले में तीन राष्ट्रीय आयोगों से जवाब माँगा गया है, जिसमें मानवाधिकार आयोग (NHRC), राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने आयोगों को इस्लाम की प्रमाणिक पुस्तकों और मजहबी किताबों समेत अन्य किसी भी सामग्री से तर्क प्रस्तुत करने की अनुमति भी दी है। कोर्ट ने मामले में सुनवाई को 19 नवंबर तक टालते हुए आयोगों को 4 महीने का समय दिया है।

गाजियाबाद की पत्रकार बेनजीर हिना ने दी थी चुनौती

सुप्रीम कोर्ट में ‘तलाक-ए-हसन’ से संबंधित सभी दायर याचिकाओं में मुख्य याचिका गाजियाबाद की पत्रकार बेनजीर हिना की है, जिनके शौहर ने इस प्रक्रिया के तहत उन्हें तलाक दे दिया था। साल 2022 में पहले महीने में तलाक के बाद ही बेनजीर ने कोर्ट का रुख किया था।

कोर्ट में याचिका दायर कर हिना ने इस प्रक्रिया को ‘भेदभावपूर्ण’ बताया था। उन्होंने कहा था कि यह एकतरफा तलाक की प्रक्रिया ‘महिलाओं की गरिमा पर घोर आघात’ है। ये औरतों के अधिकार को कमजोर करती है। उन्होंने कोर्ट से माँग की कि यह संविधान के अनुच्छेद 14,15, 21 और 25 का उल्लंघन है, इसीलिए ‘असंवैधानिक’ घोषित किया जाए।

तब सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते इस्लाम में ‘तलाक-ए-हसन’ के जरिए तलाक की प्रक्रिया को तीन तलाक से अलग बताया था और कहा था कि महिलाओं के पास भी ‘खुला’ का विकल्प है।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में ‘तलाक-ए-हसन’ मामले में दायर याचिकाओं में एक याचिका क्रिकेटर मोहम्मदी शमी की बीवी हसीन जहाँ की भी है।

इस्लाम में तलाक-ए-हसन कितना वैध ?

शरिया लॉ में तलाक-ए-हसन को तलाक-उल-सुन्नत का रूप माना गया है। तलाक-उल-सुन्नत के दो रूप हैं, जिनमें अन्य रूप तलाक-ए-अहसन है। तलाक-उल-सुन्नत का अर्थ है ‘सुन्नत के मुताबिक’ तलाक, जिसमें समय दिया जाता है। इस तरीके को पैगंबर मुहम्मद ने भी कबूल किया है।

तलाक-ए-हसन में शौहर तीन महीने में हर महीने एक बार ‘तलाक’ कहकर निकाह खत्म कर सकता है। इस्लाम में इस प्रक्रिया को सबसे माकूल और काबिले गौर तरीका माना जाता है। इस प्रक्रिया में मियाँ और बीवी को सुलह का समय दिया जाता है।

इस पर नोएडा के मौलवी मुफ्ती मुबारक कहते हैं कि तलाक-ए-हसन या तीन तलाक इस्लाम और कुरान में जायज नहीं है, केवल दो तलाक कहना ही मान्य है। तलाक-ए-हसन पर बोलते हुए कहते हैं कि इसमें पहले महीने में तलाक बोलने के बाद भी मियाँ-बीवी को दोबारा एकसाथ रहने का मौका मिलता है। लेकिन दूसरे महीने में ऐसा नहीं है, तब मियाँ-बीवी को दोबारा निकाह करना होगा।

वहीं, तीसरे महीने के तीसरे तलाक के बाद हलाला लागू हो जाएगा। इसके तहत औरत को नए शख्स के साथ निकाह कर संबंध बनाने होंगे, फिर उसे तलाक देकर अपने पहले शौहर से निकाह किया जा सकता है।

तलाक-ए-हसन की प्रक्रिया

तलाक-ए-हसन में शौहर तभी ‘तलाक’ कह सकता है, जब बीवी तुहर (मासिक धर्म से मुक्त) में नहीं होती है। अगर औरत तुहर में नहीं है, तो पहले महीने पर ‘तलाक’ कहकर प्रक्रिया शुरू हो जाती है। इसके बाद एक महीने तक औरत इद्दत (एक अवधि तक किसी भी मर्द से निकाह या शारीरिक संबंध नहीं बना सकती) में रहती है।

एक महीने के इंतजार पर शौहर अगला ‘तलाक’ भी तभी दे सकता है, जब औरत हैज (मासिक धर्म) में नहीं है। इस एक महीने के बीच अगर सुलह हो जाती है तो ‘तलाक’ की प्रक्रिया रुक जाती है। अगर ऐसा नहीं होता तो तीसरे महीने के हैज में तलाक को दोहराया जाता है। तीसरी बार ‘तलाक’ कहने पर तलाक-ए-हसन की प्रक्रिया पूरी होने के साथ निकाह खत्म हो जाता है।

शौहर के तलाक देते ही औरत अब ‘इद्दत’ शुरू कर देती है। शरिया लॉ में तलाक के बाद औरत को तीन महीने तक ‘इद्दत’ पूरी करनी होगी। हालाँकि, औरत अगर गर्भवती है तो इस ‘इद्दत’ को पूरा नहीं माना जाता है। ये बच्चा पैदा होने के बाद ही लागू होगी।

इस्लाम ने किया बेटियों का दिमाग खराब, दोनों अब भी इसके चंगुल में: आगरा में धर्मांतरण गिरोह का निशाना बनीं हिंदू बहनों के रेस्क्यू के बाद भी माता-पिता परेशान, ऑपइंडिया के आगे बयां किया दर्द

आगरा पुलिस ने देश के सबसे बड़े धर्मांतरण गिरोह का पर्दाफाश करने के साथ कोलकाता के मुस्लिम बाहुल्य इलाके से रेस्क्यू की गईं दो बहनों को उनके माता-पिता को सौंप दिया है। उन अभिवावकों का दर्द अब सामने आ रहा है। आगरा पुलिस दोनों बरामद बहनों की लगातार काउंसलिंग कर रही है। इस बीच पीड़ित माता-पिता से ऑपइंडिया ने बातचीत की।

पीड़ित माँ ने ऑपइंडिया को बताया कि बेटियाँ अचानक 24 मार्च को बिना किसी को बताए घर छोड़कर चली गईं थीं। वह अपने साथ घर से कुछ कपड़े, कुछ कैश और अपना जरूरी सामान लेकर गई थीं। माँ ने कहा, “उस दिन हम दोनों (माता-पिता) एक सत्संग के कार्यक्रम में गए हुए थे। वह हमसे नाराज नहीं थीं, लेकिन इस्लाम ने ही उनका दिमाग खराब कर रखा था।”

माँ ने कहा, “इस्लाम हमें पसंद नहीं था। हम नहीं चाहते थे कि हमारी बेटी किसी भी तरह से इस्लाम के प्रभाव में आएँ, लेकिन ये हो गया। आगरा पुलिस ने हमारी बेटियों को सकुशल वापस लाकर बहादुरी का काम किया है।” पीड़ित पिता ने भी आगरा पुलिस कमिश्नर दीपक कुमार और सीएम योगी का आभार जताया है।

साथ पढ़ने वाली सायमा ने किया था ब्रेनवॉश

पीड़ित माँ ने बताया कि बड़ी बेटी पीएचडी करने के लिए एक कोचिंग सेंटर से नेट की तैयारी कर रही थी। इस बीच कश्मीर से सायमा नाम की एक लड़की भी वहाँ कोचिंग ले रही थी। सायमा ने ही बड़ी बेटी में हिंदू पूजा पद्धति के खिलाफ जहर घोला और धीरे-धीरे उसने बड़ी बेटी को अपने प्रभाव में ले लिया। एक दिन सायमा बेटी के साथ घर भी आई थी।

इसके बाद ही 26 फरवरी 2021 को सायमा दोनों बहनों को लेकर आगरा से फरार हो गई थी। उस समय छोटी बेटी की उम्र महज 14 वर्ष (नाबालिग) थी। इसके बाद सायमा ने दोनों बहनों को जम्मू में अपनी शादीशुदा बड़ी बहन के घर ठहराया था और वहाँ से अगली सुबह खाना खाकर 170 किलोमीटर दूर कश्मीर के लिए रवाना हो गईं थी।

हालाँकि रास्ते में लैंडस्लाइड होने के कारण रास्ता जाम हो गया और पुलिस ने कश्मीर जाने से पहले ही सायमा को दोनों बेटियों के साथ दबोच लिया।

पिता बताते हैं कि सायमा की मानसिकता का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि उसने बेटी के कहने पर भी मुझसे बात नहीं कराई थी और सिम को भी तोड़कर फेंक दिया था। फिर भी हमने सायमा के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कराई थी, ये हमारी गलती थी। अगर हमने पहले ही सायमा के खिलाफ शिकायत की होती तो आज फिर से हमारी बेटियाँ घर से नहीं गई होतीं।

घर पर नमाज पढ़ने व रोजा रखने की जिद करती थीं बेटियाँ

पीड़ित माँ का दावा है कि जम्मू-कश्मीर से लौटने के शुरूआती दिनों में बेटियाँ इस्लाम की ही तारीफ करती थीं। यहाँ तक कि वह घर पर नमाज पढ़ने और रोजे रखने की बात करती थी।

माँ ने कहा, “ये सब 8-10 दिन तक चला लेकिन हमारे (माता-पिता) के विरोध के बाद बेटियाँ शांत हो गईं और फिर पहले की तरह सामान्य तरीके से रहने लगीं।” लेकिन इस घटना के बाद परिजनों ने दोनों बेटियों के घर से बाहर जाने पर पाबंदी लगा दी थी, जिससे सायमा बेहद परेशान थी।

माँ कहती हैं कि बेटियाँ अब भी इस्लाम के प्रभाव में हैं। बेटियों का कहना है कि आप लोगों में तो बुत परस्ती होती है इस्लाम में तो एक ही है। माँ बताती हैं कि पहले वह हमारी बात मानती थीं, लेकिन अब वह गुस्सा करतीं हैं। हम उनके भविष्य को लेकर बहुत चिंतित हैं, जो आए दिन हम घटना टीवी मीडिया में देख रहे हैं और लोगों से सुन रहे हैं। इन सब को देखकर बहुत डर लगता है, लेकिन मुझे भगवान पर पूरा भरोसा है कि सब ठीक हो जाएगा।

सनातन धर्म में वापस आ जाएँ बेटियाँ: माँ

पीड़ित माँ हैरानी के साथ कहती हैं कि हमने कभी सोचा नहीं था कि हमारी पढ़ी-लिखी बेटी ऐसा करेंगी। हमारा परिवार आर्यसमाजी है। हम वैदिक सनातन धर्म से जुड़े हुए हैं। ऑपइंडिया से बात करते हुए पीड़ित माता-पिता भावुक हो उठे। माँ ने कहा, “हम भगवान से प्रार्थना करते हैं कि कैसे भी हमारी बेटियाँ सनातन धर्म में वापस आ जाएँ।”

वहीं, पीड़ित पिता हिंदू समाज से अपील करते हुए कहते हैं कि बच्चों को धर्म की बात सिखाएँ ताकि उनका कोई ब्रेनवॉश न कर सके।

बहरहाल, दो बहनों की गुमशुदगी और आगरा पुलिस की सतर्कता इस धर्मांतरण गिरोह के भंडाफोड़ की सबसे बड़ी वजह बनी है। आगरा पुलिस ने ‘ऑपरेशन अस्मिता’ के तहत 7 लड़कियों को रेस्क्यू किया है। साथ ही, गैंग के 14 आरोपितों को गिरफ्तार कर जेल भेजा है।

यह गिरोह भले ही सबसे बड़े धर्मांतरण गिरोह के रूप में देश के सामने आया हो लेकिन यह धर्मांतरण गैंग पहला या आखिरी नहीं हो सकता। अब भी देश के कई हिस्सों में ऐसे लोग सक्रिय हैं जो सनातन धर्म को कमजोर करने और हमारी बेटियों को बरगलाने के लिए लगातार सक्रिय हैं।

पहले 58 साल पुराना कॉन्ग्रेसी प्रतिबंध हटाया, अब लाल किले से कहा- मुझे गर्व है: जिस RSS का स्वयंसेवक होने पर छीन लेते थे नौकरी, उसकी राष्ट्र सेवा को PM ने किया नमन

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) 2025 में अपनी स्थापना का शताब्दी वर्ष मना रहा है।79वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने RSS की सेवाओं का जिक्र करते हुए इसे विश्व का सबसे बड़ा गैर-सरकारी संगठन (NGO) बताया है। पीएम ने कहा, “यह संगठन देश के अलग-अलग हिस्सों में योगदान दे रहा है।” हालाँकि RSS के विश्व का सबसे बड़ा NGO बनने की यात्रा में कॉन्ग्रेस हमेशा बाधक बनती रही है।

पीएम ने कहा, ”आज मैं गर्व के साथ एक बात का जिक्र करना चाहता हूँ। आज से 100 साल पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जन्म हुआ। संघ के लोग 100 साल से राष्ट्र की सेवा कर रहे हैं। व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण के संकल्प को लेकर 100 साल तक माँ भारती के कल्याण का लक्ष्य लेकर संघ के लोगों ने मातृभूमि के कल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित किया है। ऐसा RSS दुनिया का सबसे बड़ा NGO है। बीते 100 साल के दौरान देश की यात्रा में संघ का अहम योगदान है।”

प्रधानमंत्री ने कहा, “मैं आज यहाँ लाल किले के प्राचीर से 100 साल की इस राष्ट्र सेवा की यात्रा में योगदान करने वाले सभी स्वयंसेवकों को आदरपूर्वक स्मरण करता हूँ। देश राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की इस 100 साल की भव्‍य, समर्पित यात्रा पर गर्व करता है और यह हमें प्रेरणा देता रहेगा।”

जानिए कैसे RSS को रोकने के लिए कॉन्ग्रेस ने चली चालें

बता दें कि जिस RSS को पीएम ने विश्व का सबसे बड़ा NGO कहा है, उसे रोकने के लिए कॉन्ग्रेस ने कम चालें नहीं चली हैं। कॉन्ग्रेस की सरकार ने 3 बार RSS पर प्रतिबंध लगाया। 60 के दशक में कॉन्ग्रेस ने सरकारी कर्मचारियों के RSS की गतिविधियों में शामिल होने पर बैन ही लगा दिया था।

महात्मा गाँधी की हत्या के बाद कॉन्ग्रेस ने RSS को खुलेआम टारगेट करना शुरू किया। कॉन्ग्रेस ने मौके का फायदा उठाते हुए संघ पर बैन लगा दिया था। हालाँकि बाद में गृहमंत्री सरदार पटेल ने इसके खिलाफ आवाज उठाई, जिसके बाद इस बैन को हटाया गया। RSS कॉन्ग्रेस की आँखों में हमेशा ही खटकता रहा है। 1966 में सरकारी कर्मचारियों को इस संगठन की गतिविधियों में भाग लेने से रोक दिया गया।

1975 में जब इमरजेंसी लागू हुई तो फिर RSS को बैन किया गया। 1977 के चुनावों में RSS ने इसके खिलाफ आवाज उठाते हुए विरोध प्रदर्शन किया। इसका असर इतना प्रभावी हुआ कि न सिर्फ पार्टी हारी, बल्कि इंदिरा गाँधी और उनके बेटे संजय गाँधी तक अपनी सीटों से हाथ धो बैठे। इसके बाद RSS से फिर से बैन हटाया गया।

कॉन्ग्रेस को RSS की ये जीत कहाँ सुहाने वाली थी। 1992 में जब अयोध्या में कारसेवा के बाद बाबरी ढाँचा गिरा तो फिर कॉन्ग्रेस को RSS पर बैन लगाने का मौका मिला गया। इस बार UAPA 1967 के प्रावधानों के तहत बैन लगाया गया।

कॉन्ग्रेस ने ढाँचा गिरने का सारा इल्जाम RSS पर लगा दिया। मामला ट्रिब्यूनल कोर्ट तक गया, हालाँकि कोर्ट को RSS के विरुद्ध पर्याप्त सबूत नहीं मिले और RSS से बैन एक बार फिर हटा दिया गया।

कुछ भी हासिल नहीं हुआ तो संघ से जुड़े लोगों की छीन ली नौकरी

RSS पर प्रतिबंध नहीं लग सका तो कॉन्ग्रेस ने संघ के सरकारी कर्मचारियों को इस संगठन की गतिविधियों में शामिल होने से रोकने का प्रयास किया। पुलिस को आदेश दिया गया कि वे सत्यापित करें कि केंद्र में काम करने वाले लोग RSS से तो नहीं जुड़े, अगर जुड़े हैं तो उनकी नियुक्ति रद्द कर दी जाए। कॉन्ग्रेस ने स्पष्ट रूप से निर्देश दिया कि उन्हें नौकरी देने से मना कर दो और नौकरी से हटा दो।

कॉन्ग्रेस की इस तानाशाही का भुक्तभोगी रामशंकर रघुवंशी को भी बताया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार रघुवंशी स्कूल शिक्षक थे। रघुवंशी को पहले पूर्व में हुए सत्यापन पर स्कूल में शामिल कर लिया गया। हालाँकि बाद में पुलिस ने सरकार को बताया कि वो एक समय में RSS और जनसंघ की गतिविधियों में शामिल थे तो उन्हें नौकरी से हटा दिया गया।

इसी तरह, रंगनाथाचार्य अग्निहोत्री को कर्नाटक में मुंसिफ के पद के लिए चुना गया था। पुलिस सत्यापन में पता चला कि वे पहले येलबुर्गा में RSS से जुड़े रहे थे। जिसका फायदा उठाते हुए सरकार ने उन्हें नौकरी में प्रवेश देने से मना कर दिया।

उदाहरण के तौर पर नागपुर के चिंतामणि की भी कहानी सामने आई। वे उप पोस्ट मास्टर थे। उन पर आरोप लगाया गया था कि वे RSS के सदस्य हैं और संक्रांति के अवसर पर RSS कार्यालय गए थे। इतनी सी बात के लिए चिंतामणि को सेवा से हटा दिया गया था।

हालाँकि चिंतामणी ने हार नहीं मानी वो इंसाफ के लिए मैसूर हाई कोर्ट पहुँचे। मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा, “प्रथम दृष्टया RSS एक गैर-राजनीतिक सांस्कृतिक संगठन है। इसमें गैर-हिंदुओं के प्रति कोई घृणा या दुर्भावना नहीं है। देश के कई प्रतिष्ठित और सम्मानित व्यक्तियों ने इसके कार्यों की अध्यक्षता करने या इसके स्वयंसेवकों के काम की सराहना करने में संकोच नहीं किया है।”

कोर्ट ने कहा, “हमारे जैसे देश में जहाँ लोकतंत्र है (जैसा कि संविधान द्वारा सुनिश्चित किया गया है), यह प्रस्ताव स्वीकार करना उचित नहीं होगा कि ऐसे शांतिपूर्ण या अहिंसक संघ की सदस्यता और उसकी गतिविधियों में भागीदारी मात्र से कोई व्यक्ति (जिसके चरित्र और पूर्ववृत्त में कोई अन्य दोष नहीं है) मुंसिफ के पद पर नियुक्त होने के लिए अनुपयुक्त हो जाएगा।”

बाद में उन्होंने विशेष सिविल अपील संख्या 22/52 में बॉम्बे (नागपुर बेंच) में हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मामले में कोर्ट ने कहा, “याचिकाकर्ता चिंतामणि के मामले में पहला आरोप यह है कि वह RSS की गतिविधियों से जुड़े हुए हैं और उसमें सक्रिय रूप से भाग ले रहे है।

हालाँकि चिंतामणि ने इस आरोप से इनकार किया है, मगर हम मान सकते हैं कि प्रतिवादी के अनुसार आरोप सत्य है… लेकिन ये भी गौर हो RSS ऐसा संगठन नहीं है जिसे गैरकानूनी घोषित किया गया हो। आरोप में यह भी नहीं बताया गया है कि RSS की कौन सी गतिविधियाँ हैं, जिनमें भागीदारी या जिनसे जुड़ाव को विध्वंसक माना जाता है।”

कोर्ट ने चिंतामणि पर लगाए गए आरोपों को लेकर कहा कि सरकार बेहद अस्पष्ट है। जब तक किसी व्यक्ति पर उचित रूप से यह संदेह न हो कि वह कुछ गैरकानूनी काम कर रहा है या सार्वजनिक सुरक्षा के लिए हानिकारक है, तब तक यह कहना मुश्किल है कि किसी ऐसी संस्था से जुड़ाव मात्र, जिसे न तो गैरकानूनी घोषित किया गया है और न ही किसी असामाजिक या देशद्रोही गतिविधियों या शांति भंग करने वाली गतिविधियों में लिप्त होने का आरोप या दिखाया गया है, नियम 3 के तहत कार्रवाई का आधार बन सकता है।

आँकड़े और भी हैं। कहा जाता है कि RSS के सदस्यों के मामलों की सुनवाई कई हाई कोर्ट्स में की गई। सभी मामलों में ऐसे ही शिकायतें सामने आईं कि केवल संगठन से जुड़ने पर नौकरी से निकाले जाने के प्रयास हुए। प्रधानमंत्री मोदी ने RSS के ‘स्वयंसेवकों’ पर लगा यह प्रतिबंध 2024 में हटा दिया था।

प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से जिस तरह RSS की सेवाओं का उल्लेख किया है, उसकी सेवा को मान दिया है, वह कॉन्ग्रेस को अपने मुँह पर चाँटे की तरह महसूस हो रहा होगा, क्योंकि यह सम्मान संघ ने कॉन्ग्रेस के जुल्म को सहते हुए लगातार देश सेवा कर अर्जित किया है।

बलूचिस्तान में ‘अमेरिकी खुदाई’ का बनाया जा रहा रास्ता, सोना निकालने वाली कनाडाई कंपनी ने G7 देशों से माँगे ₹29050 करोड़: सऊदी अरब ने फंडिंग से कर दिया है इनकार

बलूचिस्तान एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में है। इस बार कारण है इसके प्राकृतिक संसाधनों को लेकर बढ़ती वैश्विक दिलचस्पी। कनाडा की कंपनी बैरिक माइनिंग ने विवादित रेको दिक तांबा-सोना परियोजना के लिए 3.5 अरब डॉलर (29,050 करोड़ रुपए) की फंडिंग की माँग की है।

सऊदी अरब ने इस परियोजना में निवेश से इनकार कर दिया है। अब कंपनी अमेरिकी नेतृत्व में G7 फाइनेंसिंग पैकेज तैयार कर रही है, जिससे 2028 तक खदान से उत्पादन शुरू होने की उम्मीद है।

बैरिक माइनिंग के सीईओ मार्क ब्रिस्टो के अनुसार, अमेरिकी सरकार, एशियाई विकास बैंक, अंतर्राष्ट्रीय वित्त निगम (IFC), अमेरिकी अंतर्राष्ट्रीय विकास वित्त निगम, कनाडा, जापान और जर्मनी के वित्तीय संस्थान इस परियोजना में गहरी रुचि दिखा रहे हैं।

उन्होंने फाइनेंशियल टाइम्स को बताया कि अमेरिका के समर्थन से पाकिस्तान को कॉपर कॉन्सन्ट्रेट (तांबे का कच्चा रूप) तक पहुँच मिलेगी, हालाँकि इसके लिए अभी और प्रोसेसिंग की आवश्यकता है। यह परियोजना न केवल पाकिस्तान के आर्थिक भविष्य के लिए अहम मानी जा रही है, बल्कि यह भी दिखाती है कि कैसे वैश्विक ताकतें बलूचिस्तान जैसे संवेदनशील क्षेत्र में संसाधनों को लेकर सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।

बलूचिस्तान की सबसे बड़ी खनिज परियोजना

रेको दिक खदान को दुनिया की सबसे बड़ी और अब तक अविकसित तांबा-सोना परियोजनाओं में से एक माना जाता है। अनुमान है कि अगले 37 वर्षों के खनन काल में यह परियोजना लगभग 70 अरब डॉलर (5.81 लाख करोड़ रुपए) का फ्री कैश फ्लो (Free Cash Flow) और करीब 90 अरब डॉलर (7.47 लाख करोड़ रुपए) का कुल ऑपरेटिंग कैश फ्लो (Operating Cash Flow) उत्पन्न कर सकती है।

इस महत्वाकांक्षी परियोजना की मालिकाना हिस्सेदारी तीन पक्षों के बीच साझा है। जिसमें कनाडा की बैरिक गोल्ड कंपनी, पाकिस्तान की संघीय सरकार और बलूचिस्तान की प्रांतीय सरकार शामिल है।

इसकी फंडिंग के लिए कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से बातचीत चल रही है। इस साल की शुरुआत में टिम क्रिब ने बताया था कि रेको दिक परियोजना को अंतरराष्ट्रीय विकास संघ (IDA) और अंतरराष्ट्रीय वित्त निगम (IFC) से लगभग 650 मिलियन डॉलर (5,395 करोड़ रुपए) की सहायता मिलने की उम्मीद है।

वहीं, अमेरिकी निर्यात-आयात बैंक (US EXIM Bank) से 500 मिलियन से 1 अरब डॉलर (4,150 करोड़ रुपए से 8,300 करोड़ रुपए) तक की फंडिंग की संभावना जताई गई है। इसके अलावा, परियोजना जापान बैंक फॉर इंटरनेशनल को ऑपरेशन, एक्सपोर्ट डेवलपमेंट कनाडा और एशियाई विकास बैंक जैसे अन्य वित्तीय संगठनों से भी 500 मिलियन डॉलर (4,150 करोड़ रुपए) की अतिरिक्त राशि जुटाने का प्रयास कर रही है।

यह परियोजना पाकिस्तान के आर्थिक विकास के लिए एक बड़ा अवसर मानी जा रही है और इसमें वैश्विक स्तर पर बढ़ती दिलचस्पी बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों की अहमियत को भी दिखाती है।

भारत के साथ टैरिफ युद्ध के बीच ट्रंप के करीब आने की कोशिश कर रहा पाक

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर रूस से तेल खरीदने को लेकर टैरिफ वॉर छेड़ दिया है। इससे भारत-अमेरिका के बीच तनाव बढ़ गया है। इसी दौरान पाकिस्तान ने अमेरिका और ट्रंप से नजदीकियाँ बढ़ा ली हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और असली ताकत रखने वाले सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर ने ट्रंप की खुलकर चमचागिरी की है, जिससे अमेरिका से उनके रिश्ते मजबूत हुए हैं।

पाकिस्तानी फौज समर्थित सरकार ने कई बार ट्रंप को इस ‘दावे’ के लिए धन्यवाद दिया है कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्षविराम (सीजफायर) समझौते में कोई भूमिका निभाई। हालाँकि, असलियत यह है कि भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान को सैन्य रूप से करारी हार दी थी। यह ऑपरेशन पाकिस्तान-प्रायोजित पहलगाम आतंकवादी हमले के बाद किया गया था, जिसमें 26 लोग मारे गए थे।

इस शर्मनाक हार के बाद पाकिस्तान ने खुद भारत से संघर्षविराम की अपील की थी, जिसे भारत ने रणनीतिक रूप से मान लिया। इसके बाद से पाकिस्तान की फौज के प्रमुख असीम मुनीर दो बार अमेरिका का दौरा कर चुके हैं।

पाकिस्तान की खुशामदी नीति से प्रभावित होकर ट्रंप प्रशासन ने हाल ही में बलूचिस्तान की आज़ादी के लिए लड़ रही बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) और उसकी मजीद ब्रिगेड को ‘विदेशी आतंकी संगठन’ घोषित कर दिया है। इससे बलूच स्वतंत्रता सेनानियों को अब अमेरिका की नजर में आतंकवादी बताया गया है।

बलूचिस्तान में पाकिस्तान का विरोध

बलूचिस्तान, जो पाकिस्तान का सबसे उपेक्षित और शोषित प्रांत माना जाता है, लंबे समय से प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और स्थानीय लोगों के दमन का शिकार रहा है। बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) ने वर्षों से पाकिस्तानी फौज, चीनी कर्मियों और चीन की उन परियोजनाओं पर हमले किए हैं, जो बलूच संसाधनों का दोहन करती हैं।

बलूच समुदाय का आरोप है कि पाकिस्तान और चीन मिलकर उनके खनिज और ऊर्जा संसाधनों का फायदा उठा रहे हैं, लेकिन स्थानीय लोगों को उसका कोई लाभ नहीं मिलता। इस बीच, अमेरिका की भूमिका भी इस क्षेत्र में तेजी से बढ़ रही है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हाल ही में पाकिस्तान के कथित विशाल तेल भंडार को संयुक्त रूप से विकसित करने के लिए एक नया व्यापार समझौता पेश किया था। यह ऐलान उस समय हुआ जब अमेरिका ने भारत से आयात होने वाले सामान पर भारी टैरिफ और दंडात्मक शुल्क लगाने की घोषणा की थी।

ट्रम्प ने यहाँ तक कह दिया कि एक दिन पाकिस्तान भारत को तेल बेच सकता है। इसी दौरान अमेरिका ने BLA को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया, जो ट्रम्प के पाकिस्तान समर्थक रुख और बलूचिस्तान के खनिज संसाधनों में बढ़ती अमेरिकी दिलचस्पी को और भी संदिग्ध बना देता है। बलूच स्वतंत्रता सेनानियों ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के तहत ग्वादर बंदरगाह में चीनी प्रभाव का लगातार विरोध किया है।

अब कनाडा की कंपनी बैरिक माइनिंग रेको डिक तांबा-सोना परियोजना के लिए 3.5 अरब डॉलर की फंडिंग जुटाने में लगी है, जिसमें अमेरिकी संस्थानों की भी भागीदारी है। इससे यह साफ झलकता है कि पाकिस्तानी सेना बलूचिस्तान के बहुमूल्य संसाधनों को डॉलर के बदले विदेशी कंपनियों को सौंप रही है, जबकि बलूच जनता दमन और हिंसा का शिकार बनी हुई है।

इतिहास गवाह है कि बलूचिस्तान से मिलने वाली गैस और बिजली हमेशा पंजाब और पाकिस्तान के अन्य प्रांतों को दी जाती रही है, जबकि बलूच लोग खुद मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। अब विदेशी कंपनियाँ, जिनमें अमेरिकी समर्थन वाली कंपनियाँ भी शामिल हैं, बलूचिस्तान के खनिजों से अरबों का मुनाफा कमाएँगी। यह स्थिति इस ओर इशारा करती है कि बलूचिस्तान आने वाले समय में अमेरिका के लिए एक नया तेल युद्ध स्थल बन सकता है।

सैन्य ठिकाने ही नहीं, अब अस्पतालों से लेकर मंदिरों की भी सुरक्षा में ‘सुदर्शन कवच’ रहेगा तैनात: PM मोदी ने कहा- श्रीकृष्ण के सुदर्शन से मिली प्रेरणा, जानें 2035 तक कैसे बदलेगी तस्वीर

आज स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की सुरक्षा को लेकर एक ऐतिहासिक घोषणा की। उन्होंने कहा कि अगले दस साल, यानी 2035 तक, भारत के हर अहम सामरिक और नागरिक ठिकाने को ‘मिशन सुदर्शन चक्र’ के तहत हाई-टेक सुरक्षा कवच से लैस किया जाएगा।

यह सिर्फ सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं होगा, बल्कि अस्पताल, रेलवे स्टेशन, धार्मिक स्थल, बड़े बाजार और सार्वजनिक भीड़-भाड़ वाले सभी प्रमुख स्थान इसमें शामिल होंगे। पीएम मोदी ने कहा कि इस मिशन की प्रेरणा भगवान श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र से ली गई है। जैसे वह चक्र दुश्मन के वार को रोककर तुरंत पलटवार करता था, वैसे ही यह आधुनिक सुरक्षा कवच भी काम करेगा।

क्या है मिशन सुदर्शन चक्र और कैसे करेगा काम

मिशन सुदर्शन चक्र एक अत्याधुनिक बहु-स्तरीय सुरक्षा प्रणाली है, जिसका उद्देश्य किसी भी हवाई, ड्रोन, मिसाइल या रॉकेट हमले को पहले ही पहचानकर उसे निष्क्रिय करना है। इसकी खासियत यह होगी कि यह ‘डिटेक्ट डिफेंड काउंटर अटैक’ के सिद्धांत पर काम करेगा।

इस सिद्धांत के तहत पहले खतरे का पता लगेगा, फिर उसे नष्ट किया जाएगा और जरूरत पड़ने पर हमलावर पर जवाबी कार्रवाई भी होगी। इसमें रडार नेटवर्क, हाई-स्पीड डेटा प्रोसेसिंग, इंटरसेप्टर मिसाइलें और लेजर डिफेंस सिस्टम शामिल होंगे।

मिशन के तहत देश भर में एकीकृत सुरक्षा ग्रिड बनाया जाएगा, जो सभी बड़े शहरों, संवेदनशील क्षेत्रों और सीमा इलाकों को आपस में जोड़ेगा। जैसे ही किसी भी दिशा से हमला करने वाली मिसाइल, ड्रोन या हवाई जहाज का संकेत मिलेगा, यह ग्रिड तुरंत सक्रिय हो जाएगी।

सेकंडों में खतरे की पहचान होगी, लक्ष्य का ट्रैकिंग होगा और फिर उसे नष्ट करने के आदेश जारी होंगे। इस पूरी प्रक्रिया में AI और मशीन लर्निंग तकनीक का बड़ा योगदान होगा, जो पिछले हमलों के पैटर्न के आधार पर भविष्य के खतरों को भी भांप लेगी।

एस-400 – सुदर्शन से मिली प्रेरणा

इस मिशन की अवधारणा भारतीय वायुसेना के पास मौजूद एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम के अनुभव से आई है। भारत ने रूस से 2018-19 में 35,000 करोड़ रुपए  में पाँच एस-400 स्क्वाड्रन खरीदने का समझौता किया था।

अब तक तीन स्क्वाड्रन भारत को मिल चुके हैं और बाकी दो 2026 तक आ जाएँगे। इस सिस्टम को भारतीय वायुसेना ने ‘सुदर्शन’ नाम दिया है। एस-400 की ताकत का सबसे बड़ा प्रदर्शन मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हुआ, जब भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के कई ठिकानों को निशाना बनाया।

इस ऑपरेशन में सुदर्शन ने 300 किलोमीटर दूर से पाँच पाकिस्तानी लड़ाकू विमान और एक AEW&C की निगरानी विमान को मार गिराया। यह सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल का अब तक का सबसे लंबी दूरी का सफल हमला था।

इसके अलावा, इस सिस्टम ने दर्जनों ड्रोन और मिसाइल हमलों को भी नाकाम किया। पाकिस्तान के कई कमांड सेंटर, रडार स्टेशन और आतंकी ठिकाने तबाह हुए। इस घटना ने साबित कर दिया कि लंबी दूरी की और तेज प्रतिक्रिया देने वाली एयर डिफेंस प्रणाली देश की सुरक्षा के लिए कितनी अहम है।

2035 तक का लक्ष्य

पीएम मोदी के अनुसार, मिशन सुदर्शन चक्र का लक्ष्य अगले दस सालों में पूरा होगा। इस अवधि में देश के सभी रणनीतिक और संवेदनशील स्थानों पर यह सुरक्षा कवच लगाया जाएगा।

पहले चरण में सेना के ठिकाने, वायुसेना स्टेशन, नौसेना के बेस, परमाणु संयंत्र, रॉकेट लॉन्च स्टेशन और रक्षा उद्योग केंद्रों को जोड़ा जाएगा। इसके बाद रेलवे स्टेशन, मेट्रो स्टेशन, एयरपोर्ट, अस्पताल, धार्मिक स्थल, बड़े स्टेडियम और भीड़-भाड़ वाले बाजारों को भी इस प्रणाली से कवर किया जाएगा।

इस मिशन के लिए बड़े पैमाने पर घरेलू रिसर्च और मैन्युफैक्चरिंग की जाएगी। इसके लिए सरकार ने ‘प्लस वन नीति’ अपनाने का फैसला किया है, जिसमें हर विदेशी तकनीक के साथ एक भारतीय तकनीक का विकास अनिवार्य होगा।

यानी अगर कोई उपकरण बाहर से खरीदा जाएगा, तो उसका एक स्वदेशी संस्करण भी तैयार किया जाएगा। इससे तकनीकी आत्मनिर्भरता के साथ-साथ निर्यात की संभावनाएँ भी बढ़ेंगी।

क्यों जरूरी है यह मिशन

भारत की भौगोलिक स्थिति और सुरक्षा चुनौतियाँ इस मिशन को बेहद अहम बनाती हैं। एक ओर पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसी देश हैं, जिनसे सैन्य तनाव बना रहता है, वहीं दूसरी ओर ड्रोन और मिसाइल तकनीक का प्रसार आतंकवादी संगठनों तक भी पहुँच चुका है।

हाल के वर्षों में पाकिस्तान की ओर से कई बार ड्रोन के जरिये हथियार और विस्फोटक भेजे गए हैं। 2021 में जम्मू एयरफोर्स स्टेशन पर ड्रोन हमला इसका उदाहरण है। इसके अलावा, देश के भीतर भीड़-भाड़ वाले सार्वजनिक स्थलों पर सुरक्षा खतरे बढ़ते जा रहे हैं।

ऐसे में सिर्फ फिजिकल सुरक्षा इंतजाम काफी नहीं हैं। एक ऐसी ऑल-इन-वन तकनीक की जरूरत है जो खतरे को दूर से भांपकर तुरंत प्रतिक्रिया दे सके। मिशन सुदर्शन चक्र इस कमी को पूरा करेगा और देश को एक आधुनिक सुरक्षा कवच प्रदान करेगा।