भारत के साथ चली आ रही रही तनातनी के बीच इस्लामी मुल्क नीचता पर उतर आया है। खबर है कि पाकिस्तान ने इस्लामाबाद में भारतीय उच्चायोग (Indian High Commission) के कर्मचारियों और उनके परिवारों को बुनियादी जरूरतों की आपूर्ति पर रोक लगा दी है। इस कदम को भारत ने ‘जानबूझकर उठाया गया एक पूर्व-निर्धारित’ कदम बताया है।
जानकारी के अनुसार, भारत ने इसे विएना कन्वेंशन (Vienna Convention) का उल्लंघन कहा है, जो गारंटी देता है कि एक मुल्क में दूसरे देश के राजनयिकों की सुरक्षा और कामकाज करने को गारंटी मिलेगी।
रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय राजनयिकों को अब खाना पकाने के लिए गैस, पीने के लिए साफ पानी, यहाँ तक कि अखबार भी नहीं मिल पा रहे हैं। गैस पाइपलाइन होने के बावजूद गैस की सप्लाई बंद कर दी गई है। जिन दुकानदारों से पहले गैस सिलेंडर मिलते थे, उन्हें अब भारतीय स्टाफ को कुछ भी बेचने से मना कर दिया गया है।
इसके अलावा पीने के पानी की नियमित सप्लाई भी रोक दी गई है और सभी स्थानीय वाटर वेंडर्स को उच्चायोग को पानी न देने का निर्देश दिया गया है। वहीं अखबारों की सप्लाई बंद होने से भारतीय राजनयिकों की स्थानीय खबरों तक पहुँच मुश्किल हो गई है।
क्या है इसकी वजह?
सरकारी अधिकारियों का कहना है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI ने यह कदम भारत के हाल के दो फैसलों के जवाब में उठाया है। इसमें पहला है, ऑपरेशन सिंदूर की सफलता और दूसरा है सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को भारत द्वारा सस्पेंड करना।
इन दोनों घटनाओं के बाद पाकिस्तान ने यह ‘छोटी सोच वाली बदले की कार्रवाई’ की है, ताकि इस्लामाबाद में रह रहे भारतीय राजनयिकों की जिंदगी मुश्किल हो जाए। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि भारत भी अब पाकिस्तान के राजनयिकों के खिलाफ जवाबी कार्रवाई कर सकता है।
बता दें कि यह पहली बार नहीं है जब इस तरह की हरकत हुई है। 2019 में पुलवामा हमले के बाद भारत द्वारा बालाकोट के समय भी इसी तरह भारतीय राजनयिकों को परेशान किया गया था।
पाकिस्तान ने भारतीय राजनयिकों की निगरानी भी बढ़ा दी है। उनके घरों और दफ्तरों पर नजर रखी जा रही है। भारत का कहना है कि पाकिस्तान की ये हरकतें विएना कन्वेंशन का सीधा उल्लंघन हैं, जो किसी भी देश में राजनयिकों को बुनियादी सुविधाएँ देने और उनके सम्मान की रक्षा करने की बात करता है। भारत ने चेतावनी दी है कि इस तरह की घटनाएँ दोनों देशों के बीच रिश्तों को और ज्यादा नुकसान पहुँचा सकती हैं।
अमेरिका ने बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी और उससे जुड़ी मजीद ब्रिगेड को आतंकी संगठन घोषित कर दिया है। इससे पहले पाकिस्तान के तेल भंडार को विकसित करने के लिए अमेरिका पहले ही समझौता कर चुका है। बलूचिस्तान में पाकिस्तान का तेल और गैस भंडार है जिसका नए सिरे से दोहन करने की तैयारी है। बीएलए इलाके के आर्थिक शोषण का विरोध करता रहा है।
बीएलए को अमेरिका ने घोषित किया विदेशी आतंकी संगठन
अमेरिका ने पाकिस्तान की मुराद पूरी कर दी है। उसने बलूच लिबरेशन आर्मी यानी बीएलए और मजीद ब्रिगेड को विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया है। इसकी घोषणा 11 अगस्त 2025 को अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने की। अमेरिका अब इन संगठनों की हर एक्टिविटी पर प्रतिबंध लगा देगा। अमेरिका स्थित संगठन के सदस्यों की संपत्तियों को जब्त कर सकता है। अमेरिकी विदेश विभाग के मुताबिक, ये कदम आतंकवाद पर अमेरिकी सख्ती को दिखाता है। दरअसल बलूच विद्रोहियों पर एक्शन लेने की माँग पाक आर्मी चीफ ने विश्वसमुदाय से की थी
बलूच समूहों ने अमेरिकी आतंकवाद के टैग को खारिज करते हुए इसे आत्मनिर्णय की लड़ाई बताया है, क्योंकि ट्रम्प के पाकिस्तान तेल समझौते से इस क्षेत्र में अमेरिका की और अधिक भागीदारी की आशंका बढ़ गई है, जो पहले से ही संसाधन दोहन और राजनीतिक अशांति से ग्रस्त है।
ट्रंप के ‘पाकिस्तान प्रेम’ की एक वजह तेल भी
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में पाकिस्तान के ‘तेल भंडार’ को संयुक्त रूप से विकसित करने के लिए इस्लामाबाद के साथ एक नए व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। यह घोषणा भारतीय आयातों पर 25% टैरिफ और अतिरिक्त दंड के पहले दौर की घोषणा के कुछ ही घंटों बाद हुई थी। दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप ने दावा किया कि किसी दिन पाकिस्तान भारत को तेल बेच सकता है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट में ट्रंप ने कहा, “हमने अभी-अभी पाकिस्तान के साथ एक समझौता किया है, जिसके तहत पाकिस्तान और अमेरिका अपने विशाल तेल भंडार को विकसित करने के लिए मिलकर काम करेंगे… कौन जाने, शायद वे किसी दिन भारत को भी तेल बेचेंगे!”
फोटो साभार- ट्रूथ
बलूचिस्तान कहाँ है?
बलूचिस्तान वो इलाका है जो पाकिस्तान को ईरान और अफगानिस्तान से जोड़ता है। बलूचिस्तान को अलग देश बनाने की माँग होती है। ये पाकिस्तान का सबसे बड़ा हिस्सा है। पाकिस्तान ने बलूचियों के साथ काफी दुर्व्यवहार किया जाता रहा है। पाकिस्तानी फौज की दमनकारी नीति, आर्थिक और सामाजिक शोषण की वजह से बलूचिस्तानी की आजादी की माँग को लेकर बलूच लिबरेशन आर्मी का गठन किया गया। इससे जुड़ा माजिद ब्रिगेड भी है।
पाकिस्तान ने जबरन किया था कब्जा
1948 में पाकिस्तान ने इस प्रांत को अपने में मिला लिया था। ये पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है, लेकिन आबादी सबसे कम है। 2023 की जनगणना के मुताबिक पाकिस्तान की आबादी करीब 24 करोड़ है, लेकिन बलुचिस्तान की आबादी मात्र 1.5 करोड़ है।
बलूच 1948 से ही पाकिस्तान से आजादी की माँग करते आ रहे हैं। उनके राजा को धोखा देकर पाकिस्तान ने इलाके पर कब्जा किया था। दरअसल जब भारत का बँटवारा हुआ और प्रांतों को भारत या पाकिस्तान या फिर आजाद रहने का विकल्प दिया गया तो बलूचिस्तान ने फैसला नहीं लिया था कि उसे किसके साथ जाना है या अलग मुल्क बन कर रहना है। स्थिति का फायदा उठाकर पाकिस्तान ने राजा अहमद यार खान को मजबूर किया कि वह पाकिस्तान में अपने ‘रियासत कलात’ का विलय कर दें। हालाँकि इसके खिलाफ पहला विद्रोह 1948 में ही हो गया था।
पाकिस्तान में विलय के लिए नेहरू भी जिम्मेदार
तिलक देवाशर की किताब ‘द बलूचिस्तान कोरंड्रम’ के अनुसार, कलात के खान ने अंग्रेजों से कहा था कि वह आजाद रहना चाहते हैं। इसको लेकर दस्तावेज भी अंग्रेजों द्वारा भेजे गए कैबिनेट मिशन को दिए थे। मजे की बात यह है कि इस काम में मोहम्मद अली जिन्ना ने उनकी सहायता की थी। जिन्ना कलात के खान के वकील थे। ‘कलात के खान’ और कलात के प्रधानमंत्री तथा विदेश मंत्री की 1947 में बलूचिस्तान के भविष्य को लेकर बैठक हुई थी।
हमद यार खान ने कहा कि पाकिस्तान में शामिल होना जनता के विरोध के कारण चुनौतीपूर्ण था। इसके अलावा भारत वाले विकल्प को पाकिस्तान की चिंताओं पर नकार दिया गया था।
अहमद यार खान ने कथित तौर पर दावा किया कि नेहरू उनसे नफरत करते थे और कॉन्ग्रेस ने कभी उन पर भरोसा नहीं किया। कलात के विदेश मंत्री डगलस येट्स फेल ईरान में शामिल होने के पक्ष में थे। उन्होंने इसे बलोच एकता के लिए फायदेमंद करार दिया था। गौरतलब है कि बड़ी बलोच आबादी ईरान में रहती है। हालाँकि, कलात के खान अफगानिस्तान में भी शामिल होने के पक्ष में थे लेकिन इस पर भी नहीं बात बन पाई। अंत में लंदन वाला विकल्प भी नकार दिया गया।
इसके बाद कलात के खान के पास कोई विकल्प नहीं शेष थे। इसी बीच पाकिस्तान ने लासबेला, मकरान और खरान को मिला लिया। अब कलात बीच में फंस गया और उसके पाकिस्तान में मिलने के सिवा कोई चारा ना रहा। बलूच के पाकिस्तान में मिलने में नेहरू के ढीलेढाले रवैये का अहम रोल था।
पाकिस्तान ने बलूचिस्तान को लूटा
बलूचियों का कहना है कि पाकिस्तानी सरकार ने अब तक सिर्फ इस प्रांत को लूटा है और लोगों की उपेक्षा की है। मिनरल्स से भरपूर इस प्रांत में कोयला,सोना, तांबा, गैस की बहुतायत है। फिर भी पाकिस्तान जैसे भिखारी देश का ये सबसे गरीब इलाका है। आज भी पाकिस्तान का सबसे बड़ा बंदरगाह ग्वादर इसी क्षेत्र में है। ये चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा यानी सीपीईसी के लिए काफी अहम है।
बलूचिस्तान के सुई इलाके में 1950 के ही दशक में गैस का पता चला था। इस गैस की लूट मचा दी गई। पाकिस्तान ने बलूचिस्तान में इस गैस की सप्लाई नहीं दी बल्कि पंजाब और सिंध तक पहुँचाई। यहाँ तक कि 1990 का दशक आते-आते यह गैस लगभग खत्म हो गई। इसके बाद पाकिस्तान के हुक्मरानों ने बलूचिस्तान में जमीन बेच दी। वर्तमान में बलूचिस्तान का ग्वादर बंदरगाह और एयरपोर्ट चीन के अधीन है। स्थानीय लोग इसका विरोध करते हैं।
बलूचिस्तान में अयस्क और खनिज भरे हुए हैं। पाकिस्तान ने यह भी चीन को लगभग बेच दिए हैं। इससे भी बलोच लोगों में गुस्सा है। बलूचिस्तान में स्कूल, अस्पताल जैसी बुनियादी सुविधाएँ भी पाकिस्तान ने नहीं पहुँचाई हैं। ऐसे में विद्रोह के लिए लोग मजबूर हो रहे हैं। बलोच महिलाएँ भी इस विद्रोह में शामिल हैं। इन महिलाओं को पाकिस्तानी फौज ने अत्याचार का शिकार बनाया है।
बलाच मर्री ने की बीएलए की स्थापना
पाकिस्तान द्वार कब्जा कर लिए जाने के बाद बलुचियों ने अलग राष्ट्र की स्थापना के लिए संघर्षरत रहे हैं। इनका कहना है कि प्रांत के संसाधनों का बड़ा हिस्सा उनके प्रांत के काम आना चाहिए। 2000 के दशक में बलूचिस्तान की आजादी की माँग को लेकर बीएलए यानी बलूच लिबरेशन आर्मी की स्थापना की गई। बलूच राष्ट्रवादी नेता नवाब खैर बख्श मर्री के बेटे बलाच मर्री ने इसकी स्थापना की।
बलूचिस्तान में विद्रोह को दबाने के लिए पाकिस्तानी फौज ने प्रदर्शन करने वाले निर्दोष बलूचों पर हवाई हमले किए। उनपर गोलियाँ बरसाईं। 2006 में बलूच के बड़े नेता नवाब अकबर बुगती की हत्या पाकिस्तानी फौजी शासक परवेज मुशर्रफ ने करवा दी। उनके शव तक को परिवार को नहीं सौंपा। इसके बाद बलोच और भी भड़क गए। पाकिस्तानी सरकार एक के बाद एक बलूची नेताओं की हत्या करने लगे।
एक साल बाद बलूची नेता बलाच मरी की भी हत्या कर दी गई। पाकिस्तानी हुक्मरान ने बीएलए पर प्रतिबंध लगा दिया। ये विद्रोह 2005 में उस वक्त और ज्यादा भड़क गई जब बलूचिस्तान में तैनात एक फौज के मेजर ने एक बलोच लड़की के साथ बलात्कार किया। उस पर कार्रवाई करने के बजाय परवेज मुशर्रफ ने उसे बचाया और बलोच लोगों को धमकाया।
पूर्ण स्वतंत्रता चाहते हैं बलूची
बीएलए प्रतिबंध के बावजूद पूर्ण स्वतंत्रता की माँग को लेकर संघर्ष कर रहा है। बशीर जैब बलूच बीएलए ने फिलहाल नेतृत्वकर्ता माने जाते हैं। संगठन में महिलाओं को भी शामिल किया गया है। माजिद ब्रिगेड का नेतृत्व हम्माल रेहान के हाथों में है। संगठन की ट्रेनिंग में रहमान गुल बलूच का अहम रोल है। वो पाकिस्तानी फौज के पूर्व अधिकारी हैं।
बीएलए चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा यानी सीपीईसी का विरोधी है। संगठन का मानना है कि ये आर्थिक शोषण के लिए बनाया गया है। इसलिए पाकिस्तान में हुए कई हमलों को बीएलए ने अंजाम दिया है। 2024 में कराची हवाई अड्डा और ग्वादर बंदरगाह प्राधिकरण के परिसर में हमला शामिल है। 2025 में क्वेटा से पेशावर जा रही जाफर एक्सप्रेस ट्रेन को हाईजैक कर बीएलए ने किया था। 2018 में पाकिस्तान स्थित चीन के वाणिज्य दूतावास पर हमले की जिम्मेदारी संगठन ने ली थी।
बलूचिस्तान में 5 बार बड़े विद्रोह की आग भड़क चुकी है। अगर 1980-90 का दशक छोड़ दिया जाए तो अब तक लगातार हर दशक में बलूच विद्रोही उठ खड़े हुए हैं। वर्तमान में बलूचिस्तान में चल रही लड़ाई की चिंगारी 2005 में भड़की थी। तब से पाकिस्तानी फौज के साथ बलूच लिबरेशन आर्मी की टक्कर होती रहती है।
चुनाव आयोग (ECI) ने बिहार में स्पेशल इंटेंशिव रिवीजन (SIR) के तहत मतदाता सूची की खास समीक्षा की। इसमें 60 लाख से ज्यादा फर्जी या अपंजीकृत मतदाता सामने आए। इस खुलासे ने भारतीय लोकतंत्र में फर्जी वोटिंग और राजनीतिक संरक्षण के जरिए वोटरों की घुसपैठ की गंभीरता को उजागर कर दिया है।
इस अभियान के दौरान जो सामने आया कि 35 लाख लोग या तो अब नहीं मिल रहे हैं या हमेशा के लिए कहीं और चले गए हैं, 22 लाख वोटर अब इस दुनिया में नहीं हैं यानी उनकी मौत हो चुकी है, 7 लाख वोटर एक से ज्यादा जगहों पर नामांकित हैं और लगभग 1.2 लाख फॉर्म अभी लंबित हैं।
चुनाव आयोग के इस कदम को लेकर विपक्षी दल, खासकर राजद (RJD) और कॉन्ग्रेस ने कड़ा विरोध जताया है। उनका आरोप है कि यह पूरी प्रक्रिया एक ‘साजिश’ है जिसका मकसद वोटरों, खासकर मुस्लिम समुदाय के वोटरों को बाहर करना है। उन्होंने ECI की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए और कहा कि आयोग BJP के इशारे पर काम कर रहा है।
खास बात यह है कि IIM संस्थानों के प्रोफेसरों द्वारा पहले ही एक शोध पत्र में चेतावनी दी गई थी कि बिहार में 70 लाख से अधिक फर्जी वोटर हो सकते हैं।
यह पूरी प्रक्रिया अब सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं रही। इससे देशभर में अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुस्लिम घुसपैठियों के खिलाफ चल रहे अभियानों को भी नई ताकत मिली है। जैसे ही बिहार में फर्जी वोटरों की पहचान हुई, वैसे ही कई राज्यों में अवैध घुसपैठियों को पहचानने, हिरासत में लेने और देश से बाहर भेजने की कार्रवाई तेज कर दी गई है।
इस अभियान को लेकर तथाकथित ‘धार्मिक रूप से तटस्थ’ (secular) पार्टियों में नाराजगी साफ देखी जा रही है।
ममता बनर्जी ने बीएलओ को दिलाया याद, वे चुनाव आयोग नहीं राज्य सरकार के लिए करते हैं काम
हरियाणा और अन्य BJP शासित राज्यों में अवैध प्रवासियों के खिलाफ चल रही कार्रवाई और बिहार में SIR की प्रक्रिया के बीच, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने BJP के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन पर पहले भी यह आरोप लगते रहे हैं कि उनकी सरकार वोट बैंक बढ़ाने के लिए अवैध घुसपैठ को बढ़ावा देती है।
ममता बनर्जी ने पहले ही साफ कर दिया था कि वे बंगाल में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन (NRC) लागू नहीं होने देंगी। हाल ही में उन्होंने मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि जिन लोगों को बांग्लादेशी या रोहिंग्या बताकर हिरासत में लिया जा रहा है, वे असल में बंगाली प्रवासी हैं।
इसके साथ ही उन्होंने मतदाता सूची सुधार (Summary Revision) के लिए ट्रेनिंग ले रहे बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLOs) को एक तरह से चेतावनी दे दी। उन्होंने कहा, “चुनाव आयोग सिर्फ तब सक्रिय होता है जब चुनाव की तारीखें घोषित होती हैं। उससे पहले और उसके बाद भी प्रशासन राज्य सरकार के हाथ में रहता है। आप राज्य सरकार के कर्मचारी हैं, किसी को बेवजह परेशान मत कीजिए।”
बीरभूम में जुलाई में एक प्रशासनिक बैठक को संबोधित करते हुए ममता बनर्जी ने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव आयोग BJP के इशारों पर काम कर रहा है। उन्होंने कहा, “मतदाता सूची गुजरात में बैठे लोग बना रहे हैं। यह काम BJP की एक एजेंसी कर रही है, मुझे उसका नाम भी पता है।”
इसके साथ ही उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा, “अगर बंगाल में किसी का नाम वोटर लिस्ट से हटाने की कोशिश की गई तो छऊ नृत्य (एक आदिवासी नृत्य) होगा, ढोल और शंख की आवाज सुनाई देगी। मैं जिंदा रहते हुए ना NRC लागू होने दूँगी और ना ही डिटेंशन कैंप बनने दूँगी।”
पश्चिम बंगाल वह राज्य है, जहाँ जाली दस्तावेजों और स्थानीय मदद से रह रहे अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की संख्या है सबसे अधिक
हाल ही में पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। ऐसा माना जा रहा है कि अगर राज्य में SIR कराया गया तो लाखों फर्जी मतदाता, खासकर वे जो बांग्लादेश से अवैध रूप से आकर नकली दस्तावेजों के जरिए भारतीय पहचान बना चुके हैं, वे सूची से हटा दिए जाएँगे।
पश्चिम बंगाल उन राज्यों में से एक है जहाँ सबसे अधिक ‘बांग्लादेशी घुसपैठिए’ आकर बसते हैं। पिछले तीन वर्षों में 2,688 बांग्लादेशी नागरिकों को पकड़ा गया और उन्हें वापस भेजा गया है।
8 अगस्त को, तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) सरकार ने राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी (Chief Election Officer – CEO) से एक ‘स्पष्टीकरण’ माँगा, क्योंकि उन्होंने चुनाव आयोग को यह लिखा था कि राज्य SIR के लिए ‘तैयार’ है।
पिछले हफ्ते चुनाव आयोग ने 293 विधानसभा क्षेत्रों की 2002 की SIR वोटर लिस्ट प्रकाशित की (सिर्फ एक सीट को छोड़कर)।
गौरतलब है कि बंगाल में आखिरी बार SIR वर्ष 2002 में हुआ था और उसी के आधार पर 2004 की मतदाता सूची तैयार की गई थी। अब जब 22 साल बाद फिर से SIR की संभावना है तो राज्य में राजनीति गरमा गई है।
चुनाव आयोग का काम होता है कि वह मतदाता सूची को समय-समय पर अपडेट करे, गलतियाँ सुधारे, मृतकों के नाम हटाए और फर्जी वोटरों को चिन्हित करे, लेकिन राज्य की तृणमूल कॉन्ग्रेस सरकार, जिसे कई लोग ‘धर्मनिरपेक्ष’ कहकर मुस्लिम तुष्टिकरण से जोड़ते हैं, इस SIR प्रक्रिया को लेकर विरोध जता रही है और इसे लेकर चुनाव आयोग को ‘याद दिला’ रही है और दबाव भी बना रही है।
पश्चिम बंगाल जैसे राजनीतिक और सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील राज्य में मतदाता सूची में गड़बड़ी (Electoral Roll Inflation) कोई नई बात नहीं है और इसी वजह से SIR की जरूरत महसूस की जा रही है।
IIM प्रोफेसरों के शोध पत्र में आया सामने: पश्चिम बंगाल की 2024 की मतदाता सूची में 1 करोड़ अतिरिक्त मतदाता
7 अगस्त 2025 को प्रकाशित एक रिसर्च पेपर, जिसका नाम ‘Electoral Roll Inflation in West Bengal: A Demographic Reconstruction of Legitimate Voter Counts (2024)’ है, यह दिखाता है कि पश्चिम बंगाल की 2024 की वोटर लिस्ट में लगभग 1 करोड़ फर्जी नाम हो सकते हैं। यह 13.69% का वोटर इन्फ्लेशन है।
यह रिसर्च IIM विशाखापत्तनम के डॉ. मिलन कुमार और SP जैन के डॉ. विधु शेखर ने किया है। उन्होंने सरकारी आँकड़ों जैसे कि वोटर लिस्ट, जनगणना और सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम का इस्तेमाल किया और हर चरण पर रक्षात्मक (conservative) तरीका अपनाया, ताकि अनुमान नीचे रहे।
शोध पत्र में कहा गया है, “हम सभी पात्र युवाओं के पूर्ण पंजीकरण को मानते हैं, उच्च उत्तरजीविता संभावनाओं को लागू करते हैं, और हालिया वृद्धि के बजाय दशकीय रुझानों के आधार पर प्रवासन का मॉडल तैयार करते हैं। इससे हमें वैध मतदाता आबादी का एक निम्न-सीमा अनुमान लगाने में मदद मिलती है। फिर हम इस आँकड़े की तुलना 2024 के लिए चुनाव आयोग द्वारा प्रकाशित आधिकारिक मतदाता सूची से करते हैं।”
यह शोध 2024 तक पश्चिम बंगाल में वैध मतदाता आबादी के अनुभवजन्य अनुमान तीन चरणों में प्रस्तुत करता है: (i) 2004 की मतदाता सूची से बचे लोगों का अनुमान, (ii) 1986 और 2006 के बीच जन्मे नए मतदाता समूहों से जुड़ाव, और (iii) शुद्ध स्थायी प्रवास के लिए समायोजन। इसके बाद शोधकर्ताओं ने मतदाता सूची में अनुमानित अधिशेष की गणना करने के लिए परिणामों का संश्लेषण किया।
2004 की मतदाता सूची में 4.74 करोड़ पंजीकृत मतदाता दर्ज थे। शोध में इस जनसंख्या को छह आयु समूहों में विभाजित किया गया और 2001 की जनगणना के आँकड़ों का उपयोग करते हुए, आयु-विशिष्ट 20-वर्षीय उत्तरजीविता दरों का उपयोग किया गया। इन अनुमानों से 2004 की मतदाता सूची के अनुसार, अनुमानित 3.74 करोड़ जीवित मतदाता प्राप्त होते हैं।
इसके अलावा, शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि 2004 और 2024 के बीच लगभग 3.01 करोड़ नए पात्र व्यक्ति नामांकित होंगे।
इसके बाद, शोध ने 2001 और 2011 की जनगणना के आंकड़ों का उपयोग करके स्थायी बाहरी और आंतरिक प्रवास का अनुमान लगाया। विश्लेषण में पाया गया कि 2001 और 2011 के बीच पश्चिम बंगाल में प्रवासियों की कुल संख्या में गिरावट आई है।
2001 और 2011 की जनगणना के आँकड़ों का उपयोग करते हुए तथा CAGR के माध्यम से अनुमान लगाते हुए शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि इस अवधि के दौरान पश्चिम बंगाल से कुल 17.86 लाख व्यक्तियों का स्थाई प्रवास हुआ।
विश्लेषण के अनुसार, वैध मतदाताओं की अनुमानित संख्या (2024) 6,57,06,849 है, जबकि आधिकारिक मतदाता सूची (2024) के अनुसार मतदाताओं की संख्या 7,61,24,780 है। यह अनुमानित 1,04,17,931 मतदाताओं का अधिशेष दर्शाता है, जो प्रतिशत के हिसाब से 13.69% है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने जानबूझकर ऊँची सर्वाइवल रेट, ज्यादा पंजीकरण और धीमी माइग्रेशन रेट मानी, ताकि कम से कम फर्जीवाड़ा दिखे, फिर भी इतना बड़ा अंतर मिला। इसका मतलब है कि असल वोटर इन्फ्लेशन इससे भी ज्यादा हो सकता है।
इस रिसर्च के अनुसार, इतने ज्यादा फर्जी नाम होने से चुनावों की निष्पक्षता पर खतरा पैदा होता है, क्योंकि कई सीटों पर जीत का अंतर इससे छोटा होता है। इसका फायदा धोखाधड़ी, फर्जी वोटिंग और राजनीतिक गड़बड़ी में उठाया जा सकता है।
रिसर्च सुझाव देता है कि वोटर लिस्ट को आधार, सिविल रजिस्ट्रेशन और माइग्रेशन डेटा से जोड़ा जाए। एल्गोरिदम से ऑटोमेटिक चेकिंग हो जैसे 100 साल से ऊपर के हजारों वोटर, एक ही व्यक्ति के कई रजिस्ट्रेशन आदि और हर तीन महीने में जनसांख्यिकीय ऑडिट हो।
पश्चिम बंगाल और ऐसे राज्य जहाँ पिछले कई सालों से SIR नहीं हुई है, वहाँ घर-घर जाकर वोटर वेरिफिकेशन होना चाहिए।
पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट में 2024 में 13.69% यानी 1 करोड़ से ज्यादा फर्जी नाम हो सकते हैं। यह चुनाव की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठाता है और जरूरी है कि सरकार व चुनाव आयोग इस पर तुरंत और सख्त कदम उठाए।
नोट: मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रद्धा पांडेय ने लिखी है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
आगरा से गायब हुई दो सगी बहनों के बरामदगी से जुड़े मामले की जाँच के दौरान उजागर हुआ ‘धर्मांतरण गैंग’ आज पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है। इस गिरोह के साथ ही चर्चा उत्तर प्रदेश पुलिस के ‘ऑपरेशन अस्मिता’ की भी है, जिसके तहत यूपी पुलिस ने 6 राज्यों में जाकर 9 स्थानों पर एक समय पर छापे मारे और 7 लड़कियों को बचाया।
इस केस और ऑपरेशन से जुड़ी हर जानकारी लेने के लिए हमने पुलिस कमिश्नर दीपक कुमार से मुलाकात की। इस दौरान पुलिस कमिश्नर ने पूरे ऑपरेशन अस्मिता और धर्मांतरण गैंग को लेकर ऑपइंडिया के साथ कई चौंकाने वाले खुलासे किए। पुलिस कमिश्नर दीपक कुमार के मुताबिक आगरा पुलिस को 24 मार्च के दिन सदर थाने से दो सगी बहनों के अचानक गायब होने की लिखित शिकायत मिली थी। पीड़ित पिता की शिकायत पर सदर थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज की गई और छानबीन शुरू हुई।
प्रारंभिक जाँच के दौरान पुलिस को गुमशुदगी मामले में कोई सुराग नहीं मिला क्योंकि दोनों बहनों के पास न तो मोबाइल था और न कोई इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस। पुलिस हर प्रयास करने के बावजूद लड़कियों की लोकेशन नहीं ट्रेस कर पा रही थी और केस वहीं का वहीं रुका हुआ था। देखते ही देखते 41 दिन बीत गए और पुलिस खाली हाथ ही रही।
इंस्टाग्राम प्रोफाइल पर AK-47 देख उड़े पुलिस के होश
एक दिन अचानक पुलिस के सामने पीड़ित पिता ने साइमा नाम की लड़की के नाम पर संदेह जाहिर किया और पुलिस ने गुमशुदगी वाली रिपोर्ट में धाराएँ बढ़ाते हुए जाँच शुरू की। पड़ताल के दौरान छोटी बहन के इंस्टाग्राम प्रोफाइल पर AK-47 के साथ मिली डीपी ने आगरा पुलिस के होश उड़ा दिए। केस की जाँच अब तेजी से आगे बढ़ने लगी थी।
मामले की गहनता से जाँच कर रही साइबर सेल व सर्विलांस यूनिट को एक बड़ी जानकारी हाथ लगी। वह ये कि अचानक से गायब दोनों बहन एक बड़े धर्मांतरण गिरोह का हिस्सा बन चुकी हैं। इसके बाद मामले की गंभीरता से देखते हुए आगरा पुलिस ने जाँच साइबर क्राइम और एटीएस को सौंप दी। इस बीच, दो ग़ायब बहनों की तीसरी बहन से उस माइक्रो ब्लॉगिंग साइट के बारे में जानकारी मिली, जिस पर अक्सर वो दोनों बहनें जुड़ा करती थीं।
इस ब्लॉग पर आगरा पुलिस को ‘रिवर्टी’ नाम का एक पेज मिला जिस पेज की लोकेशन, कोलकाता थी। यहीं से आगरा पुलिस को सुराग मिला कि कोलकाता से चार देशों, अमेरिका, कनाडा, दुबई और लंदन, में संवाद हो रहा है और इसी लोकेशन से देश के 15 राज्यों में बैंक द्वारा पैसों का लेनदेन हुआ है। यही तथ्य आगरा पुलिस के लिए संजीवनी साबित हो गया।
जब एक महिला सब इंस्पेक्टर ‘रिवर्टी’ ग्रुप में हुई शामिल
पुलिस के लिए अब बड़ी चुनौती दो बहनों को वापस लाने के साथ ही धर्मांतरण गिरोह का पर्दाफाश करने की थी। इसके लिए एक महिला सब इंस्पेक्टर को तैयार किया गया। गायब दो बहनों की तीसरी बहन से एक सोशल मीडिया एकाउंट के बारे में मिली जानकारी के बाद महिला पुलिस अधिकारी गैंग के एक ‘रिवर्टी’ ग्रुप में शामिल हो जाती है और फिर सदस्यों से व्यक्तिगत बातचीत करते हुए कई जानकारी जुटाती है।
कमिश्नर दीपक कुमार ने आईपीएस आदित्य के नेतृत्व में एक टीम बनाई। 100 फीसदी मुस्लिम इलाका होने के चलते एक विशेष टीम को तत्काल कोलकाता भेजा गया। यहाँ टीम ने अपनी पहचान छुपाकर करीब 5 दिन तक इलाके की रेकी की और फिर डीजीपी राजीव कृष्ण और पुलिस कमिश्नर दीपक कुमार ने ऑपरेशन अस्मिता को अंजाम देने के लिए 11 टीमों का गठन किया।
ऑपरेशन अस्मिता को रखा गया था गोपनीय
टीम में शामिल करीब 45 पुलिसकर्मियों को विशेष रूप से ट्रेनिंग दी गई। ऑपरेशन को इतना गोपनीय रखा गया था कि एक-आध अधिकारियों के अलावा किसी को भी इस बात की जानकारी नहीं थी कि वह कितने बड़े धर्मांतरण गिरोह की कमर तोड़ने वाले हैं। यहाँ तक कि किसी भी टीम को यह भी जानकारी नहीं थी कि कौन सी टीम कहाँ जाएगी। बड़ी बात यह कि पूरे ऑपरेशन में सरकारी गाड़ी के बदले किराए की टैक्सी का ही इस्तेमाल किया गया।
कुछ ही देर में ऑपरेशन अस्मिता के तहत दोनों गायब बहनों को मुस्लिम इलाके से बरामद कर लिया गया। हालाँकि इस दौरान आगरा पुलिस को स्थानीय लोगों के विरोध का भी सामना करना पड़ा था। आगरा पुलिस कमिश्नर का तो यहाँ तक दावा है कि यूपी पुलिस ने एक साथ इतने स्थानों पर छापेमारी पहली बार की है।
‘ऑपरेशन अस्मिता’ की सफलता का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि देश के अलग-अलग हिस्सों में 9 स्थानों पर की गई छापेमारी में 7 बहनों को सही सलामत गैंग के चंगुल से निकाला गया है। साथ ही इस मामले में गैंग से जुड़े 14 आरोपितों को गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है। आरोपितों के पास से ‘इस्लाम और बहुजन समाज’, ‘धर्म परिवर्तन’ और ‘आपकी अमानत आपकी सेवा’ में जैसी पुस्तकें बरामद हुई हैं। साथ ही मोबाइल से हिंदू समाज को तोड़ने वाले तमाम वीडियो भी मिले हैं।
किसानों के आंदोलन और विपक्ष के विरोध के बीच आखिरकार पंजाब सरकार बैकफुट पर आ गई है। आप सरकार ने लैंड पूलिंग पॉलिसी को वापस लेने का फैसला लिया है। इससे पहले पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने भी अगले आदेश तक पॉलिसी पर रोक लगा दी थी। साथ ही पंजाब की मान सरकार को पॉलिसी रद्द करने की चेतावनी दी थी।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पंजाब सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ हाउसिंग एंड अर्बन डेवलपमेंट के प्रिंसिपल सेक्रेटरी ने लेटर जारी कर यह जानकारी दी। लेटर में बताया गया कि 14 मई 2025 को लागू की गई पंजाब लैंड पॉलिसी और इससे जुड़े संशोधनों को वापस लिया जा रहा है।
बता दें कि इससे पहले पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने लैंड पूलिंग पॉलिसी मामले की सुनवाई पर 4 हफ्ते की रोक लगा दी थी। कोर्ट ने पंजाब सरकार को 2 विकल्प दिए थे, जिसमें कहा गया था कि या तो पॉलिसी वापस ली जाए वरना अदालत इसे रद्द कर देगी।
हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई की तारीख 10 सितंबर 2025 तय कर पंजाब सरकार को जवाब दाखिल करने का समय दिया था। साथ ही कोर्ट ने पंजाब सरकार को भी फटकार लगाते हुए कहा था कि यह पॉलिसी जल्दबाजी में बनाई गई है।
किसानों ने आंदोलन की दी थी चेतावनी
लैंड पूलिंग पॉलिसी के विरोध में किसान लगातार विरोध प्रदर्शन किया। किसान मजदूर संघर्ष समिति ने पंजाब के कई जिलों में बाइक रैली निकाली। इस दौरान समिति ने फैसले का जमकर विरोध करते हुए पॉलिसी वापस लेने की माँग की थी। साथ ही ऐसा ना करने पर पंजाब सरकार को बड़े आंदोलन की भी चेतावनी दी थी।
पॉलिसी को लेकर किसान नेताओं ने दावा किया था कि लैंड पूलिंग से सरकार प्रदेश की 65000 एकड़ से ज्यादा जमीन को निजी संस्थानों के हाथों में देना चाहती है। वहीं, शिरोमणि अकाली दल ने पूरे पंजाब में विरोध रैलियाँ की। अब 01 सितंबर 2025 को पक्का मोर्चा निकालने की तैयारी थी।
क्या है लैंड पूलिंग पॉलिसी?
लैंड पूलिंग पॉलिसी 2011 में अकाली दल की सरकार के दौरान लागू की गई थी। इसके बाद कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भी इसे बढ़ावा दिया। फिर अब पंजाब की मौजूदा मान सरकार ने पॉलिसी में बदलाव करते हुए इसे लागू किया। जून 2025 में पंजाब कैबिनेट में पॉलिसी को बदलाव के साथ मंजूरी मिल गई।
इस पॉलिसी के तहत प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में जमीन अधिग्रहित कर इंडस्ट्रिटयल, कमर्शियल और रिहायशी सेक्टर विकसित किए जाने थे। पॉलिसी में यह भी बताया कि किसानों को जमीन के बदले मुआवजा नहीं दिया जाएगा बल्कि उसी क्षेत्र में कमर्शियल और रिहायशी प्लॉट दिए जाएँगे।
वहीं किसानों का कहना था कि पॉलिसी के तहत जमीन को कॉरपोरेट को देने की साजिश है। किसानों ने कहा कि उनपर चारों ओर से हमले किए जा रहे हैं। एक तरफ जमीन छीनने की साजिश की जा रही है, वहीं दूसरी तरफ भारत पर लगातार अमेरिका दबाव बना रहा है कि कृषि, डेयरी, पोल्ट्री, मछलीपालन जैसे क्षेत्र में उसे भारत में घुसने दिया जाए।
मोदी सरकार की योजनाओं ने करोड़ों लोगों को गरीबी से निकालने में बड़ी भूमिका निभाई है। PM आवास योजना से लेकर मुद्रा और लखपति दीदी जैसी योजनाओं ने देश में महिलाओं और बच्चों की गरीबी कम करने में बड़ी भूमिका निभाई है। यह जानकारियाँ एक रिपोर्ट से सामने आई हैं। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि 12 वर्षों के समय में देश में 27 करोड़ से अधिक लोग गरीबी से निकाले गए हैं।
27 करोड़ गरीबी से बाहर निकले
यह रिसर्च रिपोर्ट शमिका रवि और मुदित कपूर ने लिखी है। रिपोर्ट बताती है कि 2011-12 के मुकाबले 2023-24 में देश के घरों में महिलाओं को अधिक संसाधन मिलने लगे हैं। महिलाओं के साथ ही बच्चों को भी घर के संसाधनों में ज्यादा हिस्सा मिलने लगा है। इसका असर सीधे तौर पर महिलाओं और बच्चों की आर्थिक हालत पर पड़ा है। रिपोर्ट बताती है कि 2011-12 में बच्चों की गरीबी दर सबसे ज़्यादा (58.3%) थी, उसके बाद महिलाओं (33.3%) और पुरुषों (15.1%) का स्थान था।
रिपोर्ट के अनुसार, 2023-24 तक, बच्चों की गरीबी घटकर 17.8%, महिलाओं की गरीबी घटकर 2.2% रह गई, लेकिन पुरुषों की गरीबी मामूली रूप से घटकर 13.5% ही रह गई। यह बदलाव मात्र 12 वर्षों के भीतर हुए। इस दौरान अधिकांश समय में केंद्र में मोदी सरकार ही रही है। ऐसे में स्पष्ट तौर पर कहा जा सकता है कि इसमें बड़ा योगदान सरकार का रहा है, जिससे महिलाएँ सशक्त हुई हैं और बच्चे भी गरीबी के कुचक्र से निकले हैं।
रिपोर्ट कहती है कि प्रधानमंत्री आवास योजना, मुद्रा योजना और लखपति दीदी योजना के चलते गरीबी घटाने में बड़ी सहायता मिली है। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत अब तक देश में 4 करोड़ घर बन चुके हैं। इस योजना में मकान में महिला को सह स्वामिनी रखना जरूरी है। ऐसे में संसाधनों के बँटवारे में महिलाएँ और सशक्त हुई हैं। इसके अलावा लखपति दीदी योजना ने उन्हें रोजगार का अवसर दिया है। मुद्रा ने उन्हें वह पूँजी उपलब्ध करवाई है, जिससे वह सशक्त हो सकें।
पहले आई रिपोर्ट्स ने भी दिखाई बदली तस्वीर
यह ऐसी कोई पहली रिपोर्ट नहीं है, जिसमें देश में गरीबी कम होने की पुष्टि की गई हो। इससे पहले कई और रिपोर्ट्स गरीबी कम होने के साथ ही खर्च बढ़ने तक की बात बता चुकी हैं। केंद्र सरकार के सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वन मंत्रालय (MoSPI) के देश के परिवारों द्वारा किए जाने खर्चे को लेकर किए गए पारिवारिक उपभोग व्यय सर्वे के अनुसार, अब देश के गाँवों में बसने वाली आबादी में प्रति व्यक्ति मासिक खर्च ₹3773 है जबकि शहर में रहने वाला एक आदमी औसतन ₹6459 प्रति माह अपने ऊपर खर्च करता है।
2011-12 में किए गए सर्वे की तुलना में लगभग 2.5 गुना है। 2011-12 में गाँव में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपने ऊपर ₹1430 जबकि शहरी व्यक्ति ₹2630 खर्च करता था। गाँवों में रहने वाला व्यक्ति अपने कुल खर्चे का 46% जबकि शहरों में रहने वाला व्यक्ति 39% खर्च खाने-पीने पर करता है। रिपोर्ट के आँकड़े दर्शाते हैं कि गाँव और शहर के खर्चे के बीच की खाई भी कम हुई है। अब दोनों के खर्चे में 71% का अंतर है जबकि 2011-12 में यह लगभग 84% था।
भारत में गरीबी कम होने की बात की पुष्टि वर्ल्ड बैंक तक कर चुका है। वर्ल्ड बैंक के अनुसार, वर्ष 2011-12 में 27% लोग भारत में अत्यंत निर्धनता में रह रहे थे। अब यह संख्या मात्र 5.3% ही रह गई है। वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट बताती है कि सबसे अधिक काम उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा और बिहार जैसे राज्यों में हुआ है। इन राज्यों से सबसे अधिक लोग अत्यंत निर्धनता से बाहर निकाले गए हैं। भारत ने यह उपलब्धि तब हासिल की है जब वर्ल्ड बैंक ने किसी व्यक्ति को गरीब माने जाने के मानदंड बदले हैं और उन्हें और ऊँचा कर दिया है।
मोदी सरकार ने घर-पानी-बिजली पर सबसे पहले किया काम
केंद्र में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार आने के बाद सबसे पहले देश की मूलभूत समस्याओं को हल करने का प्रयास चालू किया है। मोदी सरकार ने देश की बड़ी आबादी को मूलभूत सुविधाएँ मुहैया करवाना चालू किया। देश में जिन लोगों के पक्का मकान नहीं था, उन्हें मोदी सरकार ने प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) और प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के तहत मकान देना चालू किया। अब तक ग्रामीण योजना के तहत 2.82 करोड़ मकान बनाए जा चुके हैं जबकि शहरी योजना के तहत 94 लाख से अधिक घर बन गए हैं।
वहीं मोदी सरकार में घर-घर बिजली सौभाग्य योजना के तहत बिजली पहुँची। इसके अलावा पानी पहुँचाने के लिए मोदी सरकार ने वर्तमान में जल जीवन मिशन चालू कर रखा है। इसके चालू होने के बाद से देश में 12.44 करोड़ घरों में पानी पहुँच चुका है। जनधन योजना से बैंकिंग की पहुँच देश के 50 करोड़ से अधिक लोगों तक हुई है। यह मूलभूत सुविधाएँ देश में गरीबी उन्मूलन का आधार बन रही हैं।
अमेरिका की सरजमीं से पाकिस्तान का आर्मी चीफ आसिम मुनीर भारत को परमाणु बम की धमकी दे रहा है। इस पर विदेश मंत्रालय ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। MEA ने पाकिस्तान के साथ-साथ अमेरिका को भी आईना दिखाया है।
भारत ने कहा है कि पाकिस्तानी आर्मी चीफ के अमेरिका दौरे के दौरान दिए गए बयान पर उनकी नजर पड़ी है। पाकिस्तान की पुरानी आदत है परमाणु हमले की धमकी देना। विश्व समुदाय पाकिस्तान के इस बयान पर मतलब निकाल सकता है। क्योंकि ये सिर्फ क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए नहीं बल्कि वैश्विक सुरक्षा के लिए भी खतरा है।
‘ढोंगी’ पाकिस्तान के हाथ में परमाणु बम सुरक्षित नहीं- MEA
आगे विदेश मंत्रालय ने कहा, ” ये काफी खेदजनक है कि ये बयान एक मित्र देश की जमीन से दी गई है।” परमाणु हथियार का दम भरने वाले पाकिस्तान का ‘ढोंग’ बताते हुए विदेश मंत्रालय ने कहा कि इस तरह के बयान ये बताता है कि ऐसे देश के हाथ में परमाणु बम कितना सुरक्षित है। ‘आतंकियों से गठजोड़ वाला’ पाकिस्तान पुरी दुनिया के लिए खतरा है।
भारत ब्लैकमेलिंग बर्दाश्त नहीं करेगा- पीएम मोदी
पीएम मोदी ने पहले ही साफ कर दिया था कि भारत ब्लैकमेलिंग बर्दाश्त नहीं करेगा। हम अपनी सुरक्षा के लिए हरसंभव कदम उठाएँगे। ऑपरेशन सिंदूर पर संसद में बहस के दौरान पीएम मोदी ने कहा था, “पाकिस्तान को क्या लगा था कि परमाणु ब्लैकमेल काम करेगा? हमने अपने हिसाब से हमलों का जवाब दिया। कोई परमाणु धमकी हमें रोक नहीं पाएँगी और हम आतंकियों को पनाह देने वालों के साथ भी आतंकियों जैसा ही व्यवहार करेंगे।”
मुनीर के अमेरिका की गोद में बैठकर दिए बयान को भी भारत ‘बकवास’ और ‘बेफिजुल की बातें’ ही करार दे रहा है। भारत का मानना है कि पाकिस्तान जैसा देश जहाँ लोकतंत्र नहीं है और सेना ही सबकुछ करती है, ऐसे देश के पास परमाणु बम होना कितना खतरनाक है, ये भी मुनीर के बयान से समझा जा सकता है।
पाकिस्तानी आर्मी चीफ ने क्या कहा ?
अमेरिकी दौरे पर गए पाक आर्मी चीफ मुनीर ने एक डिनर पार्टी में गीदड़भभकी देते हुए कहा कि भारत के साथ युद्ध में पाकिस्तान के अस्तित्व को खतरा हुआ तो वो इस क्षेत्र को परमाणु युद्ध में झोंक देगा। मुनीर ने कहा, “हम एक परमाणु राष्ट्र हैं, अगर हमें लगता है कि हम डूब रहे हैं, तो हम आधी दुनिया को अपने साथ ले जाएँगे।”
पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल समझौते को स्थगित कर दिया है। मुनीर ने इस पर भी जहर उगला है। मुनीर ने इस फैसले से 25 करोड़ लोगों को भुखमरी का खतरा बताया। मुनीर ने कहा, “हम भारत के बांध बनाने का इंतजार करेंगे और जब वह ऐसा करेगा, तो हम उसे 10 मिसाइलों से तबाह कर देंगे।”
पाकिस्तान बजरी से भरा ट्रक, भारत चमचमाती मर्सिडीज- मुनीर
मुनीर ने कहा, “भारत एक चमचमाती हुई मर्सिडीज है जो फेरारी की तरह हाईवे पर आ रही है। हम बजरी से भरा एक डंप ट्रक हैं। अगर ट्रक कार से टकरा जाए, तो नुकसान किसका होगा?” ऐसे पाकिस्तानी आर्मी चीफ के बयान पर भारत प्रतिक्रिया देना भी अपनी तोहीन समझता है। लेकिन बात अमेरिका से जुड़ी हुई थी, इसलिए विदेश मंत्रालय ने दोनों देशों को ही लताड़ दिया।
जम्मू-कश्मीर में नए स्थानीय आतंकियों की भर्ती लगभग ना के बराबर बची है। अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद आतंकियों की भर्ती में लगातार कमी हुई है। 2018 में 200 युवाओं ने आतंकवाद के लिए बंदूक उठाई थी। वहीं, इस वर्ष जम्मू-कश्मीर से केवल एक युवक आतंकी बना है।
अनुच्छेद 370 से कैसे बढ़ा आतंकवाद?
अनुच्छेद 370 को जम्मू-कश्मीर में बढ़ते आतंकवाद से जोड़कर देखा जाता रहा है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जनवरी 2025 में कहा था कि अनुच्छेद 370 ने युवाओं के मन में अलगाव का बीज बोया था।
उन्होंने कहा था, “आतंकवाद देश के अन्य मुस्लिम इलाकों में क्यों नहीं फैला? एक तर्क यह भी है कि कश्मीर की सीमा पाकिस्तान से लगती है। यहाँ तक कि गुजरात और राजस्थान की सीमा भी पाकिस्तान से लगती है लेकिन आतंकवाद वहाँ तक नहीं पहुँचा। अनुच्छेद 370 ने इस भ्रांति को बढ़ावा दिया कि भारत और कश्मीर के बीच संबंध अस्थाई हैं। धीरे-धीरे, अलगाववाद आतंकवाद में बदल गया।”
जम्मू-कश्मीर के उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा ने कुछ दिनों पहले ही कहा था कि अनुच्छेद 370 के कारण आतंकवाद और आतंकी तंत्र को बढ़ावा मिला है। सिन्हा ने कहा कि 5 अगस्त 2019 को आतंकी तंत्र के खात्मे की शुरुआत हो गई थी।
200 से 1 आतंकी तक: 7 वर्षों में बदली सूरत
2016 में हिज्बुल मुजाहिदीन के आतंकी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद घाटी में आतंकी भर्ती तेज हुई थी। 2018 में यह उच्चतम स्तर पर पहुँच गई। यह वही दौर था, जब आतंकियों के खुलेआम जनाजे निकाले जाते थे, स्थानीय युवाओं को भड़काया जाता था और सोशल मीडिया प्रचार व भाषणों के जरिए युवाओं को हथियार उठाने के लिए प्रेरित किया जाता था।
5 अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटा दिया गया और विशेष दर्जा खत्म हो गए। इसके बाद हालात तेजी से बदलने लगे। 2018 में जहाँ करीब 200 कश्मीरी युवाओं ने आतंकी संगठनों का रुख किया था, वहीं 2024 में यह संख्या घटकर सिर्फ 7 रह गई। 2025 में अब तक सिर्फ एक मामला सामने आया है।
जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद आतंकी भर्ती में रिकॉर्ड कमी आई है। आधिकारिक आँकड़ों के मुताबिक, आतंकी संगठनों में भर्ती हुए स्थानीय युवकों की संख्या 2020 में 160, 2021 में 125, 2022 में 100, 2023 में 22 और 2024 में सिर्फ 7 रह गई। वहीं, 2025 में जनवरी में कुलगाम से एक युवक गायब हुआ था और बाद में खबर आई कि वह आतंकी संगठन में शामिल हो गया है।
अब आतंकियों के छोटे-छोटे समूह ज्यादातर पाकिस्तान से आने वाले प्रशिक्षित लड़ाकों से बनते हैं। 2019 से 2024 के बीच आतंकवाद से जुड़ी 700 घटनाओं में 1,050 आतंकियों को ढेर कर दिया गया है।
इन वजहों से कम हुई आतंकियों की भर्ती
अनुच्छेद 370 हटने के बाद घाटी में आतंकी भर्ती को रोकने के लिए सुरक्षा एजेंसियों द्वारा उठाए गए कदमों का असर अब साफ नजर आ रहा है। एजेंसियों ने एक के बाद एक ऐसे कई कदम उठाए जिनके चलते आतंकियों की भर्ती कम होती गई। पुलिस और एजेंसियों ने इंटेलिजेंस आधारित ऑपरेशनों पर जोर दिया। संदिग्ध युवाओं की सोशल मीडिया गतिविधियों, फोन कॉल्स और आने-जाने पर कड़ी निगरानी रखी गई।
जिन युवकों के आतंकी रास्ते पर जाने का शक था, उनके परिवारों से सीधे संपर्क किया गया। वहीं, जो लोग गाँँव-गाँँव घूमकर या सोशल मीडिया के जरिए युवाओं को भड़काते थे। उन पर भी सरकार ने नजर बनाए रखी। इन्हें गिरफ्तार किया गया या ऑपरेशनों में ढेर किया गया।
2020 से एक बड़ा बदलाव आया और मारे गए आतंकियों के जनाजों पर रोक लगा दी गई। पहले, मारे गए आतंकियों के शव उनके गाँँवों में सौंप दिए जाते थे, जहां हजारों की भीड़ जुटती थी और भड़काऊ भाषण होते थे। ऐसे जनाजे कई बार भर्ती का मंच बन जाते थे। लेकिन अब शव गाँवों में देने की बजाय उत्तर कश्मीर के दूरदराज इलाकों में दफनाए जाने लगे।
LoC (लाइन ऑफ कंट्रोल) पर घुसपैठ पर नकेल कसी गई। इसके सहारे पाकिस्तान से लोग आकर स्थानीय आतंकियों को भड़काते थे। इसके लिए ड्रोन निगरानी, मजबूत फेंसिंग और हाई-टेक काउंटर-इंफिल्ट्रेशन ग्रिड का इस्तेमाल हुआ। इससे पाकिस्तान से हथियार, गोलाबारूद और आतंकी घुसपैठियों की सप्लाई चेन लगभग टूट गई।
370 हटने के बाद कैसे बदले हालात?
संसद ने 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 और 35ए को हटाने को मंजूरी दी और 31 अक्टूबर, 2019 से जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को दो अलग केंद्र शासित प्रदेशों में बाँट दिया गया। इसके साथ ही, केंद्र सरकार के 170 कानून जो पहले लागू नहीं थे, अब वे इस क्षेत्र में लागू कर दिए गए।
370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में सत्ता का विकेंद्रीकरण होने भी शुरू हो गया। जनपद और जिला पंचायत के चुनाव हुए, 2018 में पंचायत चुनाव हुए और इसमें 74.1% मतदान हुआ। 2019 में पहली बार आयोजित ब्लॉक डेवलेपमेंट काउंसिल चुनाव में 98.3% मतदान हुआ।
कुछ दिनों पहले हुआ पहलगाम आतंकी हमला एक अपवाद जैसा था। आँकड़ों के मुताबिक, बीते एक दशक के दौरान वर्ष 2023 में आतंकी हिंसा में मरने वालों की संख्या सबसे कम रही है। इनमें 33 प्रतिशत कमी आ चुकी है।
आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, 5 अगस्त 2019 से 4 अगस्त 2025 के बीच जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद से संबंधित कुल 1,230 मौतें दर्ज की गईं। वहीं, वर्ष 2013 से 2019 तक की अवधि में हुई कुल 1,845 मौतें हुई थीं। अनुच्छेद 370 हटने से पहले की छह वर्ष की अवधि 1121 आतंकवादी मारे गए, 475 सुरक्षाकर्मी और 243 नागरिक बलिदानी हुए हैं।
370 हटने के बाद विकास कार्यों में तेजी आई है। आईआईटी जम्मू, रियासी मेडिकल कॉलेज, एम्स अवंतीपोरा (2025 तक शुरू होने की उम्मीद) जैसे संस्थानों से शिक्षा को बढ़ावा मिला, वहीं 2019 के बाद 80,000 करोड़ रुपए का निवेश आया।
उदहमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक पूरी तरह चालू हो गया, कई टनल प्रोजेक्ट्स से कनेक्टिविटी बेहतर हुई और भारतनेट के तहत 9,789 फाइबर कनेक्शन दिए गए। पर्यटन में भी रिकॉर्ड वृद्धि हुई, श्रीनगर को 2024 में यूनेस्को ने ‘वर्ल्ड क्राफ्ट सिटी’ का दर्जा दिया और 2019 की तुलना में फ्लाइटों की संख्या 35 से बढ़कर 125 प्रतिदिन हो गई।
जम्मू-कश्मीर में कर राजस्व में भारी वृद्धि देखी गई। 2022 और 2024 के बीच जीएसटी संग्रह में 12%, उत्पाद शुल्क में 39% और कुल गैर-कर राजस्व में 25% की वृद्धि हुई है। राज्य का GDP 2015-16 के 1.17 लाख करोड़ रुपए से दोगुना होकर 2023-24 में 2.45 लाख करोड़ रुपए और 2024-25 में 2.63 लाख करोड़ रुपए हो गया है।
2023 में, रिकॉर्ड 2.11 करोड़ पर्यटक जम्मू-कश्मीर आए और पर्यटन ने GDP में 7% का योगदान दिया। 2019 के बाद 75 नए स्पॉ खोले गए। 2,000 से अधिक होमस्टे पंजीकृत किए गए जिनमें बहुत सारे दूरदराज के गांवों में स्थित है।
केसी वेणुगोपाल ने अपने एक ट्वीट से सोशल मीडिया पर तूफान खड़ा कर दिया। उन्होंने दावा किया कि एयर इंडिया की फ्लाइट AI 2455… जिसमें वो खुद, कई सांसद और सैकड़ों यात्री सवार थे, एक बड़े हादसे से बाल-बाल बची।
वेणुगोपाल के मुताबिक, तिरुवनंतपुरम से दिल्ली जा रही इस फ्लाइट में पहले तो देरी हुई, फिर टेकऑफ के बाद भयानक टर्बुलेंस का सामना करना पड़ा। करीब एक घंटे बाद कैप्टन ने बताया कि फ्लाइट के सिग्नल में खराबी है, जिसके चलते फ्लाइट को चेन्नई डायवर्ट करना पड़ा।
चेन्नई में लैंडिंग के दौरान के समय को लेकर वेणुगोपाल ने दावा किया कि रनवे पर दूसरा विमान होने की वजह से पायलट को आखिरी पल में फ्लाइट को फिर से ऊपर ले जाना पड़ा। उनके अनुसार, पायलट की सूझबूझ ने सभी की जान बचाई। दूसरी कोशिश में फ्लाइट सुरक्षित उतर गई। वेणुगोपाल ने DGCA और MoCA से इस मामले की तुरंत जाँच करने और दोषियों को सजा देने की माँग की। लेकिन इस पूरे मामले में एयर इंडिया का जवाब बिल्कुल अलग है।
एयर इंडिया ने तुरंत जवाब दिया कि ऐसा कुछ नहीं हुआ। उनके अनुसार, खराब मौसम और तकनीकी खराबी की आशंका में फ्लाइट को चेन्नई डायवर्ट किया गया था, और लैंडिंग के दौरान कोई दूसरा विमान रनवे पर नहीं था। एयर इंडिया ने साफ कहा कि उनके पायलट ने पूरी प्रक्रिया का पालन किया और सुरक्षा को सबसे ऊपर रखा।
Dear Mr Venugopal, we would like to clarify that the diversion to Chennai was precautionary due to a suspected technical issue and poor weather conditions. A go-around was instructed by Chennai ATC during the first attempted landing at Chennai airport, not because of the presence…
एयर इंडिया ने कहा कि उनके पायलट अच्छी तरह प्रशिक्षित हैं और उन्होंने इस स्थिति में सभी मानक प्रक्रियाओं का पालन किया। एयरलाइन ने ये भी कहा कि ऐसी घटनाएँ यात्रियों के लिए परेशान करने वाली हो सकती हैं और इसके लिए उन्हें खेद है, लेकिन सुरक्षा हमेशा उनकी पहली प्राथमिकता है।
ये मामला इसलिए गंभीर है, क्योंकि एक बड़े नेता के ऐसे बयान से न सिर्फ एयर इंडिया की साख पर सवाल उठते हैं, बल्कि आम यात्रियों में डर और अविश्वास भी पैदा होता है।
इस मामले में बीजेपी नेता अमित मालवीय ने कॉन्ग्रेस के सीनियर नेता केसी वेणुगोपाल के खिलाफ सख्त रुख अख्तियार किया। मालवीय ने कहा कि वेणुगोपाल का दावा बहुत गंभीर है। वेणुगोपाल ने कहा था कि चेन्नई में एक एयर इंडिया की फ्लाइट को लैंडिंग रोकनी पड़ी क्योंकि रनवे पर दूसरा विमान था। लेकिन एयर इंडिया ने तुरंत उनके दावे को गलत बताया।
मालवीय ने कहा कि इनमें से कोई एक झूठ बोल रहा है। उन्होंने कहा कि विमानन सुरक्षा सबसे जरूरी है और जिम्मेदार लोगों के सोशल मीडिया पोस्ट को बिना जाँच के नहीं छोड़ा जा सकता। अगर वेणुगोपाल का दावा सही है, तो चेन्नई एटीसी और एयर इंडिया को जवाब देना होगा। लेकिन अगर ये गलत है, तो वेणुगोपाल को सजा मिलनी चाहिए, जैसे कि उन्हें नो-फ्लाई लिस्ट में डाल देना चाहिए। मालवीय ने कहा कि झूठी खबरें फैलाने वालों के खिलाफ सख्त कदम उठने चाहिए।
This is extremely serious.
If senior Congress leader KC Venugopal claims an Air India flight had to abort landing in Chennai because another aircraft was on the runway and the airline immediately contradicts him, then one of them is misrepresenting facts.
सोशल मीडिया पर एक पोस्ट लाखों लोगों तक पहुँचती है और अगर वो गलत है, तो अफवाहें और डर फैलने में वक्त नहीं लगता। लोग पहले से ही हवाई यात्रा को लेकर सतर्क रहते हैं। ऐसे में अगर कोई जिम्मेदार नेता बिना पुख्ता सबूत के ऐसी बातें कहता है, तो लोग सोचने लगते हैं कि क्या हवाई यात्रा वाकई सुरक्षित है? इससे न सिर्फ एयर इंडिया, बल्कि पूरे विमानन उद्योग और सार्वजनिक परिवहन पर लोगों का भरोसा डगमगा सकता है।
भारत की आर्थिक तरक्की में उसके उद्योगपतियों का बड़ा हाथ है। पहले टाटा-बिरला और बाद में अडानी-अम्बानी जैसे कारोबारी समूह भारत की आर्थिक तरक्की को आगे ले जा रहे हैं। इसी आर्थिक तरक्की ने भारत को पाकिस्तान से कई गुना आगे खड़ा किया है और मजबूत बनाया है। इस आर्थिक तरक्की के स्तम्भों को लगातार निशाने पर लिया जा रहा है। इसके पीछे वह तत्व हैं, जिन्हें अमेरिका या उससे जुड़ी एजेंसियों का समर्थन प्राप्त है। कॉन्ग्रेस MP राहुल गाँधी भारतीय आर्थिक हितों को निशाना बनाने वालों के सुर में सुर मिलाते रहे हैं।
‘मुल्लामुनीर’ ने अब मुकेश अम्बानी पर किया प्रलाप
आर्थिक दौड़ में भारत से कोसों पीछे हो चुका पाकिस्तान वर्तमान में कर्जों के बल पर ज़िंदा है। IMF, अमेरिका और सऊदी के पैसों पर उसकी अर्थव्यवस्था दिवालिया होने से बच रही है। भारत की बराबरी ना कर पाने के चलते पाकिस्तान अब भारत की अर्थव्यवस्था के स्तम्भों को कमजोर करने की धमकियाँ दे रहा है। इसी कड़ी में पाक फ़ौज के सरगना आसिम मुनीर ने अमेरिकी जमीन से भारतीय कारोबारी मुकेश अम्बानी को निशाना बनाने की बात कही है।
द प्रिंट में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, मुनीर ने अमेरिका में एक जनरल के विदाई समारोह में अपने भाषण में खूब जहर उगला। इसमें मुनीर ने एक सोशल मीडिया पोस्ट का हवाला दिया। इसमें मुकेश अम्बानी की एक तस्वीर और कुरान की एक आयत थी। मुनीर ने अपने इस वक्तव्य में मुकेश अम्बानी की हत्या की धमकी एक तरह से दी। दरअसल, जिस आयत का जिक्र मुकेश अम्बानी की फोटो पर था, चिड़ियों ने दुश्मन की सेना पर पत्थर गिराए और उसे तबाह किया।
मुनीर ने सीधे तौर पर यह कहने का प्रयास किया कि वह अगले युद्ध में मुकेश अम्बानी को निशाना बनाएँगे। किसी सैन्य अधिकारी का दूसरे देश के उद्योगपति को लेकर ऐसा बयान काफी चौंकाने वाला था। हालाँकि, पाक फ़ौज के मुखिया से और कोई उम्मीद नहीं की जा सकती थी। ज्यादा परेशान करने वाली बात है कि यह धमकी लाहौर या इस्लामाबाद से नहीं बल्कि अमेरिका की जमीन से दी गई। उस कमरे से दी गई, जहाँ अमेरिका के बड़े से बड़े सैन्य अधिकारी तक मौजूद थे।
इसे सीधे तौर पर समझा जाए कि अमेरिका की शह पर मुनीर भारतीय कारोबारी को धमका रहे हैं, इसमें अमेरिका की मौन सहमति भी मानी जाए। उन्हें भारतीय कारोबारी को धमकाते टाइम ना किसी ने रोका, ना किसी ने टोका। यह मौन स्वीकृति बताती है कि मुनीर के अम्बानी पर हमले के दौरान अमेरिका उसके साथ खड़ा रहेगा। मुनीर की लफंगई का कई तरीकों से अर्थ निकाला गया है। कुछ ने इसे गुजरात के के जामनगर रिफाइनरी से भी जोड़ा।
जामनगर में रिलाइंस की बड़ी रिफाइनरी है। यह ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी खतरे की जद में बताई गई थी। इस तरह से यह मतलब भी निकाला जाए कि भारतीय औद्योगिक हितों का निशाना बनाए जाने से अमेरिका को कोई समस्या नहीं है और वह इसके लिए अपनी जमीन भी इस्तेमाल होने देगा, इसके साथ ही वह पाकिस्तान के साथ खड़ा रहेगा। मुनीर का बयान भले ही चौंकाने वाला हो लेकिन अमेरिका का भारतीय कारोबारी हितों को प्रभावित करना कोई नई बात नहीं है।
अडानी को निशाना बना रही थी अमेरिकी फर्म
अमेरिकी जमीन से जहाँ मुनीर ने भारतीय कारोबारी मुकेश अम्बानी को निशाना बनाया, तो कुछ समय पहले तक दूसरे कारोबारी गौतम अडानी भी उसकी ही जमीन से निशाना बनाए जा रहे थे। अमेरिकी शॉर्ट सेलर हिंडनबर्ग ने जनवरी, 2023 से लेकर 2024 तक लगातार अडानी पर रिपोर्ट्स छापीं। अडानी पर हिंडनबर्ग रिपोर्ट ने तमाम तरह के आरोप लगाए। इसके आधार पर भारत में खूब हंगामा हुआ। भारतीय निवेशकों की लाखों करोड़ की पूँजी चली गई।
अडानी पर हिंडनबर्ग की इस रिपोर्ट के आधार पर प्रधानमंत्री मोदी तक को निशाना बनाया गया। अडानी समूह पर धोखाधड़ी, शेयर बाजार में गड़बड़ी और पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने जैसे आरोप तक लगाए गए। यह सब उस हिंडनबर्ग ने किया, जिसका सीधा संबंध जॉर्ज सोरोस से था। यह वही सोरोस है, जिसने दुनिया भर में सत्ताएँ बदलने का काम किया है। वह भारत के खिलाफ भी जहर उगल रहा था। तब अमेरिका के बायडेन प्रशासन ने हिंडनबर्ग और बाकी ऐसे तत्वों को खुली छूट दी कि वह भारतीय कारोबारी हितों को नुकसान पहुँचे।
अडानी के खिलाफ अमेरिका में बायडेन प्रशासन के अंतिम दिनों में मुकदमा भी दर्ज कर दिया गया। एक कथित रिश्वतखोरी के मामले में गौतम अडानी और उनकी कम्पनी के बाकी लोगों को आरोपित बनाया गया है। इसमें अमेरिका की सरकारी एजेंसी SEC तक अडानी को निशाना बनाने में जुटी हुई थी। अडानी को इससे भी कोई विशेष फर्क नहीं पड़ा लेकिन भारत के आर्थिक हितों को लेकर अमेरिका का क्या रुख है, यह जरूर साफ़ हुआ।
राहुल गाँधी भी इसी गेम में शामिल!
जहाँ पाकिस्तान-अमेरिका का नेक्सस भारतीय कारोबारियों को निशाने ले रहा है तो वहीं उसको मौन सहयोग कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी दे रहे हैं। राहुल गाँधी ने हिंडनबर्ग की रिपोर्ट आने के बाद तमाम आरोप प्रधानमंत्री मोदी पर लगाए थे। कॉन्ग्रेस ने इस दौरान हिंडनबर्ग द्वारा प्रसारित हर झूठ को आगे बढ़ाया। राहुल गाँधी ने अडानी को PM मोदी का दोस्त बताया था और कई आरोप लगाए थे। कॉन्ग्रेस कहीं अडानी और प्रधानमंत्री मोदी को लेकर कोई नया शब्द गढ़ती थी तो कहीं इस्तीफ़ा माँगती थी।
हिंडनबर्ग के सहारे प्रधानमंत्री मोदी और अडानी को जोड़ कर सारा प्रोपेगेंडा चलाने का नेतृत्व राहुल गाँधी के पास ही था। बाद हिंडनबर्ग के लगाए आरोप ताश के पत्तों की तरह बिखर गए। हालाँकि, इतने दिनों तक राहुल गाँधी अमेरिकी कम्पनी हिंडनबर्ग की प्लेबुक पर खेलते रहे। दुखद बात यह है कि पाकिस्तानी जनरल मुनीर के बयान के दौरान भी उन्होंने चुप्पी साध रखी है। उनका समर्थन भारत के आर्थिक हितों को नहीं है।
यहाँ तक कि जो सेना इन आर्थिक हितों को प्रभावित होने से बचाएगी, उसके शौर्य पर प्रश्न उठाने स भी राहुल गाँधी नहीं चूके हैं। राहुल गाँधी की पार्टी के कई नेताओं ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना के एक्शन को लेकर प्रश्न पूछे हैं। कॉन्ग्रेस पार्टी के नेता यह भी नहीं मानने को तैयार हैं कि ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने पाकिस्तान के 5-6 विमान मार गिराए। इससे पाकिस्तान को शह मिल रही है और उसकी फ़ौज की मुखिया अब भारतीय कारोबारी हितों को निशाना बना रहा है।