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गद्दार है ओवैसी, इसकी औकात ही नहीं है कि हिन्दुस्तान का बँटवारा कर सके: बाबा रामदेव

योग गुरु बाबा रामदेव ने अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है। बाबा रामदेव ने कहा कि राम का वनवास खत्म। अब अयोध्या में राम मंदिर बनेगा। उन्होंने सभी से फैसले को सहर्ष स्वीकार करने के साथ ही अराजक तत्वों से सावधान रहने की जरूरत की बात भी कही। बाबा रामदेव ने कहा कि इस फैसले को किसी की हार या जीत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लमिन (एआईएमआईएम) के अध्यक्ष और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने अदालत के फैसले को लेकर अपनी नाखुशी जाहिर करते हुए कहा कि वो इस फैसले से संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि उन्हें खैरात में पाँच एकड़ जमीन नहीं चाहिए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम (सर्वोच्च) जरूर है, लेकिन वह अचूक नहीं है। उन्होंने कहा कि मुल्क हिन्दू राष्ट्र की ओर बढ़ रहा है। संघ अब काशी और मथुरा के मुद्दे को भी उठाएगा।

रिपब्लिक टीवी पर डिबेट के दौरान बाबा रामदेव ने ओवैसी की जमकर क्लास लगाई और उन्हें उनके ‘औकात’ के बारे में भी बताया। रामदेव ने ओवैसी को गद्दार बताया। उन्होंने कहा कि वो ओवैसी को गद्दार इसलिए कह रहे हैं क्योंकि उनका (ओवैसी) भारत और भारतीयता में आस्था नहीं है। उन्होंने कहा कि ओवैसी का अपना एक अलग मजहबी एजेंडा है। उस मजहबी एजेंडे को चलाकर ये अपना राज कायम रखना चाहते हैं और लोगों को अलग-अलग तरीके से भड़काना चाहते हैं।

बाबा रामदेव ने आगे कहा कि ओवैसी चाहते ही नहीं है कि हिन्दुस्तान के अंदर हिन्दू और मुस्लिम मिलकर शांति से रहे। ये मजहबी तौर पर झगड़े कराकर देश को बाँटना चाहते हैं। कोई हिन्दू राष्ट्र और कोई इस्लाम राष्ट्र की बात नहीं होगी। यह भारत है, यह हिन्दुस्तान है। उन्होंने कहा, “अगर ओवैसी का वश चले तो ये हैदराबाद में निजामी के समय की तरह ही दूसरा फसाद खड़ा कर दे, लेकिन इसकी औकात ही नहीं है इतनी कि हिन्दुस्तान का बँटवारा कर सके।”

उल्लेखनीय है कि अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार (नवंबर 9, 2019) को अपने फैसले में विवादित जमीन रामलला को देने का फैसला किया। जबकि मुस्लिम पक्ष को अयोध्या में ही दूसरी जगह 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने विवादित जमीन रामलला को इसलिए दी है, क्योंकि मुस्लिम पक्ष जमीन पर दावा साबित करने में नाकाम रहा। जिसके बाद कोर्ट ने राम मंदिर निर्माण की रूपरेखा तय करने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार को दी है। कोर्ट ने केंद्र से तीन महीने के अंदर ट्रस्ट बनाने के लिए कहा है।

‘कारसेवकों का बलिदान व्यर्थ नहीं गया, पूरे देश में हो राम राज्य’

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) ने अयोध्या के फैसले पर ख़ुशी का इज़हार किया है। पार्टी के मुखिया और शिव सेना संस्थापक बाला साहेब ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे ने फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि वे आज खुश हैं। उन्हें ख़ुशी है कि मंदिर के संघर्ष के लिए बलिदान देने वाले कार सेवकों के बलिदान व्यर्थ नहीं गए हैं।

गौरतलब है कि राम जन्मभूमि मंदिर के आंदोलन में विश्व हिन्दू परिषद, लाल कृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी के अलावा शिव सेना (2008 में मनसे के निर्माण से पहले राज ठाकरे की भी पार्टी) का भी बड़ा हाथ था। 1992 में बाबरी ध्वंस मामले में बाला साहेब ठाकरे को भी आरोपित के तौर पर नामजद किया गया था।

राज ठाकरे ने आज (9 नवंबर, 2019 को) राम मंदिर के जल्दी से जल्दी मंदिर निर्माण की माँग की है। उन्होंने साथ ही कहा कि राम मंदिर के अलावा उनकी इच्छा राष्ट्र में राम राज्य की भी है।

बाबरी मस्जिद निर्माण के 491 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला सुना राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। सीजेआई रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने साफ़ कर दिया कि मुस्लिम पक्ष अयोध्या की विवादित ज़मीन पर अपना दावा साबित करने में विफल रहा। राम मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट स्थापित कर 3 महीने के भीतर मंदिर निर्माण के लिए योजना शुरू की जाए, ऐसा सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है।

ट्रस्ट बनाने और मंदिर निर्माण की योजना के लिए तीन महीने का वक्त सरकार को दिया गया है। साथ ही शीर्ष अदालत ने कहीं और मस्जिद बनाने के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड को 5 एकड़ जमीन देने का भी निर्देश दिया है। यानी, सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को मस्जिद बनाने के लिए अलग से ज़मीन दी जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि बाहरी हिस्से पर हिन्दुओं द्वारा पहले से ही पूजा की जा रही थी, इसमें कोई विवाद नहीं है। 1857 से पहले यहाँ हिन्दुओं द्वारा पूजा करने के सबूत हैं। मुस्लिम पक्ष को राम मंदिर बनाने के लिए अयोध्या में ही 5 एकड़ ज़मीन दी जाएगी।

‘ओवैसी मुस्लिमों के ठेकेदार नहीं, 20 करोड़ मुस्लिमों की तरफ से 5 एकड़ जमीन कैसे मना कर दिए?’

कॉन्ग्रेस नेता और कश्मीरी मुस्लिम सलमान निज़ामी ने अयोध्या फैसले में मुस्लिमों को बाबरी के एवज में मिली 5 एकड़ ज़मीन ख़ारिज कर कर देने के लिए अकबरुद्दीन ‘अच्छा वाला’ ओवैसी को आड़े हाथों लिया है। निज़ामी ने कहा कि 20 करोड़ मुलिमों के ओवैसी ठेकेदार नहीं हैं। उन्होंने मुस्लिमों से 5 एकड़ ज़मीन स्वीकार कर उस पर एक मस्जिद और एक दोनों मज़हबों के छात्रों के लिए शिक्षा केन्द्र बनाने की बात की है।

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लमिन (एआईएमआईएम) के अध्यक्ष और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने अदालत के फैसले को लेकर अपनी नाखुशी जाहिर की है। उन्होंने कहा कि वो इस फैसले से संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि उन्हें खैरात में पाँच एकड़ जमीन नहीं चाहिए।

ओवैसी ने कहा, “मैं फैसले से खुश नहीं हूँ। सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम (सर्वोच्च) जरूर है, लेकिन वह अचूक नहीं है। हमें संविधान पर पूरा भरोसा है। हम अपने अधिकार के लिए लड़ रहे थे। हमें दान के रूप में पाँच एकड़ की जमीन नहीं चाहिए। हमें इस 5 एकड़ भूमि के प्रस्ताव को अस्वीकार करना चाहिए, हमें संरक्षण नहीं चाहिए।”

असदुद्दीन ओवैसी ने कॉन्ग्रेस को निशाने पर लेते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी ने भी आज अपना असली रंग दिखा दिया। कॉन्ग्रेस पार्टी पाखंडी और धोखेबाजों की पार्टी है। उनका कहना है कि अगर 1949 में मूर्तियों को नहीं रखा गया होता और तत्‍कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने ताले नहीं खुलवाए होते तो मस्‍जिद अभी भी होती। वहीं नरसिम्‍हा राव ने अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया होता तो मस्‍जिद अभी भी होती।

बाबर के वंशज ने किया फैसले का स्वागत, कहा- मंदिर बनवाने के लिए सोने की ईंट भेंट करूँगा

सुप्रीम कोर्ट द्वारा अयोध्या विवाद पर सुनाए गए फैसले का बाबर के वंशज और मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फर के परपोते याकूब हबीबुद्दीन उर्फ़ प्रिंस तुसी ने भी स्वागत किया है। इसके साथ ही उन्होंने कहा है कि मंदिर निर्माण के लिए वे सोने की ईंट भी ट्रस्ट को देंगे।

प्रिंस तुसी ने फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि जिस तरह से देश में 26 जनवरी और 15 अगस्त को खुशियाँ मनाई जाती है, उसी तरह से आज के दिन को भी राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस फैसले को सभी पक्षों को कबूल करना चाहिए।

उन्होंने ने सभी से शांति कायम रखने की अपील करते हुए कहा, “जिस तरह से हिन्दू भाई हमारे फंक्शन रमजान में, बकरीद में हमारा साथ देते हैं, उसी तरह से इस फैसले के बाद हम सभी मिलकर राम मंदिर बनाएँ और जहाँ तक हमारे सोने की ईंट की बात थी, वो हम देंगे।”

साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि जितने नेताओं की भड़काने की दुकानें हैं, वो आपको भड़काने की कोशिश करेंगे। मगर आप उनके बहकावे में न आएँ। रामलला की जहाँ जगह थी, उसे कायम रखा जाएगा और फिर दोनों मजहब के लोग मिलकर वहाँ मंदिर बनाएँगे। सारी दुनिया देखेगी कि हिन्दुस्तान एक सेक्युलर देश है।

उल्लेखनीय है कि अयोध्या विवाद पर हो रही सुनवाई के दौरान याकूब हबीबुद्दीन तुसी ने अयोध्या में राम मंदिर की पहली ईंट रखने की ख्वाहिश जताई थी। तुसी ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की इच्छा जताते हुए कहा था, “हमारा परिवार उसकी पहली ईंट रखेगा और हम मंदिर की नींव के लिए सोने की शिला दान करेंगे।”

गजब की अनुभूति हो रही है, कारसेवा जैसी ख़ुशी हो रही है, आप सब को बधाई: PM मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने करतारपुर कॉरिडोर के उद्घाटन के समय कई ऐसी बातें कहीं, जिनकी सोशल मीडिया में ख़ूब चर्चा हुई। इस दौरान उन्होंने कारसेवा की बातें भी की, जिसका सिख धर्म में काफ़ी महत्व है। सिख धर्म की परिभाषा के अनुसार, कारसेवा वो सेवा है, जो आप बिना किसी फल की प्राप्ति की इच्छा लिए दूसरों के लिए करते हैं। इसका अर्थ है कि प्रत्येक जीव के अंदर भगवान हैं और उनकी सेवा करना ही कारसेवा है। किसी धार्मिक निर्माण कार्य में सहयोग करने को भी कारसेवा कहा जाता है। पीएम मोदी ने कहा:

“ये मेरा सौभाग्य है कि मैं आज देश को करतारपुर साहिब कॉरिडोर समर्पित कर रहा हूँ। जैसी अनुभूति आप सभी को ‘कार सेवा’ के समय होती है, वही मुझे इस वक्त हो रही है। मैं आप सभी को, पूरे देश को, दुनिया भर में बसे सिख भाई-बहनों को बहुत-बहुत बधाई देता हूँ।”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस बयान के कारण लोगों को विश्व हिन्दू परिषद की कारसेवा भी याद आ गई। राम मंदिर आंदोलन के दौरान विहिप ने कारसेवा का प्रयोग किया था और इसने जनांदोलन का रूप ले लिया था। देश भर से लाखों श्रद्धालु कारसेवा करने के लिए अयोध्या पहुँचे थे। विहिप और बजरंग दल ने हजारों-लाखों कारसेवकों की भीड़ अयोध्या में जुटाई थी। ऐसे में पीएम मोदी द्वारा करतारपुर कॉरिडोर के उद्घाटन के दौरान कारसेवा का जिक्र करने से लोगों को अनायास ही 90 के दशक में राम जन्मभूमि के लिए हुई कारसेवा की याद आ गई।

गुरदासपुर स्थित डेरा बाबा नानक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने करतारपुर कॉरिडोर के लिए इंटीग्रेटेड चेकपोस्ट का उद्घाटन किया। इस दौरान पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह भी वहाँ उपस्थित रहे। उन्होंने पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह के साथ लंगर में भोजन किया। इस दौरान पीएम मोदी ने याद दिलाया कि कैसे गुरु गोबिंद सिंह सहित सभी सिख गुरुओं ने देश की रक्षा और एकता के लिए बलिदान दिए हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि गुरु नानक देव न सिर्फ़ सिख समुदाय बल्कि पूरी मानवता के धरोहर हैं।

करतारपुर साहिब के उद्घाटन से सिखों में ख़ुशी का माहौल है क्योंकि इससे उन्हें गुरु नानक देव के पवित्र स्थल का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त होगा। देशभर के कई सिखों ने पीएम मोदी को इसके लिए धन्यवाद दिया।

PM मोदी ने राष्ट्र को सम्बोधित किया, कहा-सुप्रीम कोर्ट का फैसला नया सवेरा लेकर आया है

आज सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे महत्वपूर्ण मामले पर फैसला सुनाया है, जिसके पीछे सैकड़ों वर्षों का एक इतिहास है। पूरे देश की ये इच्छा थी कि इस मामले की अदालत में हर रोज सुनवाई हो, जो हुई, और आज निर्णय आ चुका है। दुनिया मानती है कि भारत का लोकतंत्र कितना जीवंत है। फैसला आने के बाद हर समुदाय और पंत के लोगों ने जिस प्रकार से इस स्‍वीकार किया है ये अदभुत है। भारत की पहचान विविधता में एकता की रही है।

फैसला आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राम मंदिर मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने जो बातें कही वो इस प्रकार है:

  • आइए, इस अहम और पवित्र पड़ाव पर हम संकल्प लें कि गुरु नानक जी के वचनों को अपने जीवन का हिस्सा बनाएंगे। हम समाज के भीतर सद्भाव पैदा करने के लिए हर कोशिश करेंगे।
  • आज सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे महत्वपूर्ण मामले पर फैसला सुनाया है, जिसके पीछे सैकड़ों वर्षों का एक इतिहास है।पूरे देश की ये इच्छा थी कि इस मामले की अदालत में हर रोज़ सुनवाई हो, जो हुई, और आज निर्णय आ चुका है।
  • फैसला आने के बाद जिस प्रकार हर वर्ग ने, हर समुदाय ने, हर पंथ के लोगों ने, पूरे देश ने खुले दिल से इसे स्वीकार किया है, वो भारत की पुरातन संस्कृति, परंपराओं और सद्भाव की भावना को प्रतिबिंबित करता है।
  • भारत की न्यायपालिका के इतिहास में भी आज का ये दिन एक स्वर्णिम अध्याय की तरह है। इस विषय पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सबको सुना, बहुत धैर्य से सुना और सर्वसम्मति से फैसला दिया।
  • सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के पीछे दृढ़ इच्छाशक्ति दिखाई है। और इसलिए, देश के न्यायधीश, न्यायालय और हमारी न्यायिक प्रणाली अभिनंदन के अधिकारी हैं।
  • आज अयोध्या पर फैसले के साथ ही, 9 नवंबर की ये तारीख हमें साथ रहकर आगे बढ़ने की सीख भी दे ही है। आज के दिन का संदेश जोड़ने का है-जुड़ने का है और मिलकर जीने का है। नए भारत में भय, कटुता, नकारात्मकता का कोई स्थान नहीं है।
  • सर्वोच्च अदालत का ये फैसला हमारे लिए एक नया सवेरा लेकर आया है। इस विवाद का भले ही कई पीढ़ियों पर असर पड़ा हो, लेकिन इस फैसले के बाद हमें ये संकल्प करना होगा कि अब नई पीढ़ी, नए सिरे से न्यू इंडिया के निर्माण में जुटेगी।
  • अब समाज के नाते, हर भारतीय को अपने कर्तव्य, अपने दायित्व को प्राथमिकता देते हुए काम करना है। हमारे बीच का सौहार्द, हमारी एकता, हमारी शांति, देश के विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

ग़ौरतलब है कि एक ऐतिहासिक फ़ैसले के तहत, CJI रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की 5-जजों की बेंच ने अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए 2.77 एकड़ की पूरी राम जन्मभूमि साइट को सौंप दी। साथ ही, अदालत ने सरकार से कहा कि वह अयोध्या में सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के प्रतिनिधित्व वाले मुस्लिम पक्षकारों को मस्जिद निर्माण के लिए 5 एकड़ ज़मीन प्रदान करे। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से 3 महीने के भीतर इसके लिए एक योजना तैयार करने को कहा है। सरकार को मंदिर निर्माण के लिए न्यास बोर्ड का गठन करना होगा।

कटाक्ष: लिबरलों को रुदन कक्ष, रवीश-राठी-कामरा के लिए चिराँध योजना। Ajeet Bharti on Liberals meltdown

जहाँ रवीश कुमार को अनपढ़ रवीश भक्तों से जोड़ने के लिए सरकार द्वारा पेपर रोल देने का निर्देश है, वहीं कामरा-राठी जैसे लौंडों के लिए जज ने चिरकुट रोजगार एवं नल्लारोधी धमाका (ChiRAnDh) योजना बनाने के आदेश दिए हैं।

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‘पापा मोदी’, हिम्मत है तो राम मंदिर बनाओ और अनुच्छेद 370 हटाओ: कबूल हुई शेहला रशीद की दोनों दुआएँ

मोदी सरकार ने शेहला रशीद की दोनों इच्छाएँ पूरी कर दी हैं। अगर आपको लगता है कि हम मजाक कर रहे हैं तो आप ग़लत हैं। दरअसल, ट्विटर पर शेहला रशीद ने राम मंदिर को लेकर कई बार टिप्पणी की थी। जेएनयू की छात्र नेता रहीं शेहला ने जम्मू कश्मीर की राजनीति में भी क़दम रखा था लेकिन अनुच्छेद 370 के प्रावधानों के निरस्त होने के कारण उन्हें राजनीति से सन्यास लेना पड़ा। इसके लिए उन्होंने लम्बा-चौड़ा फेसबुक पोस्ट लिख कर मोदी सरकार पर निशाना साधा। अगर अनुच्छेद 370 की बात करें तो इसके हटने के पहले भी वह कई बार इसके लिए सरकार पर निशाना साध चुकी थीं।

शेहला रशीद ने एक बार ट्वीट कर के कहा था:

“अयोध्या में कॉर्पोरेटर, विधायक और सांसद- सभी भाजपा के हैं। राज्य में भी भाजपा की सरकार है। केंद्र में तो भाजपा की सरकार है ही। तो फिर राम मंदिर क्यों नहीं बना? अगर ये चुनावी मुद्दा है तो जनता को भाजपा को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा देना चाहिए।”

शेहला रशीद का ट्वीट, जिसमें उन्होंने राम मंदिर को लेकर तंज कसा था

अब शेहला रशीद की इच्छा पूरी हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले में ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाते हुए पूरी की पूरी विवादित ज़मीन रामलला विराजमान को देने का आदेश दिया है। मुस्लिम पक्ष का वहाँ किसी प्रकार का स्वामित्व नहीं है, ऐसा सुप्रीम कोर्ट ने कहा है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मुस्लिमों को अयोध्या में ही कहीं और 5 एकड़ ज़मीन दी जाए। इस सम्बन्ध में केंद्र सरकार से एक ट्रस्ट बना कर मंदिर निर्माण के सम्बन्ध में योजना बनाने को कहा गया है। यानी, मंदिर निर्माण को लेकर मोदी सरकार द्वारा गठित ट्रस्ट योजना बनाएगा।

शेहला रशीद ने राम मंदिर को लेकर मोदी समर्थकों पर किया था कटाक्ष

इस तरह से राम मंदिर के निर्माण का कार्य भी मोदी सरकार करेगी और शेहला रशीद की ये इच्छा भी पूरी हो जाएगी। शेहला ने एक बार और किसी व्यक्ति को जवाब देते हुए कहा था कि ‘राम मंदिर ले लो।’ शेहला रशीद अक्सर राम मंदिर को लेकर मोदी सरकार और मोदी समर्थकों पर कटाक्ष करती रहती हैं। सोशल मीडिया पर लोगों ने शेहला रशीद की उन ट्वीट्स को जम कर शेयर किया और उन्हें याद दिलाया कि उनकी इच्छा पूरी हो गई है।

इतना ही नहीं, अनुच्छेद 370 को लेकर भी शेहला रशीद मोदी सरकार पर तंज कसती रहती थीं। शायद उन्हें ऐसा लगता था कि बाकि सरकारों की तरह इस बार भी सिर्फ़ बातें ही की जाएँगी और एक्शन नहीं लिया जाएगा। अनुच्छेद 370 के बारे में शेहला ने कहा था:

“अरे ट्रोल्स की ही तो हुकूमत चल रही है। बोलो ट्रोल्स के पापा से कि हिम्मत है तो हटा के दिखाए अनुच्छेद 370।”

शेहला के कटाक्ष के बाद अनुच्छेद 370 के प्रावधान भी निरस्त हो गए

भले ही शेहला रशीद जैसे लोग राम मंदिर और अनुच्छेद 370 हटाने के कट्टर विरोधी रहे हों लेकिन वो समझते थे कि भाजपा के कार्यकाल में यह सब नहीं हो पाएगा। उन्होंने इसे राजनीतिक जुमला समझने की भूल की। अब इस भूल का परिणाम सामने है। शेहला के पास शायद ही अब बोलने के लिए शब्द हों।

मुस्लिमों के लिए अयोध्या की महत्ता नहीं, कोई औलिया या पीर यहाँ से नहीं जुड़ा: पद्मश्री मोहम्मद

अयोध्या मामले का फैसला आने के बाद विवाद के पटाक्षेप का एएसआई (आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया) के पूर्व निदेशक के के मोहम्मद ने स्वागत किया है। उन्होंने इसे ‘सबसे अच्छा’ फैसला बताया है।

टाइम्स नाउ से बात करते हुए एएसआई (उत्तरी) के पूर्व निदेशक मोहम्मद ने कहा कि अयोध्या और जन्मभूमि हिन्दुओं के लिए वैसे ही पवित्र और महत्वपूर्ण है, जैसे मुस्लिमों के लिए मक्का और मदीना हैं। उन्होंने यह भी कहा कि मुस्लिमों के लिए इसकी उतनी ज़्यादा कोई महत्ता नहीं है, क्योंकि कोई बड़ा औलिया या पीर इस स्थान से जुड़ा नहीं रहा है।

इसके अलावा एएनआई से बात करते हुए उन्होंने कहा कि एक ‘गैंग’ ने उन्हें उस समय परेशान करना शुरू कर दिया था, जब उन्होंने कहा था कि पुरातात्विक साक्ष्य उस जगह पर मंदिर होने की ओर इंगित करते हैं।

आज अयोध्या पर फैसले की ऐतिहासिक घड़ी में मोहम्मद को याद भी खूब किया जा रहा है। हिन्दू उनके प्रति कृतज्ञता जता रहे हैं कि उन्होंने हिन्दुओं की आस्था के पक्ष में क़ानूनी सबूत ढूँढ़ निकाले।

लेखक और वैज्ञानिक आनंद रंगनाथन वह वाकया याद दिला रहे हैं जिसमें के के मोहम्मद को धमकी दी गई थी कि बाबरी का सच जनता को बताने पर उन्हें सस्पेंड कर देने की धमकी दी गई थी। इसके बाद मोहम्मद ने संस्कृत में जवाब में कहा था, “लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन् कर्तुमर्हसि। स्वधर्मे निधनं श्रेयः…”

संक्रांत सानु और संजय दीक्षित जैसे हिंदूवादी विचारकों ने भी आज मोहम्मद के उस आरोप को याद किया कि मुस्लिम पक्ष को भी ‘सेक्युलर’ गैंग ने ही राम मंदिर के खिलाफ भड़काया था।

रामलला के तुलसी: 92 की उम्र में लड़ा अयोध्या का धर्मयुद्ध, दलीलों से मुस्लिम पक्ष को किया चित

भारतीय न्यायिक व्यवस्था में वकालत की दुनिया के पितामह कहे जाने वाले के पराशरण की अंतिम इच्छा पूरी हो गई। वे अपनी मृत्यु से पहले यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि रामलला अपनी जमीन पर​ कानूनी तौर से विराजमान हो जाएँ। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से उनकी यह मुराद पूरी हो गई है।

सुप्रीम कोर्ट में रामलला विराजमान की तरफ से उन्होंने ही दलीलें पेश की थी। सुनवाई के दौरान ऐसी-ऐसी दलीलें रखी कि मुस्लिम पक्ष उसकी काट नहीं तलाश पाए। शीर्ष अदालत पूरी सुनवाई उनकी दलीलों के इर्द-गिर्द ही घूमती रही। उन्होंने पूरे राम जन्मभूमि को न्यायिक व्यक्ति अथवा ज्यूरिस्टिक पर्सन साबित करने की कोशिश की। हालाँकि, अंत में उनकी यह दलील कोर्ट ने स्वीकार नहीं की, लेकिन पूरी सुनवाई इसी के आसपास घूमती रही।

जब सुनवाई चालू होनी थी, उससे पहले सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वकील राजीव धवन ने कहा था कि के. पराशरण के लिए ये प्रक्रिया काफ़ी थकाऊ होगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पराशरण ने घंटों खड़े होकर बहस की। अदालत में जजों ने उनकी उम्र को देखते हुए उन्हें बैठ कर बहस करने की सहूलियत दी, लेकिन पराशरण ने कहा कि इंडियन बार की जो परंपरा है, वह उसी हिसाब से चलेंगे। उनका जन्म अक्टूबर 9, 1927 को हुआ था। वह 1983 से 1989 तक भारत के अटॉर्नी जनरल रह चुके हैं।

के पराशरण तमिलनाडु से लेकर केंद्र तक, प्रत्येक सरकारों के फेवरिट रहे हैं। उनके पिता केशव अय्यंगर भी एक वकील थे। उनके दोनों बेटे मोहन पराशरण और सतीश पराशरण भी वकील हैं। भारत के अटॉर्नी जनरल रहने से पहले वह 1976-77 में तमिलनाडु के सॉलिसिटर जनरल भी रह चुके हैं। इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी के शासनकाल में भी वह इस पद पर रहे। कॉन्ग्रेस सरकारों के दौरान वो महत्वपूर्ण पदों पर रहे, लेकिन उनकी विद्वता का लोहा भी राजनीतिक दलों, नेताओं और सरकारों ने माना। तभी तो तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने जब संविधान की वर्किंग के लिए ड्राफ्टिंग एंड एडिटोरियल कमिटी बनाई तो पराशरण को भी उसमें शामिल किया गया।

पराशरण छात्र जीवन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी रहे हैं। उन्हें बीए के कोर्स के दौरान सीवी कुमारस्वामी शास्त्री संस्कृत मेडल और हिन्दू लॉ में जस्टिस वी भाष्यम अयंगर गोल्ड मेडल मिला। तब वो बीएल कर रहे थे, जिसे अब बीए एलएलबी के नाम से जाना जाता है। फिर बार कॉउन्सिल की परीक्षा में उन्हें जस्टिस श्री केएएस कृष्णास्वामी अयंगर गोल्ड मेडल मिला। आप इसी से समझ सकते हैं कि उन्होंने छात्र जीवन के दौरान ही क़दम-क़दम पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। भगवान राम के लिए, रामकाज के लिए- भला उनसे बेहतर वकील कहाँ मिलता?

राम मंदिर का मामला उन्होंने यूँ ही नहीं लड़ा। उन्हें भारतीय इतिहास, वेद-पुराण और धर्म का वृहद ज्ञान है। यही कारण है कि सुनवाई के दौरान भी वह अदालत में स्कन्द पुराण के श्लोकों का जिक्र कर राम मंदिर का अस्तित्व साबित करते रहे। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में जिरह की शुरुआत ही ‘जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ श्लोक के साथ की थी। वाल्मीकि रामायण में ये बात श्रीराम ने अपने भाई लक्ष्मण से कही थी। जहाँ भी आस्था का मामला हो, जहाँ भी धार्मिक विश्वास का मामला हो, वहाँ धर्म की ओर से, श्रद्धा की ओर से, पराशरण ही वकील होते हैं। उन्होंने सरकार के ख़िलाफ़ जाकर रामसेतु बचाने के लिए केस लड़ा।

सबरीमाला मामले में भी श्रद्धालुओं की तरफ़ से पराशरण ही वकील थे। पराशरण मजाक-मजाक में वकालत को अपनी दूसरी पत्नी बताते हैं। 24 घंटे में 18 घंटे वकालत सम्बन्धी कामकाज और अध्ययन में बिताने वाले पराशरण ने बताया था कि वो अपनी पत्नी से भी ज्यादा समय वकालत को देते हैं। सुप्रीम कोर्ट के जज संजय किशन कॉल ने अपनी पुस्तक में उनके लिए ‘पितामह ऑफ इंडियन बार’ शब्द प्रयोग किया। वकालत के कुछ छात्रों ने मिल कर के पराशरण पर ‘Law and Dharma: A tribute to the Pitamaha of the Indian Bar’ नामक पुस्तक भी लिखी है, जिसमें उनके बारे में लिखा गया है।

इस मौके पर जस्टिस संजय किशन कौल कहा कि पराशरण न सिर्फ़ बार बल्कि बेंच के युवा सदस्यों का मार्गदर्शन करने के लिए सबसे उपयुक्त व्यक्ति हैं। ‘सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ छत्तीसगढ़’ के कुलपति एनआर माधव मेनन ने पराशरण को तीन गुणों का मिश्रण बताया। उनका मानना है कि पराशरण अध्यात्म के साथ-साथ मानवता और सादगी के प्रोफेशनल प्रतीक हैं। पराशरण कहते हैं कि जीवन में कोई भी फ़ैसला लेने से पहले धर्म के प्रति हमें सचेत रहना चाहिए।

बहुत कम लोगों को पता है कि पराशरण को 2012 में राज्यसभा के लिए नामित किया गया था। वह राज्यसभा सांसद भी रह चुके हैं। उन्हें 2003 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। उन्हें 2011 में पद्म विभूषण मिला। शनिवार (नवंबर 9, 2019) को जब सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले में फ़ैसला सुना कर वहाँ मंदिर बनाने का मार्ग प्रशस्त कर दिया, पराशरण को ख़ुशी तो हुई लेकिन उन्हें बोरियत भी महसूस हुई। वह पिछले 8 महीनों से इस काम में इतने लीन हो गए थे कि अब उन्हें समझ ही नहीं आ रहा कि उनका समय कैसे व्यतीत होगा? पराशरण की टीम में जितने भी वकील थे, उनकी ऊर्जा देख कर वो सभी अचम्भे में थे और पिछले कुछ महीने उनके लिए यादगार बन गए। उन्हें काफ़ी कुछ सीखने को मिला।

आपको 16 अक्टूबर की एक बात याद दिलानी ज़रूरी है। जब सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई ख़त्म हुई, तब पराशरण कोर्ट के बाहर 15 मिनट तक किसी का इन्तजार करते रहे। वो राजीव धवन का इन्तजार कर रहे थे। वही धवन, जिन्होंने 40 दिन की सुनवाई के दौरान कई बार आपा खोया जबकि पराशरण एकदम शांत और गंभीर बने रहे। पराशरण ने धवन के साथ फोटो खिंचवा कर देश-दुनिया को यह सन्देश दिया कि प्रोफेशनल रूप से भले ही आप एक-दूसरे से लड़ें, लेकिन अंत में शांति और समरसता की ही जीत होनी चाहिए।

इतिहास में जब भी ऐतिहासिक राम मंदिर फ़ैसले की बात होगी, पराशरण के जिक्र ज़रूर आएगा क्योंकि पूरा मामले उनके इर्द-गिर्द घूमा और हिन्दुओं की इस विजय में श्रीराम के इस सेनानी का महान योगदान रहा। हिन्दुओं की भी यही इच्छा है कि पराशरण अपने जीवनकाल में भव्य राम मंदिर निर्माण का गवाह बनें। हम भी उनकी लम्बी उम्र और उत्तम स्वास्थ्य की कामना करते हैं।