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आसाराम को ठगने वाले दंपति आपस में ही ठगे गए: कहानी पूरी फ़िल्मी है

केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) के सलाहकार मंडल की सदस्या होने का दावा करने वाली एक महिला शिखा गुप्ता को उसके पति नितिन गुप्ता के साथ शनिवार को दिल्ली के प्रीत विहार से राजस्थान पुलिस के स्पेशल ऑपरेशन्स ग्रुप (एसओजी) ने गिरफ्तार किया था। टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने एसओजी के अतिरिक्त अधीक्षक करण शर्मा के हवाले से बताया है कि दम्पति के पास से पहचान पत्र और प्रवेश पत्र (एंट्री पास) मिले हैं। नितिन गुप्ता की सारी पहचान झूठी निकली है, जबकि शिखा गुप्ता के दावों का सत्यापन हो रहा है।

शिखा गुप्ता ने हजारों लोगों से पैसे ठगे हैं। हजारों लोगों से करोड़ों ठगने की आरोपित शिखा गुप्ता को पुलिस हिरासत में बड़ा झटका तब लगा जब उसके पतिदेव ने ही पुलिस के सामने अपनी एक और पत्नी होने की बात कबूली। कानून मंत्रालय में प्रधान सलाहकार होने का नकली दावा करने के आरोपी नितिन गुप्ता ने बताया कि उनकी पहले भी शादी हो चुकी है, और पहली पत्नी जयपुर के जगतपुरा में एक किराए के फ्लैट में रहती है।

एसओजी का दावा है कि दम्पति ने राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और नई दिल्ली के भोले-भाले लोगों को चोटी के मेडिकल कॉलेजों में दाखिला, बैंक, रेलवे जैसे ‘मलाईदार’ विभागों में नौकरी जैसे प्रलोभन देकर लगभग ₹2 करोड़ ऐंठे हैं। पुलिस ने यह भी दावा किया कि आरोपित दिल्ली के वरिष्ठ नेताओं और नौकरशाहों के सम्पर्क में भी हैं, और लोगों को ठगने के लिए अपने फर्जी प्रभाव का इस्तेमाल करते हैं।

लोगों को ठगने के लिए उन्हें रेलवे, राष्ट्रीयकृत बैंकों में नौकरी का लालच देते थे और सीबीएफसी की सदस्यता का प्रलोभन दे भी वसूली करते थे। उन्होंने यह भी बताया कि शुरुआती जाँच में नितिन मूल रूप से अलीगढ़ का रहने वाला है और दिल्ली आने से पहले मेरठ में कंस्ट्रक्शन कम्पनी में काम करता था। एक मैरिज ब्यूरो में काम करने वाली शिखा से शादी के बाद वह पत्नी सहित दिल्ली आ गया और कई केंद्र सरकार के विभागों के कई नौकरशाहों के साथ उसने संबंध कायम किए।

एसपी करण शर्मा के मुताबिक, “नितिन अपने नेटवर्क का इस्तेमाल केंद्र सरकार में राजनीतिक नियुक्तियों के लिए करता था। 2014 में उसने खुद ही कानून मंत्रालय में सलाहकार बनने की पुरज़ोर कोशिश की लेकिन असफल रहा। इसके बावजूद उसने नकली पहचान पत्र और विजिटिंग कार्ड बनवा कर खुद को सलाहकार बताना शुरू कर दिया।”

उसके ‘पीड़ितों’ में केवल आम लोग ही नहीं, बलात्कार के मामले में जेल में बंद आसाराम बापू का भी नाम आया है। पुलिस ने बताया कि पैरोल पर जेल से छुड़वाने के एवज में नितिन ने आसाराम से भी ₹50 लाख वसूले थे। बताया जा रहा है कि वह कुल 4 बार जेल में जाकर आसाराम से मिला था। एसपी करण शर्मा ने बताया कि दम्पति के कॉल डिटेल और 8 खातों की जाँच जारी है

‘आपातकाल से जनता नाराज़ नहीं थी’: रेंगने का सपना पाले Scroll के पत्रकार शोएब के दावे का सच

आज हम 1977 के उस चुनाव को याद करने जा रहे हैं, जिसमें जनता ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को देश पर आपातकाल थोपने की सज़ा दी थी। एक ऐसा चुनाव, जिसकी पटकथा में एक 75 वर्षीय बूढ़े की क्रांति का ज़िक्र आता है। स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी जयप्रकाश नारायण और मोरारजी देसाई की जुगलबंदी को जनता ने सर-आँखों पर बिठाया और जनता पार्टी ने कॉन्ग्रेस को चारो खाने चित कर दिया था। आपातकाल के दौरान हुए अत्याचारों से त्रस्त जनता ने पिछले चुनाव में 352 सीटें जीतने वाली कॉन्ग्रेस को 189 पर समेट दिया। कॉन्ग्रेस को 217 सीटों का भारी नुक़सान हुआ। आपातकाल के दौरान विपक्षी नेताओं और उनके समर्थकों के साथ जैसा व्यवहार किया गया, उससे समझा जा सकता है कि जनता के गुस्से का कारण क्या था?

लेकिन आज मीडिया में कुछ ऐसे कुकुरमुत्ते पैदा हो गए हैं, जो भारतीय लोकतंत्र के सबसे काले अध्याय को जायज ठहराने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। जैसे, हमारी नज़र स्क्रॉल के एक लेख पर पड़ी, जिसमें महज वोट प्रतिशत के आधार पर यह साबित करने की कोशिश की गई है कि लोग आपातकाल से नाराज़ नहीं थे। स्क्रॉल के प्रोपेगंडा को हम यहाँ बिंदु दर बिंदु काटते चलेंगे और उसे सच्चाई का एक ऐसा आइना पेश करेंगे, ताकि उन्हें एक तानाशाही रवैये को जायज ठहराने के लिए शर्मिंदगी महसूस हो। शोएब दानियाल द्वारा लिखे गए इस आर्टिकल में दावा किया गया है कि एक ऐसा ‘नैरेटिव तैयार कर दिया गया’ कि आपातकाल का समय बहुत बुरा था जबकि ऐसा कुछ नहीं था। प्रोपेगंडा पोर्टल पर प्रकाशित प्रोपेगंडा आर्टिकल के प्रोपेगंडा लेखक का प्रोपेगंडा ट्वीट:

शोएब ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और लालकृष्ण आडवाणी के बयानों का ज़िक्र किया है। नरेंद्र मोदी ने लिखा था कि आपातकाल भारतीय इतिहास के सबसे अंधकारमय काल में से एक था। हालाँकि, शोएब दावा करते हैं कि 3000 वर्षों के इतिहास में ऐसा अंधकारमय समय कई बार आया। शोएब का कहना सही है। बख्तियार ख़िलजी द्वारा नालंदा विश्वविद्यालय व लाखों पुस्तकों को जला देना, मुस्लिम शासकों द्वारा विजयनगर साम्राज्य को जीत कर थोक में महिलाओं का बलात्कार करना, अकबर के जीतने के बाद मुग़लों द्वारा दिल्ली में नरमुंडों का पहाड़ खड़ा किया जाना, ब्रिटिश शासन, औरंगजेब द्वारा हिन्दुओं पर अत्याचार और तैमूर की क्रूरता जैसे कई काले अध्याय हमारे इतिहास में भरे पड़े हैं।

आख़िर पूर्व उप-प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ब्रिटिश राज से आपातकाल की तुलना करते हुए क्यों न कहें कि वो देश की स्वायत्तता पर निर्मम हमला था? आडवाणी ने उस विभीषिका को झेला है। जो व्यक्ति 19 महीनों तक सिर्फ़ इसीलिए जेल में रहा क्योंकि उसने भारतीय लोकतंत्र के अंतर्गत विपक्ष का हिस्सा रहना पसंद किया था, क्या उसे अपनी पीड़ा व्यक्त करने का अधिकार नहीं? आडवाणी ने 2010 में लिखा था कि आपातकाल को भूल जाना लोकतंत्र को क्षति पहुँचाने जैसा होगा। नेहरू द्वारा स्थापित समाचारपत्र नेशनल हेराल्ड में तंजानिया के ‘एक पार्टी सिस्टम’ को ‘मल्टी पार्टी सिस्टम’ जितना ही ताक़तवर बताया गया। आपातकाल के दौरान उन अत्याचारों के प्रत्यक्ष गवाह व पीड़ित रहे आडवाणी कहते हैं:

“आपातकाल के ख़िलाफ़ लड़ने वाले सभी लोग लोकतंत्र के सेनानी थे। आज और भविष्य की पीढ़ियों को लोकतंत्र की रक्षा हेतु उनके योगदानों को पढ़ाया जाना चाहिए। आपातकाल वाले दौर को सिलेबस में शामिल किया जाना चाहिए। उस दौरान प्रेस को पूरी तरह सेंसर किया जाता था। आपातकाल या सरकार की आलोचना की किसी को भी अनुमति नहीं थी। इंदिरा ने मीडिया को झुकने को कहा तो वो रेंगने ही लगा।”

स्क्रॉल के आर्टिकल में आगे बताया गया कि कॉन्ग्रेस को मिलने वाले मतों की संख्या में वृद्धि हुई। आगे इसी लेख में बता दिया जाता है कि ऐसा जनसंख्या वृद्धि के कारण हुआ। 1971 और 1977 में हुए चुनावों में कुल मतों की तुलना करना बेहूदगी ही होगी क्योंकि 6 वर्षों में भारत जैसे देश में जनसंख्या काफ़ी तेज़ी से बढ़ती है और यहाँ चुनाव में मत प्रतिशत देखे जाते हैं। 1971 के मुक़ाबले 1977 में कॉन्ग्रेस को 9.3% कम वोट मिले, जो 2014 में कॉन्ग्रेस के ख़राब प्रदर्शन के ही सामान हैं। लेकिन अब हम आपको बताते हैं कि स्क्रॉल के इस दावे में खोत (गलती) कहाँ है। दरअसल, स्क्रॉल इस लेख में यह ज़िक्र करना भूल गया कि इंदिरा गाँधी ख़ुद लोकसभा चुनाव हार गई थीं।

1977 में रायबरेली से इंदिरा गाँधी को राज नारायण ने 55,000 से भी अधिक मतों से हरा दिया था। इंदिरा अपने ख़ुद के ही संसदीय क्षेत्र में 16% से भी अधिक मतों से पिछड़ गई थीं। क्या यह जनता का गुस्सा नहीं दिखाता है? जब देश का सबसे ताक़तवर नेता मानी जाने वाली शख़्सियत ख़ुद की लोकसभा सीट भी न बचा पाए? इसकी तुलना 2014 से इसीलिए नहीं की जा सकती क्योंकि 2014 में राहुल गाँधी मोदी लहर के बावजूद अमेठी से जीत दर्ज करने में कामयाब रहे थे। अगर राजनीतिक शक्ति की बात करें तो इंदिरा के सामने राहुल कहाँ ठहरते हैं, ये कोई बच्चा भी बता दे। अर्थात, देश के लोकतान्त्रिक इतिहास में सबसे ताक़तवर नेताओं में से एक का खुद की सीट भी न बचा पाना स्क्रॉल के लिए जनता के गुस्से को नहीं दिखाता।

एक और बात गौर करने लायक यह है कि आज़ादी के पहले से पूरे देश में स्थापित रहने के कारण कॉन्ग्रेस का ज़मीनी संगठन उस समय इतना मजबूत था, जिसे हिला पाना और उसके समांनातर संगठन खड़ा करना एक समय लेने वाली लम्बी और जटिल प्रक्रिया थी। यह इंदिरा गाँधी और संजय गाँधी के प्रति लोगों का भारी आक्रोश ही था कि चुनाव से ऐन पहले जनता मोर्चा के नाम से एक छतरी के तले आए कुछ दलों को जनता ने पूर्ण बहुमत दे दिया। स्क्रॉल ने दक्षिण भारत में कॉन्ग्रेस के बढ़े वोट शेयर को लेकर पूरे भारत का रुख बता दिया जबकि यह ज़िक्र तक नहीं किया कि बाकी राज्यों में पार्टी का क्या हाल हुआ था।

कुछेक क्षेत्रों के आँकड़े गिना कर आपातकाल को जायज ठहराने की कोशिश की जा रही है, ये वही मीडिया है जो इंदिरा द्वारा झुकने की बात कहने पर रेंगने लगा था। शायद मीडिया के इस गिरोह विशेष को इंदिरा जैसी ही किसी शख़्सियत का फिर से इन्तजार है, ताकि उस दौरान में अस्तित्व में नहीं रहे ये प्रोपेगंडा पोर्टल्स अपनी रेंगने की फंतासी को आज पूरी कर सकें। स्क्रॉल ने आगे कॉन्ग्रेस के वोट प्रतिशत में आई कमी का कारण जगजीवन राम का पार्टी छोड़ना बताया है। स्क्रॉल का मानना है कि सिर्फ़ जगजीवन राम के चले जाने से ही कॉन्ग्रेस को दलित वोटों का नुकसान हुआ था।

2014 और 1977 की तुलना करने वाले शोएब ने यह लेख 2015 में लिखा था। तब 1980 चुनाव में इंदिरा की वापसी की याद दिलाने वाले शोएब या स्क्रॉल को यह अंदाजा भी नहीं रहा होगा कि 2019 में क्या होने वाला है। अब जब 2019 लोकसभा चुनाव का परिणाम आ चुका है, शोएब को पता चल ही गया होगा कि 1977 और 2014 में उतना ही अंतर है, जितना 1980 और 2019 में। यह भी जानने लायक बात है कि 1977 में लोगों का गुस्सा कॉन्ग्रेस पार्टी से ज्यादा इंदिरा और संजय के अत्याचारों से था, उन दोनों से लोग आक्रोशित थे। उनका गुस्सा इंदिरा गाँधी के प्रति ज्यादा था, जिसकी सज़ा उन्हें मिली। प्रोपेगंडा पोर्टल्स हो सकता है कि कल अंडमान निकोबार द्वीप समूह से आँकड़े लाकर यह भी साबित करने की कोशिश करें कि आपातकाल के दौरान कोई भी विपक्षी नेता जेल में नहीं था।

इतिहास को अपने हिसाब से लिखते आए इतिहासकारों, पत्रकारों और कथित विशेषज्ञों को पता होना चाहिए कि अब उनका ज़माना लद गया है। अब लक्षद्वीप के आँकड़े लाकर पूरे भारत का रुख बताने की कोशिश नहीं चलेगी। आज आपातकाल को लेकर जनता के आक्रोश को कम कर दिखाने की कोशिश करने वाले स्क्रॉल और तब तंजानिया की ‘एक पार्टी सिस्टम’ का गुण गाने वाले नेशनल हेराल्ड में कोई अंतर नहीं है। आज का स्क्रॉल नेहरू-इंदिरा के युग का नेशनल हेराल्ड ही है, बस इनकी रेंगने की फैंटसी पूरी नहीं हुई है। आज आपातकाल को वाइटवाश करने वाले लोग कल को ये भी कहने लग जाएँ कि नालंदा में शिक्षकों को मौत के घात उतार कर लाखों पुस्तकों को जला देने वाला ख़िलजी महान था, तो आश्चर्य मत कीजिएगा।

Army Intelligence ने अधिकारियों को किया आगाह: ‘ओए सौम्या’ से रहें सावधान

आर्मी इंटेलीजेंस ने सेना के सभी जवानों और अफसरों को एडवाइजरी जारी करके आगाह किया है कि वे इंस्टाग्राम पर सक्रिय प्रोफाइल ‘ओए सौम्या’ से सावधान रहें। दरअसल, सेना के साइबर एक्सपर्ट का मानना है कि यह एक फर्जी प्रोफाइल है जिसे जासूसी के लिए तैयार किया गया है।

आर्मी इंटेलीजेंस की ओर से जारी एडवाइजरी में बताया गया है कि यह प्रोफाइल भारत के सैन्य संस्थानों को निशाना बनाने के लिए तैयार किया गया है। इंटेलिजेंस को संदेह है कि ‘ओए सौम्या’ नाम का अकॉउंट दुश्मनों के जासूस का है जो सेना अधिकारियों एवं स्पेशल फोर्स के जवानों को निशाना बनाने की कोशिश में हैं लेकिन, फिलहाल ये अकाउंट सेवा में नहीं है।

गौरतलब है पिछले दिनों फर्जी अकॉउंट के ऐसे बहुत से मामले सामने आए हैं, जिनमें सेना की जानकारियाँ लीक कर दी गईं। दुश्मन पक्ष के जासूस अक्सर ऐसी आकर्षक प्रोफाइल बनाकर सोशल मीडिया पर सैन्य कर्मियों से दोस्ती करके उनसे संपर्क साध लेते हैं और कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ हासिल कर लेते हैं। इसीलिए, सैन्य कर्मियों को सोशल मीडिया से दूर रहने की सलाह दी जाती है लेकिन बावजूद मनाही के कई अफसर फर्जी प्रोफाइल से सोशल मीडिया पर सक्रिय पाए गए हैं।

बता दें अभी बीती 16 मई को ऐसा ही एक मामला सामने आया था, जिसमें महू में तैनात बिहार के रहने वाले एक आर्मी क्लर्क पर पाकिस्तान को भारतीय सेना की ख़ुफ़िया जानकारी लीक करने के मामले में हिरासत में लिया गया था। खबरों के मुताबिक इस मामले में पाकिस्तान के एक फर्जी अकॉउंट के जरिए आर्मी क्लर्क को हनी ट्रैप में फंसाया गया था और बाद में उन्हें इंडियन आर्मी की लोकेशन, मूवमेंट और एक्सरसाइज से जुड़ी जानकारी हासिल करने का काम दे दिया था।

टास्क मिलने के बाद वह (आर्मी क्लर्क) अपने सूत्रों से जानकारी हासिल करते और वॉट्सऐप के जरिए सारी जानकारी पाकिस्तान को भेज देते। जवान की इन हरकतों से इंटेलिजेंस को उनपर शक हुआ और उन्हें फिजीकल और इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस में रख दिया गया, उनकी हरकतों को लगातार ट्रैक किया गया। एक महीने बाद जब उनके ख़िलाफ़ सबूत मिले तो मध्यप्रदेश पुलिस की एटीएस ने उन्हें हिरासत में ले लिया।

झारखंड मॉब लिंचिंग में 11 आरोपित गिरफ्तार, 2 पुलिस अधिकारी सस्पेंड, जाँच जारी

झारखंड के सरायकेला में मॉब लिंचिंग का शिकार हुए 24 वर्षीय तबरेज अंसारी की मौत के मामले में पुलिस ने कार्रवाई करते हुए 11 आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि कथित चोरी को लेकर इस युवक के साथ भीड़ ने मारपीट की थी। इसके साथ ही पुलिस अधीक्षक (एसपी) कार्तिक एस ने दो पुलिस पदाधिकारियों- खरसावां थाना प्रभारी चंद्रमोहन उरांव व सीनी ओपी प्रभारी विपिन बिहारी सिंह को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया। दोनों पर लापरवाही बरतने व अपने वरीय पदाधिकारी को सूचना नहीं देने का आरोप है।

जानकारी के मुताबिक, मामले पर पुलिस प्रशासन ने संज्ञान लेते हुए एसडीपीओ अविनाश कुमार के नेतृत्व में विशेष जाँच दल (एसआईटी) का गठन किया गया है। एसआईटी में आरआईटी के थाना प्रभारी सह इंस्पेक्टर, आदित्यपुर के थाना प्रभारी सह इंस्पेक्टर, सरायकेला थाना प्रभारी व नए खरसावां थाना प्रभारी को रखा गया है। एसपी के निर्देश पर एसआईटी ने जाँच शुरू कर दी है।

पुलिस अधीक्षक कार्तिक एस ने बताया कि 17 जून को अंसारी अपने दो अन्य साथियों के साथ चोरी की नीयत से रात में सरायकेला के एक गाँव में घुसा था। इस दौरान घर के लोग जाग गए और शोर मचा दिया। जिसके बाद हंगामा होने पर अंसारी के दोनों साथी भाग निकले, जबकि तबरेज अंसारी को ग्रामीणों ने पकड़ कर बिजली पोल से बाँध कर पिटाई की। एसपी ने कहा कि अंसारी के पास से कुछ बेशकीमती सामान बरामद हुए, जो उसने और उसके साथियों ने अन्य गाँवों से कथित तौर पर चुराए थे।

ग्रामीणों की सूचना पर पहुँची पुलिस ने ग्रामीणों की पिटाई से घायल तबरेज अंसारी को हिरासत में लिया। पुलिस ने इलाज कराने के बाद उसे जेल भेज दिया। 22 जून की सुबह तबरेज अंसारी की तबीयत जेल में अचानक बिगड़ गई। जिसके बाद जेल प्रशासन ने उसे इलाज के लिए सदर अस्पताल भेजा, जहाँ पता चला कि उसे बहुत चोटें आईं हैं। बाद में, अंसारी को जमशेदपुर के टाटा मेन अस्पताल ले जाया गया, जहाँ चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया। लेकिन, परिजनों ने तबरेज के जिंदा होने की बात कह अस्पताल में हंगामा शुरू कर दिया। हंगामा बढ़ते देख चिकित्सकों ने उसके परिजनों की डिमांड पर टाटा मुख्य अस्पताल रेफर कर दिया, लेकिन वहाँ भी जाँच कर तबरेज को मृत घोषित कर दिया गया।

इस घटना का एक कथित वीडियो सामने आया है जिसमें कुछ लोग पीड़ित को ‘जय श्री राम’ और ‘जय हनुमान’ बोलने के लिए विवश करते हुए दिख रहे हैं। एसपी ने बताया कि जो वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हुआ है, उसकी जाँच की जा रही है। जाँच पूरी होने पर सारी सच्चाई सामने आ जाएगी। वहीं, झारखंड प्रदेश कॉन्ग्रेस के एक नेता ने मृतक के परिवार को ₹25 लाख मुआवजा और उसकी पत्नी को नौकरी दिए जाने की माँग की है।

भारत से हारने के बाद मैं आत्महत्या करना चाहता था: पाकिस्तानी क्रिकेट कोच

पाकिस्तान टीम के कोच मिकी ऑर्थर ने कहा है कि वो 16 जून को भारत से मिली हार के बाद आत्महत्या करना चाहते थे। मिकी ने मीडिया से हुई बातचीत में बताया, “सब कुछ बहुत जल्दी-जल्दी हुआ, हम लगातार मैच हारे, ये विश्वकप है, मीडिया और लोगों का दबाव रहता है। पिछले रविवार हार के बाद तो इतना ज्यादा दबाव था कि मैंने आत्महत्या का मन बना लिया था, लेकिन फिर मैंने टीम से कहा कि सिर्फ एक अच्छा प्रदर्शन सब बदल देगा।”

ऑर्थर ने बताया कि 16 जून को मिली हार के बाद पाकिस्तानी क्रिकेटर्स को सोशल मीडिया के साथ-साथ सार्वजनिक रूप से इतना आहत किया गया कि वे सोए भी नहीं।

साउथ अफ्रीका को हराने के बाद हुई इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में मिकी से एक पत्रकार ने पूछा कि क्या आखिरी ओवर तक हारिस सोहेल थक गए थे, क्योंकि वे शतक नहीं लगा पाए? पत्रकार के इस सवाल पर मिकी काफ़ी भड़क गए और कहा, “हारिस ने 59 ने गेंद में 89 रन बनाए, ऐसी पारी बहुत लंबे समय बाद देखने को मिली, आप लोग अच्छी बातें क्यों नहीं लिखते हैं?”

गौरतलब है 23 जून को साउथ अफ्रीका को विश्व कप 2019 के 30वें मैच में 49 रनों से हराने के बाद पाकिस्तान टीम अंक तालिका में सातवें स्थान पर पहुँच गई है। इस हार के बाद जहाँ साउथ अफ्रीका की टीम सेमीफाइनल की रेस से पूरी तरह बाहर हो गई। अब सेमीफाइनल में जगह बनाने के लिए पाकिस्तान टीम को बाकी बचे तीनों मैचों में जीत हासिल करनी जरूरी है।

दूसरे समुदाय वालों ने किया अंत्येष्टि कर लौट रहे हिन्दुओं पर पथराव, कई घायल

झारखण्ड में मजहब विशेष के एक गुट ने अंतिम संस्कार करने के बाद लौट रहे हिन्दुओं पर पथराव कर दिया। हमले में कई लोगों को चोटें आई हैं। शवयात्रा के दौरान शोक का बाजा बजाए जाने को लेकर हुई इस झड़प के बाद पुलिस को कैम्पिंग करनी पड़ी है। मामला तोपचांची, जिला धनबाद के मदैयडीह का है।

सोमवार सुबह भीम नारायण महतो की माता नेमिया महताइन (80) का निधन हो गया था। उनके परिजनों और हिन्दू समुदाय के लोगों ने अंत्येष्टि कर के लौटते समय अपनी परम्परा के अनुरूप शोक का बाजा बजाया। जब वे लोग मस्जिद के समीप पहुँचे तो कुछ लोगों ने विरोध करते हुए बाजा बंद करने को कहा। विरोध पहले बहस में बदला, और बात बढ़ते-बढ़ते पत्थरबाजी होने लगी। मीडिया रिपोर्टों में लाठी-डंडे से भी हिंसा की बात निकल कर सामने आ रही है

मामले की सूचना पाकर मौके पर पहुँची मदैयडीह और राजगंज थानों की पुलिस ने किसी तरह हिंसा रोकी। इस बाबत जहाँ हिन्दुओं का कहना है कि उनके बाजा बजाने पर ही रोक लगाने की कोशिश की गई और हमला किया गया, वहीं दूसरे समुदाय का दावा है कि जिस समय बाजा बज रहा था, उस समय मस्जिद में नमाज अदा की जा रही थी। इस बीच यह भी पता चला है कि मृतका का घर ही मस्जिद के सामने था, अतः ज़ाहिर तौर पर बाजा बजाने वाले उनके घर पर ही बजा रहे थे।

हमले में हिन्दू पक्ष की ओर से संजय साव, नंदलाला साव, धनेश्वर साव, महेश्वर साव, सुदामा साव, पूजा देवी, शनीचर साव, मुनिया देवी के घायल होने की सूचना है। घायलों का इलाज तोपचांची प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में किया जा रहा है। वहीं समुदाय विशेष में कुछ व्यक्तियों के घायल होने की सूचना है। हालाँकि पुलिस कैम्पिंग से क्षेत्र में हिंसा तो नहीं हुई है, लेकिन साम्प्रदायिक तनाव कायम है।

गुजरात से RS प्रत्याशी होंगे एस जयशंकर, कॉन्ग्रेस विरोध में पहुँची SC

केंद्रीय विदेश मंत्री एस जयशंकर औपचारिक रूप से भाजपा में शामिल हो गए। उन्होंने पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा की मौजूदगी में भाजपा की सदस्यता ग्रहण की। अनुभवी राजनयिक को नई सरकार में सुषमा स्वराज की जगह सरप्राइज पैकेज के रूप में लाया गया था और देश का विदेश मंत्री बनाया गया था। पिछली मोदी सरकार में सुषमा स्वराज के मंत्री रहते उन्हें विदेश मंत्रालय को ह्यूमन टच देने के लिए जाना जाता है और सक्रिय राजनीती से संन्यास लेने के बाद लगातार यह अटकलें लगाई जा रही थीं कि नई सरकार में उनकी जगह कौन लेगा।

नियमनुसार, अगर किसी ऐसे व्यक्ति को मंत्रिपद की शपथ दिलाई जाती है जो किसी भी सदन का सदस्य नहीं है, तो उसे 6 महीने के भीतर लोकसभा या राज्यसभा का सदस्य बनना होता है। इसी को ध्यान में रखते हुए भारतीय जनता पार्टी ने जयशंकर को गुजरात से राज्यसभा प्रत्याशी बनाया है। गुजरात में समीकरणों को देखते हुए उनका राज्यसभा पहुँचना तय है। चूँकि गुजरात से राज्यसभा सांसद रहे अमित शाह गाँधीनगर से जीत कर लोकसभा सांसद बन चुके हैं और उसी तरह स्मृति ईरानी अमेठी से कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी को हरा कर लोकसभा पहुँच चुकी हैं, गुजरात में इन दोनों की जगह भरी जानी है।

एक राज्यसभा सीट के लिए एस जयशंकर को उम्मीदवार बनाया गया है, वहीं दूसरे के लिए जुगलजी माथुरजी ठाकोर को भाजपा उम्मीदवार होंगे। जेएम ठाकोर उत्तर गुजरात के नेता हैं और उन्हें सामाजिक उत्थान हेतु सक्रियता से किए गए कार्यों को लेकर जाना जाता है। कॉन्ग्रेस पार्टी ने भी अपने 2 उम्मीदवार उतारने की घोषणा की है। कॉन्ग्रेस इस राज्यसभा चुनाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट गई है। पार्टी का कहना है कि दोनों सीटों पर एक ही दिन में अलग-अलग चुनाव कराना ग़लत है।

कॉन्ग्रेस पार्टी की माँग है कि दोनों ही सीटों पर एक साथ चुनाव कराए जाएँ। ऐसा इसीलिए, क्योंकि अगर दोनों सीटों पर एक साथ चुनाव होते हैं तो कॉन्ग्रेस को एक सीट जीतने का मौक़ा मिल सकता है। राज्य में भाजपा के 100 एवं कॉन्ग्रेस के 75 विधायक हैं, वहीं 7 सीटें खाली हैं। अगर अलग-अलग चुनाव होते हैं तो भाजपा के लिए आसानी होगी क्योंकि विधानसभा में वह बहुमत में है। पार्टी के विधायकों को 2 बार वोट करने का मौक़ा मिलेगा और भाजपा के दोनों ही उम्मीदवार जीत जाएँगे। वहीं एक साथ चुनाव होने पर एक विधायक एक ही बार मतदान कर पाएगा।

राजनयिक के तौर पर लम्बा अनुभव रखने वाले एस जयशंकर अमेरिका, चीन और चेक रिपब्लिक में भारत के राजदूत रह चुके हैं। मनमोहन सिंह और जॉर्ज बुश के कार्यकाल में हुए भारत-अमेरिका परमाणु करार के दौरान जयशंकर ने अहम भूमिका निभाई थी। वह भारत के पहले ऐसे विदेश सचिव हैं, जो विदेश मंत्री बने। रिटायर होने के बाद उन्होंने टाटा संस के ग्लोबल कॉपोरेट अफेयर्स के प्रेजिडेंट के रूप में सेवाएँ दी थी। पड़ोसी देशों के साथ पल-पल बदलते रिश्ते और अमेरिका-चीन में चल रहे ट्रेड वॉर के बीच विदेश मंत्री जयशंकर के पास एक अहम ज़िम्मेदारी है क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी की हाल ही में पुतिन और जिनपिंग जैसे बड़े वैश्विक नेताओं से मुलाक़ात तय है।

आज़म खान हुए कन्फ्यूज़: संविधान को बताया मंदिर, फिर कहा क़ुरान के अलावा कुछ भी मंजूर नहीं

समाजवादी पार्टी के लोक सभा सांसद आजम खान ने संसद में विवादास्पद बयान दिया है। तीन तलाक के मुद्दे पर बहस करते हुए उन्होंने कहा कि मुस्लिमों को कुरान के अतिरिक्त और कोई कानून मंज़ूर नहीं। उनके मुताबिक तीन तलाक का मुद्दा मुस्लिम समुदाय की निजी राय है। उनके ऐसा कहने पर लोक सभा में हंगामा भी बहुत हुआ

राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा के दौरान आजम खान ने भाजपा सांसद और केंद्रीय मंत्री प्रताप सारंगी के उस कथन पर भी आपत्ति जताई जिसमें उन्होंने कहा था कि जिन्हें वन्दे मातरम स्वीकार नहीं है, उन्हें इस देश में रहने का अधिकार नहीं है। आजम खान ने कहा, “संविधान एक मंदिर है। आप किसी चीज़ को थोप नहीं सकते। देश संविधान से चलना चाहिए, हम यह चाहते हैं। अगर ऐसा नहीं हुआ तो यह देश के हित में नहीं होगा।”

तीन तलाक मुद्दे पर अध्यादेश के स्थान पर लाए गए बिल पर आजम खान ने निशाना साधा और कहा कि जिन्हें महिलाओं का बड़ा हमदर्द बनने का शौक है, उन्हें महिलाओं की मुसीबतों पर भी बोलना चाहिए। “तीन तलाक का एक संदर्भ था। जो एक तलाक मान लेता है, उसे जाने दो; जो दो तलाक मान लेता है, उसे जाने दो; जो तीन तलाक मान लेता है, उसे जाने दो; जो उसे नहीं मानता है, उसे जाने दो। मैं कहता हूँ कि ये हमारा निजी मामला है और कुरान के हुक्म, कुरान के किए हुए फैसले के अलावा और कुछ स्वीकार नहीं होगा।”

आजम खान ने यह भी कहा कि उन्हें डर है लोग शादी से घबराने न लगें और किनारा न करने लगें, और लिव-इन रिलेशनशिप में बढ़ोतरी न हो जाए। “हमें अपने रिश्तों को वापस लाना चाहिए और बेहतर देश के बारे में सोचना चहिए।” उन्होंने यह भी कहा कि राजनीति उन समुदायों को बाँट देती है जिनमें भाईचारे के रिश्ते हों।

समाजवादी पार्टी के नेता ने यह भी कहा कि बड़े जनादेश ने भाजपा पर जिम्मेदारी भी डाली है, और देश का विकास मुलिम समुदाय के विकास के बिना पूरा नहीं होगा। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके संसदीय क्षेत्र रामपुर में हजारों मुस्लिमों को वोट नहीं डालने दिया गया था। “सतहत्तर हजार लाल कार्ड दिए गए थे।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि परिवारों को घर से बाहर न निकलने की हिदायत दी गई थी।

इंदिरा, आपातकाल और RSS: जब सुप्रीम कोर्ट के जज ने याद किया संघ का योगदान

हम भारतीय देश की जिन प्रमुख विशेषताओं पर गर्व करते हैं उनमें से एक है इस देश का लोकतंत्र। भारत का लोकतंत्र विश्व में सबसे बड़ा लोकतंत्र है। केवल इतना ही नहीं सत्ता का विकेंद्रीकरण, संघवाद, हमारी संसद, न्यायपालिका इत्यादि सभी गर्व करने लायक हैं। मगर इन गौरवशाली संस्थाओं और लोकतंत्र पर इतिहास में एक कलंक भी लगा है। दुनिया के सबसे विशाल लोकतंत्र पर लगा यह कलंक जब भी स्मरण किया जाएगा, उसे एक काले कालखंड के रूप में याद किया जाएगा, जब इस देश की व्यवस्था लोकतांत्रिक न होकर तानाशाही हो गयी थी। 

जब सभी संस्थाएँ निरस्त हो चुकी थीं, और आम जनता अपने मूल अधिकार खो चुकी थी। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मारी जा चुकी थी और प्रधानमंत्री एक तानाशाह बन चुकी थीं। भारतीय लोकतंत्र का यह काला अध्याय ‘आपातकाल’ के नाम से जाना जाता है, और इस आपातकाल को काले अध्याय से नीचे की संज्ञा देना उस समय के संघर्षरत हुतात्माओं, महात्माओं के विरुद्ध होगा। यूँ तो इससे पहले दो बार देश में आपातकाल लगाया जा चुका था। एक, भारत-चीन युद्ध के समय 1962-1968 तक तथा दूसरी बार, भारत-पाक युद्ध के समय 1971 के दौरान भी इमरजेंसी लगाई गई थी। 

इन दोनों ही परिस्थितियों में बाहरी विपदाओं के कारण आपातकाल लगाया गया था मगर इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 को लगाए गए आपातकाल पर आंतरिक सुरक्षा का हवाला दिया था, जो कि असल में मात्र इंदिरा गांधी के तानाशाही रवैये का विरोध था। कल ही संसद में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष अधीर रंजन चौधरी ने इंदिरा गांधी को निर्मल गंगा समान कहा, लेकिन आपातकाल का अध्याय यह बताता है कि प्रतिशोध की भावना से काम करने वाली इंदिरा गांधी ने अपनी सत्ता बचाने के लिए देश की जनता को दांव पर लगा दिया था। 

आपातकाल और प्रताड़ना: 

25 जून 1975 की रात, तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने राष्ट्रपति श्री फखरुद्दीन अली अहमद से अनुरोध कर आपातकाल की घोषणा की। संविधान के अनुच्छेद 352 के अनुसार देश में आपातकाल की घोषणा राष्ट्रपति कैबिनेट की सलाह पर करते हैं, हालाँकि आपातकाल की जानकारी ख़ुद कैबिनेट को अगले दिन सुबह 6 बजे मिली। एक बार आपातकाल की घोषणा होते ही सभी संघीय शक्तियाँ निरस्त हो जाती हैं और देश में केवल एक केंद्रीय सत्ता रहती है। ऐसे क्षण में जनता के मूल अधिकार भी उनसे छीन लिए जाते हैं। यहाँ तक कि अपने अधिकारों के हनन के लिए कोई व्यक्ति न्यायालय भी नहीं जा सकता था। आपातकाल लागू होते ही इंदिरा गाँधी ने अपना तानाशाही रवैया लागू करना शुरू कर दिया। आपातकाल लागू होते ही कई विपक्षी नेताओं को हिरासत में ले लिया गया। इनमें राजनारायण, विजयराजे सिंधिया, जयप्रकाश नारायण, चौधरी चरण सिंह, मोरारजी देसाई, जीवनराम कृपलानी, अटल बिहारी वाजपेयी व लाल कृष्ण आडवाणी इत्यादि शामिल थे। ख़ुद कांग्रेस सरकार में मंत्री मोहन धारिया और चंद्रशेखर ने इस्तीफ़ा दे दिया। तमिलनाडु में एम करुणानिधि की सरकार को बर्खास्त कर दिया गया व उनके बेटे स्टालिन को मीसा के तहत गिरफ्तार कर लिया गया। 

जेल में बंद नेताओं का थर्ड डिग्री का उत्पीड़न किया जाता था। कई नेताओं को पुलिस ने डंडे से पीटा, कई नेताओं के नाखून उखड़वा दिए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व जमात ए इस्लामी जैसे संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। ऐसे नेता व संगठन अपनी गिरफ़्तारी व संगठन को निरस्त किये जाने का न तो विरोध कर सकते थे, न ही उसे न्यायालय में चुनौती दे सकते थे। हालाँकि इस आपातकाल को उखाड़ फेंकने में सबसे अहम किरदार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का ही था, इसे इंडियन रिव्यू के संपादक, पूर्व जस्टिस के टी थॉमस, शाह कमीशन भी मान चुका है। 

तानाशाही का रवैया ऐसा था कि सरकार के विरोध में उठने वाले हर प्रयास को नाकाम कर, उन व्यक्तियों को जेल भेज दिया जाता था अथवा यदि वे किसी संगठन से जुड़े हैं तो उसे प्रतिबंधित किया जाता था। सरकार ने अनेक विरोध व हड़तालों को रोक दिया। कई सारे राजनेता, सरकार द्वारा गिरफ्तारी से बचने और अपना विरोध जारी रखने के लिए भूमिगत हो गए। सरकार के विरुद्ध लिखी जाने वाली हर ख़बर को सेंसर अर्थात निंदा मान छापने से रोक दिया जाता था, और छापने पर गिरफ़्तार किया जाता था। अखबारों ने विरोध के तौर पर अपने सम्पादकीय पृष्ठ को ख़ाली छोड़ना शुरू किया। 

इसी बीच आपातकाल का विरोध करने के लिए कई पत्रकारों को भी गिरफ्तार कर लिया गया। तानाशाह होने का सबसे बड़ा रूप इंदिरा गाँधी ने अपने एक फ़ैसले में दिखाया, जिसे वह संविधान में संशोधन के रूप में लेकर आईं। इस फ़ैसले के द्वारा राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति व प्रधानमंत्री के कार्यालय के फैसलों को न्यायलय में चुनौती दिया जाना असंभव कर दिया गया। संविधान में 42वें संशोधन द्वारा अनैतिक व काले कानून जोड़े गए। इसके माध्यम से आम चुनाव की अवधि 5 वर्ष से बढ़ाकर 6 वर्ष कर दी गयी थी, और ऐसे भी नियम बनाए गए थे कि आपातकाल में चुनाव की अवधि एक वर्ष अधिक बढ़ा दी जाए। 

इंदिरा गांधी का यह प्रयास ऐसा था मानो वह कभी चाहती ही नहीं थी कि चुनाव कराए जाएं। 1 मार्च 1976 को केरल में पुलिस ने राजन नाम के एक व्यक्ति को बिना कारण गिरफ्तार कर लिया था। पुलिस हिरासत में उसे पीटा गया व उसकी मौत हो गयी। ऐसे ही अनेक मामले कभी जनता के सामने नहीं आ सके। इंदिरा व उनके सिरफिरे बेटे संजय गाँधी के नेतृत्व में देशभर में जबरन नसबंदी के कार्यक्रम चलाए गए। संजय गाँधी अपने सपने, कम जनसंख्या वाले भारत को देखने के लिए जबरन नसबंदी कराने पर उतारू हो गए थे। इसके कारण देशभर के अनेक लोग उत्पीड़ित किये गए, जिनमें से कई ने अपनी जान तक गंवाई। 

कई लोगों की जबरन दो बार नसबंदी कराई गयी और कई आजीवन विकलांग बन गए। केवल इतना ही नहीं नसबंदी के लिए पुलिस ने कई जगह दंगों जैसे हालात बना दिए और कई जगह पर तो उन्हें आँसू गैस के गोले तक छोड़ने पड़े थे। उत्पीड़न की सीमा यहीं नहीं समाप्त हो जाती, प्रसिद्ध गायक किशोर कुमार को जब सरकार के लिए एक कार्यक्रम में गाने को कहा गया तो उन्होंने मना कर दिया, जिसके बाद से गैर आधिकारिक रूप से रेडियो पर उनके गाने चलाने बन्द कर दिए गए। 

दूरदर्शन और रेडियो का प्रयोग सरकार के एजेंडे को चलाने के लिए किया गया। कई फिल्मों पर प्रतिबंध लगा दिया व उन्हें रिलीज़ होने से रोक दिया। पुरानी दिल्ली में तुर्कमान गेट और जमा मस्ज़िद के पास के झोपड़ियों को ध्वस्त कर दिया गया।

विरोध, संघर्ष व विजय: 

आपातकाल का सबसे पहला विरोध समाचार पत्रों व पत्रिकाओं ने किया। उनमें लेख लिखकर, संपादकीय खाली छोड़ कर, सेंसरशिप के सामने झुकने के बजाए बन्द हो जाने के रास्ते को चुनकर पत्रिकाओं ने आपातकाल का सबसे पहला विरोध किया। अवार्ड वापसी का दौर उस समय भी चला था हालाँकि उस समय इंदिरा गांधी के डर के कारण अवार्ड वापस करने के लिए बहुत अधिक नाम सामने नहीं आ सके थे ऐसे में हिंदी के साहित्यकार फणीश्वरनाथ रेणु ने अपना पद्मश्री सम्मान व कर्नाटक से कन्नड़ साहित्यकार शिवर्म करनाथ ने अपना पद्म भूषण लौटा दिया था। 

विरोध का सिलसिला यहीं नहीं थमा, देश के 9 उच्च न्यायालयों ने सर्वोच्च न्यायालय में गुहार लगाई कि आपातकाल होने के बावजूद देश की जनता को अपनी गिरफ्तारी के ख़िलाफ़ न्यायालय जा कर उसे चुनौती देने का अधिकार मिलना ही चाहिए, जिसे इंदिरा गाँधी द्वारा नियुक्त किये गए न्यायाधीश ए एन राय ने खारिज कर दिया। आपातकाल का अगर किसी संगठन ने मुखर रूप से विरोध किया और उसे समाप्त किया तो वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संगठन था। प्रतिबंधित होने के बावजूद संघ के भूमिगत कार्यकर्ताओं (जिनमें आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी भी थे) ने योजना बनाकर, जेल में बंद नेताओं से मुलाक़ात करते हुए आपातकाल का विरोध जारी रखा। एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुताबिक आपातकाल में हिरासत में लिए गए कार्यकर्ताओं व नेताओं की संख्या 1 लाख 40 हज़ार से भी अधिक थी और उनमें 1 लाख से भी अधिक कार्यकर्ता व नेता आरएसएस से जुड़े थे। 

उन दिनों ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने संघ को ‘विश्व का एकमात्र ग़ैर वामपंथी क्रांतिकारी संघठन’ घोषित किया था। कुछ दिनों पहले ही सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस के टी थॉमस आरएसएस को आपातकाल से मुक्त कराने वाला बता चुके हैं। संघ के तृतीय वर्ष शिविर में उन्होंने कहा- “अगर किसी संगठन को आपातकाल से देश को मुक्त कराने के लिए क्रेडिट दिया जाना चाहिए, तो मैं आरएसएस को दूंगा।” आपातकाल के दौरान संघ ने देशभर में सत्याग्रह का आयोजन किया जिसमें तकरीबन 1 लाख 30 हज़ार लोग जुड़े और उनमें से भी 1 लाख से अधिक लोग संघ के ही कार्यकर्ता थे। इतना ही नहीं, जो साहित्य आपातकाल के दौरान प्रतिबंधित किए जाते थे, संघ के भूमिगत कार्यकर्ताओं ने पूँजी लगाकर उन्हें प्रकाशित कराया और उनका वितरण भी किया। 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 कार्यकर्ता अधिकांश बंदी गृह और कुछ बाहर आपातकाल के दौरान बलिदान हो गए। उनमे संघ के अखिल भारतीय व्यवस्था प्रमुख श्री पांडुरंग क्षीरसागर भी थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व उसके आनुषंगिक संगठनों ने इस आपातकाल के दौरान अहिंसा व सत्याग्रह जैसे रास्तों का सहारा लेकर इंदिरा गांधी को महात्मा गांधी जी का वह मार्ग दिखाया, जिससे वह भटक चुकी थीं। इस आंदोलन में हिस्सा लेते हुए सिख बंधुओं ने भी आपातकाल का विरोध किया था। अकाली दल के माध्यम से ‘लोकतंत्र बचाओ अभियान’ चलाया गया। शिरोमणि अकाली दल, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी के सदस्यों को भी हिरासत में लिया गया था।  

करीबन 19 महीने आपातकाल चलने के बाद इंदिरा गाँधी को यह एहसास हुआ कि अब शायद देश में उनका विरोध समाप्त हो गया है और फिर उन्होंने चुनाव कराने का फैसला किया। जनवरी 1977 में चुनावों की घोषणा हुई, हालाँकि आपातकाल मार्च 1977 में चुनावों के साथ समाप्त हुआ। इस तरह 21 महीने इंदिरा गांधी के तानाशाही शासन में भारतीय लोकतंत्र को बंदी बनकर रहना पड़ा। चुनाव के दौरान अधिकांश विपक्षी दल एकजुट होकर जनता पार्टी के रूप में आए, उन्होंने लोकतंत्र को जीवित रखने की ख़ातिर इंदिरा गांधी को हटाने का आह्वान किया। जनता मन बना चुकी थी, और 1977 में तानाशाही की हार हुई। जनता पार्टी 298 सीटें लेकर बहुमत में आई और पहली ग़ैर कांग्रेसी सरकार बनी जिसमें मोरारजी देसाई देश के पहले ग़ैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने। कांग्रेस 92 सीटों पर सिमट कर रह गयी, जिनमें से अधिकांश सीटें उसे दक्षिण भारत में मिली। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया। इंदिरा व उनके बेटे संजय गाँधी स्वयं चुनाव हार गए। आने वाले समय में जनता पार्टी ने इंदिरा गाँधी को जेल भी भेजा, संविधान में हुए बदलावों को ठीक किया और दो सालों तक देश को इंदिरा गाँधी से मुक्त रखा। 

हालांकि 5 साल का कार्यकाल पूरा किये बिना ही जनता पार्टी की सरकार गिर गयी, लेकिन आपातकाल के दौरान के संघर्ष ने इंदिरा गाँधी को वह सबक सिखा दिया, जिसकी उन्हें आवश्यकता थी। इंदिरा गाँधी और आने वाली कोई भी पीढ़ी अब आपातकाल लगाने का स्वप्न भी नहीं देख सकती थी।

NIA और UAPA एक्ट में संशोधन: अब ‘लोन वुल्फ’ आतंकी भी नहीं बचेंगे

केंद्रीय कैबिनेट ने नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) को लेकर बड़ा निर्णय लिया है। ताज़ा निर्णय के बाद एनआईए के हाथ और मज़बूत हो जाएँगे। आतंकवाद की रोकथाम के लिए केंद्रीय कैबिनेट ने 2 क़ानूनों में संशोधन को मंज़ूरी प्रदान कर दी है। कैबिनेट ने ग़ैरक़ानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) में संशोधन को मंजूरी दी है, जिससे आतंकवादी गतिविधि से जुड़े व्यक्तियों को भी आतंकी घोषित किया जा सकेगा। इसके अलावा एनआईए क़ानून में भी संशोधन को मंजूरी दे दी गई है। इससे एजेंसी और सशक्त बनेगी। इस संशोधन के बाद से जाँच एजेंसी भारत से बाहर भी अगर भारतीय हितों या नागरिकों को नुक़सान पहुँचता है तो मामला दर्ज कर कार्रवाई कर सकती है।

कोई भी व्यक्ति जो आतंकी गतिविधियों में संलिप्त होगा, उसे आतंकी घोषित कर प्रतिबंधित किया जा सकेगा। दोनों ताज़ा संशोधनों से जुड़े विधेयक को इसी सत्र में पेश किए जाने की उम्मीद है। मौजूदा समय में सिर्फ़ आतंकी गतिविधियों में संलिप्त संगठनों को ही प्रतिबंधित किया जा सकता है। एनआईए को साइबर अपराध और मानव तस्करी से जुड़े मुद्दे भी देने की बात कही जा रही है। 2008 में हुए मुंबई हमलों के बाद गठित एनआईए को अभी तक सिर्फ़ आतंक सम्बंधित गतिविधियों की जाँच का ही अधिकार प्राप्त हैं। व्यक्तिगत रूप से आतंकी गतिविधियाँ संचालित करने वालों को आतंकी घोषित कर प्रतिबंधित करने का भी अब तक प्रावधान नहीं था।

ऐसे लोग किसी आतंकी संगठन में तो शामिल नहीं होते थे लेकिन वो सभी काम करते थे जो एक आतंकी संगठन के माध्यम से किया जा सकता है। ऐसे व्यक्तियों को ‘लोन वुल्फ’ की संज्ञा दी जाती थी। अब उन पर नकेल कसी जा सकेगी। अब अगर किसी व्यक्ति को आतंकी घोषित किया जाता है तो उसके साथ वित्तीय लेनदेन करने वालों पर शिकंजा कसना आसान हो जाएगा। इससे आईएसआईएस और अलकायदा जैसे आतंकी संगठनों से प्रेरित हो कर आतंक का दामन थामने वालों पर कार्रवाई की राह और ज्यादा आसान हो जाएगी। बता दें कि मानव तस्करी और साइबर आतंक ऐसे मामले होते हैं, जिसके अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लिंक जुड़े होते हैं।

नए संशोधन के बाद एनआईए को किसी भी राज्य में सर्च के लिए वहाँ के शीर्ष पुलिस अधिकारी की अनुमति लेने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। हालाँकि, अभी भी एनआईए को ऐसी कार्रवाई के लिए अनुमति की ज़रूरत नहीं पड़ती लेकिन क़ानून व्यवस्था ख़राब होने की स्थिति में ऐसा करना होता है। बता दें कि संयुक्त राष्ट्र का क़ानून भी व्यक्तियों को आतंकी घोषित करने की अनुमति देता है और यह आशा करता है कि सभी देशों का क़ानून इसके अनुरूप हो। इससे आतंकी घोषित किए गए व्यक्ति की यात्रा और आवागमन पर ज़रूरी नियंत्रण रखा जा सकता है या उसे प्रतिबंधित किया जा सकता है।

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के गृह मंत्री बनने के बाद जम्मू कश्मीर और राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर अहम निर्णय लिए जाने की पहले से ही उम्मीद थी। हाल ही में जम्मू कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने भी कह दिया है कि अगर आतंकी गोली चलाते हैं तो सेना हाथ पर हाथ धरे बैठे नहीं रहेगी। अमित शाह ने राज्य की सुरक्षा व्यवस्था व अन्य मामलों के सम्बन्ध में राज्यपाल के साथ बैठक भी की थी। एनआईए अभी राज्य के अलगावादियों से जुड़े टेरर फंडिंग की जाँच कर रही है, जो अभी निर्णायक मोड़ पर है।