पश्चिम बंगाल में डॉक्टरों की जारी हड़ताल और उनकी सुरक्षा आश्वासन देने की माँग न मानने के ममता बनर्जी के हठ ने एक मासूम को लील लिया। बंगाल में 3 दिन के एक बच्चे की जान इलाज के अभाव में चली गई है। उसके पिता के अनुसार वह उसे जहाँ-जहाँ लेकर गए, डॉक्टरों ने इलाज करने से मना कर दिया। खबर सोशल मीडिया पर सबसे पहले आनंद बाजार पत्रिका की फोटो जर्नलिस्ट ने ब्रेक की है।
मासूम का शव हाथ में ले फफकता पिता
आनंद बाजार पत्रिका की छायाकार दमयंती दत्ता ने सफ़ेद कफ़न में लिपटे मासूम के शव को लिए हुए फफकते पिता की फ़ोटो शेयर करते हुए लिखा, “#Savethedoctors और #SaveBengal के बीच यह एक पिता है जिसने अपने नवजात को इसलिए खो दिया क्योंकि डॉक्टरों ने शिशु का इलाज नहीं किया। आज का @MyAnandBazar चित्र।” (अनूदित)
फर्स्टपोस्ट की खबर के अनुसार शिशु के पिता अभिजित मलिक का बयान है, “उसे (उनके बेटे को) डॉक्टरी सहायता की ज़रूरत थी। मैं उसे कई अस्पतालों में लेकर गया। किसी ने सहायता नहीं की। उसकी गलती क्या थी? इस हड़ताल ने मेरे बेटे की जान ले ली।”
फर्स्टपोस्ट की खबर
मालूम हो कि पश्चिम बंगाल में एनआरएस अस्पताल में एक समुदाय विशेष मरीज की हृदयघात से मृत्यु हो जाने के बाद उसके तीमारदारों द्वारा भीड़ जुटाकर जूनियर डॉक्टरों पर हमला बोल दिया गया था। पुलिस ने भी सक्षम तरीके से डॉक्टरों की सहायता नहीं की (जिसके पीछे कारण ममता बनर्जी की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति माना जा रहा है), और दो डॉक्टरों को इतनी गंभीर चोटें आईं कि उन्हें आईसीयू में भर्ती करना पड़ा। इसके बाद इसके विरोध में पहले तो एनआरएस के और फिर पूरे प्रदेश में जूनियर डॉक्टर बड़ी तादाद में हड़ताल पर चले गए हैं। डॉक्टरों की माँग है कि ममता बनर्जी हमले के आरोपितों को तुरंत गिरफ़्तार करवाएँ और डॉक्टरों की अस्पताल में सुरक्षा सुनिश्चित करें।
वहीं मुख्यमंत्री ने उनकी माँगें माँगने की बजाय पहले तो उन्हें हड़ताल से दिक्कतें और इलाज के आभाव में मौत का खतरा झेल रहे मरीजों का हवाला दे कर मनाने की कोशिश की। लेकिन जब वह नहीं माने तो बनर्जी ने उन्हें हड़ताल खत्म करने का अल्टीमेटम और न करने पर गंभीर परिणाम की चेतावनी दी। इसके अलावा पूरे मामले में उन्होंने भाजपा और माकपा पर भी प्रदेश में साजिश करने का आरोप लगाया है।
उच्च न्यायालय की अपील
कलकत्ता उच्च न्यायालय ने मामले में एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए तरफ़ डॉक्टरों को मरीज की भलाई को सर्वोपरि रखने की अपनी व्यवसायिक शपथ (हिप्पोक्रेटिक ओथ) याद दिलाई, और दूसरी ओर सरकार से आग्रह किया कि डॉक्टरों की सुरक्षा सुनिश्चित करे और मामले का शांतिपूर्ण हल निकाले। उच्च न्यायालय ने जनहित याचिका की सुनवाई के लिए एक हफ़्ते बाद 21 जून की तारीख़ मुकर्रर की है।
NDTV पिछले कई सालों से वित्तीय अनियमितताओं और टैक्स फ्रॉड के कारण जाँच एजेंसियों के रडार पर थी। NDTV प्रमोटर्स प्रणय रॉय और उनकी वाइफ राधिका रॉय को एक बड़ा झटका देते हुए सेबी ने सिक्योरिटी एक्सचेंज मार्केट में लेन-देन और NDTV मैनेजमेंट में किसी भी पोस्ट से 2 साल के लिए बाहर कर दिया है। 2009-10 से ही विभिन्न जाँच एजेंसियाँ प्रणय और राधिका के कई टैक्स फ्रॉड और वित्तीय अनियमितताओं की जाँच कर रही थी। इससे पहले प्रणय और राधिका रॉय को सेबी ने 10 सितम्बर 2018 को कारण बताओ नोटिस भेजा था।
.@SEBI_India: BARS NDTV PROMOTERS FROM ACCESSING SECURITIES MARKETS FOR 2 YEARS
BSE द्वारा दी गयी सूचना के अनुसार, प्रणय रॉय और राधिका रॉय को, जो NDTV के प्रमोटर हैं, 10 सितम्बर 2018 को कारण बताओ नोटिस मिला था। यह नोटिस 31 अगस्त 2018 को SEBI द्वारा SEBI एक्ट के सेक्शन 11(1), 11(4) और 113 के तहत भेजा गया था जिसमें इसी एक्ट के सेक्शन 12A (d)और (e) के उल्लंघन के मामले का ज़िक्र है। इस नोटिस में SEBI (Prohibition of lnsider Trading) Regulations, 1992 के रेगुलेशन 3(i) और 4 का उल्लंघन भी शामिल है।
SEBI एक्ट का सेक्शन 12A इनसाइडर ट्रेडिंग से ताल्लुक रखता है जिसका मतलब है कि वैसे व्यक्ति कंपनी के शेयर/सिक्योरिटी आदि खरीद-बेच नहीं सकते जिनके पास कंपनी की भीतरी जानकारियाँ उपलब्ध होती हों। इससे पहले भी NDTV का पाला इनकम टैक्स डिपार्टमेंट से पड़ चुका है।
इससे पहले, इनकम टैक्स डिपार्टमेंट द्वारा भेजा गया कारण बताओ नोटिस 2009-10 में IT डिपार्टमेंट द्वारा 436.80 करोड़ रुपए की पैनल्टी के सन्दर्भ में था। NDTV ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया लेकिन उन्होंने इस मामले में दखल देने से मना कर दिया था और कहा था कि चैनल इनकम टैक्स कमिशनर (अपील) के पास जाए। कमिशनर ने उनकी अपील ठुकरा दी और पूरा फाइन भरने के लिए 15 जून, 2018 तक की मोहलत दी थी।
पूर्व भारतीय क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर ने एक ऑस्ट्रेलियाई बैट निर्माता कंपनी स्पार्टन पर मुक़दमा दायर किया है, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि कंपनी ने अपने उत्पादों को प्रमोट करने के लिए उनके नाम और फोटो का इस्तेमाल किया और उन्हें रॉयल्टी के रूप में 20 लाख डॉलर (क़रीब 14 करोड़ रुपए) का भुगतान भी नहीं किया।
दस्तावेज़ों के अनुसार, सचिन ने यह मुक़दमा 5 जून को फेडरल कोर्ट में दायर किया। सिडनी स्थित स्पार्टन स्पोर्ट्स इंटरनेशनल कंपनी ने 2016 में सचिन के नाम और फ़ोटो का इस्तेमाल अपने उत्पादों को प्रमोट करने के लिए उन्हें कम से कम 1 मिलियन डॉलर (क़रीब 7 करोड़ रुपए) का भुगतान करने की बात कही थी। सचिन तेंदुलकर ने कंपनी के उत्पादों को प्रमोट करने के लिए लंदन और मुंबई में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में हिस्सा भी लिया था।
ख़बर के अनुसार, दस्तावेज़ों से पता चला है कि सितंबर 2018 तक सचिन को कंपनी द्वारा किसी भी तरह का कोई भुगतान नहीं किया गया। तेंदुलकर ने बताया कि कंपनी द्वारा उन्हें भुगतान न किए जाने पर उन्होंने भुगतान के लिए औपचारिक अनुरोध भी किया। लेकिन, जब कोई जवाब नहीं आया, तो उन्होंने समझौते को समाप्त कर दिया और कंपनी से अपने नाम व फ़ोटो के इस्तेमाल करने के लिए मना कर दिया। बावजूद इसके कंपनी ने उनके नाम व फ़ोटो का इस्तेमाल करना जारी रखा। न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स ने इस मामले में कंपनी के चीफ़ ऑपरेटिंग ऑफ़िसर से सवाल किए, जिसका अब तक कोई जवाब नहीं दिया गया।
पूर्व क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर टेस्ट और वन-डे में सबसे अधिक रन बनाकर इतिहास रचने वाले खिलाड़ी हैं। उन्होंने इंटरनेशनल क्रिकेट में 34 हज़ार से अधिक रन बनाए हैं। इतना ही नहीं उन्होंने शतकों के शतक का शानदार इतिहास भी रचा है। सचिन के 24 साल के क्रिकेट करियर पर वर्ष 2013 में विराम लगा था। 2012 में उन्हें ऑस्ट्रेलिया ने अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान में से एक ‘ऑर्डर ऑफ़ ऑस्ट्रेलिया’ का सम्माननीय सदस्य बनाया था।
ममता बनर्जी अपने ही राज्य के डाक्टरों को बाहरी बताते हुए उन पर हमलावर हैं। जबकि, डॉक्टरों की माँग इतनी थी कि हमलावरों-गुंडों पर गैरजमानती धाराओं में मुकदमा दर्ज किया जाए और उनकी सुरक्षा राज्य सुनिश्चित करे। अलबत्ता, मुद्दा सुलझाने को कौन कहे, ममता ने डॉक्टरों को हड़ताल ख़त्म करने की धमकी देकर, अपनी गैर-जिम्मेदारी का परिचय और गुंडों को समर्थन, दोनों, दे दिया। ममता की धमकी को डॉक्टरों ने न सिर्फ नज़रअंदाज किया बल्कि अपनी सुरक्षा और गुंडों पर कार्रवाई जैसी बुनियादी माँगों के लिए, अपना इस्तीफा तक देने को तैयार हो गए। इतने पर भी ममता का अहंकार शांत नहीं हुआ, उन्होंने उल्टा आरोप लगा दिया की बीजेपी है इन सबके पीछे।
ऐसा करके ममता बनर्जी डॉक्टरों के दोनों जायज़ और बुनियादी माँगों से कन्नी काट गईं। फिर क्या था पूरे देश के डॉक्टरों ने पश्चिम बंगाल के डॉक्टरों को समर्थन देने के लिए शुक्रवार (जून 14, 2019) को ‘ऑल इंडिया प्रोटेस्ट डे’ के रूप में सड़क पर आ गए। हालाँकि, यहाँ भी मीडिया का एक बड़ा धड़ा, इस मुद्दे पर ममता की सनक साफ देखते हुए भी कुछ भी बोलने से कतरा रहा है। क्योंकि, यहाँ भी पीड़ित डॉक्टर हिन्दू और डॉक्टरों को पीटने वाले दबंग गुंडे मजहब विशेष के, आम तौर पर पश्चिम बंगाल में तृणमूल के कोर वोटर हैं। अब ममता उन पर कोई एक्शन ले तो कैसे ले। उन पर एक्शन लेना मतलब अपनी राजनीतिक जमीन में खुद ही सेंध लगा देना, वो भी ऐसे समय में जब वह हाल के ही लोकसभा चुनावों में एक तरह से अपनी आधी सत्ता बीजेपी को सौंप चुकीं हैं।
तो, ममता ने इससे पहले होती बीजेपी कार्यकर्ताओं की निर्मम हत्याओं की तरह ही इसे भी राजनीतिक रंग देते हुए शोर मचाना शुरू कर दिया कि बीजेपी वर्कर और ‘बाहरी’ ही उनके खिलाफ लगातार प्रोटेस्ट कर रहे हैं।
जबकि, प्रदर्शनकारी डॉक्टरों ने ममता के इस आरोप को सिरे से ख़ारिज करते हुए ममता को यह याद दिलाने के लिए मुखर हो उठे कि वह सभी इसी राज्य के डॉक्टर्स हैं न कि बाहरी व्यक्ति। इस समस्या से खुद को निपटने में अक्षम पाकर उल्टा ममता बनर्जी डॉक्टरों पर ही आरोप मढ़ने लगीं हैं। उन्होंने कल यहाँ तक कह दिया, “जब मैं कल हॉस्पिटल के आपात चिकित्सा में गई तो वहाँ मुझे गालियाँ दी गई लेकिन मैंने उन्हें माफ़ कर दिया।”
ममता बनर्जी के इस स्टेटमेंट से भी साफ है कि वह इस मसले में यह नहीं कह रहीं कि दोषियों पर राज्य करवाई करेगी जबकि कल ही जब राज्यपाल ने सर्वदलीय बैठक बुलाई तो ममता ने राज्यपाल पर ही आरोप लगाते हुए यह कह दिया, “राज्यपाल बीजेपी के आदमी हैं उनका यहाँ के कानून से कोई लेना-देना नहीं। कानून राज्य का विषय है, इसलिए मैं नहीं जा रही, मेरी तरफ से कोई जाएगा, चाय पी के आ जाएगा।”
सही कहा ममता बनर्जी ने कि लॉ एंड ऑर्डर राज्य का विषय है लेकिन यह बताना भूल गईं कि जब राज्य कानून व्यवस्था सम्भालने में अक्षम हो जाए या जानबूझकर राज्य गुंडागर्दी, अराजकता, दंगा और हत्याओं को खुला समर्थन दे तो संविधान में इसका भी प्रावधान राज्यपाल के ही माध्यम से राष्ट्रपति शासन के रूप में किया गया है।
ममता बनर्जी शायद खुद को ही संविधान मानने लगी हैं या संविधान से भी ऊपर की सत्ता साम्राज्ञी, तभी तो अक्सर वह पश्चिम बंगाल में जघन्य से जघन्य अपराधों पर लगातार राजनीति की आड़ ले पर्दा डालती नज़र आती हैं। खुद प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण का बहिष्कार तक कर देतीं हैं, क्योंकि उसमें जिन बीजेपी कार्यकर्ताओं को तृणमूल के गुंडों ने मौत के घाट उतारा था, उनके परिवारों को बुलाया गया था। इसके बाद भी वह राज्य में लगातार हो रही बीजेपी कार्यकर्ताओं की हत्या पर मौन हैं क्योंकि उन्हें पता है कि हत्यारे उनकी ही पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस के गुंडे हैं। जिनका बचाव आजकल यह कहकर किया जा रहा है कि ‘ऐसा तो बंगाल में होता ही रहता है।’ उनके खिलाफ राज्य में कोई भी आवाज उठाता है तो उसे तत्काल बाहरी कहने से नहीं चूकने वाली ममता शायद भूल गई हैं कि बंगाल उनका ‘गणराज्य’ नहीं बल्कि देश का ही एक छोटी-सी इकाई ‘राज्य’ है और देश में किसी भी नागरिक को कहीं भी आने-जाने और व्यवसाय की निर्बाध स्वतंत्रता है।
मीडिया का एक धड़ा जो खुद को लगातार निष्पक्ष बताता आया है, वह इस पर मौन है और तमाम वामपंथी बुद्धिजीवियों ने इस पर चुप्पी साध ली है, जैसे बंगाल में या तो ‘कुछ हुआ ही नहीं’ या ‘हुआ तो हुआ।’ अब यहाँ किसी अवार्ड वापसी गैंग को अराजकता और तानाशाही नज़र नहीं आ रही, लेकिन इन मौन आवाजों के बीच भी आवाज उन्हीं डॉक्टरों ने उठाई है, जिन पर पश्चिम बंगाल के स्वास्थ्य देखभाल की जिम्मेदारी है, जो आज अपने ही स्वास्थ्य और सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। उनका एक साथी डॉक्टर गंभीर रूप से घायल है और दूसरा ज़िन्दगी और मौत के बीच झूल रहा है। यहाँ 200 से अधिक लोगों की अराजक और आक्रोशित भीड़ में किसी को भी अपराधी या गुंडे नज़र नहीं आ रहे क्योंकि पीड़ित यहाँ न ‘नज़ीम’ है, न ‘अख़लाख़’ बल्कि यहाँ दंगाइयों और उपद्रवियों के नाम में मोहम्मद या ऐसा ही कुछ जुड़ा है।
डॉक्टरों की न्याय की माँग को नज़रअंदाज करते हुए जब राज्य की मुखिया ही अन्याय के आगे ढाल बनकर खड़ी हो तो ऐसी तानाशाही का मुखर विरोध ज़रूरी है। विरोध में, पश्चिम बंगाल में लगातार डॉक्टरों के इस्तीफे जारी हैं। देश के विभिन्न राज्यों के डॉक्टर्स खुलकर इस अन्याय के खिलाफ खड़े हो गए हैं। सबकी एक ही माँग है दोषियों पर कार्रवाई और डॉक्टरों की सुरक्षा का इंतज़ाम ताकि वे निश्चिन्त हो अपना काम कर सकें। कायदे से वहाँ सुरक्षा तो उन सभी नागरिकों को मिलनी चाहिए जो उनके ही पार्टी के गुंडों के सताए हुए हैं और उनको भी न्याय की दरकार है जो एक सत्तालोलुप मुख्यमंत्री की राजनीतिक दुश्मनी में अपने जान गँवा चुके हैं।
मुखर आवाजों ने विरोध का बिगुल बजा दिया है। ममता के ‘बाहरी’ राग के गुब्बारे की हवा निकाल दी है। रिपब्लिक को दिए अपने बयानों में सबने पश्चिम बंगाल के मौजूदा हालात की पोल खोल दी है।
NRS हॉस्पिटल में न्याय की माँग के लिए आवाज बुलंद करते हुए एक डॉक्टर ने कहा, “मैं अपने मुख्यमंत्री के बयान पर शर्मिंदा हूँ, यदि वह चाहतीं तो समस्या को सुलझा सकती थीं। वह उन पर तुरंत कार्रवाई कर सकती थीं लेकिन वह इसे नज़रअंदाज कर रही हैं। वह न्याय को नकार रहीं हैं। इस प्रतिरोध में कोई भी बाहरी नहीं है, ममता बनर्जी इस पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक रंग देना चाहतीं हैं।”
#DoctorsFightBack | ‘We are not outsiders,’ say protesting doctors at NRS Hospital in Kolkata in unanimous response to West Bengal CM Mamata Banerjee. Tune in for #LIVE updates as doctors from across the country show solidarity with them https://t.co/LGCyJUEBn5pic.twitter.com/Ujz5bHqVeo
एक दूसरे डॉक्टर ने ममता बनर्जी के बाहरी के कहने का जवाब दिया कि “हम डॉक्टर्स हैं और आज यहाँ सफ़ेद एप्रन के लिए लड़ रहे हैं, हम बाहरी नहीं हैं, हमारा सी.पी.एम. या बीजेपी से कोई सम्बन्ध नहीं।”
#DoctorsFightBack | ‘We are doctors, we are not CPM, we are not BJP, we are not outsiders, we are doctors!,’ say protesting doctors at NRS Hospital in Kolkata refuting West Bengal CM Mamata Banerjee, even as doctors from across India stand with them https://t.co/LGCyJUEBn5pic.twitter.com/C0dRZfqxto
ममता के आरोपों और धमकियों का विरोध कर रहे, डॉक्टरों के एक दूसरे समूह ने भी ममता के बेतुके बयानों को आड़े हाथों लेते हुए, उन्हें सिर्फ इतना याद दिलाया कि न्याय का गला घोंटकर दोषियों के साथ मत खड़े होइए, जिन्होंने डॉक्टरों पर हमला किया, उन पर तत्काल कार्रवाई किया जाए।
रेजिडेंट डॉक्टरों के एक बड़े संगठन URDA के प्रेजिडेंट डॉ मनु गौतम ने कहा, “हम आज ममता बनर्जी के बयान से केवल नाराज ही नहीं हैं, हम उम्मीद भी खोते जा रहे हैं क्योंकि अब जो हो रहा है वह बहुत ज़्यादा है। हम इसलिए डॉक्टर्स नहीं बने हैं कि इस तरह से पब्लिक द्वारा पीटें जाएँ। लोगों को समझना होगा कि हम भगवान नहीं हैं।” साथ ही यह भी कहा कि पश्चिम बंगाल में इंटर्न और रेजिडेंट डॉक्टर्स 36-42 घंटे तक लगातार काम करते हैं वह भी बहुत ही अमानवीय स्थिति में….
फ़िलहाल, हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल में डॉक्टरों के हड़ताल का समाधान बातचीत से हल करने का निर्देश दे दिया है। लेकिन ममता बनर्जी अभी भी जिद पर अड़ी हैं। एक तरफ राजनीति है तो दूसरी तरफ राज्य का लॉ एंड ऑर्डर और अब इस मुहीम में डॉक्टरों का साथ देने के लिए न सिर्फ पश्चिम बंगाल में बल्कि अन्य राज्यों के भी साथी डॉक्टरों भी विरोध प्रदर्शन में शामिल हो गए हैं। कोलकाता में अब तक लगभग 69 डॉक्टरों ने अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया है, साथ ही एनआरएस मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में डॉक्टरों के खिलाफ हिंसा को लेकर बंगाल में दो प्रोफेसरों ने भी अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। प्रोफेसर सैबाल कुमार मुखर्जी ने एनआरएस मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल कोलकाता के प्रिंसिपल और मेडिकल सुपरिटेंडेंट के पद से इस्तीफा दिया तो वहीं, प्रोफेसर सौरभ चट्टोपाध्याय ने वाइस-प्रिंसिपल पद से इस्तीफा दे दिया और अब डॉक्टर्स के इस्तीफे की झड़ी सी लग गई है। सीनियर डॉक्टर भी ममता बनर्जी के विरोध में उतर आए हैं।
#DoctorsStrike: Intensifying the protest, at least 69 doctors at Kolkata’s RG Kar Medical College and Hospital submit mass resignation.
They are demanding an unconditional apology from @MamataOfficial.
जिस तरह से पिछले पाँच दिनों से यह सब घटित हो रहा है और ममता बनर्जी का अभी तक का जो रवैया रहा है, लगता ही नहीं कि उन्हें सिवाय अपनी राजनीति और वोट बैंक के, डॉक्टरों की सुरक्षा या आम मरीज़ के जीवन की तनिक भी चिंता है। फिर भी, अब देखना यह है कि क्या अब भी ममता चेततीं हैं, इस घटना से सबक लेतीं हैं या अभी भी इस मुद्दे को राजनीति के चश्में से ही देखतीं हैं। उम्मीद कम ही है क्योंकि, अभी भी एक आसान सी माँग पर कुछ भी ढंग का नहीं बोल पाई हैं। सवाल ज्यों का त्यों है, क्या उनकी सरकार डॉक्टरों के काम करने हेतु सुरक्षित माहौल दे सकेगी? क्या बंगाल में बीजेपी कार्यकर्ताओं की नृशंष हत्या का सिलसिला रुकेगा या राजनीतिक जंग के नाम पर बुरे से बुरे और बर्बर कृत्य को भी जायज ठहराने का सिलसिला यूँ ही जारी रहेगा? यह वक्त ही बताएगा।
पिछले दिनों दिल्ली सरकार ने मेट्रो, डीटीसी बसों और क्लस्टर बसों में महिलाओं के लिए मुफ़्त सफर की घोषणा की थी। सरकार अब मेट्रो की फीडर बसों में भी महिलाओं के लिए मुफ़्त सफर की तैयारी में है। वर्तमान में, दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (DMRC) के पास 174 फीडर बसे हैं और जल्द ही 905 फीडर बसों को जोड़े जाने की योजना है। भारतीय जनता पार्टी ने इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ आम आदमी पार्टी पर निशाना साधा है और कहा है कि इस योजना को आगामी विधानसभा चुनावों के लिए वोटर्स को लुभाने का प्रयास बताया है।
DMRC ने दिल्ली सरकार को सौंपे अपने प्रस्ताव में कहा कि महिलाओं के लिए मुफ्त यात्रा को लागू करने से लगभग 1560 करोड़ रुपए का वार्षिक ख़र्च होगा, इसमें से 11 करोड़ रुपए का ख़र्च फीडर बसों पर आएगा।
बुधवार (12 जून) को, मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि दिल्ली सरकार द्वारा DMRC को इस रकम का भुगतान किया जाएगा। DMRC ने अपनी 8 पेज की रिपोर्ट में, इस बात का भी ज़िक्र किया कि महिलाओं को मुफ़्त सफर कराने वाली इस योजना का भविष्य में दुरुपयोग भी हो सकता है। DMRC ने क़ानूनी सलाहकार से भी चर्चा की और यह जानने का प्रयास किया कि क्या इस तरह की वित्तीय सब्सिडी या अनुदान राज्य सरकार द्वारा दिल्ली मेट्रो रेलवे (संचालन और रखरखाव) अधिनियम, 2002 के तहत यात्रियों के एक विशेष वर्ग को दी जा सकती है?
लीगल टीम ने इलेक्ट्रिसिटी एक्ट 2003, राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण अधिनियम 1988 और एयरपोर्ट इकोनॉमिक रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया एक्ट, 2008 जैसे क़ानूनों का भी विश्लेषण किया ताकि यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि मेट्रो अधिनियम के तहत इस तरह का कोई प्रावधान मौजूद है कि नहीं? इस विश्लेषण से पता चला कि इस तरह का कोई प्रावधान नहीं है।
इससे पहले, DMRC ने सरकार के सामने मुफ़्त सफर की व्यवस्था को लागू करने के लिए दो प्रस्ताव रखे थे। इसमें से पहले प्रस्ताव में योजना को लंबे समय के लिए लागू करने के लिए तक़रीबन 12 महीने से अधिक समय लगने की बात कही गई थी, क्योंकि इस व्यवस्था को कार्यान्वित करने के लिए सॉफ्टवेयर बदलना पड़ेगा। वहीं, दूसरे प्रस्ताव में अस्थायी रूप से लागू करने के लिए गुलाबी टोकन व्यवस्था के ज़रिए 8 महीने का समय माँगा।
एंटी-करप्शन ब्यूरो (एसीबी) की टीम ने राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) में नाम जोड़ने के एवज में रिश्वत लेते हुए दो अधिकारियों को गिरफ्तार किया है। टीम ने गुरुवार (जून 13, 2019) को सैयद शाहजहाँ और राहुल परासर को 10 हजार रुपए बतौर रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा है। इन दोनों को गुवाहाटी स्थित दिसपुर एनआरसी केंद्र नंबर आठ के कार्यालय से गिरफ्तार किया गया है।
Assam: 2 NRC officials in Dispur were caught red-handed by Directorate of Vigilance&Anti-Corruption y’day while accepting bribe of Rs 10,000 from a man for entering his name in draft NRC. Arrested officials Syed Shahjahan&Rahul Parashar will be produced before Special Court today pic.twitter.com/utpRhHPZvP
सैयद शाहजहाँ फील्ड लेवल अधिकारी और राहुल पराशर असिस्टेंट लोकल रजिस्ट्रार ऑफ सिटिजन रजिस्ट्रेशन के पद पर तैनात हैं। दोनों के खिलाफ दिसपुर जिले की आनंद नगर निवासी कजरी घोष दत्ता ने एंटी-करप्शन ब्यूरो में शिकायत की थी। कजरी के अनुसार उनका नाम एनआरसी के ड्राफ्ट में शामिल नहीं हैं। उनका कहना है कि जब उन्होंने एनआरसी ड्राफ्ट में नाम शामिल करने के लिए आवेदन किया, तो अधिकारियों ने उनसे रिश्वत के तौर पर 10 हजार रुपए माँगे।
एसीबी निदेशक ने घटना की जानकारी देते हुए बताया कि आरोपितों के पास से रुपए और महत्वपूर्ण दस्तावेज जब्त कर लिए गए हैं। एनआरसी सेवा केंद्र पर भी जाँच की जा रही है। दरअसल, दोनों आरोपितों ने महिला के आवेदन में कुछ गलतियाँ निकाली थी और इन्हीं गलतियों को दूर करने के बदले में महिला से 10 हजार रुपए की माँग की गई थी। फिलहाल, दोनों आरोपितों को अदालत में पेश किया जाएगा।
जानकारी के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट के आदेशनुसार आगामी 31 जुलाई से पहले एनआरसी का फाइनल और सम्पूर्ण ड्राफ्ट प्रकाशित हो जाएगा। पिछले साल जुलाई में एनआरसी की सूची आने के बाद पूर्वोत्तर के दो राज्य पश्चिम बंगाल और असम में खासा राजनीतिक हंगामा हुआ था। जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 8 मई को सुनवाई करते हुए आदेश दिया था कि एनआरसी का अंतिम प्रकाशन 31 जुलाई तक हो जाना चाहिए। कोर्ट ने पहले चरण में ड्राफ्ट से शामिल न हो पाए असम के 40 लाख आवेदकों को भारतीय नागरिकता के प्रमाण के लिए 25 मार्च, 1971 या उससे पहले के किसी भी सरकारी दस्तावेज के साथ आवेदन करने का दोबारा मौका दिया है।
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने ऐलान किया है कि सोमवार (जून 17, 2019) को सुबह 6 बजे से लेकर 18 की सुबह 6 बजे तक 24 घंटे के लिए पूरे देश भर के डॉक्टर हड़ताल पर रहेंगे। इस दौरान केवल इमरजेंसी और कैजुएलटी की सेवाएँ जारी होंगी।
Indian Medical Association announces nationwide doctors’ strike on Monday to protest the attack on an intern at a Kolkata hospital, says “violence in hospitals will adversely affect patient care”.
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा कि वो अस्पतालों में डॉक्टरों की सुरक्षा चाहते हैं। कोलकाता के मेडिकल छात्र बेहद डरे हुए हैं, सड़कों पर हिंसा शुरू हो गई हैं। इसलिए वो चाहते हैं कि उनका समाज आगे आए और कोलकाता में हुई हिंसा के आरोपितों को सज़ा हो।
वो चाहते हैं कि अस्पतालों में हिंसा के खिलाफ केंद्रीय कानून लागू हो। इसलिए उन्होंने घोषणा की है कि 17 जून को पूरे देश में हड़ताल की जाएगी,और उस दौरान सिर्फ इमरजेंसी सेवाएँ जारी रहेंगी। खबरों के अनुसार डॉक्टरों की हड़ताल शनिवार को भी जारी रहेगी।
Indian Medical Association declares nationwide strike on Monday over Kolkata assault
आईएमए के सेक्रेटरी ने जानकारी दी कि 17 तारीख को उन्होंने डॉक्टरों की देशव्यापी हड़ताल बुलाई है। इस हड़ताल में प्राइवेट अस्पताल भी हिस्सा लेंगे। डॉक्टरों की माँग है कि उनकी सुरक्षा में कानून लागू हो। आईएमए सेक्रेट्री ने कहा कि उन्हें पता है कि मरीज़ इस ‘बंद’ से परेशान होंगे, लेकिन उनकी सुरक्षा भी ज़रूरी है। इस बंंद के बावजूद आपातकालीन सेवाएं जारी रहेंगी।
भाजपा कार्यकर्ताओं की लगातार होती हत्या और डॉक्टरों की हड़ताल से बंगाल का माहौल काफ़ी तनावपूर्ण पहले से है कि इसी बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने क्षेत्रवाद को लेकर बयान दे दिया। शुक्रवार यानी आज (जून 14, 2019) ममता बनर्जी ने नॉर्थ 24 परगना में जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि वो बंगाल को गुजरात नहीं बनने देंगी। अपने बयान में ममता ने साफ़ बोल दिया कि अगर आप बंगाल में आए हैं तो आपको बांग्ला ही बोलनी होगी।
West Bengal Chief Minister Mamata Banerjee: We have to bring Bangla forward. When I go to Bihar, UP, Pujnab, I speak in their language, if you are in Bengal you have to speak Bangla. I will not tolerate criminals who stay in Bengal and roam around on bikes. pic.twitter.com/rs6FSBzCst
हमेशा से क्षेत्रवाद की राजनीति करने वाली ममता बनर्जी ने कहा, “हमें बांग्ला को आगे ले जाना है, जब मैं बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब जाती हूँ तो मैं उनकी भाषा बोलती हूँ, इसलिए अगर आप बंगाल आते हैं तो आपको भी बांग्ला ही बोलनी होगी” अपने बयान में ममता ने आगे कहा कि वो बंगाल में उन अपराधियों को बिलकुल बर्दाश्त नहीं करेंगी जो यहाँ रहते हैं और मोटरसाइकल पर घूमते हैं।
DIDI We Indians Can’t tolerate you. Your time is over n don’t try to divide India on the basis of lang now . JAI SHRI RAM? @MamataOfficial
सोशल मीडिया पर ममता के इस बयान की खूब आलोचना हो रही है। डॉक्टरों को दिए अल्टीमेटम पर जहाँ उन्हें हिटलर बताया जा रहा था, वहीं अब लोग उन्हें ‘बंगाली राज ठाकरे’ बताने लगे हैं। ममता बनर्जी के बारे में लोग साफ़ बोल रहे हैं कि वो अब देश को जाति और भाषा में बाँटना चाहती हैं, वो ज्यादा समय मुख्यमंत्री नहीं रहेंगी।
बिहार में एनडीए के सहयोगी जनता दल यूनाईटेड के प्रवक्ता अजय आलोक ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। आलोक ने ट्विटर पर अपने इस्तीफे की तस्वीर ट्वीट करके इस बात की जानकारी दी। आलोक ने अपनी और पार्टी की विचारधारा मेल न खाने के कारण ये कदम उठाया है।
अजय ने अपने ट्वीट में मुख्यमंत्री एवं पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार को धन्यवाद दिया है। साथ ही उन्होंने लिखा है कि वो उनके लिए शर्म का कारण नहीं बनना चाहते हैं, इसलिए उन्होंने पद से इस्तीफ़ा दिया है। आलोक ने अपना इस्तीफा केंद्रीय गृहमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के काम पर सवाल उठाने के बाद दिया है।
I have resigned as a Spokesperson from JDU as I think I am not doing good job as my views which are mine ofcourse do not match with my party , Thanks to my Party and my President who has always supported me and I don’t want to be a source of embarrassment for @NitishKumar ,
दरअसल, 11 तारीख़ को आलोक ने ट्विटर पर एक पोस्ट किया था। इस पोस्ट में उन्होंने बांग्लादेशी शरणार्थियों के मुद्दे को लेकर गृह मंत्री अमित शाह पर तंज कसा था। साथ ही एक अन्य ट्वीट में उन्होंने बीएसएफ अधिकारियों पर भी निशाना साधा था। अपने ट्वीट में उन्होंने लिखा था, “सिर्फ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को कोसने से काम नहीं चलेगा अपने तंत्र को कसने की जरूरत है, खासकर तब जब अमित शाह हमारे गृह मंत्री हैं। अवैध घुसपैठ पे रोक अति आवश्यक है। अब नहीं होगा तो कब होगा।”
सिर्फ़ @MamataOfficial को कोसने से काम नहीं चलेगा अपने तन्त्र को कसने की ज़रूरत हैं ख़ासकर तब जब @AmitShah जी हमारे गृह मंत्री हैं । illegal immigration पे रोक अति आवश्यक हैं । अब नहीं होगा तो कब होगा ?
अजय आलोक ने बीएसएफ अधिकारियों को लेकर बुधवार को भी बड़ा बयान दिया था। मीडिया खबरों के मुताबिक उन्होंने कहा था कि सीमा पर बीएसएफ के अधिकारी 5000 रुपये लेकर बांग्लादेशी घुसपैठियों को अवैध तरीके से भारत में प्रवेश करवाते हैं। उन्होंने नरेंद्र मोदी को टैग करते हुए ट्विटर पर लिखा था कि बांग्लादेश बॉर्डर पर तैनात ऐसे बीएसएफ अधिकारी जो 7-8 वर्षों से वहीं पर जमे हुए हैं, उनकी संपत्ति की जाँच हो। उनका कहना है कि बांग्लादेशी शरणार्थी ऐसे ही भारत में नहीं आ गए हैं।
आयकर अधिकारियों की सेवा समाप्त कर भ्रष्टाचार के विरुद्ध संकल्पित होने का संदेश दिया हैं @narendramodi जी ने लेकिन अब ज़रूरत हैं BSF के अधिकारी जो बांग्लादेश और बर्मा में पिछले 10-15 वर्षों में तैनात थे उनकी सम्पत्ति की जाँच हो । ऐसे ही बांगलादेशी और रोहिंग्या नहीं आ गए यहाँ !!
राजस्थान में पिछले साल दिसंबर में कॉन्ग्रेस सत्ता पर काबिज हुई। राजस्थान में सत्ता परिवर्तन के साथ ही पाठ्यपुस्तकों में भी विचारधारा का टकराव देखने को मिल रहा है। अशोक गहलोत सरकार ने सत्ता में आने के 6 महीने के भीतर स्कूल की तमाम किताबों में बदलाव किया है। अशोक गहलोत ने राज्य बोर्ड के अतंर्गत आने वाले स्कूलों के छात्रों की किताबों में कई बदलाव किए हैं। इनमें ऐतिहासिक घटनाओं, शख्सियतों से लेकर एनडीए सरकार के कार्यकाल में लिए गए फैसलों में बदलाव किए गए।
What’s happening is Rajasthan? Is congress still haven’t learnt any lessons? Sawarkar will always be ‘Veer’ you morons @ashokgehlot51. @narendramodi we expect respect to our Freedom fighters sir. Such disrespect won’t be tolerated.#VeerSavarkarhttps://t.co/WtIDploUFw
राजस्थान सरकार ने कक्षा 12 की पाठ्यपुस्तक में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर सावरकर वाले चैप्टर में सावरकर के नाम के आगे से ‘वीर’ हटा दिया है। इससे साफ जाहिर हो रहा है कि कॉन्ग्रेस की नज़र में सावरकर, वीर नहीं हैं। दरअसल, ये बदलाव राज्य में 13 फरवरी को पाठ्यपुस्तक समीक्षा समिति द्वारा की गई सिफारिशों के बाद किया गया है। इस समिति का गठन इसलिए किया गया था, ताकि यह अध्ययन किया जा सके कि कहीं एनडीए सरकार द्वारा राजनीतिक हितों को साधने के लिए इतिहास के साथ छेड़-छाड़ तो नहीं किया गया था।
जानकारी के मुताबिक, 12वीं की इतिहास की पुरानी किताब में स्वतंत्रता संग्राम वाले चैप्टर में सावरकर के नाम के आगे ‘वीर’ लिखा था। इस अध्याय में स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में दिए उनके योगदान के बारे में काफी विस्तार से लिखा गया था। वहीं, नई किताब में सावरकर के नाम से ‘वीर’ शब्द हटा दिया गया है और उनका नाम अब विनायक दामोदर सावरकर हो गया है। इसमें बताया गया है कि कैसे अंग्रेजों ने सेल्यूलर जेल में उन्हें प्रताड़ित किया था और उन्होंने दूसरी दया याचिका में खुद को पुर्तगाल का बेटा बताया था।
यह भी लिखा है कि सावरकर ने अंग्रेजों को चार बार दया याचिका भेजी। सावरकर ने भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की तरफ कार्य किया। इसके साथ ही इसमें लिखा है कि सावरकर ने 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन और 1946 में पाकिस्तान के निर्माण का विरोध किया। 30 जनवरी, 1948 को गाँधी की हत्या के बाद, उन पर हत्या की साजिश रचने और गोडसे की सहायता करने के आरोप में मुकदमा चलाया गया। हालाँकि, बाद में उन्हें मामले से बरी कर दिया गया।
वीर सावरकर के नाम के आगे से वीर हटाने के साथ ही पाठ्यपुस्तक में और भी कई सारे बदलाव किए गए हैं। गौरतलब है कि, राजस्थान सरकार ने पहले तो स्कूली पाठ्यक्रम से विनायक दामोदर सावरकर से जुड़े चैप्टर को हटाने का फैसला किया था, लेकिन भाजपा के विरोध के बाद फैसला पलटा गया। अब विनायक दामोदर सावरकर का चैप्टर पाठ्यक्रम में तो है, लेकिन राजस्थान सरकार की नजर में अब वो ‘वीर’ नहीं है।