सुरक्षा बलों को अतिरिक्त शक्तियाँ देने वाला सशस्त्र बल (विशेषाधिकार) कानून अरुणाचल प्रदेश के 9 में से 3 जिलों से आंशिक रूप से हटा लिया गया है। हालाँकि, यह कानून म्यामांर से सटे इलाकों में अभी लागू रहेगा। यह कदम राज्य में कानून लागू होने के 32 साल बाद उठाया गया है। अधिकारियों ने मंगलवार (मार्च 02, 2019) को यह जानकारी देते हुए बताया कि अरुणाचल प्रदेश के 3 जिलों से AFSPA हटा लिया गया है, इन जिलों में रविवार 31 मार्च को स्थिती का जायजा लिया गया था।
MHA sources: AFSPA has been withdrawn from 3 districts (of 9) of Arunachal Pradesh. Law & order situation in six districts of Arunachal Pradesh was reviewed before March 31 for validity of the ‘disturbed area’ designation under AFSPA.
अरुणाचल प्रदेश में फरवरी 20, 1987 को बनने के समय से AFSPA कानून लागू था। यह कानून असम और केंद्र शासित प्रदेश मणिपुर में पहले से लागू था। अरुणाचल प्रदेश के बाद मेघालय, मिजोरम और नागालैंड अस्तित्व में आए और इन राज्यों में भी यह कानून लागू किया गया था। न्यायमूर्ति बी पी जीवन रेड्डी समिति ने राज्य से AFSPA हटाने की सिफारिश की थी।
AFSPA :Armed Forces (Special Powers) Acts
AFSPA कानून के तहत, सुरक्षा बल किसी को भी गिरफ्तार कर सकते हैं और किसी भी परिसर में छापा मार सकते हैं। गृह मंत्रालय ने एक अधिसूचना में कहा कि ‘अशांत क्षेत्र’ घोषित अरुणाचल प्रदेश के 4 थाना क्षेत्र रविवार से इस विशेष कानून के अंतर्गत नहीं हैं। जिन थाना क्षेत्रों से अफस्पा हटाया गया है, उसमें पश्चिम कामेंग जिले के बालेमू तथा भालुकपोंग थाने, पूर्वी कामेंग जिले का सेइजोसा थाना और पापुमपारे जिले का बालीजान थाना शामिल है।
इन जिलों में अभी लागू रहेगा अफस्पा कानून
अधिसूचना के अनुसार, हालाँकि, तिराप, चांगलांग और लोंगडिंग जिलों, नामसाई जिले के नामसाई तथा महादेवपुर थानों के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों, लोअर दिबांग घाटी जिले के रोइंग तथा लोहित जिले के सुनपुरा में अफस्पा 6 और महीनों के लिए 30 सितंबर तक लागू रहेगा।
गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि कानून व्यवस्था की स्थिति में सुधार के कारण चार थाना क्षेत्रों से ‘अशांत क्षेत्र’ का टैग वापस ले लिया गया है और पूर्वोत्तर के प्रतिबंधित उग्रवादी समूहों के निरंतर क्रियाकलापों को देखते हुए यह कानून अन्य क्षेत्रों में लागू रहेगा। अधिसूचना में कहा गया कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस कानून की धारा तीन के तहत उसे मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए यह फैसला किया।
पिछले साल मार्च में मेघालय में सुरक्षा स्थिति में सुधार आने पर अफस्पा पूरी तरह से हटा लिया गया था। एक अधिकारी ने कहा कि अरुणाचल प्रदेश के कुछ भागों में प्रतिबंधित एनएससीएन, उल्फा और एनडीएफबी जैसे उग्रवादी समूह उपस्थित हैं।
चुनावों का दिन जैसे-जैसे समीप आ रहा है, कॉन्ग्रेस नेताओं और गठबंधन सहयोगियों के बयानों का स्तर उतना ही नीचा होता जा रहा है। महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस के महागठबंधन के साथी दल पीपल रिपब्लिकन पार्टी (पीआरपी) के सुप्रीमो जोगेंद्र कडावड़े के बेटे जयदीप कडावड़े ने भाजपा नेत्री और केन्द्रीय कपड़ा उद्योग मंत्री स्मृति ईरानी पर चारित्रिक हनन करता हुआ बयान दिया है।
“स्मृति ईरानी गडकरी के बगल में बैठती है और संविधान बदलने की बात करती है। मैं बताता हूँ स्मृति ईरानी के बारे में। वो सर पर बड़ी सी बिंदी लगाती है और किसी ने मुझे बताया है कि जो औरत पति बहुत बार बदलती है, उसकी बिंदी का आकार उसी (पति बदलने के) हिसाब से बढ़ता जाता है।” कडावड़े के यह शब्द थे। उन्होंने इसके आगे स्मृति ईरानी को सीधे-सीधे संबोधित करते हुए यह ‘जानकारी’ दी कि संविधान बदलना पति बदलने जितना आसान नहीं है।
जयदीप कडावड़े की पीआरपी महागठबंधन के महाराष्ट्र संस्करण का हिस्सा है और कॉन्ग्रेस, शरद पवार की राकांपा और ‘भारत की किसान मजदूर पार्टी’ नामक मार्क्सवादी पार्टी इस संस्करण के अन्य भाग हैं।
स्मृति ने ठोंक रखी है अमेठी से ताल
स्मृति ईरानी को भाजपा ने लगातार दूसरी बार अमेठी से लोकसभा का टिकट दिया है। पिछली बार भाजपा ने स्मृति को हालाँकि बहुत देर से अपना प्रत्याशी बनाया था और स्मृति चुनाव प्रचार करने भी आखिरी दस ही दिनों में ही पहुँचीं थीं, पर तब भी उन्होंने राहुल गाँधी के जीत के अंतर को एक-चौथाई से भी कम में समेट दिया था। 2009 में जहाँ राहुल गाँधी अपना चुनाव 4 लाख मतों से ज्यादा में जीते थे, वहीं 2014 में स्मृति ने दस दिन के भीतर इस अंतर को 1 लाख से कुछ ऊपर ही छोड़ा था।
इसके बाद स्मृति ने 5 साल तक अमेठी से लगातार संपर्क बनाए रखा और सांसद न होते हुए भी कई विकास कार्यों का प्रबंध किया था। माना जा रहा है कि स्मृति के इस तरह अमेठी में जनसंपर्क और जनाधार बनाने और बढ़ाने के चलते ही राहुल गाँधी अमेठी के अलावा एक और ‘सुरक्षित’ सीट तलाशने को मजबूर हुए।
राहुल गाँधी अमेठी के अलावा केरल के वायनाड जिले से लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं।
पहले भी हो चुके हैं स्मृति पर अभद्र राजनीतिक हमले
पिछले साल राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह ने स्मृति ईरानी को ‘हट्टी-कट्टी गाय’ कहा था। इसके अलावा कॉन्ग्रेस के तत्कालीन प्रवक्ता संजय निरुपम भी ईरानी को एक बार ‘टीवी पर ठुमके लगाने वाली’ कह चुके हैं।
स्मृति ईरानी ने जनवरी में बयान दिया था कि अमेठी का विकास राहुल गाँधी के पुरुषार्थ को चुनौती है। उसे भी वामपंथी झुकाव वाले टेलीग्राफ ने तोड़-मरोड़कर स्मृति ईरानी के राहुल गाँधी की मर्दानगी को ललकारना बताने का प्रयास किया था।
मौसम चुनावी हो रखा है लेकिन आज बात इतिहास की करेंगे। राजनीति उसमें आप स्वयं ढूँढ लीजिएगा। इतिहास की बात इसलिए क्योंकि भारत के कुछ नेता जनता से पढ़ाई-लिखाई-सड़क-सुरक्षा-स्वास्थ्य-नौकरी आदि की बात न करके इतिहास की बात कर रहे हैं। हमेशा ऐशो-आराम की जिंदगी जीने वाले ऐसे नेता यह भूल जाते हैं कि उनके बाप-दादाओं की क्या हैसियत थी! और यह भी भूल जाते हैं कि उनके पूर्वज ने लालच में आकर कुर्सी की खातिर कब थूका और कब चाटा। इसलिए आज इतिहास की बात।
कहानी की शुरुआत होती है जनक सिंह से, जो आर्मी अफसर थे। 15 अगस्त 1947 – देश तब आजाद हुआ था। कहानी के दूसरे पात्र हैं – मेहर चंद महाजन। यह वकील थे, फिर जज बने। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस भी रहे। कहानी के तीसरे पात्र वो हैं, जिन पर शीर्षक लिखा गया है। ये वो हैं, जिनके वंशज अभी भी राजनीति कर रहे हैं – मतलब इनका नाम जिंदा रखे हुए हैं। बाकी दोनों पात्र भुला दिए गए हैं। तभी कहानी के जरिए आप तक पहुँच रहे हैं।
15 अगस्त 1947 से 14 अक्टूबर 1947
इस कालखण्ड में जनक सिंह प्रधानमंत्री थे – जम्मू और कश्मीर के। इसके पहले वो आर्मी मिनिस्टर और रेवेन्यू मिनिस्टर भी रहे थे। आजादी के आस-पास उथल-पुथल वाले माहौल में जनक सिंह केवल 65 दिनों तक जम्मू और कश्मीर के प्रधानमंत्री रहे।
15 अक्टूबर 1947 से 5 मार्च 1948
जनक सिंह के बाद जम्मू और कश्मीर के प्रधानमंत्री पद पर मेहर चंद महाजन की एंट्री होती है। इन्हीं के समय आजाद भारत और पाकिस्तान के बीच जम्मू और कश्मीर को लेकर पहला युद्ध (22 अक्टूबर 1947 से 5 जनवरी 1949) लड़ा गया। युद्ध की शुरुआत के 4 दिनों के बाद 26 अक्टूबर को जम्मू और कश्मीर भारत का अभिन्न अंग बन जाता है। मतलब प्रधानमंत्री के तौर पर मेहर चंद महाजन ने अपना रोल बखूबी निभाया होगा, इसमें कोई शक नहीं।
5 मार्च 1948 – 9 अगस्त 1953
शेख अब्दुल्ला इस कहानी के तीसरे पात्र हैं। आजाद भारत में जम्मू और कश्मीर के तीसरे प्रधानमंत्री भी। लगभग साढ़े पाँच साल यह जम्मू और कश्मीर के प्रधानमंत्री रहे। तब राज्य के चीफ करण सिंह (राजा हरि सिंह के बेटे) ने शेख अब्दुल्ला को प्रधानमंत्री पद से हटा दिया। इतना ही नहीं, कश्मीर कॉन्सपिरेसी केस मामले में अब्दुल्ला को लगभग 11 साल तक जेल में भी रहना पड़ा।
PM से CM पद तक का सफर
नाटकीय घटनाक्रम के तहत 8 अप्रैल 1964 को शेख अब्दुल्ला पर लगे सारे आरोप हटा लिए जाते हैं। ये फिर से राजनीति में आते हैं। दुखद यह कि जो शख्स कभी जिस रियासत का प्रधानमंत्री था, उसने अपने आत्मसम्मान का गला घोंटकर मुख्यमंत्री बनना स्वीकार कर लिया। एक बार नहीं, बल्कि 2-2 बार। 25 फरवरी 1975 से 26 मार्च 1977 और फिर 9 जुलाई 1977 से 8 सितंबर 1982 तक शेख अब्दुल्ला जम्मू और कश्मीर के मुख्यमंत्री रहे।
शेख अब्दुल्ला के पोते हैं उमर अब्दुल्ला। वो भी जम्मू और कश्मीर के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। उनके पापा हैं फारुक अब्दुल्ला – मतलब शेख अब्दुल्ला के बेटे। ये भी जम्मू और कश्मीर के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। बाप का, दादा का, पोता का… मतलब जम्मू और कश्मीर की राजनीति खानदानी पेशा है इनका।
उमर अब्दुल्ला शायद अपने दादाजी का नाम और इतिहास भूल गए हैं। यह कहानी उमर के लिए भी। उनको याद दिलाने के लिए कि कैसे उनके दादाजी ने ‘वज़ीर-ए-आज़म’ का सपना थूक कर मुख्यमंत्री की कुर्सी थामी थी। और चुनावी माहौल में पोता चले हैं अपने दादा के थूके हुए को चाटने… ताकि फिर से ‘वज़ीर-ए-आज़म’ का सपना बेच कर सत्ता की कुर्सी पर तशरीफ़ रखी जा सके। मतलब साफ है – थूकना हो या थूक कर चाटना हो – कुर्सी पाना खानदानी पेशा है इस परिवार का।
इस साल 19 जनवरी को, AAP समर्थक प्रोपेगेंडा वीडियो ब्लॉगर ध्रुव राठी ने अपने Youtube चैनल पर एक वीडियो अपलोड किया था जिसमें बताया गया था कि कैसे राजनेता टीवी बहस में पूछे गए कठिन सवालों को दरकिनार करते हैं। राजनेताओं के इस व्यवहार को समझाने के लिए, राठी के साथ एक और बहरूपिया व्यक्ति राजनेता की भूमिका में था। नेता के नाम पर इस अभिनेता के माथे पर एक बड़ा भगवा तिलक था और गले में एक मोतियों की माला थी जो रुद्राक्ष की तरह दिखती है।
हालाँकि, अभिनेता की कल्पना ने उस राजनेता का रूप ले लिया था जिसे आमतौर पर राठी द्वारा टारगेट किया जाता है। राजनेताओं की ‘लॉजिकल फ़ैलेसी’ को समझाते हुए राजनेता का परिचय अंध भक्त बनर्जी नामक एक बड़े मोदी समर्थक के रूप में कराया गया। एजेण्डाधारी ध्रुव राठी द्वारा लिए गए संघी राजनेता के साक्षात्कार की कई क्लिपें, एक मोनोलॉग के फॉर्म में डाली गई थीं, जो राजनेताओं के विभिन्न तार्किक फ़ैलेसी की व्याख्या करने के लिए इस्तेमाल किया गया था।
वैसे तो लगभग सभी विचारधाराओं और दलों के राजनेता लॉजिकल फ़ैलेसी अर्थात विभिन्न विरोधाभाष या कुतर्क का उपयोग करते हैं जैसे कि स्ट्रोमैन तर्क (strawman argument), स्लिपरी स्लोप (slippery slope), सर्कुलर तर्क (circular argument), लाल हेरिंग (red herring) आदि, लेकिन वीडियो में यह समझाने की कोशिश की गई कि जैसे केवल भाजपा के राजनेता ही ऐसी रणनीति में लिप्त हैं।
अन्य पार्टियों के राजनेताओं द्वारा भी इस तरह की रणनीति का उपयोग किया जाता है, यही दिखाने के लिए एक अन्य यूट्यूब चैनल ने उस वीडियो को एडिट किया और Youtube पर अपलोड किया। इस वीडियो में, ध्रुव राठी के मोनोलॉग को बरकरार रखा गया था, लेकिन वीडियो में इस्तेमाल किए गए नकली साक्षात्कार के उदाहरण को हटाकर, उन्हें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के वास्तविक साक्षात्कार और भाषणों के साथ बदल दिया गया था।
Coward @dhruv_rathee can’t tolerate when answered in his own language & got my video with 50k+ views deleted by reporting it.His fans are threatening me now but I’m not scared,I know u people are w/ me. I request everyone to download & share this video maxhttps://t.co/m2iXtG6OZy
कमाल की बात ये है कि क्लिप को इस तरह बदल दिया गया था कि वीडियो का कथानक बिलकुल वैसा ही रहे। केजरीवाल की क्लिप ध्रुव राठी द्वारा अपने वीडियो में किए गए तर्कों से बिल्कुल मेल खाती थी। संपादित वीडियो में उपयोग किए गए क्लिप केजरीवाल को उसी रणनीति का उपयोग करते हुए दिखाते हैं, जो वीडियो में इस तरह से दिखाया गया था कि जैसे केवल भाजपा नेताओं द्वारा उपयोग किया जाता हो।
संपादित वीडियो से ऐसा लग रहा है कि ध्रुव राठी लॉजिकल फ़ैलेसी को समझाते हुए AAP सुप्रीमो का पर्दाफाश कर रहे हैं और आप समर्थक ध्रुव राठी के लिए यह एक बड़ी शर्मिंदगी वाली बात है। इसलिए उसने कॉपीराइट उल्लंघन का हवाला देते हुए YouTube से वीडियो को हटा दिया है। जिसे हटाने से पहले 50 हजार से अधिक बार देखा गया था।
चैनल के मालिक ने यह भी बताया कि कॉपीराइट उल्लंघन के लिए चैनल को YouTube द्वारा निलंबित कर दिया गया था। इसलिए उन्होंने अन्य वेबसाइटों पर वीडियो अपलोड किया है। वीडियो नीचे देखा जा सकता है।
यह साफ देखा जा सकता है कि वीडियो को राठी के प्रोपेगेंडा को आईना दिखाने के लिए, एक व्यंग्य के रूप में संपादित किया गया था, यह साबित करने के लिए कि अरविंद केरीवाल भी मूल वीडियो में बताए गए रणनीति का ही उपयोग करते हैं। संपादित वीडियो वास्तव में यह साबित करता है कि ध्रुव राठी सही है, क्योंकि अब इस वीडियो में उनके स्पष्टीकरण के सन्दर्भ में वास्तविक जीवन के उदाहरण थे। चलते-चलते एक और बात, विश्लेषण, समीक्षा या व्यंग्यात्मक उद्देश्यों के लिए मूल कार्य का उपयोग अवैध नहीं है, लेकिन फिर भी प्रोपेगेंडा चलाने वालों की वजह से वह वीडियो हटा दिया गया।
आयुष्मान योजना ने किस कदर लोगों की मदद की है, इसे जानने के लिए गाँवों की तरफ रुख करना होगा। ग्रामीण, गरीब, किसानों से मिलने पर पता चलता है कि किस तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी योजना ‘आयुष्मान भारत’ न सिर्फ ज़िंदगियाँ बचा रही बल्कि उन्हें जीने का सम्बल भी दे रही है। लोकसभा चुनाव की रिपोर्टिंग के दौरान जब पत्रकार विभिन्न लोकसभा क्षेत्रों में कवरेज के लिए गए हैं तो वहाँ किस तरह से विभिन्न सरकारी योजनाओं ने कितना लाभ पहुँचाया, कहाँ-कहाँ अभी भी सुधार की जरुरत है, ये सब बाहर आ रहा है।
दैनिक जागरण ने एक ग्रॉउंड रिपोर्ट पब्लिश की है पलामू का, बताता चलूँ कि पलामू लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र झारखंड के 14 लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में से एक है। दो जिलों के कुछ हिस्सों को मिलाकर इस संसदीय क्षेत्र का गठन किया गया है।
पलामू की ही एक कहानी है विनोद की, कि किस तरह से एक बदहवास-सा मजदूर पिता अपनी सतमासी बेटी को लेकर दौड़ता हुआ अस्पताल पहुँचा। बिटिया के जन्म के साथ ही डॉक्टर ने जवाब दे दिया था। बड़े अस्पताल के लिए रेफर तो कर दिया गया पर पैसा न विनोद के पास और न ही उनके रिक्शा चलाने वाले पिताजी शिवनारायण चौधरी के पास, बेटी के जन्म के समय ही नीजि डॉक्टर के यहाँ नौ हजार रुपए खर्च करने के बाद, जमीन बेचने का मन बना चुके विनोद के अस्पताल पहुँचते ही उनका गोल्डन कार्ड बन गया। पता लगा आयुष्मान योजना के तहत बेटी का इलाज शुरू हो गया। बिना एक पैसा खर्च किए। यह उनके लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं था। आज विनोद की बेटी अच्छी है। जमीन बेचने की नौबत नहीं आई। आयुष्मान योजना ने उसकी जमीन बचा दी और बच्ची भी।
जागरण की रिपोर्ट में ही एक और घटना जिक्र है कि पांकी के पगार खुर्द के सलोक का, सलोक एक बीघा जमीन के मालिक हैं, माँ-बेटी की जान बचाने के लिए डॉक्टर ने बड़े अस्पताल के लिए रेफर तो कर दिया। पिताजी छठू साव राँची में रिक्शा चलाते हैं। माली हालत ऐसी नहीं थी कि जमा पैसे से इलाज करा पाते। सलोक ने जमीन बेचकर भी इलाज कराने का फैसला किया और पहुँच गया पलामू। 42 दिनों से एनआइसीयू में भर्ती बेटी का, रोजाना तीन-चार हजार रुपए के हिसाब से कोई डेढ़ लाख रुपए का बिल बन गया लेकिन आयुष्मान भारत योजना से पूरा इलाज हुआ, उसकी भी जमीन बिकने से बच गई।
गाँव में एक कहावत है कि ‘जिसे अस्पताल और अदालत का चक्कर लगा वह बर्बाद हो गया।’ सोचिये फिर उन गरीबों पर क्या बीतती होगी जिन्हें खाने के लाले पड़े हैं या बस किसी तरह से गुज़ारा कर रहे हैं।
आयुष्मान भारत योजना ने किसी तरह मजदूरी का जीवन यापन करने वाले गरीबों के लिए, किसानों के लिए, यह योजना बहुत बड़ा सहारा है। पाँच साल के बीजेपी के शासन काल में जहाँ उनकी बाकी ज़रूरतें उज्ज्वला, अन्त्योदय सहित विभिन्न योजनाओं से पूरी हो रही थी। आयुष्मान योजना ने सबसे बड़ी समस्या स्वास्थ्य सुरक्षा को भी सुनिश्चित कर दिया।
जागरण के रिपोर्ट के अनुसार ही बता दें कि पलामू के अस्पतालों में विनोद और सलोक जैसे कोई 6200 मरीज थे जिनका एक साल के भीतर इलाज हुआ। इस मद में करीब साढ़े छह करोड़ रुपए खर्च हुए। अनेक गरीबों की जमीन बिकने से बची तो अनेक सूदखोरों के चंगुल में फँसने से बचे।
रिपोर्ट के अनुसार, सिर्फ पलामू में ही 65 हजार से अधिक लोगों के गोल्डन कार्ड बन चुके हैं। ये सभी सूचीबद्ध 37 सरकारी गैर सरकारी अस्पतालों में इलाज करा सकते हैं। पाँच लाख तक का मुफ्त इलाज सेवा का लाभ लेने वालों के दिल से योजना चलाने वाले के लिए आयुष्मान भव: का आशीर्वाद निकलना अस्वभाविक नहीं है।
ये आँकड़े तो सिर्फ एक लोकसभा क्षेत्र के हैं। आज देश में इस योजना ने गरीबों, वंचितों, किसानों को उस बेबसी और लाचारी से बाहर लाने में बड़ी मददगार सिद्ध हुई है। अब उन्हें पैसों की किल्लत की वजह से अपनों को नहीं खोना पड़ेगा। हालिया संशोधनों के बाद आयुष्मान भारत योजना के तहत देश के सभी बड़े विशेषज्ञ चिकित्सकों को इससे जोड़ा जा रहा है, ताकि देश का कोई भी गरीब, वंचित वर्ग बीमारी की लाचारी में अपने जमीन और जीवन भर की कमाई से वंचित न हो।
केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) के 57वें वार्षिक दिवस पर सीबीआई निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला ने कहा कि सीबीआई को लोगों, संसद, न्यायपालिका और सरकार के भरोसे का से खुशी मिल रही है। जब भी कोई बड़ा अपराध होता है या एक विश्वसनीय जाँच की आवश्यकता होती है, तो हमेशा सीबीआई जाँच की माँग होती है। इस दौरान सीबीआई ने भ्रष्टाचार से संबंधित आँकड़े जारी किए। इन आँकड़ों से पता चलता है कि पिछले साल सीबीआई के जाँच के अनुसार 1,468 लोगों को भ्रष्टाचार के मामलों में दोषी ठहराया गया। इन आँकड़ों के अनुसार एंटी-ग्राफ्ट एजेंसी ने 2018 से अब तक 8,999 केस और प्रारंभिक पूछताछ के मामले दर्ज किए गए थे, जिनमें से 544 मामलों में दोष साबित करने में सफलता हासिल हुई। जिसके बाद अदालतों के निर्देश पर इनमें से 209 मामले उठाए गए।
एजेंसी का दावा है कि उसने रिश्वत के आरोपों का पता लगाने के लिए 156 ट्रैप ऑपरेशन किए थे और बैंक धोखाधड़ी से संबंधित 211 मामले दर्ज किए थे। सीबीआई के एक प्रवक्ता ने पुष्टि करते हुए कहा कि कई संवेदनशील मामलों में भी सजाएँ दी गई हैं,। उन्होंने कहा कि सीबीआई ने शिमला में एक नाबालिग लड़की के बलात्कार और हत्या के मामले की जांच करते हुए भारत में पहली बार डीएनए और वंश मिलान के प्रतिशत मिलान की तकनीक का सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया।
सीबीआई के निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला ने 14 जांच अधिकारियों, 6 कानून अधिकारियों, 46 कार्यकारी और 46 कार्यकारी और मंत्रालयिक कर्मचारियों और 2 तकनीकी अधिकारियों को निदेशक सीबीआई के प्रशस्ति पत्र और उनके अनुकरणीय कार्य के लिए नकद पुरस्कार से सम्मानित किया है। इस दौरान सीबीआई अधिकारियों को दिए अपने संबोधन में, शुक्ला ने शिकायत निवारण के महत्व पर भी जोर दिया और इस संबंध में संगठन के सभी अधिकारियों के लिए ‘ओपन डोर पॉलिसी ’का उल्लेख किया।
शुक्ला ने कहा कि सीबीआई एक भ्रष्टाचार विरोधी एजेंसी से बहुआयामी, बहु-विषयक केंद्रीय पुलिस कानून प्रवर्तन निकाय के रूप में विकसित हुई है, जिसमें देश भर में अपराधों की जाँच और मुकदमा चलाने की क्षमता, विश्वसनीयता और कानूनी जनादेश है। हाल ही में, एक नियुक्ति समिति में आईपीएस ऋषि कुमार शुक्ला को नए सीबीआई निदेशक के रूप में नियुक्त किया। इसमें पीएम मोदी, सीजेआई राजन गोगोई और लोकसभा में कॉन्ग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे शामिल थे।
भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के बाद सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा के पद से हटने के बाद सीबीआई प्रमुख का पद 10 जनवरी से खाली पड़ा हुआ था। सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा के इस्तीफा देने के बाद एम नागेश्वर राय ने कार्यभार संभाला था।
ऋषि कुमार शुक्ला को नव निर्वाचित कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा मध्य प्रदेश में डीआईजी के रूप में अपने पद से हटा दिया गया था, जिसकी वजह से सरकार और विपक्ष के बीच जुबानी जंग छिड़ गई थी। सीबीआई के पूर्व निदेशक आलोक वर्मा और एजेंसी के पूर्व उप प्रमुख राकेश स्थाना के बीच भी कुछ ठीक नहीं था। दोनों अधिकारियों ने एक-दूसरे के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए और एजेंसी की प्रतिष्ठा पर एक गंभीर प्रहार किया।
सोशल मीडिया पर अक्सर हम देखते हैं कि मोटिवेशनल कोट्स और पंक्तियों को किसी भी शायर या बड़े लेखक के नाम से ‘वायरल’ कर दिया जाता है। इस प्रचलन के सबसे बड़े शिकार अब तक सबसे ज्यादा गाँधी, ग़ालिब, रूमी और चाणक्य हुए हैं। लेकिन इस बार जो दुर्घटना घटी है उसमें शिकार और शिकारी दोनों ही लोगों को स्तब्ध कर देने वाले नाम हैं। ये ताजा प्रकरण जुड़ा है अमिताभ बच्चन और उनके पिता स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी की एक ‘कविता’ से।
अप्रैल फूल के नाम से मनाए जाने वाले 1 अप्रैल के दिन बॉलीवुड के वरिष्ठ अभिनेता अमिताभ बच्चन ने ट्विटर पर एक ऐसी कविता पोस्ट कर डाली, जो सोशल मीडिया और व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी पर खूब चलाई जाती हैं। लेकिन दुखद बात ये थी कि खुद अमिताभ बच्चन ये बात नहीं समझ पाए कि ये कविता के नाम पर एक धब्बा है और उनके पिता हरिवंशराय बच्चन जी ने ये नहीं लिखी है। ‘पूज्य बाबू जी का लेखन’ के साथ दो हाथ जोड़ती इमोजी बनाकर अमिताभ बच्चन ने ये ऐतिहासिक भूल कर डाली, लेकिन ट्विटर यूज़र्स की आपत्ति के बावजूद भी उन्होंने ये कविता अभी तक डिलीट भी नहीं की है।
इस कविता के लिरिक्स कुछ इस तरह हैं (हमने इसमें एडिटिंग नहीं की है)
*हारना तब आवश्यक हो जाता है ,* *जब लड़ाई ” अपनों ” से हो ,* *और ,* *जीतना तब आवश्यक हो जाता* *जब लड़ाई ‘ अपने आप ‘ से हो* ….. *मंजिल मिले ना मिले ये* *मुकदर की बात है ,* *हम कोशिश ना करें , यह तो गलत बात है !* *किसी ने बर्फ से पूछा कि-* *आप इतने ठडे क्यो हो?* *बर्फ ने बडा सुन्दर उत्तर दिया-* *मेरा आतीत भी पानी* *मेरा भविष्य भी पानी* *फिर गर्मी किस बात की रखूं !*
हिन्दीनामा (Hindinama2) ने चाणक्य की एक रैंडम तस्वीर पर लिखी गई इन्हीं पंक्तियों के साथ आपत्ति जताते हुए लिखा है कि ये चाणक्य ने लिखा है ना कि हरिवंशराय बच्चन जी ने।
Sir आप चाणक्य के बोले गए वाक्यों को अपने पूज्य पिताजी से जोड़ रहे हैं… यह बहुत गलत बात है, आपसे ऐसी उम्मीद न थी।?? @SrBachchan ? pic.twitter.com/2rsXD4vFNV
हालाँकि, ये बच्चन साहब का पारिवारिक मामला है लेकिन यह एक बड़ा सन्देश है कि जब अमिताभ बच्चन जैसी जागरूक हस्ती भी इंटरनेट पर चलने वाली अफवाहों के सही और गलत होने का निर्णय नहीं ले पाते हैं तो फिर आम नागरिक इन सूचनाओं से किस स्तर तक प्रभावित हो सकता है, वो भी ऐसे समय में, जब लोग सोशल मीडिया के माध्यम से और सस्ते कॉमेडियंस द्वारा दी गई जानकारियों को ही ब्रह्म सत्य मान बैठते हैं और हर दूसरे मनचले व्यक्ति के आँकड़ों को ही सही मानकर सरकार को कोसना चालू कर देते हैं।
कल ही ऑपइंडिया ने यह खुलासा किया कि आप सुप्रीमो और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल मध्य-पूर्व के मुस्लिम-बहुल देशों से चंदा माँग रहे हैं, और उसके लिए आम आदमी पार्टी के विज्ञापन इन देशों में चल रहे हैं। आज यह पता चला कि यह खबर बाहर आने के बाद भी आम आदमी पार्टी का संदिग्ध चंदा-उगाही अभियान थमा नहीं है बल्कि और फैल गया है। और इस फेहरिस्त में टैक्स-चोरी आसान करने के लिए बदनाम (लेकिन टैक्स-चोरों में ‘हेवन’ के रूप में मशहूर) देशों में भी अब आम आदमी पार्टी के विज्ञापन भेजे जा रहे हैं।
जिन 62 देशों में आप के विज्ञापन चिह्नित हैं, उनमें भारत, ऑपइंडिया द्वारा पहले ही खुलासा किए गए चार देशों सऊदी अरब, ओमान, संयुक्त अरब अमीरात, और क़तर, के अलावा ऑलैंड आइलैंड्स, मखदूनिया (Macedonia, आक्रान्ता सिकंदर का देश), मॉलडोवा जैसे देश भी शामिल हैं।
टैक्स-हेवन देशों का नाम निकल कर आता है सामने
ऑलैंड आइलैंड्स की कुल आबादी 2017 की जनगणना के हिसाब से 30,000 है। अप्रवासी हिन्दुस्तानी भी यहाँ केवल 38 ही हैं। केजरीवाल यहाँ से कितने चंदे की उम्मीद कर रहे थे?
ऐसा ही एक और देश गर्न्सी भी इस सूची में है जहाँ 2016 की जनगणना 63,000 की आबादी बताती है। इसके अलावा यह देश टैक्स-हेवन के रूप में भी विख्यात/कुख्यात है। एंडोरा भी एक और देश है जो आप की विज्ञापन सूची और आंशिक टैक्स-हेवन देशों की सूची, दोनों में मौजूद है।
मखदूनिया, अल्बेनिया, कोसोवो- तीनों के तीनों टैक्स-हेवन देशों की सूची में हैं, और आम आदमी पार्टी की संभावित दानदाता-लक्ष्य की सूची में भी हैं। मॉलडोवा भी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई से अपनी राजनीति शुरू करने वाले अरविन्द केजरीवाल के चंदा-अभियान के लक्ष्य पर है, और सावर्जनिक भ्रष्टाचार पर नज़र रखने वाली संस्था CiFAR इस देश को ‘यूरोप का बिसराया भ्रष्टाचार का स्वर्ग’ कहती है।
केजरीवाल वेटिकेन सिटी में भी चंदे के लिए विज्ञापन लगाए हैं, और यहाँ कुल 1000 ही लोग रहते हैं, जिनमें शायद ही कोई हिंदुस्तान का नागरिक या गैर-ईसाई होगा!
केजरीवाल और चंदा- दाल में काला, या फिर…?
2017 में आम आदमी पार्टी पर यह आरोप लगा था कि उसने हवाला के जरिए शेल कम्पनियों से चंदे के पैसे लिए। उसके पहले केजरीवाल के ‘गुरु’ अन्ना हजारे भी उन्हें पत्र लिखकर पार्टी को मिल रहे चंदे के बारे में स्थिति स्पष्ट करने के लिए कह चुके थे।
यही नहीं, केजरीवाल पर 2014 के आम चुनावों के पहले भी संदिग्ध स्रोतों से चंदा लेने का आरोप है। आप के बागी विधायक कपिल मिश्रा ने यह आरोप लगाया था कि उनके (केजरीवाल के) वाराणसी से लोकसभा चुनावों का पर्चा भरने के एक सप्ताह पूर्व 5 अप्रैल 2014 को आम आदमी पार्टी के खाते में 4 शेल कम्पनियों से ₹2 करोड़ जमा किए गए। उन तीन कम्पनियों में एक डायरेक्टर समान था- हेम प्रकाश शर्मा। नोटबंदी के दौरान प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने दिल्ली के ग्रेटर कैलाश में छापा मारकर ₹13 करोड़ से अधिक की नकदी बरामद की थी। इस मामले में फँसी कम्पनी में भी हेम प्रकाश शर्मा के डायरेक्टर होने की बात निकल कर सामने आई थी।
कपिल मिश्रा इस हेम प्रकाश शर्मा को ही नोटबंदी के समय की केजरीवाल की विवादास्पद प्रेस कांफ्रेंस के पीछे बताते हैं। और कपिल मिश्रा के आरोप यहाँ से और संगीन ही होते गए। उन्होंने न केवल हेम प्रकाश शर्मा के फर्जी डायरेक्टर होने का आरोप लगाया बल्कि यह अंदेशा भी जताया कि शायद हेम प्रकाश शर्मा का कोई अस्तित्व ही नहीं है। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि केजरीवाल को नोटबंदी की वजह से ही चुनाव लड़ने में दिक्कत हो रही है, और नोटबंदी में केजरीवाल का भारी नुकसान हुआ है। केजरीवाल के शुरूआती दिनों में भ्रष्टाचार विरोधी भाषणों को अगर याद करें तो यह आरोप चौंकाने वाले हैं।
DNA की तफ्तीश वेबसाइट से गायब!
ऑपइंडिया ने जब इस रहस्यमयी हेम प्रकाश शर्मा की तहकीकात करने का प्रयास किया तो हमें इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट मिली जिसमें कई असहज कर देने वाले तथ्य दर्ज थे। इस रिपोर्ट के अनुसार आप को चंदा देने वालीं जिन तीन कम्पनियों का जिक्र ऊपर किया गया है, उनके पास दिखाने के लिए कोई राजस्व नहीं है। इन सभी में तीन लोग डायरेक्टर थे- हेम प्रकाश शर्मा, धरमेंदर कुमार, और मुकेश कुमार। इन कम्पनियों का जो पता रजिस्ट्रार हाउस में दर्ज है वहाँ पर एक डाकखाना, एक शटरबंद किराने की दुकान, और एक छोटा से सिलाई कारखाना है। रिपोर्ट पढ़कर यह कम्पनियाँ निश्चय ही शेल कम्पनियाँ प्रतीत होतीं हैं।
एक और भी चौंकाने वाला वाकया हमारे यह खबर लिखने के बाद हुआ है, जिसके लिए हम इस रिपोर्ट को सम्पादित कर रहे हैं। DNA ने उपरोक्त डायरेक्टरों में से एक मुकेश कुमार को तलाशा और उसके हवाले से यह दावा किया था कि हालाँकि वह इन कागजी कम्पनियों के मालिक जरूर हैं पर उन्होंने कभी आप को चंदा नहीं दिया। DNA ने यह भी लिखा था कि वह हेम प्रकाश शर्मा के आधिकारिक रूप से दर्ज पते पर पहुँचे तो उन्हें वहाँ एक दो-मंजिला घर मिला जहाँ एक अन्य 60-वर्षीया महिला और अपने परिवार के साथ रह रहीं दीपिका शर्मा ने हेम प्रकाश शर्मा की कोई भी जानकारी होने से इंकार किया है।
पर यह खबर लिखे जाने के बाद ऑपइंडिया को यह जानकारी मिली कि यह रिपोर्ट DNA के पोर्टल से हट चुकी है, और वहाँ अब केवल एक error message आ रहा है।
आखिर हेम प्रकाश शर्मा का ऐसा कौन सा सच है, जिसे छिपाने के लिए इस रिपोर्ट को हटाया गया है?? और हेम प्रकाश शर्मा का अरविन्द केजरीवाल से असली connection क्या है?
बेहतर होगा केजरीवाल खुद स्थिति स्पष्ट करें
केजरीवाल के राजनीतिक उद्गम, और नैतिक श्रेष्ठता के उनके ऊँचे होते जा रहे दावे, दोनों का तकाजा यही है कि केजरीवाल खुद आगे आकर अपने और हेम प्रकाश शर्मा के संबंधों का खुलासा करें, और यह साफ़ करें कि उनके विज्ञापन इतने सारे टैक्स-हेवन देशों में क्यों चल रहे हैं।
अगर वह ऐसा नहीं करते हैं तो वे अपने ऊपर उँगलियाँ उठने से नहीं रोक सकते।
कॉन्ग्रेस नेता और पाटीदार आंदोलन के अगुआ रहे हार्दिक पटेल के लोकसभा चुनाव लड़ने की उम्मीदों पर पानी फिर गया है। सुप्रीम कोर्ट ने हार्दिक पटेल को झटका देते हुए लोकसभा चुनाव लड़ने की अनुमति देने वली याचिका पर जल्द सुनवाई करने से इंकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा है कि याचिका पर नियमित क्रम में ही सुनवाई होगी।
कोर्ट के इस फैसले के बाद ये साफ हो गया है कि हार्दिक आगामी चुनाव में हिस्सा नहीं ले पाएँगे। बता दें कि, हार्दिक ने गुजरात हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ अपील की थी, जिसमें उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी गई थी। हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगाने के लिए उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय से गुहार लगाई है। हार्दिक ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की थी कि उनकी सजा को निलंबित रखा जाए और साथ ही अदालत इस याचिका पर जल्द से जल्द सुनवाई करे, ताकि वो चुनाव लड़ सकें। मगर हार्दिक को यहाँ भी राहत नहीं मिली। ‘रिप्रजेंटेशन ऑफ पीपल एक्ट 1951’ के मुताबिक अगर किसी शख्स को दो साल की सजा मिली है तो वो चुनाव नहीं लड़ सकता है।
Supreme Court declines urgent hearing of Patidar leader Hardik Patel’s plea seeking a suspension of his conviction in a 2015 case relating to rioting, so that he can contest the upcoming Lok Sabha elections. (file pic) pic.twitter.com/5AMtzD3SqC
नामांकन की आखिरी तारीख 4 अप्रैल है। इस फैसले से हार्दिक के साथ-साथ कॉन्ग्रेस पार्टी को भी झटका लगा है, क्योंकि 12 मार्च को कॉन्ग्रेस में शामिल हुए हार्दिक पटेल को पार्टी जामनगर से चुनाव लड़ाने की तैयारी में थी और हार्दिक ने भी जामनगर से कॉन्ग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने की तैयारी शुरू कर दी थी।
गौरतलब है कि हार्दिक को राज्य के महेसाणा जिले के विसनगर में 23 जुलाई 2015 को एक आरक्षण रैली के दौरान हुई हिंसा और तत्कालीन स्थानीय भाजपा विधायक ऋषिकेश पटेल के कार्यालय पर हमले और तोड़फोड़ के मामले में पिछले साल 25 जुलाई को एक स्थानीय अदालत ने 2 साल के साधारण कारवास की सजा सुनाई थी। उन पर जुर्माना भी लगाया गया था।
कॉन्ग्रेस ने आज अपना चुनावी घोषणापत्र जारी किया। घोषणा पत्र को पार्टी ने ‘जन आवाज’ का नाम दिया। इस घोषणा पत्र में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी। इस घोषणा पत्र को पढ़ने के बाद वित्त मंत्री ने इसमें मौजूद कई बातों को खतरनाक बताया। अरुण जेटली ने देशद्रोह के अपराध को खत्म कर देने वाली बात पर अपना मत रखा।
वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी के घोषणा पत्र में कई बातें ऐसी हैं जिन्हें देखकर ऐसा लगता कि घोषणापत्र के कुछ बिंदु राहुल गाँधी के टुकड़े-टुकड़े गैंग वाले दोस्तों द्वारा तैयार किए गए हैं।
Union Finance Minister & BJP leader Arun Jaitley on Congress manifesto: Even though there was a drafting committee, but it appears that some of the important points have been drafted by the Congress President’s friends in ‘Tukde Tukde gang’ when it deals with Jammu & Kashmir pic.twitter.com/2rE39uBOaC
उन्होंने कॉन्ग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि वे एकता के ख़िलाफ़ और देश को तोड़ने वाला काम करते हैं। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर को लेकर गाँधी-नेहरू परिवार द्वारा जो ऐतिहासिक भूल हुई उसके लिए देश उन्हें कभी माफ़ नहीं कर सकता है।
The Congress is the principal creator of the J&K problem. It created a special status; it unconstitutionally brought in Article 35A. A reference to “Kashmiri Pandits’ & their ethnic cleansing is conspicuously absent in the Manifesto. It shows, how untrustworthy Congress is.
— Chowkidar Arun Jaitley (@arunjaitley) April 2, 2019
जेटली ने देशद्रोह को अपराध श्रेणी से खत्म करने वाली बात पर कहा कि जो पार्टी इस तरह की बातें करती है वो देश के एक भी वोट पाने की हकदार नहीं हैं। कॉन्ग्रेस के घोषणापत्र को जेटली कहा कि इसमें माओवादियों और जेहादियों की रक्षा करने के लिए सीआरपीसी में बदलाव की बात हुई।
#WATCH Union Finance Minister & BJP leader Arun Jaitley on Congress manifesto: Some of the ideas are positively dangerous, they are an agenda for the balkanisation of India. pic.twitter.com/XPp8LDXM4c
जेटली की माने तो कॉन्ग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में जम्मू-कश्मीर के लिए पूरा पेज लिख दिया है। लेकिन कश्मीरी पंडित के लिए एक जिक्र भी नहीं है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के सेक्युलेरिज्म में कश्मीरी पंडितों के लिए आँसू नहीं है। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस का घोषणापत्र AFSPA को कमजोर करने की बात कर रहा है। बता दें इस घोषणा पत्र में सेना के अधिकारियों पर किसी सरकारी अनुमति के बिना मामला दर्ज़ होने की भी बात है। जिसपर वित्त मंत्री का तर्क है कि अगर ऐसा होता है तो किसी आतंकवादी को पकड़ने पर भी उनका संगठन बदसलूकी के आरोप लगाता है।
2019 Congress Manifesto is a Charter to Weaken India. After reading Congress Manifesto my worst fears have come true. The repeal of S.124A of the IPC, diluting AFSPA & “bail is the rule jail is the exception” for terrorists & hardcore criminals will compromise national security.
— Chowkidar Arun Jaitley (@arunjaitley) April 2, 2019
अरुण जेटली ने कॉन्ग्रेस पार्टी की न्याय योजना को एक धोखा बताया, क्योंकि घोषणा पत्र में साफ नहीं किया गया है कि इसके लिए बजट कहाँ से आएगा। वित्त मंत्री ने कहा कि उन्होंने राहुल गाँधी से ज्यादा बार कॉन्ग्रेस का घोषणा पत्र पढ़ा है। उनका कहना है कि इस घोषणा पत्र के साथ कॉन्ग्रेस पार्टी राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ नई नीतियाँ लेकर आई है जिसका मकसद सिर्फ़ देश को कमज़ोर बनाना है।