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क्या FCRA संशोधन बिल ईसाई विरोधी है? चर्च पर कब्जे के दावों से लेकर विदेशी फंडिंग तक, जानिए पूरा सच

अमेरिकी रिपब्लिकन सांसद राइली मूर ने मंगलवार (4 अगस्त 2026) को भारत के विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 (FCRA Amendment Bill) को लेकर घबराहट और डर फैलाने की कोशिश की। उन्होंने दावा किया कि मोदी सरकार चर्चों और धार्मिक चैरिटी को अपने नियंत्रण में लेकर ईसाइयों को प्रताड़ित करने की कोशिश में है।

इस MAGA ईसाई राष्ट्रवादी ने कहा, “भारत की संसद विदेशी अंशदान नियमन संशोधन (FCRA) नियमों में संशोधन करने पर विचार कर रही है ताकि सरकार को चर्चों और धार्मिक चैरिटी पर कब्जा करने की अनुमति मिल सके।” उन्होंने आगे कहा, “यह ईसाइयों के खिलाफ एक सीधा हमला है। यदि यह विधेयक इसी दिशा में आगे बढ़ता है, तो यह भारत के साथ हमारे द्विपक्षीय संबंधों में एक बड़ी चिंता का विषय होगा।”

हालाँकि, यह साफ था कि सोशल मीडिया पर किया गया यह दिखावा नाराज MAGA वोटर बेस को शांत करने के लिए था, खासकर अमेरिका की मौजूदा स्थिति और ईरान के साथ जारी युद्ध को देखते हुए, लेकिन उनका डर फैलाने वाला यह बयान भारत में अराजकता पैदा कर सकता है।

उनके बयान इस कानून के मूल प्रावधानों और भारत के विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक के व्यापक नियामक उद्देश्य, दोनों को गलत तरीके से पेश करते हैं। वास्तव में, यह कानून धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करता। इसका उद्देश्य देश में काम कर रहे सभी गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) में जवाबदेही और वित्तीय पारदर्शिता बढ़ाना तथा फंड के गलत इस्तेमाल या उसकी हेरा-फेरी से रोकना है।

ईसाई विरोधी झूठ का पर्दाफाश

FCRA संशोधन विधेयक को लेकर फैलाई जा रही अफवाह यह है कि यह भारत सरकार को मनमाने ढंग से चर्चों और धार्मिक संस्थानों को अपने नियंत्रण में लेने का अधिकार देता है। कानून के वैधानिक पाठ को सीधे पढ़ने से ही पता चलता है कि यह नैरेटिव तथ्यात्मक रूप से गलत है।

प्रस्तावित कानून [pdf] स्पष्ट रूप से सभी पूजा स्थलों (Places of Worship) को सरकारी परिवर्तन, धर्मनिरपेक्षीकरण या पुनरुद्देश्य (दूसरे काम में इस्तेमाल) से बचाता है।

“उप-धारा (6) में किसी भी बात के बावजूद, नामित प्राधिकरण, जहाँ उसके पास स्थायी रूप से निहित कोई संपत्ति या उसका कोई हिस्सा पूजा स्थल हो, ऐसी संपत्ति या उसके हिस्से के प्रबंधन या संचालन की जिम्मेदारी निर्धारित व्यक्ति को, निर्धारित तरीके और नियमों एवं शर्तों के अनुसार सौंपेगा और यह सुनिश्चित करेगा कि ऐसे पूजा स्थल का धार्मिक स्वरूप बरकरार रहे।”

(PRS इंडिया के माध्यम से 2026 के FCRA संशोधन विधेयक के एक अंश का स्क्रीनग्रैब)

यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि यदि किसी चर्च का विदेशी अंशदान लाइसेंस भी रद्द हो जाता है, तब भी उसके पूजा स्थल को न तो तोड़ा जा सकता है और न ही बंद किया जा सकता है। धार्मिक गतिविधियों पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।

नामित प्राधिकरण की भूमिका केवल उन व्यावसायिक या विकास से जुड़ी संपत्तियों के प्रबंधन तक सीमित है, जिन्हें विदेशी फंड से बनाया गया है और जिनका FCRA पंजीकरण रद्द, सरेंडर या समाप्त हो गया है। इसका उद्देश्य सार्वजनिक सेवाओं की निरंतरता सुनिश्चित करना है।

इसके अलावा, नामित प्राधिकरण द्वारा जारी किसी भी आदेश के खिलाफ प्रशासनिक समीक्षा और जिला न्यायाधीश के समक्ष न्यायिक अपील की जा सकती है।

साथ ही, राज्य स्तर की एजेंसियों को केंद्र की पूर्व मंजूरी के बिना स्थानीय स्तर पर मुकदमा शुरू करने से रोक दिया गया है। यह मनमाने ढंग से स्थानीय कार्रवाई के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करता है।

जान लीजिए पूरा सच

प्रस्तावित कानून को पढ़ने से यह स्पष्ट है कि इसमें ईसाई मजहब समेत किसी के लिए भी विदेशी फंडिंग पर रोक नहीं लगाई गई है। ऐसे में चर्च और मंदिर, मस्जिद तथा गुरुद्वारे जैसे अन्य पूजा स्थल भी वास्तविक धार्मिक कार्यों के लिए विदेशी चंदा प्राप्त करना जारी रख सकते हैं।

सिर्फ तब कोई संगठन अपना FCRA पंजीकरण खो सकता है, जब विदेश से प्राप्त धन का इस्तेमाल उस उद्देश्य के अनुसार नहीं किया जाता, जिसके लिए उसे मूल रूप से घोषित किया गया था। लेकिन ऐसी स्थिति में भी संगठन के पूजा स्थल पर कब्जा नहीं किया जा सकता और न ही उसका इस्तेमाल किसी दूसरे उद्देश्य के लिए किया जा सकता है।

कानून में अदालत जाने का रास्ता भी उपलब्ध है। जिस संगठन का FCRA लाइसेंस रद्द किया जाता है, वह केंद्र सरकार के इस फैसले को अदालत में चुनौती दे सकता है। यह प्रावधान धार्मिक और धर्मार्थ कार्यों से जुड़े संगठनों पर भी लागू होता है।

यहाँ तक कि यदि किसी चर्च का संचालन करने वाला संगठन अपना लाइसेंस खो देता है, तब भी स्थानीय लोग बिना किसी सरकारी हस्तक्षेप के उस चर्च में प्रार्थना करना जारी रख सकते हैं। यह बात FCRA संशोधन विधेयक को अल्पसंख्यक विरोधी बताए जाने वाले दावों की पोल खोलती है।

मोदी सरकार का आश्वासन

मोदी सरकार ने सभी हितधारकों (stakeholders) के साथ सक्रिय रूप से जुड़कर चिंताओं को दूर किया है और दोहराया है कि यह विधेयक बिना किसी धार्मिक पूर्वाग्रह के समान रूप से लागू होता है।

इस साल जुलाई में, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मेघालय के मुख्यमंत्री कॉनराड के. संगमा और वरिष्ठ चर्च प्रतिनिधियों के एक प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की, जिसमें प्रेसबिटेरियन चर्च ऑफ इंडिया, गारो बैपटिस्ट कन्वेंशन और रोमन कैथोलिक चर्च शामिल थे।

उसी महीने में, केंद्रीय गृह मंत्री ने कैथोलिक विशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया (CBCI) के प्रतिनिधियों से मुलाकात की और उन्हें सूचित किया कि FCRA संशोधन विधेयक विदेशी धन प्राप्त करने वाले कानून का पालन करने वाले ईसाई संगठनों के कामकाज को प्रभावित नहीं करेगा।

(अमित शाह कॉनराड के. संगमा और ईसाई प्रतिनिधिमंडल से मिले, एएनआई के माध्यम से छवि)

यह आश्वासन भी दिया गया कि प्रस्तावित कानून प्रकृति में गैर-भेदभावपूर्ण है और इसे पिछली तारीख से लागू नहीं किया जा सकता है। केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने इस साल मार्च में साफ किया था कि FCRA संशोधन विधेयक किसी भी धार्मिक संगठन को प्रभावित नहीं करेगा।

उन्होंने कहा था, “कॉन्ग्रेस पार्टी और केरल में कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा यह अफवाहें फैलाई जा रही हैं कि भारत सरकार विभिन्न धार्मिक संगठनों की गतिविधियों को रोकने के लिए FCRA में बदलाव ला रही है। यह पूरी तरह से झूठा, मनगढ़ंत और भ्रामक है।”

रिजिजू ने आगे कहा, “कुछ फंड अवैध रूप से देश में प्रवेश करते हैं और राष्ट्रीय हित के खिलाफ इस्तेमाल किए जाते हैं। इसलिए, इस कानून का उद्देश्य विदेशी फंड के उचित नियमन को सुनिश्चित करके राष्ट्रीय हित और सुरक्षा की रक्षा करना है।”

कांग्रेस ने पहले FCRA का समर्थन किया था

यह ध्यान रखना दिलचस्प है कि यूपीए (UPA) शासन के दौरान कांग्रेस पार्टी ने FCRA के कार्यान्वयन का समर्थन किया था। 2012 में, पूर्व पीएम मनमोहन सिंह ने कहा था, “ऐसे NGO भी हैं, जिन्हें अक्सर अमेरिका और स्कैंडिनेवियाई देशों से फंडिंग मिलती है, लेकिन वे हमारे देश के सामने मौजूद विकास की चुनौतियों को पूरी तरह नहीं समझते हैं…”

उन्होंने आगे कहा था, “परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम मुश्किलों में पड़ गया है क्योंकि ये गैर-सरकारी संगठन… हमारे देश के लिए ऊर्जा आपूर्ति बढ़ाने की आवश्यकता को नहीं समझते हैं।”

यहाँ तक कि पूर्व गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने कुडनकुलम परमाणु विरोधी प्रदर्शनों के दौरान इसी तरह के बयान दिए थे: “जाँच से पता चलता है कि धन की हेराफेरी हुई है। इसलिए, विदेशी अंशदान अधिनियम के तहत, हमने मामले दर्ज करने का फैसला किया है।” दिलचस्प बात यह है कि यूपीए सरकार ने अपने कार्यकाल के दौरान 4,000 गैर-सरकारी संगठनों के लाइसेंस रद्द किए थे।

निष्कर्ष

जब अमेरिका भारत के आंतरिक मामलों में दखल देने की कोशिश कर रहा है और भारतीय ईसाइयों की स्थिति को लेकर डर का माहौल बना रहा है, तब यह भी ध्यान देने वाली बात है कि यह उत्तरी अमेरिकी देश भी पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करता है। अमेरिका में फॉरेन एजेंट्स रजिस्ट्रेशन एक्ट (FARA) लागू है, जिसके तहत विदेशी हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्तियों और संगठनों को अपनी राजनीतिक गतिविधियों और फंडिंग के स्रोतों का खुलासा करना पड़ता है।

FCRA संशोधन विधेयक भारत की संप्रभुता और अखंडता बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है। इसमें पूजा स्थलों के संरक्षण को अनिवार्य किया गया है, आपराधिक सजा के प्रावधानों को कम किया गया है, न्याय पाने के लिए स्पष्ट कानूनी रास्ता तय किया गया है और सभी गैर-सरकारी संस्थाओं के लिए एक समान पारदर्शिता सुनिश्चित की गई है।

गालीबाजों में दिखे ‘स्वतंत्रता सेनानी’ और मोदी सरकार में ‘क्रूर ब्रिटिश’… ‘पत्रकारिता’ के नाम पर इस वामपंथी सनक को छोड़ दो आरफा-श्याम-तनुश्री

आज देश की शांति और सुरक्षा पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है। कुछ खुद को ‘स्वतंत्र पत्रकार’ कहने वाले वामपंथी विचारधारा के लोग देश का माहौल बिगाड़ रहे हैं। 2 अगस्त को आरफा खानुम और श्याम मीरा सिंह अपने-अपने यूट्यूब चैनल पर एक कोलैबोरेशन (Collaboration) वीडियो अपलोड करते हैं। यह वीडियो 1 घंटे 4 मिनट का है। इसमें आरफा खानुम, श्याम मीरा सिंह, तनुश्री पांडे और अनमोल आपस में चर्चा करते हुए नजर आते है। चर्चा किस बात पर… केवल और केवल मोदी सरकार को कैसे कोसा जाए, सीजेपी के उग्र प्रदर्शन की बिगड़ी छवि कैसे बचाई जाए और लोगों को सत्ता पलटने के लिए कैसे उकसाया जाए। इस गोलमेज (राउंड टेबल) चर्चा का मकसद केवल और केवल देश में आग लगाना है। ये वामपंथी विचारधारा के लोग युवाओं को हिंसा के लिए उकसा रहे हैं।

इन तथाकथित पत्रकारों ने दिल्ली की सड़कों पर हुड़दंग मचाने वालों का साथ दिया है। इन उपद्रवियों ने देश के प्रधानमंत्री को गालियां दीं। इन्होंने सार्वजनिक संपत्ति को भारी नुकसान पहुँचाया। इन्होंने दिल्ली पुलिस और जवानों पर जानलेवा हमले किए। हद तो तब हो गई जब इन देश-विरोधी लोगों ने इन गुंडों को ‘स्वतंत्रता सेनानी’ बता दिया। इन्होंने चुनी हुई सरकार की तुलना क्रूर ब्रिटिश राज से की।

हैरान करने वाली बात ये है कि सीजेपी का प्रदर्शन खत्म हो चुका है तब भी ये लोग इसी मुद्दे को लेकर बैठे है लेकिन झारखंड में नीट (NEET) पेपर लीक को लेकर जो वास्तविक छात्र प्रदर्शन कर रहे हैं, उस पर इन वामपंथियों को उस चर्चा नहीं करनी है। ये वामपंथी झारखंड वाले पर चर्चा इसलिए नहीं करना चाहते हैं, क्योंकि वहाँ इनके अपने राजनीतिक आका फँसे (कॉन्ग्रेस) हैं। जब आरफा खानुम ईरान गई थीं, तब डर के मारे उन्होंने बुर्का और हिजाब पहन लिया था। वहाँ वे एक शब्द बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाई थीं। लेकिन आज वे देश में बैठकर जहर उगल रही हैं।

गालियों और उपद्रवियों को ‘स्वतंत्रता सेनानी’ बताने वाले इन वामपंथियों का काला सच

राउंड टेबल में बातचीत के दौरान तनुश्री, आरफा, अनमोल और श्याम ने अपने फाल्तु और दो कोड़ी के विचार रखें। इन लोगों ने दिल्ली की सड़कों पर पत्थरबाजी करने वालों को ‘स्वतंत्रता सेनानी’ तक बता दिया है। ये वही लोग हैं जिन्होंने प्रधानमंत्री को गालियाँ दीं। यह हमारे देश के महान स्वतंत्रता सेनानियों का सीधा अपमान है। हमारे असली सेनानियों ने देश की आजादी के लिए जान दी थी। वे अंग्रेजों की गोलियाँ खाते थे। वे देश की एकता के लिए हँसते-हँसते फाँसी पर चढ़े थे। वे चौराहों पर बैठकर ना तो पिज्जा-बर्गर खाते थे, ना ही देश का माहौल खराब करते थे। इसके अलावा, वे न तो देश विरोधी नारे लगाते थे और न ही किसी की माँ-बहन को गाली देते थे।

भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, चंद्रशेखर आजाद और सरदार पटेल ने देश को एक किया था। लेकिन यह वामपंथी गैंग देश को तोड़ने में लगी है। जो लोग पुलिस पर पत्थर फेंकते हैं, वे कभी स्वतंत्रता सेनानी नहीं हो सकते। ऐसा कहना हमारे शहीदों के साथ बहुत बड़ा धोखा है। श्याम मीरा सिंह ने तो खुलेआम धमकी दी है। उसने वीडियो में कहा कि अगर 26 मार्च वाला आंदोलन सफल हो जाता, तो पीएम मोदी 26 अगस्त नहीं देख पाते। यह सीधे तौर पर देश के प्रधानमंत्री को रास्ते से हटाने की साजिश है। यह लोग देश के युवा के शुभचिंतक नहीं हैं। ये सिर्फ अपने आकाओं को खुश करना चाहते हैं। ये मासूम छात्रों को मोहरा बना रहे हैं। ये अपनी गंदी राजनीति चमकाने के लिए देश में आग लगाना चाहते हैं।

जानें असल में स्वतंत्रता सेनानी कौन थे?

शहीद भगत सिंह (1907-1931): शहीद भगत सिंह भारत के इतिहास के एक ऐसे महान क्रांतिकारी हैं, जिनका नाम लेते ही हर देशवासी का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। उनका जन्म 28 सितंबर 1907 को पंजाब के बंगा में एक देशभक्त परिवार में हुआ था। भगत सिंह ने कम उम्र में ही समझ लिया था कि देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद कराने के लिए वैचारिक और सशस्त्र दोनों लड़ाइयों की जरूरत है। लाला लाजपत राय की लाठीचार्ज से हुई मृत्यु का बदला लेने के लिए उन्होंने ब्रिटिश पुलिस अधिकारी सॉन्डर्स का वध किया था। इसके बाद देश की सोई हुई सरकार और बहरी अंग्रेज हुकूमत को जगाने के लिए उन्होंने और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में बम फेंका। उनका उद्देश्य किसी की जान लेना नहीं, बल्कि पर्चे फेंककर अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाना था। गिरफ्तारी के बाद उन्होंने जेल में ऐतिहासिक भूख हड़ताल की और भारतीय राजनीतिक कैदियों के अधिकारों के लिए लंबी लड़ाई लड़ी। मात्र 23 साल की कम उम्र में 23 मार्च 1931 को हँसते-हँसते फाँसी के फँदे को चूमने वाले भगत सिंह आज भी देश के युवाओं के प्रेरणास्रोत और अमर नायक हैं।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस (1897-1945): ‘नेताजी’ के नाम से संपूर्ण विश्व में विख्यात सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को कटक (उड़ीसा) में हुआ था। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे आक्रामक और रणनीतिक रूप से निपुण नेताओं में से एक थे। उनका मानना था कि अंग्रेजों से भीख माँगकर नहीं, बल्कि सशस्त्र संघर्ष और बल प्रयोग करके ही पूर्ण स्वतंत्रता हासिल की जा सकती है। उन्होंने कॉन्ग्रेस के भीतर वैचारिक मतभेदों के बाद ‘फॉरवर्ड ब्लॉक’ की स्थापना की और अंग्रेजों द्वारा नजरबंद किए जाने के बावजूद अद्भुत साहस दिखाते हुए देश से बाहर निकल गए। नेताजी ने जर्मनी और जापान की सहायता से सुदूर पूर्व में ‘आज़ाद हिंद फ़ौज’ (Indian National Army) का पुनर्गठन किया और सिंगापुर में भारत की अस्थायी सरकार ‘अर्ह सरकार’ की स्थापना की। उन्होंने देशवासियों को ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा!’ और ‘दिल्ली चलो!’ जैसे ओजस्वी नारे दिए। उनकी यह सेना अंग्रेजों के खिलाफ सीधे युद्ध के मैदान में उतरी और अंडमान-निकोबार को अंग्रेजों से मुक्त कराकर वहाँ तिरंगा फहराया। भारत की आजादी में नेताजी का योगदान और उनका पराक्रम इतिहास का सबसे स्वर्णिम अध्याय है।

चंद्रशेखर आज़ाद (1906-1931): चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के भाबरा गाँव में हुआ था। वे बचपन से ही देश की आजादी के प्रति असीम जुनून रखते थे। जब वे मात्र 15 वर्ष के थे, तब उन्होंने महात्मा गाँधी के असहयोग आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया और ब्रिटिश पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए। अदालत में जब मजिस्ट्रेट ने उनका नाम पूछा, तो उन्होंने गर्व से अपना नाम ‘आजाद’, पिता का नाम ‘स्वातंत्र्य’ (स्वतंत्रता) और पता ‘जेलखाना’ बताया था। तभी से उनके नाम के साथ ‘आजाद’ शब्द हमेशा के लिए जुड़ गया। रामप्रसाद बिस्मिल्लाह और अन्य महान क्रांतिकारियों के बलिदान के बाद, चंद्रशेखर आजाद ने ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ (HRA) की कमान संभाली और इसका नाम बदलकर ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ (HSRA) किया। वे काकोरी ट्रेन एक्शन जैसे कई साहसिक क्रांतिकारी अभियानों के मुख्य योजनाकारों में शामिल थे। अंग्रेजों की नींद उड़ा देने वाले आजाद ने आजीवन कसम खाई थी कि पुलिस की गोलियाँ उन्हें कभी जिंदा नहीं पकड़ सकेंगी। आखिरकार, 27 फरवरी 1931 को अल्फ्रेड पार्क (इलाहाबाद) में अंग्रेजों से हुई अंतिम मुठभेड़ में उन्होंने अपनी पिस्तौल की आखिरी गोली खुद को मारकर मातृभूमि के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी, लेकिन अंग्रेजों के सामने कभी घुटने नहीं टेके।

मोदी सरकार की ब्रिटिश राज से तुलना

आरफा खानुम और उनके साथियों ने अपनी चर्चा में मोदी सरकार की तुलना भारत पर कब्जा करने वाले ब्रिटिश राज से कर डाली। इन लोगों ने बार-बार यह साबित करने की कोशिश की है कि आज की चुनी हुई सरकार बिल्कुल ब्रिटिश हुकूमत की तरह काम कर रही है। यह इन वामपंथियों की गहरी राजनीतिक कुंठा को साफ-साफ दिखाता है। देश की जनता इन्हें बार-बार चुनावों में धूल चटा चुकी है। जनता ने इन्हें पूरी तरह नकार दिया है। अब इन लोगों से अपनी हार बर्दाश्त नहीं हो रही है। इसलिए ये बौखलाकर देश के लोकतंत्र और संविधान पर ही सवाल उठाने लगे हैं।

हमारा भारतीय संविधान देश के हर एक नागरिक को खुलकर जीने और अधिकार देता है। लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि कोई भी उपद्रवी भीड़ सड़क पर उतर आए। इसका मतलब यह नहीं है कि भीड़ कानून को अपने हाथ में ले ले। यह हक किसी को नहीं है कि वह सरेआम पुलिसकर्मियों के सिर फोड़ दे और दंगा फैलाए। अंग्रेजों के शासनकाल में देशवासियों पर बेइंतहा जुल्म और अत्याचार किए जाते थे। तब भारत का नागरिक अपने ही देश में गुलाम था। लेकिन आज देश का हर नागरिक पूरी तरह स्वतंत्र है और आजाद हवा में सांस ले रहा है। आज देश में जनता के वोटों से चुनी हुई अपनी सरकार है, जिसको आरफा, तनुश्री जैसे वामपंथी पचा नहीं पा रहे हैं।

इन वामपंथियों और कट्टरपंथियों को सबसे बड़ी तकलीफ इस बात की है कि देश की जनता इनके चहेते राजनीतिक दलों को वोट नहीं देती है। जनता इन्हें देखना तक पसंद नहीं करती है। इसीलिए ये अपनी हार का बदला लेना चाहते हैं। ये सीधे रास्ते से सत्ता में नहीं आ पा रहे हैं। इसलिए अब ये सीधे-सीधे मासूम युवाओं को भड़का रहे हैं। ये युवाओं का इस्तेमाल करके देश में आग लगाना चाहते हैं। ये हर हाल में देश की सत्ता को पलटने की खतरनाक साजिश रच रहे हैं।

आरफा खानुम का पाखंड, महिलाओं की सुरक्षा का झूठा डर

आरफा खानुम ने चर्चा में दिल्ली को एक ऐसा “बदनाम शहर” बताया जहां महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं और सरकार पर डर का माहौल बनाने का आरोप लगाया। लेकिन सवाल यह है कि क्या आरफा खानुम कभी अपने ही मजहब और समाज के भीतर मुस्लिम महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों पर बोलती हैं? तीन तलाक और पर्दे की आड़ में महिलाओं के हकों पर डाका डालने वालों पर उनका मुँह क्यों सिल जाता है? देश में हिंदू लड़कियों को लव जिहाद के जाल में फँसाकर धर्मांतरण और उत्पीड़न की घटनाओं पर आरफा पूरी तरह मौन रहती हैं। और ये कहती हुई नजर आती है कि हिंदू लड़कियों को मुस्लिम लड़की ही क्यों पसंद आते हैं।

हाथरस से लेकर हिंदू विरोधी एजेंडे तक के कारनामे: तनुश्री पांडे का काला चिट्ठा

इस राउंडटेबल चर्चा में शामिल तनुश्री पांडे का पुराना रिकॉर्ड बहुत ही दागदार रहा है, जिसको वो शायद भूल चुकी है। इनका पूरा इतिहास देश और समाज के खिलाफ साजिश रचने का रहा है। इनके कारनामे बताते हैं कि ये किस खतरनाक और नफरती एजेंडे पर काम करती रही हैं।

हाथरस कांड के संवेदनशील समय में इन मोहतरमा तनुश्री ने अपनी हदें पार कर दी थीं। इन्होंने हाथरस की पीड़ित के परिवार को बार-बार फोन किया था। इन्होंने परिवार के लोगों को लगातार उकसाने का काम किया था। मृतका के भाई पर दबाव बना रही थी, कि जैसे वो कहे वैसा ही कहे। इसका एकमात्र मकसद इस गंभीर मामले को सांप्रदायिक रंग देना था। ये चाहती थीं कि देश में समाज के बीच नफरत की आग भड़क उठे।

तनुश्री पांडे पर हिंदू आस्था पर चोट करने के भी आरोप हैं। इन पर हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ आपत्तिजनक बातें कहने के गंभीर आरोप लगते रहे हैं। ये लोग हमेशा से बहुसंख्यक समाज की आस्था को ठेस पहुँचाने का काम करते आए हैं। इन्हें देश की संस्कृति और परंपराओं से हमेशा से नफरत रही है।

तनुश्री का एक और पुराना और काला सच जगजाहिर है। इनका जेएनयू के वामपंथियों के साथ पुराना और गहरा नाता रहा है। एक बार वे जेएनयू के वामपंथी उपद्रवियों को यह सिखाते हुए पकड़ी गई थीं कि कैमरे के सामने क्या बोलना है और कैसे झूठ फैलाना है।

तनुश्री ये भी कहती नजर आती है कि भारत में सवाल पूछे जाने पर आपको सजा मिलती है और अलग नजरिए से देखा जाता है। एक दो उदारहण भी ये बताती है। ये देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का झूठा ढिंढोरा पीटते हैं। लेकिन जब पाकिस्तान जैसे देश की बात आती है, तो ये एकदम गूंगे हो जाते हैं। पाकिस्तान में पत्रकारों की सरेआम हत्याएँ होती हैं। वहाँ विदेशी मीडिया पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा हुआ है। लेकिन पाकिस्तान के इन जुल्मों पर तनुश्री और इनके साथियों का मुँह कभी नहीं खुलता है।

कंगना रनौत के सांसद रहने पर तनुश्री और आरफा को हो रही खुजली

आरफा खानुम और तनुश्री पांडे जैसी वामपंथी महिला पत्रकारों ने अपनी इस राउंडटेबल चर्चा में कंगना रनौत को लेकर भी बातचीत की। इन दोनों ने देश की जानी-मानी अभिनेत्री और मंडी से लोकसभा सांसद कंगना रनौत को लेकर बेहद अशोभनीय और अपमानजनक टिप्पणियाँ की हैं। इन्होंने खुलेआम कंगना के सांसद के पद और उनके राजनीतिक रसूख पर सवालिया निशान खड़े किए हैं। इन तथाकथित पत्रकारों की मानसिकता इतनी गिरी हुई है कि ये एक राष्ट्रवादी और बेबाक महिला नेता को देखकर हमेशा बौखलाई रहती हैं।

आरफा खानुम ने वीडियो में कहा कि एक 15 साल की बच्ची को डरा-धमकाकर माफी मँगवाई गई है। तनुश्री ने तंज कसते हुए यहाँ तक कह दिया कि अगर कंगना रनौत उस बच्ची के साथ बैठकर बात कर लें, तभी वह मानेंगी कि कंगना सचमुच एक सांसद हैं। इन दोनों वामपंथी चेहरों को यह बात अच्छी तरह याद रखनी चाहिए कि वे सच्चाई को छिपा नहीं सकतीं। उस नाबालिग बच्ची ने खुद दुनिया के सामने यह स्वीकार किया था कि उसे कुछ राजनीतिक तत्वों और उपद्रवियों द्वारा बहला-फुसलाकर और उकसाया गया था। उस मासूम बच्ची से गलत हरकतें करवाई गई थीं ताकि देश का माहौल खराब किया जा सके।

कंगना रनौत ने उसी गंदी राजनीति का पुरजोर विरोध किया था जिसके तहत इन मासूम बच्चियों का ब्रेनवॉश किया जाता है। कंगना ने उस साजिश के खिलाफ आवाज उठाई थी जिसमें बच्चों को ढाल बनाकर अराजकता फैलाई जाती है। लेकिन इन वामपंथी महिला पत्रकारों को यह बात बिल्कुल बर्दाश्त नहीं होती है। इन्हें यह पचता ही नहीं है कि संसद में बैठी एक मजबूत और राष्ट्रवादी महिला सांसद खुलकर इनके पूरे प्रोपेगेंडा और एजेंडे की पोल खोल रही है। जब भी कोई महिला इनकी पोल खोलती है, तो ये अपनी बौखलाहट में व्यक्तिगत हमलों पर उतर आती हैं। यह इनकी दोहरी मानसिकता का सबसे बड़ा और जीता-जागता सबूत है।

वामपंथी इकोसिस्टम का एकमात्र काम

यह पूरा वीडियो इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि भारत में एक ऐसा इकोसिस्टम सक्रिय है जो देश की प्रगति को पचा नहीं पा रहा है। आरफा खानुम, श्याम मीरा सिंह, तनुश्री पांडे और अनमोल जैसे चेहरे पत्रकारिता की आड़ में देश के युवाओं में जहर घोलने का काम कर रहे हैं। इनका उद्देश्य केवल देश में अराजकता फैलाना और अपने वैचारिक आकाओं को खुश करना है। झारखंड पेपर लीक मामले में इनका मुँह बंद था और बंद हो चुके सीजेपी प्रदर्शन पर अभी भी अपनी रोटियाँ सेक रहे हैं और पैसा कमा रहे हैं। इनके पास विषय केवल ‘विष’ (जहर) फैलाने का रह गया है और मोदी सरकार को कोसने का रह गया है। जब तक ये पूरे दिन में केंद्र सरकार की खामियाँ नहीं गिना देते, तब तक इनके अंदर की खुजली खत्म नहीं होती है।

वांगचुक ने 26 दिन भूख हड़ताल कर राहुल गाँधी को दिया राजनीतिक वापसी का मौका, लेकिन उनके अहंकार ने सब चौपट कर दिया

दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के विरोध प्रदर्शन के दौरान 26 दिनों की भूख हड़ताल करके राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरने वाले सोनम वांगचुक ने कहा है कि वे चाहते थे कि विपक्ष के नेता राहुल गाँधी उनकी भूख हड़ताल तुड़वाएँ। वांगचुक ने बताया कि उनकी पत्नी गीतांजलि अंगमो ने राहुल गाँधी से अनशन तुड़वाने को लेकर बातचीत की थी। हालाँकि, कॉन्ग्रेस नेता ने कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी।

‘इंडिया टुडे’ से बात करते हुए सोनम वांगचुक ने कहा, “दरअसल, हम विपक्ष के नेता राहुल गाँधी के माध्यम से अपना अनशन तुड़वाने पर विचार कर रहे थे और गीतांजलि इस पर काम कर रही थीं। वह राहुल गाँधी के खिलाफ नहीं थीं। वह इस पर कड़ी मेहनत कर रही थीं कि क्या राहुल गाँधी मेरा अनशन तुड़वा सकते हैं। हालाँकि, उन्हें सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली।”

लद्दाख के एक्टिविस्ट वांगचुक ने कहा कि राहुल गाँधी को अपना अनशन खत्म करने के लिए मनाने की कोशिशों को लेकर उनकी बेरुखी का यह किस्सा बताना जरूरी है। और ऐसा इसलिए क्योंकि बाद में कॉन्ग्रेस नेतृत्व की आलोचना करने पर गीतांजलि आंगमो को कॉन्ग्रेस समर्थकों ने जमकर ट्रोल किया था।

सोनम वांगचुक ने 24 जुलाई 2026 को मेदांता अस्पताल में केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह की उपस्थिति में अपनी भूख हड़ताल समाप्त की थी।

क्या वांगचुक चाहते थे कि उनके आंदोलन का सियासी फायदा राहुल गाँधी को मिले?

सोनम वांगचुक लगातार कहते रहे हैं कि उनकी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं है और सरकार से जवाबदेही तय करने की माँग को लेकर किया गया उनका अनशन केवल जिम्मेदारी निभाने का एक प्रयास था। हालाँकि, वांगचुक इस बात को लेकर भी चिंतित थे और काफी दिलचस्पी ले रहे थे कि उनका अनशन किस तरह खत्म हो और इसे राजनीतिक तौर पर किस नजरिए से देखा जाए।

वांगचुक ने कहा था कि वह चाहते थे कि उनके अनशन की समाप्ति को सत्ता पक्ष, विपक्ष और छात्र नेताओं से जुड़े लोगों की संयुक्त कोशिश के तौर पर पेश किया जाए।

यह साफ है कि सोनम वांगचुक की उठाई गई माँगों को राहुल गाँधी पूरा नहीं कर सकते थे। तर्क यही कहता है कि वांगचुक का अनशन तभी खत्म हो सकता था जब वह खुद इसे खत्म करने का फैसला लेते, उन्हें जबरन खाना-पानी दिया जाता या सरकार उनकी माँगों पर विचार करने के लिए तैयार होती। न तो कोई छात्र नेता और न ही लोकसभा में विपक्ष के नेता ऐसा कर सकते थे।

सोनम वांगचुक अब जिस ‘संयुक्त प्रयास’ के तौर पर अनशन खत्म होने की बात कर रहे हैं, उससे आगे एक सवाल उठता है कि क्या सोनम वांगचुक CJP-वांगचुक आंदोलन का सियासी फायदा राहुल गाँधी को सौंपना चाहते थे और खुद के लिए एक ऐसी सम्मानजनक विदाई का रास्ता बनाना चाहते थे, जिसमें वह नायक की तरह बाहर निकलते?

सोनम वांगचुक ने एक लद्दाखी परंपरा का भी जिक्र किया था। इसके मुताबिक, जो व्यक्ति किसी को पानी, जूस या सूप देता है या औपचारिक तौर पर अनशन तुड़वाता है, वह उस फैसले की स्वीकृति, नैतिक समर्थन या उसके नतीजे की साझा जिम्मेदारी का संकेत देता है।

सोनम वांगचुक के साथ क्रेडिट बाँटने के बजाय आंदोलन की राजनीतिक बढ़त हथियाने की कोशिश में रहे राहुल

सोनम वांगचुक शायद अपने अनशन को खत्म करने के लिए ऐसा रास्ता चाहते थे, जिसमें सरकार, विपक्ष और दूसरे पक्षों की साझा सहमति दिखे। लेकिन राहुल गाँधी जैसे नेता के लिए यह तस्वीर बहुत फायदेमंद नहीं होती क्योंकि उनकी राजनीतिक पहचान मुख्य विपक्षी चेहरे के तौर पर बनी हुई है।

शायद यही वजह है कि राहुल गाँधी ने गीतांजलि आंगमो की उस कोशिश पर सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी जिसमें वह उनसे सोनम वांगचुक का अनशन खत्म करवाने की अपील कर रही थीं। इसके बजाय राहुल गाँधी ने सही समय देखकर अलग से एक और आंदोलन का रास्ता चुना।

सोनम वांगचुक ने 28 जून 2026 को NEET पेपर लीक के मुद्दे पर भूख हड़ताल शुरू की थी। कई दिन बीत गए लेकिन ऑनलाइन बयानबाजी के अलावा उन्हें किसी बड़े राजनीतिक दल का खास समर्थन नहीं मिला। संसद का मानसून सत्र करीब आने के बाद ही विपक्ष के प्रमुख नेताओं का जंतर-मंतर पहुँचना शुरु हुआ। इनमें सपा की डिंपल यादव, आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर आजाद और AAP के अरविंद केजरीवाल शामिल थे।

राहुल गाँधी का चुनावी प्रदर्शन लगातार निराशाजनक रहा है। इसके बावजूद वह और उनकी पार्टी ऐसे मुद्दों की तलाश करते रहते हैं जिनके सहारे कोई चमत्कार हो और राहुल गाँधी केवल सोशल मीडिया के अभियानों में नहीं बल्कि वास्तव में एक ‘जननायक’ के रूप में स्थापित हो सकें।

हालाँकि, राहुल गाँधी पूरे CJP आंदोलन से दूरी बनाए रहे और उनका समर्थन केवल दिखावे तक सीमित रहा। चल रहे CJP आंदोलन में शामिल होने या उसे खुलकर मजबूत करने के बजाय राहुल गाँधी ने जानबूझकर अलग रास्ता अपनाया। कॉन्ग्रेस ने ‘छात्रों की गूंज’ नाम से छात्र संपर्क अभियान शुरू किया और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की वही माँग अपने मंच से उठाई, जो CJP भी कर रहा था।

CJP के आंदोलन में पूरी तरह शामिल होने के बजाय उससे दूरी बनाए रखने के फैसले को लेकर कॉन्ग्रेस को बीजेपी विरोधी खेमे से भी आलोचना झेलनी पड़ी। 20 जुलाई को जब CJP ने संसद की ओर अपना घोषित ‘चलो संसद’ मार्च शुरू किया, उसी दिन राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस नेताओं ने CJP की माँगों को लेकर अलग से प्रदर्शन किया।

राहुल गाँधी के इस प्रदर्शन का समय भी काफी दिलचस्प था। कॉन्ग्रेस समर्थकों का कहना है कि गाँधी ने संसद का सत्र शुरू होने का इंतजार किया ताकि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग को और तेज किया जा सके। लेकिन कॉन्ग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास के बाहर प्रदर्शन किया।

अगर कॉन्ग्रेस को सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी के घर के बाहर प्रदर्शन करना था, तो वह यह बहुत पहले भी कर सकती थी। लेकिन ऐसा लगता है कि कॉन्ग्रेस और राहुल गाँधी ने पहले CJP के आंदोलन के जोर पकड़ने, मोदी सरकार के खिलाफ उसे व्यापक जनसमर्थन मिलने और फिर 20 जुलाई को आंदोलन के चरम पर पहुँचने का इंतजार किया। इसके बाद राजनीतिक बढ़त अपने हाथ में लेने की कोशिश की गई।

प्रदर्शन की जगह का चुनाव भी सोच-समझकर किया गया था। कॉन्ग्रेस CJP के आंदोलन में सहयोगी की भूमिका नहीं निभाना चाहती थी जिसमें समाजवादी पार्टी और बीजेपी विरोधी दूसरे दलों के कार्यकर्ता भी साफ तौर पर शामिल थे।

सोनम वांगचुक के इस खुलासे के बाद कि वह चाहते थे कि राहुल गाँधी उनका अनशन तुड़वाएँ और कॉन्ग्रेस नेता ने कथित तौर पर ऐसा करने से इनकार कर दिया, कई लोगों ने कहा कि गाँधी ने एक बड़ा मौका गँवा दिया। उनके पास CJP-वांगचुक के नेतृत्व वाले उस आंदोलन का स्वाभाविक राजनीतिक चेहरा बनने का मौका था, जिसे युवाओं के बीच व्यापक ध्यान मिल रहा था।

हालाँकि, राहुल गाँधी इस तरह काम नहीं करते। अपने राजनीतिक करियर में राहुल गाँधी कई बार खुद को नए तरीके से पेश करने की कोशिश कर चुके हैं लेकिन इनमें से किसी भी कोशिश में उन्होंने बाहरी ताकतों के सहारे आगे बढ़ना या किसी और के मोदी सरकार विरोधी आंदोलन में सहयोगी की भूमिका निभाना पसंद नहीं किया।

CJP के आंदोलन की राजनीतिक बढ़त अपने हाथ में लेने की राहुल गाँधी की पूरी कोशिश के पीछे मकसद श्रेय बाँटने से बचना था। ऐसा इसलिए क्योंकि आंदोलन इतना बड़ा हो चुका था कि केंद्र सरकार को रियायतें देनी पड़ सकती थीं, भले ही वह CJP के हिंसक सड़क आंदोलन के दबाव के आगे पूरी तरह न झुके।

कॉन्ग्रेस लंबे समय से भारत में नेपाल जैसी हिंसक सत्ता परिवर्तन की स्थिति की इच्छा रखती रही है। शायद यही वजह थी कि जब उसे लगा कि ऐसा सपना सच होने की संभावना बन सकती है, तब वह इस पूरे घटनाक्रम से पूरी तरह बाहर नहीं रहना चाहती थी।

इसे छोटा राजनीतिक अहंकार कहें या राजनीतिक स्वार्थ, कॉन्ग्रेस और राहुल गाँधी अक्सर किसी सरकार विरोधी आंदोलन के बड़ा होने का इंतजार करना और फिर उसकी राजनीतिक बढ़त अपने हाथ में लेना पसंद करते हैं। कॉन्ग्रेस के लिए CJP जैसे संगठन जिसे आम आदमी पार्टी की ‘B-टीम’ बताया गया है द्वारा खड़े किए गए आंदोलन में सहयोगी की भूमिका निभाने का मतलब यह स्वीकार करना होता कि वह युवाओं से जुड़े इस मुद्दे को खुद प्रभावी तरीके से नहीं उठा पाई और अब केवल राजनीतिक फायदा लेने के लिए उसका समर्थन कर रही है।

कॉन्ग्रेस एक राष्ट्रीय पार्टी है और लगातार तीन लोकसभा चुनावों में झटके लगने के बावजूद खुद को BJP के मुख्य विपक्ष के तौर पर पेश करती रही है। ऐसे में उसके लिए यह ‘मुख्य विपक्ष’ का दर्जा खोना बड़ा नुकसान होगा क्योंकि इसके बाद पार्टी के पूरी तरह राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक होने का खतरा बढ़ जाएगा।

भारत-म्यांमार बॉर्डर पर होगी जमीन की अदला-बदली, 171 KM सीमा अब भी तय होना बाकी: समझिए क्यों जरूरी है सीमांकन और फेंसिंग

भारत अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने के साथ-साथ उन हिस्सों में सीमा तय करने का काम भी आगे बढ़ा रहा है, जो कई दशकों से लंबित हैं। इसी कड़ी में केंद्र सरकार मणिपुर से लगी भारत-म्यांमार सीमा के एक छोटे से हिस्से को लेकर जमीन की अदला-बदली के प्रस्ताव पर विचार कर रही है। इसमें करीब 1.4 वर्ग मील यानी लगभग 3.6 वर्ग किलोमीटर जमीन शामिल है।

विदेश मंत्रालय ने भी माना है कि भारत-म्यांमार सीमा के कुछ हिस्सों को लेकर दोनों देशों के बीच बातचीत चल रही है। ऐसे में जमीन की संभावित अदला-बदली को सीमा से जुड़े पुराने विवादों और अस्पष्टता को खत्म करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

आखिर क्या है भारत-म्यांमार सीमा पर जमीन की अदला-बदली का प्रस्ताव?

भारत और म्यांमार के बीच लगभग 1643 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है जो अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मिजोरम से होकर गुजरती है। दोनों देशों के बीच आज भी करीब 171 किलोमीटर क्षेत्र ऐसा है जिसका फाइनल सीमांकन नहीं हो सका है।

यही वजह है कि कुछ स्थानों पर बाउंड्री पिलर्स और वास्तविक सीमा रेखा को लेकर तकनीकी विवाद बने हुए हैं। The Diplomat की रिपोर्ट में दावा किया गया था कि भारत सरकार मणिपुर के चंदेल जिले में सीमा स्तंभ संख्या 65 से 68 के बीच स्थित लगभग 1.4 वर्ग मील क्षेत्र के आदान-प्रदान के प्रस्ताव पर विचार कर रही है।

सरकार का यह भी कहना है कि भारत और म्यांमार के बीच कोई व्यापक सीमा विवाद नहीं है। मौजूदा अंतरराष्ट्रीय सीमा 1967 के द्विपक्षीय समझौते पर आधारित है। केवल कुछ सीमा स्तंभ और सीमांकन वाले हिस्से ऐसे हैं जिनका अंतिम निर्धारण अभी होना बाकी है। इन्हें द्विपक्षीय तंत्र के माध्यम से सुलझाया जा रहा है।

सीमा निर्धारण से जुड़े जिन क्षेत्रों को सबसे अधिक संवेदनशील माना जाता है उनमें मोलचाम सेक्टर (सीमा स्तंभ 64-68), मोरेह सेक्टर (75-79) और चोरो खुनौ सेक्टर (88-95) शामिल हैं। प्रस्तावित भूमि अदला-बदली भी इन्हीं संवेदनशील इलाकों में से एक मोलचाम-चंदेल क्षेत्र से जुड़ी बताई जा रही है।

भारत इस प्रस्ताव पर विचार क्यों कर रहा है?

भारत-म्यांमार सीमा देश की सबसे संवेदनशील सीमाओं में से एक है। इसका बड़ा हिस्सा घने जंगलों, पहाड़ों और दूर-दराज के इलाकों से गुजरता है। सीमा के दोनों तरफ एक ही जनजातीय समुदाय के लोग रहते हैं और इसलिए लंबे समय तक यहाँ लोगों की आवाजाही आम बात रही।

लेकिन 2021 में म्यांमार में सैन्य तख्तापलट और उसके बाद शुरू हुए गृहयुद्ध ने भारत के लिए सुरक्षा की नई चुनौतियाँ खड़ी कर दीं। बड़ी संख्या में घुसपैठिए भारत आए। इसके साथ ही अवैध घुसपैठ, हथियारों और ड्रग्स की तस्करी और उग्रवादी संगठनों की आवाजाही को लेकर भी चिंता बढ़ी हैं।

इसी को देखते हुए केंद्र सरकार ने 1,643 किलोमीटर लंबी भारत-म्यांमार सीमा पर फेंसिंग करने का फैसला किया। फरवरी 2024 में गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि सीमा पर बाड़ के साथ पेट्रोलिंग ट्रैक भी बनाया जाएगा।

सरकार ने फ्री मूवमेंट रेजीम (FMR) भी खत्म कर दिया। इसके तहत सीमा के दोनों तरफ रहने वाले जनजातीय लोग बिना वीजा 16 किलोमीटर तक आ-जा सकते थे।

हालाँकि, सीमा पर फेंसिंग का काम आसान नहीं रहा। कई जगह बाड़ को नुकसान पहुँचाने, सामग्री चोरी होने और दूसरी बाधाओं की घटनाएँ सामने आई हैं। ऐसे में सरकार सीमा के बचे हुए हिस्सों का स्थायी समाधान चाहती है ताकि फेंसिंग और निगरानी का काम पूरा किया जा सके।

मणिपुर में क्यों शुरू हुआ विरोध और सरकार का आधिकारिक रुख क्या है?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत-म्यांमार सीमा पर संभावित भूमि अदला-बदली की खबर सामने आने के बाद मणिपुर में राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर विरोध भी देखने को मिला।

राज्य की प्रमुख सामाजिक संस्था कोऑर्डिनेटिंग कमेटी ऑन मणिपुर इंटीग्रिटी (COCOMI) ने इस प्रस्ताव पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि मणिपुर की भौगोलिक अखंडता से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं किया जाना चाहिए।

COCOMI का तर्क है कि मणिपुर की वर्तमान सीमाएँ वर्षों के ऐतिहासिक और प्रशासनिक विकास का परिणाम हैं। संगठन ने दावा किया कि राज्य पहले भी अपने ऐतिहासिक भूभाग का कुछ हिस्सा खो चुका है और अब किसी भी नए सीमा परिवर्तन को स्वीकार नहीं किया जाएगा। संस्था ने केंद्र सरकार से अपील की कि राज्य की जनता की सहमति के बिना ऐसा कोई निर्णय न लिया जाए।

हालाँकि, विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि भारत और म्यांमार के बीच कोई व्यापक सीमा विवाद नहीं है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, सीमा के कुछ हिस्सों का सीमांकन अभी बाकी है और उन्हीं क्षेत्रों को लेकर बातचीत चल रही है। सरकार का कहना है कि इस प्रक्रिया का उद्देश्य वर्षों से लंबित सीमा निर्धारण को पूरा करना है ताकि भविष्य में सीमा प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था को और प्रभावी बनाया जा सके।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देशों के बीच पेंडिंग डिमार्केशन का समाधान हो जाता है तो भारत के लिए पूरे सीमा क्षेत्र में फेंसिंग, निगरानी और गश्त का काम काफी आसान हो जाएगा।

इससे अवैध घुसपैठ, हथियारों की तस्करी, मादक पदार्थों के कारोबार और सीमा पार सक्रिय उग्रवादी संगठनों की गतिविधियों पर भी अधिक प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया जा सकेगा। यही कारण है कि केंद्र सरकार सीमा सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा के व्यापक दृष्टिकोण से देख रही है।

2015 में भारत और बांग्लादेश के बीच भी हुआ था भूमि सीमा समझौता

यदि भविष्य में भारत और म्यांमार के बीच किसी प्रकार का भूमि सीमा समझौता होता है, तो यह भारत के लिए कोई नया अनुभव नहीं होगा। इससे पहले वर्ष 2015 में भारत और बांग्लादेश ने दशकों पुराने सीमा विवाद को समाप्त करते हुए ऐतिहासिक Land Boundary Agreement (LBA) लागू किया था।

इस समझौते के तहत भारत ने बांग्लादेश में स्थित अपने 111 एन्क्लेव, जबकि बांग्लादेश ने भारत के भीतर मौजूद 51 एन्क्लेव भारत को सौंपे। कुल 162 एन्क्लेव के आदान-प्रदान के साथ दोनों देशों ने चार दशक से अधिक समय से चले आ रहे सीमा विवाद का अंत किया।

क्षेत्रफल के लिहाज से भारत के लगभग 17160 एकड़ क्षेत्र वाले 111 एन्क्लेव बांग्लादेश में शामिल हुए, जबकि बांग्लादेश के करीब 7110 एकड़ क्षेत्र वाले 51 एन्क्लेव भारत का हिस्सा बने।

इस समझौते का सबसे बड़ा लाभ उन हजारों लोगों को मिला जो सालों तक एन्क्लेव में रहते हुए भी बुनियादी सरकारी सुविधाओं से वंचित थे। समझौते के बाद लोगों को भारत या बांग्लादेश की नागरिकता चुनने का अधिकार दिया गया।

उस समय उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार, बांग्लादेश में स्थित भारतीय एन्क्लेव में लगभग 37 हजार लोग जबकि भारत में स्थित बांग्लादेशी एन्क्लेव में करीब 14 हजार लोग रह रहे थे। प्रभावित लोगों के पुनर्वास के लिए भारत सरकार ने 3048 करोड़ रुपए का विशेष पैकेज भी स्वीकृत किया था।

हालाँकि भारत-बांग्लादेश भूमि सीमा समझौते और भारत-म्यांमार से जुड़ी मौजूदा चर्चाओं में एक महत्वपूर्ण अंतर भी है। बांग्लादेश के साथ समझौता वर्षों से अस्तित्व में रहे एन्क्लेव और नागरिकों की प्रशासनिक समस्याओं के समाधान के लिए किया गया था जबकि म्यांमार से जुड़ी मौजूदा चर्चा का मुख्य उद्देश्य सीमा के लंबित हिस्सों का सीमांकन, प्रभावी फेंसिंग और राष्ट्रीय सुरक्षा को और मजबूत करना बताया जा रहा है।

क्या होता है एम्बर, 6.5 करोड़ साल टाइमलाइन शिफ्ट का क्या मतलब है: समझिए चीन में मिला ‘जीवाश्म कैप्सूल’ क्यों है इतना खास

चीन में दुनिया का सबसे पुराना एम्बर मिला है जो अनुमान से 385 मिलियन साल पुराना है। इससे पहले 320 साल पुराना जीवाश्म कैप्सूल सबसे पुराना माना जाता था। नया कैप्सूल 65 मिलियन साल यानी 6.5 करोड़ वर्ष से ज्यादा पुराना है। एम्बर को अक्सर प्रकृति का ‘टाइम कैप्सूल’ कहा जाता है। दरअसल इसमें करोड़ों साल पहले के पेड़-पौधों, कीड़ों, परागकणों, फंगस, बैक्टीरिया और कभी-कभी छोटे जीवों के अवशेष लगभग उसी रूप में सुरक्षित रह जाते हैं। वैज्ञानिक इनका अध्ययन करके यह समझते हैं कि करोड़ों साल पहले पृथ्वी का वातावरण कैसा था, कौन कौन से जीव-जन्तु थे, कैसे थे। जंगल-जमीन और जलवायु कैसे थे।

क्या होता है एम्बर

दरअसल एम्बर वास्तव में जीवाश्म युक्त पेड़ की रेजिन (Resin) है। यह एक तरह से पेड़ का सुरक्षा कवच है यानी जब पेड़ की छाल निकल जाती है या उस पर कीड़े हमला करते हैं, तब पेड़ चिपचिपा रेजिन निकालता है। इससे फूलों के परागकण से लेकर छोटे छोटे कीड़े मकोड़े तक फँस जाते हैं। जब यह जमीन पर गिरता है, तो साल दर साल उस पर आवरण जमने लगता है।

लाखों सालों तक जमीन के नीचे दबने और रासायनिक बदलाव के बाद यह कठोर होकर एम्बर बन जाता है। दरअसल रेजिन पेड़ों के रस से अलग होता है क्योंकि रस पेड़ को पोषण देता है जबकि रेजिन पेड़ की रक्षा करता है। यह पुराने पेड़ों में चिपचिपा पदार्थ के रूप में पेड़ को चोट लगने पर बाहर निकलता है। चिपचिपा होने की वजह से ही इसमें परागकण, कीड़े, बीज आदि फँसते हैं। चूकिं इसके अंदर ऑक्सीजन नहीं पहुँचता, हवा-पानी नहीं लगता और किसी तरह का परिवर्तन नहीं होता है, तो वह जीवों के अवशेष के रूप में पूरी तरह सुरक्षित रहता है।

एम्बर को ‘टाइम कैप्सूल’ क्यों कहते हैं?

लाखों साल बाद भी कीड़ों-मकोड़ों, पेड़-पौधों के अवशेष अपने वास्तविक रूप में जब वैज्ञानिकों को मिलते हैं तो उन पर रिसर्च में कई बातों का पता चलता है। चूकि ये मानव निर्मित न होकर पूरी तरह प्राकृतिक तौर पर बनते हैं। मान लीजिए 5 करोड़ साल पहले कोई मच्छर किसी पेड़ के रेजिन में फँस गया।

रेजिन इतना चिपचिपा होता है कि मच्छर बाहर नहीं निकल पाया। वह वही जम कर मर गया। धीरे धीरे रेजिन कड़ा होकर जमीन पर गिर गया। चूकि वहाँ ऑक्सीजन नहीं पहुँच पा रहा है। फंग्स या बैक्टीरिया भी उसका नुकसान नहीं कर पा रहा। लाखों साल बाद यह मच्छर का अवशेष बता देंगा कि उसकी प्रजाति क्या थी, किस पेड़ का रेजिन है। उस वक्त जलवायु कैसी थी। उसके साथ अगर पराणकण भी मौजूद है तो ये भी पता चल जाएगा कि किस तरह के पौधे उस वक्त होते थे और सबसे अहम की ये कितना साल पुराना है। इसलिए एम्बर को प्राकृतिक ‘टाइम कैप्सूल’ कहा जाता है।

वैज्ञानिकों को इसी तरह के टाइम कैप्सूल से डायनासोर का भी पता चला। वैज्ञानिकों को एम्बर में डायनासोर के पंख, छिपकली की पूंछ, छोटे मेंढक, मकड़ियाँ, चींटियाँ, मधुमक्खियाँ, फूलों के बीज और परागकण, फूलों के पंखुड़ी, फलों के बीज आदि मिलते रहे हैं। इससे लाखों साल पुरानी पृथ्वी की पारिस्थितिकी तंत्र को समझने में बड़ी मदद मिली है।

चीन में मिला 385 मिलियन साल पुराना एम्बर

अब तक पेड़ों के रेजिन के बने कैप्सूल से एम्बर मिले थे, लेकिन साइंस एडवासेंज में प्रकाशित नए रिसर्च में पता चला है कि चीन में 385 मिलियन साल पुराने चट्टानों के अंदर से जीवाश्म युक्त रेजिन मिले हैं। ‘द अर्लियेस्ट एम्बर फ्रॉम द मिडिल देवोनियन ऑप चीन’ शीर्षक से छपे इस रिसर्च में बताया गया है कि पृथ्वी के शुरुआत में कुछ पौधों ने रेजिन उत्पादन करने वाला सिस्टम विकसित कर लिया था जिससे पौधों को लेकर नया दृष्टिकोण मिलता है कि पृथ्वी पर पौधों का विकास किस तरह हुआ है। यह एम्बर अब तक खोजा गया सबसे पुराना एम्बर है। वैज्ञानिकों को अब लगता है कि पृथ्वी पर रेज़िन बनाने वाले पेड़ पहले सोचे गए समय से भी बहुत पहले मौजूद थे। यह बदलाव पृथ्वी के जंगलों के विकास का इतिहास बदल सकता है।

हाल ही में चीन के शिनजियांग में मध्य देवोनियन काल के सैकड़ों एम्बर कोयले के खदानों में मिले। अधिकांश का आकार 0.1-0.5 मिलीमीटर के बीच था, लेकिन इसका सबसे बड़ा एम्बर 1.5 मिलीमीटर का था, हालाँकि ये अब तक मिले एम्बर की तुलना में काफी छोटा था।

हाल के कुछ शोधों में वैज्ञानिकों ने पाया कि रेजिन बनाने वाले जंगलों (Amber forests) का इतिहास पहले की तुलना में कहीं अधिक पुराना है। पहले माना जाता था कि बड़े पैमाने पर एम्बर बनने की शुरुआत लगभग 320–300 मिलियन वर्ष पहले (Late Carboniferous) हुई। नई खोजों से पता चलता है कि रेजिन उत्पादन और एम्बर बनने की शुरुआत का समय पहले की सोच से लगभग 65 मिलियन वर्ष पहले होता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, देवोनियन चट्टानों से पहले जो रेजिन मिले थे, उस सेंपल में यह पुष्टि नहीं हो पाई थी ये वास्तविक एम्बर थे। लेकिन अब चट्टानों में मिले एम्बर से पता चला है कि ये वास्तविक एम्बर हैं यानी जितना सोचा था उससे करीब 65 मिलियन साल पुराना। इसलिए कहा जा रहा है कि एम्बर का 65 मिलियन साल टाइमलाइन शिफ्ट हो गया है।

लेट कार्बोनिफेरस पीरियड क्या है?

पृथ्वी पर लगभग 323 से 299 मिलियन साल पहले (Late Carboniferous Period) इतिहास का वह दौर था जब दलदली जंगल हुआ करते थे। पेड़ 30–40 मीटर तक ऊँचे होते थे। ऑक्सीजन की प्रचूरता ज्यादा थी। आज से करीब 30-35 फीसदी ज्यादा ऑक्सीजन धरती पर मौजूद थी। इसलिए कीड़े मकोड़े भी बड़े बड़े मिलते थे। घने और ऊँचे जंगलों के जमीन में दबने और हजारों सालों बाद कोयले में परिवर्तित होने की वजह से इस वक्त को कार्बोनिफेरस पीरियड कहा गया। इस वक्त दलदली जंगलों की वजह से सरीसृप प्राणी ज्यादा मिलते थे।

डेवोनियन पीरियड क्या है?

आज से लगभग 419 से 359 मिलियन वर्ष पहले (Devonian Period) पृथ्वी पर पेड़ विकसित हुए और घने जंगल बने। सामान्य बीज वाले पौधे आए और कुछ जीव पहली बार जमीन पर रहने लगे। यानी समुद्र से निकलकर दलदली इलाकों में रहने वाले एम्फीबियन यानी उभयचर विकसित हुए। इस वक्त समुद्रों में मछलियों की बहुत अधिक विविधता थी। इसलिए इसे अक्सर ‘Age of Fishes’ कहा जाता है। ये वह वक्त था जब बड़े बड़े पेड़ों की अधिकता से घने जंगलों का बड़े पैमाने पर विकास हुआ।

उस वक्त बार बार लगने वाले जंगलों की आग भी अहम थी। ऐसे में पारिस्थितकी तंत्र पर दबाव बना और इसमे बदलाव आए। माना जाता है कि इस वक्त ही पौधों में रेजिन जैसे पदार्थ का विकास हुआ जो उन्हें लगने वाले घावों से बचा सकें। आग में पौधों को क्षतिग्रस्त होने के बाद बनने वाले घावों को भरने में मदद मिली क्योंकि इस पर कीटों का वार होता था और वह पेड़ सड़ जाते थे। रेजिन इन सब से पेड़ों को बचाता था।

रेजिन इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

रेज़िन केवल पेड़ के लिए ही सुरक्षा कवच नहीं है, बल्कि यह वैज्ञानिकों के लिए भी अनमोल धरोहर की तरह है। पेड़ की सुरक्षा करना, चोट लगने पर घाव भरना, कीड़ों को चोट वाले स्थान से दूर रखना, वायरस-बेक्टिरिया से बचाना इसका काम तो है ही। ये जीवाश्म संरक्षण में अहम योगदान देता है। अगर रेजिन नहीं हो, तो बड़े बड़े पेड़ सड़ जाएँगे। उनमें जरा सी खरोंच आने पर उनका बचना मुश्किल हो जाता।

वैज्ञानिकों को एम्बर नहीं मिल पाता क्योंकि कीड़े सड़ जाते, पराणकण और फूलों के हिस्से सड़ जाते, छोटे जीव के अवशेष नहीं बचते। रेजिन के कारण ही लाखों-करोड़ों साल पुराने छोटे जीव जन्तुओं और पौधों के अंश सुरक्षित रहते हैं। इससे पृथ्वी पर हुए विकासवाद (Evolution) को समझना आसान हो जाता है। एम्बर में सुरक्षित जीव बताते हैं कि कौन-सी प्रजातियाँ कब विकसित हुईं, उनका रूप समय के साथ कैसे बदला, किन पौधों और कीड़ों के बीच सह-विकास (co-evolution) हुआ।

एम्बर केवल एक सुंदर पीला अनमोल रत्न नहीं है, बल्कि पृथ्वी के करोड़ों वर्षों के इतिहास का प्राकृतिक अभिलेख है। पेड़ इसे अपनी सुरक्षा के लिए निकालते हैं और यह पारिस्थिति तंत्र को संरक्षित कर लेता है क्योंकि रेजिन समय के साथ जीवाश्म युक्त एम्बर बनता है और अपने भीतर उस वक्त के कीट, पौधे, परागकण, सूक्ष्मजीव और पर्यावरण की जानकारी सुरक्षित रह जाती है। इसी वजह से इसे ‘प्राकृतिक टाइम कैप्सूल’ कहा जाता है।

‘फ्लाइट का इंजन हवा में बंद…’ केजरीवाल जिस डर को बेच चमका रहे राजनीति, समझिए उस SAF का पूरा विज्ञान; कितनी खतरनाक है E50 के नाम पर ‘गाड़ी ना खरीदने’ की अपील

‘आपकी फ्लाइट का इंजन हवा में ही बंद हो सकता है।’… इस तरह की बातें सुनना कितना भयावह लग लग सकता है? लेकिन सोचिए भारत की जनता को यह डर राजनीति के नाम पर बेचा जा रहा है और ऐसा कर रहे हैं दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी (AAP) के मुखिया अरविंद केजरीवाल। इतना ही नहीं, वो लोगों से यहाँ तक अपील कर रहे हैं कि पेट्रोल और डीजल की नई गाड़ियाँ ना खरीदें। ऐसा होने पर ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री का क्या होगा, इसका आप अनुमान लगा लीजिए।

केजरीवाल ने गुरुवार (6 अगस्त 2026) सुबह X पर एक पोस्ट में लिखा, “सूत्रों के मुताबिक, मोदी सरकार एविएशन टर्बाइन फ्यूल यानी ATF में एथेनॉल मिलाने की योजना बना रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे उड़ानों की सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ सकता है।”

बस कुछ ही देर में केजरीवाल ने अपने इस प्रोपेगेंडा को आगे बढ़ाते हुए X पर एक आर्टिकल शेयर करते हुए लिखा, “यह आर्टिकल पढ़ें। आपकी फ्लाइट का इंजन हवा में ही बंद हो सकता है। क्या आप मिलावटी एविएशन फ्यूल से चलने वाले एयरक्राफ्ट में उड़ने का रिस्क लेंगे? एक पढ़ी-लिखी और काबिल सरकार का समय आ गया है भारत ने एविएशन फ्यूल में एथेनॉल मिलाने की इजाजत दी।”

हालाँकि, अगर अरविंद केजरीवाल ने शेयर करने से पहले अगर 23 अप्रैल 2026 का यह आर्टिकल खुद पढ़ लिया होता तो वह यह सब लिखने का जोखिम ना उठाते। खैर, हम यह समझने की कोशिश करते हैं कि क्या सचमुच विमान के टैंक में एथेनॉल मिलाकर यात्रियों की जान जोखिम में डालने की तैयारी हो रही है? जवाब जानने के लिए हमें राजनीति के शोर से थोड़ा बाहर निकलकर एविएशन फ्यूल को समझना होगा।

क्या है सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल?

भारत में जिस बदलाव की बात हो रही है, उसका संबंध सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (Sustainable Aviation Fuel – SAF) से है। SAF कोई ऐसा ‘मिलावटी तेल’ नहीं है जिसे बिना जाँचे विमान में डाल दिया जाए। यह aviation-grade fuel है, जिसे निर्धारित तकनीकी और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप इस्तेमाल किया जाता है और इसे ATF के साथ ब्लेंडिंग के लिए विकसित किया गया है।

अमेरिकी ऊर्जा विभाग की एक रिपोर्ट बताती है कि SAF से हवाई जहाजों से होने वाले वायु प्रदूषण को कम करने में मदद मिलती है। SAF को सामान्य विमान ईंधन के साथ अलग-अलग मात्रा में मिलाया जा सकता है। इसे आम तौर पर 10% से 50% तक मिलाने की सीमा होती है। यह सीमा इस बात पर निर्भर करती है कि SAF किस चीज से बनाया गया है और इसे बनाने का तरीका क्या है। अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन (ICAO) के अनुसार, अब तक 46 अलग-अलग हवाई अड्डों से 3 लाख 60 हजार से ज्यादा व्यावसायिक उड़ानों में SAF का इस्तेमाल किया जा चुका है। इनमें ज्यादातर हवाई अड्डे अमेरिका और यूरोप में हैं।

केजरीवाल तो केवल एथेनॉल का रोना रो रहे हैं लेकिन यह रिपोर्ट बताती है कि SAF को पेट्रोलियम के बजाय दूसरे नवीकरणीय स्रोतों से बनाया जा सकता है। इसके लिए नगरों से निकलने वाला ठोस कचरा, जिसमें खाने और बगीचे का कचरा शामिल है, लकड़ी से मिलने वाला जैविक पदार्थ, पशु वसा, चिकनाई, तेल और ऐसे ही दूसरे स्रोतों का इस्तेमाल किया जा सकता है। SAF का उत्पादन अभी शुरुआती दौर में है।

कैसे होगा एथेनॉल का इस्तेमाल?

कई लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि क्या एथेनॉल को सीधे हवाई जहाज के ईंधन टैंक में मिलाया जा सकता है? इसका सीधा जवाब है- नहीं। एथेनॉल में पानी को सोखने की प्रवृत्ति होती है, जिससे अत्यधिक ऊँचाई और कम तापमान पर विमान के ईंधन सिस्टम में ‘फेज सेपरेशन’ (ईंधन और पानी का अलग होना) या माइक्रोबियल ग्रोथ का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा, कच्चे एथेनॉल की ऊर्जा क्षमता पारंपरिक जेट ईंधन से लगभग 34% तक कम होती है।

इसीलिए, एथेनॉल को अल्कोहल-टू-जेट (Alcohol-to-Jet या AtJ) तकनीक के माध्यम से चरणबद्ध तरीके से परिष्कृत (Refine) किया जाता है :-

डीहाइड्रेशन: एथेनॉल से पानी के कणों को पूरी तरह निकाल दिया जाता है।
ओलिगोमेराइजेशन: इसके कार्बन मॉलिक्यूल्स को जोड़कर लंबी हाइड्रोकार्बन चेन बनाई जाती है।
हाइड्रोजनेशन: अंत में हाइड्रोजन जोड़कर एक ऐसा ‘सिंथेटिक केरोसिन’ तैयार होता है जो रासायनिक संरचना में हुबहू पारंपरिक एटीएफ जैसा होता है।

इस प्रक्रिया के बाद तैयार ईंधन को मौजूदा विमान इंजनों या हवाई अड्डे के बुनियादी ढांचे में बिना किसी बदलाव के 50% तक सुरक्षित रूप से मिश्रित (Blend) किया जा सकता है।

भारत ने SAF पर क्या कहा था?

दुनिया भर में हो रहे बदलावों को देखते हुए ही भारत ने भी अप्रैल 2026 में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए विमान ईंधन में एथेनॉल और सिंथेटिक हाइड्रोकार्बन के मिश्रण को कानूनी मंजूरी दे दी थी। यह जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों और कार्बन उत्सर्जन को कम करने के प्रयासों के बीच विमानन उद्योग में हो रहे वैश्विक बदलाव का ही एक हिस्सा था।

PIB द्वारा 23 अप्रैल 2026 को बताया गया था कि एविएशन टरबाइन फ्यूल (विपणन का विनियमन) आदेश 2001 में संशोधन कर SAF के साथ मिश्रित ATF को एटीएफ नियंत्रण आदेश के दायरे में लाया गया है।

केजरीवाल जो डर आज फैला रहें हैं उस पर तब ही PIB ने साफ कर दिया था कि SAF खास तौर से प्रसंस्कृत विमानन-ग्रेड हाइड्रोकार्बनों से बना होता है जो रासायनिक रूप से ATF के समान होते हैं और विमान इंजनों के साथ पूरी तरह अनुकूल होते हैं। SAF विमानन ईंधन की मूल स्वरूप, सुरक्षा या कार्य में कोई बदलाव नहीं करता है।

विमानन उपयोग के लिए SAF को शामिल करने से पहले, ICAO द्वारा मान्यता प्राप्त, ASTM इंटरनेशनल मानकों के अनुसार विमान इंजनों को कठोर परीक्षण प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसके बाद SAF को विमानन में उपयोग के लिए स्वीकार किया जाता है।

ICAO CORSIA यानी अंतरराष्ट्रीय विमानन के लिए कार्बन उत्सर्जन की भरपाई और कमी की योजना लागू कर रहा है। CORSIA का अनिवार्य चरण 2027 से शुरू होगा। इसके तहत अंतरराष्ट्रीय उड़ानों को एक तय आधार स्तर से अधिक हुए उत्सर्जन की भरपाई करनी होगी। SAF के इस्तेमाल से इस भरपाई की जरूरत को कम किया जा सकता है।

इसी वैश्विक जरूरत को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में इस्तेमाल होने वाले ATF में SAF मिलाने के लिए शुरुआती लक्ष्य तय किए हैं। 2027 में 1%, 2028 में 2% और 2030 में 5% SAF मिलाने का लक्ष्य रखा गया है।

भारत में उड़ाई जा चुकी है SAF वाली फ्लाइट

यह कोई आसमानी ख्वाब नहीं है। भारत की पहली व्यावसायिक यात्री उड़ान देश में तैयार किए गए सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल यानी SAF के मिश्रण से 2023 में ही सफलतापूर्वक उड़ाई जा चुकी है। 19 मई 2023 की TOI की रिपोर्ट बताती है कि एयरएशिया इंडिया की फ्लाइट i5-767 ने पुणे से नई दिल्ली के लिए उड़ान भरी थी। इस विमान में देश में तैयार SAF और सामान्य विमान ईंधन का मिश्रण इस्तेमाल किया गया था।

दुनियाभर में उठाए जा रहे इस तरह के कदम

दुनिया के दूसरे देश भी इसी दिशा में कदम उठा रहे हैं। यूरोपीय संघ और ब्रिटेन ने SAF मिलाने की अनिवार्य व्यवस्था शुरू की है। यूरोपीय संघ में 2025 में SAF मिलाने का लक्ष्य 2%, 2030 में 6% और 2050 तक 70% तक पहुँचने का लक्ष्य है। ब्रिटेन में यह लक्ष्य 2025 में 2%, 2030 में 10% और 2040 में 22% है।

अमेरिका SAF के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन दे रहा है। जापान ने भी 2030 तक 10% SAF इस्तेमाल करने का लक्ष्य रखा है। सिंगापुर में 2026 से अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए 1% SAF का इस्तेमाल जरूरी होगा और 2030 तक इस लक्ष्य को बढ़ाकर 3 से 5% किया जाएगा।

कुछ वर्ष आप पेट्रोल और डीजल की नई गाड़ियाँ ना खरीदें: केजरीवाल बेच रहे एक और डर

केजरीवाल ने केवल SAF को लेकर ही छूट नहीं बोला बल्कि लोगों ने नई गाड़ियाँ ना खरीदने की अपील कर कर दी। उन्होंने X पर एक पोस्ट में लिखा, “मोदी सरकार का क्या प्लान है? पता चल रहा है कि पेट्रोल में 50% से अधिक की मिलावट करेंगे। अभी बस माहौल शांत होने का इंतजार कर रहे हैं। पहले आपकी E0 और E10 गाड़ियों में जबरदस्ती E20 पेट्रोल डालकर कबाड़ा किया।”

उन्होंने आगे लिखा, “आज अगर आप E20 नई गाड़ी खरीदते हैं तो सरकार कुछ दिन बाद उसमे जबरदस्ती E50 पेट्रोल डालकर उसका कबाड़ा कर देगी। सरकार जल्द ही डीजल में भी मिलावट करने वाली है। इसलिए अभी कुछ वर्ष आप पेट्रोल और डीजल की नई गाड़ियाँ खरीदने से बचें।”

केजरीवाल के इस दावे पर बीजेपी की IT सेल के मुखिया अमित मालवीया ने भी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने लिखा, “फेक न्यूज़ फैलाना और बेवजह डर पैदा करना अरविंद केजरीवाल की पुरानी आदत है। अब नया झूठ यह फैलाया जा रहा है कि सरकार चुपके से पेट्रोल में 50% से अधिक एथेनॉल मिला देगी और लोगों की गाड़ियाँ कबाड़ हो जाएँगी।”

BJP नेता ने आगे लिखा, “भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि E20 से आगे पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण बढ़ाने का अभी कोई निर्णय नहीं लिया गया है। भविष्य में यदि कभी ऐसा प्रस्ताव आता भी है, तो वह व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन, तकनीकी परीक्षण और वाहन निर्माताओं, ऑयल मार्केटिंग कंपनियों तथा अन्य हितधारकों से परामर्श के बाद ही होगा।”

कितना खतरनाक हो सकती है केजरीवाल की यह राजनीति

केजरीवाल की यह अपील कितनी खतरनाक हो सकती है, यह देखना भी जरूरी है। सवालों के नाम पर जो सनसनी फैलानी की कोशिश अरविंद केजरीवाल कर रहे हैं उससे बड़ा आर्थिक नुकसान भी हो सकता है। केजरीवाल ने जो 50% से ज्यादा एथनॉल वाली बात कही है उसके पीछे कोई तर्क नहीं है बस अपना मनगढ़ंत दावे हैं।

केजरीवाल राजनीति के नाम पर एक बेहद खतरनाक फॉर्मूला इस्तेमाल कर रहे हैं। पहले आशंका पैदा करो, फिर आशंका को संभावना बताओ और आखिर में संभावना को लगभग तय सरकारी योजना की तरह जनता के सामने रख दो। और इसका नुकसान सिर्फ राजनीतिक बहस तक सीमित नहीं रहता।

सोचिए, कोई मध्यमवर्गीय परिवार महीनों की बचत के बाद कार खरीदने की योजना बना रहा है। कोई व्यक्ति रोजी-रोटी के लिए बाइक खरीदना चाहता है। कोई छोटा कारोबारी नई गाड़ी से अपना काम बढ़ाना चाहता है। ऐसे में एक बड़ा राजनीतिक चेहरा सार्वजनिक रूप से कहता है कि अभी गाड़ी मत खरीदिए, आगे पेट्रोल ही बदलने वाला है। स्वाभाविक है कि आम आदमी के मन में डर पैदा होगा।

E20 को लेकर वास्तविक बहस हो सकती है। पुराने वाहनों पर प्रभाव, माइलेज, रखरखाव, ईंधन की गुणवत्ता और उपभोक्ताओं को मिलने वाले विकल्प जैसे सवाल बिल्कुल जायज हैं। सरकार से जवाब माँगना भी जायज है। लेकिन इन सवालों को उठाने और यह कह देने में जमीन-आसमान का अंतर है कि 50% से ज्यादा एथनॉल आने वाला है, इसलिए नई गाड़ी मत खरीदो।

अगर करोड़ों लोगों के मन में यह धारणा बैठा दी जाए कि आने वाले वर्षों में पेट्रोल गाड़ियाँ ही भरोसे लायक नहीं रहेंगी, तो इसका सीधा झटका भारत के ऑटोमोबाइल सेक्टर को लग सकता है। ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री केवल कार बनाने वाली कंपनियों का नाम नहीं है।

इसके पीछे हजारों कंपनियों की सप्लाई चेन, ऑटो पार्ट्स बनाने वाली यूनिट, डीलरशिप, सर्विस सेंटर, बीमा, फाइनेंस और लाखों प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोजगार जुड़े हैं। एक कार की बिक्री कम होती है तो असर सिर्फ कार कंपनी के शोरूम तक नहीं रुकता।

और यह असर उस समय और गंभीर हो सकता है जब भारत का ऑटो सेक्टर एक बड़े तकनीकी बदलाव से गुजर रहा है और पेट्रोल-डीजल, हाइब्रिड, इलेक्ट्रिक और वैकल्पिक ईंधन वाली गाड़ियों के बीच बाजार अपना भविष्य तय कर रहा है। ऐसे वक्त में जब नेताओं को जनता को और भरोसा देने की जरूरत है केजरीवाल जैसे नेता केवल वोट बैंक के नाम पर फर्जी सनसनी फैला रहे हैं।

अब पुराने कपड़े नहीं जाएँगे कूड़े में, दिल्ली सरकार की ‘अर्पण योजना’ से मिलेगा नया जीवन: जरूरतमंदों तक पहुँचेगी मदद और महिलाओं को भी मिलेगा रोजगार

दिल्ली के एक आम घर की अलमारी में अक्सर ऐसे कपड़े दबे रहते हैं, जो समय के साथ छोटे हो गए हैं या जिन्हें अब पहना नहीं जाता है। ये कपड़े पूरी तरह से ठीक और पहनने योग्य होते हैं, लेकिन फैशन के बदलने या कम इस्तेमाल की वजह से वे किसी कोने में धूल फाँकते रहते हैं। आमतौर पर भारतीय घरों में इन पुराने कपड़ों का इस्तेमाल बहुत ही रचनात्मक और पारंपरिक तरीकों से किया जाता रहा है।

देश के आम नागरिक अपने घर के पुराने कपड़ों को संभाल कर रखते हैं और जरूरत पड़ने पर उनका बेहतरीन उपयोग करते हैं। कई लोग इन पुराने कपड़ों को अच्छी तरह नमक के पानी में धोकर साफ करते हैं, ताकि उनमें किसी तरह के कीटाणु न रहें। इसके बाद वे इन्हें बर्तन बेचने वाले या फेरी वाले को देकर अपने घर के लिए नए बर्तन या जरूरत का अन्य सामान ले लेते हैं।

इसके अलावा, हमारे देश में एक और लोकप्रिय तरीका पुराना कपड़ा प्रबंधन का रहा है, जिसे पारंपरिक रूप से खूब अपनाया जाता है। लोग पुराने सूती या अन्य मजबूत कपड़ों को लंबे समय तक सहेज कर रखते हैं और फिर उन्हें इकट्ठा करके किसी कुशल कारीगर के पास भेजते हैं। इन कपड़ों से घरों में बिछाने के लिए खूबसूरत और मजबूत दरियाँ, पायदान या अन्य घरेलू उपयोग की वस्तुएँ बनवाई जाती हैं। वहीं, समाज का एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो इन पुराने और इस्तेमाल करने योग्य कपड़ों को सीधे तौर पर अपने आस-पास के जरूरतमंदों, गरीबों और बेघर लोगों को दान कर देता है। ऐसा करने से वे लोग कड़ाके की ठंड या अन्य मौसम में उन कपड़ों का पूरा इस्तेमाल कर पाते हैं और उनका जीवन थोड़ा आसान हो जाता है।

इसी भारतीय सांस्कृतिक परंपरा और जन-सहयोग की भावना को एक आधुनिक, बड़े और संगठित रूप में ढालने का काम अब दिल्ली सरकार ने किया है। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए राजधानी में ‘अर्पण योजना’ की शुरुआत की है। यह योजना न केवल पुराने कपड़ों को कचरे में फेंकने से रोकती है, बल्कि उन्हें एक नया उद्देश्य और नया जीवन प्रदान करती है।

क्या है दिल्ली सरकार की ‘अर्पण योजना’?

दिल्ली सरकार ने शहर में बढ़ रहे कपड़ों के कचरे को रोकने के लिए ‘अर्पण योजना’ शुरू की है। इस योजना का मुख्य मकसद पुरानी चीजों को दोबारा इस्तेमाल में लाना है। इसे चक्रीय अर्थव्यवस्था या सर्कुलर इकोनॉमी भी कहा जाता है। इसके तहत लोग अपने घर के बेकार कपड़े तय किए गए केंद्रों पर आसानी से जमा करा सकते हैं। इस खास योजना की शुरुआत पूर्वी दिल्ली के मयूर विहार फेज-1 और पंजाबी बाग वेस्ट मेट्रो स्टेशन से की गई है।

दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने खुद आगे आकर इस अभियान की शुरुआत की है। उन्होंने पहले ‘अर्पण’ डोनेशन सेंटर का उद्घाटन किया और खुद अपने पुराने कपड़े दान किए। मुख्यमंत्री ने ऐसा करके आम जनता के सामने एक बहुत अच्छी मिसाल पेश की है। सरकार चाहती है कि लोग अपने पुराने कपड़ों को कूड़ेदान में न फेंकें। इन कपड़ों को सही जगह पहुँचाया जाए ताकि पर्यावरण की रक्षा हो सके और गरीबों की मदद की जा सके।

बहुत से लोग अपने पुराने और इस्तेमाल न होने वाले कपड़ों को यूँ ही फेंक देते हैं। इससे हमारे पर्यावरण पर बहुत बुरा असर पड़ता है और कचरा बढ़ता है। इसी समस्या को हल करने के लिए सरकार लोगों को जागरूक कर रही है। सरकार चाहती है कि नागरिक अपने साफ और पहनने योग्य कपड़े इन केंद्रों पर दान करें। इससे बेकार कपड़े कचरे में नहीं जाएँगे और उनका सही इस्तेमाल हो पाएगा।

इस योजना की सोच बहुत साफ है कि घरों में रखे अनचाहे कपड़ों को सही व्यक्ति तक पहुँचाया जाए। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता का कहना है कि छोटी-छोटी कोशिशों से ही बड़ा बदलाव आता है। यह योजना सिर्फ कपड़ों का दान करने तक सीमित नहीं है। यह हमारे पर्यावरण को बचाने और समाज को जोड़ने का एक बड़ा तरीका है। जब हम मिलकर काम करेंगे, तभी हमारी दिल्ली साफ और सुंदर बनेगी।

इन केंद्रों पर जमा होने वाले कपड़ों को बहुत सावधानी से छांटा जाता है। वैज्ञानिक तरीकों से यह देखा जाता है कि कौन सा कपड़ा किसके काम आ सकता है। इस प्रक्रिया में यह ध्यान रखा जाता है कि कोई भी अच्छा कपड़ा बेकार न जाए। इन सभी प्रयासों से दिल्ली को स्वच्छ और पर्यावरण के प्रति जागरूक बनाने में मदद मिल रही है। यह योजना हम सबके लिए एक बेहतरीन मौका है।

अर्पण केंद्र किन मेट्रो स्टेशनों पर है?

दिल्ली सरकार ने पुरानी कपड़ों को दान करने के इस काम को बेहद आसान बना दिया है। इसके लिए सार्वजनिक मेट्रो नेटवर्क का इस्तेमाल किया गया है ताकि लोगों को किसी तरह की परेशानी न हो। पहले चरण में दिल्ली के कुल 10 प्रमुख मेट्रो स्टेशनों पर ‘अर्पण केंद्र’ बनाए जा रहे हैं। इन सभी 10 स्टेशनों पर यात्री अपने रोज आने-जाने के सफर के दौरान आसानी से पहुँच सकते हैं।

इन सभी 10 प्रमुख मेट्रो स्टेशनों के नाम बहुत साफ हैं। इनमें मयूर विहार फेज-1, पंजाबी बाग वेस्ट, शालीमार बाग और शाहदरा शामिल हैं। इसके अलावा रोहिणी वेस्ट, हौज खास, लाजपत नगर, मालवीय नगर, द्वारका और मोहन एस्टेट स्टेशन भी हैं। इन जगहों पर रोजाना लाखों लोग सफर करते हैं। इसलिए सरकार ने इन स्टेशनों को चुनकर कपड़ों को जमा करना बहुत आसान कर दिया है।

इन केंद्रों पर कपड़े दान करने की प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल और सरल है। केंद्र पर एक विशेष स्कैनर लगा होता है जिसे आपको अपने फोन से स्कैन करना होता है। इसके बाद आपके फोन पर एक छोटा सा फॉर्म खुल जाता है। उस फॉर्म में आपको अपना नाम और मोबाइल नंबर लिखना होता है।

साथ ही, आपको दान किए जाने वाले कपड़ों का वजन किलो में दर्ज करना होता है। आप सुबह 8 बजे से शाम 6 बजे तक अपने साफ और पहनने योग्य कपड़े यहाँ दे सकते हैं। DMRC के सहयोग से चल रही यह पहल बहुत ही व्यवस्थित है। यहाँ आने वाले कपड़ों की छंटनी करके अच्छे कपड़े जरूरतमंदों को दिए जाते हैं, और बाकी कपड़ों को रीसाइकिल किया जाता है।

अर्पण योजना का मुख्य उद्देश्य क्या?

दिल्ली सरकार की ‘अर्पण योजना’ का सबसे बड़ा उद्देश्य शहर के कचरे को सही तरीके से संभालना है। आज के समय में नए कपड़े बहुत ज्यादा खरीदे जा रहे हैं। लोग थोड़े दिन कपड़े पहनकर उन्हें बेकार समझकर फेंक देते हैं। इससे हमारे शहरों में कचरे के बड़े-बड़े पहाड़ बन जाते हैं। इस समस्या को टेक्सटाइल वेस्ट कहा जाता है। इसी बड़ी समस्या से निपटने के लिए सरकार यह योजना लेकर आई है।

पुराने कपड़ों को दोबारा इस्तेमाल करने से पर्यावरण पर पड़ने वाला बुरा असर कम होता है। इससे हमारी प्राकृतिक चीजें सुरक्षित रहती हैं। साथ ही, नए कपड़े बनाने में जो ऊर्जा खर्च होती है, उसकी भी बचत होती है। जब हम पुरानी चीजों का फिर से उपयोग करते हैं, तो प्रकृति को बहुत राहत मिलती है। यह योजना इसी सोच पर काम करती है।

इस योजना का एक और बहुत जरूरी मकसद लोगों में समझदारी बढ़ाना है। सरकार चाहती है कि लोग सामानों को यूँ ही न फेंके। लोगों को चीजों को दोबारा इस्तेमाल करने और रीसाइकिल करने की आदत डालनी चाहिए। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने इस अभियान की शुरुआत करते समय एक बात बहुत साफ कही थी। उन्होंने कहा था कि जब तक आम जनता का साथ नहीं मिलेगा, तब तक कोई भी सरकारी योजना सफल नहीं हो सकती।

इसलिए सरकार इस काम को एक बड़ा जन-आंदोलन बनाना चाहती है। इसका मकसद हर नागरिक को पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार बनाना है। यह योजना सिर्फ कचरा साफ करने तक सीमित नहीं है। यह लोगों के दिलों में समाज की सेवा और प्रकृति के प्रति प्यार जगाने का एक बहुत अच्छा तरीका भी है। जब सब लोग मिलकर साथ चलेंगे, तभी हमारी दिल्ली साफ और हरी-भरी बन पाएगी।

पुराने कपड़ों का क्या होता है? रीसायकल और अपसाइक्लिंग की पूरी प्रक्रिया

‘अर्पण योजना’ के तहत जब लोग अपने पुराने कपड़े जमा कराते हैं, तो सबके मन में यह सवाल आता है कि उन कपड़ों का आगे क्या किया जाएगा? इस बात का जवाब देते हुए सरकार ने साफ किया है कि इन कपड़ों को तीन मुख्य तरीकों से नया जीवन दिया जाएगा। ये तीन तरीके दोबारा इस्तेमाल करना, रीसाइकिल करना और अपसाइक्लिंग करना हैं। इस पूरी प्रक्रिया के जरिए यह पक्का किया जाता है कि कोई भी कपड़ा बेकार न जाए और उसका सही सदुपयोग हो सके।

सबसे पहले इन सभी कपड़ों की बहुत सावधानी से छंटनी की जाती है। छंटनी के बाद जो कपड़े पूरी तरह सुरक्षित और पहनने योग्य होते हैं, उन्हें ‘रीस्यू’ यानी दोबारा इस्तेमाल की श्रेणी में रखा जाता है। इन अच्छे और साफ कपड़ों को बिना किसी बदलाव के सीधे गरीबों और जरूरतमंद लोगों में बांट दिया जाता है। इससे समाज के गरीब लोगों को मुफ्त में अच्छे कपड़े मिल जाते हैं। सर्दियों के मौसम में या किसी भी मुश्किल समय में यह मदद उनके बहुत काम आती है। यह तरीका समाज में आपसी प्यार और इंसानी मदद की भावना को और ज्यादा मजबूत बनाता है।

जो कपड़े सीधे पहनने लायक नहीं बचते हैं, उन्हें दूसरे चरण में रीसाइक्लिंग इकाइयों में भेजा जाता है। वहाँ आधुनिक मशीनों की मदद से इन कपड़ों के रेशों को अलग किया जाता है। इन पुराने रेशों से नए धागे या कारखानों में काम आने वाले अन्य उत्पाद बनाए जाते हैं। इसके अलावा, अपसाइक्लिंग की प्रक्रिया भी बहुत खास होती है। इसमें पुराने और कटे-फटे कपड़ों को रचनात्मक तरीके से काटकर नई और सुंदर चीजें बनाई जाती हैं।

इस अपसाइक्लिंग प्रक्रिया के जरिए पुराने कपड़ों से डिजाइनर बैग, सुंदर कुशन कवर और घर की सजावट का सामान तैयार किया जाता है। इसके अलावा और भी कई उपयोगी वस्तुएँ बनाई जाती हैं जो रोजमर्रा के काम आती हैं। यह पूरी वैज्ञानिक प्रक्रिया यह पक्का करती है कि कपड़े का छोटे से छोटा टुकड़ा भी बेकार न फेंका जाए। इस तरह पुराने कपड़ों को रीसाइकिल करके प्रकृति को बचाया जाता है और उनका अधिकतम उपयोग किया जाता है।

महिलाओं के लिए रोजगार के नए अवसर

दिल्ली सरकार की ‘अर्पण योजना’ सिर्फ पर्यावरण को साफ रखने या कपड़े दान करने तक सीमित नहीं है। इस योजना का एक बहुत ही मजबूत और अच्छा सामाजिक पहलू भी है। इस योजना के जरिए दिल्ली की महिलाओं के लिए रोजगार के नए और सुनहरे रास्ते खोले जा रहे हैं। जब लोग मेट्रो स्टेशनों पर बने केंद्रों पर कपड़े दान करते हैं, तो वे कपड़े आगे प्रोसेसिंग यूनिट्स में जाते हैं। इन जगहों पर काम करने के लिए बहुत सारे लोगों की जरूरत होती है।

इन कपड़ों की छंटनी करने, उन्हें धोने और अलग-अलग भागों में बांटने का काम किया जाता है। इसके अलावा पुराने कपड़ों से नई चीजें यानी अपसाइक्लिंग करने के कामों में भी महिलाओं को जोड़ा जा रहा है। सरकार का यह कदम महिलाओं को आगे बढ़ाने और उन्हें मजबूत बनाने की दिशा में एक बहुत बड़ी और अच्छी सोच है। इससे महिलाओं को किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा और वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकेंगी।

इस व्यवस्था की मदद से महिलाएँ अपने घर के पास ही इन केंद्रों या जुड़ी हुई फैक्ट्रियों में काम कर सकती हैं। वे वहाँ काम करके अपनी आजीविका चला सकती हैं और अपने परिवार को आर्थिक रूप से मजबूत बना सकती हैं। सरकार का सोचना है कि जब महिलाएँ ऐसे पर्यावरण और समाज से जुड़े कामों में हिस्सा लेती हैं, तो देश और समाज का विकास बहुत तेजी से होता है।

इससे महिलाओं का आत्मविश्वास भी काफी बढ़ता है और वे शहर की तरक्की में अपनी अहम भूमिका निभाती हैं। इस तरह ‘अर्पण योजना’ एक साथ कई अच्छे काम कर रही है। एक तरफ जहाँ इससे हमारा पर्यावरण साफ हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ गरीबों की मदद भी हो रही है। साथ ही साथ, इससे महिलाओं का आर्थिक विकास भी पूरी तरह सुरक्षित हो रहा है।

अमेरिकी सांसद राइली मूर ने FCRA संशोधन विधेयक पर भारत को दी चेतावनी: आखिर विदेशी नेताओं और चर्च समूहों को इस बदलाव से इतनी परेशानी क्यों

अमेरिकी प्रतिनिधि राइली एम. मूर ने प्रस्तावित विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 (FCRA Amendment Bill) की आलोचना करते हुए दावा किया है कि यह विधेयक भारत सरकार को ‘चर्चों और धार्मिक चैरिटी संस्थाओं पर कब्जा करने’ की अनुमति देता है। अपने पहले कार्यकाल के इस रिपब्लिकन सांसद ने इसे ‘ईसाइयों पर सीधा हमला’ करार दिया।

4 अगस्त को सोशल मीडिया मंच X पर लिखते हुए मूर ने कहा,

“हमारे प्रभु यीशु मसीह के पुनरुत्थान के कुछ ही दशकों बाद संत थॉमस भारत के मालाबार तट पर आए थे, लेकिन ईसाइयों के इस लंबे इतिहास के बावजूद भारत की संसद विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) में ऐसे संशोधन पर विचार कर रही है, जिससे सरकार चर्चों और धार्मिक चैरिटी संस्थाओं पर कब्जा कर सके।”

उन्होंने आगे लिखा,

“यह ईसाइयों पर स्पष्ट हमला है। यदि यह विधेयक इसी रूप में आगे बढ़ा, तो यह भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों के लिए गंभीर चिंता का विषय होगा।”

विडंबना यह है कि चर्चों पर ‘सरकारी कब्जे’ का उनका दावा उतना ही भ्रामक है, जितना पहली शताब्दी में संत थॉमस के दक्षिण भारत आने का दावा।

FCRA संशोधन विधेयक को लेकर अमेरिकी सांसद ने जो भ्रम और भय के माहौल तैयार करने की कोशिश की है, उसकी पड़ताल आवश्यक है।

मार्च 2026 में पेश किया गया FCRA संशोधन विधेयक मुख्य रूप से उन संस्थाओं से संबंधित है, जिनका FCRA पंजीकरण रद्द हो चुका है, जिन्होंने स्वयं लाइसेंस सरेंडर कर दिया है या जिनका नवीनीकरण नहीं हुआ। यह विधेयक केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त प्राधिकारी को ऐसी संस्थाओं की विदेशी फंडिंग और उस विदेशी धन से निर्मित परिसंपत्तियों के प्रबंधन का अधिकार देता है। इसका मकसद उनके दुरुपयोग, अवैध हस्तांतरण को रोकना है।

इसके अलावा, गृह मंत्रालय ने 22 जून 2026 को अधिसूचना के माध्यम से विदेशी अंशदान (विनियमन) नियम, 2011 में संशोधन करते हुए धार्मिक समुदाय के कई वर्गों के लिए धर्मांतरण (Proselytisation) को नियमों के दायरे से बाहर रखा।

दिलचस्प बात यह है कि राइली मूर पहले अमेरिकी सांसद नहीं हैं, जिन्होंने भारत के FCRA संशोधन विधेयक को लेकर आपत्ति जताई है। इससे पहले अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की मई 2026 की भारत यात्रा से पूर्व अमेरिकी सांसद क्रिस स्मिथ ने मदर टेरेसा की मिशनरीज ऑफ चैरिटी का FCRA लाइसेंस निलंबित किए जाने का मुद्दा भारत के सामने उठाने की अपील की थी।

भय का माहौल बनाते हुए स्मिथ ने दावा किया था कि यदि यह विधेयक पारित हो गया, तो ‘सभी चर्चों और डायोसीज की संपत्तियाँ भारत के कब्जे में जा सकती हैं।’

राइली मूर की तरह स्मिथ ने भी चेतावनी दी थी कि यदि इस विधेयक को रोका नहीं गया, तो इससे भारत-अमेरिका संबंधों को दीर्घकालिक नुकसान हो सकता है।

सिर्फ विदेशी राजनेता ही नहीं, बल्कि भारत के कुछ मीडिया संस्थान भी इस विधेयक को धार्मिक अल्पसंख्यकों और नागरिकों पर हमले के रूप में दिखाने की कोशिश कर रहे हैं।

FCRA विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करने वाला कानून है, धार्मिक कानून नहीं

राइली मूर ने इस मामले में भारतीय वामपंथी उदारवादी वर्ग से भी आगे बढ़कर भय और पीड़ित होने का नैरेटिव गढ़ा है। उनका यह दावा कि FCRA संशोधन विधेयक सरकार को मनमाने ढंग से चर्चों पर कब्जा करने का अधिकार देता है, पूरी तरह भ्रामक है।

सरकार न तो किसी पूजा स्थल का अधिग्रहण कर सकती है और न ही उसके धार्मिक स्वरूप में कोई बदलाव कर सकती है।

नियमों के अनुसार, सरकार की शक्तियाँ केवल उन विदेशी फंड से निर्मित परिसंपत्तियों तक सीमित हैं, जिन पर FCRA लाइसेंस समाप्त होने जैसी विशेष परिस्थितियाँ लागू होती हैं। इतना ही नहीं, ऐसे आदेशों की समीक्षा करने और अपील का अधिकार भी दिया गया है।

यह भी उल्लेखनीय है कि राइली मूर और कई भारतीय NGO केवल ईसाइयों का उल्लेख कर रहे हैं, जबकि यह कानून पूरी तरह धर्म-निरपेक्ष है और सभी FCRA पंजीकृत संस्थाओं पर समान रूप से लागू होता है। मौजूदा FCRA कानून और प्रस्तावित संशोधन दोनों ही विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करने वाले कानून हैं, न कि धार्मिक कानून।

दुनिया के अन्य लोकतांत्रिक देशों में भी विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करने वाले ऐसे कानून मौजूद हैं। अमेरिका में विदेशी एजेंट्स पंजीकरण अधिनियम (FARA), ब्रिटेन में विदेशी प्रभाव पंजीकरण स्कीम (FIRS) और ऑस्ट्रेलिया में विदेशी प्रभाव पारदर्शिता और जवाबदेही अधिनियम (FITAA) जैसे कानून इसी उद्देश्य से बनाए गए हैं।

भारत के FCRA की सबसे बड़ी खासियत है कि राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए यह पूर्व अनुमति (Pre-approval) और अनुमति-आधारित व्यवस्था पर काम करता है।

अब प्रश्न उठता है कि अमेरिका भारत के FCRA संशोधन विधेयक का विरोध क्यों कर रहा है और भारत-अमेरिका संबंधों को नुकसान पहुँचने की चेतावनी क्यों दे रहा है?

इसका उत्तर भूराजनीतिक हितों और धार्मिक महत्वाकांक्षाओं में छिपा है।

अमेरिकी मिशनरी नेटवर्क, World Vision, USAID और FCRA संशोधन विधेयक का विरोध

दशकों से अमेरिका स्थित अनेक इंजीलवादी (Evangelical) और मिशनरी नेटवर्क भारत में चर्च स्थापित करने, गरीबों, विशेषकर जनजातीय और दलितों के बीच धर्मांतरण अभियान चलाने तथा उससे जुड़ी गतिविधियों के लिए फंडिंग करते रहे हैं। Compassion International, World Vision India, Joshua Project समेत कई विदेशी ईसाई संगठन आज भी भारत में सक्रिय हैं और धार्मिक गतिविधियों के साथ-साथ अपने मूल देशों के रणनीतिक हितों को भी आगे बढ़ाने का काम करते हैं।

OpIndia लगातार अमेरिका स्थित वर्ल्ड विजन इंटरनेशनल की गतिविधियों को लेकर चेतावनी देता रहा है। इस ईसाई NGO को अब बंद हो चुकी अमेरिकी एजेंसी USAID से भी फंडिंग मिलती रही, जिस पर भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी संगठनों तथा व्यक्तियों को वित्तीय सहायता देने के आरोप लगते रहे हैं।

वर्ल्ड विजन का असर पूर्वोत्तर तक ही सीमित नहीं है। संगठन स्वयं को एक मानवीय संगठन (Humanitarian Organisation) के रूप में दिखाता है, जबकि वास्तविकता में यह कट्टर ईसाई मिशनरी संगठन है। पिछले लगभग सात दशकों से इसने अन्य मिशनरी समूहों के साथ मिलकर हिंदुओं का धर्मांतरण करने के लिए अभियान चलाए। इनमें विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों शामिल हैं। यह उस दौर में हुआ जब नेहरू सरकार ने इस संगठन को भारत में खुलकर काम करने की छूट दी।

वर्ष 1972 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की सरकार ने World Vision के संस्थापक बिली ग्राहम को नागालैंड जाने की अनुमति भी दी थी। उस समय राज्य में अस्थिरता के कारण विदेशियों को जाने की अनुमति भी नहीं दी जाती थी। स्वयं ग्राहम ने भी इस अनुमति पर आश्चर्य व्यक्त किया था। इसके बाद World Vision ने नागालैंड और दूसरे क्षेत्रों में अपने धर्मांतरण अभियानों को आगे बढ़ाया।

वर्ष 2024 में मोदी सरकार ने World Vision का FCRA लाइसेंस रद्द कर दिया, जिससे भारत में उसकी गतिविधियों को बड़ा झटका लगा। OpIndia पहले भी रिपोर्ट कर चुका है कि World Council of Churches, World Evangelical Alliance और World Vision जैसे विदेशी ईसाई संगठन भारत के धर्मांतरण-रोधी कानूनों का लगातार विरोध करते रहे हैं।

अब यही विदेशी और भारतीय मिशनरी संगठन FCRA संशोधन विधेयक का भी विरोध कर रहे हैं, क्योंकि उनका मानना है कि इससे उन संस्थाओं तक विदेशी धन का बिना रुकावट के प्रवाह रुक जाएगा, जो भारत की धार्मिक जनसांख्यिकी बदलने तथा राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करने वाले एजेंडे पर काम करती हैं।

सिर्फ मिशनरी संगठन ही नहीं, बल्कि कई NGO और वामपंथी विचारधारा से जुड़े नेटवर्क भी लंबे समय से विकास परियोजनाओं के विरोध, आंदोलन भड़काने और भारत-विरोधी प्रचार के आरोपों के चलते जाँच एजेंसियों के रडार पर रहे हैं।

सरकार ने पहले भी विकास परियोजनाओं का विरोध, हिंसक या उग्र प्रदर्शन भड़काना तथा जबरन धर्मांतरण जैसी गतिविधियों की वजह से FCRA लाइसेंस रद्द किया था।

कुडनकुलम परमाणु परियोजना: विदेशी फंडिंग और आंदोलन

विदेशी फंडिंग के प्रभाव का सबसे चर्चित उदाहरण कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा परियोजना (KKNPP) है, जिसे वर्षों तक वामपंथी दलों और विदेशी धन प्राप्त NGO के विरोध का सामना करना पड़ा।

तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले में स्थित इस परियोजना की परिकल्पना भारत के सबसे बड़े परमाणु ऊर्जा संयंत्र के रूप में की गई थी, जिसकी कुल क्षमता 6,000 मेगावाट निर्धारित थी। इसका निर्माण 2002 में शुरू हुआ, लेकिन लगातार प्रदर्शन और राजनीतिक विरोध के कारण यह परियोजना लंबे समय तक बाधित रही।

इन विरोध प्रदर्शनों का चरम वर्ष 2011 में देखने को मिला, जब जापान के फुकुशिमा परमाणु हादसे के बाद लोगों में भय का माहौल बनाया गया कि कुडनकुलम में भी वैसी ही त्रासदी हो सकती है।

पीपुल्स मूवमेंट अगेंस्ट न्यूक्लियर एनर्जी (PMANE) के नेता एस. पी. उदयकुमार इस आंदोलन का प्रमुख चेहरा बनकर उभरे।

वर्ष 2012 में कई अंतरराष्ट्रीय ईसाई प्रकाशनों ने खुलकर लिखा था कि चर्च और कैथोलिक संगठन इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं। इडिंथाकराई स्थित ‘लेडी ऑफ लूर्ड्स कैथोलिक चर्च‘ तथा दो कैथोलिक पादरी PMANE की समन्वय समिति का हिस्सा थे।

बाद में परमाणु परियोजना का विरोध करने वाले कई प्रमुख कार्यकर्ता, जिनमें एस. पी. उदयकुमार और जी. सुंदरराजन शामिल थे, आम आदमी पार्टी (AAP) से जुड़ गए। सुंदरराजन ने तो वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में AAP के उम्मीदवार के रूप में चुनाव भी लड़ा।

इसी प्रकार हाल में दिल्ली में हुए Cockroach Janta Party (CJP) के छात्र आंदोलन का नेतृत्व करने वाले अभिजीत दिपके भी अतीत में आम आदमी पार्टी से जुड़े रहे हैं।

इस पूरे विवाद के दौरान भारत के पूर्व राष्ट्रपति और प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम ने स्वयं सार्वजनिक रूप से कहा था कि कुडनकुलम परियोजना पूरी तरह सुरक्षित है और लोगों को घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि इसमें विश्वस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था मौजूद है।

फिर भी विरोध प्रदर्शन और न्यायालयों में याचिकाओं का सिलसिला वर्षों तक चलता रहा।

मनमोहन सिंह का बयान, IB रिपोर्ट और विदेशी फंडेड NGO का नेटवर्क

कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा परियोजना को लेकर लगातार चल रहे विरोध के बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने भी सार्वजनिक रूप से विदेशी फंड प्राप्त गैर-सरकारी संगठनों (NGO) की भूमिका पर सवाल उठाए थे।

उन्होंने फरवरी 2012 में प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका Science को दिए एक साक्षात्कार में कहा था कि कई NGO, विशेषकर अमेरिका और स्कैंडिनेवियाई देशों से वित्तीय सहायता प्राप्त संगठन, भारत की विकास संबंधी चुनौतियों को समझने के बजाय देश की प्रगति में बाधा उत्पन्न कर रहे हैं।

डॉ. सिंह ने कहा था,

“कई NGO, जिन्हें अक्सर अमेरिका और स्कैंडिनेवियाई देशों से धन मिलता है, हमारे देश की विकास संबंधी आवश्यकताओं को समझने के बजाय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम और कृषि में जेनेटिक इंजीनियरिंग जैसी परियोजनाओं का विरोध कर रहे हैं। परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को जिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, उसके पीछे ऐसे NGO हैं, जो यह नहीं समझते कि भारत को अपनी ऊर्जा क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता है।”

यानी, उस समय स्वयं कॉन्ग्रेस सरकार के प्रधानमंत्री ने स्वीकार किया था कि विदेशी फंड प्राप्त संगठन भारत की रणनीतिक और विकास संबंधी परियोजनाओं को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे थे।

मानवाधिकार और लोकतंत्र की आड़ में विदेशी फंडिंग

मानवाधिकार, लोकतांत्रिक स्वतंत्रता, आर्थिक न्याय, सरकारी जवाबदेही, शिक्षा के प्रसार और आदिवासी अधिकार जैसे आकर्षक नारों के साथ भारत में अनेक NGO विदेशी वित्तीय सहायता प्राप्त करते हैं। लेकिन समय-समय पर आरोप लगते रहे हैं कि इनमें से कई संगठनों का वास्तविक उद्देश्य विकास परियोजनाओं को रोकना, अराजकता फैलाना और भारत की आर्थिक प्रगति को बाधित करना रहा है।

इसी संदर्भ में वर्ष 2014 में इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) की एक रिपोर्ट सामने आई थी, जिसमें विदेशी फंड प्राप्त NGO के कामकाज और उनके तौर-तरीकों का विस्तृत उल्लेख किया गया था।

रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिटेन, अमेरिका, जर्मनी, नीदरलैंड सहित कई देशों से वित्तीय सहायता प्राप्त भारतीय NGO ऐसे मुद्दों को चुनते थे, जिनके माध्यम से बड़े विकास कार्यों के विरुद्ध जनमत तैयार किया जा सके।

IB रिपोर्ट में कहा गया था कि ऐसे संगठन परमाणु ऊर्जा संयंत्रों, यूरेनियम खदानों, कोयला आधारित ताप विद्युत परियोजनाओं, आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों (GMO), POSCO और वेदांता जैसी औद्योगिक परियोजनाओं, नर्मदा और अरुणाचल प्रदेश की जलविद्युत परियोजनाओं तथा पूर्वोत्तर भारत में तेल और खनन गतिविधियों के विरुद्ध आंदोलन खड़े कर रहे थे।

रिपोर्ट के अनुसार, इन गतिविधियों का भारत की आर्थिक वृद्धि पर प्रतिवर्ष 2 से 3 प्रतिशत GDP तक का नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता था।

विदेशी दानदाताओं की कार्यप्रणाली

IB रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि विदेशी दानदाता अपने वास्तविक उद्देश्य को छिपाने के लिए मानवाधिकारों की रक्षा, विस्थापितों के पुनर्वास, आदिवासी आजीविका की सुरक्षा, धार्मिक स्वतंत्रता और सुशासन जैसे विषयों के नाम पर धन उपलब्ध कराते थे।

इसके बाद स्थानीय NGO उन विषयों पर रिपोर्ट तैयार करते थे, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के विरुद्ध इस्तेमाल किया जाता था और जो पश्चिमी देशों की विदेश नीति के रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाने का माध्यम बनती थीं।

रिपोर्ट में Greenpeace International और CORDAID जैसे संगठनों का विशेष उल्लेख किया गया, जिन पर ऐसे अभियानों पर विशेष रूप से ध्यान केंद्रित करने का आरोप लगाया गया। वहीं ActionAid और Amnesty International जैसे संगठनों के बारे में कहा गया कि वे अपनी कुल फंडिंग का एक हिस्सा इसी प्रकार की गतिविधियों में लगाते हैं।

IB रिपोर्ट ने कुडनकुलम परमाणु परियोजना, प्रस्तावित कोयला आधारित बिजली परियोजनाओं, GMO के विरोध, POSCO और वेदांता जैसी औद्योगिक परियोजनाओं के खिलाफ अभियानों को उदाहरण के रूप में बताते हुए निष्कर्ष निकाला है कि विदेशी संस्थाएँ भारतीय NGO का उपयोग भारत की विकास परियोजनाओं को रोकने और उसकी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने के लिए कर रही थीं।

USAID और भारत विरोधी नेटवर्क

लेख के अनुसार, बाद के वर्षों में यह भी सामने आया कि United States Agency for International Development (USAID) भारत में कई विवादास्पद NGO को वित्तीय सहायता दे रही थी।

OpIndia ने पहले भी रिपोर्ट किया है कि USAID पर भारत और बांग्लादेश में शासन परिवर्तन (Regime Change) जैसे अभियानों को समर्थन देने के आरोप लगे। लेख में यह भी उल्लेख है कि बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि अमेरिका बांग्लादेश, म्यांमार और भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के कुछ हिस्सों को मिलाकर एक अलग ईसाई राष्ट्र बनाने की कोशिशों का समर्थन कर रहा है।

इन सभी घटनाओं को आधार बनाते हुए लेख में तर्क दिया गया है कि विदेशी फंडिंग को लेकर भारत सरकार की सतर्कता केवल प्रशासनिक या वित्तीय मामला नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़ा विषय है।

ईसाइयत नैरेटिव या विदेशी फंडिंग पर कार्रवाई?

लेख के अनुसार, भारत और विदेशों के अनेक ईसाई संगठनों तथा उनके समर्थकों द्वारा प्रचारित “ईसाइयों पर हमले” का नैरेटिव वास्तविक मुद्दे से ध्यान भटकाने का प्रयास है। वास्तविक चिंता चर्चों या धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर नहीं, बल्कि उन विदेशी फंडिंग नेटवर्क पर बढ़ती निगरानी को लेकर है, जिनका उपयोग वर्षों से धर्मांतरण और भारत-विरोधी गतिविधियों के लिए किया जाता रहा है।

लेख का तर्क है कि मोदी सरकार ने न केवल धर्मांतरण के नेटवर्क पर कार्रवाई तेज की है, बल्कि FCRA संशोधन विधेयक के माध्यम से यह भी सुनिश्चित करने का प्रयास किया है कि जिन संस्थाओं का FCRA लाइसेंस रद्द हो चुका है, उनके खिलाफ की गई कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित न रह जाए।

लाइसेंस रद्द होने के बाद अब क्या बदलेगा?

वर्तमान व्यवस्था में यदि किसी संस्था का FCRA लाइसेंस रद्द हो जाता है, तब भी उसके पास विदेशी धन से खरीदी गई जमीन, भवन, अस्पताल, स्कूल और अन्य परिसंपत्तियां बनी रहती हैं। ऐसे मामलों में वर्षों तक मुकदमे चलते रहते हैं और कई बार संबंधित संस्थाएँ व्यावहारिक रूप से अपना संचालन जारी रखती हैं।

लेख के अनुसार, प्रस्तावित संशोधन इस स्थिति को बदलने का प्रयास करता है। यदि किसी संस्था का लाइसेंस रद्द हो जाता है, तो उसकी विदेशी धन से निर्मित परिसंपत्तियां सरकार द्वारा नियुक्त डिज़िग्नेटेड अथॉरिटी की निगरानी में आ जाएँगी। आवश्यकता पड़ने पर इन परिसंपत्तियों का प्रबंधन या निस्तारण किया जा सकेगा और उससे प्राप्त राशि भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) में जमा होगी।

लेख के अनुसार, इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि FCRA लाइसेंस रद्द होने के बाद भी विदेशी धन से निर्मित परिसंपत्तियों का उपयोग पूर्ववत जारी न रह सके।

किन संगठनों को आपत्ति है?

लेख में कहा गया है कि यही कारण है कि भारत और विदेशों के अनेक ईसाई संगठन इस विधेयक का विरोध कर रहे हैं ।इनमें Catholic Bishops’ Conference of India (CBCI), All India Christian Council तथा आर्चबिशप जोसेफ डी’सूज़ा का उल्लेख किया गया है। लेख के अनुसार, आर्चबिशप डी’सूज़ा ने FCRA संशोधन को ईसाई संस्थाओं की संपत्तियों की ‘लूट’ तक बताया है।

भारत के बाहर भी National Hispanic Christian Leadership Conference सहित कई अमेरिकी ईसाई संगठनों ने इस विधेयक को वापस लेने की माँग की है।

इसके अलावा Christianity Today, International Christian Concern जैसी ईसाई पत्रिकाओं और पोर्टलों पर भी ऐसे लेख प्रकाशित हुए, जिनमें यह दावा किया गया कि भारत की ‘हिंदू राष्ट्रवादी सरकार’ ईसाइयों को निशाना बना रही है।

दिल्ली के CJP आंदोलन और चर्च की भागीदारी

लेख में यह भी दावा किया गया है कि हाल में दिल्ली में हुए कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के आंदोलन में कई कैथोलिक पादरी भी प्रदर्शनकारियों के साथ मार्च करते दिखाई दिए। साथ ही यह भी उल्लेख किया गया है कि दिल्ली पुलिस ने इस आंदोलन से जुड़े कुछ NGO और व्यक्तियों की भूमिका की जाँच शुरू की है।

लेख का निष्कर्ष है कि FCRA संशोधन विधेयक से विदेशी फंडिंग के उन स्रोतों पर प्रभाव पड़ने वाला है, जिनका उपयोग धार्मिक धर्मांतरण, राजनीतिक सक्रियता और भारत-विरोधी अभियानों के लिए किया जाता रहा है। यही कारण है कि विदेशी राजनीतिक नेता और मिशनरी संगठन इस कानून के विरुद्ध सक्रिय अभियान चला रहे हैं।

कॉन्ग्रेस के विदेशी फंडिंग का इतिहास पुराना

पूरे विवाद का राजनीतिक पक्ष भी है। कॉन्ग्रेस पार्टी इस विधेयक के विरोध का नेतृत्व कर रही है, जबकि उसका अपना इतिहास विदेशी फंड प्राप्त संस्थाओं से जुड़ा रहा है।

लेख में राजीव गाँधी फाउंडेशन का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि इस संस्था की अध्यक्ष सोनिया गाँधी और ट्रस्टी राहुल गाँधी रहे हैं। इस संस्था को चीन सहित विदेशी स्रोतों से धन प्राप्त हुआ था। बाद में जाँच के दौरान कथित अनियमितताएँ सामने आई और उसका FCRA लाइसेंस रद्द कर दिया गया।

लेख में यह भी दावा किया गया है कि राहुल गाँधी कई अवसरों पर विदेशों में भारत के लोकतंत्र को लेकर चिंता व्यक्त करते रहे हैं और विदेशी हस्तक्षेप की माँग जैसे बयान देते रहे हैं। ऐसे माहौल में अमेरिकी सांसदों द्वारा भारत की नीतियों की आलोचना उसी अभियान का विस्तार प्रतीत होती है।

लेख के अनुसार, FCRA संशोधन विधेयक का मूल उद्देश्य चर्चों या धार्मिक संस्थाओं पर कब्जा करना नहीं, बल्कि विदेशी फंडिंग के उन नेटवर्क को नियंत्रित करना है, जिनका उपयोग धर्मांतरण, डेमोग्राफी के बदलाव, विरोध प्रदर्शनों, अराजक गतिविधियों या ऐसे सिस्टम को खड़ा करने के लिए किया जाता रहा है।

इसलिए लेख में निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि अमेरिकी सांसद राइली मूर सहित कई विदेशी राजनीतिक और धार्मिक संगठन इस विधेयक को ‘ईसाइयों पर हमले’ के रूप में दिखा कर धार्मिक भावनाएँ भड़काने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि उनके अनुसार वास्तविक मुद्दा विदेशी धन के उपयोग और उस पर भारत सरकार की बढ़ती निगरानी है।

(मूलरूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

मस्जिद को लेकर अफवाह, दंगों की साजिश में सपा सांसद बर्क का हाथ, पुलिस पर झूठा आरोप: संभल हिंसा जाँच की 857 पेज की रिपोर्ट योगी सरकार तक पहुँची, पढ़िए इसमें और क्या

संभल हिंसा 2024 सुनियोजित साजिश का परिणाम था। इसमें समाजवादी पार्टी सांसद जियाउर रहमान बर्क और सपा के ही विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहैल इकबाल की अहम भूमिका थी। हिंसा की जाँच के लिए गठित न्यायिक रिपोर्ट में ये दावा किया गया है। संभल हिंसा को लेकर आयोग ने सरकार को 857 पेज की विस्तृत रिपोर्ट सौंपी है।

जामा मस्जिद बनाम हरिहर मंदिर विवाद में 24 नवंबर 2024 को सर्वे के दौरान संभल जल उठा था। इसकी जाँच रिपोर्ट बुधवार (5 जुलाई 2026) को उत्तर प्रदेश विधानसभा में पेश की गई। जानकारी के मुताबिक, इसमें कहा गया है कि सर्वे को लेकर मुस्लिमों में गलत सूचना फैलाई गई।

रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन गोलियों से मौतें हुई, वह पुलिस ने नहीं चलाई थी बल्कि पुलिस के हथियार लूटने की कोशिश की गई थी। आयोग ने हिंसा और आगजनी की घटना पर तत्परता से काबू पाने के लिए जिला प्रशासन की तारीफ की है।

सर्वे से पहले ही तैयार हो गई थी हिंसा की जमीन

आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, 24 नवंबर 2024 की हिंसा पूर्व नियोजित थी। रिपोर्ट में हिंसा के लिए प्रमुख रूप से सपा सांसद जिया-उर-रहमान बर्क, संभल विधायक पुत्र सोहेल इकबाल था।

इसके अलावा इंतजामिया कमेटी जामा मस्जिद संभल के सदर जफर अली, एडवोकेट कासिम जमाल, इंतजामिया कमेटी के सचिव मशहूद अली फारूकी एडवोकेट, इंतजामिया कमेटी के उपसदर लहदन खान और इंतजामिया समिति के अन्य सदस्यों ने मिलकर साजिश रची थी।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इन लोगों में 19 नवंबर 2024 को सिविल जज (सीनियर डिवीजन) द्वारा पारित जामा मस्जिद सर्वे आदेश को लेकर नाराजगी थी। ये लोग मस्जिद की गतिविधियों में किसी तरह के हस्तक्षेप के पक्ष में नहीं थे।

19 नवंबर के सर्वे आदेश के बाद रची गई बड़ी साजिश

घटना के बाद गठित किए गए तीन-सदस्यीय न्यायिक जाँच आयोग की रिपोर्ट ने पुष्टि की है कि हिंसा सुनियोजित साजिश का परिणाम थी। पूरे मामले की गहराई से छानबीन करने और तमाम साक्ष्यों के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, हिंसा किसी तात्कालिक विवाद की वजह से नहीं हुई थी, बल्कि इसकी पटकथा पहले ही रची जा चुकी थी।

हिंसा के दौरान पुलिस-प्रशासन पर पथराव, फायरिंग, हथियार लूट ली गई। इतना ही नहीं वाहनों और संपत्ति को आग के हवाले कर दिया गया। रिपोर्ट में लोगों को उकसाने एवं भड़काने में सपा सांसद जिया-उर-रहमान बर्क समेत कई लोग शामिल थे। ये हिंसा 24 नवंबर 2024 को शाही जामा मस्जिद के पास शुरू हुई थी। इसमें 4 लोगों की मौत हुई थी जबकि कई लोग घायल हुए थे।

वीडियो के जरिए फैलाया गया भ्रम, फिर भड़काई गई हिंसा

न्यायिक जाँच रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ असामाजिक तत्वों ने वीडियो बना कर लोगों को उकसाया और भड़काऊ संदेश दिए। इनलोगों ने मुस्लिम समुदाय को यह विश्वास दिलाने की कोशिश की कि सर्वे के बहाने जामा मस्जिद को हड़पने का प्रयास किया जा रहा है।

इसके बाद 24 नवंबर को सर्वे के दौरान माहौल बिगड़ गया और हिंसक घटनाएँ हुईं। रिपोर्ट में मस्जिद में दिए गए कथित भड़काऊ भाषणों के बाद नारेबाजी, पथराव, आगजनी और गोलीबारी का भी विस्तार से उल्लेख किया गया है।

पुलिस पर पथराव, गोलीबारी और वाहनों में आगजनी

आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि भीड़ ने सुनियोजित तरीके से पुलिस पर पथराव और गोलीबारी की। इसके साथ ही हथियार और दंगा नियंत्रण सामग्री लूटने, वाहनों व संपत्ति को आग के हवाले करने की घटनाएँ भी हुईं। इस दौरान 28 पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी-कर्मचारी घायल हुए। वहीं घटना में चार लोगों की मौत का भी रिपोर्ट में जिक्र है।

आयोग के अनुसार, 24 नवंबर की हिंसा में हुई मौतों के लिए मुस्लिम पक्ष की ओर से की गई सुनियोजित साजिश जिम्मेदार है। मरने वालों में कोट कुर्वी इलाके के रहने वाला नईम, सराय तरीन निवासी बिलाल, संभल के हयात नगर का नुमान और एक 19 साल के लड़के के तौर पर हुई।

चारों मृतकों के रिश्तेदारों ने जो FIR दर्ज कराई थी, उनमें अनजान लोगों के नाम थे और उन्होंने अपनी शिकायतों या पैनल के सामने अपने बयानों में पुलिस पर हत्या का आरोप नहीं लगाया था।

रिपोर्ट में आगे लिखा था, “जिन डॉक्टरों ने ऑटोप्सी की… उनकी राय थी कि उनकी मौत गोली लगने से हुई थी। स्थानीय पुलिस अधिकारी ने अपने एडिशनल एफिडेविट के साथ बैलिस्टिक रिपोर्ट भी फाइल की थी। इसके मुताबिक मरने वाले के शरीर पर मिली चोटें .315 बोर के हथियारों से लगी होंगी। लेकिन रिकॉर्ड में किसी भी पुलिस वाले के पास .315 बोर का कोई हथियार था, इसके कोई सबूत नहीं हैं।” वहीं रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सात पुलिस वालों को ‘हिंसक भीड़ की फायरिंग’ की वजह से गोली लगी।

बर्क और सोहेल इकबाल के राजनीतिक वर्चस्व में उग्र हुई हिंसा

आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक जिया-उर-रहमान बर्क, सोहेल इकबाल, जफर अली, कासिम जमाल और मशहूद अली फारूकी आदि ने मुकदमा संख्या 182/2024 के तथ्यों को छिपाकर ऐसा भ्रामक प्रचार किया कि हिंदू मस्जिद को ढहाना चाहते हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि बर्क और सोहेल इकबाल राजनीतिक वर्चस्व बनाए रखने और सरकार-पुलिस को बदनाम करने के लिए लोगों को उकसाना चाहते थे।

दोनों के बीच पुरानी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता भी थी। जिले में मुस्लिमों के तुर्क और पठान गुटों के बीच वर्चस्व की लड़ाई भी हिंसा का कारण बनी। जाँच में सामने आया कि घटनास्थल से 12-बोर के कारतूस मिले थे। ये बात भी सामने आया है कि हिंसा में स्थानीय और बाहरी उपद्रवी दोनों शामिल थे।

हिंसा की जाँच के लिए तीन सदस्यीय आयोग का हुआ था गठन

हिंसा की जाँच के लिए योगी सरकार ने 28 नवंबर 2024 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति देवेंद्र कुमार अरोड़ा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय न्यायिक जाँच आयोग गठित किया। आयोग का मकसद 24 नवंबर की हिंसक घटना के कारणों और उससे जुड़े पहलुओं की पड़ताल करना था।

रिपोर्ट में हिंसा की पृष्ठभूमि से लेकर भीड़ के व्यवहार, पुलिस पर हमले, आगजनी, गोलीबारी और मौतों से जुड़े पहलुओं को सामने रखा गया है। आयोग के निष्कर्षों ने 24 नवंबर की घटना को अचानक हुई हिंसा के बजाय पूर्व नियोजित साजिश और सुनियोजित उकसावे की कार्रवाई से जोड़ते हुए पूरे घटनाक्रम पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

पुलिस प्रशासन की भूमिका सराहनीय- आयोग

हिंसा के दौरान पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के घायल होने के बावजूद जिला प्रशासन और पुलिस ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए तत्परता से कार्रवाई की। इस प्रभावी कार्रवाई के लिए जाँच आयोग ने जिला प्रशासन की भूमिका की तारीफ की है। उनका कहना है कि मृतकों के परिजनों ने भी पुलिस फायरिंग से मौत का दावा नहीं किया। एफएसएल और सीन री-क्रिएशन रिपोर्ट में भी यही पता चलता है कि सभी चार लोगों की मौत पुलिस की गोली से नहीं हुई थी।

कौन है जियाउर रहमान बर्क

समाजवादी पार्टी के टिकट पर संभल से लोकसभा चुनाव 2024 में जीत दर्ज करने वाले जियाउर रहमान बर्क की पृष्ठभूमि भी राजनीतिक रही है। उसके दादा शफीकुर रहमान बर्क संभल से पूर्व सांसद थे। बर्क का जन्म 13 जुलाई 1988 को संभल में ही हुआ था।

लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान उन्होंने जो हलफनामा प्रस्तुत किया, उसके अनुसार, उन्होंने मेरठ के चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की। उनके पास कानून में स्नातक और कला में स्नातक की दो डिग्रियां हैं। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान वे छात्र राजनीति में सक्रिय रूप से शामिल रहे और 2005-06 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय छात्र संघ (AMUSU) से जुड़े रहे।

शुरुआत में, बर्क 2017 तक असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व वाली ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) से जुड़े रहे। बाद में, वे अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी (एसपी) में शामिल हो गए और उत्तर प्रदेश विधानसभा के 18वें सत्र में विधायक चुने गए। उन्होंने 1 मार्च 2022 से 4 जून 2024 तक कुंदरकी निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। इसके बाद उन्होंने लोकसभा चुनाव 2024 लड़ा और संभल निर्वाचन क्षेत्र से सांसद चुने गए।

संभल हिंसा के बाद जो एफआईआर दर्ज हुई थी उसमें कहा गया था 22 नवंबर को जियाउर रहमान बर्क जामा मस्जिद गए। नमाज अदा करने के बाद उन्होंने प्रशासनिक अनुमति के बिना भीड़ इकट्ठा की और भड़काऊ बयान दिए। राजनीतिक लाभ के लिए उन्होंने भीड़ को सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने के लिए उकसाया।

इसके अलावा एफआईआर में विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहैल इकबाल का भी जिक्र था, जो हिंसा भड़कने वाले दिन भीड़ में मौजूद था। एफआईआर में कहा गया था कि सुहैल इकबाल ने भीड़ को उकसाते हुए कहा था कि जियाउर रहमान बर्क हमारे साथ है, हम भी तुम्हारे साथ हैं। हम तुम्हें कुछ नहीं होने देंगे। अपने इरादे पूरे करो। इसके बाद भीड़ हिंसक हो गई।

न्यायिक रिपोर्ट ने भी दोनों को हिंसा की साजिश रचने का दोषी माना है। इससे पहले सीएम योगी ने भी कहा था कि न्यायिक रिपोर्ट आने पर पता चल जाएगा कि संभल हिंसा में कौन कौन दोषी है।

प्रेस फ्रीडम का पीटता है ढोल, लेकिन जर्नलिस्ट की कब्रगाह बना पाकिस्तान: बलूचिस्तान में 42 पत्रकारों की मौत, POK में जुल्म दिखाने पर मीडिया पर पहरा

दुनिया के प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भले ही पाकिस्तान भारत से चार पायदान ऊपर दिखाई देता हो, लेकिन जमीन पर तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आती है। बलूचिस्तान में पत्रकारों की हत्याएँ, जबरन गायब किए जाने के आरोप, POK में मीडिया पर कार्रवाई और अब विदेशी पत्रकारों के लिए सख्त एनओसी व्यवस्था ने पाकिस्तान की प्रेस की आजादी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

इसी बीच बलूचिस्तान के जाफराबाद जिले में स्थानीय पत्रकार नजर मुहम्मद कनरानी की हालिया गोली मारकर हत्या कर दी, जिसके बाद बहस और तेज हो गई है कि पाकिस्तान में पत्रकारों की सुरक्षा और स्वतंत्र रिपोर्टिंग कितनी गंभीर चुनौती बन चुकी है।

अब इस्लामाबाद, लाहौर और कराची को छोड़कर पाकिस्तान के किसी भी दूसरे हिस्से में रिपोर्टिंग करने से पहले विदेशी पत्रकारों को सरकार से नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) लेना होगा।

ऐसे समय में यह फैसला आया है जब पाकिस्तान पहले से ही बलूचिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) में मानवाधिकार उल्लंघन, इंटरनेट बंदी, प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई और पत्रकारों पर हमलों को लेकर अंतरराष्ट्रीय आलोचना झेल रहा है।

आलोचकों का कहना है कि यह कदम सुरक्षा के नाम पर नहीं, बल्कि उन इलाकों की सच्चाई दुनिया से छिपाने के लिए उठाया गया है।

विदेशी पत्रकारों के लिए क्या बदले नए नियम?

पाकिस्तान के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने फॉरेन मीडिया फैसिलिटेशन गुइडेलीनेस 2026 जारी की हैं। इन नियमों के तहत अब विदेशी मीडिया संस्थानों, पत्रकारों, फ्रीलांसरों, डॉक्यूमेंट्री बनाने वालों, प्रोडक्शन हाउस, फिक्सर, अनुवादकों और विदेशी मीडिया के लिए काम करने वाले पाकिस्तानी नागरिकों तक को सरकारी पंजीकरण कराना होगा।

सबसे बड़ा बदलाव यह है कि विदेशी पत्रकार अब केवल इस्लामाबाद, लाहौर और कराची में बिना अतिरिक्त अनुमति के काम कर सकेंगे। यदि उन्हें बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा, सिंध के दूरदराज इलाकों या पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में जाना है तो पहले सरकार से NOC लेना होगा।

यह नियम केवल न्यूज रिपोर्टिंग तक सीमित नहीं है। किसी भी तरह की वीडियो शूटिंग, डॉक्यूमेंट्री, सोशल मीडिया कंटेंट या किसी विशेष इलाके में जाकर जानकारी जुटाने के लिए भी सरकारी मंजूरी जरूरी होगी। यहाँ तक कि विदेशी पत्रकार यदि एबटाबाद या मुरी घूमने भी जाना चाहें तो उन्हें पहले सरकार से अनुमति लेनी पड़ेगी।

नई व्यवस्था में दो तरह की मान्यताएँ भी तय की गई हैं। एक स्थायी वार्षिक मान्यता, जो पाकिस्तान में लगातार काम करने वाले विदेशी पत्रकारों के लिए होगी, जबकि दूसरी तीन महीने तक की अस्थायी मान्यता होगी, जो बाहर से आने वाले पत्रकारों को दी जाएगी।

सबसे विवादित बात यह है कि सरकार किसी भी समय किसी पत्रकार की मान्यता रद्द कर सकती है यदि उसे लगे कि उसकी रिपोर्टिंग पाकिस्तान की विचारधारा, संप्रभुता, सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के खिलाफ है। इन शब्दों की स्पष्ट कानूनी परिभाषा भी नहीं दी गई है, जिससे अधिकारियों को व्यापक अधिकार मिल जाते हैं।

बलूचिस्तान में पत्रकारिता बन चुकी है जान जोखिम में डालने जैसा काम

पाकिस्तान का बलूचिस्तान लंबे समय से हिंसा, जबरन गायब किए जाने, सुरक्षा बलों की कार्रवाई और अलगाववादी संगठनों की गतिविधियों का केंद्र रहा है। यहाँ पत्रकारों के लिए सच्चाई सामने लाना किसी युद्ध क्षेत्र में काम करने से कम नहीं माना जाता।

बलूचिस्तान यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (BUJ) के अनुसार साल 2008 से 2026 के बीच 42 पत्रकारों की हत्या हो चुकी है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन मामलों में किसी भी आरोपित को सजा नहीं मिली।

कई पत्रकारों ने अपनी पहचान छिपाकर बताया कि उन्हें लगातार धमकियाँ मिलती रहती हैं। एक पत्रकार ने बताया कि उसे फोन पर कहा गया, “अगर तुम पत्रकारिता में नए हो तो शायद तुम्हें ताबूत की जरूरत पड़ेगी। बता दो, हम पहले ही भेज देते हैं।”

ऐसी धमकियों के बाद कई पत्रकार पुलिस तक भी नहीं जाते क्योंकि उन्हें भरोसा नहीं कि उनकी सुरक्षा होगी। कई मामलों में पत्रकारों की हत्या के बाद FIR तक दर्ज नहीं हुई।

पत्रकार अब्दुल लतीफ बलोच का मामला इसका बड़ा उदाहरण है। मई 2025 में कुछ हथियारबंद लोग आधी रात उनके घर पहुँचे। परिवार ने उन्हें बाहर जाने से रोका, लेकिन हमलावरों ने वहीं गोलियाँ चलाकर उनकी हत्या कर दी। एक साल से ज्यादा समय गुजरने के बाद भी इस मामले में कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

बलूचिस्तान के कई जिलों में पत्रकारों को केवल सुरक्षा बलों या सरकार से ही नहीं, बल्कि उग्रवादी संगठनों और स्थानीय प्रभावशाली लोगों से भी खतरा रहता है। ऐसे माहौल में स्वतंत्र पत्रकारिता लगभग असंभव हो जाती है।

जबरन गायब करना, इंटरनेट बंदी और सेंसरशिप से दबाई जा रही आवाजें

बलूचिस्तान में लोगों को जबरन उठाकर गायब कर देना सालों से सबसे बड़ा मानवाधिकार मुद्दा रहा है। मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि कई नागरिकों को सुरक्षा एजेंसियाँ हिरासत में ले जाती हैं और परिवारों को महीनों या वर्षों तक उनकी कोई जानकारी नहीं मिलती।

कुछ लोग लंबे समय बाद गंभीर शारीरिक यातना के निशानों के साथ वापस लौटते हैं, जबकि कई लोगों के शव सुनसान इलाकों में मिलते हैं। इन शवों पर गोली और यातना के निशान होने के आरोप भी बार-बार सामने आते रहे हैं।

इन्हीं मुद्दों को उठाने वाली डॉक्टर महरंग बलोच और उनकी संस्था बलोच यकजेहती कमेटी (BYC) अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रही हैं। उन्होंने जबरन गायब किए गए लोगों और मानवाधिकार उल्लंघनों के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन आयोजित किए।

उनके परिवार पर भी पहले हमला हुआ था और उनके पिता की मौत भी ऐसे ही एक मामले से जुड़ी बताई जाती है। अब उन्हें भी कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है, जिसे लेकर लगातार सवाल उठा रहे हैं।

सेंसरशिप केवल धमकियों तक सीमित नहीं है। कई इलाकों में सालों से इंटरनेट सेवाएँ बंद हैं। पंजगुर में मोबाइल इंटरनेट लंबे समय से प्रभावित रहा, जबकि डेरा बुगती में भी 3जी और 4जी सेवाएँ लंबे समय तक बंद रहने की खबरें सामने आती रही हैं। इंटरनेट बंद होने का सबसे बड़ा असर पत्रकारों पर पड़ता है क्योंकि वे अपनी रिपोर्ट समय पर भेज ही नहीं पाते।

कई स्थानीय मीडिया संस्थान सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर हैं। ऐसे में सरकार के खिलाफ खबरें प्रकाशित करना उनके लिए आर्थिक जोखिम भी बन जाता है। यही कारण है कि कई पत्रकार केवल सरकारी प्रेस विज्ञप्तियाँ प्रकाशित करने तक सीमित रहने को मजबूर हो जाते हैं।

POK में विरोध प्रदर्शनों के बाद बढ़ी सख्ती, दुनिया उठा रही सवाल

विश्लेषकों का मानना है कि विदेशी मीडिया पर नई पाबंदियों का समय बेहद महत्वपूर्ण है। हाल के महीनों में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) में चुनाव, प्रदर्शन और सुरक्षा बलों की कार्रवाई को लेकर कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने रिपोर्ट प्रकाशित की थीं।

मानवाधिकार संगठनों ने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग किया गया, कई जगह इंटरनेट सेवाएँ बंद की गईं और पत्रकारों की रिपोर्टिंग में बाधाएँ डाली गईं। इन्हीं घटनाओं के बाद पाकिस्तान ने विदेशी मीडिया की गतिविधियों पर और ज्यादा नियंत्रण स्थापित कर दिया।

कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कार्रवाई भी हुई। पाकिस्तान ने कुछ रिपोर्टों को एंटी-स्टेट प्रोपेगेंडा और येलो जर्नलिज्म बताते हुए उनके प्रसारण पर रोक लगाने जैसे कदम उठाए।

एमनेस्टी इंटरनेशनल, कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (CPJ) और रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने बार-बार पाकिस्तान से प्रेस की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने, पत्रकारों की सुरक्षा बढ़ाने और मानवाधिकार उल्लंघनों की निष्पक्ष जाँच कराने की माँग की है।

रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स का कहना है कि पाकिस्तान दुनिया के उन देशों में शामिल है जहाँ स्वतंत्र पत्रकारिता करना सबसे अधिक जोखिम भरा है। संगठन के अनुसार जो पत्रकार सेना या सुरक्षा प्रतिष्ठान की आधिकारिक लाइन से अलग रिपोर्टिंग करते हैं, उन्हें निगरानी, हिरासत, धमकी और हमलों का सामना करना पड़ सकता है।

इसी वजह से विशेषज्ञ मानते हैं कि विदेशी पत्रकारों के लिए नई NOC व्यवस्था केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं है, बल्कि यह उन इलाकों तक स्वतंत्र मीडिया की पहुँच सीमित करने वाला कदम भी साबित हो सकता है, जहाँ पहले से मानवाधिकार और प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर सवाल उठते रहे हैं।

पाकिस्तान सरकार इन नियमों को प्रशासनिक व्यवस्था और सुरक्षा के लिए जरूरी बता रही है, लेकिन जिस समय इन्हें लागू किया गया है और जिस तरह विदेशी पत्रकारों की गतिविधियों को सरकारी अनुमति से जोड़ दिया गया है, उससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह बहस तेज हो गई है कि क्या पाकिस्तान संवेदनशील क्षेत्रों की वास्तविक स्थिति दुनिया से छिपाने की कोशिश कर रहा है।