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‘गाय हिंदुओं के लिए पवित्र, इसकी हत्या धार्मिक भावनाओं को आहत कर सकती है’: गोमांस के साथ पकड़े गए आरिफ को जमानत देने से गुजरात HC का इनकार

गुजरात हाई कोर्ट ने गोमांस के साथ पकड़े गए आरोपित की जमानत याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने कहा कि आरोपित पर पहले से ही इस तरह के आठ मामले दर्ज हैं और पिछले मामलों में जमानत मिलने के बावजूद वह बार-बार ऐसे अपराध करता रहा है, इसलिए उसे रिहा नहीं किया जा सकता।

इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि हिंदू धर्म में गाय को पवित्र माना जाता है और गुजरात सरकार ने इसकी सुरक्षा के लिए सख्त कानून बनाए हैं। आरोपित की पहचान मोहम्मद आरिफ अब्दुल रजाक के रूप में हुई है। उसके खिलाफ दिसंबर 2025 में गोधरा पुलिस थाने में मामला दर्ज किया गया था।

3 जनवरी 2025 को उसे न्यायिक हिरासत में भेजा गया था और तभी से वह जेल में बंद है। आरिफ के खिलाफ गोधरा टाउन बी पुलिस थाने में गुजरात पशु संरक्षण अधिनियम, 2011 की धारा 5(1), 6(b), 8(2), 8(4) और 10 के साथ-साथ भारतीय न्याय संहिता की धारा 325 और गुजरात पुलिस एक्ट की धारा 119 के तहत FIR दर्ज की गई है।

क्या है पूरा मामला?

मामले की जानकारी के अनुसार, 1 दिसंबर 2025 को गोधरा पुलिस को सूचना मिली थी कि गोमांस की तस्करी की जा रही है। इस सूचना के आधार पर पुलिस ने मोहम्मद के घर पर छापा मारा, जहाँ से 23 किलो गोमांस बरामद हुआ। मौके से आरोपित मोहम्मद को गिरफ्तार कर लिया गया, जबकि अन्य आरोपित भागने में सफल हो गए।

जाँच में यह सामने आया कि मोहम्मद अपनी कार के जरिए गोमांस की तस्करी करता था और इसके लिए उसने कुछ अन्य लोगों को भी रखा हुआ था। हाई कोर्ट में आरोपित मोहम्मद आरिफ के वकील ने दलील दी कि वह 3 जनवरी से जेल में बंद है, जाँच पूरी हो चुकी है और चार्जशीट भी दाखिल की जा चुकी है।

अब मामले में कुछ भी बरामद करने के लिए बाकी नहीं है और ट्रायल में काफी समय लग सकता है। साथ ही यह भी कहा गया कि आरोपित का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, लेकिन जब राज्य सरकार ने अपनी दलील रखी, तो बताया गया कि मोहम्मद आरिफ के खिलाफ इस तरह के आठ मामले पहले भी दर्ज हो चुके हैं।

हर बार वह जमानत पर बाहर आकर फिर से गोमांस की तस्करी में शामिल हो जाता था। सरकार ने इन सभी मामलों की सूची कोर्ट में पेश करते हुए कहा कि आरोपित की गतिविधियों से सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ सकता है और कानून-व्यवस्था की स्थिति खराब हो सकती है। इसके अलावा जिन अन्य आरोपितों को मौके से पकड़ा जाना था, वे अभी फरार हैं।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री की जाँच करने के बाद कोर्ट ने जमानत याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया आरोपित के खिलाफ मामला बनता है। साथ ही कोर्ट ने यह भी माना कि आरोपित को पहले जमानत मिलने के बावजूद उसने उसकी स्वतंत्रता का दुरुपयोग करते हुए फिर से ऐसे अपराध करना जारी रखा।

कोर्ट ने क्या कहा?

कोर्ट ने इस मामले में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा, “संविधान कहता है कि हर नागरिक को पर्यावरण का संरक्षण करना चाहिए और अन्य जीवों के प्रति करुणा रखनी चाहिए। मूल अधिकार वैसे तो सीधे तौर पर लागू नहीं होते, लेकिन वे संविधान की मूल भावना और राज्य की मंशा को दर्शाते हैं।”

कोर्ट ने आगे कहा, “इन्हीं संवैधानिक निर्देशों को ध्यान में रखते हुए गुजरात सरकार ने पशु संरक्षण अधिनियम और पशुओं के प्रति क्रूरता रोकथाम अधिनियम बनाए हैं। गुजरात पशु संरक्षण अधिनियम के तहत गाय और उसके वंश के वध पर प्रतिबंध लगाया गया है और उनके संरक्षण व सुरक्षा के लिए प्रावधान किए गए हैं।”

कोर्ट ने कहा, “प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि आरोपित बार-बार गोवंश की हत्या और उसके अवैध परिवहन से जुड़े मामलों में शामिल रहा है। इस तरह की गतिविधियाँ सार्वजनिक व्यवस्था और सांप्रदायिक सौहार्द पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती हैं।”

‘गाय हिंदुओं के लिए पवित्र है, इसकी हत्या धार्मिक भावनाओं को पहुँचा सकती है ठेस

कोर्ट ने कहा, “कोर्ट इस तथ्य को भी नजरअंदाज नहीं कर सकता कि भारतीय समाज के एक बड़े वर्ग, विशेषकर हिंदू और जैन समुदाय के लिए गाय पवित्र है और वे उसके संरक्षण को बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं। ऐसे में बार-बार गोहत्या के मामलों में संलिप्तता लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचा सकती है और सामाजिक तनाव पैदा कर सकती है।”

कोर्ट ने आगे कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता जरूरी है और उसका महत्व भी है, लेकिन यह पूर्ण नहीं होती और इसके साथ समाज के व्यापक हितों को भी ध्यान में रखना होता है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता समाज के हितों पर हावी नहीं हो सकती। कोर्ट के लिए यह आवश्यक है कि आरोपित की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानून-व्यवस्था बनाए रखने से जुड़े सामाजिक हितों के बीच संतुलन बना रहे। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को मामले की सुनवाई तेजी से पूरी करने के निर्देश दिए हैं और अभियोजन पक्ष को भी कहा है कि वे जल्द से जल्द गवाहों की जाँच पूरी करें।

(मूल रुप से यह रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)


भारत में 45°C झेलने वाले हैरान, यूरोप में 43°C तापमान पर पिघल रहीं सड़कें: समझें कैसे ठंडे मौसम के लिए बने उनके घर ही बन गए सबसे बड़ी मुसीबत

यूरोप का नाम आते ही आम तौर पर बर्फ से ढके पहाड़, खूबसूरत शहर और सुहावना मौसम याद आता है। लेकिन इस समय महाद्वीप की तस्वीर बिल्कुल अलग है। फ्रांस से लेकर जर्मनी और स्पेन से लेकर ब्रिटेन तक, कई देश भीषण गर्मी की चपेट में हैं। हालात ऐसे हैं कि सोशल मीडिया पर सामने आ रहे वीडियो दुनिया भर का ध्यान खींच रहे हैं।

हालात इस कदर बदतर हो चुके हैं कि कई देशों से सड़कों और ट्रैफिक लाइटों के पिघलने के वीडियो सामने आ रहे हैं। लोग गर्मी से राहत पाने के लिए नदियों और झीलों का रुख कर रहे हैं। हीटवेव के बीच अतिरिक्त मौतों के आँकड़ों ने चिंता और बढ़ा दी है। इन तस्वीरों के बीच भारत में एक अलग बहस छिड़ गई है।

सवाल उठ रहा है कि जब भारत के कई शहर हर साल 45 डिग्री या उससे ज्यादा तापमान का सामना करते हैं, तो यूरोप में 40 से 43 डिग्री सेल्सियस पर हालात इतने गंभीर क्यों दिखाई दे रहे हैं? क्या वहाँ की गर्मी अलग है, या फिर सिर्फ तापमान के आधार पर तुलना करना ही गलत है?

यही सवाल हमें उस फर्क तक ले जाता है, जो थर्मामीटर पर नहीं बल्कि भूगोल, शहरों की बनावट, घरों की डिजाइन और जलवायु के साथ समाज की तैयारी में छिपा है।

यूरोप में गर्मी का कहर

यूरोप में इस बार की गर्मी को सिर्फ एक सामान्य मौसमीय घटना नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे हाल के वर्षों की सबसे गंभीर और व्यापक हीटवेव घटनाओं में गिना जा रहा है। कई देशों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुँच गया और उसके साथ स्वास्थ्य, परिवहन और बुनियादी ढाँचे पर दबाव भी तेजी से बढ़ने लगा।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, 21 जून के बाद से यूरोप में अत्यधिक गर्मी से जुड़ी 1300 से ज्यादा अतिरिक्त मौतें दर्ज की गई हैं। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि वास्तविक असर इससे बड़ा हो सकता है क्योंकि हीटवेव से जुड़ी मौतों का पूरा आँकड़ा अक्सर बाद में सामने आता है।

कई देशों में तापमान ने पुराने रिकॉर्ड भी तोड़े। जर्मनी के कुछ हिस्सों में तापमान 41 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुँच गया और नए रिकॉर्ड दर्ज किए गए। मध्य यूरोप के कई क्षेत्रों में जून के आखिरी दिनों में ऐसी गर्मी देखी गई जो सामान्य मौसमीय पैटर्न से बाहर मानी जा रही है।

कुछ देशों में स्वास्थ्य सेवाओं को अतिरिक्त सतर्कता अपनानी पड़ी, स्कूलों और सार्वजनिक गतिविधियों पर असर पड़ा और ऊर्जा व्यवस्था पर भी दबाव बढ़ा।

फ्रांस उन देशों में शामिल रहा जहाँ असर सबसे ज्यादा दिखाई दिया। वहाँ अपेक्षा से अधिक मौतों की रिपोर्ट की गई और स्वास्थ्य एजेंसियों ने बताया कि प्रभावित लोगों में बड़ी संख्या बुजुर्गों की थी। कई मौतें घरों के भीतर हुईं, जिसने एक और सवाल खड़ा किया कि क्या समस्या सिर्फ बाहर की धूप नहीं बल्कि रहने की व्यवस्था भी है?

इस गर्मी का असर सिर्फ लोगों तक सीमित नहीं रहा। सोशल मीडिया और स्थानीय रिपोर्टों में सड़कों, परिवहन सेवाओं और शहरी ढाँचे पर दबाव की तस्वीरें भी सामने आईं। इससे एक बात साफ हुई कि यूरोप की बड़ी चुनौती सिर्फ ऊँचा तापमान नहीं, बल्कि वह तैयारी है जो लंबे समय तक ठंडे मौसम के हिसाब से बनाई गई थी।

43°C पर इतना संकट क्यों?

डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, 43 डिग्री सेल्सियस तापमान अपने आप में हर जगह खतरनाक होता है, लेकिन इसका असर इस बात पर निर्भर करता है कि मानव शरीर उसे किस तरह से प्रोसेस कर पा रहा है। सिर्फ तापमान का आँकड़ा यह नहीं बताता कि शरीर पर वास्तविक दबाव कितना है।

जनरल फिजिशियन और हीट-रिलेटेड बीमारियों पर काम करने वाले विशेषज्ञ बताते हैं कि मानव शरीर का तापमान नियंत्रित करने का सबसे बड़ा तरीका पसीना है। जब शरीर गर्म होता है तो पसीना निकलता है और उसके वाष्पीकरण से शरीर ठंडा होता है। लेकिन अगर बाहरी वातावरण इस प्रक्रिया में बाधा डालता है, तो शरीर खुद को ठंडा नहीं कर पाता।

विशेषज्ञों के अनुसार, तीन मुख्य स्थितियाँ इस प्रक्रिया को सबसे ज्यादा प्रभावित करती हैं, हवा की गति, नमी और लगातार बना रहने वाला तापमान। अगर हवा स्थिर हो, नमी अधिक हो, या रात में भी तापमान कम न हो, तो शरीर पर गर्मी का असर तेजी से बढ़ता है। ऐसे हालात में शरीर लगातार ‘हीट स्ट्रेस’ की स्थिति में बना रहता है।

डॉक्टर यह भी बताते हैं कि लगातार कई दिनों तक उच्च तापमान रहने पर शरीर की थर्मोरेगुलेशन क्षमता कमजोर पड़ने लगती है। इसका मतलब है कि शरीर धीरे-धीरे गर्मी से निपटने की अपनी क्षमता खोने लगता है। यही कारण है कि हीटवेव के दौरान अचानक थकान, चक्कर, डिहाइड्रेशन और गंभीर मामलों में हीट स्ट्रोक जैसी स्थितियाँ सामने आती हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक, एक और महत्वपूर्ण कारक रात का तापमान है। अगर रात में पर्याप्त ठंडक नहीं मिलती, तो शरीर को रिकवरी का समय नहीं मिलता। यह लगातार तनाव जैसी स्थिति बनाता है, जो खासकर बुजुर्गों, बच्चों और पहले से बीमार लोगों के लिए ज्यादा खतरनाक होता है।

सूरज और भौगोलिक स्थिति का असर

यूरोप और भारत की गर्मी को समझने के लिए सिर्फ तापमान देखना काफी नहीं है। इसके पीछे भौगोलिक स्थिति और सूरज की भूमिका को समझना जरूरी है। यही वह हिस्सा है जो पहली नजर में दिखाई नहीं देता, लेकिन गर्मी के अनुभव को बहुत बदल देता है।

भारत भूमध्य रेखा के अपेक्षाकृत करीब स्थित है और यहाँ सालों से ऊँचा तापमान जीवन का सामान्य हिस्सा रहा है। दूसरी तरफ यूरोप काफी उत्तर में स्थित है। इसका मतलब यह नहीं कि वहाँ सूरज कम तेज होता है, बल्कि गर्मियों में सूरज का व्यवहार अलग हो जाता है। यूरोप के कई हिस्सों में गर्मियों के दौरान दिन बहुत लंबे हो जाते हैं।

कई देशों में 15 से 16 घंटे तक धूप बनी रहती है। यानी तापमान चाहे भारत के बराबर दिखे, लेकिन जमीन, सड़कें और इमारतें लंबे समय तक लगातार गर्मी सोखती रहती हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि यूरोप के शहरों में इस लंबे सोलर एक्सपोजर का असर देर शाम तक बना रहता है।

दिनभर धूप खाने वाली कंक्रीट, डामर और इमारतें रात में धीरे-धीरे वही गर्मी छोड़ती रहती हैं। नतीजा यह होता है कि रात में भी तापमान पर्याप्त नीचे नहीं गिरता और शरीर को रिकवरी का समय नहीं मिलता। यही वजह है कि कई लोग दिन की तुलना में रात की गर्मी को ज्यादा थकाने वाला अनुभव बताते हैं।

कुछ विशेषज्ञ बताते हैं कि भारत के कई हिस्सों में वातावरण में मौजूद धूल और अन्य सूक्ष्म कण सूरज की ऊर्जा को कुछ हद तक फैला देते हैं, जबकि यूरोप के कई क्षेत्रों में अपेक्षाकृत साफ आसमान और सीधी धूप गर्मी को ज्यादा तीखा महसूस करा सकती है। इसलिए सिर्फ तापमान देखकर यह मान लेना कि दोनों जगह असर समान होगा, पूरी तस्वीर नहीं दिखाता।

लेकिन इस बार सिर्फ सूरज और लंबे दिन ही वजह नहीं थे। यूरोप के ऊपर बना एक विशेष मौसमीय पैटर्न भी गर्मी को असामान्य स्तर तक ले गया। इसे ओमेगा ब्लॉक कहा जाता है। ओमेगा ब्लॉक तब बनता है जब वायुमंडल में एक हाई-प्रेशर सिस्टम लंबे समय तक एक क्षेत्र पर टिक जाता है और उसके दोनों तरफ लो-प्रेशर सिस्टम बने रहते हैं।

मौसम के नक्शे पर इसकी आकृति ग्रीक अक्षर ‘Ω’ जैसी दिखाई देती है, इसलिए इसे ओमेगा ब्लॉक कहा जाता है। सामान्य स्थिति में तेज हवाएं और जेट स्ट्रीम मौसम को आगे बढ़ाती रहती हैं, लेकिन इस स्थिति में मौसम जैसे एक जगह अटक जाता है। यूरोप में इस बार यही हुआ।

हाई-प्रेशर सिस्टम लंबे समय तक बना रहा और मौसम बदलने वाली हवाएँ कमजोर पड़ गईं। इसके कारण अफ्रीका की तरफ से आने वाली गर्म और सूखी हवा यूरोप के ऊपर फँसती चली गई। ठंडी हवाओं और बादलों की एंट्री सीमित हो गई। यहीं से हीट डोम जैसी स्थिति बनने लगी।

जब ऊपर हाई-प्रेशर मौजूद रहता है तो गर्म हवा ऊपर उठकर बाहर नहीं निकल पाती। वह वापस नीचे दबती है और और ज्यादा गर्म हो जाती है। इससे जमीन और तेजी से गर्म होती जाती है। बादल कम होने की वजह से सूरज की सीधी ऊर्जा लगातार सतह तक पहुँचती रहती है।

इस पूरी प्रक्रिया ने मिलकर यूरोप में ऐसी गर्मी पैदा की जिसमें सिर्फ तापमान नहीं बढ़ा, बल्कि गर्मी लगातार जमा होती चली गई। कम हवा, लंबे दिन, लगातार धूप, गर्म सतहें और रुका हुआ मौसम, इन सबने मिलकर वही हालात बनाए जिनकी तस्वीरें इन दिनों पूरी दुनिया देख रही है।

घरों की बनावट बनी मुसीबत

यूरोप में इस बार की गर्मी को समझने के लिए सिर्फ बाहर का तापमान देखना काफी नहीं है। एक बड़ी वजह उन घरों और इमारतों की बनावट भी है, जिनमें लोग रहते हैं। यूरोप के ज्यादातर हिस्सों में लंबे समय तक सबसे बड़ी मौसमीय चुनौती ठंड रही है, इसलिए वहाँ घरों को इस तरह डिजाइन किया गया कि सर्दियों में अंदर की गर्मी बाहर न निकले।

इसी सोच के कारण कई घरों में मोटी दीवारें, मजबूत इंसुलेशन, छोटी खिड़कियाँ और सीमित क्रॉस-वेंटिलेशन रखा गया। ठंड के मौसम में यह व्यवस्था बेहद कारगर होती है क्योंकि इससे घर अपेक्षाकृत गर्म रहते हैं और ऊर्जा की बचत होती है। लेकिन जब वही ढाँचा लगातार कई दिनों तक 40 डिग्री से ऊपर तापमान झेलता है, तो यही डिजाइन समस्या बनने लगता है।

दिनभर धूप और गर्म हवा से गर्म हुई दीवारें, छतें और खिड़कियाँ घर के अंदर गर्मी जमा करने लगती हैं। रात होने के बाद भी यह गर्मी जल्दी बाहर नहीं निकलती। नतीजा यह होता है कि घरों का तापमान लगातार ऊँचा बना रहता है और लोगों को आराम नहीं मिल पाता।

विशेषज्ञ बताते हैं कि जब शरीर को रात में भी ठंडा होने का मौका नहीं मिलता तो उसका असर सीधे स्वास्थ्य पर पड़ता है। लगातार गर्म माहौल में रहने से डिहाइड्रेशन, थकान, हीट एक्सॉशन और हीट स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। यही वजह है कि इस बार यूरोप में चर्चा सिर्फ बाहर की गर्मी की नहीं, बल्कि घरों के अंदर फँसी गर्मी की भी हुई।

AC और कूलिंग की चुनौती

यूरोप में गर्मी के इस संकट ने एक और ऐसी कमजोरी सामने ला दी जिस पर पहले बहुत कम ध्यान दिया जाता था- कूलिंग सिस्टम की कमी। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने सवाल उठाया कि जब तापमान इतना बढ़ गया तो लोग एयर कंडीशनर का इस्तेमाल क्यों नहीं कर रहे। लेकिन इसका जवाब यूरोप के मौसम और शहरी इतिहास में छिपा है।

यूरोप के ज्यादातर देशों में लंबे समय तक इतनी तेज और लगातार गर्मी सामान्य नहीं मानी जाती थी। इसलिए वहाँ घरों, अस्पतालों, स्कूलों और सार्वजनिक इमारतों में एयर कंडीशनिंग को जरूरी बुनियादी सुविधा की तरह विकसित नहीं किया गया। कई देशों में आज भी बड़ी संख्या में घर बिना एसी के हैं और लोग गर्मियों में प्राकृतिक वेंटिलेशन पर निर्भर रहते हैं।

लेकिन जब लगातार कई दिनों तक तापमान 40 डिग्री के आसपास बना रहे, रात में भी राहत न मिले और घर खुद गर्मी जमा करने लगें, तब सिर्फ खिड़कियाँ खोलना काफी नहीं होता। कई जगह लोगों ने पोर्टेबल कूलिंग यूनिट और अस्थायी इंतजामों का सहारा लेना शुरू किया। इसका असर स्वास्थ्य पर भी दिखाई दिया।

भारत और यूरोप की गर्मी में फर्क

भारत लंबे समय से गर्म जलवायु वाला देश रहा है। यहाँ के कई हिस्सों में ऊँचा तापमान सामान्य मौसमी अनुभव का हिस्सा है। इसी वजह से लोगों की दिनचर्या, रहने का तरीका और कई जगहों पर घरों की संरचना धीरे-धीरे गर्म मौसम के अनुसार विकसित हुई है।

दोपहर में काम कम करना, हल्के कपड़े पहनना, पानी और छाँव पर निर्भर रहना और गर्मी के हिसाब से जीवन को ढालना लंबे समय से यहाँ की सामाजिक आदतों का हिस्सा रहा है।
दूसरी तरफ यूरोप में लंबे समय तक इतनी तीव्र गर्मी सामान्य नहीं रही। वहाँ के शहर, घर और सार्वजनिक ढाँचा ठंड से बचने के लिए विकसित हुए।

कई घरों में गर्मी रोककर रखने वाला इंसुलेशन है, एयर कंडीशनिंग सीमित है और लगातार ऊँचे तापमान के लिए तैयारी कम रही है। इस गर्मी के दौरान एक और अंतर साफ दिखा कि यूरोप में लंबे दिन, कम हवा और लगातार गर्म रातों ने शरीर को राहत नहीं दी। ऊपर से वहाँ बुजुर्ग आबादी का अनुपात भी ज्यादा है, जो गर्मी के प्रति अधिक संवेदनशील मानी जाती है।

यही वजह है कि भारत और यूरोप की गर्मी की तुलना सिर्फ थर्मामीटर से नहीं, बल्कि मौसम, इंफ्रास्ट्रक्चर और लोगों की तैयारी के आधार पर करनी चाहिए।

तापमान नहीं, परिस्थितियाँ तय करती हैं असर

यूरोप की इस भीषण गर्मी ने एक बात साफ कर दी है कि सिर्फ तापमान देखकर किसी हीटवेव की गंभीरता को पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। असली असर उस पूरे सिस्टम पर निर्भर करता है जिसमें लोग रहते हैं, यानी मौसम, हवा, नमी, घरों की बनावट, शहरों की योजना और लोगों की तैयारी।

एक ही तापमान अलग-अलग जगहों पर अलग अनुभव दे सकता है, क्योंकि शरीर का गर्मी से सामना केवल थर्मामीटर की संख्या से नहीं होता। अगर रात में राहत न मिले, हवा न चले, घरों के अंदर गर्मी जमा होती रहे और शरीर को ठंडा होने का समय न मिले, तो वही तापमान ज्यादा खतरनाक बन जाता है।

यूरोप की मौजूदा स्थिति ने दिखाया कि जब कोई क्षेत्र लंबे समय तक ठंडे मौसम के हिसाब से विकसित हुआ हो और अचानक वहाँ लगातार तेज गर्मी आने लगे, तो उसका असर सिर्फ मौसम तक सीमित नहीं रहता। वह स्वास्थ्य, इंफ्रास्ट्रक्चर और रोजमर्रा की जिंदगी को भी प्रभावित करता है।

इसीलिए विशेषज्ञ बार-बार इस बात पर जोर देते हैं कि गर्मी को समझने के लिए केवल डिग्री नहीं, बल्कि पूरी परिस्थितियों को देखना जरूरी है। यही वजह है कि इस बार की हीटवेव ने सिर्फ तापमान का रिकॉर्ड नहीं तोड़ा, बल्कि यह सवाल भी खड़ा किया कि बदलते मौसम के साथ दुनिया कितनी तैयार है।

पाकिस्तान में छिड़ी थी 5 कबीलों की लड़ाई, 11 साल में 11 लाशें गिरने के बाद ‘जिरगा’ में हुई ‘पीस डील’: जानें आतंकी मुल्क में क्यों छिड़ा था भीषण घमासान

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के मियांवाली जिले में पाँच प्रमुख कबीलों के बीच 11 साल से चल रहा खूनी संघर्ष आखिरकार समाप्त हो गया। रविवार (28 जून 2026) को एक सुलह समारोह के दौरान प्रतिद्वंद्वी परिवारों ने एक-दूसरे को गले लगाकर वर्षों पुरानी दुश्मनी खत्म करने की औपचारिक घोषणा की।

इस संघर्ष में अब तक 11 लोगों की मौत हो चुकी थी और 9 अन्य घायल हुए थे। यह झगड़ा कुंडी, कालो, बिखन खेल, हजारा खेल और यारो खेल कबीलों के बीच 2015 से लगातार हिंसा का कारण बना हुआ था।

2015 में शुरू हुआ था पहला बड़ा खूनी संघर्ष

इस लंबे विवाद की शुरुआत वर्ष 2015 में मियांवाली के वान भच्छरन थाना क्षेत्र में हुई थी, जब यारो खेल कबीले के दो भाइयों अशरफ खान और असगर खान समेत उनके सहयोगियों मोहम्मद जमान हजारा खेल और शेर अब्बास भट्टी की हत्या कर दी गई थी।

इसी हिंसा में कालो कबीले के मोहम्मद लतीफ की भी जान चली गई थी। इस घटना ने कबीलों के बीच तनाव को इतना बढ़ा दिया कि बदले की आग लगातार भड़कती रही और क्षेत्र में कई बार हिंसक झड़पें होती रहीं।

तीन साल बाद 2018 में मियांवाली सिटी थाना क्षेत्र में एक और बड़ा हमला हुआ, जब कालो और कुंडी कबीलों के लोग अदालत की सुनवाई में जा रहे थे, तभी घात लगाकर उन पर हमला कर दिया गया। इस हमले में अब्दुल वहीद कालो, मोहम्मद मेहरान कुंडी, मोहम्मद नोमान कुंडी और दो राहगीरों की मौत हो गई।

इसके बाद 2019 में कायदाबाद के पास हुई एक और घटना में अशरफ खान बिखन खेल की हत्या कर दी गई, जिसने दोनों पक्षों के बीच दुश्मनी को और गहरा कर दिया।

11 साल बाद खत्म हुआ लंबा संघर्ष

इस संघर्ष को समाप्त कराने में मियां रियाज मियाना, शौकत खान, सिब्तैन खान और इंस्पेक्टर इरफान गुज्जर की अहम भूमिका मानी जा रही है। लंबे संवाद और भरोसा बहाली की कोशिशों के बाद आखिरकार मियांवाली के नूर मार्केट में सुलह समारोह आयोजित किया गया।

इस कार्यक्रम में पंजाब के राज्यपाल सरदार सलीम हैदर खान समेत कई पूर्व सांसद, राजनीतिक नेता और स्थानीय लोग मौजूद रहे। समारोह के दौरान कबीलों के सदस्यों ने एक-दूसरे को गले लगाकर दुश्मनी खत्म करने की घोषणा की।

राज्यपाल ने इसे सामाजिक स्थिरता और शांति की दिशा में अहम कदम बताया। इसी मौके पर अकरम खान ने 12 मिलियन रुपए के किसास (खून बहा) को माफ करने की घोषणा करते हुए कहा कि उन्होंने यह फैसला अल्लाह की रजा के लिए लिया है।

राम मंदिर न जाने के लिए अखिलेश का राजनीतिक बहाना: असल मकसद है हिंदू बनाम हिंदू की लड़ाई और वोटरों को साधना

उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर राम मंदिर, सनातन और तुष्टिकरण का मुद्दा गरमा गया है। समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया अखिलेश यादव द्वारा अयोध्या में राम मंदिर के दर्शन न करने और उसके बदले अन्य धार्मिक स्थलों का रुख करने को लेकर सियासी गलियारों में तीखी बहस छिड़ गई है।

उत्तर प्रदेश की सियासत में राम मंदिर और अयोध्या हमेशा से धुरी रहे हैं। दरअसल, अखिलेश यादव का राम मंदिर न जाना कोई सामान्य फैसला नहीं, बल्कि एक सोची-समझी चुनावी रणनीति का हिस्सा है। उनका असल मकसद बहुसंख्यक समाज के भीतर ही ‘हिंदू बनाम हिंदू’ की एक नई राजनीतिक रेखा खींचना और अपने पारंपरिक वोटरों को एकजुट रखना है।

इस राजनीतिक उठापटक के बीच, अखिलेश यादव द्वारा राम मंदिर न जाने के पीछे केदारेश्वर मंदिर के दर्शन को एक ढाल की तरह इस्तेमाल करने के मामले को अगर देखा जाए, तो यह साफ है कि उन्होंने अयोध्या की भव्यता से ध्यान भटकाने के लिए केदारेश्वर मंदिर जाने का सिर्फ एक तात्कालिक बहाना बनाया।

अखिलेश यादव ने रविवार (28 जून 2026) को कहा कि इटावा में बन रहे केदारेश्वर शिव मंदिर का काम पूरा होने के बाद वह अयोध्या में स्थित राम मंदिर के दर्शन करने के लिए जाएँगे।

हालाँकि बात सिर्फ इतनी सी नहीं है। इस बहानेबाजी के पीछे सपा का एक लंबा इतिहास, चुनावी मजबूरियाँ और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा उनके प्रोपेगेंडा को ध्वस्त किए जाने की पूरी कहानी छिपी है, जिसे विस्तार से समझना जरूरी है।

राम मंदिर से दूरी और ‘हिंदू बनाम हिंदू’ की नई सियासी जंग

अखिलेश यादव का राम मंदिर से दूरी बनाना और अन्य धार्मिक स्थलों का रुख करना उनके किसी व्यक्तिगत लगाव की कमी को नहीं, बल्कि उनकी सोची-समझी चुनावी महत्वाकांक्षा को दर्शाता है। आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए सपा एक ऐसी पिच तैयार करने की कोशिश कर रही है, जहाँ वह खुद को एक अलग तरह के हिंदू नैरेटिव के साथ पेश कर सके।

अखिलेश यादव भली-भांति जानते हैं कि आज के दौर में सनातन या राम मंदिर का सीधा विरोध करना उनके लिए राजनीतिक रूप से आत्मघाती साबित हो सकता है। इसलिए उन्होंने एक नई रणनीति अपनाई है, जो है हिंदुओं को ही आपस में लड़ाना।

चढ़ावा चोरी जैसे विवादित बयान देकर वह यह दिखाना चाहते हैं कि वे सनातन के विरोधी नहीं हैं, बल्कि मंदिर व्यवस्था या पुजारियों के एक वर्ग के खिलाफ हैं। इस प्रोपेगेंडा के जरिए वे भाजपा के ‘राष्ट्रवादी और सांस्कृतिक’ हिंदुत्व के समानांतर एक ऐसा वर्ग खड़ा करना चाहते हैं, जो आपस में ही बंटा रहे। यानी ‘हिंदू बनाम हिंदू’ की यह लड़ाई इसलिए लड़ी जा रही है ताकि बहुसंख्यक वोट बैंक में सेंध लगाई जा सके और साथ ही सपा का जो अपना पारंपरिक मुस्लिम-यादव (M-Y) समीकरण है, उसे यह संदेश दिया जा सके कि पार्टी अभी भी भाजपा के कोर एजेंडे के सामने पूरी तरह नतमस्तक नहीं हुई है। यह राजनीति पूरी तरह से वोट बैंक को साधने और सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ने के लिए बुनी गई है।

सपा का ‘काला इतिहास’: 1990 का वो दौर जब सरयू का जल हुआ था लाल

अखिलेश यादव की आज की राजनीति को समझने के लिए उनकी पार्टी के उस अतीत को देखना होगा, जिसे भारतीय राजनीति का एक बेहद कड़वा और विवादित अध्याय माना जाता है। राम मंदिर निर्माण को लेकर समाजवादी पार्टी का इतिहास हमेशा से विरोधाभासों और विवादों से घिरा रहा है, जो आज भी समय-समय पर उनकी राजनीतिक कलई खोल देता है।

इतिहास गवाह है कि जब 1990 में अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन अपने चरम पर था, तब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव थे। 30 अक्टूबर और 2 नवंबर 1990 को अयोध्या में जो कुछ हुआ, उसकी गूँज आज भी हर सनातनी के दिल में दर्द पैदा करती है।

मुलायम सरकार के सख्त आदेश पर अयोध्या में जमा हुए निहत्थे और शांतिपूर्ण कारसेवकों पर पुलिस ने बेरहमी से गोलियाँ चला दी थीं। इस ऐतिहासिक और कड़वे सच से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता कि उस फायरिंग में दर्जनों रामभक्तों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी और कहा जाता है कि सरयू नदी का जल सनातनियों के खून से लाल हो गया था।

मुल्ला-मुलायम की मिली थी उपाधि

अयोध्या में हिंदुओं के नरसंहार की इस घटना के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति का रुख पूरी तरह बदल गया। मुलायम सिंह यादव की सरकार ने बाद में रामभक्तों पर गोलियाँ चलाने वाले पुलिसकर्मियों और अधिकारियों पर दर्ज मुकदमों को भी वापस ले लिया था। राजनीतिक गलियारों में यह साफ माना गया कि यह कदम एक खास समुदाय (मुस्लिमों) को खुश करने और अपना वोट बैंक पक्का करने के लिए उठाया गया था। इसी दौर में उन्हें ‘मुल्ला मुलायम’ की उपाधि तक दे दी गई थी।

आज जब अखिलेश यादव खुद को एक नए रूप में पेश करने की कोशिश करते हैं, तो उनकी पार्टी का यही इतिहास उनके दावों के आड़े आ जाता है। जनता के सामने यह विरोधाभास साफ दिखता है कि जिस मंदिर आंदोलन को कभी सपा ने पूरी ताकत से रोकने की कोशिश की, आज उसी मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा और दर्शन को लेकर वे असहज नजर आते हैं।

‘चढ़ावा चोरी’ का प्रोपेगेंडा और सीएम योगी की दो-टूक चुनौती

अखिलेश यादव ने हाल ही में धार्मिक स्थलों और आयोजनों में ‘चढ़ावे और प्रबंधन’ को लेकर सवाल उठाए थे। अखिलेश ने जानबूझकर ‘चढ़ावा चोरी’ का मुद्दा उछाला ताकि इसके जरिए वह हिंदू समाज और संतों के एक वर्ग को मंदिर प्रबंधन या सरकार के खिलाफ खड़ा कर सकें। यह भी ‘हिंदू बनाम हिंदू’ के उसी प्रोपेगेंडा का हिस्सा था, जिसके जरिए वे बहुसंख्यकों के बीच अविश्वास की भावना पैदा करना चाहते थे।

रामपुर में जनसभा को संबोधित करते हुए सीएम योगी ने कहा कि जो लोग ‘जय श्री राम’ का नारा लगाने वालों पर लाठीचार्ज करवाते थे, वे आज राम भक्ति की वकालत कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जो लोग राम भक्तों पर गोलियाँ चलवाते थे, वे आज भगवान राम के प्रति भक्ति की बातें कर रहे हैं। सीएम योगी ने कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी, जिसने 2017 से पहले भगवान राम और भगवान कृष्ण में विश्वास करने से इनकार कर दिया था, आज अयोध्या जाने के लिए उत्सुक है। सीएम योगी ने आगे कहा कि भगवान राम जानते हैं कि कौन सही है और कौन गलत।

सीएम योगी ने हनुमान का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि रामभक्ति हर प्रकार की बाधा को दूर करने का सामर्थ्य देती है। रामभक्ति ऐसे कालनेमियों को निपटाने में पूरी सहायक है। उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी और कॉन्ग्रेस पहले भगवान राम और भगवान श्रीकृष्ण के अस्तित्व पर सवाल उठाती थीं, लेकिन आज अयोध्या जाने की होड़ लगी हुई है।

सीएम योगी ने अखिलेश को दी मथुरा की चुनौती

इससे पहले, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रविवार (28 जून 2026) को हाथरस में अखिलेश यादव पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि अयोध्या को धार्मिक नगरी बनाने की बात करने वालों को पहले अपना इतिहास देखना चाहिए। जिनकी सरकार में रामभक्तों पर गोलियां चलीं, काँवड़ यात्रा पर रोक लगी और कृष्ण जन्माष्टमी जैसे धार्मिक आयोजनों तक को दबाने की कोशिश हुई। आज जब राम भक्तों के परिश्रम और पुरुषार्थ से प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में अयोध्या अब त्रेता युग का स्मरण करा रही है, तो इनके भी मुँह में पानी आने लग गया है। अब तैयारी करिये कि हम कृष्ण कन्हैया के लिए भी कुछ कर सकें।

उन्होंने आगे बोलते हुए कहा कि अखिलेश यादव अब मथुरा की बात करिए, अगर सचमुच अपने को धार्मिक कहलाने का प्रयास कर रहे हो तो मथुरा-वृंदावन, श्रीकृष्णजन्मभूमि पर खुलकर बोल दीजिए। उन्होंने कहा, “बोलिये कि राम जन्मभूमि मुक्ति के आंदोलन की तर्ज पर ही कृष्ण जन्मभूमि की मुक्ति का भी अभियान चलना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि को भी सम्मान मिलना चाहिए। हमारी सरकार वहाँ श्रद्धालुओं को बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध कराने का कार्य कर रही है।”

दरअसल, अखिलेश ने कहा था कि वो अयोध्या को धार्मिक नगरी में बदलेंगे। इसी के बाद सीएम योगी ने उन पर पलटवार किया और कहा, “अखिलेश में हिम्मत नहीं है, क्यों कि मुल्ला और मोलबियों के सामने घुटने टेकने के सिवाय उनके पास कोई ऐसा एजेंडा नहीं जो प्रदेश के विकास के लिए हो। अयोध्या, मथुरा या काशी के उत्थान के लिए हो, उनकी पहचान को पौराणिक पहचान दिलाने के लिए हो।”

तुष्टिकरण बनाम सांस्कृतिक राष्ट्रवाद

अखिलेश यादव की मौजूदा राजनीतिक छटपटाहट यह साफ करती है कि वे एक तरफ अपने पारंपरिक मुस्लिम मतदाताओं को छिटकने नहीं देना चाहते, और दूसरी तरफ भाजपा के मजबूत हिंदू वोट बैंक में दरार डालना चाहते हैं। लेकिन राम मंदिर जैसे बेहद संवेदनशील और आस्था से जुड़े विषय पर इस तरह की बहानेबाजी और ‘हिंदू बनाम हिंदू’ की खाई पैदा करने की कोशिशें जनता की नजरों से छिपी नहीं हैं।

1990 के कारसेवक गोलीकांड का काला इतिहास और हाल के दिनों में तुष्टिकरण की राजनीति के जो सबूत (जैसे गंगा पर इफ्तार पार्टियां) सामने आए हैं, वे समाजवादी पार्टी की धर्मनिरपेक्षता के दावों की पोल खोलते हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सीधी चुनौतियों और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मजबूत नैरेटिव के सामने अखिलेश यादव का यह नया राजनीतिक प्रयोग फिलहाल पूरी तरह असफल होता दिखाई दे रहा है।

कुल मिलाकर देखें तो अखिलेश यादव की मौजूदा रणनीति पूरी तरह बेनकाब हो चुकी है। चूँतकि मतदाता अब तुष्टिकरण और छद्म धर्मनिरपेक्षता के खेल को अच्छी तरह समझने लगा है, ऐसे में अखिलेश यादव के लिए ‘हिंदू बनाम हिंदू’ का यह प्रोपेगेंडा उल्टा पड़ता दिखाई दे रहा है।

अंडरडॉग्स ने हिला दिया विश्व फुटबॉल: ब्राज़ील बचा, जर्मनी और नीदरलैंड्स बाहर

फुटबॉल में सबसे ख़तरनाक टीम वह नहीं होती जिसके पास सबसे बड़े सितारे हों। सबसे ख़तरनाक टीम वह होती है, जिसे हारने का डर नहीं होता। विश्व कप का इतिहास बार-बार यही सिखाता आया है कि नॉकआउट फुटबॉल में प्रतिष्ठा, इतिहास और ट्रॉफियाँ केवल कागज़ पर लिखी बातें हैं। मैदान पर अंततः वही टीम जीतती है जो अंतिम सीटी तक उम्मीद नहीं छोड़ती।

एक ऐतिहासिक जापानी एनीमे सीरीज़ है, Neon Genesis Evangelion। उसमें एक यादगार किरदार है मिसातो कात्सुरागी। इस सीरीज़ में वह कहती हैं, “Giving up halfway is worse than never trying at all.” अर्थात, बीच रास्ते हार मान लेना, कभी कोशिश ही न करने से भी अधिक बुरा है।

बीती रात और आज खेले गए फीफा विश्व कप के राउंड ऑफ 32 के मुकाबलों ने इस एक पंक्ति को बार-बार सच साबित किया। कहीं आख़िरी मिनट में वापसी हुई, कहीं इतिहास बदल गया और कहीं हारने वाली टीम भी पूरे विश्व का दिल जीतकर मैदान से बाहर निकली। फुटबॉल के लिहाज़ से यह सिर्फ़ एक नॉकआउट राउंड ना होकर साहस, धैर्य और उम्मीद का उत्सव था।

इस कहानी की शुरुआत होती है ह्यूस्टन से, जहाँ पाँच बार की विश्व विजेता ब्राज़ील के सामने थी एशिया की सबसे अनुशासित और निडर टीम- जापान।

सबसे पहले बीती रात ह्यूस्टन के स्टेडियम में ब्राज़ील का सामना एशियाई महाद्वीप के ‘जाएंट स्लेयर’ जापान से था। स्टेडियम में बड़ी संख्या में दर्शक मौजूद थे। पीली जर्सियाँ पहने ब्राज़ीलियाई समर्थक अपनी टीम का उत्साह बढ़ाने पहुँचे थे, जबकि जापान इतिहास रचने की उम्मीद के साथ मैदान में उतरा था।

मैच शुरू होते ही दोनों टीमों ने आक्रामक रुख अपनाया। दोनों की कोशिश थी कि शुरुआती बढ़त हासिल कर मुकाबले को अतिरिक्त समय या पेनाल्टी शूटआउट तक जाने से रोका जाए। पहले हाफ में जापान ने अपेक्षाकृत अधिक संगठित और आत्मविश्वास भरा खेल दिखाया। उसके खिलाड़ी लगातार ब्राज़ील पर दबाव बनाए रखते रहे।

मैच के 29वें मिनट में 25 वर्षीय काएशू सानो ने शानदार गोल दागकर जापान को 1-0 की बढ़त दिला दी। यह जापान की राष्ट्रीय टीम के लिए उनका पहला अंतरराष्ट्रीय गोल था। विश्व कप के नॉकआउट मुकाबले में, वह भी ब्राज़ील जैसी दिग्गज टीम के खिलाफ, अपनी राष्ट्रीय टीम के लिए पहला गोल करना किसी भी खिलाड़ी के लिए अविस्मरणीय क्षण होता। गोल होते ही स्टेडियम में सनसनी फैल गई।

इसके बाद विनीसियस जूनियर और उनके साथी खिलाड़ियों ने लगातार बराबरी हासिल करने की कोशिश की, लेकिन जापान ने अनुशासित रक्षात्मक खेल का शानदार प्रदर्शन किया। गोलकीपर सुज़ुकी ने भी कई अहम बचाव करते हुए ब्राज़ील को निराश किया। पहले हाफ की समाप्ति तक स्कोर 1-0 से जापान के पक्ष में रहा। ब्राज़ीलियाई समर्थकों का पीला समंदर चिंता में डूबा दिखाई दे रहा था।

दूसरे हाफ की शुरुआत के साथ ही ब्राज़ील पूरी तरह बदली हुई टीम की तरह मैदान पर उतरा। खिलाड़ियों की ऊर्जा, आक्रामकता और प्रतिबद्धता पहले से कहीं अधिक दिखाई दे रही थी। इसका असर भी ज्यादा देर तक इंतज़ार नहीं करवाता।

अनुभवी मिडफील्डर कैसेमीरो ने जापानी रक्षा पंक्ति को चकमा देते हुए एक शानदार हेडर लगाया। गेंद सीधे जाल में समा गई और ब्राज़ील ने मुकाबले में 1-1 की बराबरी कर ली। पूरे स्टेडियम में फिर से जान लौट आई।

इसके बाद मुकाबला लगातार रोमांचक होता गया। ब्राज़ील ने आक्रमणों की रफ्तार और तेज कर दी, जबकि जापानी खिलाड़ी पूरे समर्पण के साथ रक्षा करते रहे। सुज़ुकी लगातार बेहतरीन बचाव करते हुए अपनी टीम को मुकाबले में बनाए हुए थे। समय बीतने के साथ ऐसा लगने लगा कि मैच अतिरिक्त समय में जाएगा।

लेकिन फुटबॉल का सबसे बड़ा आकर्षण यही है कि अंतिम सीटी बजने तक कुछ भी निश्चित नहीं होता। ब्राज़ील लगातार हमले कर रहा था। दाएँ फ्लैंक से आया एक आक्रमण जापानी रक्षा पंक्ति से टकराकर उछला और गेंद जर्सी नंबर 22 पहने गैब्रिएल मार्टिनेली के सामने आ गिरी। उनके सामने दो जापानी डिफेंडर मौजूद थे। मार्टिनेली ने एक पल भी गंवाए बिना शानदार नियंत्रण दिखाया और गोलकीपर को छकाते हुए गेंद को गोलपोस्ट के दाएँ कोने में पहुँचा दिया।

ह्यूस्टन का स्टेडियम खुशी से गूंज उठा। ब्राज़ीलियाई समर्थकों का उत्साह चरम पर था। कुछ ही मिनट बाद रेफरी ने अंतिम सीटी बजाई और ब्राज़ील ने 2-1 से मुकाबला जीतकर अगले दौर (राउंड ऑफ 16) में अपनी जगह पक्की कर ली।

उधर, जापानी खिलाड़ियों के चेहरों पर निराशा साफ झलक रही थी। कई खिलाड़ियों की आँखें नम थीं। उनके समर्थकों के लिए भी यह हार बेहद भावुक करने वाली थी। मैच समाप्त होते ही मुख्य कोच हाजिमे मोरियासु मैदान पर पहुँचे और अपने खिलाड़ियों को गले लगाकर उनके साहस, अनुशासन और जुझारूपन की सराहना की। स्टैंड्स में मौजूद जापानी समर्थकों ने तालियों की गड़गड़ाहट से अपनी टीम का उत्साह बढ़ाया। जवाब में खिलाड़ियों और कोचिंग स्टाफ ने झुककर अपने समर्थकों का अभिवादन किया।

दरअसल, जापान के लिए यह विश्व कप शुरू होने से पहले ही चुनौतियों से भर गया था। टूर्नामेंट से पहले उसके कई प्रमुख खिलाड़ी चोटों से जूझ रहे थे। काओरू मितोमा और ताकुमी मीनामिनो पहले ही बाहर हो चुके थे। टूर्नामेंट शुरू होने से लगभग एक सप्ताह पहले कप्तान वातारू एंडो भी चोटिल होकर पूरी प्रतियोगिता से बाहर हो गए। इसके बाद स्टार खिलाड़ी टाकेफुसा कुबो भी पहले ही मैच के दौरान चोटिल हो गए और आगे नहीं खेल सके।

इन तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद जापान ने जिस साहस, अनुशासन और सामूहिक खेल का प्रदर्शन किया, उसने दुनिया भर के फुटबॉल प्रेमियों का दिल जीत लिया। वे भले ही यह मुकाबला हारकर घर लौटेंगे, लेकिन अपने प्रदर्शन से उन्होंने सम्मान, प्रशंसा और असंख्य शुभकामनाएँ जरूर अर्जित कर ली हैं।

आज खेले गए राउंड ऑफ 32 के बाकी तीनों मुकाबले किसी बेहतरीन मलयाली क्राइम थ्रिलर से कम रोमांचक नहीं थे। ब्राज़ील को जापान के खिलाफ अंतिम क्षणों तक संघर्ष करना पड़ा, लेकिन वह तो मानो इस नाटकीय दिन की भूमिका भर थी। असली कहानी अभी बाकी थी।

अगला मुकाबला बोस्टन में खेला जाना था, जहाँ चार बार की विश्व विजेता और खिताब की प्रबल दावेदार जर्मनी का सामना दक्षिण अमेरिकी टीम पराग्वे से था।

मुख्य कोच जूलियन नागेल्समान ने अपनी टीम को 4-2-3-1 फॉर्मेशन में मैदान पर उतारा। पिछले मुकाबले में इक्वाडोर से मिली हार को पीछे छोड़ते हुए जर्मनी जीत के साथ क्वार्टर फाइनल में जगह बनाना चाहता था। दूसरी ओर पराग्वे की टीम पर किसी तरह का अतिरिक्त दबाव नहीं था। वह पूरे आत्मविश्वास के साथ मैदान में उतरी थी और जानती थी कि यदि उसने शुरुआती दबाव झेल लिया, तो जर्मनी की बेचैनी ही उसकी सबसे बड़ी ताकत बन सकती है।

मैच की शुरुआत अपेक्षा के अनुरूप हुई। जर्मनी ने गेंद पर नियंत्रण बनाए रखा और लगातार छोटे-छोटे पासों के जरिए खेल को आगे बढ़ाने की कोशिश की। लेकिन उसके अधिकांश आक्रमण अंतिम तिहाई तक पहुँचते-पहुँचते बिखर जाते। पराग्वे ने अपनी रक्षापंक्ति को बेहद अनुशासित रखा और जर्मन खिलाड़ियों को खुलकर खेलने का अवसर नहीं दिया।
जर्मनी के पास गेंद जरूर अधिक थी, लेकिन उसके खेल में वह धार दिखाई नहीं दे रही थी जिसकी उससे उम्मीद की जाती है। पेनाल्टी बॉक्स के आसपास पहुँचने के बाद भी निर्णायक पास और सटीक फिनिशिंग का अभाव साफ़ नज़र आ रहा था। दूसरी ओर पराग्वे हर अवसर का धैर्यपूर्वक इंतज़ार कर रहा था।

फिर आया मैच का 42वाँ मिनट।

पराग्वे को कॉर्नर किक मिली। गेंद बॉक्स के भीतर पहुँची और महज़ साढ़े पाँच फ़ुट लंबे 22 वर्षीय जूलियो इनसिसो ने ऊँची छलांग लगाते हुए शानदार हेडर लगाया। गेंद सीधे जाल में समा गई और पराग्वे ने 1-0 की अप्रत्याशित बढ़त हासिल कर ली।

गोल होते ही पराग्वे के खिलाड़ी खुशी से झूम उठे, जबकि जर्मन डगआउट में सन्नाटा पसर गया। स्टेडियम में मौजूद हजारों जर्मन समर्थक कुछ पल के लिए बिल्कुल शांत हो गए। पहले हाफ की समाप्ति तक यही स्कोर बना रहा।
हाफ टाइम के दौरान नागेल्समान अपने खिलाड़ियों से लंबी चर्चा करते दिखाई दिए। स्पष्ट था कि अब केवल गेंद पर कब्ज़ा बनाए रखना पर्याप्त नहीं होगा। जर्मनी को परिणाम चाहिए था।

दूसरे हाफ की शुरुआत के साथ ही जर्मन टीम ने अपने खेल की गति बढ़ा दी। लगातार दबाव का असर आखिरकार 56वें मिनट में दिखाई दिया। फ्लोरियन विर्ट्ज़ ने शानदार विज़न का परिचय देते हुए सटीक पास काई हावर्ट्ज़ तक पहुँचाया। हावर्ट्ज़ ने बिना कोई गलती किए गेंद को गोलपोस्ट के भीतर भेज दिया और जर्मनी ने मुकाबले में 1-1 की बराबरी कर ली।

इसके बाद ऐसा लगा कि अब मैच पूरी तरह जर्मनी की ओर झुक जाएगा। लेकिन पराग्वे ने हार नहीं मानी। उसकी पूरी टीम एकजुट होकर रक्षण करती रही। जर्मनी लगातार गोल की तलाश में आक्रमण करता रहा, लेकिन हर बार पराग्वे का कोई न कोई खिलाड़ी उसके सामने दीवार बनकर खड़ा हो गया। कई मौकों पर जर्मनी बेहद करीब पहुँचा, लेकिन अंतिम स्पर्श या तो चूक गया या फिर पराग्वे की रक्षापंक्ति ने खतरे को टाल दिया।

90 मिनट का निर्धारित समय समाप्त हुआ और स्कोर 1-1 पर बराबर रहा। मुकाबला अतिरिक्त समय में पहुँच गया।
एक्स्ट्रा टाइम शुरू होते ही पराग्वे ने रणनीतिक बदलाव किया। अनुभवी मिडफील्डर मिगुएल अलमिरोन को बाहर बुलाकर एक अतिरिक्त डिफेंडर मैदान पर उतारा गया। संदेश बिल्कुल साफ़ था; अब हर हाल में मैच को पेनाल्टी शूटआउट तक ले जाना है।

दूसरी ओर जर्मनी किसी भी कीमत पर शूटआउट से बचना चाहता था।

जोशुआ किमिख, निक वोल्टेमाडे, फ्लोरियन विर्ट्ज़ और काई हावर्ट्ज़ लगातार अवसर बनाने की कोशिश करते रहे। गेंद बार-बार पराग्वे के पेनाल्टी क्षेत्र में पहुँचती, लेकिन हर बार कोई न कोई लाल-सफेद जर्सी उसके सामने आ खड़ी होती। पराग्वे का सामूहिक रक्षण पूरे मुकाबले में उसकी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरा।

एक अवसर पर काई हावर्ट्ज़ ने फिर शानदार हेडर लगाया, लेकिन वह भी गोल में तब्दील नहीं हो सका। धीरे-धीरे अतिरिक्त समय भी समाप्ति की ओर बढ़ा। पूरे 120 मिनट बीत गए, लेकिन दोनों टीमें एक-दूसरे की बराबरी पर रहीं।
अब फैसला पेनाल्टी शूटआउट से होना था।

पहली कुछ पेनाल्टियों के बाद मुकाबला बराबरी पर चलता रहा, लेकिन फिर दबाव ने जर्मनी का साथ छोड़ दिया। काई हावर्ट्ज़, निक वोल्टेमाडे और जोनाथन ताह अपनी-अपनी पेनाल्टी को गोल में तब्दील नहीं कर सके। दूसरी ओर पराग्वे ने संयम बनाए रखा और आखिरकार शूटआउट 4-3 से अपने नाम कर लिया।

अंतिम पेनाल्टी गोल में जाते ही पराग्वे के खिलाड़ी मैदान पर दौड़ पड़े। बेंच से पूरा कोचिंग स्टाफ खुशी में मैदान के भीतर आ गया। खिलाड़ियों की आँखों में अविश्वास और खुशी एक साथ दिखाई दे रही थी। उन्होंने विश्व फुटबॉल की सबसे सफल टीमों में से एक को विश्व कप से बाहर कर दिया था।

इसके साथ ही एक नया इतिहास भी दर्ज हुआ।

यह पहली बार था जब जर्मनी विश्व कप के किसी पेनाल्टी शूटआउट में पराजित हुआ। वर्षों तक शूटआउट में अजेय रहने वाली जर्मन टीम आखिरकार इस बार दबाव के आगे टिक नहीं सकी।

मैच के बाद सोशल मीडिया पर कुछ प्रशंसकों ने मज़ाकिया अंदाज़ में इसे ‘मेसुत ओज़िल का श्राप’ तक कहना शुरू कर दिया। हालांकि यह केवल प्रशंसकों की प्रतिक्रिया थी, लेकिन इतना तय है कि लगातार तीसरे विश्व कप में अपेक्षाकृत कमज़ोर मानी जा रही टीम के हाथों जर्मनी की विदाई उसके फुटबॉल ढाँचे पर गंभीर सवाल खड़े करेगी।
कप्तान जोशुआ किमिख सहित कई वरिष्ठ खिलाड़ियों के लिए यह शायद विश्व कप का आख़िरी अध्याय साबित हो। आने वाले वर्षों में जर्मन फुटबॉल को बड़े बदलावों से गुजरना पड़ सकता है।

उधर, पराग्वे में जश्न का माहौल था। खिलाड़ियों ने अपने समर्थकों के साथ इस ऐतिहासिक जीत का भरपूर उत्सव मनाया। विश्व कप ने एक बार फिर साबित कर दिया कि नॉकआउट फुटबॉल में इतिहास, प्रतिष्ठा और पिछले रिकॉर्ड तभी तक मायने रखते हैं, जब तक रेफरी पहली सीटी नहीं बजाता।

अब बारी थी दिन के तीसरे और अंतिम मुकाबले की। मेक्सिको के नुएवो लिओन प्रांत के खूबसूरत स्टेडियम में नीदरलैंड्स और मोरक्को आमने-सामने थे। एक ओर युवा और अनुभवी खिलाड़ियों का संतुलित मिश्रण लिए टीम ओरांजे थी, तो दूसरी ओर वह मोरक्को, जिसने पिछले कुछ वर्षों में अपने जुझारू खेल से दुनिया भर के फुटबॉल प्रेमियों के दिलों में खास जगह बना ली थी। ‘एटलस लायंस’ के नाम से मशहूर यह टीम एक और बड़े उलटफेर के इरादे से मैदान में उतरी थी।

रेफरी की सीटी बजते ही मुकाबले की शुरुआत हुई। शुरुआती कुछ मिनटों में नीदरलैंड्स ने आक्रामक रुख अपनाया और मोरक्को के पाले में लगातार दबाव बनाने की कोशिश की। लेकिन जैसे-जैसे मैच आगे बढ़ा, मोरक्को ने लय पकड़नी शुरू कर दी। उसके खिलाड़ी आत्मविश्वास के साथ गेंद पर नियंत्रण बनाए रखने लगे और धीरे-धीरे खेल की रफ्तार अपनी शर्तों पर तय करने लगे।

पहले हाफ में दोनों टीमों ने कुछ अच्छे मौके बनाए, लेकिन कोई भी उन्हें गोल में तब्दील नहीं कर सका। मोरक्को का मिडफील्ड लगातार गेंद पर नियंत्रण बनाए हुए था, जबकि नीदरलैंड्स जवाबी हमलों के जरिए अवसर तलाश रहा था। निर्धारित 45 मिनट समाप्त होने तक स्कोर 0-0 ही रहा, लेकिन मैच का रोमांच लगातार बढ़ता जा रहा था।

दूसरे हाफ की शुरुआत के बाद भी मुकाबले का स्वरूप बहुत अधिक नहीं बदला। मोरक्को ने गेंद पर अपना प्रभाव बनाए रखा और लगातार डच रक्षा पंक्ति को परखता रहा। दूसरी ओर नीदरलैंड्स अपेक्षाकृत नीरस और बिखरा हुआ फुटबॉल खेलता दिखाई दिया। उसकी ओर से वह धार नज़र नहीं आ रही थी जिसने पूरे टूर्नामेंट में उसे खिताब का दावेदार बनाया था।

डच गोलकीपर ने हालांकि कुछ बेहद महत्वपूर्ण बचाव किए और अपनी टीम को मुकाबले में बनाए रखा। ऐसा लगने लगा था कि यदि किसी टीम को गोल मिलेगा तो वह मोरक्को होगी।

लेकिन फुटबॉल अक्सर वही कहानी लिखता है जिसकी सबसे कम उम्मीद होती है।

72वें मिनट में नीदरलैंड्स ने तेज़ जवाबी हमला बोला। गेंद को तेजी से आगे बढ़ाया गया और आखिरकार कोडी गाक्पो ने सटीक फिनिश करते हुए नीदरलैंड्स को 1-0 की बढ़त दिला दी।

गोल होते ही उनके साथी खिलाड़ी खुशी से उनकी ओर दौड़े, लेकिन गाक्पो की आँखों में मुस्कान नहीं थी। वह भावुक होकर मैदान पर रो पड़े। दरअसल, कुछ ही दिन पहले गाक्पो और उनकी साथी ने अपने अजन्मे शिशु को खो दिया था। उस निजी पीड़ा के बीच विश्व कप के मंच पर आया यह गोल उनके लिए केवल एक खेल उपलब्धि नहीं था, बल्कि गहरे व्यक्तिगत भावनाओं का विस्फोट भी था। उनके साथी खिलाड़ियों ने उन्हें घेर लिया और पूरे स्टेडियम में कुछ क्षणों के लिए एक अलग ही भावनात्मक वातावरण बन गया।

इसके बाद मुकाबला और तेज़ हो गया। मोरक्को ने बराबरी के लिए पूरी ताकत झोंक दी। लगातार हमले होने लगे और डच खिलाड़ी अपनी बढ़त बचाने में जुट गए। समय तेजी से बीत रहा था और ऐसा लगने लगा था कि नीदरलैंड्स किसी तरह यह मुकाबला जीत लेगा।

लेकिन फिर आया इंजरी टाइम।

90+1वें मिनट में मोरक्को ने शानदार मूव तैयार किया। तेज़ पासिंग के बाद गेंद डच पेनाल्टी बॉक्स में पहुँची और उसे गोल में बदल दिया गया। स्कोर 1-1 हो गया। पूरे स्टेडियम में मौजूद मोरक्को के समर्थक खुशी से झूम उठे, जबकि नीदरलैंड्स के खिलाड़ियों के चेहरे पर अविश्वास साफ दिखाई दे रहा था।

निर्धारित समय समाप्त हुआ और मुकाबला अतिरिक्त समय में चला गया।

एक्स्ट्रा टाइम में दोनों टीमों ने जीत हासिल करने की पूरी कोशिश की। मोरक्को का आत्मविश्वास बढ़ चुका था, जबकि नीदरलैंड्स लगातार दबाव में दिखाई दे रहा था। दोनों ओर से कुछ अवसर बने, लेकिन कोई भी निर्णायक साबित नहीं हुआ। 120 मिनट पूरे होने के बाद भी स्कोर 1-1 ही रहा और अब फैसला पेनाल्टी शूटआउट से होना था।
शूटआउट शुरू हुआ। दोनों टीमों के खिलाड़ी बारी-बारी से पेनाल्टी लेने लगे। लेकिन इस बार मोरक्को के सबसे भरोसेमंद खिलाड़ी यासीन बोनू एक बार फिर दीवार बनकर खड़े हो गए। उनके शानदार बचावों ने नीदरलैंड्स की उम्मीदों पर पानी फेर दिया।

आखिरकार मोरक्को ने पेनाल्टी शूटआउट 3-2 से जीत लिया और लगातार एक और यूरोपीय दिग्गज को विश्व कप से बाहर का रास्ता दिखा दिया।

कई लोग इसे दिन का एक और बड़ा उलटफेर कहेंगे, लेकिन जिसने पूरा मुकाबला देखा होगा, वह शायद इस निष्कर्ष से पूरी तरह सहमत न हो। मोरक्को ने अधिकांश समय खेल की गति नियंत्रित रखी, गेंद पर बेहतर पकड़ दिखाई और पूरे मुकाबले में कहीं अधिक आत्मविश्वास के साथ खेलता नज़र आया। उसके प्रदर्शन ने यह साबित कर दिया कि यह जीत किसी संयोग का परिणाम नहीं थी, बल्कि पूरे 120 मिनट के अनुशासित और धैर्यपूर्ण खेल का पुरस्कार थी।
इस हार के साथ नीदरलैंड्स का विश्व कप अभियान समाप्त हो गया, जबकि मोरक्को लगातार दूसरी बार फुटबॉल जगत को यह याद दिलाने में सफल रहा कि अब उसे केवल ‘डार्क हॉर्स’ कहकर नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
खैर, अब नज़रें आज रात खेले जाने वाले मुकाबलों पर होंगी।

भारतीय समयानुसार रात साढ़े दस बजे डलास में कोटे डी आइवोर का सामना नॉर्वे से होगा। नॉर्वे के पास एरलिंग हालांड की अगुवाई में बेहद मजबूत आक्रमण है, जबकि कोटे डी आइवोर पूरे टूर्नामेंट में अपने जुझारूपन और आक्रामक तेवर से प्रभावित करता आया है। ऐसे में यह मुकाबला किसी भी दिशा में जा सकता है।

इसके बाद भारतीय समयानुसार रात ढाई बजे फ्रांस और स्वीडन आमने-सामने होंगे। न्यू जर्सी में खेले जाने वाले इस मुकाबले में दोनों टीमों के पास कई खतरनाक गोल स्कोरर मौजूद हैं। हालांकि फ्रांस का पलड़ा भारी माना जा रहा है। पिछले मुकाबले में उस्मान डेंबेले ने मात्र 32 मिनट के भीतर हैट्रिक लगाकर यह बता दिया था कि उन्हें थोड़ी-सी भी जगह देना किसी भी टीम के लिए कितना महंगा साबित हो सकता है। स्वीडन को यदि क्वार्टर फाइनल में पहुँचना है तो उसकी रक्षापंक्ति को पूरे मुकाबले में लगभग त्रुटिहीन प्रदर्शन करना होगा।

इसके बाद अपने घरेलू समर्थकों के बीच मेक्सिको का सामना उस इक्वाडोर से होगा जिसने पिछले दौर में जर्मनी जैसी दिग्गज टीम को बाहर का रास्ता दिखाकर पूरे फुटबॉल जगत को चौंका दिया था। भारतीय समयानुसार यह मुकाबला कल सुबह साढ़े छह बजे खेला जाएगा। इक्वाडोर ने पिछले दौर में अपने इरादे स्पष्ट कर दिए हैं, जबकि मेक्सिको को घरेलू दर्शकों का भरपूर समर्थन मिलेगा। ऐसे में यह मुकाबला भी बेहद दिलचस्प रहने की पूरी उम्मीद है।
अब तक इस विश्व कप ने एक बात पूरी तरह स्पष्ट कर दी है; यह बड़े नामों का नहीं, बल्कि बड़े जज़्बे का टूर्नामेंट बन चुका है।

इक्वाडोर, पराग्वे और मोरक्को जैसी टीमों ने दिखा दिया है कि यदि विश्वास, अनुशासन और साहस साथ हों तो फुटबॉल के सबसे मजबूत किले भी ढहाए जा सकते हैं। इन टीमों का प्रदर्शन काबो वर्दे जैसी अन्य उभरती टीमों के लिए भी प्रेरणा बनेगा कि विश्व कप में कोई भी मुकाबला पहले से तय नहीं होता।
यही फुटबॉल की सबसे बड़ी खूबसूरती है।

यहाँ अंतिम सीटी बजने तक कुछ भी संभव है।
वीवा ला फुटबॉल।

GAGAN की मदद से इंडिगो का विमान उदयपुर एयरपोर्ट पर उतरा: जानिए क्या है भारत का स्वदेशी सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम और यह कैसे काम करता है?

प्लेन की उड़ान का सबसे जरूरी हिस्सा टेक-ऑफ और लैंडिंग होता है। ज्यादातर हादसे इन्हीं दो प्रक्रियाओं के दौरान होते हैं। प्लेन लैंडिंग करते समय जिस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हैं, उसे इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम (ILS) कहते हैं। यह एक सटीक रेडियो नेविगेशन सिस्टम है, जो विमानों को खराब मौसम, घने कोहरे या रात के समय रनवे पर सुरक्षित उतरने में मार्गदर्शन करती है।

भारत में उड़ने वाले प्लेन हर दिन इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते रहे हैं, लेकिन 27 जून, 2026 को एक अलग घटना हुई। उदयपुर एयरपोर्ट पर पहुँची इंडिगो की एक फ्लाइट ने लैंडिंग के लिए इस इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम की जगह भारत के स्वदेशी सैटेलाइट-बेस्ड नेविगेशन सिस्टम यानी GAGAN का इस्तेमाल किया। (GPS बेस्ड GEO ऑगमेंटेड नेविगेशन)। इस सिस्टम को भारत के इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइज़ेशन यानी ISRO और एयरपोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने मिलकर बनाया है।

पहले GAGAN सिस्टम को छोटे एयरक्राफ्ट के साथ टेस्ट किया गया था, लेकिन अब इंडिगो के कमर्शियल एयरक्राफ्ट ने GAGAN का इस्तेमाल करके सफलतापूर्वक लैंडिंग की है। यह एविएशन के क्षेत्र में ऐतिहासिक है। इससे पता चलता है कि भारत के पास अब स्वदेशी सैटेलाइट-बेस्ड सिस्टम की मदद से ग्राउंड इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भर हुए बिना कमर्शियल एयरक्राफ्ट को सफलतापूर्वक लैंड कराने की क्षमता है।

इसमें कोई शक नहीं कि लैंडिंग किसी भी एयरक्राफ्ट के लिए जरूरी है। आमतौर पर पायलट दूर से ही रनवे को देख सकते हैं और उसी हिसाब से सफलतापूर्वक लैंड कर सकते हैं। लेकिन बारिश के मौसम में, कोहरे या बादलों में, या अक्सर रात में, पायलट को बाहर से मदद की जरूरत होती है। दशकों से इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम यह काम कर रहा है।

यह सिस्टम जमीन पर लगे रेडियो एंटेना और दूसरे उपकरण की मदद से पायलट को बताता रहता है कि उसका एयरक्राफ्ट रनवे की लाइन में है या नहीं। वह यह भी बताता है कि एयरक्राफ्ट रनवे पर बहुत तेजी से आ रहा है या बहुत धीरे, या उसकी स्पीड बहुत धीमी है या बहुत तेज। इसके आधार पर पायलट एयरक्राफ्ट को बाएँ-दाएँ, ऊपर-नीचे, ज्यादा स्पीड या कम स्पीड कर लैंड कर सकता है।

इसके लिए एयरक्राफ्ट को रनवे से लगातार रेडियो सिग्नल मिलते रहते हैं। अगर विजिबिलिटी बहुत कम हो, तो अब मॉडर्न एयरक्राफ्ट में ऐसी सुविधा है जो ऑटोमैटिक लैंडिंग भी कर सकती है और उसके लिए भी ILS काम आता है। ILS की कमी यह है कि हर रनवे पर यह सिस्टम होना जरूरी है और रेडियो ट्रांसमीटर लगाना, उसे लगातार मेंटेन करना और लगातार बदलाव करना इसके लिए बेहद जरूरी है। इसलिए कुछ छोटे एयरपोर्ट पर या तो यह सिस्टम होता ही नहीं है या कुछ ही रनवे पर रखा जाता है।

भारत एविएशन नेटवर्क पर तेजी से काम कर रहा है और रीजनल कनेक्टिविटी पर जोर दिया जा रहा है। ऐसे में इन लिमिटेशन पर काम करना जरूरी है, इसीलिए GAGAN बनाया गया था।

GAGAN क्या है?

GAGAN सिस्टम को एविएशन की भाषा में LPV (लोकलाइजर परफॉर्मेंस विद वर्टिकल गाइडेंस) कहा जाता है। यह ILS की तरह ही काम करता है, लेकिन फर्क यह है कि यह जमीन पर लगे रेडियो एंटीना पर निर्भर नहीं करता, बल्कि सैटेलाइट पर निर्भर करता है। आसान शब्दों में – रनवे से एयरक्राफ्ट को गाइड करने के बजाय, यह काम सैटेलाइट की मदद से होता है। इसके लिए जमीन पर एंटीना या सिस्टम की जरूरत नहीं होती।

यहाँ एक सवाल उठता है कि अगर एयरक्राफ्ट पहले से ही GPS का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो सैटेलाइट-बेस्ड सिस्टम की क्या जरूरत है?

यह सच है कि हर एयरक्राफ्ट नेविगेशन के लिए GPS का इस्तेमाल करता है, लेकिन सटीक लैंडिंग के लिए नॉर्मल GPS काफी नहीं है। हम अपने मोबाइल फोन में भी GPS का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन उसकी लोकेशन कुछ मीटर तक गलत होती है। यह सही लोकेशन नहीं दिखाता है। हालाँकि यह सिस्टम कार चलाने के लिए सही है, लेकिन एयरक्राफ्ट में 2-5 मीटर की सटीकता की ही जरूरत नहीं होती उसे लैंड करने से कुछ किलोमीटर पहले से ही बहुत सटीक जानकारी होना जरूरी है, वह थोड़ा भी नहीं भटक सकता।

GPS सैटेलाइट पृथ्वी से हजारों किलोमीटर दूर काम करते हैं। उनके सिग्नल हम तक पहुँचने से पहले पृथ्वी के कई स्तर वाले वातावरण से गुजरते हैं। वातावरण के आयनोस्फीयर में कुछ इलेक्ट्रिकल पार्टिकल GPS सिग्नल की स्पीड और दिशा को थोड़ा बदल देते हैं, जिससे हम तक पहुँचने वाली जानकारी में थोड़ी गलती हो जाती है।

भारत के मामले में यह समस्या थोड़ी ज्यादा है, क्योंकि हम पृथ्वी के उस हिस्से में हैं जहाँ आयनोस्फीयर सबसे ज्यादा एक्टिव है। यहाँ इलेक्ट्रिकली चार्ज्ड कण की मात्रा लगातार बदलती रहती है। कभी ये कण ज्यादा होते हैं, कभी कम। जैसा कि पहले बताया गया है, यह सिर्फ मोबाइल फोन या कार नेविगेशन के लिए ही प्रॉब्लम नहीं है, बल्कि किसी एयरक्राफ्ट की सटीक लैंडिंग के लिए भी रिस्क लेने जैसा है, इस रिस्क को खत्म कर GPS सिग्नल्स को सटीक बनाना का काम GAGAN करता है।

GAGAN कैसे काम करता है?

आइए समझते हैं कि GAGAN कोई GPS सिस्टम नहीं है। यह GPS पर ही रखे गए एक इंटेलिजेंट करेक्शन सिस्टम की तरह काम करता है। अगर हम स्मार्टफोन का उदाहरण लें, तो यह ‘ऑटोकरेक्ट’ जैसा है। GPS एक सिग्नल भेजता है, GAGAN सिर्फ यह देखता है कि यह जानकारी पूरी तरह सही है या नहीं। अगर कोई गलती मिलती है, तो यह सिग्नल के एयरक्राफ्ट तक पहुँचने से पहले उसे ठीक कर देता है। एक तरह से यह एक फैक्ट चेकर की भूमिका निभाता है। इसका काम सिग्नल भेजना नहीं है।

इस सिस्टम में 15 रेफरेंस स्टेशन अहम भूमिका निभाते हैं, जो पूरे भारत में अलग-अलग जगहों पर मौजूद हैं। इन स्टेशनों को GPS सिग्नल मिलते हैं। इन स्टेशनों की असली लोकेशन पहले से तय होती हैं और सेंटीमीटर लेवल तक सटीक होती हैं। इसलिए उन्हें अपनी लोकेशन के बारे में पहले से ही बहुत सटीक जानकारी होती है। इस दौरान, वे लगातार GPS सिग्नल से उनकी तुलना करते रहते हैं ताकि यह देखा जा सके कि GPS उनकी लोकेशन सही दिखा रहा है या नहीं। इसलिए यह जरूरी है कि GPS लोकेशन असली (पहले मापी गई) लोकेशन से मेल खाए।

अगर GPS में थोड़ा सा भी बदलाव दिखता है, तो GPS इसे गलती मान लेता है। यह काम सभी स्टेशन करते हैं। वहाँ से डेटा इकट्ठा होकर एक मास्टर कंट्रोल स्टेशन तक पहुँचता है। यहाँ का कंप्यूटर पूरे देश से मिले डेटा की समीक्षा करता है और यह पता लगाता है कि GPS सिग्नल में कितनी गलती है। इसके बाद इस गलती को ठीक करके एक करेक्शन डेटा तैयार किया जाता है।

हालाँकि यह करेक्शन डेटा सीधे एयरक्राफ्ट को नहीं भेजा जाता है। इसे सबसे पहले ISRO के GSAT-8 और GSAT-10 जैसे जियोस्टेशनरी सैटेलाइट को भेजा जाता है। ये सैटेलाइट धरती से करीब 36000 km की ऊँचाई पर एक ही जगह पर रहकर पूरे भारतीय इलाके को कवर करते हैं। यह सैटेलाइट करेक्शन डेटा एयरक्राफ्ट को भेजता है। फिर पायलट इसी डेटा के आधार पर लैंडिंग के लिए आगे बढ़ता है।

इसके अलावा GAGAN एक और काम भी करता है। यह लगातार चेक करता है कि GPS से आ रहे सिग्नल सही हैं या नहीं। अगर इसमें कोई गलती मिलती है, तो यह तुरंत एयरक्राफ्ट को चेतावनी देता है कि इस समय इस जानकारी पर भरोसा नहीं किया जा सकता, इस सिस्टम को ‘इंटीग्रिटी मॉनिटरिंग’ कहते हैं। इसे एक सेफ्टी फीचर के तौर पर रखा गया है।

ISRO की मदद से देश में ही बनाए गए इस सिस्टम की मदद से एयरक्राफ्ट ज्यादा आसानी से सही और सुरक्षित तरीके से लैंड कर पाएँगे और इससे एयर ट्रैफिक मैनेजमेंट भी आसान हो जाएगा। पिछले दस सालों में भारत में सैकड़ों एयरपोर्ट जोड़े गए हैं। लेकिन सरकार भी जानती है कि सिर्फ एयरपोर्ट बनाने से काम नहीं चलता। एविएशन इंडस्ट्री के डेवलपमेंट के लिए ऐसी सभी चीजें जरूरी हैं। नए भारत में इन सभी पर काम चल रहा है।

(यह लेख मूलरूप से गुजराती में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

₹3000000 तक के इलेक्ट्रिक वाहनों को रजिस्ट्रेशन में छूट, पुरानी गाड़ियों की स्क्रैपिंग पर ₹1 लाख तक का प्रोत्साहन: जानिए नई EV पॉलिसी से रेखा सरकार कैसे लगाएगी वायु प्रदूषण पर लगाम

दिल्ली सरकार ने नई EV पॉलिसी 2026–2030 को मंजूरी दे दी है। इसके तहत इलेक्ट्रिक वाहनों की खरीद में बंपर छूट के साथ सब्सिडी दी जाएगी। 30 लाख तक की इलेक्ट्रिक वाहनों पर कोई रोड टैक्स नहीं लगेगा। यहाँ तक कि रजिस्ट्रेशन फीस भी नहीं देना होगा। 1 जुलाई 2026 से ये पॉलिसी लागू हो जाएगी और 31 मार्च 2030 तक रहेगी।

इसका मकसद राजधानी में वायु प्रदूषण कम करना, पेट्रोल-डीजल वाहनों पर निर्भरता घटाना और इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना है। रेखा गुप्ता सरकार का कहना है कि अगले चार वर्षों में इस पर लगभग ₹15,000 करोड़ खर्च किए जाएँगे।

इलेक्ट्रिक वाहनों पर टैक्स में बड़ी राहत

₹30 लाख तक की इलेक्ट्रिक कारों पर रोड टैक्स और रजिस्ट्रेशन शुल्क में 100% छूट दी गई है। इससे EV खरीदने की शुरुआती लागत कम हो जाएगी। नई नीति के तहत जनवरी 2027 में सिर्फ ई-ऑटो का रजिस्ट्रेशन होगी जबकि अप्रैल 2028 से दोपहिया वाहनों का रजिस्ट्रेशन किया जाएगा। इलेक्ट्रिक टू व्हीलर के खरीदारों को पहले साल ₹30,000, दूसरे साल ₹20,000 और तीसरे साल ₹10,000 की सब्सिडी मिलेगी।

स्क्रैपेज (पुरानी गाड़ी हटाने) पर प्रोत्साहन

पुरानी BS-IV या उससे पुराने वाहन को स्क्रैप कर नया EV खरीदने को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने वाहनों की खरीद में छूट दी है। कार के लिए अधिकतम ₹100000 तक का स्क्रैपेज इंसेंटिव दिया जा रहा है।

दोपहिया और तिपहिया वाहनों के लिए भी अलग-अलग प्रोत्साहन राशि का ऐलान किया गया है। इसमें दो पहिया वाहनों के लिए ₹10000, तिपहिया वाहनों के लिए ₹25000, चार पहिया वाहनों के लिए ₹100000, N1 ट्रक के लिए ₹50000 और ग्रामीण सेवा वाहन के लिए ₹15000 इंसेंटिव की घोषणा की गई है।

इलेक्ट्रिक ऑटो और थ्री व्हीलर को लेकर बदलाव

1 जनवरी 2027 से दिल्ली में नए रजिस्ट्रेशन केवल इलेक्ट्रिक ऑटो के होंगे। CNG और पेट्रोल ऑटो के नए रजिस्ट्रेशन बंद कर दिए जाएँगे। नई EV पॉलिसी के मुताबिक, खरीदारों को पहले साल ₹50,000, दूसरे साल ₹40,000 और तीसरे साल ₹30,000 की सब्सिडी दी जाएगी। अधिकारियों ने साफ कहा है कि हाइब्रिड वाहनों के लिए कोई सब्सिडी नहीं मिलेगी। यह पॉलिसी पूरी तरह से जीरो इमिशन वाहनों के लिए है।

दिल्ली की नई नीति के तहत चरणबद्ध तरीके से प्लान लागू होंगे। इसमें 1 जनवरी 2027 से केवल इलेक्ट्रिक ऑटो रिक्शा का ही रजिस्ट्रेशन होगा। जबकि 1 अप्रैल 2028 से नए पेट्रोल या CNG दोपहिया वाहनों का रजिस्ट्रेशन बंद होगा। इसके बाद केवल इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों का नया रजिस्ट्रेशन होगा।

चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार

सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशन बढ़ाए जाएँगे। बैटरी स्वैपिंग और चार्जिंग नेटवर्क को मजबूत किया जाएगा। स्कूलों और कई व्यावसायिक वाहनों के लिए चरणबद्ध तरीके से EV अपनाने के लक्ष्य तय किए गए हैं। कैबिनेट के फैसले की जानकारी देते हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि यह एक ऐतिहासिक दिन है और राज्य को पॉलिसी से ₹15,000 करोड़ के निवेश की उम्मीद है।

लोगों को कैसे फायदा होगा?

EV खरीदने पर लागत कम हो जाएगी। लोगों को रोड टैक्स और रजिस्ट्रेशन शुल्क में बचत होगी। पुरानी गाड़ी स्क्रैप करने पर अतिरिक्त रकम मिलेगा। वैसे भी इलेक्ट्रिक वाहन को चलाने की लागत पेट्रोल-डीजल की तुलना में काफी कम होती है। इससे शहर को वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण से मुक्ति मिलने की उम्मीद है। चार्जिंग स्टेशन बढ़ने से EV इस्तेमाल करना आसान होगा।

30 लाख की कार पर 5 लाग की बचत

दिल्ली में फिलहाल रोड टैक्स की बात करें तो ₹6 लाख तक की पेट्रोल कार पर 4 फीसदी, ₹10 लाख तक की कार पर 7 फीसदी और ₹10 लाख से ऊपर की कार पर 10 फीसदी रोड टैक्स लिया जाता है। ऐसे में अब दिल्ली के लोगों को ₹30 लाख तक की इलेक्ट्रिक कार खरीदने पर ₹3 लाख रोड टैक्स और रजिस्ट्रेशन फीस, ₹1लाख पुरानी कार की स्क्रैप और ₹1लाख की सब्सिडी यानी कुल मिलाकर ₹5 लाख तक की बचत हो जाएगी।

नई EV पॉलिसी क्यों लाई गई?

दिल्ली दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में एक मानी जाती है। खासकर सर्दियों में तो शहर के दमघोंटू हवा में दिल्ली वासियों का जीना मुहाल हो जाता है। सरकार का कहना है कि वाहनों से निकलने वाला धुआँ प्रदूषण का बड़ा कारण है।

गौरतलब है कि दिसंबर 2025 में सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी। रिपोर्ट के मुताबिक, सर्दियों में पीएम 2.5 स्तर पर था। इसमें वाहनों के इमिशन की हिस्सेदारी करीब 46-53 फीसदी थी।

दिल्ली में हर साल करीब 5 लाख पेट्रोल-डीजल के वाहन बिकते हैं, जबकि मात्र 70 हजार इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री होती है। परिवहन विभाग का मानना है कि नई नीति से लाखों वाहन इलेक्ट्रिक में बदल जाएँगे या सड़क से बाहर होंगे। इससे वायु प्रदूषण कम करने में मदद मिलेगी। इतना ही नहीं, लोगों को जाम से भी निजात मिलेगी।

ई-वाहनों का नया बाजार तैयार होगा। कई नामी गिरामी कंपनियों ने इलेक्ट्रिक कारों, ऑटो, छोटे व्यावसायिक वाहनों को बाजार में उतार दिया है। कई कंपनियाँ अपने प्रोडक्ट लेकर बाजार में उतरने की तैयारी कर रही हैं। इन्हें दिल्ली की EV नीति से काफी फायदा होगा। चार्जिंग स्टेशन में बढोतरी से काफी फायदा होगा।

पेट्रोल-डीजल की खपत पर भी इसका असर पड़ेगा। जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटेगी और इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग और रोजगार को बढ़ावा मिलेगा। हाल ही में कई कंपनियों ने ई- मॉडल पेश किए हैं। 32 हजार चार्जिंग स्टेशन बनाए जाने से इन्हें फायदा होगा और रोजगार के मौके बढ़ेंगे।

दिल्ली में दूसरे राज्यों की तुलना में सब्सिडी ज्यादा है। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश समेत कई राज्यों ने अपनी वाहन नीति घोषित कर दी है। पेट्रोल-डीजल के वाहनों को हतोत्साहित किया गया है और इलेक्ट्रिक वाहनों में सब्सिडी दी गई है।

EV पॉलिसी 2020 और EV पॉलिसी 2026 में अंतर

2020 EV पॉलिसी में पूरा जोर सब्सिडी और स्वैच्छिक EV अपनाने पर था जबकि अब प्रोत्साहन के साथ कई क्षेत्रों में अनिवार्य बदलाव की समय-सीमा तय की गई है। 2020 में EV खरीद पर सब्सिडी और रोड टैक्स में छूट दी गई थी, लेकिन अब स्क्रैपेज, इंसेंटिव और रजिस्ट्रेशन फ्री जैसी आकर्षक छूट दी गई है। दमघोंटू हवा से दिल्ली को मुक्त कराने के लिए अब रेखा सरकार की प्रतिबद्धता दिख रही है।

पहले पेट्रोल के दोपहिया वाहनों और CNG ऑटो पर कोई तय प्रतिबंध नहीं था, लेकिन अब 2027 से नए इलेक्ट्रिक ऑटो और 2028 से नए इलेक्ट्रिक दोपहिया अनिवार्य किए गए हैं। पहले चार्जिंग नेटवर्क विकसित करने पर जोर था, लेकिन अब चार्जिंग नेटवर्क के साथ बड़े पैमाने पर फ्लीट विद्युतीकरण और नियामकीय बदलाव शामिल किए गए हैं।

3 साल तक दिल्ली के बाहर नहीं बेचे जा सकते ई-वाहन

नई ईवी नीति का मकसद दिल्ली को देश का अग्रणी EV शहर बनाना है। ई-वाहन खरीदते समय सब्सिडी और स्क्रेपिंग पॉलिसी का फायदा सिर्फ दिल्लावालों को मिलेगा। वाहन खरीदते समय वोटर आई कार्ड, आधार कार्ड दिखाना होगा। दिल्ली की सीएम रेखा गुप्ता के मुताबिक, इन वाहनों को 3 साल तक दिल्ली से बाहर नहीं बेचा जा सकता है। परिवहन विभाग एनओसी इससे पहले जारी नहीं करेगा।

परिवहन कमिश्नर निहारिका राय के मुताबिक, सब्सिडी, स्क्रैप और दूसरी प्रोत्साहन राशि ग्राहक के बैंक अकाउंट में डीबीटी के माध्यम से सीधा भेजी जाएगी। सब्सिडी पाने वाले को इसके लिए ईवी पोर्टल पर अप्लाई करना होगा। इसके लिए नया ईवी पोर्टल तैयार किया गया है, जिसे 1 जुलाई 2026 को लॉन्च किया जा रहा है। ग्राहक को अप्लाई करने के 60 दिनों के भीतर रकम मिल जाएगी।

दिल्ली सरकार चाहती है कि ये वाहन दिल्ली में ही चलाए जाएँ, ताकि दिल्ली को प्रदूषण से राहत मिल सके। जानकारों के मुताबिक, दिल्ली से सभी पेट्रोल- डीजल वाहनों के आवागमन को रोक दिया जाए और ई-वाहनों को ही जाने दिया जाए, तो दिल्ली का प्रदूषण आधा हो जाएगा। दरअसल सीएनजी वाहनों में भी कुछ हद तक धुआँ निकलता है, लेकिन इलेक्ट्रिक वाहन पूरी तरह इससे मुक्त होते हैं। दरअसल ये फैसला दिल्ली को स्वच्छ बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।

अब शुरू हुई असली विश्व कप की कहानी… जहाँ हर हार आखिरी होगी

अल-नीनो को चकमा देते हुए मॉनसून अंततः भारत में दस्तक दे चुका है। चाय-पकौड़ों का मौसम आने लगा है। इधर कई राज्यों में बरसात होने लगी है। वहीं, अमेरिकी महाद्वीप में गोलों की बौछार जारी है। बरसात के चलते गोवा में मछली पकड़ने पर रोक लगने लगी है। मछुआरे अपनी नावें तटों पर बांध चुके हैं। तमाम छोटे-बड़े बारों में बीयर लिए दिन भर की थकान मिटाते लोग हैं। उनके बीच चर्चा का विषय है – फीफा विश्व कप। वहीं, केरल में लोगों ने सड़कों पर मेसी, नेमार व रोनाल्डो के आदमकद पोस्टर लगाए हैं। चारों तरफ विभिन्न टीमों की जर्सियां पहने लोग हैं। लोगों ने अपने वाहनों व मकानों को अपनी पसंदीदा टीम के रंग में रंग लिया है। क्या बच्चे, क्या बुजुर्ग; फीफा फीवर सभी के सिर चढ़कर बोल रहा है।

गुजरे दो हफ्तों में हर तरफ बस फीफा विश्व कप के ही किस्से गूंज रहे हैं। जैसे-जैसे विश्व कप आगे बढ़ता जा रहा है, माहौल और भी मजेदार होता जा रहा है। पहले तो हमें ग्रुप चरण के अंतिम छह मुकाबले देखने को मिले। फिर, बीती रात, Round of 32 का पहला मुकाबला खेला गया।

ग्रुप एल के अंतिम दो मैच खेले जाने थे। पहले मैच में इंग्लैंड ने ज्यूड बेलिंघम व हैरी केन के गोलों की मदद से पनामा को 2-0 से हराया। अगला मुकाबला फिलाडेल्फिया में क्रोएशिया व घाना के मध्य खेला जाना था। इस शानदार मैच में 2-1 से क्रोएशियाई टीम की जीत होती है। इन परिणामों के आधार पर इंग्लैंड, क्रोएशिया व घाना अगले दौर में जगह बनाने में सफल हो जाते हैं।

वहीं, ग्रुप के के अंतिम दो मैच भी खेले गए। पहले मैच में मियामी के मैदान में पुर्तगाल की टीम का सामना कोलंबिया से था। यहां, सभी को चौंकाते हुए कोलंबिया ने पुर्तगाल के खिलाफ काफी बढ़िया फुटबॉल खेली। हालांकि मैच ड्रॉ रहा, परन्तु कोलंबिया इस मुकाबले में लगभग हर मामले में पुर्तगाल पर भारी नजर आया। पुर्तगाली टीम, जो टूर्नामेंट की शुरुआत से पहले जीत की प्रबल दावेदार मानी जा रही थी, अब तक आशा के अनुरूप प्रदर्शन करती नजर आई नहीं है। उन्हें ट्रॉफी जीतने के लिए आगे काफी मशक्कत करनी होगी। गौरतलब है कि अपने ग्रुप में पुर्तगाली टीम, कोलंबिया के ठीक पीछे, दूसरे स्थान पर रही। इस ग्रुप का अगला मैच DR CONGO व उज़्बेकिस्तान के बीच खेला गया। यहां योआन विस्सा के दो बेहतरीन गोलों की बदौलत DR CONGO, मैच में वापसी करते हुए, उज़्बेकिस्तान को 3-1 से हरा कर अगले दौर में जगह बनाने में सफल रहा। इस ग्रुप से कोलंबिया, पुर्तगाल व DR CONGO अगले दौर में जगह बनाने में सफल रहे।

अंततः, ग्रुप जे के दो अंतिम मैच खेले गए। इस ग्रुप के पहले मैच में अल्जीरिया का सामना ऑस्ट्रिया से था। यह बेहद ही हाई वोल्टेज ड्रामा वाला मैच रहा, जिसमें नब्बे मिनटों में दोनों टीमों द्वारा कुल छह गोल दागे गए। यह मैच 3-3 से ड्रॉ रहा। आगे, अगले मैच में, डल्लास स्टेडियम में अर्जेंटीना की टीम जॉर्डन के खिलाफ मैदान में उतरी। क्योंकि अर्जेंटीना पहले ही अगले दौर में जगह बना चुकी है, इसलिए इस मैच में कोच लियोनेल स्कालोनी ने अपनी स्टार्टिंग लाइन-अप में सात-आठ परिवर्तन किए थे। लियोनेल मेसी को भी मैच के शुरू होते वक्त बेंच पर ही रखा गया था। इसके बावजूद अर्जेंटीना यह मैच 3-1 से जीत गया। लियोनेल मेसी विश्व कप में लगातार सात मैचों में गोल करने वाले इकलौते खिलाड़ी बन गए। इस शानदार जीत के संग पिछले विश्व कप की विजेता अर्जेंटीनी टीम ने भी अगले दौर में जगह बना ली। इस ग्रुप से अर्जेंटीना, ऑस्ट्रिया व अल्जीरिया अगले दौर में जगह बनाने में सफल रहे।

गौरतलब है कि अफ्रीकी महाद्वीप की दस में से नौ टीमें Round of 32 में जगह बनाने में सफल रहीं। ग्रुप स्टेज में एक ओर कई मुकाबले ड्रॉ होते दिखे तो वहीं दूसरी ओर कई हाई स्कोरिंग मुकाबले भी हुए। इस टूर्नामेंट की अब तक की खासियत यह रही कि कमोबेश छोटी टीमों ने अपने खेल के बूते तमाम खेलप्रेमियों का दिल जीत लिया। कई नए और अपेक्षाकृत कम चर्चित खिलाड़ियों ने भी अपने शानदार प्रदर्शन से सबका ध्यान अपनी ओर खींचा। इक्वाडोर का जर्मनी को हरा देना। Cape Verde का एक कठिन ग्रुप से भी अगले दौर में जगह बना लेना। यह सब लंबे समय तक याद रखा जाएगा।

आगे, आज रात (भारतीय समयानुसार रात साढ़े बारह बजे) Round of 32 का पहला मुकाबला खेला गया। लॉस एंजिलिस स्टेडियम में मेजबान राष्ट्रों में शुमार कनाडा का मुकाबला था दक्षिण अफ्रीका की टीम से। इस मैच में गेंद ज्यादातर अपने पास रखते हुए भी दक्षिण अफ्रीका कुछ खास कर न सकी। उन्होंने कनाडा के गोलपोस्ट पर छह बार आक्रमण किया, लेकिन केवल दो ही प्रयास निशाने पर रहे और दोनों को कीपर ने शानदार तरीके से रोक दिया। कनाडाई टीम ने आक्रामक फुटबॉल खेलते हुए चौदह दफा विरोधी गोलपोस्ट पर शॉट लगाए, जिनमें से सात निशाने पर रहे। लेकिन नब्बे मिनटों में भी कोई टीम गोल नहीं कर सकी थी। कनाडा ने मैच की शुरुआत से ही कई बार गोल करने के अवसर बनाए, मगर दक्षिण अफ्रीकी कप्तान, जो कि टीम के गोलकीपर हैं, ने कई शानदार बचाव करते हुए अपनी टीम को मैच में बनाए रखा। दूसरे हाफ में उन्होंने एक शानदार वन-ऑन-वन सेव भी किया। उनकी रक्षापंक्ति ने भी आज काफी बढ़िया रक्षात्मक खेल दिखाया।

एक वक्त तो ऐसा प्रतीत हो रहा था कि नॉकआउट चरण का पहला ही मैच एक्स्ट्रा टाइम तक चला जाएगा। सभी की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी। लेकिन तभी, मैच के 90+2 मिनट पर कनाडा की टीम मैदान की दाईं दिशा से गेंद को लेकर आगे बढ़ती दिखी। अंदर की दिशा में एक क्रॉस डाला गया जिस पर एक दफा फिर दक्षिण अफ्रीका ने अच्छा बचाव किया। गेंद दक्षिण अफ्रीकी “डी” के बाहर की ओर गई। लेकिन तभी, कनाडाई मिडफील्डर स्टीफन एस्ताक्वियो ने मौका पाते ही एक जोरदार राइट फुटर किक लगा कर गेंद को गोलपोस्ट के भीतर भेज दिया।

इस गोल के साथ लॉस एंजिलिस से लेकर ओटावा तक खुशियों की लहर सी दौड़ गई। कनाडाई समर्थकों की खुशी का ठिकाना न रहा। कनाडा यह मैच 1-0 से जीत कर अगले दौर में चली गई। यह पहली दफा है जब कनाडा ने नॉकआउट चरण का मैच जीत लिया है। दक्षिण अफ्रीका की टीम अच्छा खेल दिखा कर भी आज टूर्नामेंट से वापसी करने को मजबूर हो गई।

अब, आज, भारतीय समयानुसार रात साढ़े दस बजे, Round of 32 का अगला मैच खेला जाएगा। आज ह्यूस्टन स्टेडियम में अपनी पारंपरिक पीली जर्सी पहने सेलेकाओ के खिलाड़ी समुराई ब्लूज़ से दो-दो हाथ करते नजर आएंगे। मकसद होगा यह मैच जीत कर सफलतापूर्वक अगले दौर में जगह बनाना। दोनों ही टीमें आज रात मैदान में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देंगी।

एकतरफ पांच बार की विजेता ब्राजील है, जो सदैव खिताब के दावेदारों में शामिल होती है, वहीं दूसरी ओर जापान रूपी एशियाई तूफान होगा, जिसको आप हल्के में लेने की भूल नहीं कर सकते। जापान की टीम एक बार फिर चाहेगी कि दाईची कमाडा व अयासे ऊएडा, जो अब तक टूर्नामेंट में उनके टॉप स्कोरर रहे हैं, जल्द से जल्द उन्हें इस मैच में जरूरी बढ़त दिला दें ताकि ब्राजील पर दबाव बनाया जा सके। लेकिन विनीसीयस व माथियूस कुन्हा भी गजब फॉर्म में हैं। सो, ब्राजील भी चाहेगा कि तुरंत गोल कर के मैच को अपनी दिशा में मोड़ लिया जाए। यह एक ऐसा मुकाबला होगा जिसमें अंतिम व्हिस्ल बजने तक रोमांच अपने चरम पर रहने की पूरी उम्मीद है। यहां अंतिम व्हिस्ल बजने तक एक घमासान युद्ध होगा। मनोरंजन होना गारंटीड है।

आगे, आज रात भारतीय समयानुसार रात दो बजे, जर्मनी अपने नॉकआउट चरण का पहला मैच खेलने पेराग्वे के विरुद्ध बोस्टन स्टेडियम में उतरेगी। सन् 2014 में जर्मनी ने अर्जेंटीना को हराकर ट्रॉफी जीती थी। उसके बाद यह पहली दफा होगा कि जर्मन टीम नॉकआउट चरण का कोई मैच खेलेगी। पेराग्वे अपने इतिहास में कुल पांच बार नॉकआउट चरण में पहुंचा है, परन्तु अब तक वह नॉकआउट चरण में गोल स्कोर करने में नाकाम रहे हैं। वह निश्चित ही आज रात इस दाग को मिटाने का प्रयास करेंगे। ग्रुप स्टेज के अंतिम मैच में मिली हार को भुलाकर जर्मनी, बोस्टन में खेले जाने वाले इस मैच में, एक बड़ी जीत से सभी को सचेत करना चाहेगी कि उन्हें हल्के में लेने की भूल न की जाए।

आगे, कल सवेरे भारतीय समयानुसार साढ़े छह बजे, नीदरलैंड्स का सामना होगा एटलस लायंस से। नीदरलैंड्स व मोरक्को दोनों ही टीमों ने ग्रुप चरण में अच्छे खेल का प्रदर्शन करते हुए अपने-अपने ग्रुप में सात-सात अंक हासिल किए थे। मोरक्को ने पिछली दफा बेल्जियम, स्पेन व पुर्तगाल को हराते हुए सेमीफाइनल तक का सफर तय किया था। वहीं, डच टीम भी इस दफा फिर अच्छी फुटबॉल खेलती नजर आई है। मेक्सिको में कल जरूर एक बेहद जबरदस्त मैच होना तय है।

इस दफा पहली बार टूर्नामेंट के इतिहास में, 48 टीमें होने के चलते, Round of 32 खेला जा रहा है। और, इस राउंड में कई रोचक मुकाबले खेले जाने वाले हैं। नीदरलैंड्स और मोरक्को के बीच होने वाला यह मुकाबला भी उन्हीं में से एक होगा। दोनों ही टीमें जीत के लिए लालायित हैं। दोनों ही टीमें अंतिम क्षणों तक जीत के लिए प्रयासरत रहेंगी। ब्राजील बनाम जापान के साथ-साथ फुटबॉल प्रेमियों की नजरें इस मुकाबले पर भी टिकी रहेंगी।

अब तो हर मैच ही रोचक होगा। अब तो हर मैच में कुछ भी हो सकता है। एक अच्छा दिन किसी भी टीम की किस्मत बना या बिगाड़ सकता है। अब, लगातार बेहतरीन फुटबॉल देखने को मिलेगी। बने रहिए साथ, क्योंकि……..the party has just begun!

राष्ट्रीय हितों की अनदेखी, मुस्लिम तुष्टिकरण पर जोर: गाँधी परिवार की चाहत- इजरायल को छोड़ फिलिस्तीन का समर्थन करे मोदी सरकार, अखबारी लेख में सोनिया ने की बैटिंग

भारत की विदेश नीति को लेकर एक बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है, जब कॉन्ग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने तीखा हस्तक्षेप किया। शनिवार (27 जून 2026) को द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित अपने एक लेख में वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता ने नरेंद्र मोदी सरकार पर जोरदार हमला बोला।

उन्होंने पश्चिम एशिया में जारी मानवीय संकट पर सरकार के रुख की आलोचना करते हुए कहा कि इजरायल द्वारा किए जा रहे ‘गाजा नरसंहार’ पर उसकी ‘पत्थर जैसी चुप्पी’ और निष्क्रियता न केवल नैतिक रूप से निंदनीय है, बल्कि राष्ट्रीय हित के दृष्टिकोण से भी समझ से परे है।

उन्होंने दावा किया कि अपनी ऐतिहासिक जियोपॉलिटिकल नीतियों से हटकर भारत ने फिलिस्तीन, ईरान और व्यापक पश्चिम एशियाई क्षेत्र में अपने लंबे समय से चले आ रहे सहयोगियों को खुद से दूर कर लिया है।

उनका तर्क था कि इस कूटनीतिक तौर पर पीछे हटने के कारण से भारत वैश्विक जनमत से भी दूर हो गया है, जबकि पाकिस्तान ने इस खाली जगह का फायदा उठाकर खुद को एक मध्यस्थ के रूप में स्थापित करने की कोशिश की है।

उनका मानना है कि ऐतिहासिक रूप से क्षेत्र के सभी प्रमुख पक्षों के साथ भारत के मैत्रीपूर्ण संबंधों को देखते हुए यह भूमिका स्वाभाविक रूप से भारत की होनी चाहिए थी।

अपने संपादकीय में गाँधी ने विशेष रूप से प्रधानमंत्री के कूटनीतिक कार्यक्रम को निशाना बनाते हुए कहा कि ईरान को लेकर अमेरिका-इजरायल की संयुक्त सैन्य कार्रवाइयों से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इजरायल दौरा एक हैरान करने वाला रणनीतिक निर्णय था।

उन्होंने कहा कि भारतीय राष्ट्र की भावना यह माँग करती है कि वह उन फिलिस्तीनियों के पक्ष में आवाज उठाए, जिनके बच्चों को इतनी निर्ममता से निशाना बनाया गया है। अपने तर्कों को आधार देने के लिए उन्होंने अंतरराष्ट्रीय निष्कर्षों का भी हवाला दिया।

उन्होंने लिखा कि सितंबर 2025 में संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जाँच आयोग ने निष्कर्ष निकाला था कि इज़रायली अधिकारी गाजा में नरसंहार कर रहे हैं। उन्होंने आगे कहा कि जून 2026 में इसी आयोग ने, जिसकी अध्यक्षता अब सेवानिवृत्त भारतीय न्यायविद न्यायमूर्ति एस मुरलीधर कर रहे हैं, उन निष्कर्षों को दोहराया और विशेष रूप से सबसे कम उम्र के नागरिकों पर पड़े भारी असर पर ध्यान केंद्रित किया।

लेख का स्क्रीनशॉट

संयुक्त राष्ट्र के निष्कर्षों का हवाला देते हुए गाँधी ने लिखा, “94 पन्नों की यह रिपोर्ट बेहद भयावह है, जिसमें गाजा में इजरायल द्वारा मचाई गई तबाही की भयावह तस्वीर और उसकी कार्रवाई के पीछे मौजूद नरसंहार की मंशा का विवरण दिया गया है। कम से कम 20,000 बच्चों की मौत हो चुकी है और 44000 अन्य बच्चे घायल हुए हैं, जिनमें से कई पूरी जिंदगी के लिए गंभीर रूप से प्रभावित हो गए हैं।”

उन्होंने दावा किया कि बच्चों को निशाना बनाना एक सोची-समझी रणनीति है। उन्होंने कहा, “मारे गए या घायल हुए लोगों में 27 प्रतिशत बच्चे हैं और कई लड़कों के सिर और गर्दन पर गोली लगने के निशान पाए गए। गाजा के 97 प्रतिशत स्कूल नष्ट कर दिए गए हैं।”

उन्होंने यह भी कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं के ढाँचे के नष्ट होने के कारण गर्भपात और प्रसव संबंधी जटिलताओं के मामलों में 300 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। हालाँकि गाँधी ने अक्टूबर 2023 में हमास द्वारा इजरायल पर किए गए हमले को कायरतापूर्ण, भयावह और पूरी तरह अस्वीकार्य हमला बताया, लेकिन उनका कहना था कि इसके बाद इजरायली सशस्त्र बलों की जवाबी कार्रवाई बेलगाम क्रूरता और बर्बरता से भरी रही है।

उन्होंने लिखा, “प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से लेकर उनके वरिष्ठ कैबिनेट सहयोगियों तक, इजरायल के कई वरिष्ठ नेताओं ने गाजा की पूर्ण घेराबंदी और पूरी तरह विनाश की माँग की है, फिलिस्तीनियों को जानव’ बताया है जिनका अस्तित्व में रहने का कोई अधिकार नहीं है और इजरायल की सफलता की परिभाषा लाखों लोगों के गाजा छोड़कर भाग जाने को बताया है।”

कॉन्ग्रेस के शीर्ष नेताओं ने ओप-एड का किया समर्थन

सोनिया गाँधी के इन विचारों को कॉन्ग्रेस के शीर्ष नेताओं का भी जल्द ही मजबूत समर्थन मिल गया। उन्होंने इस अवसर का इस्तेमाल भारत की वैश्विक कूटनीतिक प्राथमिकताओं में बदलाव की माँग उठाने के लिए किया।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इस लेख को साझा करते हुए कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इसे बेहद प्रभावशाली बताया और कहा कि यह लेख इस बात की “कड़ी याद दिलाता है कि हमारी मौजूदा विदेश नीति ने फिलिस्तीन, ईरान और व्यापक मध्य-पूर्व क्षेत्र में हमारे ऐतिहासिक सहयोगियों को हमसे दूर कर दिया है।”

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने भी इस संपादकीय को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर साझा किया, ताकि इसका संदेश डिजिटल मंचों पर अधिक से अधिक लोगों तक पहुँच सके।

उन्होंने लिखा, “अपने इस संपादकीय के माध्यम से कॉन्ग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गाँधी जी ने भारत से अपनी स्वतंत्र विदेश नीति को फिर से स्थापित करने, मानवीय मूल्यों को कायम रखने और गाजा के मुद्दे पर नैतिक स्पष्टता के साथ अपनी आवाज उठाने का आह्वान किया है।”

वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेतृत्व द्वारा किए गए इस समन्वित अभियान से संकेत मिलता है कि कॉन्ग्रेस पार्टी पश्चिम एशिया को लेकर सरकार की नीति को राजनीतिक संघर्ष का एक प्रमुख मुद्दा बनाने की तैयारी में है।

इजराइल से भारत को गहरे रणनीतिक लाभ

अंतरराष्ट्रीय संबंधों का मार्गदर्शन वैचारिक भावुकता के बजाय ठोस राष्ट्रीय सुरक्षा हितों से होना चाहिए। पिछले तीन दशकों में भारत और इजरायल के बीच एक मजबूत साझेदारी विकसित हुई है।

हालाँकि भारत ने 1950 में इजरायल को मान्यता दे दी थी, लेकिन दोनों देशों के बीच पूर्ण राजनयिक संबंध 1992 में स्थापित हुए। इसके बाद से रक्षा, प्रौद्योगिकी, कृषि, साइबर सुरक्षा और व्यापार जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के संबंधों का उल्लेखनीय विस्तार हुआ है।

वर्तमान सरकार के कार्यकाल में भारत, इजरायल से हथियार खरीदने वाला सबसे बड़ा देश बन गया है। वहीं दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 1992 में 20 करोड़ अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2024 तक 6 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक हो गया।

इस आर्थिक और रक्षा साझेदारी को सितंबर 2025 में हस्ताक्षरित द्विपक्षीय निवेश संधि का भी समर्थन मिला, जिसने पेट्रोलियम, रसायन, इंजीनियरिंग उत्पादों और पॉलिश किए गए हीरों जैसे क्षेत्रों में व्यापार को और गति दी है।

सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि राष्ट्रीय संकट के गंभीर समय में, जब दुनिया की अन्य बड़ी शक्तियाँ तत्काल सहायता देने से हिचकिचा रही थीं, तब इजरायल ने लगातार एक भरोसेमंद और महत्वपूर्ण रक्षा साझेदार होने का प्रमाण दिया है।

इजरायल के साथ भारत के रक्षा संबंधों का इतिहास काफी पुराना है। इसकी शुरुआत 1962 से मानी जाती है, जब चीन के साथ युद्ध के दौरान इजरायल ने भारत को सैन्य सहायता प्रदान की थी।

इसके बाद 1999 में पाकिस्तान के साथ कारगिल युद्ध के दौरान इजरायल ने भारतीय वायुसेना (IAF) को सर्चर  मानव रहित हवाई वाहन (Unmanned Aerial Vehicle) और जगुआर तथा मिराज स्क्वाड्रनों के लिए निगरानी प्रणालियाँ उपलब्ध कराई थीं।

साल 2014 के बाद से भारत और इजरायल के बीच रक्षा संबंधों में और तेजी आई है। इजरायल के कुल हथियार निर्यात का लगभग 42.1 प्रतिशत हिस्सा भारत को जाता है, जबकि अज़रबैजान, वियतनाम और अमेरिका उसके अन्य प्रमुख रक्षा ग्राहक हैं।

भारत की इजरायल के साथ साझेदारी केवल रक्षा क्षेत्र तक सीमित नहीं है। हालाँकि भारत का निर्यात कुछ प्रमुख क्षेत्रों में केंद्रित है, जिनमें रत्न एवं आभूषण, विशेष रूप से कटे और पॉलिश किए गए हीरे शामिल हैं, जिन्हें इजरायल के बड़े हीरा व्यापार केंद्रों में भेजा जाता है।

इसके अलावा पेट्रोलियम उत्पाद, ऑर्गेनिक केमिकल्स, प्लास्टिक और इंजीनियरिंग उत्पाद भी भारत के प्रमुख निर्यात का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। हाल के वर्षों में इजरायल को भारत के निर्यात में तेज गिरावट दर्ज की गई है।

माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इजरायल दौरा विभिन्न रणनीतिक समझौतों और साझेदारियों के जरिए एक बार फिर दोनों देशों के बीच व्यापार और भारतीय निर्यात को गति दे सकता है।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत-इजरायल पार्टनरशिप ने कैसे मदद की

इस रक्षा साझेदारी का व्यावहारिक महत्व ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पूरी तरह सामने आया। यह संघर्ष 22 अप्रैल 2025 को पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों द्वारा पहलगाम की बैसरन घाटी में किए गए घातक आतंकी हमले के बाद तेजी से बढ़ गया, जिसमें सीमा पार से आए आतंकियों ने 26 हिंदू पर्यटकों की हत्या कर दी थी।

इस उकसावे के जवाब में भारतीय सशस्त्र बलों ने ऑपरेशन सिंदूर नाम से एक सटीक और तीव्र जवाबी सैन्य कार्रवाई शुरू की, जिसका उद्देश्य पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (POK) में लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद द्वारा चलाए जा रहे आतंकी ढाँचे और लॉन्च पैड्स को नष्ट करना था।

7 मई को रात 1:05 बजे शुरू हुआ यह 23 मिनट का अभियान दुश्मन के ठिकानों पर सटीक हमले करने और संभावित जवाबी हमलों से भारतीय हवाई क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्वदेशी और रूसी प्रणालियों के साथ-साथ अत्याधुनिक इज़रायली तकनीक पर भी काफी हद तक निर्भर था। इस अभियान की सफलता सुनिश्चित करने में इजरायल के सैन्य उपकरणों ने निर्णायक भूमिका निभाई:

हारोप लोइटरिंग म्यूनिशन्स (Harop Loitering Munitions): भारतीय सशस्त्र बलों ने इजरायल में निर्मित हारोप कामिकाज़े ड्रोन तैनात किए, जिन्हें विशेष रूप से दुश्मन की वायु रक्षा प्रणालियों और रडार इकाइयों को नष्ट करने के लिए डिजाइन किया गया है।

ये ड्रोन लक्ष्य क्षेत्र के ऊपर नौ घंटे तक मंडराने में सक्षम हैं और 50 पाउंड के वारहेड से लैस होते हैं। उच्च स्तर की स्वायत्त क्षमता से युक्त इन ड्रोन ने ऑपरेशन के दौरान लाहौर में स्थित पाकिस्तान की एक महत्वपूर्ण वायु रक्षा सुविधा पर सफलतापूर्वक हमला कर उसे नष्ट कर दिया।

हेरॉन Mk2 यूएवी (Heron Mk2 UAVs): निगरानी और टोही अभियानों के लिए भारतीय वायुसेना ने हेरॉन Mk2 ड्रोन का इस्तेमाल किया, जो 35000 फीट तक की ऊँचाई पर उड़ान भर सकते हैं और 40 घंटे से अधिक समय तक लगातार हवा में रह सकते हैं।

अग्रिम सैन्य ठिकानों से संचालित इन लंबी अवधि तक उड़ान भरने वाले ड्रोन ने दुर्गम उत्तरी क्षेत्र में वास्तविक समय (रियल-टाइम) खुफिया जानकारी, लक्ष्य की पहचान (टारगेट एक्विजिशन) और हमले के बाद हुए नुकसान का आकलन (बैटल डैमेज असेसमेंट) उपलब्ध कराया। साथ ही ये पारंपरिक जमीनी विमानभेदी हथियारों की पहुँच से सुरक्षित दूरी पर रहकर अपना मिशन पूरा करते रहे।

स्काईस्ट्राइकर ड्रोन (SkyStriker Drones): इजरायल की एल्बिट सिक्योरिटी सिस्टम्स और भारत की बेंगलुरु स्थित अल्फा डिजाइन टेक्नोलॉजीज़ की साझेदारी में निर्मित इन शांत, विद्युत चालित (इलेक्ट्रिक प्रोपेल्ड) लोइटरिंग म्यूनिशन्स का इस्तेमाल गुप्त रूप से कम ऊँचाई पर सटीक हमले करने के लिए किया गया।

5 से 10 किलोग्राम तक के बम ले जाने में सक्षम इन ड्रोन ने उन परिस्थितियों में भी विशिष्ट सामरिक लक्ष्यों पर सफलतापूर्वक हमला किया, जहाँ GPS सिग्नल बाधित थे।

बराक-8 मिसाइल रक्षा प्रणाली (Barak 8 Missile Defence System): भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) और इजरायल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज (IAI) द्वारा संयुक्त रूप से विकसित बराक-8 लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली ने देश की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

जब पाकिस्तान ने जवाबी कार्रवाई के तहत दिल्ली को निशाना बनाते हुए फतह-II बैलिस्टिक मिसाइल दागी, तब बराक-8 प्रणाली ने हरियाणा के सिरसा के ऊपर ही उस आने वाली मिसाइल को सफलतापूर्वक रोककर नष्ट कर दिया।

स्पाइस-2000 प्रिसिजन बम किट्स: भारतीय लड़ाकू विमानों ने इजरायल द्वारा विकसित स्पाइस-2000 गाइडेंस किट्स का इस्तेमाल कर सामान्य जनरल-पर्पज़ बमों को स्मार्ट, फायर-एंड-फॉरगेट (दागो और भूल जाओ) क्षमता वाले अत्यधिक सटीक स्टैंड-ऑफ हथियारों में बदल दिया।

उन्नत सीन-मैचिंग एल्गोरिदम की मदद से इन बमों ने आतंकी ठिकानों की इमारतों की छतों को बेहद सटीकता से भेदते हुए निशाना बनाया, जबकि आसपास के नागरिक इलाकों को होने वाले नुकसान को न्यूनतम रखा गया।

टेवर X95 असॉल्ट राइफल्स : जमीनी अभियानों के दौरान मरीन कमांडो (MARCOS) और गरुड़ कमांडो सहित भारतीय विशेष बलों की चुनिंदा इकाइयों को भारत में लाइसेंस के तहत निर्मित कॉम्पैक्ट, बुलपप डिजाइन वाली टेवर X95 असॉल्ट राइफलों से लैस किया गया था।

इन राइफलों ने नजदीकी दूरी पर चलाए गए सुरक्षा अभियानों (क्लोज-क्वार्टर्स ऑपरेशंस) के दौरान उच्च विश्वसनीयता और बेहतर गतिशीलता (मैन्युवरेबिलिटी) प्रदान की।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान मिली निर्णायक सफलता, जिसमें लगभग 100 आतंकवादी मारे गए थे, जिनमें जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर के करीबी रिश्तेदार और शीर्ष कमांडर तथा लश्कर-ए-तैयबा के रणनीतिकार अबू जुंदाल भी शामिल थे, इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि इज़रायली रक्षा तकनीक भारत की सैन्य तैयारियों और परिचालन क्षमता का कितना महत्वपूर्ण और गहराई से जुड़ा हिस्सा बन चुकी है।

भारत की द्वि-राष्ट्र नीति और राष्ट्रीय हित

भारत आधिकारिक रूप से दो-राष्ट्र समाधान (टू-स्टेट सॉल्यूशन) का समर्थन करता है, जिसमें इजरायल और फिलिस्तीन दोनों को मान्यता देने तथा संवाद और कूटनीति के माध्यम से शांतिपूर्ण समाधान का पक्ष लिया जाता है।

इस दृष्टिकोण से भारतीय राज्य का प्राथमिक दायित्व अपने नागरिकों की सुरक्षा करना, अपनी सीमाओं की रक्षा करना और अपने आर्थिक हितों को सुरक्षित रखना है। दूरस्थ वैचारिक विवादों में गहराई से शामिल होने से कोई स्पष्ट रणनीतिक लाभ नहीं मिलता और इससे महत्वपूर्ण रक्षा आपूर्ति श्रृंखलाओं को रोकने का जोखिम भी पैदा हो सकता है।

भारत की लंबे समय से चली आ रही आधिकारिक कूटनीतिक नीति एक स्पष्ट और संतुलित दो-राष्ट्र नीति (Two-State Policy) रही है, जिसके तहत एक स्वतंत्र और व्यवहार्य फिलिस्तीन के साथ-साथ एक सुरक्षित और मान्यता प्राप्त इजरायल को औपचारिक मान्यता देने का समर्थन किया जाता है।

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस संतुलित कूटनीतिक रुख को बनाए रखने से आगे बढ़कर, क्षेत्र की आंतरिक राजनीतिक परिस्थितियाँ या सैन्य संघर्ष बाहरी मामले हैं। ऐसे में भारत पर इजरायल जैसे महत्वपूर्ण रक्षा साझेदार के खिलाफ आक्रामक और एकतरफा रुख अपनाने का दबाव बनाना देश की व्यावहारिक राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति और हितों को कमजोर करने वाला कदम माना जाता है।

कॉन्ग्रेस का मुस्लिम तुष्टीकरण का इतिहास रहा है जो देश के हितों को नजरअंदाज करता है

कॉन्ग्रेस का गाज़ा जैसे अंतरराष्ट्रीय संघर्षों पर अत्यधिक ध्यान वैश्विक रणनीति से अधिक उसकी लंबे समय से चली आ रही अल्पसंख्यक वोट-बैंक की राजनीति का परिणाम माना जाता है। आलोचकों का तर्क है कि इस राजनीतिक सोच के कारण पार्टी अक्सर राष्ट्रीय हितों के बजाय घरेलू चुनावी समीकरणों को प्राथमिकता देती है। यह आरोप स्वतंत्रता के शुरुआती वर्षों से ही कॉन्ग्रेस पर लगता रहा है।

आलोचकों के अनुसार, समान न्याय के बजाय राजनीतिक प्रभावों को प्राथमिकता देने की यह प्रवृत्ति स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के शासनकाल में भी दिखाई देती है। दिसंबर 1948 के ऐतिहासिक अभिलेख बताते हैं कि नेहरू ने 1946 के डायरेक्ट एक्शन डे के दौरान कलकत्ता में हुई सांप्रदायिक हिंसा के प्रमुख जिम्मेदार नेताओं में गिने जाने वाले हुसैन शहीद सुहरावर्दी के विरुद्ध चल रहे 50 लाख रुपए के आयकर चोरी के मामले में व्यक्तिगत हस्तक्षेप किया था।

12 दिसंबर 1948 को तत्कालीन वित्त मंत्री जॉन मथाई को लिखे अपने आधिकारिक पत्र में नेहरू ने आयकर कार्रवाई को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि यदि सुहरावर्दी के खिलाफ कठोर वित्तीय कार्रवाई की गई, तो इसका भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के मुस्लिम नेताओं पर राजनीतिक प्रभाव पड़ सकता है। पत्र में उन्होंने लिखा:

“सुहरावर्दी के संबंध में जो भी कार्रवाई की जाएगी, उसके कुछ सार्वजनिक परिणाम होंगे। ऐसी हर कार्रवाई की प्रतिक्रिया भारत और पाकिस्तान दोनों में होगी।”

इसके बाद उन्होंने वित्त मंत्रालय से सुहरावर्दी की संपत्तियों की कुर्की की कार्रवाई रोकने का आग्रह किया।

आलोचकों के अनुसार, इस हस्तक्षेप के परिणामस्वरूप सुहरावर्दी भारत में अपनी व्यावसायिक संपत्तियाँ बेचने, बड़ी कर देनदारी से बचने और सुरक्षित रूप से पाकिस्तान जाने में सफल रहे, जहाँ बाद में वे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भी बने।

उनके आलोचक यह भी कहते हैं कि यह निर्णय उन लोगों के प्रति नरमी का उदाहरण था जिन्हें 1946 की सांप्रदायिक हिंसा में हजारों हिंदुओं की मौत के लिए जिम्मेदार माना जाता है।

UPA की विरासत और आधुनिक चुनावी माहौल

कॉन्ग्रेस का गाज़ा जैसे अंतरराष्ट्रीय संघर्षों पर अत्यधिक ध्यान वैश्विक रणनीति से अधिक उसकी लंबे समय से चली आ रही अल्पसंख्यक वोट-बैंक की राजनीति का परिणाम माना जाता है। आलोचकों का तर्क है कि इस राजनीतिक सोच के कारण पार्टी अक्सर राष्ट्रीय हितों के बजाय घरेलू चुनावी समीकरणों को प्राथमिकता देती है। यह आरोप स्वतंत्रता के शुरुआती वर्षों से ही कॉन्ग्रेस पर लगता रहा है।

आलोचकों के अनुसार, समान न्याय के बजाय राजनीतिक प्रभावों को प्राथमिकता देने की यह प्रवृत्ति स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के शासनकाल में भी दिखाई देती है।

दिसंबर 1948 के ऐतिहासिक अभिलेख बताते हैं कि नेहरू ने 1946 के डायरेक्ट एक्शन डे के दौरान कलकत्ता में हुई सांप्रदायिक हिंसा के प्रमुख जिम्मेदार नेताओं में गिने जाने वाले हुसैन शहीद सुहरावर्दी के विरुद्ध चल रहे 50 लाख रुपए के आयकर चोरी के मामले में व्यक्तिगत हस्तक्षेप किया था।

12 दिसंबर 1948 को तत्कालीन वित्त मंत्री जॉन मथाई को लिखे अपने आधिकारिक पत्र में नेहरू ने आयकर कार्रवाई को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि यदि सुहरावर्दी के खिलाफ कठोर वित्तीय कार्रवाई की गई, तो इसका भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के मुस्लिम नेताओं पर राजनीतिक प्रभाव पड़ सकता है। पत्र में उन्होंने लिखा:

“सुहरावर्दी के संबंध में जो भी कार्रवाई की जाएगी, उसके कुछ सार्वजनिक परिणाम होंगे। ऐसी हर कार्रवाई की प्रतिक्रिया भारत और पाकिस्तान दोनों में होगी।”

इसके बाद उन्होंने वित्त मंत्रालय से सुहरावर्दी की संपत्तियों की कुर्की की कार्रवाई रोकने का आग्रह किया।

आलोचकों के अनुसार, इस हस्तक्षेप के परिणामस्वरूप सुहरावर्दी भारत में अपनी व्यावसायिक संपत्तियाँ बेचने, बड़ी कर देनदारी से बचने और सुरक्षित रूप से पाकिस्तान जाने में सफल रहे, जहाँ बाद में वे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भी बने।

उनके आलोचक यह भी कहते हैं कि यह निर्णय उन लोगों के प्रति नरमी का उदाहरण था जिन्हें 1946 की सांप्रदायिक हिंसा में हजारों हिंदुओं की मौत के लिए जिम्मेदार माना जाता है।

सोनिया गाँधी के फॉर्मूलों पर बीजेपी का पलटवार

सोनिया गाँधी के लेख के जवाब में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने तीखा पलटवार करते हुए कॉन्ग्रेस  नेतृत्व पर आरोप लगाया कि वह अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों में भी घरेलू वोट-बैंक की राजनीति घुसाने का प्रयास कर रही है।

भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने कॉन्ग्रेस पर मानवीय संवेदनाओं को चुनिंदा तरीके से अपनाने का आरोप लगाया। मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा,

“सोनिया गाँधी गाजा के मुसलमानों के लिए आवाज उठाती हैं, रफाह पर ट्वीट करती हैं, लेकिन ढाका में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों पर पूरी तरह चुप रहती हैं। इससे साफ पता चलता है कि उनके लिए विदेश नीति भी वोट-बैंक की राजनीति के हिसाब से तय होती है।”

भाजपा का कहना है कि कॉन्ग्रेस और विपक्ष के ऐसे सार्वजनिक बयान राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित हैं। पार्टी के अनुसार, इन बयानों का मकसद जनता को गुमराह करना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को कमजोर करना है। भाजपा का आरोप है कि विपक्ष देश के दीर्घकालिक रक्षा सहयोग, रणनीतिक स्वायत्तता और राष्ट्रीय हितों से ऊपर अल्पकालिक चुनावी लाभ को प्राथमिकता देता है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

जब भगवान पड़ते हैं बीमार… पुरी की जगन्नाथ परंपरा में 15 दिनों तक बंद हो जाते हैं मंदिर के द्वार: जानें भक्त-भगवान के इस अनूठे जीवंत रिश्ते की पूरी कथा

दुनिया के अधिकांश पंथों और धार्मिक परंपराओं में ईश्वर को सर्वशक्तिमान, अलिप्त, अचल और मानवीय सीमाओं से परे माना जाता है। वहाँ ईश्वर पूजा का केंद्र तो होता है लेकिन वह मनुष्य जैसा जीवन नहीं जीता। उसे भूख नहीं लगती, वह बीमार नहीं पड़ता, उसे विश्राम की आवश्यकता नहीं होती। लेकिन सनातन परंपरा इस दृष्टि से अलग खड़ी दिखाई देती है।

यहाँ भगवान केवल पूजे नहीं जाते, उन्हें जिया जाता है। वे जन्म लेते हैं, बाल्यकाल बिताते हैं, मित्र बनते हैं, प्रेम करते हैं, विवाह करते हैं, युद्ध करते हैं, शोक करते हैं, विश्राम करते हैं और कुछ परंपराओं में तो वे बीमार भी पड़ते हैं। यही कारण है कि सनातन में मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं बल्कि भगवान का निवास माने जाते हैं और उनकी सेवा किसी मूर्ति की नहीं बल्कि एक जीवंत सत्ता की तरह की जाती है।

इसी जीवंत परंपरा का सबसे अद्भुत उदाहरण ओडिशा के पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा से पहले आने वाला वह 15 दिन का काल है, जब करोड़ों भक्तों के आराध्य भगवान जगन्नाथ स्वयं दर्शन देना बंद कर देते हैं। मंदिर के द्वार बंद हो जाते हैं और माना जाता है कि भगवान बीमार हैं।

लेकिन सवाल उठता है कि आखिर इन 15 दिनों में भगवान रहते कहाँ हैं और उनके साथ क्या होता है? इस प्रश्न का उत्तर हमें स्नानयात्रा, अनसर और जगन्नाथ परंपरा की उस अनूठी दुनिया में लेकर जाता है जहाँ भगवान और भक्त के बीच दूरी नहीं, बल्कि आत्मीयता है।

देव स्नान पूर्णिमा: जब भगवान स्वयं स्नान करने आते हैं बाहर

सनातन परंपरा में प्रत्येक मास की पूर्णिमा का महत्व माना गया है, लेकिन ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को विशेष रूप से देव स्नान पूर्णिमा कहा जाता है। पुरी में इसी दिन भगवान जगन्नाथ की प्रसिद्ध स्नान यात्रा आयोजित होती है। यह वह अवसर होता है जब भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा को गर्भगृह से बाहर लाकर स्नान मंडप पर विराजमान किया जाता है।

स्नान मंडप पर विराजमान भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा (फोटो साभार: shreekhetra.com)

इस पूरे अनुष्ठान को ‘पहंडी विजय’ कहा जाता है। ढोल, मृदंग, शंखध्वनि और वैदिक मंत्रों के बीच देव विग्रहों को बाहर लाने का दृश्य लाखों श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत भावुक और दुर्लभ माना जाता है। इसके बाद शुरू होता है महास्नान। परंपरा के अनुसार, मंदिर परिसर के स्वर्णकूप से जल लाया जाता है और 108 कलशों से भगवानों का अभिषेक किया जाता है।

मान्यता के अनुसार, इनमें से 35 कलश भगवान जगन्नाथ, 33 बलभद्र, 22 देवी सुभद्रा और शेष 18 कलश सुदर्शन चक्र के लिए होते हैं। जल में चंदन, पुष्प, कपूर, केसर और सुगंधित द्रव्य मिलाकर उसे विशेष मंत्रों से अभिमंत्रित किया जाता है।

क्या है कथा और मान्यता?

भगवान जगन्नाथ के बीमार होने की परंपरा से जुड़ी एक अत्यंत रोचक और भावनात्मक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि पुरी में माधव दास नाम के एक महान भक्त रहते थे। उनका पूरा जीवन भगवान जगन्नाथ की भक्ति में समर्पित था और वे मंदिर के प्रसाद से ही अपना निर्वाह करते थे। एक बार माधव दास को तेज बुखार हो गया।

शरीर कमजोर होता गया, लेकिन उनकी भक्ति में कोई कमी नहीं आई। लोग उन्हें बार-बार वैद्य के पास जाकर इलाज कराने की सलाह देते, लेकिन उनका उत्तर हमेशा एक ही होता, “जब स्वयं मेरे प्रभु मेरा ध्यान रख रहे हैं, तो मुझे किसी और सहारे की आवश्यकता नहीं है।” धीरे-धीरे बीमारी इतनी बढ़ गई कि एक दिन वे अचेत होकर गिर पड़े।

मान्यता है कि उसी समय स्वयं भगवान जगन्नाथ उनके पास पहुँचे और उनकी सेवा करने लगे। उन्होंने उनकी देखभाल की, उन्हें संभाला और उनके कष्ट को कम किया। कुछ समय बाद जब माधव दास को होश आया और उन्होंने देखा कि उनकी सेवा कोई और नहीं बल्कि स्वयं भगवान कर रहे हैं, तो वे भावुक हो उठे।

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार: AI)

उन्होंने विनम्रता से पूछा, “प्रभु, आप मेरे लिए इतना कष्ट क्यों उठा रहे हैं?” तब भगवान जगन्नाथ ने कहा, “मैं अपने भक्तों का साथ कभी नहीं छोड़ता। लेकिन संसार का नियम है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्मों का फल भोगना पड़ता है। तुम्हारी बीमारी अभी पंद्रह दिन और चलने वाली थी, इसलिए तुम्हारा दुख कम करने के लिए मैं उसे अपने ऊपर ले रहा हूँ।”

कहा जाता है कि यह घटना ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन हुई थी। तभी से यह मान्यता चली आ रही है कि इस दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को विशेष स्नान कराया जाता है, जिसके बाद वे अस्वस्थ हो जाते हैं। इसके बाद भगवान लगभग पंद्रह दिनों तक भक्तों को दर्शन नहीं देते और एकांत में विश्राम करते हैं।

हाथी बेश: जब भगवान धारण करते हैं गणेश स्वरूप

महास्नान के तुरंत बाद भगवानों का श्रृंगार किया जाता है। पहले उन्हें सादा बेश पहनाया जाता है और उसके बाद प्रसिद्ध ‘हाथी बेश’ या ‘गज वेश’ होता है। लोकमान्यता के अनुसार, महाराष्ट्र से आए गणपति उपासक विनायक भट्ट ने भगवान जगन्नाथ के गणेश स्वरूप के दर्शन की इच्छा व्यक्त की थी।

कहा जाता है कि उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने पुजारियों को स्वप्न में संकेत दिया और तब से महास्नान के बाद भगवान को गजानन स्वरूप में सजाने की परंपरा शुरू हुई। यह केवल श्रृंगार नहीं बल्कि सनातन की उस व्यापक दृष्टि का प्रतीक माना जाता है जिसमें विभिन्न देव रूप एक-दूसरे से अलग नहीं बल्कि एक ही दिव्य चेतना के विस्तार माने जाते हैं।

स्नान के बाद बीमार पड़ जाते हैं भगवान

यहीं से शुरू होता है जगन्नाथ परंपरा का सबसे रहस्यमय और भावनात्मक अध्याय। मान्यता है कि 108 कलशों से शीतल जल के महास्नान के बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा को ज्वर हो जाता है। इसके बाद वे सार्वजनिक दर्शन देना बंद कर देते हैं। इसे ‘अनसर’ या ‘अनवसर’ काल कहा जाता है।

यह सुनने में आधुनिक संवेदनाओं से प्रतीकात्मक लग सकता है, लेकिन सनातन दर्शन में इसका गहरा अर्थ है। यहाँ भगवान सर्वशक्तिमान होते हुए भी अपने भक्तों के जीवन से अलग नहीं हैं। वे मनुष्य के अनुभवों को स्वीकार करते हैं। वे बताते हैं कि दिव्यता दूरी नहीं, निकटता का नाम है।

अनसर घर: आखिर इन 15 दिनों में भगवान रहते कहाँ हैं?

स्नान यात्रा के बाद तीनों देव विग्रहों को मंदिर परिसर के भीतर स्थित विशेष कक्ष में ले जाया जाता है जिसे ‘अनसर घर’ कहा जाता है। यहीं भगवान अगले लगभग 15 दिनों तक विश्राम करते हैं। इस दौरान मंदिर के सामान्य दर्शन बंद रहते हैं और केवल चुनिंदा सेवायतों को ही प्रवेश की अनुमति होती है।

विशेष रूप से दैतापति सेवक इस अवधि में भगवान की सेवा करते हैं। इस सेवा को ‘गुप्त सेवा’ या ‘गुप्त रीति’ भी कहा जाता है। इन दिनों भगवान को औषधीय पेय, जड़ी-बूटियों से बने विशेष भोग, दशमूल मोदक और फुलुरी तेल अर्पित किया जाता है। मान्यता यह है कि जैसे घर में कोई सदस्य बीमार हो तो उसकी देखभाल होती है, वैसे ही भगवान की भी होती है।

बंद दरवाजों के पीछे क्या होता है?

अनसर काल केवल विश्राम नहीं है, यह मंदिर की सबसे गोपनीय सेवाओं में से एक माना जाता है। इस दौरान भगवान के विग्रहों पर विशेष उपचारात्मक और सौंदर्य संबंधी सेवाएँ की जाती हैं। पारंपरिक रूप से देव विग्रहों के रंगों और स्वरूप की भी देखभाल की जाती है।

कुछ परंपराओं के अनुसार, इस अवधि में भगवान के विग्रहों का पुनः अलंकरण और नवीनीकरण भी किया जाता है, क्योंकि इस दौरान भगवान दर्शन नहीं देते, इसलिए मंदिर में उनके स्थान पर विशेष पटचित्र रूपों की पूजा होती है जिन्हें ‘अनसर पट्टी’ कहा जाता है। इसमें भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के चित्र स्वरूप को पूजित किया जाता है।

यह व्यवस्था केवल धार्मिक नहीं बल्कि एक गहरे दार्शनिक विचार को भी व्यक्त करती है कि रूप बदल सकता है, उपस्थिति नहीं।

नवयौवन दर्शन: जब भगवान फिर लौटते हैं भक्तों के बीच

लगभग पंद्रह दिनों के विश्राम और उपचार के बाद भगवान पहली बार फिर दर्शन देते हैं। इस अवसर को ‘नवयौवन दर्शन’ कहा जाता है। मान्यता है कि अब भगवान पूर्णतः स्वस्थ होकर नए यौवन और नई ऊर्जा के साथ भक्तों के सामने आते हैं।

इसके अगले दिन भव्य रथयात्रा निकलती है, जिसमें भगवान स्वयं मंदिर से बाहर आकर जनता के बीच पहुँचते हैं। यह शायद दुनिया की उन दुर्लभ धार्मिक परंपराओं में से एक है जहाँ भक्त भगवान तक नहीं पहुँचते बल्कि भगवान स्वयं भक्तों तक आते हैं।

ओडिशा रथयात्रा (फोटो साभार: Brittanica)

सनातन की जीवंत ईश्वर परंपरा: ईश्वर और भक्त के रिश्ते का सबसे अनोखा दर्शन

जगन्नाथ की यह पूरी परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि सनातन के दर्शन को समझने की कुंजी है। सनातन में मूर्ति केवल प्रतीक नहीं है। ‘अर्चावतार’ की अवधारणा कहती है कि भगवान भक्त के प्रेम के लिए स्वयं को सुलभ बना लेते हैं।

इसलिए मंदिरों में भगवान को जगाया जाता है, स्नान कराया जाता है, वस्त्र पहनाए जाते हैं, भोजन कराया जाता है, विश्राम कराया जाता है और कभी-कभी उनकी चिकित्सा भी की जाती है। यह विचार कहता है कि ईश्वर दूर बैठा हुआ राजा नहीं, जीवन के हर अनुभव में सहभागी है।

शायद इसी वजह से जगन्नाथ परंपरा करोड़ों लोगों को यह अनुभव कराती है कि भगवान सर्वशक्तिमान होने के बावजूद इतने अपने हो सकते हैं कि साल में एक बार बीमार भी पड़ जाएँ और भक्त उनके ठीक होने का इंतजार करें।

दुनिया की अधिकांश धार्मिक परंपराओं और पंथों में ईश्वर को एक ऐसी सत्ता के रूप में देखा जाता है जो सर्वशक्तिमान है, पूर्ण है, समय और प्रकृति के नियमों से परे है। वह सृष्टि का निर्माता है लेकिन सृष्टि की सीमाओं से बंधा नहीं है। वह जन्म नहीं लेता, उसे भूख नहीं लगती, वह थकता नहीं, उसे विश्राम या उपचार की आवश्यकता नहीं होती।

वह मनुष्य को देखता है, उसका मार्गदर्शन करता है, लेकिन स्वयं मनुष्य के अनुभवों का हिस्सा नहीं बनता। इस दृष्टि में ईश्वर और मनुष्य के बीच एक निश्चित दूरी बनी रहती है। यानी कि श्रद्धा होती है, समर्पण होता है, लेकिन निकटता सीमित होती है। इसके विपरीत सनातन परंपरा ईश्वर के साथ संबंध की एक बिल्कुल अलग कल्पना प्रस्तुत करती है।

यहाँ भगवान केवल पूजे जाने वाले देव नहीं हैं, बल्कि जीवन के सहभागी हैं। वे इतने दूर नहीं हैं कि केवल ध्यान में महसूस किए जाएँ और इतने छोटे भी नहीं कि केवल एक प्रतिमा तक सीमित हो जाएँ। सनातन में भगवान स्वयं भक्त के संसार में उतरते हैं।

जगन्नाथ का संदेश: दिव्यता दूरी नहीं, अपनापन भी है

वे अवतार लेते हैं, जन्म लेते हैं, बचपन जीते हैं, माता-पिता का स्नेह पाते हैं, मित्र बनाते हैं, प्रेम करते हैं, विवाह करते हैं, युद्ध लड़ते हैं, वनवास जाते हैं, वियोग सहते हैं, शोक करते हैं और कभी-कभी तो मनुष्य की तरह थकते और विश्राम भी करते हैं।

इसीलिए श्रीराम केवल ईश्वर नहीं हैं, वे पुत्र भी हैं, शिष्य भी हैं, पति भी हैं और राजा भी। श्रीकृष्ण केवल विष्णु के अवतार नहीं हैं, वे यशोदा के लाडले बालक हैं, सुदामा के मित्र हैं, अर्जुन के सारथी हैं और गोपियों के प्रिय भी हैं। भगवान शिव केवल संहारक नहीं हैं, वे पिता हैं, पति हैं, तपस्वी हैं और परिवार के साथ कैलाश पर रहने वाले देव भी हैं।

यही वह भाव है जो सनातन को केवल दर्शन नहीं बल्कि संबंध का धर्म बनाता है। इसी परंपरा का शायद सबसे जीवंत और अद्भुत उदाहरण भगवान जगन्नाथ हैं। पुरी में भगवान को केवल प्रतिमा मानकर पूजा नहीं जाती, बल्कि उन्हें एक जीवित राजा, परिवार के सदस्य और स्वयं भगवान के रूप में सेवा दी जाती है।

उनका जागरण होता है, उन्हें स्नान कराया जाता है, भोजन कराया जाता है, वस्त्र बदले जाते हैं, विश्राम कराया जाता है और वर्ष में एक समय ऐसा भी आता है जब माना जाता है कि भगवान अस्वस्थ हो गए हैं। ज्येष्ठ पूर्णिमा पर होने वाले महास्नान के बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को ज्वर हो जाता है।

इसके बाद वे सार्वजनिक दर्शन बंद कर देते हैं और लगभग पंद्रह दिनों तक अनसर गृह में विश्राम करते हैं। उन्हें औषधि दी जाती है, विशेष आहार दिया जाता है और सीमित सेवायत उनकी सेवा करते हैं। पहली नजर में यह एक धार्मिक कथा या अनुष्ठान लग सकता है, लेकिन इसके भीतर सनातन का बहुत गहरा दार्शनिक संदेश छिपा है।

यह परंपरा मानती है कि यदि भगवान केवल सर्वशक्तिमान रह जाएँ और मनुष्य के अनुभवों से कभी न गुजरें, तो भक्त उनके प्रति श्रद्धा तो रख सकता है, लेकिन अपनापन नहीं महसूस कर पाएगा। इसलिए भगवान स्वयं अपने भक्त के संसार में आते हैं। वे यह दिखाते हैं कि दिव्यता का अर्थ दूरी नहीं, निकटता भी हो सकता है।

जगन्नाथ का बीमार पड़ना वास्तव में भगवान की कमजोरी का नहीं, बल्कि भक्त के प्रति उनके स्नेह का प्रतीक माना जाता है। यह संदेश है कि जो ईश्वर पूरे जगत का पालन करता है, वही भक्त के प्रेम के लिए अपने आपको इतना सहज और मानवीय बना सकता है कि उसकी सेवा भी की जा सके।

शायद यही कारण है कि सनातन में भक्त केवल भगवान से प्रार्थना नहीं करता, वह उनकी देखभाल भी करता है।