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मुस्लिम आरक्षण खत्म करने से हिंदुओं को न्याय तक… जानें- क्या हैं नेपाल में 9 दिन से आमरण अनशन पर बैठे विनय यादव की माँगें और उन्होंने ऑपइंडिया को क्या बताया?

नेपाल की राजधानी काठमांडू के मैतीघर मंडला में राष्ट्रीय एकता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनय यादव आमरण अनशन पर बैठे हैं। शुक्रवार (7 अगस्त 2026) को उनके अनशन का नौवाँ दिन है। सुनसरी के देवानगंज में ‘हिंदू नरसंहार’ के पीड़ितों को न्याय दिलाने और सरकार के साथ हुए समझौते को लागू कराने की माँग को लेकर उन्होंने अन्न का त्याग कर दिया है।

विनय यादव का संघर्ष केवल एक घटना तक सीमित नहीं है। वह नेपाल में मुस्लिम आरक्षण खत्म करने, मुस्लिम आयोग को भंग करने, अवैध घुसपैठ पर कार्रवाई करने और हिंदू समुदाय के खिलाफ हुई हिंसा के दोषियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई की माँग भी उठा रहे हैं।

देवानगंज में 26 जुलाई 2026 की रात लाउडस्पीकर के इस्तेमाल, डीजे बजाने और कावड़ यात्रा को लेकर हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच हिंसा भड़की थी। इस झड़प और भीड़ को नियंत्रित करने के लिए की गई पुलिस कार्रवाई में गोलीबारी भी हुआ और इस घटना में 4 लोगों की मौत हो गई।

इसके बाद सरकार ने पीड़ित परिवारों के साथ सात-सूत्रीय समझौता किया। मृतकों को शहीद का दर्जा, परिवारों को 10 लाख नेपाली रुपए की राहत, एक सदस्य को रोजगार, घायलों के मुफ्त इलाज और निष्पक्ष जाँच जैसे भरोसे दिए गए। विनय यादव का कहना है कि इन आश्वासनों को अब कागज से निकालकर जमीन पर उतारने का समय आ गया है।

उनका सवाल सीधा है कि अगर सरकार ने पीड़ित परिवारों से समझौता किया है, तो उसके हर बिंदु पर कार्रवाई कब होगी? अगर हिंसा हुई है, तो दोषियों को कानून के सामने कब लाया जाएगा? और अगर नेपाल में धार्मिक हिंसा रोकनी है, तो ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए स्थायी सुरक्षा व्यवस्था कब तैयार होगी?

आमरण अनशन पर बैठ विनय यादव

ऑपइंडिया से क्या बोले विनय यादव?

इस आंदोलन के केंद्र में सुनसरी की घटना है। राष्ट्रीय एकता दल का कहना है कि हिंसा में मारे गए लोगों के परिवारों को सिर्फ आश्वासन नहीं बल्कि न्याय चाहिए। संगठन ने सरकार से घटना की स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध जाँच कराने की मांग की है।

माँग है कि दोषियों पर बिना किसी राजनीतिक या सामाजिक दबाव के कानून के अनुसार कार्रवाई हो और जाँच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। संगठन का कहना है कि यदि जाँच ही पारदर्शी नहीं होगी तो पीड़ित परिवारों का सरकार और कानून-व्यवस्था पर भरोसा कैसे कायम होगा?

विनय यादव ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा है, “घटना के बाद हमने शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया और सरकार को 24 घंटे का अल्टीमेटम दिया और विभिन्न माध्यमों से अपनी माँगें सरकार तक पहुँचाईं। लेकिन जब हमारी माँगों पर कोई ठोस पहल नहीं हुई, तब हमें मजबूर होकर आमरण अनशन शुरू करना पड़ा।”

उन्होंने आगे कहा, “हमारी मुख्य माँगों में सुनसरी घटना की निष्पक्ष जाँच, दोषियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई, पीड़ित परिवारों को न्याय, मृतकों को शहीद घोषित करना, घायलों का पूर्ण उपचार, सीमावर्ती क्षेत्रों में अवैध गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण तथा हमारे द्वारा उठाए गए अन्य नीतिगत विषयों पर सरकार द्वारा गंभीर पहल शामिल है।”

उनका कहना है कि जब तक सरकार माँगों पर सम्मानजनक, लिखित और कार्यान्वयन योग्य सहमति नहीं देती, तब तक यह आमरण अनशन जारी रहेगा।

सरकार के 7-सूत्रीय समझौते पर भी सवाल

देवानगंज हिंसा के बाद नेपाल सरकार ने पीड़ित परिवारों के साथ सात-सूत्रीय समझौता किया था। राष्ट्रीय एकता दल अब सरकार से इसी समझौते को पूरी तरह और तत्काल लागू करने की मांग कर रहा है।

इसमें मृतकों को शहीद का दर्जा देने की प्रक्रिया पूरी करना, प्रत्येक पीड़ित परिवार को 10 लाख नेपाली रुपए की राहत राशि देना, परिवार के एक योग्य सदस्य को रोजगार उपलब्ध कराना और घायलों का मुफ्त इलाज शामिल है।

राष्ट्रीय एकता दल का माँग पत्र

इसके अलावा घटना की स्मृति में मेमोरियल पार्क बनाने और समझौते में तय अन्य सुविधाओं को भी लागू करने की माँग की गई है। संगठन का कहना है कि राहत की घोषणा कर देना पर्याप्त नहीं है। पीड़ित परिवारों तक सहायता पहुँचे और समझौते के प्रत्येक बिंदु का प्रभाव जमीन पर दिखाई दे, तभी न्याय का भरोसा पैदा होगा।

मुस्लिम आरक्षण और मुस्लिम आयोग की समाप्ति की माँग

राष्ट्रीय एकता दल की सबसे स्पष्ट नीतिगत माँगों में नेपाल में मुस्लिम आरक्षण समाप्त करना और मुस्लिम आयोग को भंग करना शामिल है। विनय यादव ने ऑपइंडिया से कहा, “हमारा मुद्दा किसी धर्म विशेष के नेपाली नागरिकों से नहीं है। हमारी चिंता मुख्य रूप से सीमावर्ती क्षेत्रों से होने वाली अवैध घुसपैठ, अवैध बसावट, नागरिकता के दुरुपयोग तथा गैरकानूनी गतिविधियों को लेकर है।”

मुस्लिम आरक्षण समाप्त करने की माँग को लेकर विनय यादव ने कहा, “हमारा मानना है कि राज्य के सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए। इसलिए आरक्षण और विशेष प्रावधानों जैसे विषयों की संविधान, समानता के सिद्धांत और राष्ट्रीय आवश्यकता के आधार पर समीक्षा होनी चाहिए। यह एक नीतिगत विषय है, जिस पर सरकार और संबंधित पक्षों के बीच गंभीर संवाद होना चाहिए।”

अवैध घुसपैठ पर भी सरकार को घेर रहा आंदोलन

राष्ट्रीय एकता दल ने रोहिंग्या और बांग्लादेशी नागरिकों को वापस भेजने की माँग भी उठाई है। आधिकारिक पत्र में संगठन ने अवैध आव्रजन और सीमा पार होने वाली अवैध गतिविधियों को राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में गंभीर मुद्दा बताया है।

इसके साथ ही संगठन ने कथित ‘जिहादी’ गतिविधियों के मामलों में मृत्युदंड का प्रावधान करने वाले कानून की माँग की है। यह माँग भी सरकार के सामने औपचारिक बातचीत के जरिए रखने की बात कही गई है।

इन माँगों पर किसी भी निर्णय को नेपाल के संविधान और कानून की प्रक्रिया से गुजरना होगा लेकिन आंदोलन ने इन्हें अब राष्ट्रीय राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है।

नेपाल में मुस्लिम आरक्षण

नेपाल में मुस्लिम आरक्षण को लेकर इन दिनों बहस तेज है लेकिन इसका इतिहास समझने के लिए एक जरूरी तथ्य पहले जानना होगा नेपाल में मुस्लिमों के लिए शुरू से कोई अलग तय प्रतिशत वाला आरक्षण नहीं रहा है। सरकारी नौकरियों में समावेशी आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था की नींव 2007 में पड़ी, जब सिविल सर्विस में खुली प्रतियोगिता से भरी जाने वाली सीटों में से 45% को समावेशी श्रेणियों के लिए रखा गया। इसमें महिलाओं, आदिवासी-जनजाति, मधेसी, दलित, दिव्यांग और पिछड़े क्षेत्रों के लोगों को अलग-अलग हिस्से मिले लेकिन मुस्लिमों के लिए अलग श्रेणी नहीं थी।

बड़ा बदलाव 2015 के नेपाल संविधान से आया। संविधान के अनुच्छेद 42 में आर्थिक, सामाजिक या शैक्षिक रूप से पिछड़े मुस्लिमों को राज्य के निकायों में समानुपातिक समावेशी सिद्धांत के आधार पर भागीदारी का अधिकार दिया गया। यानी मुस्लिम समुदाय को संवैधानिक तौर पर समावेशी प्रतिनिधित्व या आरक्षण का अधिकार मिला।

नेपाल के संविधान (2015) के अनुच्छेद 264 के तहत ‘राष्ट्रीय मुस्लिम आयोग’ की स्थापना की गई। इसे कानूनी जामा पहनाने के लिए संसद ने ‘मुस्लिम आयोग अधिनियम, 2074 (2017)’ पारित किया। इस कानून की प्रस्तावना में लिखा है कि यह आयोग मुस्लिम समुदाय के इतिहास व संस्कृति की पहचान, उनके अधिकारों की रक्षा, और उनके आर्थिक-सामाजिक सशक्तीकरण के लिए सरकार को सुझाव देगा। आयोग के मुताबिक, 2011 की जनगणना में नेपाल की मुस्लिम आबादी करीब 4.4% थी। 2021 में यह बढ़कर 5.09% हो गई थी।

आरक्षण को लेकर बहस आज भी खत्म नहीं हुई है। मार्च 2025 में प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने संसद में कहा था कि थारू और मुस्लिम समुदाय से जुड़ी आरक्षण संबंधी मांगों को संघीय सिविल सेवा कानून के जरिए संबोधित किया जाएगा। यानी आज की असली बहस यह है कि मुस्लिमों के लिए मौजूदा समानुपातिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था पर्याप्त है या सरकारी नौकरियों में अलग और स्पष्ट मुस्लिम कोटा होना चाहिए। इसी व्यवस्था के विरोध में अब नेपाल में मुस्लिम आरक्षण और मुस्लिम आयोग खत्म करने की माँग भी उठ रही है।

सांसद ने सदन में उठाया अनशन का मुद्दा

अब यह आमरण अनशन का मुद्दा नेपाल की संसद तक भी पहुँच चुका है। राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी की सांसद खुशिबू ओली ने प्रतिनिधि सभा में इस मुद्दे को उठाते हुए सरकार से प्रदर्शनकारी पक्षों के साथ तत्काल बातचीत करने की अपील की।

इस बीच नेशनल मधेसी कमीशन के चेयरमैन विनय दत्ता भी मैतीघर मंडला पहुँचे। उन्होंने विनय यादव से मुलाकात की और सुनसरी घटना की निष्पक्ष जाँच तथा दोषियों पर कानूनी कार्रवाई की जरूरत बताई।

नेपाल सरकार की और से अब तक क्या हुआ?

मैतीघर मंडला में 9 दिन से जारी अनशन अब नेपाल सरकार के लिए सीधी चुनौती बन चुका है। एक तरफ देवानगंज हिंसा के पीड़ित परिवारों के लिए किए गए सात-सूत्रीय समझौते को लागू करने का सवाल है, दूसरी तरफ मुस्लिम आरक्षण, मुस्लिम आयोग, अवैध घुसपैठ और धार्मिक हिंसा जैसे मुद्दों पर आंदोलनकारी पक्षों से बातचीत की माँग है। राष्ट्रीय एकता दल ने साफ किया है कि वह केवल आश्वासन से पीछे हटने वाला नहीं है।

विनय यादव ने बताया है कि अब तक सरकार की ओर से कुछ स्तर पर संपर्क हुआ है। जिला प्रशासन के माध्यम से हमारा माँग-पत्र लिया गया है और संवाद की प्रारंभिक प्रक्रिया शुरू हुई है। उन्होंने कहा, “हमने सरकार से स्पष्ट कहा है कि केवल मौखिक आश्वासन पर्याप्त नहीं है।”

यादव का कहना है, “हम चाहते हैं कि सरकार आधिकारिक स्तर पर वार्ता करे, लिखित सहमति दे और उस सहमति को समयबद्ध तरीके से लागू करे। यदि सरकार सकारात्मक पहल करती है, तो हम भी लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से समाधान निकालने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। हमारा आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण है और इसका उद्देश्य केवल न्याय, सुरक्षा तथा हमारी माँगों पर गंभीर सरकारी पहल सुनिश्चित करना है।”

जहाँ फाँसी पर चढ़े थे काकोरी कांड के सेनानी ठाकुर रोशन सिंह, वहाँ 60 साल से चल रहा ‘नेहरू’ अस्पताल: अब नाम बदलने के लिए अनिश्चितकालीन धरना शुरू

19 दिसंबर 1927 की वह सुबह इलाहाबाद (अब प्रयागराज) की साउथ मलाका जेल के लिए एक भारी सुबह थी। फाँसी घर में एक क्रांतिकारी को तख्ते की ओर ले जाया जा रहा था, नाम था ठाकुर रोशन सिंह।

उनका ‘जुर्म’ बस इतना था कि उन्होंने अंग्रेज हुकूमत के खजाने को लूटकर आज़ादी की लड़ाई के लिए हथियार और संसाधन जुटाने की हिम्मत दिखाई थी, यही था मशहूर काकोरी काण्ड। पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ और शचीन्द्रनाथ बख्शी के साथ मिलकर अंग्रेजों की नींद उड़ा देने वाले रोशन सिंह को इसी जेल में फाँसी की सजा सुनाई गई थी और उसी जेल की चारदीवारी में उनकी जिंदगी का आखिरी अध्याय पूरा हुआ।

जब उनका पार्थिव शरीर बाहर लाया गया, तो जेल के फाटक पर हजारों लोग जुट आए थे। वह भीड़ उस दौर की जनभावना की एक जीती-जागती मिसाल थी। मगर आजाद भारत में इस जगह को याद रखना तो दूर, इसका इतिहास ही धीरे-धीरे गुमनामी में धकेल दिया गया।

ब्रिटिश काल के बाद साउथ मलाका जेल को नैनी में स्थापित कर दिया गया। वर्षों तक इस जगह को बिसारने के बाद जेल को अस्पताल में बदल दिया गया और नाम रखा गया- स्वरूप रानी नेहरू अस्पताल। इसके बाद तो जैसे लोगों को रोशन सिंह की सुध ही नहीं रही।

अब महुआ डाबर संग्रहालय परिवार के प्रमुख शाह आलम खान ने इस अस्पताल का नाम बदलकर ठाकुर रोशन सिंह के नाम पर करने की माँग उठाई है। इसे लेकर अनिश्चितकालीन धरना भी शुरू कर दिया गया है।

गांधी के असहयोग आंदोलन वापस लेने पर दुखी थे रोशन सिंह

रोशन सिंह का जन्म 22 जनवरी 1892 को शाहजहाँपुर जिले के नबादा गाँव में हुआ था। पिता का नाम था ठाकुर जंगी सिंह और माता थीं कौशल्या देवी। बचपन से ही उनका स्वभाव निडर और तेज-तर्रार रहा।

1922 में चौरी चौरा काण्ड के बाद जब महात्मा गाँधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। इससे देशभर के अनगिनत युवाओं की तरह रोशन सिंह भी बहुत दुखी हुए और क्रांति की राह पकड़ ली।

बरेली गोलीकांड में जेल गए रोशन सिंह

असहयोग आंदोलन में उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर और बरेली जिले के ग्रामीण क्षेत्र में इनका अद्भुत योगदान रहा। बरेली में ठाकुर रोशन सिंह ने एक पुलिस वाले की रायफल छीनकर जबर्दस्त फायरिंग शुरू कर दी थी जिसके कारण हमलावर पुलिस को उल्टे पाँव भागना पड़ा। मुकदमा चला और ठाकुर को सेंट्रल जेल बरेली में दो साल की सजा़ काटनी पड़ी।

बरेली में हुए एक गोली-काण्ड में सजा काटने के बाद वे हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) से जुड़ गए। उनके रौबीले व्यक्तित्व और निशानेबाजी में महारत को देखते हुए राम प्रसाद बिस्मिल ने उन्हें संगठन के साथियों को हथियार चलाना सिखाने की जिम्मेदारी सौंपी।

काकोरी कांड नहीं था असल फाँसी की वजह

1922 में गया कॉन्ग्रेस अधिवेशन के दौरान कॉन्ग्रेस के भीतर विचारों का मतभेद सामने आया। इसके बाद मोतीलाल नेहरू और चितरंजन दास ने मिलकर स्वराज पार्टी बना ली।

उस समय कॉन्ग्रेस के इन नेताओं के पास आर्थिक संसाधनों की कमी नहीं थी, लेकिन दूसरी ओर क्रांतिकारी संगठन के पास मजबूत विचारधारा, संविधान और जोशीले युवाओं की बड़ी टोली तो थी, पर सबसे बड़ी कमी पैसों की थी।

इसी आर्थिक संकट से निपटने के लिए क्रांतिकारियों ने आयरलैंड के स्वतंत्रता सेनानियों की रणनीति अपनाई। उन्होंने धन जुटाने के लिए डकैती करने का फैसला किया, जिसे संगठन की भाषा में ‘एक्शन’ कहा जाता था।

इस योजना के तहत पहला एक्शन 25 दिसंबर 1924 को पीलीभीत जिले की बिसलपुर तहसील के बमरौली गाँव में किया गया। निशाना बने बलदेव प्रसाद, जो शक्कर कारोबारी और सूद पर पैसे उधार देने का काम करते थे।

इस डकैती में क्रांतिकारियों को करीब ₹4,000 और कुछ सोने-चाँदी के जेवर मिले। हालांकि, इस दौरान मोहनलाल पहलवान नाम के व्यक्ति ने उनका विरोध किया। जवाब में ठाकुर रोशन सिंह ने गोली चलाई, जिससे मोहनलाल की मौके पर ही मौत हो गई। बाद में यही घटना ठाकुर रोशन सिंह को फाँसी की सजा मिलने की सबसे बड़ी वजह बनी।

काकोरी काण्ड में रोशन सिंह खुद मौजूद नहीं थे, फिर भी अंग्रेज सरकार ने संगठन में उनकी भूमिका और प्रभाव को देखते हुए उन्हें बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ और राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी के साथ फाँसी की सजा दी।

रोशन सिंह ने फाँसी से पहले लिखा भावुक पत्र

6 दिसंबर 1927 को इलाहाबाद की मलाका (नैनी) जेल की काल-कोठरी से ठाकुर रोशन सिंह ने अपने एक मित्र को पत्र लिखा। उन्होंने लिखा कि उन्हें उम्मीद है कि इसी सप्ताह फाँसी हो जाएगी और उनके लिए कोई दुःख न करे।

उनका मानना था कि जन्म लेने वाले हर व्यक्ति को एक दिन मरना ही है, इसलिए इंसान को ऐसा जीवन जीना चाहिए कि अंत समय में उसे कोई पछतावा न हो और भगवान का स्मरण बना रहे।

उन्होंने यह भी लिखा कि पिछले दो वर्षों से परिवार से दूर रहने के दौरान उन्हें ईश्वर की भक्ति करने का भरपूर अवसर मिला। उन्होंने अपने पत्र में धर्म के लिए प्राण देने वालों की तुलना तपस्या करने वाले ऋषि-मुनियों से करते हुए लिखा कि शास्त्रों में ऐसे बलिदान को सर्वोच्च माना गया है। पत्र के अंत में उन्होंने अपना प्रसिद्ध शेर लिखा:

‘ज़िंदगी ज़िंदा-दिली को जान ऐ रोशन!

वरना कितने ही यहां रोज़ फ़ना होते हैं।‘

जब क्रांतिकारियों की चीखों से गूँजती थी जेल

साउथ मलाका जेल कोई साधारण जेल नहीं थी। काकोरी काण्ड से जुड़े कई क्रांतिकारियों को यहीं रखा गया था, यहीं पूछताछ के नाम पर उनका उत्पीड़न किया जाता था। अंग्रेज हुकूमत के लिए यह जेल क्रांतिकारियों को ‘सबक सिखाने’ का एक हथियार भर थी।

आजादी के बाद जैसे-जैसे प्रशासनिक जरूरतें बदलती गईं, इस जेल को नैनी शिफ्ट कर दिया गया। इसके बाद साउथ मलाका जेल की जगह बरसों तक वीरान पड़ी रही। वह जमीन, जिसने एक क्रांतिकारी की आखिरी साँसें देखी थीं, धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों से मिटती चली गई।

कॉन्ग्रेस सरकार ने बनाया अस्पताल, नाम रखा गया नेहरू की माँ के नाम पर

आज़ादी के बाद, प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के और कॉन्ग्रेस सरकार के दौर में, 1961 में इसी साउथ मलाका जेल परिसर की जमीन पर मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज खड़ा किया गया। इसका उद्घाटन तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के हाथों हुआ।

सवाल यह उठता है कि जिस ज़मीन पर एक क्रांतिकारी को फाँसी दी गई हो, उसका नाम आखिर किसके नाम पर रखा जाए? जवाब मिला नेहरू परिवार से जुड़े नाम में।

1963 में जब मेडिकल कॉलेज पूर्व गवर्नर हाउस की इमारत में शिफ्ट हुआ, तो यही जेल परिसर पूरी तरह अस्पताल में बदल दिया गया और इसका नाम रखा गया ‘स्वरूप रानी नेहरू चिकित्सालय’।

नाम सोचते वक्त रोशन सिंह और उनकी शहादत का जिक्र तक नहीं हुआ, जिस मिट्टी पर उनका खून बहा था, वहाँ उनका नाम दर्ज करने की जरूरत तक महसूस नहीं की गई। इसके बाद पूरे छह दशक तक हालात वैसे ही बने रहे- न कोई स्मारक, न कोई पहचान, बस एक ‘नेहरू’ नाम जो पूरे किस्से पर भारी पड़ता रहा। 2024 में योगी सरकार ने आकर तस्वीर बदली।

योगी सरकार में मिली पहली पहचान

2024 में योगी आदित्यनाथ सरकार ने उसी अस्पताल परिसर के मुख्य द्वार के पास जहाँ रोशन सिंह को फाँसी दी गई थी, उनकी प्रतिमा स्थापित करवाई। यह फैसला ऐसे समय आया जब देश ‘आज़ादी का अमृत महोत्सव’ मना रहा था और सरकार गुमनाम और उपेक्षित स्वतंत्रता सेनानियों को सामने लाने की मुहिम चला रही थी।

2026 में काकोरी ट्रेन एक्शन (9 अगस्त 1925) की शताब्दी वर्षगाँठ भी है, जिसे देखते हुए काकोरी से जुड़े शहीदों को सम्मान देने पर जोर बढ़ गया था। दशकों बाद पहली बार सरकारी स्तर पर उस बलिदान को औपचारिक पहचान मिली, जिसे कॉन्ग्रेस के शासनकाल में जानबूझकर भुला दिया गया था।

अब उठी अस्पताल का नाम बदलने की माँग, आखिर क्यों?

स्मारक बनने के बाद अब यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि जब पूरा परिसर ही रोशन सिंह की शहादत की धरती है, तो अस्पताल का नाम आज भी नेहरू परिवार के नाम पर क्यों टिका हुआ है?

इस माँग को उठाने वालों में सबसे मुखर आवाज़ हैं बस्ती के महुआ डाबर क्षेत्र के शाह आलम खान, जो 1857 की क्रांति के उस दौर से जुड़े परिवार से आते हैं, जब 10 जून 1857 को मनोरमा नदी पार कर रहे अंग्रेज अफसरों पर महुआ डाबर, अमिलहा, मुहम्मदपुर और नकहा गाँवों के वीरों ने धावा बोल दिया था।

इस हमले के प्रमुख नायकों में क्रांतिवीर पिरई खान भी शामिल थे, जिन्होंने अपने साथियों गुलाब खाँ, अमीर खाँ, वज़ीर खाँ, जफर अली के साथ मिलकर अंग्रेज अफसरों को घेरकर मार गिराया था।

इस हमले से बौखलाई अंग्रेज हुकूमत ने बदला लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी और 20 जून 1857 को बस्ती में मार्शल लॉ लगा दिया गया। 3 जुलाई को महुआ डाबर गाँव को चारों ओर से घेरकर जला दिया गया, गाँव को ‘गैरचिरागी’ घोषित कर संपत्ति जब्त कर ली गई।

कई लोगों के सिर कलम किए गए और 18 फरवरी 1858 को गाँव के कई क्रांतिकारियों को सरेआम फाँसी पर लटका दिया गया। शाह आलम खान उसी बलिदानी विरासत के वशंज है। पिछले करीब ढाई दशकों से वे 1857 और काकोरी जैसे आंदोलनों से जुड़े गुमनाम क्रांतिकारियों का इतिहास खोजने, दस्तावेज़ जुटाने और नई पीढ़ी तक पहुँचाने के काम में लगे हैं।

इसी मकसद से उन्होंने महुआ डाबर संग्रहालय की स्थापना की, जहाँ स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े दुर्लभ दस्तावेज़ों और तस्वीरों को सहेजा गया है। वे समय-समय पर चौरी चौरा विद्रोह और काकोरी ट्रेन एक्शन जैसी ऐतिहासिक घटनाओं पर प्रदर्शनियाँ भी आयोजित करते रहे हैं, और लगातार यह माँग उठाते रहे हैं कि क्रांतिकारियों के परिवारों को उनका हक और सम्मान मिले।

अब उन्हीं की अगुवाई में महुआ डाबर संग्रहालय परिवार के बैनर तले एसआरएन अस्पताल परिसर में अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया गया है, जिसकी माँग है कि अस्पताल का नाम बदलकर ‘अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह चिकित्सालय’ रखा जाए। उनका तर्क सीधा-सा है- जिस ज़मीन ने एक क्रांतिकारी की शहादत देखी, उस ज़मीन पर आज भी उसका नाम गायब है, जबकि एक राजनीतिक परिवार का नाम पीढ़ियों से चस्पा है।

पुरानी सरकारों की चुप्पी पर सवाल

यहाँ सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि जब यह तथ्य किसी से छिपा नहीं था कि यह जगह काकोरी के शहीद की फाँसी-स्थली है, तो दशकों तक सत्ता में रही कॉन्ग्रेस समेत बाद की सरकारों ने कभी इस दिशा में कदम क्यों नहीं उठाया?

क्या यह महज संयोग था, या फिर एक सोची-समझी कोशिश कि क्रांतिकारियों के बलिदान की जगह हर बार एक ही परिवार की विरासत को आगे बढ़ाया जाए? अब जब योगी सरकार ने स्मारक बनवाकर पहला कदम उठा दिया है, स्थानीय स्तर पर यह माँग जोर पकड़ रही है कि सम्मान अधूरा न रह जाए और अस्पताल का नाम भी बदला जाए।

एक पर हमला तो तीनों देंगे जवाब, पाकिस्तान-सऊदी और तुर्किये का नया रक्षा गठबंधन: जानिए ‘मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ के बारे में सब कुछ

मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध और बढ़ते सुरक्षा संकट के बीच पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने एक महत्वपूर्ण रक्षा समझौते ‘मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते के तहत यदि तीनों देशों में से किसी एक पर हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा।

इसका उद्देश्य सामूहिक सुरक्षा को मजबूत करना, रक्षा सहयोग बढ़ाना और क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा देना है। यह समझौता ऐसे समय हुआ है जब पश्चिम एशिया लगातार संघर्षों, मिसाइल हमलों और जियोपॉलिटिकल तनावों का सामना कर रहा है।

मक्का में हुई तीन देशों की अहम बैठक

यह समझौता सऊदी अरब के शहर मक्का में आयोजित बैठक के दौरान हुआ। बैठक में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस और प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन सलमान, तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोआन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ शामिल हुए।

शहबाज शरीफ अपने तीन दिवसीय दौरे पर एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल के साथ सऊदी अरब पहुँचे थे, जिसमें पाकिस्तान के फौज प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर भी शामिल थे।

तीनों नेताओं ने क्षेत्रीय सुरक्षा, रक्षा सहयोग, आर्थिक संबंधों और भविष्य की रणनीतिक साझेदारी पर विस्तृत चर्चा की। इस दौरान मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए गए, जिसे तीनों देशों की सामूहिक सुरक्षा के लिए एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

समझौते में क्या-क्या प्रावधान हैं?

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के अनुसार, इस समझौते का मुख्य उद्देश्य किसी भी प्रकार की आक्रामक कार्रवाई के खिलाफ सामूहिक प्रतिरोध क्षमता को मजबूत करना है। सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि यदि तीनों देशों में से किसी एक पर हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा।

समझौते में रक्षा सहयोग के सभी क्षेत्रों को मजबूत करने की बात कही गई है। इनमें संभावित रूप से संयुक्त सैन्य अभ्यास, सैनिकों का प्रशिक्षण, रक्षा तकनीक का आदान-प्रदान और खुफिया जानकारी साझा करना शामिल हो सकता है। हालाँकि इन सभी व्यवस्थाओं का विस्तृत खाका अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है।

आधिकारिक बयान के अनुसार, इस समझौते का उद्देश्य क्षेत्र में शांति, सुरक्षा और स्थिरता को बढ़ावा देना है और इसे किसी विशेष देश के खिलाफ गठबंधन के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है।

यह समझौता अभी क्यों महत्वपूर्ण माना जा रहा है?

पिछले कुछ सालों में मिडिल ईस्ट लगातार संघर्षों से जूझ रहा है। ईरान, इजरायल, गाजा, लेबनान और यमन से जुड़े घटनाक्रमों ने पूरे क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित किया है।

सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे पर ड्रोन तथा मिसाइल हमलों की घटनाएँ भी सामने आती रही हैं। ऐसे माहौल में रियाद अपनी सुरक्षा साझेदारियों को केवल पारंपरिक सहयोगियों तक सीमित नहीं रखना चाहता और नए रक्षा सहयोग विकसित कर रहा है।

क्षेत्रीय संघर्षों के कारण होर्मुज और समुद्री व्यापार भी प्रभावित हुआ है, जिससे ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक बाजारों पर असर पड़ा है। ऐसे समय में तीनों देशों का यह रक्षा समझौता क्षेत्रीय सुरक्षा ढाँचे में एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।

तीनों देशों की ताकत क्या है?

इस नए रक्षा सहयोग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें शामिल तीनों देशों की अपनी अलग-अलग रणनीतिक क्षमता है। सऊदी अरब दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक देशों में शामिल है और आर्थिक रूप से बेहद मजबूत माना जाता है। साथ ही इस्लाम के दो सबसे पवित्र स्थलों की मौजूदगी के कारण उसका मजहबी और क्षेत्रीय प्रभाव भी काफी व्यापक है।

तुर्किये नाटो का सदस्य है और उसके पास नाटो की दूसरी सबसे बड़ी सेना है। हाल के वर्षों में उसने रक्षा उत्पादन, ड्रोन तकनीक और सैन्य उद्योग के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है।

वहीं पाकिस्तान दुनिया का एकमात्र परमाणु हथियार संपन्न मुस्लिम देश है और लंबे समय से सैन्य दृष्टि से महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। हालाँकि विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की परमाणु क्षमता इस समझौते का औपचारिक हिस्सा नहीं है और उसका परमाणु प्रतिरोध मुख्य रूप से भारत-केंद्रित बना रहेगा।

पुराने रक्षा सहयोग का विस्तार

यह समझौता पूरी तरह नया नहीं है, बल्कि पिछले वर्ष पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुए द्विपक्षीय रक्षा समझौते का विस्तार माना जा रहा है। उस समझौते में भी दोनों देशों ने कहा था कि किसी एक पर हमला दोनों पर हमला माना जाएगा। अब तुर्किये को इसमें शामिल कर त्रिपक्षीय सुरक्षा व्यवस्था बनाई गई है।

तीनों देशों के बीच पहले से भी सैन्य सहयोग मौजूद रहा है। पाकिस्तान दशकों से सऊदी सेना को प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता देता रहा है। वहीं तुर्किये और पाकिस्तान रक्षा उपकरणों, युद्धपोतों और प्रशिक्षण विमानों के क्षेत्र में सहयोग करते रहे हैं। 2023 में सऊदी अरब ने तुर्किये से बड़े पैमाने पर ड्रोन खरीदने का समझौता भी किया था।

भारत समेत दुनिया की नजर

इस समझौते पर भारत भी करीबी नजर बनाए हुए है। भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत इस घटनाक्रम पर नजर रख रहा है और आगे की जानकारी साझा की जाएगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह त्रिपक्षीय सहयोग आगे संस्थागत रूप लेता है और संयुक्त सैन्य गतिविधियाँ बढ़ती हैं, तो यह पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया की सुरक्षा राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

फिलहाल यह समझौता सामूहिक सुरक्षा और रक्षा सहयोग तक सीमित बताया गया है तथा इसे किसी विशेष देश के खिलाफ सैन्य गठबंधन के रूप में घोषित नहीं किया गया है।

कॉकरोच जनता पार्टी की नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी में AAP के पुराने चेहरों को मिली जगह: जानिए CJP की टीम में कौन-कौन नेता हैं शामिल

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) ने अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी का ऐलान कर दिया है। महाराष्ट्र में संस्थापक अभिजीत दीपके के घर पर हुई बैठक के बाद 6 अगस्त 2026 को इसकी घोषणा हुई। पार्टी अब देश भर में अपने संगठन का विस्तार करेगी। इसके लिए ‘क्या बोलती पब्लिक‘ नाम से एक नया अभियान भी शुरू किया जाएगा।

यह पार्टी युवाओं की एक ऐसी आवाज बनने का दावा कर रही है जो सरकार पर दबाव बनाएगी। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इसे आगे बढ़ाने वाले ज्यादातर लोग आम आदमी पार्टी (AAP) के पुराने नेता ही हैं।

इस पार्टी की शुरुआत सोशल मीडिया पर एक तंज के रूप में हुई थी। मई 2026 के बीच में देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने कोर्ट में एक टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था कि जिन युवाओं को नौकरी नहीं मिलती, वे ‘कॉकरोच‘ की तरह आरटीआई, सोशल मीडिया और पत्रकारिता में आ जाते हैं और समाज के ‘परजीवी’ बन जाते हैं।

इसी बयान के विरोध में दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी नाम से एक बड़ा प्रदर्शन हुआ, जिससे यह संगठन चर्चा में आ गया। इसके बाद पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने भी नीट पेपर लीक और शिक्षा सुधारों की मांग को लेकर 26 दिन की भूख हड़ताल शुरू कर दी, जिससे यह आंदोलन और बड़ा हो गया।

ऑपइंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, इस पार्टी ने छात्रों के असली मुद्दों का सहारा जरूर लिया। लेकिन इसका असली मकसद ‘लॉटिविज्म’ यानी हँसी-मजाक के जरिए सिर्फ बीजेपी और मोदी सरकार के खिलाफ राजनीतिक विरोध तैयार करना है।

CJP का कहना है कि आने वाले छह महीनों में वह राज्यों और शहरों में अपनी कमेटियाँ बनाएगी। लेकिन जिस तरह से यह प्रेशर ग्रुप आगे बढ़ रहा है, उससे साफ पता चलता है कि यह भविष्य में एक नई राजनीतिक पार्टी बनने की तैयारी कर रहा है, जिसका एकमात्र एजेंडा बीजेपी का विरोध करना है।

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) अब पूरी तरह से बीजेपी के विरोध की राजनीति पर उतर आई है। इस बात को विस्तार से समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि इस पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी (NWC) में कौन-कौन लोग शामिल हैं।

पार्टी की नई टीम में कई अहम नाम सामने आए हैं। संस्थापक अभिजीत दीपके (30 वर्ष) को पार्टी का राष्ट्रीय संयोजक बनाया गया है। आशुतोष रांका (30 वर्ष) और सौरव दास (27 वर्ष) को सह-संयोजक की जिम्मेदारी दी गई है।

संगठन को संभालने के लिए भी कई लोगों को पद दिए गए हैं। अजिंक्य शिंडे (35 वर्ष) राष्ट्रीय संगठन प्रभारी बनाए गए हैं, जबकि दीपक बालियान (26 वर्ष) संगठन सह-प्रभारी हैं। आफ़रीन नवाज (34 वर्ष) राष्ट्रीय सचिव, विजय रेड्डी मल्लंगी (30 वर्ष) मीडिया प्रमुख और रत्ना सिंह (31 वर्ष) कानूनी मामलों की जिम्मेदारी संभालेंगी। इसके अलावा शोध और नीति का काम वैष्णवी गौर (29 वर्ष) देखेंगी। रोहन देशपांडे (31 वर्ष) टेक्नोलॉजी और योगेश इंगले (33 वर्ष) वित्त विभाग संभालेंगे।

पार्टी ने देश के अलग-अलग हिस्सों के लिए जोनल प्रमुख भी नियुक्त किए हैं। इनमें उत्तर भारत के लिए दीपक बालियान, दक्षिण के लिए विजय रेड्डी मल्लंगी, पूर्व और पूर्वोत्तर के लिए अंकित भारद्वाज तथा पश्चिम भारत के लिए योगेश इंगले को जिम्मेदारी सौंपी गई है।

CJP यानी ‘AAP’ की नई टीम: कैसे आम आदमी पार्टी का चेहरा बन गई है कॉकरोच जनता पार्टी

जब से ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ यानी CJP बनी है, तब से यह बात सामने आ रही है कि यह आम आदमी पार्टी (AAP) का ही नया रूप है। CJP के राष्ट्रीय संयोजक और संस्थापक अभिजीत दीपके साल 2020 से 2023 के बीच ‘आप’ के सोशल मीडिया कोऑर्डिनेटर रह चुके हैं। इसके बाद साल 2023 में वे अमेरिका चले गए थे और बोस्टन यूनिवर्सिटी से पब्लिक रिलेशंस में एमएस की डिग्री ली थी।

दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 के दौरान कई रिपोर्ट्स में उन्हें ‘आप’ की सोशल मीडिया और डिजिटल प्रचार टीम का हिस्सा बताया गया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, वे मीम्स, छोटे वीडियो और डिजिटल कंटेंट बनाने वाले मुख्य लोगों में शामिल थे। उनका काम अरविंद केजरीवाल का प्रचार करना और राजनीतिक विरोधियों को जवाब देना था।

अभिजीत दीपके ‘आप’ के चुनाव वॉर-रूम और सोशल मीडिया अभियानों का भी हिस्सा रहे हैं। मीडिया इंटरव्यू में वे युवाओं और पहली बार वोट देने वालों के लिए बनाई जाने वाली चुनावी रणनीतियों पर चर्चा करते नजर आए थे। उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान ‘आप’ की आईटी और मीडिया टीमों के साथ मिलकर काम किया था।

अभिजीत दीपके को ‘आप’ नेता और दिल्ली के पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया का करीबी भी माना जाता है। दीपके ‘आप’ के वॉर-रूम का हिस्सा रहे हैं और उनका रुख हमेशा से बीजेपी के खिलाफ रहा है। हमने देखा है कि कैसे आम आदमी पार्टी ने CJP के प्रदर्शनों का खुलकर समर्थन किया था। खुद ‘आप’ प्रमुख अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया जंतर-मंतर पहुँचे थे और इन ‘कॉकरोच’ प्रदर्शनकारियों के साथ एकजुटता दिखाई थी।

दूसरी ओर, CJP के सह-संयोजक आशुतोष रांका ने आईआईटी कानपुर और लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स से पढ़ाई की है। वे लंदन में मैकिन्से कंपनी में मैनेजमेंट कंसलटेंट के रूप में भी काम कर चुके हैं। पिछले साल भारत लौटने के बाद वे जयपुर में पर्यावरण, शिक्षा सुधार और युवाओं के मुद्दों से जुड़े अभियानों में सक्रिय रहे हैं। नीट विवाद के दौरान CJP से जुड़ने के बाद आशुतोष रांका को काफी प्रसिद्धि मिली थी।

आशुतोष रांका राजनीति के लिए कोई नया नाम नहीं हैं। उनका सबसे बड़ा राजनीतिक परिचय यह है कि वे पहले आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता रह चुके हैं। इस दौरान उन्होंने शराब नीति घोटाले के आरोपों पर अरविंद केजरीवाल और पार्टी का कड़ाई से बचाव किया था और इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया था। रांका साल 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी ‘आप’ के साथ सक्रिय रूप से जुड़े हुए थे।

आशुतोष रांका इससे पहले ‘दप्रिंट’ और ‘न्यूजलॉन्ड्री’ जैसे मीडिया पोर्टल्स के लिए लेख भी लिख चुके हैं।

CJP द्वारा राष्ट्रीय संगठन प्रभारी बनाए गए अजिंक्य शिंडे भी ‘आप’ के ही एक पदाधिकारी हैं। उन्होंने पूर्णकालिक ‘आप’ सदस्य बनने के लिए अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया था। शिंडे ‘आप’ की महाराष्ट्र युवा विंग के प्रदेश अध्यक्ष और राज्य समिति के सदस्य रह चुके हैं।

मई 2025 के आसपास यह जानकारी सामने आई थी कि अजिंक्य शिंडे ने CJP में संगठन की जिम्मेदारी संभालने से पहले ‘आप’ के गोवा सह-प्रभारी के रूप में भी काम किया था। हकीकत तो यह है कि कई रिपोर्ट्स यह इशारा करती हैं कि शिंडे अभी भी ‘आप’ की महाराष्ट्र युवा विंग के संयोजक के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।

CJP ने मीडिया प्रमुख और दक्षिण क्षेत्र की जिम्मेदारी विजय रेड्डी मल्लंगी को सौंपी है। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि वे तेलंगाना में आम आदमी पार्टी के एक सक्रिय सदस्य हैं।

सोशल मीडिया पर उनके कई ऐसे वीडियो और फोटो मौजूद हैं, जो यह दिखाते हैं कि उन्होंने पिछले साल ‘आप’ के लिए चंदा जुटाने, नेताओं का समर्थन करने और चुनावी अभियानों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था।

CJP के वित्त प्रमुख योगेश इंगले भी महाराष्ट्र के पुणे में आम आदमी पार्टी के एक पदाधिकारी बताए जाते हैं।

इसके अलावा, CJP के पूर्व और उत्तर क्षेत्र के प्रभारी अंकित भारद्वाज भी पहले आम आदमी पार्टी के लिए एक स्वयंसेवक (वॉलंटियर) के रूप में काम कर चुके हैं।

इन सारी बातों से यह बिल्कुल साफ हो जाता है कि CJP ने अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी में ज्यादातर मौजूदा या पुराने ‘आप’ नेताओं को ही जगह दी है। इस तरह से इस पार्टी ने अप्रत्यक्ष रूप से खुद को आम आदमी पार्टी की ‘युवा विंग’ के रूप में ही स्थापित कर लिया है।

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ की हकीकत: युवाओं की आड़ में आम आदमी पार्टी का नया राजनीतिक चेहरा

भले ही CJP यह दावा करती रही है कि उसके सदस्यों का पुराना राजनीतिक इतिहास कोई मायने नहीं रखता और उनका संगठन पूरी तरह से ‘स्वतंत्र’ है। लेकिन सच्चाई यह है कि जिन लोगों को संगठन में पद दिए गए हैं, उनका पुराना नाता किसी खास पार्टी और उसकी विचारधारा से रहा है। इससे साफ पता चलता है कि CJP कोई नया संगठन नहीं है, बल्कि यह आम आदमी पार्टी का ही एक बढ़ा हुआ रूप है।

ऑपइंडिया ने पहले भी यह विश्लेषण किया था कि CJP हँसी-मज़ाक और कॉमेडी के परदे के पीछे किस तरह से सोची-समझी रणनीति के तहत विपक्ष के एजेंडे को आगे बढ़ाती है। यह संगठन न्यायपालिका, चुनाव आयोग, बड़े उद्योगपतियों, मीडिया और पार्टी बदलने वाले नेताओं को निशाना बनाता है। यह संगठन व्यंग्य और कॉमेडी की आड़ में राजनीतिक संदेश देने का काम करता है। यह बात बिल्कुल साफ हो चुकी है कि CJP आधुनिक और ‘कूल’ दिखने वाला सिर्फ एक ऐसा प्रयोग है जिसका एकमात्र मकसद बीजेपी का विरोध करना है।

इन ‘कॉकरोच’ कहे जाने वाले लोगों ने मई महीने में ही अपनी राजनीतिक सोच और मोदी विरोध को पूरी तरह साफ कर दिया था। जब उन्होंने इंस्टाग्राम पर बीजेपी के साथ खुद की फॉलोअर्स बढ़ाने की होड़ शुरू की थी, तभी उनकी मंशा समझ आ गई थी। जब जंतर-मंतर पर प्रदर्शन हुआ, तो CJP ने हर उस शख्स का स्वागत किया जो बीजेपी का विरोधी है। इनमें महुआ मोइत्रा, चंद्रशेखर आजाद, कीर्ति आजाद जैसे नेता शामिल थे। इसके अलावा योगेंद्र यादव जैसे इस्लामो-वामपंथी भी इसमें शामिल हुए, जिन्होंने जंतर-मंतर और संसद की तरफ जाने वाले रास्तों पर CJP के कब्जा करने पर अपनी खुशी जाहिर की थी।

इसी मंच से कुणाल कामरा ने माँ सीता पर अपमानजनक टिप्पणियाँ की थीं। दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नंदिता नारायण ने ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’ गाना गाया और पाकिस्तानी शायर फैज अहमद फैज की इस्लामी वर्चस्ववादी कविता ‘हम देखेंगे’ का गुणगान किया। इसके अलावा AISA, SFI और अन्य वामपंथी छात्र संगठनों ने ‘आजादी-आजादी’ और ‘ब्राह्मणवाद से आजादी’ जैसे देशविरोधी नारे भी लगाए।

CJP को प्रकाश राज, स्वरा भास्कर, शबाना आजमी, अरुंधति रॉय और निवेदिता मेनन जैसे जाने-माने हिंदू विरोधी और बीजेपी विरोधी ‘एक्टिविस्टों’ का भी पूरा समर्थन मिला।

असल बात तो यह है कि 20 जुलाई को हुए हिंसक CJP प्रदर्शन के दौरान समाजवादी पार्टी, आजाद समाज पार्टी और दूसरे बीजेपी विरोधी दलों के कार्यकर्ता भी इस तथाकथित ‘छात्र आंदोलन’ में खुलकर शामिल हुए थे। इस प्रदर्शन में MACOCA के आरोपित और ‘आप’ से जुड़े गैंगस्टर हाजी अफजल ने भी हिस्सा लिया था।

CJP के बड़े नेता यह दावा करते रहे हैं कि जुलाई के प्रदर्शन के दौरान हर राजनीतिक विचारधारा के लोगों ने उनका समर्थन किया था। लेकिन इन सब बातों के बाद, जब CJP ने अपने सबसे बड़े पदों पर आम आदमी पार्टी के पुराने पदाधिकारियों को ही बिठा दिया है, तो इस बात पर पक्की मुहर लग जाती है कि जिसकी आशंका पहले से जताई जा रही थी, वही सच है। यानी CJP और कुछ नहीं, बल्कि आम आदमी पार्टी की ही ‘बी-टीम’ है।

‘मदरसा वेतन विधेयक’ को योगी सरकार ने लिया वापस, मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए अखिलेश 2016 में लाए थे बिल: जानिए क्या थे इसके प्रावधान और कानूनी अड़चनें

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने साल 2016 के समाजवादी पार्टी सरकार के एक विवादित ‘मदरसा वेतन विधेयक’ को पूरी तरह खारिज कर दिया है। अखिलेश यादव की सरकार ने तब मदरसों के वेतन से जुड़ा यह बिल पास कराया था। लेकिन राज्यपाल और राष्ट्रपति की आपत्तियों के कारण यह बिल कभी कानून नहीं बन पाया था।

‘मदरसा वेतन विधेयक‘ इसलिए विवादों में था क्योंकि इसमें नियम बनाया गया था कि वेतन मिलने में देरी होने पर अधिकारियों पर सीधे आपराधिक केस दर्ज होगा। साथ ही, मदरसा कर्मचारियों को सामान्य कानूनी जाँच से विशेष छूट दी जा रही थी। राज्यपाल राम नाईक ने इसे संविधान के समानता के अधिकार के खिलाफ माना था।

योगी सरकार का मानना है कि जो बिल संविधान की कसौटी पर खरा नहीं उतरा, उसे फाइल में लटकाकर रखने का कोई मतलब नहीं है। करीब दस साल तक ठंडे बस्ते में रहने के बाद इस ‘मदरसा वेतन विधेयक’ को विधानसभा और विधान परिषद से वापस ले लिया गया है। इस प्रकार योगी सरकार ने तुष्टीकरण से जुड़े इस पुराने और विवादित अध्याय को हमेशा के लिए बंद कर दिया है।

क्या था 2016 का मदरसा वेतन विधेयक?

साल 2016 में जब उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार थी, तब अखिलेश यादव सरकार ने मदरसों के स्टाफ के लिए एक नया ‘मदरसा वेतन विधेयक’ पास कराया था। इस बिल का मकसद सिर्फ एक खास वर्ग (मुस्लिमों) को खुश करना और उसका तुष्टीकरण करना था। सरकार का दावा था कि इससे मदरसों के शिक्षकों को समय पर सैलरी मिलेगी।

लेकिन इस बिल के जरिए सपा सरकार ने नियमों को ताक पर रख दिया था। इस बिल में ऐसे नियम बनाए गए थे जो बाकी सभी नागरिकों और सरकारी कर्मचारियों के लिए लागू होने वाले कानूनों से बिल्कुल अलग थे। इससे साफ पता चलता है कि सरकार हर बार की तरह सिर्फ वोट बैंक की राजनीति कर रही थी।

जैसे ही यह ‘मदरसा वेतन विधेयक’ सदन में आया, इस पर बड़ा विवाद खड़ा हो गया। जानकारों और विरोधियों ने कहा कि यह बिल संविधान के समानता के अधिकार के खिलाफ है। एक खास समुदाय को फायदा पहुँचाने के लिए बनाई गई ऐसी नीतियों से देश का सामान्य कानून कमजोर होता है।

किन प्रावधानों पर सबसे ज्यादा विवाद हुआ?

‘मदरसा वेतन विधेयक’ में मदरसा शिक्षकों की सैलरी को लेकर एक बेहद अजीब और एकतरफा नियम बनाया गया था। नियम यह था कि अगर मदरसे के कर्मचारियों को समय पर सैलरी नहीं मिली, तो सरकारी अधिकारियों पर सीधे आपराधिक केस दर्ज कर दिया जाएगा। उस समय समाजवादी पार्टी सरकार का पूरा जोर बस एक खास वर्ग को खुश करने और उनके वोट बैंक को साधे रखने पर था।

इस बिल का दूसरा बड़ा विवादित हिस्सा यह था कि इसने मदरसा स्टाफ को आम कानून और पुलिस कार्रवाई से पूरी तरह सुरक्षित कर दिया था। आम सरकारी कर्मचारियों और मदरसों के स्टाफ के लिए कानून के अलग-अलग पैमाने तय कर दिए गए थे। यह साफ-साफ एक वर्ग विशेष को फायदा पहुँचाने और बाकी जनता के अधिकारों की अनदेखी करने का खेल था। सपा सरकार की नीतियाँ हमेशा से तुष्टीकरण के इर्द-गिर्द ही घूमती रही हैं।

इसी वजह से कानून के जानकारों और विरोधियों ने इस पर तीखा सवाल उठाया था। उन्होंने पूछा था कि क्या देश का संविधान सिर्फ एक खास समुदाय (मुस्लिमों) के लिए अलग से कानून बनाने की इजाजत देता है। क्या समानता के अधिकार को ताक पर रखकर सिर्फ एक वर्ग को विशेष सुरक्षा देना सही है। यही वो कानूनी और राजनीतिक पेंच था जिसके चलते यह ‘मदरसा वेतन विधेयक’ कभी कानून नहीं बन पाया और आखिरकार योगी सरकार ने इसे पूरी तरह दफन कर दिया।

राज्यपाल ने मंजूरी क्यों नहीं दी?

जब यह विवादित ‘मदरसा वेतन विधेयक’ विधानसभा और विधान परिषद दोनों जगहों से पास हो गया, तब इसे मंजूरी के लिए तत्कालीन राज्यपाल राम नाईक के पास भेजा गया। नियम के मुताबिक राज्यपाल ऐसे बिलों को पास कर देते हैं और वह कानून बन जाता है। लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हुआ। राज्यपाल ने तुरंत इस पर साइन करने से इनकार कर दिया। राज्यपाल ने साफ देखा कि यह बिल संविधान के नियमों और समानता के अधिकार के खिलाफ है।

राज्यपाल को इस बात पर पूरा शक था कि सपा सरकार सिर्फ एक समुदाय को खुश करने और अपना वोट बैंक बचाने के लिए यह नियम लाई है। इसलिए उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 200 का इस्तेमाल किया। राज्यपाल ने इस तुष्टीकरण वाले बिल को अपनी मंजूरी देने की बजाय राष्ट्रपति के पास भेज दिया। नियम यह है कि जब तक राष्ट्रपति ऐसे किसी विवादित बिल पर अपनी मुहर नहीं लगाते, वह कानून नहीं बन सकता।

राष्ट्रपति भवन में जाँच के दौरान भी यह साफ हो गया कि यह बिल पूरी तरह गलत है। यही वजह रही कि दोनों सदनों से पास होने के बावजूद यह बिल कभी कानून नहीं बन पाया। समाजवादी पार्टी की मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति की यह चाल शुरू में ही धरी रह गई।

अनुच्छेद 200 में क्या व्यवस्था है?

जब ‘मदरसा वेतन विधेयक’ राज्यपाल के पास पहुँचा, तो संविधान ने उन्हें पूरी ताकत दी थी कि वे इसकी जाँच करें। संविधान का अनुच्छेद 200 राज्यपाल को यह अधिकार देता है कि अगर कोई बिल देश के संविधान या कानून के खिलाफ हो, तो वे उसे रोक सकते हैं। राज्यपाल राम नाईक ने तुरंत भांप लिया कि यह बिल देश के मूल सिद्धांतों के साथ खिलवाड़ कर रहा है। इसलिए उन्होंने बिल पर साइन करने से साफ मना कर दिया और इसे राष्ट्रपति के पास भेज दिया।

इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी जड़ संविधान का अनुच्छेद 14 बना। यह अनुच्छेद देश के हर नागरिक को कानून के सामने एक समान मानने की गारंटी देता है। लेकिन सपा सरकार का यह बिल ठीक इसके उलट था। इसमें एक खास समुदाय और मदरसा कर्मचारियों के लिए अलग और विशेष नियम बनाए गए थे। आलोचकों और जानकारों ने सवाल उठाया कि क्या देश का कानून सिर्फ एक वर्ग को बचाने के लिए बन सकता है। क्या समानता के अधिकार को कुचलकर सिर्फ वोट बैंक की राजनीति करना सही है।

चूंकि यह बिल अपनी शुरुआत से ही कानूनी पेंच में फँस गया था और कभी कानून नहीं बन पाया, इसलिए अदालत को इस पर फैसला देने की जरूरत ही नहीं पड़ी। सपा सरकार की मुस्लिम तुष्टीकरण वाली यह नीति कागज पर ही दम तोड़ गई। दस साल तक यह बिल फाइलों में धूल फाँकता रहा और आखिरकार योगी सरकार ने इसे पूरी तरह दफन कर दिया।

राज्यपाल के पास जाने के बाद यह बिल राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए रुक गया था। राष्ट्रपति भवन से इस बिल पर कोई हरी झंडी नहीं मिली। केंद्र सरकार के स्तर पर भी इसकी जाँच की गई थी। जाँच में सामने आया कि इस बिल में कई कानूनी कमियाँ और पेंच हैं। इसी वजह से यह बिल आगे नहीं बढ़ पाया। दस साल बीतने के बाद भी यह कभी कानून नहीं बन सका।

योगी सरकार ने इसे वापस क्यों लिया?

योगी आदित्यनाथ की सरकार का साफ कहना है कि जो बिल दस साल तक पास न हो सके, उसे ढोने का कोई मतलब नहीं है। जिस बिल को संवैधानिक मंजूरी ही न मिली हो, उसे रिकॉर्ड में रखने का क्या फायदा। इसी सोच के साथ योगी कैबिनेट ने ‘मदरसा वेतन विधेयक’ वापस लेने का बड़ा फैसला किया।

इसके बाद इस बिल को विधानसभा और विधान परिषद दोनों जगहों से आधिकारिक तौर पर वापस ले लिया गया। सरकार के इस कदम से इस पूरे मामले की विधायी प्रक्रिया हमेशा के लिए खत्म हो गई है। अब यह साफ हो गया है कि यह विवादित बिल भविष्य में कभी भी कानून नहीं बन पाएगा।

योगी सरकार का कहना है कि कानून बनाते समय संविधान के समानता सिद्धांत और प्रशासनिक संतुलन का ध्यान रखना जरूरी होता है। किसी खास वर्ग (मुस्लिमों) के हितों की रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन ऐसी व्यवस्था भी नहीं बनाई जा सकती जो दूसरे वर्गों से अलग कानूनी ढांचा तैयार करे। सरकार का दावा है कि इसी वजह से पुराने विधेयक को समाप्त करना आवश्यक था।

PM मोदी की ‘लोकल’ अपील से वैश्विक बाजार तक: राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर जानिए भारत के बुनकरों और हथकरघा उद्योग की पूरी कहानी

भारत में हर साल 7 अगस्त को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस मनाया जाता है। यह दिन सिर्फ पारंपरिक कपड़ों का उत्सव नहीं, बल्कि उन लाखों बुनकरों और कारीगरों को सम्मान देने का अवसर भी है, जो पीढ़ियों से देश की समृद्ध बुनाई परंपरा को जीवित रखे हुए हैं।

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस 2026 के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी देशवासियों से #NationalHandloomDay के साथ अपने ‘गेट रेडी विद मी’ (GRWM) वीडियो साझा कर भारतीय हथकरघा उत्पादों को बढ़ावा देने की अपील की है।

एक ओर सरकार नई योजनाओं, डिजिटल प्लेटफॉर्म और वैश्विक बाजार के जरिए इस क्षेत्र को मजबूत करने पर जोर दे रही है, वहीं आधुनिक डिजाइन और फैशन की दुनिया में भी भारतीय हथकरघा अपनी अलग पहचान बना रहा है।

1905 के स्वदेशी आंदोलन से जुड़ा है राष्ट्रीय हथकरघा दिवस

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस हर साल 7 अगस्त को मनाया जाता है। इस तारीख का संबंध 1905 में शुरू हुए स्वदेशी आंदोलन से है। उस समय देशवासियों ने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार कर भारतीय उत्पादों को अपनाने का संकल्प लिया था। हथकरघा उद्योग उस आंदोलन का एक मजबूत आधार बना था।

इसी ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए वर्ष 2015 में पीएम मोदी ने राष्ट्रीय हथकरघा दिवस की शुरुआत की। तब से यह दिन बुनकरों के योगदान को सम्मान देने और लोगों को भारतीय हथकरघा उत्पाद अपनाने के लिए प्रेरित करने का अवसर बन गया है।

हथकरघा उद्योग से भारत में जुड़े हैं कितने लोग ?

हथकरघा उद्योग सिर्फ सांस्कृतिक पहचान नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका का भी आधार है। 2019-20 की चौथी अखिल भारतीय हथकरघा जनगणना के अनुसार देश में लगभग 31.45 लाख हथकरघा परिवार हैं और करीब 35.22 लाख बुनकर एवं संबद्ध श्रमिक इस क्षेत्र से जुड़े हुए हैं।

इनमें लगभग 8.48 लाख लोग बुनाई से पहले और बाद के काम, जैसे धागा तैयार करना, रंगाई, वार्पिंग और फिनिशिंग जैसी गतिविधियों में लगे हैं। सबसे खास बात यह है कि इस क्षेत्र में 72 प्रतिशत से अधिक यानी लगभग 25.46 लाख महिलाएँ काम करती हैं। यही वजह है कि हथकरघा उद्योग महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण का भी बड़ा माध्यम माना जाता है।

इसके अलावा लगभग 28.20 लाख करघों में से करीब 90 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में मौजूद हैं, जिससे साफ है कि यह उद्योग गाँवों की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाता है।

सरकार किन योजनाओं से दे रही है बुनकरों को सहारा?

सरकार हथकरघा क्षेत्र को मजबूत करने के लिए कई योजनाएं चला रही है। इनमें सबसे प्रमुख राष्ट्रीय हथकरघा विकास कार्यक्रम (NHDP) और कच्चा माल आपूर्ति योजना (RMSS) हैं।

NHDP के तहत छोटे क्लस्टरों को आधुनिक करघे, बेहतर कार्यशाला, डिजाइन सहायता, उत्पाद विकास और विपणन जैसी सुविधाएँ दी जाती हैं। वर्ष 2021-22 से जून 2026 तक 357 क्लस्टर स्वीकृत किए जा चुके हैं। वर्कशेड निर्माण और इलेक्ट्रॉनिक जैक्वार्ड जैसी तकनीकों से बुनकरों की उत्पादकता और आय में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

सरकार रियायती ब्याज दर पर ऋण, बीमा योजनाएँ, छात्रवृत्ति, मेगा क्लस्टर विकास और विशेष अवसंरचना परियोजनाओं के जरिए भी बुनकरों की मदद कर रही है। जनवरी 2025 में शुरू किए गए ई-पहचान पोर्टल के माध्यम से नए बुनकरों का पंजीकरण आसान हुआ है और जुलाई 2026 तक करीब 84 हजार अतिरिक्त श्रमिकों को ई-पहचान कार्ड की मंजूरी मिल चुकी है।

पारंपरिक बुनाई को मिल रही आधुनिक पहचान

आज भारतीय हथकरघा सिर्फ पारंपरिक साड़ियों या कपड़ों तक सीमित नहीं है। आधुनिक फैशन, डिजाइन और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने इसे नई पहचान दी है।

हाल के वर्षों में फेमिना मिस इंडिया, भारत टेक्स, IFFI गोवा और ‘वीव द फ्यूचर 4.0’ जैसे आयोजनों में भारतीय हथकरघा को नए अंदाज में प्रस्तुत किया गया। चंदेरी, बनारसी, जामदानी, महेश्वरी, इकत, कोटा डोरिया और कई अन्य पारंपरिक बुनाई शैलियों को आधुनिक फैशन के साथ जोड़कर दुनिया के सामने पेश किया गया।

इसी दिशा में हैंडलूम हैकाथॉन 2026 भी शुरू किया गया है, जिसमें विद्यार्थी, स्टार्टअप, डिजाइनर और बुनकर मिलकर इस क्षेत्र के लिए नए तकनीकी और व्यावहारिक समाधान तैयार कर रहे हैं।

वैश्विक बाजार में बढ़ रही भारतीय हथकरघा की पहचान

भारतीय हथकरघा उत्पादों की माँग अब विदेशों में भी लगातार बढ़ रही है। वर्ष 2025-26 में भारत का हथकरघा निर्यात लगभग 1330.96 करोड़ रुपए रहा। संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और स्पेन प्रमुख निर्यात बाजार रहे।

सरकार खरीदारों का भरोसा बढ़ाने के लिए हैंडलूम मार्क, इंडिया हैंडलूम ब्रांड और जीआई टैग जैसी व्यवस्थाओं को भी मजबूत कर रही है। जून 2026 तक 29402 हैंडलूम मार्क पंजीकरण और 2305 इंडिया हैंडलूम ब्रांड पंजीकरण जारी किए जा चुके थे।

डिजिटल प्लेटफॉर्म भी इस बदलाव में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। GeM पोर्टल से करीब 1.50 लाख बुनकर और संस्थाएँ जुड़ चुकी हैं, जबकि IndiaHandmade प्लेटफॉर्म हजारों कारीगरों को सीधे ग्राहकों तक पहुँचने का अवसर दे रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संदेश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर स्थानीय कपड़ों को बढ़ावा देने की अपील की है। उन्होंने देशवासियों को संबोधित करते हुए सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर किया।

इसमें उन्होंने जनता से अपील करते हुए देश की पारंपरिक शिल्पकला और स्थानीय बुनाई को बढ़ावा देने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग करने का आग्रह किया। उन्होंने नागरिकों से स्थानीय कपड़ों की लोकप्रियता बढ़ाने के लिए हैशटैग के साथ अपने ‘गेट रेडी विद मी’ (GRWM) वीडियो शेयर करने की अपील की।

प्रधानमंत्री ने गुरुवार को एक्स प्लेटफॉर्म पर लिखा, “7 अगस्त राष्ट्रीय हथकरघा दिवस है। आइए भारत की हथकरघा विविधता को लोकप्रिय बनाएँ। अपने पसंदीदा हथकरघा उत्पादों के वीडियो, जिनमें GRWM वीडियो भी शामिल हैं, सोशल मीडिया पर साझा करें। #NationalHandloomDay का उपयोग करना न भूलें।”

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 7 अगस्त 2026 को दिल्ली के राष्ट्रपति भवन सांस्कृतिक केंद्र में 12वें राष्ट्रीय हथकरघा दिवस समारोह के अवसर पर देश के 22 उत्कृष्ट बुनकरों और शिल्पकारों को प्रतिष्ठित संत कबीर हथकरघा और राष्ट्रीय हथकरघा पुरस्कार प्रदान किए।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सभा को संबोधित करते हुए कहा, “हमारे कृषि क्षेत्र में भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सबसे सुंदर और मानवीय उद्योग बनने की संभावनाएँ बढ़ी हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि हथकरघा क्लस्टरों को आधुनिक प्रौद्योगिकी और सामाजिक प्रशिक्षण के तरीकों से जोड़ा जा रहा है। किसानों की संख्या बढ़ाने के लिए सरकार ने कई पारदर्शी कदम उठाए हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “किसानों ने अपनी मेहनत का सीधा लाभ प्राप्त करने के रास्ते खोज लिए हैं। जैसा कि कानून मंत्री ने उल्लेख किया है, भारतीय कृषि क्षेत्र की अंतरराष्ट्रीय छवि उभर रही है। सरकार इसे एक सत्यापित सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था बनाने के लिए कड़ी मेहनत कर रही है। हथकरघा और घरेलू वस्त्र क्षेत्रों में आर्थिक विकास की संभावनाएँ हैं।”

भविष्य की ओर बढ़ता भारतीय हथकरघा

भारतीय हथकरघा केवल कपड़ा बनाने की कला नहीं, बल्कि देश की सांस्कृतिक विरासत, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और लाखों परिवारों की आजीविका का आधार है। समय के साथ यह क्षेत्र भी तेजी से बदल रहा है। नई तकनीक, बेहतर डिजाइन, सरकारी योजनाएँ, डिजिटल बाजार और अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलकर इसे नई दिशा दे रहे हैं।

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस 2026 इस बात का संदेश देता है कि परंपरा और आधुनिकता साथ-साथ चल सकती हैं। यदि बुनकरों को लगातार तकनीकी सहायता, बेहतर बाजार और मजबूत सरकारी समर्थन मिलता रहा, तो भारतीय हथकरघा आने वाले वर्षों में न केवल देश की सांस्कृतिक पहचान को और मजबूत करेगा, बल्कि वैश्विक वस्त्र बाजार में भी अपनी अलग और स्थायी जगह बनाएगा।

‘प्रदर्शन के नाम पर शहर को बंधक नहीं बना सकते, जंतर-मंतर बंद करने पर विचार करो’: दिल्ली HC की सख्त टिप्पणी, जानें- क्यों सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक माना जा रहा यह धरना स्थल

दिल्ली हाई कोर्ट ने शुक्रवार (7 अगस्त 2026) को जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शनों के स्थल के रूप में जारी रखने पर गंभीर सवाल उठाते हुए केंद्र सरकार से पूछा कि आखिर इस स्थान को बंद करने पर विचार क्यों नहीं किया जा रहा है। कोर्ट ने कहा कि किसी भी विरोध-प्रदर्शन के कारण पूरे शहर को अनावश्यक रूप से बंधक नहीं बनाया जाना चाहिए।

यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई, जिसमें ऑल इंडिया दलित क्रिश्चियन राइट्स प्रोटेक्शन कमेटी ने जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति देने के लिए दिल्ली पुलिस को निर्देश देने की माँग की थी। इसी मुद्दे से जुड़ी एक जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट भी सुनवाई कर रहा है, जिसमें जंतर-मंतर के बजाय विरोध-प्रदर्शनों के लिए वैकल्पिक स्थल तय करने की माँग की गई है।

जंतर-मंतर बंद क्यों नहीं कर देते?: हाई कोर्ट ने सरकार से पूछा सवाल

मामले की सुनवाई जस्टिस अमित महाजन की एकल पीठ ने की। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि विरोध-प्रदर्शनों के कारण शहर के आम लोगों को परेशानी उठानी पड़ती है और सरकार को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। जस्टिस महाजन ने कहा कि इस तरह के प्रदर्शन शहर के बीचों-बीच नहीं होने चाहिए, हालाँकि अंतिम फैसला सरकार का है।

उन्होंने सवाल किया कि आखिर पूरे शहर को अनावश्यक रूप से बंधक क्यों बनाया जाए और सरकार जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में बंद क्यों नहीं कर देती। यह मामला ऑल इंडिया दलित क्रिश्चियन राइट्स प्रोटेक्शन कमेटी की ओर से दायर याचिका से जुड़ा था।

समिति की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय घोष ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने जुलाई में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति के लिए आवेदन दिया था, लेकिन दिल्ली पुलिस ने अब तक न तो उसे मंजूर किया है और न ही खारिज किया है। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन में अधिकतम 75 लोगों के शामिल होने की बात आवेदन में स्पष्ट रूप से कही गई थी।

इसके बावजूद पुलिस आवेदन पर निर्णय नहीं ले रही है। इस पर कोर्ट ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा से पूछा कि सरकार इस स्थल को बंद करने पर विचार क्यों नहीं करती। जस्टिस महाजन ने दोहराया कि उनकी व्यक्तिगत राय में इस तरह के प्रदर्शन दिल्ली शहर के भीतर नहीं होने चाहिए।

पुलिस, केंद्र और याचिकाकर्ता के तर्क: कोर्ट ने कहा- शहर को बंधक नहीं बनाया जा सकता

ASG चेतन शर्मा ने कोर्ट को बताया कि यही मुद्दा पहले से सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है, जहाँ यह तय होना है कि क्या जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन के लिए नामित स्थल बने रहना चाहिए। इस पर जस्टिस महाजन ने कहा कि उनकी राय में ऐसा नहीं होना चाहिए।

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता संजय घोष ने सवाल उठाया कि क्या केंद्र सरकार का यह रुख है कि दिल्ली में कहीं भी विरोध-प्रदर्शन नहीं हो सकते। इस पर जस्टिस महाजन ने कहा कि यह निर्णय पुलिस को लेना है कि वह शहर के भीतर प्रदर्शन की अनुमति दे सकती है या नहीं।

जवाब में घोष ने कहा कि यदि सरकार यह स्पष्ट कह दे कि दिल्ली में लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण प्रदर्शन नहीं होंगे तो वे उसे स्वीकार कर लेंगे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह यह नहीं कह रही कि प्रदर्शन लोकतांत्रिक हैं या अलोकतांत्रिक, बल्कि उसका सवाल केवल इतना है कि ऐसे आयोजनों से पूरे शहर को परेशानी क्यों झेलनी पड़े।

इस पर संजय घोष ने सुप्रीम कोर्ट के शाहीन बाग फैसले का हवाला देते हुए कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है। जस्टिस महाजन ने इसका जवाब देते हुए कहा कि अधिकार अपनी जगह हैं, लेकिन शहर को बंधक बनाकर नहीं रखा जा सकता।

सुनवाई के दौरान ASG चेतन शर्मा ने यह भी बताया कि जंतर-मंतर क्षेत्र में फिलहाल दंड प्रक्रिया संहिता (CRPC) की धारा 144 लागू है और 15 अगस्त नजदीक होने के कारण सुरक्षा व्यवस्था और अधिक कड़ी कर दी गई है।

उन्होंने कहा कि कई बार 75 लोगों का प्रदर्शन देखते-देखते 75 हजार लोगों की भीड़ में बदल जाता है और ऐसी स्थिति में सुरक्षा एजेंसियों के सामने गंभीर चुनौती खड़ी हो जाती है। इस पर जस्टिस महाजन ने फिर कहा कि उनकी व्यक्तिगत राय में शहर के भीतर ऐसे प्रदर्शन नहीं होने चाहिए क्योंकि इससे एंबुलेंस सहित आम लोगों की आवाजाही प्रभावित होती है।

इसके बाद ASG शर्मा ने कहा कि कई बार प्रदर्शनकारियों के अनुच्छेद 19(1)(a) के अधिकारों को अन्य नागरिकों के अधिकारों से ऊपर मान लिया जाता है, जिससे आम जनता को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

अंत में दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया कि वह ऑल इंडिया दलित क्रिश्चियन राइट्स प्रोटेक्शन कमेटी के आवेदन पर 8 अगस्त तक निर्णय ले और इसी निर्देश के साथ याचिका का निस्तारण कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट में भी जंतर-मंतर के खिलाफ याचिका, वैकल्पिक प्रदर्शन स्थल की माँग

जंतर-मंतर को लेकर विवाद केवल दिल्ली हाई कोर्ट तक सीमित नहीं है। इससे पहले सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने भी एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया था।

यह याचिका सतीश चंद कौशिक ने दायर की है, जिसमें कहा गया है कि जंतर-मंतर अब विरोध-प्रदर्शनों के लिए उपयुक्त स्थान नहीं रह गया है और इसके स्थान पर कोई वैकल्पिक स्थल तय किया जाना चाहिए। याचिका में तर्क दिया गया है कि जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शनों से स्थानीय निवासियों को लगातार असुविधा होती है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि क्षेत्र में आने-जाने के रास्ते बाधित हो जाते हैं, आवश्यक वस्तुओं और दवाइयों की आपूर्ति प्रभावित होती है तथा मेडिकल सेवाओं और एंबुलेंस की आवाजाही में भी रुकावट आती है। इसलिए विरोध-प्रदर्शनों के लिए किसी ऐसे स्थान की व्यवस्था की जानी चाहिए जहाँ नागरिकों को कम से कम असुविधा हो।

सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य जज की अध्यक्षता वाली पीठ ने भी माना कि याचिका में उठाए गए मुद्दे महत्वपूर्ण हैं। कोर्ट ने कहा कि याचिका में यह बताया गया है कि जंतर-मंतर अब प्रदर्शन के लिए उपयुक्त स्थल नहीं रह गया है क्योंकि वहाँ आने-जाने में गंभीर दिक्कतें होती हैं और चिकित्सा संबंधी आवश्यक सेवाओं की आपूर्ति भी प्रभावित होती है।

मुख्य जज ने इसे महत्वपूर्ण चिंता का विषय बताया। याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि प्रधानमंत्री आवास तक प्रस्तावित एक राजनीतिक मार्च के मद्देनजर पहले जैसी अप्रिय घटनाओं से बचना जरूरी है। हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने प्रस्तावित कार्यक्रम पर कोई टिप्पणी करने से इनकार करते हुए कहा कि ऐसी परिस्थितियों से निपटना संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों का दायित्व है। इसके बाद कोर्ट ने मामले को अलग से सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।

कॉकरोचों ने की संसद में घुसने की कोशिश

गौरतलब है कि कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के दौरान संसद में घुसने की भी कोशिश हुई थी, जो कि जंतर-मंतर से करीब 3 से 4 किलोमीटर की दूरी पर है। दिल्ली पुलिस ने अपने बयान में कहा था कि प्रदर्शन के लिए केवल जंतर-मंतर पर धरना देने की अनुमति दी गई थी। संसद की ओर मार्च निकालने या तय प्रदर्शन स्थल से आगे बढ़ने की इजाजत नहीं थी।

दिल्ली पुलिस के मुताबिक, कई हफ्तों तक प्रदर्शन शांतिपूर्वक चलता रहा और इस दौरान प्रदर्शन स्थल को जबरन खाली नहीं कराया गया। हालात तब बिगड़े, जब प्रदर्शनकारियों का एक समूह संसद का सत्र चलने के दौरान संसद की ओर बढ़ने लगा और रास्ते में लगाए गए सुरक्षा बैरिकेड्स को पार करने की कोशिश की।

पुलिस ने कहा कि प्रदर्शनकारियों से कई बार घोषणा करके तय जगह पर ही रहने की अपील की गई। इसके बावजूद कुछ लोग आगे बढ़ते रहे। इस दौरान बैरिकेड्स को नुकसान पहुँचाया गया, पुलिस को निशाना बनाया गया और कई पुलिसकर्मियों, जिनमें वरिष्ठ और बुजुर्ग अधिकारी भी शामिल थे, को घरेकर धक्का-मुक्की और बदसलूकी की गई।

Meta पर ₹5000 करोड़ का जुर्माना, जानें क्या है न्यू मेक्सिको में बच्चों की सुरक्षा से खिलवाड़ का मामला: इससे बच्चों में बढ़ रहा डिप्रेशन व सुसाइड जैसा खतरा, दुनियाभर में मुकदमे झेल रही कंपनी

सोशल मीडिया ऐप्स का असर आज के बच्चों और युवाओं के दिमाग पर बहुत गहरा पड़ रहा है। मेटा, जो फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसी बड़ी ऐप्स चलाती है, इस समय दुनिया भर में कानूनी मामलों और सरकारी जाँच का सामना कर रही है।

अमेरिका की अदालतों से लेकर यूरोप की एजेंसियों और भारत में बच्चों की सुरक्षा के मुद्दों तक, मेटा पर आरोप है कि उसने अपने फायदे और कमाई के लिए बच्चों की सुरक्षा और सेहत को नुकसान पहुँचाया। हाल ही में न्यू मेक्सिको की एक अदालत ने मेटा पर 567 मिलियन डॉलर (करीब 4,700 करोड़ रुपए) का भारी जुर्माना लगाया है।

यह फैसला टेक कंपनियों के काम करने के तरीके, उनके एल्गोरिदम, AI चैटबॉट्स और बच्चों के यौन शोषण को रोकने में उनकी नाकामी पर एक बड़ा सबक है। ऐप्स के अंदर जानबूझकर ऐसे फीचर्स डाले जाते हैं जो बच्चों को घंटों फोन से चिपकाए रखते हैं। इससे बच्चों में तनाव, नींद न आना, डिप्रेशन और आत्महत्या जैसे मामले सामने आ रहे हैं।

न्यू मेक्सिको की अदालत ने मेटा को ‘पब्लिक न्यूसेंस’ (सार्वजनिक उपद्रव) फैलाने का दोषी माना है, जिसका मतलब है कि सोशल मीडिया की ये कमियाँ अब सिर्फ किसी एक इंसान की दिक्कत नहीं हैं, बल्कि पूरे समाज के लिए खतरा बन चुकी हैं।

इसके साथ ही भारत जैसे देश में भी, जहाँ करोड़ों बच्चे इंटरनेट चलाते हैं, ऑनलाइन बाल यौन शोषण और सुरक्षा का मुद्दा बहुत गंभीर रूप ले चुका है। इन सभी मामलों और अदालती फैसलों से यह साफ हो गया है कि अब दुनिया भर की सरकारें और अदालतें टेक कंपनियों की मनमानी को चुपचाप बर्दाश्त करने के मूड में नहीं हैं। 

न्यू मेक्सिको के कोर्ट का ऑर्डर और 567 मिलियन डॉलर की पेनाल्टी

अमेरिका के न्यू मेक्सिको स्थित सांता फे की एक कोर्ट ने मेटा के खिलाफ कड़ा फैसला सुनाते हुए कंपनी को 567 मिलियन डॉलर (4,700 करोड़ रुपए से अधिक) की भारी राशि किशोर मानसिक स्वास्थ्य कोष (Teen Mental Health Fund) में जमा करने का आदेश दिया है।

इसके साथ ही जज ब्रायन बीडशेड ने मेटा को अपने प्लेटफॉर्म्स के काम करने के बुनियादी तरीकों में बदलाव करने का निर्देश दिया है ताकि कम उम्र के यूजर्स को सुरक्षा दी जा सके। कोर्ट ने अपने निष्कर्ष में साफ कहा कि मेटा अपने प्लेटफॉर्म्स के जरिए बच्चों और किशोरों के स्वास्थ्य और जीवन की सुरक्षा को नुकसान पहुँचाने के लिए पूरी तरह जिम्मेदार है।

यह पूरी कानूनी कार्रवाई न्यू मेक्सिको के अटॉर्नी जनरल रॉल टॉरेज द्वारा शुरू की गई थी, जिन्होंने आरोप लगाया था कि उसने अपने प्रोडक्ट्स को इस तरह डिजाइन किया कि युवाओं को उनकी लत लग जाए। साथ ही कंपनी अपने प्लेटफॉर्म्स पर बच्चों को यौन उत्पीड़न, ऑनलाइन ग्रूमिंग और शोषण से बचाने के बुनियादी तंत्र को लागू करने में भी पूरी तरह नाकाम रही।

कोर्ट का यह 567 मिलियन डॉलर का फैसला इस पूरे केस के दूसरे चरण की सुनवाई के बाद सामने आया है। इससे ठीक पाँच महीने पहले इसी मुकदमे के प्रथम चरण में न्यू मेक्सिको की एक जूरी ने मेटा को 375 मिलियन डॉलर का भुगतान करने का आदेश दिया था।

जूरी ने अपने जाँच निष्कर्षों में माना था कि मेटा ने फेसबुक और इंस्टाग्राम की सुरक्षा के बारे में झूठे और भ्रामक दावे करके उपभोक्ता संरक्षण कानूनों का सीधा और गंभीर उल्लंघन किया है। कोर्ट ने अपने फैसले के तहत पाँच वर्षों के लिए लागू रहने वाली एक बेहद सख्त डिक्री भी जारी की है।

इसके तहत मेटा को न्यू मेक्सिको में किशोरों द्वारा फेसबुक और इंस्टाग्राम के उपयोग की एक निश्चित मासिक समय-सीमा तय करनी होगी, बार-बार भेजे जाने वाले नोटिफिकेशंस पर कड़े प्रतिबंध लगाने होंगे, अनजान वयस्कों द्वारा नाबालिगों से सीधे संपर्क साधने के रास्तों को ब्लॉक करना होगा, AI चैटबॉट्स पर कड़े सुरक्षा नियम लागू करने होंगे और बाल यौन शोषण सामग्री से जुड़ी रिपोर्टों की बहुत ही गहनता से समीक्षा करनी होगी।

क्या है पब्लिक न्यूसेंस लॉ और मेटा ने अपने बचाव में क्या दलीलें दी?

न्यू मेक्सिको की इस कोर्ट में चली तीन हफ्ते की बिना जूरी वाली सुनवाई का मुख्य केंद्र यह तय करना था कि क्या मेटा के प्लेटफॉर्म्स ने राज्य के कानून के तहत एक पब्लिक न्यूसेंस की स्थिति पैदा की है।

अमेरिकी न्याय प्रणाली में सार्वजनिक उपद्रव का कानून ऐतिहासिक रूप से उन गतिविधियों के खिलाफ इस्तेमाल किया जाता रहा है जो आम जनता के स्वास्थ्य, सुरक्षा या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाती हैं, जैसे कि मुख्य रास्तों को अवरुद्ध करना या नदियों और हवा में जहरीला कचरा फैलाना।

हालाँकि हाल के वर्षों में अमेरिकी राज्यों ने तंबाकू कंपनियों, ओपिओइड दवा निर्माताओं, जलवायु परिवर्तन के मामलों, ई-सिगरेट कंपनियों और अब AI व सोशल मीडिया दिग्गजों को कटघरे में खड़ा करने के लिए इस कानून का व्यापक उपयोग शुरू कर दिया है।

जज ब्रायन बीडशेड ने अपने लिखित फैसले में एक बहुत ही प्रभावी तुलना करते हुए लिखा कि जिस प्रकार किसी कारखाने से निकलने वाला जहरीला धुआँ आसपास के वातावरण और स्वच्छ हवा के सार्वजनिक अधिकार को दूषित करता है, ठीक उसी प्रकार मेटा के प्लेटफॉर्म्स के हानिकारक प्रभाव केवल फोन की स्क्रीन या इंटरनेट तक सीमित नहीं रहते।

ये हानिकारक प्रभाव डिजिटल दुनिया से बाहर निकलकर वास्तविक दुनिया में फैलते हैं और प्रभावित बच्चों, उनके परिवारों, स्कूलों, अस्पतालों और पूरी कानून प्रवर्तन प्रणाली पर एक बहुत बड़ा सामाजिक बोझ और संकट खड़ा करते हैं।

दूसरी ओर मेटा ने मुकदमे की सुनवाई के दौरान अपना बचाव करते हुए दलील दी कि उसने ऐसा कोई पब्लिक न्यूसेंस पैदा नहीं किया है क्योंकि उसने हवा या पानी जैसी किसी सार्वजनिक संपत्ति में सीधे तौर पर कोई रुकावट नहीं डाली है।

मेटा के वकीलों का यह भी कहना था कि न्यू मेक्सिको के युवा केवल उनकी ऐप्स का उपयोग नहीं करते हैं, बल्कि वे अन्य कंपनियों के डिजिटल ऐप्स भी चलाते हैं, इसलिए केवल मेटा को इस स्थिति के लिए दोषी ठहराना गलत है।

कंपनी ने कोर्ट से माँगी गई पाबंदियों और सुरक्षात्मक उपायों का विरोध करते हुए कोर्ट फाइलिंग्स में कहा कि इनमें से कई बदलाव तकनीकी रूप से असंभव या बेहद कठिन हैं और इन नियमों के कारण कंपनी को मजबूरन उस पूरे राज्य से ही अपनी सेवाएँ समेटनी पड़ सकती हैं।

इसके अतिरिक्त मेटा ने अमेरिकी कानून ‘कम्युनिकेशंस डिसेंसी एक्ट’ की धारा 230 के तहत कानूनी छूट का दावा किया, जो सामान्य तौर पर इंटरनेट प्लेटफॉर्म्स को उनके यूजर्स द्वारा पोस्ट किए गए कंटेंट के दायित्व से सुरक्षा देती है।

हालाँकि जज बीडशेड ने धारा 230 के इस बचाव को पूरी तरह से खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य यहाँ किसी तीसरे पक्ष द्वारा पोस्ट की गई सामग्री के लिए मेटा को दोषी नहीं ठहरा रहा है, बल्कि वह कंपनी द्वारा खुद डिजाइन किए गए प्लेटफॉर्म फीचर्स, लत लगाने वाले तंत्र और उसकी अपनी आंतरिक कार्यप्रणाली को चुनौती दे रहा है।

AI चैटबॉट्स की अश्लील बातचीत और चाइल्ड सेफ्टी से जुड़ा गंभीर खतरा

मुकदमे के दौरान कोर्ट के सामने पेश की गई इंटरनल रिपोर्ट्स ने यह खुलासा किया कि मेटा के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) चैटबॉट्स बच्चों की सुरक्षा के लिए एक नया और बेहद गंभीर खतरा बन रहे थे। रिपोर्ट्स में यह बात साबित हुई कि कंपनी के AI चैटबॉट्स कम उम्र के बच्चों के साथ रोमांटिक, कामुक और अश्लील बातचीत कर सकते थे।

प्लेटफॉर्म पर विज्ञापनों के जरिए धोखाधड़ी और प्रतिबंधित सामान बेचे जाने से होने वाली कमाई की जाँच के बीच इस AI फीचर के दुरुपयोग ने कोर्ट की चिंता को और बढ़ा दिया।

जज बीडशेड ने अपने आदेश में मेटा को निर्देश दिया कि वह न्यू मेक्सिको के किसी भी बच्चे को मेटा के AI चैटबॉट्स के साथ किसी भी प्रकार की रोमांटिक, कामुक या यौन बातचीत में शामिल होने से रोकने के लिए पुख्ता तकनीकी दीवारें खड़ी करे।

कोर्ट ने यह भी तय करने का आदेश दिया कि कोई भी वयस्क यूजर किसी बच्चे के साथ अश्लील बातचीत का करने के लिए मेटा के चैटबॉट्स का इस्तेमाल न कर सके। यह मामला केवल AI चैटबॉट्स तक ही सीमित नहीं है, बल्कि प्लेटफॉर्म पर फैलने वाले बाल यौन शोषण सामग्री और बच्चों को निशाना बनाने वाले पीडोफाइल्स से भी सीधे जुड़ा हुआ है।

राज्य के अटॉर्नी जनरल ने पुख्ता सबूतों के साथ आरोप लगाया कि फेसबुक और इंस्टाग्राम पर सुरक्षा की इतनी भयंकर कमियाँ थीं कि गलत नीयत रखने वाले वयस्कों को नाबालिग बच्चों तक पहुँचने और उनका शोषण करने का खुला अवसर मिल रहा था।

कोर्ट ने अपने आदेश में मेटा को निर्देश दिया है कि वह अपने प्लेटफॉर्म्स पर बाल यौन शोषण से जुड़ी शिकायतों और रिपोर्टों की समीक्षा प्रक्रिया को मजबूत और तेज करे। हालाँकि मेटा ने इस फैसले के बाद जारी अपने आधिकारिक बयान में कहा कि वह इस निर्णय के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील दायर करेगी।

मेटा का दावा है कि वह अपने प्लेटफॉर्म्स को सुरक्षित बनाने के लिए लगातार काम कर रही है। कंपनी का कहना है कि वह किशोरों की सुरक्षा से जुड़े अपने रिकॉर्ड को लेकर आश्वस्त है और कोर्ट में अपने तथ्यों का बचाव करती रहेगी, लेकिन कोर्ट के फैसले में सामने आए तथ्य उसके इन दावों की पोल खोलते हैं।

यूरोपीय आयोग की कड़ी जाँच और दुनियाभर की सरकारी एजेंसियों का बढ़ता दबाव

अमेरिका में चल रहे इन मुकदमों के अलावा, यूरोपीय संघ (EU) में भी मेटा के खिलाफ नियमों की घेराबंदी लगातार सख्त होती जा रही है। यूरोपीय आयोग ने औपचारिक रूप से घोषणा की है कि वह मेटा के दो बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, फेसबुक और इंस्टाग्राम के खिलाफ अपने नए और बेहद सख्त ‘डिजिटल सर्विसेज एक्ट’ (DSA) के तहत जाँच शुरू कर रहा है।

यह जाँच मुख्य रूप से बाल सुरक्षा से जुड़े गंभीर जोखिमों और कंपनी द्वारा अपने वैधानिक दायित्वों की अनदेखी करने पर केंद्रित है। यूरोपीय संघ का यह लैंडमार्क कानून यह अनिवार्य बनाता है कि टेक कंपनियों को अपने प्लेटफॉर्म्स से गैर-कानूनी, अश्लील और नुकसानदेह सामग्री को हटाने के लिए तुरंत और ठोस कदम उठाने होंगे।

साथ ही नाबालिगों की प्राइवेसी और सुरक्षा का उच्चतम स्तर सुनिश्चित करना होगा। यदि कोई कंपनी इन नियमों का उल्लंघन करती पाई जाती है, तो उस पर उसकी वैश्विक कुल कमाई के 6 प्रतिशत तक का वित्तीय जुर्माना लगाया जा सकता है।

यूरोपीय संघ के नियामकों का मानना है कि फेसबुक और इंस्टाग्राम के कई फीचर्स इस तरह डिजाइन किए गए हैं जो बच्चों में ऐप की लत और अवांछनीय व्यवहार को बढ़ावा देते हैं, जिससे उनके मानसिक विकास और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा नकारात्मक असर पड़ रहा है।

इसके अतिरिक्त यूरोपीय आयोग इस बात की भी जाँच कर रहा है कि क्या मेटा के पास उपयोगकर्ताओं की सही उम्र का सत्यापन करने के लिए कोई विश्वसनीय तंत्र मौजूद है या नहीं, और क्या उसके एल्गोरिदम कम उम्र के बच्चों को उनकी इच्छा के बिना भी खतरनाक या अनुचित कंटेंट की ओर धकेल रहे हैं।

लगातार बढ़ते इस वैश्विक दबाव का असर मेटा के व्यावसायिक भविष्य पर भी साफ दिखाई दे रहा है। कंपनी ने अपने शेयरधारकों और निवेशकों को औपचारिक रूप से चेतावनी दी है कि अमेरिका और यूरोपीय संघ में युवाओं के सोशल मीडिया उपयोग और बाल सुरक्षा से जुड़े ये कानूनी मामले और नियामक प्रतिबंध उसके व्यवसाय को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकते हैं।

मानसिक स्वास्थ्य पर असर और टीनएजर्स की मौतों पर लीगल एक्शन

सोशल मीडिया कंपनियों द्वारा अपने वित्तीय लाभ के लिए युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को दाँव पर लगाने का यह मुद्दा अब सिर्फ सरकारी एजेंसियों या राज्य के मुकदमों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसका सबसे भयानक पहलू उन आम परिवारों की कहानियों में दिखता है जिन्होंने अपने बच्चों को खो दिया है।

हाल ही में अमेरिका की डेलावेयर सुपीरियर कोर्ट में चार नाबालिग बच्चों के परिवारों ने एक बड़ा केस दर्ज कराया है। यह मुकदमा मेटा, टिकटॉक, स्नैपचैट और यूट्यूब की मूल कंपनी गूगल के खिलाफ एक साथ दायर किया गया है।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि इन प्लेटफॉर्म्स के वर्षों के रेग्युलर और अत्यधिक इस्तेमाल से पैदा हुए गंभीर मानसिक खतरों के कारण उन चारों बच्चों ने आत्महत्या जैसा खौफनाक कदम उठा लिया।

यह मुकदमा जुलाई 2024 से सितंबर 2025 के बीच केवल 14 महीनों की अवधि के भीतर अपनी जान गँवाने वाले चार अलग-अलग राज्यों के बच्चों- लीवी कास्त्रो (13 वर्ष), रिव केलेहर (14 वर्ष), नथैनिएल चैम्बर्स (17 वर्ष) और डॉसन होल्डन (18 वर्ष) के परिवारों की तरफ से दाखिल किया गया है।

पीड़ित परिवारों का प्रतिनिधित्व कर रहे ‘सोशल मीडिया विक्टिम्स लॉ सेंटर’ के संस्थापक वकील मैथ्यू बर्गमैन ने स्पष्ट रूप से कहा कि कंपनियों के बड़े अधिकारियों के तमाम खोखले दावों और झूठे आश्वासनों के बावजूद ये ऐप्स बच्चों की जिंदगी छीन रहे हैं।

कोर्ट में दाखिल शिकायत के अनुसार, इन चारों टीनएजर्स ने सोशल मीडिया की भयंकर लत, नींद की गंभीर कमी, गहरा अवसाद, चिंता और आत्महत्या के विचारों जैसी भयानक मानसिक स्थितियों का सामना किया। अमेरिका के 33 से अधिक राज्यों के अटॉर्नी जनरल ने मिलकर कैलिफोर्निया की संघीय कोर्ट में मेटा के खिलाफ एक साझा मुकदमा दर्ज कराया हुआ है।

इसमें 33 राज्यों का एक समूह शामिल है जिसने आरोप लगाया कि मेटा जानती थी कि उसके प्लेटफॉर्म्स पर मौजूद लाइक्स का सिस्टम और लगातार स्क्रॉल होने वाला डिजाइन किशोरों के दिमाग को आकर्षित करके उन्हें नियंत्रित कर लेता है।

साल 2021 में कंपनी की ही एक पूर्व कर्मचारी फ्रांसिस हॉगेन द्वारा लीक किए गए अंदरूनी गुप्त दस्तावेजों ने संसद और पूरी दुनिया के सामने यह उजागर कर दिया था कि इंस्टाग्राम किशोरियों के मन में अपने शरीर को लेकर हीन भावना पैदा कर रहा है और कंपनी को इसकी पूरी जानकारी होने के बावजूद उसने मुनाफे के लिए इसे छिपाए रखा।

भारत में बाल यौन शोषण, कानूनी ढाँचा और डिजिटल सुरक्षा की स्थिति

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बाल सुरक्षा और यौन शोषण का यह संकट केवल अमेरिका या यूरोप के विकसित देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत जैसे विशाल डिजिटल बाजार वाले देश के लिए यह एक बड़ी चुनौती प्रस्तुत करता है।

भारत में आज करोड़ों छोटे बच्चे और किशोर रोजाना इंस्टाग्राम, फेसबुक और व्हाट्सएप का सक्रियता से इस्तेमाल करते हैं। डिजिटल साक्षरता की कमी और पर्याप्त निगरानी के अभाव के कारण भारतीय बच्चे ऑनलाइन साइबर बुलिंग, ऑनलाइन ग्रूमिंग और बाल यौन शोषण सामग्री के आसान शिकार बन जाते हैं।

हालाँकि भारत में इस प्रकार के अपराधों से निपटने के लिए एक सख्त कानूनी ढाँचा मौजूद है, जिसमें मुख्य रूप से ‘प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेस’ यानी पॉक्सो एक्ट (POCSO Act, 2012) और ‘इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट’ (IT Act, 2000) शामिल हैं।

भारतीय कानून के तहत ऑनलाइन बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) को देखना, खोजना, डाउनलोड करना, अपने फोन या कंप्यूटर में स्टोर करना, या किसी अन्य को भेजना एक गैर-जमानती गंभीर अपराध है। ऐसी सामग्री का केवल स्टोरेज या कंजप्शन भी पॉक्सो कानून की धारा 15 और आईटी एक्ट की धारा 67B के तहत दंडनीय अपराध है।

इसके अलावा भारत सरकार के ‘इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (इंटरमीडियरी गाइडलाइन्स एंड डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) रूल्स, 2021’ के तहत मेटा जैसी टेक कंपनियों (इंटरमीडियरीज) पर यह सख्त कानूनी दायित्व डाला गया है कि किसी भी शिकायत या सरकारी निर्देश के मिलने के 24 घंटे के भीतर वे बाल यौन शोषण से जुड़ी किसी भी सामग्री को अपने प्लेटफॉर्म से तुरंत हटाएँ और उसकी पहुँच को ब्लॉक करें।

जाँच एजेंसी CBI ने भी देशभर में ऑनलाइन फैल रहे बाल यौन शोषण रैकेट्स का पर्दाफाश करने के लिए ‘ऑपरेशन मेघ चक्र’ जैसे अभियान चलाकर बड़े पैमाने पर छापेमारी की है।

फर्जी है PM मोदी की विदेश यात्राओं पर फिजूलखर्ची वाला नैरेटिव: समझिए- कैसे मनमोहन सिंह से ज्यादा दौरे, फिर भी खर्च में नहीं हुई आनुपातिक बढ़ोतरी

विदेश मंत्रालय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं पर ताजा जानकारी संसद में दी है। इसके बाद सोशल मीडिया पर एक बार फिर इन यात्राओं पर हुए खर्च को लेकर बहस शुरू हो गई। जानकारी सामने आने के कुछ ही घंटों में विपक्षी नेताओं और मोदी विरोधी लोगों ने अलग-अलग खर्च के आँकड़े साझा करने शुरू कर दिए। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर जनता के टैक्स का बहुत पैसा खर्च हो रहा है।

लेकिन पूरी जानकारी देखने पर तस्वीर कुछ अलग नजर आती है। सिर्फ कुछ आँकड़ों को अलग से देखने के बजाय अगर पूरी जानकारी देखी जाए तो पता चलता है कि प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पिछले प्रधानमंत्री की तुलना में ज्यादा विदेश यात्राएँ की हैं लेकिन इन यात्राओं पर कुल खर्च लगभग उसी स्तर पर रहा है। कुछ मामलों में खर्च पहले से कम भी रहा है।

यह जानकारी राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह और CPI(M) सांसद डॉ. वी. शिवदासन के सवालों के जवाब में दी गई। दोनों सांसदों ने 2021 से अब तक प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं, हर यात्रा पर हुए खर्च, दूसरे देशों के साथ हुए समझौतों और इस दौरान भारत में आए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की जानकारी माँगी थी।

विदेश मंत्रालय के अनुसार, जुलाई 2026 तक प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं पर लगभग ₹74.5 करोड़ खर्च हुए। इन छह महीनों में ही उन्होंने मलेशिया, इजरायल, संयुक्त अरब अमीरात, नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे, इटली, फ्रांस, स्लोवाकिया, सेशेल्स, इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड सहित 13 देशों की यात्रा की।

जाहिर तौर पर, आलोचकों ने पूरी तस्वीर देखने के बजाय अलग-अलग विदेश यात्राओं पर हुए खर्च को ही मुद्दा बनाया। कुछ आलोचकों ने सवाल उठाया कि प्रधानमंत्री की यूरोप यात्रा के दौरान सिर्फ नॉर्वे जाने पर 17 करोड़ रुपए से ज्यादा कैसे खर्च हो गए। उन्होंने इस आँकड़े को ज्यादा खर्च और फिजूलखर्ची साबित करने की कोशिश की।

यह आलोचना प्रधानमंत्री की आधिकारिक विदेश यात्राओं की असली प्रकृति को नजरअंदाज करती है।

आँकड़ों के अंदर की बात

सरकार की ओर से बताए गए खर्च में सिर्फ प्रधानमंत्री को एक देश से दूसरे देश ले जाने वाली फ्लाइट का खर्च शामिल नहीं है। इसमें चार्टर्ड विमान, सुरक्षा व्यवस्था, पहले से भेजी जाने वाली टीमें, सरकारी प्रतिनिधिमंडल, संचार व्यवस्था, आने-जाने और रहने से जुड़ी व्यवस्थाएँ, प्रोटोकॉल और विदेश दौरों से जुड़े कई दूसरे खर्च भी शामिल होते हैं। कई देशों की यात्रा वाले दौरों में प्रधानमंत्री कई देशों के नेताओं से मुलाकात करते हैं और इसलिए ऐसे दौरों का खर्च सामान्य यात्रा से ज्यादा होना स्वाभाविक है।

अगर किसी एक देश की यात्रा पर हुए खर्च को अलग से देखा जाए और पूरे दौरे को नजरअंदाज कर दिया जाए, तो इससे खर्च की एक गलत तस्वीर बनती है। सबसे अहम बात यह है कि पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल से खर्च की तुलना करने पर यह आलोचना कमजोर पड़ जाती है।

संसद में उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक, डॉ. मनमोहन सिंह ने 2004 से 2014 के बीच 10 साल में 73 विदेश यात्राएँ की थीं। इन यात्राओं के दौरान केवल हवाई यात्रा पर करीब 795.18 करोड़ रुपए खर्च हुए थे। यहाँ ‘केवल हवाई यात्रा’ शब्द बेहद महत्वपूर्ण हैं।

तुलना, जो आलोचक नहीं कर पाते

प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं के लिए जारी किए गए आंकड़ों में चार्टर्ड फ्लाइट, सुरक्षा व्यवस्था, सरकारी प्रतिनिधिमंडल और यात्रा से जुड़ी दूसरी व्यवस्थाओं का खर्च भी शामिल है। इसके उलट, डॉ. मनमोहन सिंह की विदेश यात्राओं पर खर्च हुए 795.18 करोड़ रुपए का आँकड़ा सिर्फ हवाई यात्रा का खर्च बताता है।

इसमें सुरक्षा व्यवस्था, रहने का खर्च, आने-जाने की व्यवस्था, संचार सुविधाएँ, पहले से भेजी जाने वाली टीमें, प्रोटोकॉल और प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं के साथ होने वाले कई दूसरे खर्च शामिल नहीं हैं। इसलिए, डॉ. मनमोहन सिंह की विदेश यात्राओं पर हुआ वास्तविक कुल खर्च उपलब्ध 795.18 करोड़ रुपए से काफी ज्यादा रहा होगा।

डॉ. सिंह की कई व्यक्तिगत यात्राओं का खर्च प्रधानमंत्री मोदी की हालिया यात्राओं से भी अधिक रहा है

व्यक्तिगत दौरों की जाँच करने पर यह तुलना और भी अधिक स्पष्ट हो जाती है। डॉ. सिंह की जून 2012 में मैक्सिको और ब्राजील की यात्रा पर अकेले हवाई यात्रा पर लगभग ₹26.94 करोड़ का खर्च आया। उनकी 2010 में वाशिंगटन डीसी और ब्राजील की यात्रा पर विमान संचालन पर लगभग ₹22.70 करोड़ खर्च हुए जबकि उनकी नवंबर 2009 में अमेरिका और त्रिनिदाद और टोबैगो की यात्रा पर लगभग ₹21.27 करोड़ का खर्च आया।

2013 में अमेरिका की एक अन्य यात्रा में हवाई यात्रा पर लगभग ₹23.30 करोड़ का खर्च आया। इनमें से प्रत्येक आँकड़ा केवल विमान की लागत से संबंधित है।

इसके विपरीत, प्रधानमंत्री मोदी की हाल की कई बहु-देशीय यात्राओं का खर्च जिसमें सुरक्षा, रसद और आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल के खर्च शामिल हैं पिछली सरकार के हवाई यात्रा बिलों से कम या लगभग बराबर रहा है। इससे ही यह स्पष्ट हो जाता है कि व्यय के अलग-अलग आँकड़ों से सनसनीखेज निष्कर्ष निकालना बौद्धिक रूप से बेईमानी है। व्यापक तुलना भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

अधिक कूटनीति, लगभग उतना ही खर्च

2015 से 2025 के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 100 से ज्यादा विदेश यात्राएँ कीं। यह संख्या डॉ. मनमोहन सिंह की 10 साल में की गई 73 विदेश यात्राओं से काफी ज्यादा है। इसके बावजूद प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं पर कुल खर्च करीब 800 करोड़ रुपए रहने का अनुमान है।

दूसरे शब्दों में, प्रधानमंत्री मोदी ने ज्यादा बार विदेश यात्रा की, ज्यादा देशों का दौरा किया और कई देशों के नेताओं के साथ मुलाकात की लेकिन उनकी विदेश यात्राओं पर हुआ कुल खर्च उनके पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की सिर्फ हवाई यात्रा पर हुए 795.18 करोड़ रुपए के खर्च से भी कम है।

यह मानना मुश्किल है कि डॉ. मनमोहन सिंह की विदेश यात्राओं के दौरान सुरक्षा व्यवस्था, होटल, आने-जाने की व्यवस्था, सरकारी प्रतिनिधिमंडल और स्थानीय परिवहन पर कोई खर्च नहीं हुआ होगा। इसलिए साफ है कि UPA सरकार के दौरान प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर हुआ कुल खर्च सिर्फ हवाई यात्रा के उपलब्ध आँकड़े से काफी ज्यादा रहा होगा।

PM मोदी ने एक बड़ा खर्च खत्म किया: पत्रकारों के ‘सरकारी खर्च पर विदेश दौरों’ पर लगी रोक

प्रधानमंत्री मोदी के आलोचक अक्सर एक अहम अंतर का जिक्र नहीं करते। यह अंतर विदेश यात्राओं के दौरान प्रधानमंत्री के साथ जाने वाले आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल से जुड़ा है।

UPA सरकार के दौरान बड़े मीडिया संस्थानों के पत्रकारों का प्रधानमंत्री के साथ विदेश दौरों पर जाना आम बात थी। वे आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा होते थे। ऐसे में उनके लिए विशेष विमान में सीट और यात्रा से जुड़ी दूसरी व्यवस्थाएँ करनी पड़ती थीं।

2014 में प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद नरेंद्र मोदी ने इस व्यवस्था को खत्म कर दिया। अब पत्रकार आम तौर पर प्रधानमंत्री के साथ सरकारी विमान में विदेश यात्रा नहीं करते। अगर मीडिया संस्थान प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा को कवर करना चाहते हैं तो उन्हें अपनी तरफ से यात्रा और दूसरी व्यवस्थाएँ करनी होती हैं।

इस बदलाव से विदेश यात्राओं के खर्च का एक हिस्सा अपने आप कम हो गया, जो पिछली सरकारों के दौरान होता था। लेकिन दोनों सरकारों के बीच विदेश यात्रा के खर्च की तुलना करते समय आलोचक अक्सर इस अंतर का जिक्र नहीं करते।

इसके बजाय, वे प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं पर हुए खर्च के चुनिंदा आँकड़ों को सामने रखते हैं और उनके बड़े कूटनीतिक एजेंडे के साथ-साथ आज विदेश यात्राओं के आयोजन के तरीके में आए बदलाव को नजरअंदाज कर देते हैं।

कूटनीतिक महत्व को सिर्फ खर्च से नहीं मापा जा सकता

आलोचना में मोदी सरकार के दौरान भारत की बढ़ी हुई अंतरराष्ट्रीय सक्रियता को भी नजरअंदाज किया जा रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राएँ सिर्फ दो देशों के बीच संबंधों तक सीमित नहीं रही हैं। इनमें G20, क्वाड, BRICS, SCO, ASEAN, COP और कई दूसरे बहुपक्षीय सम्मेलनों में भारत की भागीदारी भी शामिल है। प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीतिक पहुँच उन क्षेत्रों तक भी बढ़ी है, जिन्हें पहले के दशकों में प्रधानमंत्रियों की ओर से अपेक्षाकृत कम ध्यान मिला था।

विदेश मंत्रालय के मुताबिक, अप्रैल 2021 से दिसंबर 2025 के बीच भारत को करीब 381.8 अरब अमेरिकी डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) मिला। यह कहना सही नहीं होगा कि पूरा निवेश सीधे प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं की वजह से आया। लेकिन अलग-अलग सरकारें हमेशा से मानती रही हैं कि बड़े स्तर की कूटनीति निवेश लाने, व्यापारिक रिश्ते मजबूत करने और भारत के रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाती है।

प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं के दौरान रक्षा सहयोग, नई तकनीक, सेमीकंडक्टर निर्माण, महत्वपूर्ण खनिज, ऊर्जा सुरक्षा, लोगों की आवाजाही से जुड़े समझौते, सप्लाई चेन और निवेश साझेदारी जैसे कई अहम मुद्दों पर बातचीत होती है। भू-राजनीतिक तनाव के दौर में दुनिया के दूसरे नेताओं के साथ सीधे बातचीत का मौका भी इन यात्राओं से मिलता है।

यह उस समय और महत्वपूर्ण हो जाता है जब भारत ग्लोबल साउथ की एक प्रमुख आवाज के तौर पर अपनी भूमिका मजबूत कर रहा है और साथ ही विकसित देशों के साथ अपने संबंध भी लगातार गहरे कर रहा है।

सार्वजनिक पैसे के इस्तेमाल पर सवाल उठाना लोकतंत्र में पूरी तरह जायज है। आखिर संसद का एक बड़ा काम सरकार से जवाबदेही सुनिश्चित करना ही है। लेकिन किसी भी खर्च की जाँच पूरी और एक जैसी जानकारी के आधार पर होनी चाहिए, न कि संदर्भ से अलग किए गए कुछ आँकड़ों के आधार पर।

विदेश मंत्रालय की ताजा जानकारी यह साबित नहीं करती कि प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं पर लापरवाही से बहुत ज्यादा पैसा खर्च किया गया। इसके उलट, आँकड़े बताते हैं कि भारत ने पहले की तुलना में ज्यादा सक्रिय विदेश नीति अपनाई है लेकिन खर्च मोटे तौर पर उसी स्तर पर रहा है और संभव है कि पिछली सरकार के मुकाबले कम भी रहा हो जबकि विदेश यात्राओं की संख्या काफी ज्यादा रही है।

दिलचस्प बात यह है कि संसद में सामने आए आँकड़े उन्हीं दावों को कमजोर करते नजर आते हैं, जिन्हें मोदी विरोधियों ने उठाया था। ये आँकड़े यह साबित करने के बजाय कि प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राएँ फिजूलखर्ची वाली हैं, यह दिखाते हैं कि उन्होंने ज्यादा देशों की यात्रा की, भारत की कूटनीतिक पहुँच बढ़ाई, सरकारी विमान में मीडिया प्रतिनिधिमंडल ले जाने जैसी अतिरिक्त लागत वाली पुरानी व्यवस्था को खत्म किया और इसके बावजूद सरकारी खर्च में कोई असामान्य बढ़ोतरी नहीं हुई।

जब इन आँकड़ों को चुनिंदा सुर्खियों के बजाय पूरी तस्वीर के साथ देखा जाता है, तो कहानी फिजूलखर्ची की नहीं बल्कि ज्यादा सक्रिय विदेश नीति और आधिकारिक यात्रा पर खर्च को अपेक्षाकृत नियंत्रित रखने की दिखाई देती है।

गाजा, बोर्ड ऑफ पीस और UNSC का स्याह भविष्य

अंतरराष्ट्रीय संबंधों और वैश्विक सुरक्षा के इतिहास में आज हम एक बहुत ही निर्णायक मोड़ पर खड़े हैं। दशकों तक द्वितीय विश्व युद्ध (World War II) के बाद बनी वैश्विक व्यवस्था का यह अटूट नियम माना जाता था कि जब भी दुनिया के किसी कोने में लड़ाई होगी या दो देशों के बीच भीषण हिंसा भड़केगी या कोई मानवीय संकट पैदा होगा, तो वहाँ कानून-व्यवस्था कायम करने के लिए संयुक्त राष्ट्र (UN) की नीली टोपी वाली सेना (UN Blue Helmets) ही भेजी जाएगी। लेकिन आज 21वीं सदी के तीसरे दशक में यह ढाँचा पूरी तरह से चरमराता हुआ दिखाई दे रहा है।

गाजा पट्टी में महीनों तक चले भीषण संघर्ष के बाद जब युद्ध के अंत और उसके बाद की सुरक्षा व्यवस्था (Post-War Security Setup) को लेकर विचार-विमर्श शुरू हुआ, तो संयुक्त राष्ट्र को लगभग दरकिनार कर दिया गया। गाजा में सुरक्षा व्यवस्था और पुनर्निर्माण की कमान अब अमेरिका की अगुवाई में एक विशेष प्रशासनिक संरचना (Special Administrative Structure) ‘बोर्ड ऑफ पीस‘ (Board of Peace) बनाई गई है, जो ‘अंतरराष्ट्रीय स्टेबलाइजेशन फोर्स’ (ISF – International Stabilization Force) के जरिए ये काम करेगी। हालाँकि UNSC के रिजोल्यूशन 2803 के जरिए इस इंटरनेशनल फोर्स को वैश्विक कानूनी वैधता प्रदान की गई है।

पारंपरिक रूप से ऐसे मामलों में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का रुख किया जाता था और यूएन पीसकीपिंग फोर्स भेजी जाती थी। लेकिन गाजा के मामले में स्थितियाँ बिल्कुल अलग हैं। जैसे-

इजरायल का अविश्वास: इजरायल लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र और उसकी एजेंसियों (जैसे UNRWA) पर पक्षपात का आरोप लगाता रहा है। वह अपनी सीमाओं के पास यूएन सेना की मौजूदगी को पर्याप्त सुरक्षा गारंटी नहीं मानता।

वीटो पावर की रुकावट: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमेरिका, रूस और चीन जैसी महाशक्तियों के बीच मतभेद के कारण किसी सर्वसम्मत यूएन मिशन पर सहमति बनना लगभग असंभव हो जाता है।

‘बोर्ड ऑफ पीस’ और बहुराष्ट्रीय बल: इसी गतिरोध के हल के रूप में अमेरिका और उसके सहयोगी अरब देशों के साथ मिलकर एक ऐसी व्यवस्था पर चर्चा कर रहे हैं जहाँ एक नागरिक-सुरक्षा बोर्ड बनाया जाए। इसमें अमेरिका, मित्र अरब देश (जैसे मिस्र, यूएई, कतर) और कुछ अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ शामिल हों, जो गाजा में कानून-व्यवस्था, राहत सामग्री के वितरण और सुरक्षा की निगरानी करें।

यह स्पष्ट संकेत है कि जब यूएन किसी स्थिति में सर्वसम्मति नहीं बना पाता, तो क्षेत्रीय व वैश्विक शक्तियाँ अपना खुद का ‘थर्ड पार्टी’ ढाँचा तैयार कर लेती हैं और जरूरत के हिसाब से उसे UN का कानूनी ढाँचा भी पहना दिया जाता है।

बहरहाल, इन सबके बीच ये जानना अहम है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अगुवाई में ये बोर्ड ऑफ पीस क्यों बनाया गया? इसकी जरूरत क्यों पड़ी? क्यों यहाँ पर सीधे UN ने हस्तक्षेप करने से कदम पीछे खींच लिए? क्या ऐसी व्यवस्थाएँ अतीत में हुई हैं और अगर हुई हैं तो कहाँ-कहाँ हुई हैं, ये भी जानना जरूरी हो जाता है। इस आर्टिकल में हम इस पूरे मुद्दे को विस्तार से समझेंगे।

बोर्ड ऑफ पीस के बारे में जानिए

दरअसल, गाजा पट्टी में इजरायल और हमास के बीच लंबे समय तक चले भीषण संघर्ष के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठकर आया कि युद्ध रुकने के बाद वहाँ सुरक्षा कौन संभालेगा? ऐसे में डोनाल्ड ट्रंप की अगुवाई में बोर्ड ऑफ पीस (Board of Peace – BoP) का गठन किया गया। यह एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है, जिसका मुख्य उद्देश्य दुनिया भर के संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों और खासकर गाजा पट्टी (Gaza Strip) में शांति बहाल करना, बुनियादी ढाँचे का पुनर्निर्माण करना और स्थिरता लाना है।

बोर्ड ऑफ पीस पर डोनाल्ड ट्रंप का बयान (फोटो साभार: boardofpeace . org)

सितंबर 2025 में बोर्ड ऑफ पीस नाम के संगठन का प्रस्ताव रखा गया था। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UN Security Council Resolution 2803) ने गाजा शांति योजना की निगरानी और वहाँ सुरक्षा बल तैनात करने के लिए इस बोर्ड को अपनी स्वीकृति दी। और फिर 22 जनवरी 2026 को स्विट्जरलैंड के दावोस में ‘विश्व आर्थिक मंच’ (World Economic Forum) के दौरान 20 से अधिक देशों के प्रतिनिधियों ने इसके संस्थापक चार्टर (Charter) पर हस्ताक्षर किए। इस समय अमेरिका के अलावा 27 देश इसके चार्टर पर हस्ताक्षर कर चुके हैं।

इसमें कौन-कौन से देश शामिल हैं?

बोर्ड ऑफ पीस में 27 से अधिक देश संस्थापक/पूर्ण सदस्य के रूप में जुड़े हैं, जिनमें शामिल हैं- अमेरिका, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कतर, तुर्की, इजरायल, मिस्र, अर्जेंटीना, इंडोनेशिया, पाकिस्तान और कजाकिस्तान जैसे देश। स्थायी सदस्यता बनाए रखने के लिए सदस्य देशों से 1 अरब अमेरिकी डॉलर का योगदान देने की अपेक्षा रखी गई है, या फिर हर तीन साल में उनकी सदस्यता का रिन्युअल होगा।

बोर्ड ऑफ पीस के फाउंडिंग मेंबर

इसका नेतृत्व और सांगठनिक ढाँचा कैसा है?

बोर्ड ऑफ पीस के चार्टर के मुताबिक, डोनाल्ड ट्रंप को जीवनभर के लिए इसका अध्यक्ष (Chairman for life) नामित किया गया है। नए सदस्यों को आमंत्रित करने या संगठन के नियमों में बदलाव करने का सर्वाधिकार उनके पास है। इसका मुख्यालय वाशिंगटन डी.सी. (अमेरिका) में स्थित है। संगठन में नीतिगत और कूटनीतिक फैसले लेने के लिए एक एग्जीक्यूटिव बोर्ड बनाया गया है। इसमें पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर, पूर्व संयुक्त राष्ट्र दूत निकोले म्लादेनोव, जेरेड कुश्नर और स्टीव विटकॉफ जैसे प्रमुख चेहरे शामिल हैं।

इस संगठन के मुख्य कार्य और इसकी जिम्मेदारियाँ क्या हैं?

युद्ध से प्रभावित गाजा इलाके का पुनर्निर्माण करना: इजरायल-हमास युद्ध के बाद गाजा को चलाने और स्थानीय सेवाओं को बहाल करने के लिए नेशनल कमेटी फॉर द एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ गाजा (NCAG) का गठन किया गया है। NCAG में गैर-राजनीतिक और तकनीकी विशेषज्ञ (Technocrats) शामिल हैं, जो गाजा में रोजमर्रा के काम संभालते हैं। वहीं, बोर्ड ऑफ पीस NCAG के ऊपर मुख्य सुपरवाइजरी बॉडी (निगरानी संस्था) के रूप में काम करता है। बोर्ड ऑफ पीस के तहत नियुक्त हाई रिप्रेजेंटेटिव (जैसे निकोले म्लादेनोव) इस प्रशासनिक समिति के कामकाज को निर्देशित और नियंत्रित करते हैं। इसी के जरिए गाजा में इमारतों, सड़कों और बुनियादी सुविधाओं के पुनर्निमाण का काम किया जाएगा।

सुरक्षा और शांति स्थापना: गाजा में शांति बनाए रखने के लिए बोर्ड ऑफ पीस के पास सुरक्षा संबंधी कई अधिकार हैं। इसके तहत बोर्ड ऑफ पीस को गाजा में लगभग 20,000 सैनिकों का एक अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा बल यानी अंतरराष्ट्रीय शांति सेना (ISF) को तैनात करने का जिम्मा मिला है, जिसमें अल्बानिया, इंडोनेशिया, कजाकिस्तान, कोसोवो और मोरक्को जैसे देश सैनिक भेज रहे हैं।

इंटरनेशनल फोर्स के डिप्लॉयमेंट का ब्लू प्रिंट

इसके अलावा स्थानीय पुलिस को भी प्रशिक्षित किया जाएगा, जिसमें मिस्र और जोर्डन जैसे देश लगभग 12,000 गाजा पुलिस कर्मियों को प्रशिक्षित करने पर सहमत हुए हैं।

गाजा में हमास और अन्य सशस्त्र गुटों के सैन्य ढाँचे को पूरी तरह से समाप्त करना और हथियार आत्मसमर्पण कराना भी बोर्ड ऑफ पीस के प्रमुख लक्ष्यों में शामिल है। जिसमें अंतरराष्ट्रीय शांति सेना (ISF) मदद करेगी।

मानवीय सहायता पहुँचाने का जिम्मा: युद्ध में तबाह हुए गाजा के भौतिक और आर्थिक पुनर्निर्माण की जिम्मेदारी भी इसी बोर्ड के पास है। इसके तहत गाजा के पुनर्निर्माण के लिए अरब देशों और अन्य सदस्य देशों से अरबों डॉलर की फंडिंग जुटाने की योजना बनाई गई है।
इस फंडिंग के जरिए बिजली, पानी, अस्पताल, स्कूल, सड़कें और आवासीय भवनों का नए सिरे से निर्माण किया जाएगा। इसके साथ ही गाजा के प्रभावित नागरिकों तक भोजन, दवाइयाँ और जरूरी सामान सुचारू रूप से पहुँचाने के लिए बॉर्डर क्रॉसिंग (जैसे रफाह बॉर्डर) एक्टिविटी को भी नियंत्रित करना इसका लक्ष्य है।

कम शब्दों में कहें तो बोर्ड ऑफ पीस गाजा में ‘निरीक्षक, सुरक्षा प्रदाता और फंड मैनेजर’ तीनों भूमिकाएँ एक साथ निभा रहा है। इसका उद्देश्य गाजा में राजनीतिक शून्यता (Governance Vacuum) को भरना, हमास के नियंत्रण को समाप्त करना और एक अंतरराष्ट्रीय मॉडल के तहत गाजा का पुनर्विकास करना है।

हालाँकि इससे जुड़े कई सवाल भी हैं, क्योंकि आलोचकों का मानना है कि संगठन की अधिकांश शक्तियाँ सिर्फ अध्यक्ष (डोनाल्ड ट्रंप) के पास केंद्रित हैं। वहीं, इस संगठन पर संयुक्त राष्ट्र की भूमिका और महत्व को कम करने की कोशिश का भी आरोप है। इसके अलावा इस संगठन के फंड प्रबंधन और पारदर्शिता को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय मीडिया और विशेषज्ञों द्वारा सवाल उठाए गए हैं।

बोर्ड ऑफ पीस ने किया साफ, पीली रेखा से सबसे आखिर में पीछे हटेगा इजरायल

बोर्ड ऑफ पीस (Board of Peace) के ऑफिसियल एक्स हैंडल पर बताया गया है कि इजरायल के प्रधानमंत्री और अन्य अहम लोगों के बीच सोमवार (3 जुलाई 2026) को अहम बैठक हुई। इस बैठक में उच्च प्रतिनिधि निकोले म्लादेनोव और बोर्ड ऑफ पीस की टीम ने इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनकी टीम के साथ गंभीरता से चर्चा की, जिसके बाद उसके (बोर्ड ऑफ पीस) और मध्यस्थ देशों (अमेरिका, मिस्र, कतर और तुर्की) के प्रयासों से हमास और गाजा के सभी सशस्त्र समूहों के पूर्ण निशस्त्रीकरण (हथियार डालने) पर बड़ा समझौता हुई है।

इस बैठक के बाद साफ कर दिया गया है कि गाजा पट्टी में हथियारों को पूरी तरह खत्म करना और बंदूक के साये वाले शासन से हटाकर आम नागरिक प्रशासन की ओर बढ़ना ही इसका लक्ष्य है। इस लक्ष्य तक पहुँचना एक प्रक्रिया होगी और उस प्रक्रिया का पूरा ढाँचा काम के अगले चरण में तय किया जाएगा।

इसके साथ ही ये साफ कर दिया गया कि इजराइली सेना (IDF) की येलो लाइन के पार वापसी केवल तभी होगी जब हथियारों को हटाने की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी, जैसा कि हमास ने मध्यस्थों से वादा किया था। यह नियम छोटे हथियारों, भारी हथियारों और सुरंगों सभी पर समान रूप से लागू होता है।

इस पूरे समझौते को लागू करने की निगरानी ‘अंतरराष्ट्रीय स्टेबलाइजेशन फोर्स’ (ISF) और ‘इम्प्लीमेंटेशन वेरिफिकेशन कमेटी’ द्वारा की जाएगी, जिसमें अमेरिका और बोर्ड ऑफ पीस दोनों शामिल हैं। इसे पूरी तरह से लागू करने की दिशा में आगे की प्रगति इस बात पर निर्भर करेगी कि दोनों पक्ष सहमत हुए तंत्र के तहत अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करें।

क्यों पड़ी बोर्ड ऑफ पीस की जरूरत?

गाजा को लेकर चल रहे इस पूरे घटनाक्रम ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में एक पुरानी लेकिन बेहद गंभीर बहस को फिर से जिंदा कर दिया है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या संयुक्त राष्ट्र की शांति सेनाओं (UN Peacekeeping Operations) का दौर अब हमेशा के लिए धीमा पड़ चुका है? गाजा से लेकर काकेशस के बर्फीले पहाड़ों तक, कैरिबियाई सागर के द्वीपों से लेकर अफ्रीका के जंगलों और मध्य पूर्व के तपते रेगिस्तानों तक, आज संयुक्त राष्ट्र की औपचारिक शांति सेनाओं के बजाय ‘थर्ड पार्टी Force’ (तीसरे पक्ष के सुरक्षा बल) या शक्तिशाली देशों की अगुवाई वाले बहुराष्ट्रीय गठबंधनों का दबदबा बढ़ता जा रहा है।

फोटो साभार: यूएन पीसकीपिग मिशन वेबसाइट

यह सिर्फ सैनिकों की अदला-बदली का मामला नहीं है, बल्कि यह पूरी दुनिया के शक्ति-संतुलन (Power Dynamics), क्षेत्रीय प्रभुत्व, स्वायत्तता (Autonomy) और संप्रभुता के खेल का एक नया अध्याय है।

इसे समझने के लिए हमें उस मूलभूत तंत्र को देखना होगा जिसने लगभग सात दशकों तक दुनिया को संभाला। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के तहत सुरक्षा परिषद (UN Security Council) को यह अधिकार दिया गया था कि वह वैश्विक शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए सदस्य देशों के सैनिकों को मिलाकर एक निष्पक्ष शांति सेना का गठन करे। इन शांति सैनिकों की मुख्य पहचान उनकी नीली टोपियाँ और निष्पक्षता का वादा हुआ करता था। लेकिन आज का कड़वा सच यह है कि संयुक्त राष्ट्र की यह निष्पक्षता और इसकी निर्णय लेने की क्षमता, महाशक्तियों की अपनी आपसी गुटबाजी और वीटो (Veto) पावर के अंधाधुंध इस्तेमाल की बलि चढ़ चुकी है।

दरअसल, जब भी दुनिया में कोई बड़ा संकट खड़ा होता है, तो सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्य (अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस) आपस में ही उलझ जाते हैं। एक देश प्रस्ताव लाता है और दूसरा उस पर वीटो लगा देता है। इस राजनीतिक गतिरोध (Veto Gridlock) के कारण जब संकटग्रस्त क्षेत्रों में निर्दोष लोग मारे जा रहे होते हैं, तब यूएन का तंत्र कागजी प्रक्रियाओं और अंतहीन बहसों में फंसा रह जाता है। इसी लाचारी ने दुनिया के अलग-अलग देशों और क्षेत्रीय संगठनों को यूएन के बाहर जाकर अपने विकल्प ढूँढने के लिए मजबूर किया है।

गाजा पट्टी में बन रहा नया ढाँचा इस बात का साफ संदेश है कि जब वैश्विक संस्थान काम करने में नाकाम साबित होते हैं, तो क्षेत्रीय शक्तियाँ और वैश्विक महाशक्तियाँ अपना खुद का ‘थर्ड पार्टी’ तंत्र विकसित कर लेती हैं। यह मॉडल त्वरित फैसले लेने और कड़े कदम उठाने में बेहद सक्षम माना जा रहा है, हालाँकि इसके साथ ही इस पर यह आरोप भी लग रहे हैं कि यह अमेरिका और उसके करीबियों के कूटनीतिक और भू-राजनीतिक हितों को साधने का एक जरिया मात्र है। जैसा पहले भी होता रहा है।

रूस का ‘पीसकीपिंग’ मॉडल

गाजा में अमेरिका और उसके सहयोगियों की यह पहल कोई अनोखी या पहली घटना नहीं है। अगर हम वैश्विक नक्शे पर थोड़ा पूर्व की ओर नजर दौड़ाएँ और पूर्वोत्तर यूरोप तथा पूर्व सोवियत संघ (Post-Soviet Space) के देशों को देखें, तो रूस पिछले तीन दशकों से बिना किसी संयुक्त राष्ट्र जनादेश के अपना एक अलग ही ‘पीसकीपिंग’ मॉडल चला रहा है।

रूस का यह मॉडल सुरक्षा देने से ज्यादा उस इलाके पर अपना राजनीतिक और सैन्य दबदबा (Sphere of Influence) बनाए रखने का एक कारगर औजार रहा है। रूस जिन भी क्षेत्रों में अपनी शांति सेनाएँ भेजता है, वहाँ न तो यूएन का कोई नियंत्रण होता है और न ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय की सीधी दखलंदाजी। इन सभी मामलों में एक बात समान है वहाँ या तो दो देशों के बीच जमीन को लेकर पुराना विवाद है, या फिर किसी देश के भीतर का कोई हिस्सा खुद को आजाद घोषित करके स्वायत्तता (Autonomy) की माँग कर रहा है।

रूस के शांति सैनिक किन महत्वपूर्ण जगहों पर हैं तैनात
रूस के शांति सैनिक किन महत्वपूर्ण जगहों पर हैं तैनात, स्रोत-IISS, EPRC, CRISIS Group (ये ग्राफ ओपन सोर्स रिपोर्टिंग के आधार पर AI ChatGPT से बनाया गया है)

1-नागोर्नो-काराबाख (आर्मेनिया और अजरबैजान)

रूस के इस स्वतंत्र पीसकीपिंग मॉडल का सबसे प्रमुख उदाहरण नागोर्नो-काराबाख (Nagorno-Kara-bakh) का इलाका रहा है। यह क्षेत्र दक्षिण काकेशस के पहाड़ों में स्थित है और इसको लेकर दो पड़ोसी देशों आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच दशकों से खूनी जंग चलती आ रही है।

1990 के दशक में सोवियत संघ के पतन के बाद से ही यह क्षेत्र आर्मेनियाई मूल के लोगों के नियंत्रण में था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून के हिसाब से इसे अजरबैजान का हिस्सा माना जाता था। 2020 में जब दोनों देशों के बीच फिर से भीषण युद्ध भड़का, तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सिर्फ बयानबाजी करती रह गई। तब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने व्यक्तिगत रूप से दखल दिया और दोनों पक्षों को मेज पर लाकर एक युद्धविराम समझौते पर दस्तखत करवाए।

इस समझौते के तहत रूस ने बिना किसी यूएन मंजूरी के तुरंत अपने 2,000 से ज्यादा सशस्त्र सैनिकों और बख्तरबंद गाड़ियों को नागोर्नो-काराबाख में ‘शांति सैनिक’ बनाकर तैनात कर दिया। रूस ने आर्मेनिया और नागोर्नो-काराबाख को जोड़ने वाले लाचिन कॉरिडोर (Lachin Corridor) का पूरा नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया। यह पूरी तरह से 2022 तक रूस का एकतरफा और क्षेत्रीय अभियान था, जहाँ रूसी सेना ही कानून, सुरक्षा और सीमा की अंतिम फैसलेदार बन गई। हालाँकि साल 2024 में अजरबैजान के इस पूरे इलाके पर कब्जे के बाद रूस ने अपनी सेना पूरी तरह से वापस बुला ली और इस पर पूरी तरह से अजरबैजानी सैनिकों का कब्जा हो गया। ये इलाका आधिकारिक तौर पर अजरबैजान का ही है।

2- ट्रांसनिस्ट्रिया (मॉल्डोवा)

इसी तरह का एक और दिलचस्प और उलझा हुआ मामला पूर्वी यूरोप के छोटे से देश मॉल्डोवा का है, जहाँ ‘ट्रांसनिस्ट्रिया’ (Transnistria) नाम का एक संकरा भूभाग स्थित है। मॉल्डोवा से अलग होकर अपनी आजादी का दावा करने वाला क्षेत्र ‘ट्रांसनिस्ट्रिया’ रूस समर्थक माना जाता है। यहाँ 1990 के दशक से ही रूस ने अपने ‘शांति सैनिक‘ तैनात कर रखे हैं।

दरअसल, 1990 के दशक की शुरुआत में जब मॉल्डोवा सोवियत संघ से अलग हुआ, तो डैन्यूब नदी के किनारे बसे ट्रांसनिस्ट्रिया क्षेत्र ने रूस के समर्थन से खुद को मॉल्डोवा से आजाद घोषित कर दिया। वहाँ एक छोटा सा सशस्त्र संघर्ष हुआ, जिसके बाद रूस ने तुरंत वहाँ अपने ‘शांति सैनिकों’ (Peacekeepers) की तैनाती कर दी। आज तीन दशक बीत जाने के बाद भी लगभग 1,500 रूसी सैनिक शांति बनाए रखने के नाम पर ट्रांसनिस्ट्रिया में डटे हुए हैं।

मॉल्डोवा की चुनी हुई सरकार और अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसे मॉल्डोवा की संप्रभुता (Sovereignty) पर सीधा कब्जा मानते हैं और बार-बार रूसी सैनिकों को हटाने की माँग करते रहे हैं। लेकिन रूस ‘थर्ड पार्टी फोर्स’ की आड़ में इस इलाके का इस्तेमाल मॉल्डोवा को पश्चिमी देशों और यूरोपीय संघ (EU) के करीब जाने से रोकने के लिए एक कूटनीतिक मोहरे के रूप में करता आ रहा है।

3- अबखाजिया और साउथ ओसेशिया (जॉर्जिया)

रूस के इस मॉडल का तीसरा बड़ा उदाहरण जॉर्जिया के दो क्षेत्रों अबखाजिया (Abkhazia) और साउथ ओसेशिया (South Ossetia) में देखने को मिलता है। 1990 के दशक के शुरुआती संघर्षों के बाद रूस ने खुद को इन दोनों अलगाववादी क्षेत्रों में शांति का मुख्य संरक्षक घोषित कर दिया था।

साल 2008 में जब जॉर्जिया की सरकार ने साउथ ओसेशिया पर फिर से अपना नियंत्रण कायम करने की कोशिश की, तो रूस ने अपने ‘शांति सैनिकों पर हमले’ को बहाना बनाकर जॉर्जिया पर हमला कर दिया और सिर्फ पाँच दिनों में जॉर्जियाई सेना को खदेड़ दिया। इसके तुरंत बाद रूस ने इन दोनों क्षेत्रों को स्वतंत्र देशों के रूप में मान्यता दे दी और वहाँ अपने स्थायी सैन्य अड्डे और सुरक्षा बल तैनात कर दिए।

इन तीनों ही मामलों से यह बिल्कुल साफ हो जाता है कि रूस के लिए ‘शांति सेना’ का मतलब वैश्विक शांति नहीं, बल्कि अपने पड़ोस में अपनी सामरिक मौजूदगी को कानूनी और नैतिक जामा पहनाना है। हम इसमें क्रीमिया और यूक्रेन से जुड़ा मामला जोड़ सकते हैं, लेकिन वो सीधे युद्ध और कब्जे का मामला बन चुका है। हालाँकि क्रीमिया में रूसी हस्तक्षेप शांति स्थापना के नाम पर ही शुरू हुआ था।

दुनिया में अन्य प्रमुख ‘गैर-यूएन’ (Non-UN) सुरक्षा बल

दुनिया भर के नक्शे पर नजर डालें तो हमें यह समझ में आएगा कि संयुक्त राष्ट्र के बाहर सुरक्षा व्यवस्था चलाने का यह चलन सिर्फ अमेरिका या रूस तक ही सीमित नहीं है। दुनिया के हर महाद्वीप में संवेदनशील सुरक्षा क्षेत्रों में क्षेत्रीय संगठनों, विशेष गठबंधनों या बहुराष्ट्रीय टास्क फोर्स ने यूएन की जगह ले ली है।

नीचे दिए गए टेबल के आधार पर यह स्पष्ट समझा जा सकता है कि दुनिया के किन-किन हिस्सों में गैर-यूएन बल अपनी सेवाएँ दे रहे हैं और उनके पीछे कौन से संगठन या देश खड़े हैं-

सिनाई प्रायद्वीप में MFO की तैनाती

इनमें से सबसे पुराने और सफल गैर-यूएन मिशनों में से एक सिनाई प्रायद्वीप में स्थित MFO (Multinational Force and Observers) है। 1979 में जब अमेरिका के राष्ट्रपति जिमी कार्टर की मध्यस्थता में मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादात और इजरायल के प्रधानमंत्री मेनाकेम बेगिन ने ऐतिहासिक ‘कैम्प डेविड समझौते’ पर दस्तखत किए, तो शर्त यह थी कि इजरायल सिनाई प्रायद्वीप से अपनी सेना हटा लेगा और वहाँ एक निष्पक्ष अंतरराष्ट्रीय बल तैनात किया जाएगा जो दोनों देशों के बीच सीमा पर नजर रखेगा।

शुरुआती योजना के अनुसार यह काम यूएन शांति सेना को सौंपा जाना था। लेकिन उस दौर में शीत युद्ध (Cold War) चरम पर था और सोवियत संघ ने यह साफ कर दिया कि वह सुरक्षा परिषद में ऐसे किसी भी प्रस्ताव पर वीटो लगा देगा जो अमेरिका की मध्यस्थता से हुए समझौते को मान्यता देता हो।

यूएन के इस राजनीतिक गतिरोध को देखते हुए अमेरिका, मिस्र और इजरायल ने एक अभूतपूर्व रास्ता निकाला। उन्होंने यूएन की लालफीताशाही से हटकर एक स्वतंत्र, गैर-यूएन अंतरराष्ट्रीय बल का गठन किया, जिसे MFO का नाम दिया गया। इसका मुख्यालय रोम में बनाया गया और इसकी कमान अमेरिकी नागरिक और सैन्य अधिकारियों को सौंपी गई।

आज भी चार दशकों से अधिक समय बीत जाने के बाद, सिनाई के रेगिस्तान में अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, फ्रांस और न्यूजीलैंड जैसे दर्जनों देशों के सैनिक तैनात हैं। MFO ने बिना किसी यूएन हस्तक्षेप के मिस्र और इजरायल जैसी दो पारंपरिक विरोधी ताकतों के बीच शांति को आज तक सफलतापूर्वक बनाए रखा है, जो यह साबित करता है कि गैर-यूएन मॉडल बेहद प्रभावी हो सकते हैं।

कोसोवा में नाटो की तैनाती

दूसरा बड़ा उदाहरण यूरोप के बालकन क्षेत्र में स्थित कोसोवो का है। 1990 के दशक के अंत में जब सर्बिया की सेना और कोसोवो के अल्बानियाई मूल के अलगाववादियों के बीच भीषण जातीय हिंसा और नरसंहार शुरू हुआ, तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद रूस के रुख के कारण कोई सख्त फैसला नहीं ले सकी।

इसके जवाब में नाटो (NATO) ने यूएन की औपचारिक मंजूरी का इंतजार किए बिना सर्बियाई ठिकानों पर व्यापक हवाई हमले शुरू कर दिए। सर्बियाई सेना को पीछे हटने पर मजबूर करने के बाद नाटो ने जून 1999 में कोसोवो में अपनी शांति सेना तैनात कर दी, जिसे KFOR (Kosovo Force) के नाम से जाना जाता है।

कोसोवो में नाटो के सैनिक (फोटो साभार: KFOR Offical Website)

हालाँकि बाद में यूएन ने इसे एक प्रस्ताव के जरिए काम करने की अनुमति दी, लेकिन KFOR की पूरी सैन्य कमान, रणनीति और सैनिकों की तैनाती पूरी तरह से नाटो के जनरलों के हाथ में रही है। KFOR आज भी कोसोवो में शांति बनाए रखने और सर्बिया के साथ उसकी विवादित सीमाओं पर तनाव को नियंत्रित करने का काम कर रही है।

कैरिबियाई देश हैती का अनोखा उदाहरण

कैरिबियाई देश हैती (Haiti) की स्थिति और भी ज्यादा अनोखी है। 2021 में हैती के राष्ट्रपति जोवेनेल मोइस की हत्या के बाद देश में पूरी तरह से अराजकता फैल गई। राजधानी पोर्ट-ओ-प्रिंस के 80 प्रतिशत से ज्यादा हिस्से पर हिंसक आपराधिक गिरोहों (Gangs) का कब्जा हो गया और सरकार लगभग ढह गई।

हैती के अंतरिम नेतृत्व ने बार-बार अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मदद की गुहार लगाई। लेकिन अतीत में हैती में चलाए गए यूएन शांति अभियानों (MINUSTAH) का अनुभव बहुत खराब रहा था, जहाँ यूएन सैनिकों पर हैजा बीमारी फैलाने और मानवाधिकारों के उल्लंघन के गंभीर आरोप लगे थे। इस वजह से न तो यूएन एक और पारंपरिक शांति मिशन भेजना चाहता था और न ही कोई पश्चिमी देश अपने सैनिक भेजने को तैयार था।

ऐसी स्थिति में एक नया प्रयोग किया गया। सुरक्षा परिषद ने एक प्रस्ताव पारित करके एक ‘थर्ड पार्टी’ सुरक्षा मिशन को मंजूरी दी, लेकिन कमान खुद के हाथ में लेने के बजाय इसे केन्या की अगुवाई में एक बहुराष्ट्रीय सुरक्षा सहायता मिशन (MSS – Multinational Security Support Mission) का रूप दे दिया।

केन्या ने इस मिशन का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी उठाई और अपनी सशस्त्र पुलिस टुकड़ियों को हैती भेजा, जिसमें बहामास, जमैका, बारबाडोस और बांग्लादेश जैसे अन्य देशों ने भी अपने सुरक्षाकर्मी जोड़े। यह मॉडल दर्शाता है कि यूएन अब सीधे मोर्चे पर उतरने के बजाय क्षेत्रीय या इच्छुक देशों को ‘आउटसोर्स’ (Outsource) करके सुरक्षा अभियानों की कमान सौंप रहा है।

गैर UN फोर्स की तैनाती, डाटा-NARO, UNSC, IISS etc (ये ग्राफ ओपन सोर्स रिपोर्टिंग के आधार पर AI ChatGPT से बनाया गया है)

अफ्रीका में अफ्रीकी यूनियन ने उठाए गंभीर कदम, सोमालिया में कई देशों की फौज रही तैनात

अफ्रीका महाद्वीप में अफ्रीकी संघ (African Union – AU) ने अपनी सुरक्षा चिंताओं को खुद संभालने की दिशा में बड़े कदम उठाए हैं। सोमालिया में कट्टरपंथी इस्लामी आतंकी गुट अल-शबाब (Al-Shabaab) के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए यूएन सेना के बजाय अफ्रीकी संघ का मिशन ATMIS (African Union Transition Mission in Somalia) तैनात किया गया है। इसे UNSC ने रिजोल्यूशन 2767 के जरिए मान्यता दी है।

इस मिशन में युगांडा, केन्या, बुरुंडी, इथियोपिया और जिबूती जैसे अफ्रीकी पड़ोसी देशों के सैनिक शामिल हैं। अफ्रीकी देशों का मानना है कि बाहरी पश्चिमी या यूएन सैनिक स्थानीय भाषा, संस्कृति और भूगोल को नहीं समझते, इसलिए स्थानीय और क्षेत्रीय समस्याओं का समाधान क्षेत्रीय ताकतों के पास ही होना चाहिए।

दुनिया भर में ‘थर्ड पार्टी Force’ और ‘मिक्स्ड Force’ की उपस्थिति पहले से

जब हम ‘थर्ड पार्टी Force’ की बात करते हैं, तो इसमें सिर्फ बहुराष्ट्रीय संगठन या रूस-अमेरिका जैसी महाशक्तियाँ ही शामिल नहीं हैं। आज दुनिया में ऐसे दर्जनों संवेदनशील इलाके हैं जहां ‘मिक्स्ड फोर्स’ (Mixed Forces) या ‘द्विपक्षीय/त्रिस्तरीय सुरक्षा बल’ (Bilateral & Tripartite Forces) तैनात हैं।

इसका मतलब यह है कि दो या तीन देश आपस में एक विशेष सुरक्षा समझौता करते हैं और किसी तीसरे देश के क्षेत्र में या अपनी साझी विवादित सीमाओं पर संयुक्त रूप से सेनाएँ या पुलिस तैनात कर देते हैं। इसमें यूएन का दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं होता।

दुनिया भर में इस प्रकार की ‘थर्ड पार्टी’ तथा ‘मिक्स्ड/द्विपक्षीय’ सैन्य तैनाती के कुछ मामलों के बारे में हम आपको बता रहे हैं।

सीरिया में ‘थर्ड पार्टी’ ताकत का खेल: US, रूस, तुर्की और ईरान का अखाड़ा

सीरिया का संकट इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि जब किसी देश में गृहयुद्ध भड़कता है और संयुक्त राष्ट्र (UN) मूकदर्शक बन जाता है, तो वहाँ ‘थर्ड पार्टी’ सैन्य शक्तियाँ किस तरह अपना कब्जा और वर्चस्व कायम कर लेती हैं।

दिसंबर 2024 में बशर अल-असद के दशकों पुराने शासन के पतन के बाद सीरिया एक बड़े ऐतिहासिक बदलाव से गुजरा है। असद के जाने के बाद अहमद अल-शरा (पूर्व एचटीएस प्रमुख) के नेतृत्व में एक संक्रमणकालीन सरकार (Transitional Government) का गठन तो हुआ, लेकिन सीरिया में शांति अभी भी बेहद नाजुक मोड़ पर खड़ी है।

आज सीरिया की स्थिति 3 मुख्य मोर्चों पर बंटी हुई है-

सत्ता और अन्य विरोधी गुटों में टकराव: नए संक्रमणकालीन प्रशासन ने सीरियाई सेना में विद्रोही गुटों को विलय करने का प्रयास किया है, लेकिन कुर्द-नेतृत्व वाली ‘सीरियाई डेमोक्रेटिक फोर्सेस’ (SDF) और दमिश्क सरकार के बीच अक्सर हिंसक झड़पें और स्वायत्तता की लड़ाई जारी है।

  • सीरिया में असद शासन के पतन के बाद भी रूस के पास ‘हमीमिम’ एयरबेस और ‘तारतूस’ नौसैनिक अड्डे की रणनीतिक मौजूदगी का आधार है, जिन्हें वह अपने भू-राजनीतिक हितों के लिए खाली नहीं करना चाहता। वहीं सीरिया की असद सरकार के गिरने के बाद से यहाँ ईरान को बहुत बड़ा झटका लगा और उसे लगातार बैकफुट पर आना पड़ा।
  • इसी तरह से तुर्की भी है। पूर्वोत्तर सीरिया में अमेरिका और उत्तर में तुर्की की सेनाएँ अपने-अपने ‘थर्ड पार्टी’ सुरक्षा हितों और आतंकवाद-विरोधी अभियानों के नाम पर लगातार सक्रिय हैं। इसमें उत्तर-पश्चिम सीरिया (इदलिब और उत्तरी अलेप्पो) में तुर्की की सेना ने अपने सुरक्षा क्षेत्र (Safe Zone) बनाए हुए हैं। यहाँ तुर्की की सेना ने स्थानीय ‘सीरियन नेशनल आर्मी’ (SNA) के साथ मिलकर एक मिक्स्ड पुलिसिंग और सैन्य ढाँचा तैयार किया है ताकि कुर्द लड़ाकों को अपनी सीमाओं से दूर रखा जा सके और सीरियाई शरणार्थियों को वापस बसाया जा सके।
  • वहीं, उत्तर-पूर्वी सीरिया के तेल समृद्ध इलाकों और अल-तन्फ (Al-Tanf) बेस पर लगभग 900 से अधिक अमेरिकी सैनिक तैनात रहे हैं। ये सैनिक सीरियन डेमोक्रेटिक फोर्सेस (SDF – जो मुख्य रूप से कुर्द लड़ाके हैं) के साथ मिलकर ‘मिक्स्ड फोर्स‘ के रूप में ISIS के खिलाफ अभियान चलाते रहे हैं और सीरियाई सरकार के प्रभाव को रोकते हैं। हालाँकि अब अमेरिका ने अपनी उपस्थिति सीमित की है, तो कुर्दों को भी तुर्की के हाथों मरने के लिए छोड़ दिया है। यहाँ अमेरिकी ढाँचा विफल नजर आ रहा है, क्योंकि सीरिया में पूर्व आतंकी ही आज राष्ट्रप्रमुख की हैसियत में है।

हालाँकि सीरिया में शासन बदलने के बावजूद अलवी, द्रूज और ईसाई अल्पसंख्यकों के खिलाफ सांप्रदायिक हिंसा घटी नहीं है। वहीं आईएसआईएस (ISIS) के स्लीपर सेल अभी भी छिटपुट हमलों की फिराक में रहते हैं।

सीरिया आज किसी पारंपरिक यूएन मिशन के तहत शांत नहीं हो रहा है, बल्कि यह तुर्की, रूस, अमेरिका और स्थानीय स्वायत्त गुटों की शक्ति-संतुलन (Power Dynamics) पर टिका हुआ है। यह दिखाता है कि एक बार जब यूएन निष्प्रभावी हो जाता है, तो किसी देश की स्वायत्तता और सुरक्षा पर ‘थर्ड पार्टी फोर्स’ ही हावी हो जाती हैं।

कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC): SAMIDRC और EACRF का क्षेत्रीय मिक्स्ड फोर्स मॉडल

पूर्वी कांगो (DR Congo) दशकों से दर्जनों विद्रोही गुटों (जैसे M23) की हिंसा से जूझ रहा है। यहाँ यूएन का सबसे बड़ा और महंगा शांति मिशन MONUSCO दशकों से तैनात था, लेकिन स्थानीय जनता और सरकार यूएन की नाकामी से बेहद नाराज हो गई। इसके परिणामस्वरूप यूएन को हटाने की प्रक्रिया शुरू हुई और उसकी जगह क्षेत्रीय ‘मिक्स्ड फोर्स’ तैनात की गईं-

  • SAMIDRC (SADC Mission in the DRC): दक्षिणी अफ्रीकी विकास समुदाय (SADC) के देशों दक्षिण अफ्रीका, तंजानिया और मलावी ने मिलकर पूर्वी कांगो में अपनी एक सशक्त ‘मिक्स्ड कॉम्बैट फोर्स’ भेजी है, जो सीधे विद्रोहियों के खिलाफ आक्रामक सैन्य कार्रवाई करती है।
  • EACRF (East African Community Regional Force): इससे पहले पूर्वी अफ्रीकी समुदाय (केन्या, युगांडा, बुरुंडी, दक्षिण सूडान) के सैनिकों को मिलाकर एक क्षेत्रीय मिक्स्ड बल बनाया गया था जिसने कांगो के हिंसाग्रस्त इलाकों में गश्त और सुरक्षा की कमान संभाली थी।
अफ्रीकन यूनियन की फोर्स तैनाती, सोर्स-AUPSD, AU Press Release, IISS Military Balance 2024 (ये ग्राफ ओपन सोर्स रिपोर्टिंग के आधार पर AI ChatGPT से बनाया गया है)

मोजाम्बिक (काबो डेलगाडो)

  • कांगो की तरह ही मोजांबिक में SAMIM और रवांडा की द्विपक्षीय ‘थर्ड पार्टी Force’ की मौजूदगी बनी हुई है दरअसल, मोजाम्बिक के उत्तरी प्रांत काबो डेलगाडो (Cabo Delgado) में जब ISIS से जुड़े आतंकवादी गुटों ने कब्जा कर लिया और प्राकृतिक गैस परियोजनाओं को ठप कर दिया, तो मोजाम्बिक सरकार ने संयुक्त राष्ट्र के पास जाने के बजाय द्विपक्षीय और क्षेत्रीय मदद माँगी। इसमें-
  • रवांडा सुरक्षा बल (RDF – Rwanda Defence Force): मोजाम्बिक और रवांडा की सरकारों के बीच एक सीधा द्विपक्षीय समझौता हुआ। रवांडा ने अपने 2,000 से अधिक उच्च प्रशिक्षित सैनिकों और पुलिसकर्मियों को काबो डेलगाडो भेजा। रवांडा की सेना और मोजाम्बिक की सेना ने एक ‘मिक्स्ड फोर्स’ के रूप में काम करते हुए कुछ ही महीनों में आतंकियों को प्रमुख शहरों से खदेड़ दिया।
  • SAMIM (SADC Mission in Mozambique): इसके साथ ही दक्षिणी अफ्रीकी देशों के गठबंधन ने अपनी संयुक्त सेना भी वहाँ भेजी। इस मॉडल को वैश्विक कूटनीति में अत्यंत सफल द्विपक्षीय सुरक्षा सहयोग (Bilateral Security Intervention) माना जाता है।

साहेल क्षेत्र (पश्चिम अफ्रीका): गफाइव साहेल (G5 Sahel) और बहुराष्ट्रीय टास्क फोर्स

पश्चिम अफ्रीका के सहारा मरुस्थल से सटे साहेल क्षेत्र (माली, नाइजर, बुर्किना फासो, चाड) में जिहादी आतंकवाद से निपटने के लिए विभिन्न प्रकार की मिक्स्ड और थर्ड पार्टी फोर्सेज तैनात रही हैं-

MNJTF (Multinational Joint Task Force): नाइजीरिया, चाड, कैमरून, नाइजर और बेनिन देशों ने मिलकर लेक चाड बेसिन (Lake Chad Basin) में ‘बोको हरम’ और ‘ISWAP‘ के खिलाफ एक बहुराष्ट्रीय संयुक्त बल (MNJTF) का गठन किया है। इसमें पाँचों देशों के सैनिक और कमांडर एक ही एकीकृत कमान के तहत काम करते हैं और सीमाओं के पार जाकर आतंकवादियों का पीछा करते हैं।

ऑपरेशन बरखाने और टाकुबा टास्क फोर्स (पूर्व में): फ्रांस ने इस इलाके में अपने हजारों सैनिक तैनात किए थे और यूरोपीय देशों (स्वीडन, एस्टोनिया, चेक गणराज्य) की विशेष सेनाओं के साथ मिलकर एक ‘मिक्स्ड यूरोपियन फोर्स’ (Takuba Task Force) बनाई थी। हालाँकिसैन्य तख्तापलटों के बाद रूस के समर्थन वाली फ्रांस विरोधी तख्तापलट सरकारों ने फ्रांसीसी बलों को निकालकर रूसी वैगनर (अब अफ्रीका कोर) को थर्ड पार्टी फोर्स के रूप में आमंत्रित किया है।

सोलोमन द्वीप और दक्षिण प्रशांत: ऑस्ट्रेलिया और चीन की द्विपक्षीय तैनाती

दक्षिण प्रशांत महासागर के छोटे से द्वीप देश सोलोमन आइलैंड्स (Solomon Islands) में जब 2021 में भीषण दंगे और राजनीतिक अस्थिरता भड़की, तो सुरक्षा के लिए द्विपक्षीय ‘थर्ड पार्टी फोर्स’ की मदद ली गई-

SIAF (Solomon International Assistance Force): ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, फिजी और पापुआ न्यू गिनी की पुलिस और सेनाओं ने मिलकर एक त्वरित प्रतिक्रिया बल सोलोमन द्वीप भेजा जिसने वहाँ की सड़कों पर व्यवस्था कायम की।

चीन-सोलोमन द्वीप सुरक्षा समझौता: इसके तुरंत बाद सोलोमन द्वीप की सरकार ने चीन के साथ एक द्विपक्षीय सुरक्षा समझौते पर दस्तखत किए, जिसके तहत चीनी पुलिस और सुरक्षा बल वहां की पुलिस को प्रशिक्षण देने और आवश्यकता पड़ने पर देश में सुरक्षा व्यवस्था संभालने के लिए तैनात किए गए हैं। यह प्रशांत क्षेत्र में महाशक्ति स्पर्धा का एक नया मिक्स्ड/थर्ड पार्टी मॉडल है। हालाँकि अब सोलोमन के भीतर चीन के साथ हुई इस व्यवस्था का विरोध भी शुरू हो गया है।

गैर-यूएन फोर्स की सफल तैनाती, सोर्स-AU, NARO, SADC, UN Documents(ये ग्राफ ओपन सोर्स रिपोर्टिंग के आधार पर AI ChatGPT से बनाया गया है)

जिबूती: दुनिया का सबसे बड़ा ‘मिक्स्ड फॉरेन मिलिट्री हब’

लाल सागर और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के मुहाने पर स्थित अफ्रीका का छोटा सा देश जिबूती (Djibouti) दुनिया का सबसे अनोखा सुरक्षा केंद्र है। जिबूती में कोई संयुक्त राष्ट्र बल नहीं है, लेकिन यहाँ दुनिया की सबसे प्रतिद्वंद्वी महाशक्तियों के सैन्य अड्डे एक-दूसरे से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं-

अमेरिका (Camp Lemonnier): अफ्रीका में अमेरिका का एकमात्र स्थायी सैन्य अड्डा, जहाँ हजारों अमेरिकी सैनिक और ड्रोन तैनात हैं।

चीन (PLA Support Base): चीन का विदेश में पहला और सबसे बड़ा नौसैन्य अड्डा।

इसके अलावा फ्रांस, जापान और इटली जैसे देशों के भी अपने-अपने स्वतंत्र सैन्य अड्डे जिबूती में मौजूद हैं।

यह पूरा देश एक प्रकार से अंतरराष्ट्रीय बहु-पक्षीय ‘थर्ड पार्टी सैन्य केंद्र‘ के रूप में काम करता है, जहाँ से ये सभी देश हिंद महासागर और लाल सागर में समुद्री लुटेरों, आतंकवाद और व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा की निगरानी करते हैं।

संयुक्त राष्ट्र पीसकीपिंग का पतन और ‘थर्ड पार्टी Force’ के उभार की 5 बड़ी वजहें

आखिर ऐसा क्या हुआ कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनाया गया संयुक्त राष्ट्र का बहुपक्षीय शांति ढाँचा आज इतना कमजोर पड़ गया है और दुनिया भर के देश गैर-यूएन, क्षेत्रीय या द्विपक्षीय ‘थर्ड पार्टी फोर्सेज’ का रुख करने के लिए मजबूर हो रहे हैं? इसके पीछे 5 कड़वे और व्यावहारिक कारण हैं-

1- सुरक्षा परिषद की राजनीतिक लाचारी (Veto Gridlock & Polarization)

संयुक्त राष्ट्र का पूरा ढाँचा इस बात पर टिका था कि सुरक्षा परिषद के पाँचों स्थायी सदस्य (P5) दुनिया के बड़े संकटों पर एकमत होंगे। लेकिन आज का दौर एक नए शीत युद्ध (New Cold War) का दौर है। अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस एक तरफ हैं, जबकि रूस और चीन दूसरी तरफ।

यूक्रेन युद्ध, सीरिया संकट, इजरायल-गाजा संघर्ष या नागोर्नो-काराबाख जैसे मामलों में सुरक्षा परिषद पूरी तरह से लकवाग्रस्त (Paralyzed) हो चुकी है।

जब भी कोई देश शांति सेना भेजने का प्रस्ताव लाता है, दूसरी महाशक्ति तुरंत अपने वीटो का इस्तेमाल कर देती है।

परिणाम स्वरूप पीड़ित देशों या क्षेत्रीय शक्तियों के पास यूएन के बाहर जाकर ‘थर्ड पार्टी गठबंधन’ या द्विपक्षीय मिक्स्ड फोर्स बनाने के अलावा कोई चारा नहीं बचता।

2- ‘पीसकीपिंग’ बनाम ‘पीस एनफोर्समेंट’ की वैधानिक सीमाएँ

संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अध्याय 6 (Chapter VI) के तहत भेजी जाने वाली पारंपरिक यूएन शांति सेनाओं के नियम बहुत सख्त और सीमित होते हैं।

आत्मरक्षा का नियम: यूएन शांति सैनिक केवल तभी गोली चला सकते हैं जब उन पर सीधा हमला हो। वे किसी युद्ध को रोकने, हमलावरों को खत्म करने या जबरन शांति स्थापित करने (Peace Enforcement) के लिए ताकत का इस्तेमाल नहीं कर सकते।

गाजा या हैती जैसे हालात: गाजा या हैती जैसी जगहों पर, जहाँ कोई शांति समझौता लागू ही नहीं है और हथियारबंद आतंकवादी या आपराधिक गिरोह खुलेआम सड़कों पर घूम रहे हैं, वहाँ यूएन के नीली टोपी वाले सैनिक पूरी तरह से अप्रभावी साबित होते हैं।

ऐसी जगहों पर ऐसी ‘थर्ड पार्टी Forces’ की जरूरत होती है जो बिना किसी हिचकिचाहट के आक्रामक सैन्य कार्रवाई कर सकें और कानून तोड़ने वालों का खात्मा कर सकें।

3- यूएन मिशनों की धीमी, नौकरशाही और जटिल प्रक्रिया

संयुक्त राष्ट्र का नौकरशाही ढाँचा दुनिया भर में अपनी सुस्ती के लिए जाना जाता है। जब दुनिया के किसी हिस्से में कोई नया संकट खड़ा होता है, तो यूएन सुरक्षा परिषद में बहस होने, प्रस्ताव पास होने, बजट मंजूर होने और फिर 193 सदस्य देशों से सैनिकों की माँग करके उन्हें तैयार करने और तैनात करने में अक्सर 6 महीने से लेकर 2 साल तक का समय लग जाता है।

इतनी देर में संकटग्रस्त इलाके में हजारों निर्दोष लोग मारे जाते हैं या पूरा देश तबाह हो जाता है।

इसके विपरीत, नाटो, अफ्रीकी संघ, रूस या अमेरिकी अगुवाई वाले क्षेत्रीय बल या द्विपक्षीय मिक्स्ड फोर्सेज महज कुछ दिनों या हफ्तों के भीतर अपनी पूरी सैन्य टुकड़ियों को युद्ध क्षेत्र में उतारने में सक्षम होते हैं।

4- संप्रभुता का हनन, कब्जा और भू-राजनीतिक हित (Sphere of Influence)

कई मामलों में शक्तिशाली देश जानबूझकर संयुक्त राष्ट्र को किसी क्षेत्र से बाहर रखते हैं ताकि वे उस इलाके पर अपना एकतरफा कूटनीतिक, रणनीतिक और सैन्य प्रभाव बनाए रख सकें।

रूस का पूर्व-सोवियत देशों (जैसे मॉल्डोवा, जॉर्जिया, आर्मेनिया) में अपनी शांति सेनाएं तैनात करना इसी रणनीति का हिस्सा है ताकि इन देशों को पश्चिमी सैन्य गठबंधन नाटो या यूरोपीय संघ में शामिल होने से रोका जा सके।

इसी तरह अमेरिका भी मध्य पूर्व के तेल समृद्ध क्षेत्रों और रणनीतिक समुद्री मार्गों पर अपना दबदबा बनाए रखने के लिए यूएन के बजाय अपनी अगुवाई वाले स्वतंत्र गठबंधनों (जैसे MFO या बहुराष्ट्रीय टास्क फोर्स) को प्राथमिकता देता है।

‘थर्ड पार्टी Force’ की तैनाती महाशक्तियों को उस क्षेत्र के राजनीतिक भविष्य को अपने हिसाब से मोड़ने का अधिकार देती है।

मेजबान देशों का यूएन पर से टूटता भरोसा और बदनामी

अतीत के कई यूएन शांति मिशनों के खराब रिकॉर्ड ने भी उनकी साख को भारी नुकसान पहुँचाया है।

रवांडा नरसंहार (1994): यूएन शांति सैनिक वहाँ मौजूद थे, फिर भी उनकी आँखों के सामने 8 लाख से ज्यादा लोग मार दिए गए क्योंकि उनके पास हथियार चलाने का आदेश नहीं था।

स्रेब्रेनित्सा नरसंहार (1995): बोस्निया में यूएन द्वारा घोषित ‘सुरक्षित क्षेत्र’ में डच यूएन सैनिकों के सामने हजारों बोस्नियाई मुस्लिमों का कत्लेआम कर दिया गया।

हैती में हैजा महामारी: यूएन शांति सैनिकों की लापरवाही के कारण हैती में हैजा फैल गया जिससे 10,000 से ज्यादा स्थानीय लोग मारे गए।

इन्हीं खराब अनुभवों के कारण आज कांगो, माली, सूडान और हैती जैसे देशों की सरकारें और जनता यूएन मिशनों को अपने देश से बाहर निकाल रही हैं और उनकी जगह रवांडा, केन्या या अन्य क्षेत्रीय देशों की मिक्स्ड सुरक्षा ताकतों पर भरोसा जता रही हैं।

क्या बदल रहा है दुनिया का सुरक्षा ढाँचा?

गाजा में अमेरिका की ‘बोर्ड ऑफ पीस’ पहल हो, काकेशस और पूर्वी यूरोप में रूस की एकतरफा सैन्य उपस्थिति हो, या अफ्रीका और प्रशांत महासागर के द्वीपों में क्षेत्रीय मिक्स्ड बलों का उभार हो यह सब इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि वैश्विक सुरक्षा का ताना-बाना अब पूरी तरह से ‘बहुध्रुवीय’ (Multipolar) और व्यावहारिक (Pragmatic) होता जा रहा है।

बोर्ड ऑफ पीस के हवाले गाजा
बोर्ड ऑफ पीस के हवाले गाजा, प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI ChatGPT)

संयुक्त राष्ट्र अब दुनिया का एकमात्र ‘ग्लोबल दरोगा’ नहीं रहा। बल्कि क्षेत्रीय ताकतों का उभार हुआ है। ऐसे में क्षेत्रीय संगठन (जैसे नाटो, अफ्रीकी संघ, CSTO) और शक्तिशाली देश अपने-अपने क्षेत्रों में ‘थर्ड पार्टी फोर्स’ के जरिए नियंत्रण स्थापित कर रहे हैं।

ये तरह की चुनौती भी और समाधान भी। क्योंकि जहाँ एक तरफ थर्ड पार्टी फोर्स त्वरित कार्रवाई करने में सक्षम होती हैं, वहीं दूसरी तरफ इनमें निष्पक्षता की कमी हो सकती है, क्योंकि इन बलों के पीछे अक्सर नेतृत्व करने वाले देश के अपने राजनीतिक व कूटनीतिक हित छुपे होते हैं।

गाजा की स्थिति आज पूरी दुनिया के सामने एक नया नजीर पेश कर रही है। अगर ‘बोर्ड ऑफ पीस’ या अमेरिका के नेतृत्व वाली बहुराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था गाजा में सफल होती है, तो यह भविष्य के अंतरराष्ट्रीय विवादों को सुलझाने के लिए यूएन के बजाय ‘थर्ड पार्टी कोऑलिशन’ के मॉडल को और अधिक मजबूती देगा।

UNSC में बदलाव की बेहद जरूरत, सदस्यों की संख्या बढ़े और वीटो सिस्टम हटे

बहरहाल, इन घटनाक्रमों के बीच सबसे ज्यादा जरूरत फिलहाल संयुक्त राष्ट्र के ढाँचे खासकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में बदलाव लाने की है। आज UNSC की स्थाई सीटों में बढ़ोतरी कर भारत, अफ्रीकन यूनियन और लातिन अमेरिकी देशों को भी जगह मिलनी चाहिए, जिसके लिए भारत लगातार कोशिश भी कर रहा है। भारत की दावेदारी को भारी बहुमत से समर्थन भी मिल रहा है, लेकिन वीटो पॉवर के दम पर इसमें लगातार अडंगा लगाया जा रहा है। ऐसे में UNSC के वीटो पॉवर वाले हिस्से पर भी फिर से बहस की जरूरत है।

इन सबसे एक अच्छा तरीका तो यही लगता है कि वीटो पॉवर वाले सदस्यों की संख्या बढ़ाई जाए और किसी भी प्रस्ताव के पास होने के लिए 2 तिहाई या 3 चौथाई जैसे कड़े बहुमत की व्यवस्था की जाए। वर्ना धीरे-धीरे UNSC सिर्फ थर्ड पार्टी फोर्स के लिए कानूनी रास्ते बनाने तक ही जाएगा, जिसकी दुनिया में वैसे भी कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि ये काम सिर्फ रबर स्टैंप के तौर पर हो रहा है। वैसे भी ताकतवर देश अपने फायदे लिए संयुक्त राष्ट्र की अनदेखी कर ही रहे हैं।