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केरल HC ने युवक को रेप के आरोप से किया बरी, 3 साल के रिश्ते का जिक्र कर ‘शिक्षित’ महिला के दावों पर उठाए सवाल: जानें- कानून के दुरुपयोग के मामलों से कैसे निपट रही हैं अदालतें

केरल हाई कोर्ट ने सोमवार (1 दिसंबर) को एक पुरुष के खिलाफ आपराधिक मामला रद्द कर दिया। कोर्ट ने महिला द्वारा लगाए गए रेप के आरोपों को खारिज कर दिया।

कोर्ट ने कहा है कि किसी रिश्ते के खत्म होने या बाद में शादी कर लिए जाने पर सहमति से बने संबंध को रेप नहीं कहा जा सकता।

जस्टिस जी गिरीश की सिंगल बेंच ने दोनों पक्षों के दलीलों की जाँच की और महिला के दावों में कई विरोधाभास पाए, जिसके बाद उन्होंने यह फैसला सुनाया।

दरअसल याचिकाकर्ता पुरुष ने हाई कोर्ट से क्रिमिनल केस रद्द करने की माँग की थी। ये केस 23 जुलाई, 2018 को एराट्टुपेट्टा पुलिस द्वारा IPC की धारा 376 और इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट की धारा 66E के तहत दर्ज की गई थी।

शिकायत करने वाली महिला ने आरोप लगाया था कि आरोपित ने 2011 और 2014 के बीच उसके साथ रेप किया और उसकी आपत्तिजनक तस्वीरें लीं और प्रकाशित करने की धमकी दी और उसका मेंटल टॉर्चर किया। इस पर हाईकोर्ट ने पीड़िता के दावों में कई कमियाँ गिनाई।

हालाँकि, हाई कोर्ट ने पाया कि शिकायत करने वाली महिला की बातों में कई बातें थीं, जिससे पता चलता है कि आरोपित को झूठे केस में फँसाया गया है।

आरोपित पुरुष ने केस को झूठा बताते हुए आपराधिक केस हटाने की माँग की थी और दावा किया था कि उसे इस केस में झूठा फँसाया गया था। आरोपित का कहना है कि उसने शिकायत करने वाली महिला पर केस किया था, क्योंकि उसने उधार लिए गए पैसे वापस नहीं किए थे और उसके साथ इंश्योरेंस फ्रॉड कर रही थी।

अपने फैसले में हाई कोर्ट ने कहा, “2010 के बाद से याचिकाकर्ता और शिकायत करने वाली महिला के बीच फाइनेंशियल और प्रॉपर्टी के लेन-देन हुए। केस के रिकॉर्ड से भी इसका पता चलता है। ऐसे में शिकायत करने वाली महिला की इस बात पर यकीन करना बहुत मुश्किल है कि याचिकाकर्ता तीन साल से ज़्यादा समय से उसका यौन शोषण कर रहा था, और उसने शर्म के कारण इस जुर्म के बारे में नहीं बताया।”

हाई कोर्ट के मुताबिक, 2017 में शिकायत करने वाली महिला ने चेक डिसऑनर के एक मामले में कोर्ट के सामने याचिकाकर्ता के पक्ष में गवाही दी थी। उसने उसे ‘एक करीबी फैमिली फ्रेंड’ बताया था।

कोर्ट ने सवाल पूछा कि अगर वह फैमिली फ्रेंड था, तो आरोपित कई मौकों पर उसे त्रिशूर और पूंजर में अपने घर आने के लिए मजबूर किया और उसे सरेंडर करना पड़ा, जैसे आरोप मेल नहीं खाते हैं। यह उस शपथ पत्र से भी मेल नहीं खाता जो असल में शिकायत करने वाली महिला ने 26.07.2017 को ज्यूडिशियल फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट कोर्ट के सामने दिया था।

शिकायत करने वाली महिला के दावों पर यकीन न करते हुए, जस्टिस गिरीश ने कहा कि ” पढ़ी-लिखी और नौकरी करने वाली महिला से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह लगभग तीन साल तक पिटीशनर के दबाव और क्रिमिनल धमकी का शिकार रही होगी और यौन उत्पीड़न का शिकार होती रहेगी।”

घटनाओं के क्रम का एनालिसिस करने के बाद, जिसमें आरोपित याचिकाकर्ता द्वारा शिकायत के खिलाफ केस करने से लेकर FIR फाइल करने तक का वक्त शामिल है। हाई कोर्ट का कहना है कि याचिकाकर्ता के इस आरोप में दम था कि उसके खिलाफ झूठी शिकायत दर्ज की गई है, क्योंकि उसने असल में शिकायत करने वाली महिला के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की थी।

सहमति से बना रिश्ता, रेप के आरोप का आधार नहीं हो सकता: SC

यह मामला ये बताता है कि कैसे भारत में कई महिलाएँ यौन उत्पीड़न से जुड़े कानूनों का गलत इस्तेमाल कर रही हैं। इसकी वजह से बेगुनाह पुरुषों को जेल की हवा खानी पड़ रही है।

ऐसे मामले असली पीड़ितों के मामलों को भी कमजोर करता है और कानून की प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल किया जाता है। कोर्ट ने बार-बार स्पष्ट किया है कि आपसी सहमति से बने रिश्तों का खराब होना या शादी न हो पाना, रेप नहीं कहा जा सकता।

मई 2025 में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपसी सहमति से बने रिश्तों के समय के साथ खराब होने वाले मामलों में क्रिमिनल कार्रवाई शुरू करने से ज्यूडिशियरी पर बोझ बढ़ता है और बेगुनाह लोगों को इसकी कीमत चुकानी पड़ रही है।

यह बात सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे मामले में कही थी, जिसमें एक शादीशुदा, एक बच्चे की माँ ने 23 साल के एक आदमी पर उनके रिश्ते खराब होने के बाद रेप के झूठे आरोप लगाए थे।

“अगर सहमति से बना रिश्ता खराब हो जाए या पार्टनर दूर चला जाए, तो यह आपराधिक मामला नहीं हो सकता। ऐसा व्यवहार न केवल कोर्ट पर बोझ डालता है, बल्कि ऐसे जघन्य अपराध के आरोपी को पहचाने में भी रुकावट डालता है।

कोर्ट ने बार-बार नियमों के गलत इस्तेमाल के खिलाफ चेतावनी दी है। कोर्ट ने शादी करने के वादे को तोड़ने वाले व्यक्ति पर IPC की धारा 376 के तहत अपराध के लिए मुकदमा चलाना बेवकूफी बताया है।

झूठे रेप केस से निपटने में हाई कोर्ट का रवैया हुआ सख्त

झूठे रेप केस की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी को देखते हुए कोर्ट रेप केस की सुनवाई करते समय सावधानी बरत रहे हैं। हाल के कुछ मामलों में, कई हाई कोर्ट ने उन क्रिमिनल कार्रवाई को रद्द कर दिया जहां रेप केस झूठे पाए गए थे।

अगस्त 2025 में, उत्तराखंड हाई कोर्ट ने एक नाबालिग लड़के के खिलाफ रेप की कार्रवाई को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि शिकायत करने वाली और आरोपित के बीच सहमति से रिश्ता बना था। ऐसे ही एक मामले में, लखनऊ की एक कोर्ट ने एक महिला को 7.5 साल जेल की सजा सुना दी, क्योंकि उसने दो आदमियों को रेप केस और SC/ST एक्ट के तहत अपराधों में फँसाया था।

पिछले साल अगस्त में, बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक 73 साल के पुरुष के खिलाफ फाइल की गई FIR रद्द कर दी थी, जिस पर शादी का झूठा वादा करके एक औरत से रेप करने का आरोप था। हाई कोर्ट ने इस बात पर ध्यान दिया कि शिकायत करने वाली महिला 31 साल से ‘रिलेशनशिप’ में थी और शिकायत करने वाली महिला ने पहले कभी इस रिश्ते के खिलाफ आवाज नहीं उठाई थी।

झूठे आरोप में फँसे पुरुषों के लिए कानूनी उपाय

सहमति से बने रिश्तों में इमोशनल नतीजों के बाद महिलाओं द्वारा रेप कानूनों का इस्तेमाल करने का बढ़ता ट्रेंड चिंताजनक है। इस पर ध्यान देना होगा कि बदला लेने वाले लोग कानूनों का इस्तेमाल हथियार के तौर पर न कर सकें।

ऐसे कई कानूनी नियम हैं जिनका इस्तेमाल झूठे रेप केस का सामना कर रहे पुरुष कर सकते हैं। ऐसे पुरुष हाई कोर्ट में CrPC की धारा 482 (अब धारा 528 BNSS) के तहत FIR रद्द करने की माँग कर सकते हैं।

पुरुष उन महिलाओं के खिलाफ IPC की धारा 182 (सरकारी कर्मचारी को गलत जानकारी देना, धारा 217 BNS) और 211 (चोट पहुंचाने का झूठा आरोप, धारा 248 BNS) के तहत केस दर्ज करा सकते हैं, जो उन पर सेक्सुअल अपराधों का झूठा आरोप लगाती हैं। हालाँकि ये तब हो सकता है जब आरोप मनगढ़ंत साबित हो जाए या आरोपित बरी हो जाए।

इसके अलावा, अगर मजिस्ट्रेट को लगता है कि आरोप का कोई सही आधार नहीं था, तो वह BNSS का सेक्शन 273 लगाकर शिकायत करने वाले को आरोपी को बरी होने के बाद मुआवजा देने का आदेश दे सकता है।

हालाँकि हाईप्रोफाइल रिश्तों से जुड़े मामलों का अक्सर समाज पर बड़ा असर पड़ता है। मीडिया की हेडलाइन उन मामलों को सनसनीखेज बनाती हैं। ऐसे में विवादित पहलुओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है।

करीबी रिश्ते मुश्किल होते हैं और कभी-कभी, अलग-अलग सोशियो-इकोनॉमिक पावर डायनामिक्स के कारण, लंबे समय तक चलने वाले रिश्ते ‘मजबूर’ भी हो सकते हैं। भले ही वे ऊपर से सहमति से बने हुए लगें। महिलाओं और यहाँ तक ​​कि पुरुषों के खिलाफ कई बयान आम लोगों में कन्फ्यूजन फैलाते हैं। इसलिए, ज्यूडिशियरी और मीडिया दोनों के लिए जरूरी है कि वे सामाजिक मुद्दों पर सावधानी से बात करें।

(ये लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है, इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

धर्म बदलने वाले SC-ST नहीं ले सकते आरक्षण: जानिए क्या है मामला, क्यों इलाहाबाद हाई कोर्ट ने धर्मांतरण के बाद लाभ को बताया ‘संविधान के साथ धोखा’

भारत की आरक्षण व्यवस्था को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला ‘क्रिप्टो क्रिश्चियन्स’ के लिए बड़ा झटका है। अपने फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ-साफ कहा है कि अगर कोई व्यक्ति हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई, इस्लाम या किसी अन्य गैर-हिंदू धर्म को अपना लेता है, तो वह अनुसूचित जाति (SC) या अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण लाभों का हकदार नहीं रहता।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इसे ‘संविधान के साथ धोखाधड़ी’ करार दिया है। यह फैसला जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि की सिंगल बेंच ने 21 नवंबर 2025 को सुनाया, जो जितेंद्र साहनी नाम के एक व्यक्ति की याचिका पर आधारित है। यह फैसला न सिर्फ उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव के विवाद से निकला है, बल्कि पूरे देश की आरक्षण नीति, धर्मांतरण के मुद्दे और सामाजिक न्याय की बहस को नई दिशा दे सकता है। आइए, जानते हैं क्यों महत्वपूर्ण है इलाहाबाद हाई कोर्ट का ये फैसला…

कैसे शुरू हुआ ये मामला, जो राष्ट्रीय स्तर पर बना महत्वपूर्ण

ये मामला उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिले के सिंदुरिया थाने के अंतर्गत आने वाले ग्राम मथानिया लक्ष्मीपुर एकड़ंगा का है। यहाँ के निवासी जितेंद्र साहनी मूल रूप से केवट समुदाय से ताल्लुक रखते थे।

जितेंद्र साहनी ने अप्रैल 2023 में हाई कोर्ट में अर्जी देकर स्थानीय सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट (SDM) से अपनी निजी जमीन पर रविवार और बुधवार को ‘यीशु मसीह के वचनों’ पर आधारित प्रार्थना सभाओं के आयोजन की अनुमति माँगी थी। SDM ने इसे मंजूरी दे भी दी थी, लेकिन स्थानीय हिंदुओं के विरोध के बाद 3 मई 2023 को यह अनुमति रद्द कर दी गई।

साहनी की याचिका
याचिका का पूरा हिस्सा

हिंदू देवी-देवताओं पर विवादित टिप्पणी कर उनका मजाक उड़ाता था साहनी

ग्रामीणों का आरोप था कि साहनी ने इन सभाओं का इस्तेमाल गरीब हिंदू परिवारों को लालच देकर ईसाई मजहब अपनाने के लिए उकसाने के लिए किया। एक गवाह लक्षन विश्वकर्मा ने पुलिस जाँच में बयान दिया कि साहनी ने ग्रामीणों को इकट्ठा कर हिंदू देवी-देवताओं का मजाक उड़ाया।

लक्षन ने अपने लिखित बयान में कहा, “साहनी ने बताया कि हिंदू धर्म में हजारों देवी-देवता हैं। किसी के आठ हाथ, किसी के चार, किसी के चेहरे पर सूंड है। कोई चूहे की सवारी करता है, कोई मोर की। कोई भाँग पीता है, कोई गाँजा।” गवाह ने आगे आरोप लगाया कि साहनी ने कहा, “हिंदू धर्म में जाति के भेदभाव से कोई इज्जत नहीं मिलती, लेकिन ईसाई बनने से नौकरी, बिजनेस और मिशनरी से पैसे का फायदा होगा।”

गवाह का बयान रहा अहम
गवाह लक्षन के बयान की कॉपी

इन आरोपों पर पुलिस ने जितेंद्र साहनी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153A (धर्म, जाति या जन्मस्थान के आधार पर शत्रुता फैलाना) और 295A (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना) के तहत मुकदमा दर्ज किया। 11 मार्च 2024 को चार्जशीट दाखिल हुई और 24 जुलाई 2024 को ACJM कोर्ट ने संज्ञान ले लिया।

साहनी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर इस मुकदमे को रद्द करने की गुहार लगाई। उनका दावा था कि सभाओं में कोई विवादास्पद भाषण नहीं हुआ और उन्हें झूठा फँसाया जा रहा है। लेकिन कोर्ट पहुँचते ही एक बड़ा राज खुल गया, वो ये था कि साहनी ने अपनी याचिका के साथ दाखिल हलफनामे में खुद को ‘हिंदू’ बताया, जबकि गवाह बयानों से साफ था कि वह ईसाई पादरी बन चुका था।

यह खुलासा कोर्ट के लिए आश्चर्यजनक था। अतिरिक्त सरकारी वकील पंकज त्रिपाठी ने CrPC की धारा 161 के तहत दर्ज गवाह बयानों का हवाला दिया। एक अन्य गवाह बुद्धि राम यादव ने भी पुष्टि की कि साहनी ने गरीबों को लालच देकर धर्मांतरण कराया। कोर्ट ने इसे गंभीरता से लिया और याचिका खारिज कर दी। जस्टिस गिरि ने कहा, “ट्रायल कोर्ट ही साक्ष्यों की जाँच करेगा। साहनी ट्रायल कोर्ट में डिस्चार्ज अर्जी दे सकते हैं, जहाँ वे दावा कर सकते हैं कि IPC की इन धाराओं के तत्व मौजूद नहीं हैं।”

धर्मांतरण के बाद SC वर्ग का लाभ लेना क्यों है संविधान के ‘धोखाधड़ी’?

अब सवाल यह है कि एक आपराधिक मुकदमे की याचिका से आरक्षण का मुद्दा कैसे जुड़ गया? कोर्ट ने साहनी के हलफनामे को ‘गुमराह करने वाला’ बताते हुए इसे संविधान के साथ धोखे का उदाहरण माना। जस्टिस गिरि ने स्पष्ट किया कि SC/ST लाभ केवल उन लोगों के लिए हैं जो हिंदू, सिख, बौद्ध या जैन परंपरा का पालन करते हैं। संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के पैराग्राफ 3 में साफ लिखा है- “कोई व्यक्ति जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म से अलग कोई अन्य धर्म मानता है, उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा।”

कोर्ट ने ‘हिंदू’ की परिभाषा पर भी रोशनी डाली। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 2 के अनुसार, हिंदू में सिख, बौद्ध, जैन और आर्य समाजी शामिल हैं। जो व्यक्ति मुस्लिम, ईसाई, पारसी या यहूदी नहीं है, वह हिंदू माना जाता है। SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 2(c) भी इसी पर आधारित है। अनुच्छेद 341 और 342 के तहत SC/ST की सूची में केवल हिंदू, सिख या बौद्ध ही आ सकते हैं।

कोर्ट ने जोर दिया कि ईसाई या इस्लाम जैसे मजहबों में जाति व्यवस्था मान्य नहीं है। इसलिए इन मजहबों को अपनाने वाले व्यक्ति ऐतिहासिक जातिगत भेदभाव का शिकार नहीं रहते। SC/ST अधिनियम का मकसद ऐसी समुदायों की रक्षा करना है जो सदियों से जाति-आधारित उत्पीड़न झेलते आए हैं। अगर कोई व्यक्ति धर्म बदल लेता है, तो वह इस संरक्षण का हकदार नहीं रहता।

जस्टिस गिरि ने कहा, “धर्मांतरण के बाद SC दर्जा बनाए रखना संविधान के साथ धोखा है। यह आरक्षण नीति के मूल सिद्धांतों – सामाजिक न्याय और समानता के खिलाफ है।”

सुप्रीम कोर्ट और अन्य फैसलों का जिक्र, कानूनी इतिहास के फैसलों का रेफरेंस

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुप्रीम कोर्ट के पुराने और नए फैसलों को ध्यान में रखकर सुनाया। इन फैसले में सबसे प्रमुख है 2024 का C. Selvarani vs. Special Secretary-District Collector मामला। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सिर्फ लाभ के लिए धर्मांतरण करना ‘संविधान के साथ धोखाधड़ी’ है। तमिलनाडु की एक महिला ने ईसाई बनने के बाद भी SC प्रमाणपत्र का दावा किया था, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया था। इस मामले में जज ने चेतावनी दी थी कि अगर धर्मांतरण सिर्फ आरक्षण का लाभ लेने के लिए छिपाया जा रहा है, तो यह इस नीति के खिलाफ है।

तमिलनाडु के मामले का हाई कोर्ट ने किया जिक्र

इसके अलावा इलाहाबाद हाई कोर्ट ने साल 1986 के Soosai vs. Union of India मामले को भी अपने फैसले के रेफरेंस में शामिल किया। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि SC नियम केवल हिंदू या सिख मानने वालों पर लागू होते हैं। साल 2015 के K.P. Manu vs. Chairman, Scrutiny Committee में तीन शर्तें बताई गईं: (1) जाति की मान्यता, (2) मूल धर्म में वापसी और (3) समुदाय की स्वीकृति। इसके बिना किसी तरह के आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता है।

सूसई केस का रेफरेंस

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2025 के आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के Akkala Rami Reddy vs. State of A.P. का भी हवाला दिया। इसमें ईसाई बन चुके व्यक्ति को SC/ST अधिनियम के तहत सुरक्षा से वंचित कर दिया गया, क्योंकि ईसाई धर्म में जाति भेदभाव नहीं है। आंध्र प्रदेश के हाई कोर्ट ने कहा था कि ऐसे (कन्वर्टेड) व्यक्ति को अब उत्पीड़न का शिकार नहीं माना जा सकता।”

ये फैसले दिखाते हैं कि धर्मांतरण और आरक्षण का मुद्दा नया नहीं। 1950 के संविधान आदेश से ही यह स्पष्ट था, लेकिन हाल के वर्षों में मिशनरी गतिविधियों और आरक्षण दुरुपयोग के आरोपों से यह बहस तेज हो चुकी है।

हाई कोर्ट ने जाँच और कार्रवाई के लिए दिए सख्त निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वो निर्देश हैं, जिसमें कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों (DM) को 4 महीने (मार्च 2026 तक) का समय दिया कि वे राज्य में ऐसे मामलों की जाँच करें, जहाँ धर्म बदल चुके लोग SC/ST लाभ ले रहे हैं। इसके साथ ही हाई कोर्ट ने जाँच के बाद कानूनी कार्रवाई को भी जरूरी बताया है, साथ ही सभी DM को मुख्य सचिव को रिपोर्ट देने को भी कहा है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले की कॉपी का स्क्रीनशॉट

इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महाराजगंज के DM को विशेष निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि महाराजगंज के डएम को साहनी के धर्म की 3 महीने में जाँच करनी होगी। अगर साहनी का हलफनामा फर्जी साबित होता है, तो उसके खिलाफ फर्जीवाड़े के मामले में सख्त कार्रवाई के लिए कहा है। ताकि भविष्य में इस तरह के फर्जी हलफनामे दाखिल न किए जा सकें और फर्जीवाड़ों पर रोक लग सके।

हाई कोर्ट के फैसले का हिस्सा

अल्पसंख्यक और एससी-एसटी दर्जे के बीच के अंतर को स्पष्ट करे सरकार

इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले से केंद्र और राज्य स्तर पर भी हलचल मचनी तय है। क्योंकि हाई कोर्ट ने भारत सरकार के कैबिनेट सचिव, UP के मुख्य सचिव, समाज कल्याण विभाग के अपर मुख्य सचिव, अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव को निर्देश दिए हैं कि वो अल्पसंख्यक दर्जा (ईसाई/मुस्लिम) और SC दर्जे के बीच सख्त अंतर सुनिश्चित करें। कोर्ट ने एडिशनल गवर्नमेंट एडवोकेट को ये आदेश सभी अधिकारियों तक पहुँचाने का जिम्मा भी सौंपा है।

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “प्रिंसिपल सेक्रेटरी/एडिशनल चीफ सेक्रेटरी, माइनॉरिटीज वेलफेयर डिपार्टमेंट, गवर्नमेंट ऑफ यूपी को भी मामले को देखने और सही कार्रवाई करने या अधिकारियों को निर्देश देने के लिए उचित आदेश पारित करने का निर्देश दिया जाता है ताकि कानून को असलियत/सही मायने में लागू किया जा सके। एडिशनल चीफ सेक्रेटरी, सोशल वेलफेयर डिपार्टमेंट को भी कानून के अनुसार काम करने का निर्देश दिया जाता है।”

सरकारों की बढ़ी जिम्मेदारी

इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद अब UP सरकार के लिए चुनौती बढ़ गई है। यूपी सरकार की जाँच में 4 महीने में फर्जीवाड़ों के हजारों मामले सामने आ सकते हैं। ऐसे में अल्पसंख्यक कल्याण विभाग को SC और माइनॉरिटी लाभों के बीच बैलेंस भी बनाना पड़ेगा। वहीं, आने वाले समय के लिए सरकारों को भी SC/ST प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया कड़ी करनी पड़ सकती है। खासकर क्रिप्टो क्रिश्चियन जैसे मामलो में।

क्रिप्टो क्रिश्चियन कौन होते हैं?

ऑपइंडिया अपनी रिपोर्ट्स में पहले भी क्रिप्टो क्रिश्चियन को लेकर साफ तौर पर बता चुका है कि अपने धर्म को छिपाकर खुद को मूल धर्म का दिखाना और संवैधानिक फायदों को उठाते रहने वाले लोग क्रिप्टो क्रिश्चियन की श्रेणी में आते हैं। जितेंद्र साहनी का भी मामला ऐसा ही है।

जितेंद्र साहनी मूल रूप से हिंदू धर्म के केवट जाति से आते हैं। लेकिन उन्होंने धर्मांतरण कर खुद को ईसाई होना स्वीकार किया। इसके साथ ही कथित तौर पर वो एससी-एसटी वर्ग के लिए दिए जाने वाले सारे फायदे भी प्राप्त करते रहे। उनकी हिम्मत देखिए, कि उन्होंने खुद को हाई कोर्ट में भी हिंदू बताया, जबकि पूरे मामले में साफ है कि वो न सिर्फ ईसाई बन चुका है, बल्कि वो पादरी जैसा पद भी अपने पास रखता है।

क्रिप्टो क्रिश्चियन का एक सबसे अलग और अनोखा रूप ये है कि एक तरफ जहाँ जितेंद्र खुलेआम ईसाइयत का पालन करता है, तो कई ऐसे लोगों को उसने ईसाई बनाया, जिन्होंने न तो सार्वजनिक तौर पर खुद को ईसाई बताया और न ही अपना नाम और धर्म और न ही पहचान बदली। यानि ऐसे लोग कागजों पर हिंदू-दलित बनकर मलाई भी चाट रहे और प्रैक्टिस ईसाई मजहब की करते हैं।

आरक्षण नीति पर नया सवाल, सामाजिक बहस की शुरुआत

भारत संविधानिक रूप से धर्मनिरपेक्ष है। अनुच्छेद 25 हर नागरिक को धर्म चुनने की आजादी देता है। लेकिन कोर्ट ने कहा, “धर्म बदलना व्यक्तिगत विश्वास से होना चाहिए, न कि लाभ के लिए।” ऐसे में कोर्ट का यह फैसला आरक्षण व्यवस्था की नींव को मजबूत करता है। SC/ST कोटा शिक्षा, नौकरी और राजनीति में 22.5% आरक्षण देता है, जो राज्यों के स्तर पर अलग-अलग होता है। लेकिन इसके दुरुपयोग के आरोप लंबे समय से लगते रहे हैं। कुछ लोग इस वर्ग को मिलने वाले लाभ के लिए धर्म बदलकर भी योजनाओं का लाभ लेते रहते हैं। ऐसे में कोर्ट के फैसले ने इस तरह के फर्जीवाड़े को रोकने का रास्ता दिखा दिया है।

इस पूरे मुद्दे पर ऑपइंडिया ने सीनियर एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय से बातचीत की। उन्होंने कहा, “इलाहाबाद हाई कोर्ट का जो रिजर्वेशन के ऊपर फैसला है, बिल्कुल ठीक फैसला है। हमारे संविधान निर्माता भी यही कह रहे थे कि जो हिंदू दलित है, जो हिंदू में पिछड़े हैं, ट्राइबल है, उनको ही रिजर्वेशन का फायदा मिलेगा। जो हिंदू कन्वर्ट हो जाएगा, चाहे वह इस्लाम में चला जाए या ईसाइयत में चला जाए, उसको रिजर्वेशन का फायदा नहीं मिलेगा। यह संविधान निर्माताओं की भी मंशा थी। यही संविधान भी कहता है और यही हाई कोर्ट का फैसला भी है।”

अपनी बात आगे बढ़ाते हुए अश्विनी उपाध्याय ने कहा, “आप एक तरफ रिजर्वेशन का फायदा लो। यह कहते हुए हम तो ऐसी हैं और फिर दूसरी तरफ आप कन्वर्ट भी हो जाओ। अगर इसकी इजाजत दी गई तो कन्वर्जन बढ़ेगा और यह हमारे संविधान निर्माता बिल्कुल नहीं चाहते थे। रिजर्वेशन का सिस्टम लाया गया था। वह बहुत लिमिटेड समय के लिए लाया गया था। वह गरीबों के लिए लाया गया था। वो केवल और केवल हिंदुओं के लिए लाया गया था।”

एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय ने कहा, “कुछ लोग सुप्रीम कोर्ट आए हुए यह कहने के लिए एक नई नई दलितों की स्थिति तो वैसे ही रहती है। भले वह क्रिश्चियन बन जाए या इस्लाम कबूल कर लें। उस पर माननीय सुप्रीम कोर्ट ने सवाल पूछा ता कि अगर कन्वर्जन के बाद भी वही स्थिति रहनी है, तो फिर कन्वर्जन क्यों करना? फिर तो हिंदू बने रह सकते हैं। हालाँकि इसका जवाब अभी तक नहीं आया है। ये मामला सुप्रीम कोर्ट में भी पेंडिंग है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में माँग की गई थी कि इस्लाम-ईसाई मजहब अपनाने वालों को भी SC-ST का फायदा मिलना चाहिए, लेकिन अभी तक इस पर कोई फैसला नहीं आया है।

ऑपइंडिया से बातचीत में अश्विनी उपाध्याय ने आगे कहा, “इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला यूपी के लिए है लेकिन हाईकोर्ट का फैसला यह अपने आप में एक तरीके से बिल्कुल परफेक्ट फैसला है। इसलिए मध्य प्रदेश की सरकार, महाराष्ट्र की सरकार, देश के सभी अन्य राज्य सरकारों को भी इस फैसले को अपने स्तर पर लागू करना चाहिए और जो लोग कन्वर्ट हो गए हैं, चाहे वो इस्लाम में चले गए हों या ईसाई में, उनका एससी-एसटी का दर्जा खत्म करना चाहिए। उनको एससी-एसटी के मिलने वाले लाभ बंद होने चाहिए। जो लोग केवल हिंदू में रहते हैं और दलित हैं, उनको ही इसका फायदा मिलना चाहिए।”

न्याय की राह में अहम कदम है इलाहाबाद हाई कोर्ट का ये फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला जितेंद्र साहनी के व्यक्तिगत मामले से कहीं आगे जाता है। यह संविधान की भावना को बचाने की कोशिश है, जिसमें आरक्षण उत्पीड़ितों के उत्थान के लिए, न कि धोखे के लिए। जस्टिस गिरि की बेंच ने साफ कहा, “भारत सेक्युलर है, लेकिन कानून अंधा नहीं है।”

हालाँकि अब गेंद प्रशासन के पाले में आ गई है। ऐसे में क्या हाई कोर्ट के आदेश के मुताबिक, हाई कोर्ट के इस फैसले पर यूपी सरकार सख्ती से अमल करती है या फिर वो सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगी, ये तो आने वाला समय ही बताएगा। वैसे, एक बात अब साफ हो चुकी है कि सामाजिक न्याय की यह लड़ाई के नाम चल रहे धर्मांतरण रैकेटों और फर्जीवाड़ा करने वाले लोगों के लिए आगे की राह कठिन हो चली है।

जापान में मुस्लिमों को दफनाने की जगह नहीं, 40 वर्ष में 38 गुना बढ़ी मस्जिदों की संख्या: तेजी से बढ़ती मुस्लिम आबादी कितना बड़ा संकट

जापान में मुस्लिम आबादी की बेतहाशा वृद्धि दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच रही है। यहाँ बड़े-बड़े मस्जिद बन गए हैं। यहाँ तक कि विश्वविद्यालय में भी मस्जिद देखा जा सकता है। जापान के 47 प्रांतों में 2.3 लाख से 4.2 लाख आबादी इस्लाम को मानने वालों की है। हाल ही में कब्रिस्तान को बनाने के लिए जगह देने को लेकर जापानी संसद में सवाल पूछे गए। इसके बाद मुस्लिम आबादी का मामला सुर्खियों में आ गया।

जापान में हजार से लाखों में पहुँची मुस्लिम आबादी

दुनियाभर में मुस्लिम आबादी बेहताशा बढ़ रही है। एक अनुमान के मुताबिक, इस सदी के अंत तक ईसाइयों को पीछे छोड़ते हुए इस्लाम मानने वालों की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा होगी।

दुनिया में 200 से ज्यादा देशों में इनकी अच्छी खासी आबादी है। इन देशों में इस्लामी गतिविधियाँ तेजी से बढ़ी हैं। 2013 में विश्व जनसंख्या में मुस्लिम आबादी 1.6 अरब थी और 2050 तक 2.9 अरब यानी विश्व जनसंख्या का करीब 26% तक पहुँचने का अनुमान है। यही वजह से की विश्व के छोटे-छोटे देशों में भी इनकी संख्या दिन दुनी रात चौगुनी बढ़ रही है।

छोटा सा एशियाई देश जापान भी इससे अछूता नहीं है। 2016 के आंकड़ों के मुताबिक, जापान में मुस्लिम आबादी करीब 1.30 लाख थी। इनमें से 1.20 लाख विदेशी मुस्लिम और 10 हजार जापानी मुस्लिम रहते थे। लेकिन अब इस्लाम को माननेवालों की संख्या तेजी से बढ़ी है। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जापान के 47 प्रांतों में 2.3 लाख से 4.2 लाख आबादी है। मुस्लिमों की कुल आबादी जापान की आबादी का 0.18 फीसदी से 0.33 फीसदी है, जो साल-दर-साल बढ़ रही हैं।

ये लोग ज्यादातर प्रवासी कामगार हैं, जो टेक्नोलॉजी, बिजनेस और शिक्षा के क्षेत्र में योगदान दे रहे हैं। जापान में मुसलमानों पर स्टडी करने वाले वासेदा यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एमेरिटस हिरोफुमी तनाडा के एक सर्वे के मुताबिक, इनकी संख्या 200,000 से ज़्यादा होने का अनुमान है। मार्च 2021 तक, देश भर में मस्जिदों, यानी पूजा की जगहों की संख्या 1999 में 15 से बढ़कर 113 हो गई है।

जापानी की अधिकांश मुस्लिम आबादी (लगभग 80%) ग्रेटर टोक्यो क्षेत्र, चुक्यो महानगरीय क्षेत्र और किन्ही क्षेत्र में रहते हैं। अब इनका विस्तार दूसरे क्षेत्रों में भी हो रहा है।

जापान में तेजी से बन रहे हैं बहुमंजिला मस्जिद

ईरान और पाकिस्तान जैसे मुस्लिम देशों से मजदूरों के बढ़ते इमिग्रेशन और धर्मांतरण की वजह से जून 2024 तक यहाँ 149 मस्जिदें बन गई हैं। यानी इनकी संख्या 10 गुणा बढ़ गई हैं। कई मस्जिदों को बड़ा बनाया गया है।

टोक्यो में टोक्यो कैमी मस्जिद को हाल ही में बहुमंजिला बनाया गया है और समय-समय पर आम जनता को लुभाने के लिए इस्लामिक गतिविधियाँ चलाई जाती हैं। दिसंबर 2012 के मध्य में एक शुक्रवार को दोपहर के आसपास, टोक्यो के शिबुया वार्ड में टोक्यो कैमी मस्जिद में एक खास आवाज में आदमी ने अज़ान दिया और नमाज का समय बताया। उसने कहा, “मस्जिद घर जैसी है। अल्लाहु अकबर।”

टोक्यो कैमी मस्जिद (फोटो साभार- रिसर्च एसोसिएट हिरोफुमी ओकाई)

यहाँ तक कि विश्वविद्यालय में भी मस्जिद बन चुकी है। जैसे- वासेदा विश्वविद्यालय के टोकोरोजावा परिसर के पास एक इमारत बनी थी, जिसे मस्जिद के रूप में उपयोग करने के लिए पुनर्निर्मित किया गया है।

(फोटो साभार- प्रोफेसर तनाडा)

90 के दशक में बनी बेतहाशा मस्जिदें

1990 के दशक में यहाँ मस्जिदों की संख्या तेजी से बढ़ी। 1980 में जहाँ सिर्फ 4 मस्जिदें थी, वहीं 1990 के दशक में ये बढ़ कर 90 से ज्यादा हो गई। इन वर्षों में इस्लाम के प्रचार प्रसार के लिए बाहरी देशों से कई लोग आए और मस्जिदों में कार्यक्रम आयोजित कर जापानियों को लुभाने की कोशिश की गई यानी जापानियों के धर्मांतरण में इन कार्यक्रमों की अहम भूमिका रही।

अब हालात ये हैं कि न सिर्फ प्रवासी मुस्लिम आबादी बढ़ रही है, बल्कि जापान की मूल आबादी का धर्मांतरण तेजी से हुआ है। जापान में प्रवासी मुस्लिमों के बसने और परिवार बसाने की वजह से एक ‘हाइब्रिड मुस्लिम’ आबादी तैयार हो गई है। नमाज पढ़ना और रोजा रखना जैसे रीति रिवाज का पालन बड़ी आबादी करती है। इनमें कट्टरता भी देखी जाती है।

सांसद मिजुहो ने कब्रिस्तान बनाने पर प्रतिबंध लगाने की माँग की

जापान में हाल ही में ये खबर भी सामने आई कि सरकार ने शव दफनाने के लिए कब्रिस्तान बनाने के लिए जमीन देने से इनकार कर दिया है और प्रवासी मुस्लिमों को शव अपने देश लेकर दफनाने को कहा है। हालाँकि सरकार ने जापानी संसद में इसको लेकर स्पष्टीकरण दिया है।

दरअसल हाउस ऑफ काउंसिलर्स की प्रतिनिधि उमेमुरा मिजुहो ने कहा कि जापान में छोटा भू भाग है। प्राकृतिक आपदाएँ यहाँ होती रहती हैं, ऐसे में किसी बड़ी आपदा की स्थिति में दफनाने पर शवों के बाहर निकलने की संभावना है। साथ ही 99 फीसदी आबादी यहाँ दाह संस्कार करती है, इसलिए जापान की स्थिति को देखते हुए दफनाने से जुड़े नियम कड़े किए जाने चाहिए।

इसको लेकर सरकार ने स्थानीय सरकार को इसके बारे में विचार करने को कहा है। साथ ही स्थानीय रीति रिवाजों, नियमों और पर्यावरण को भी ध्यान में रखने को कहा है। क्योडो न्यूज़ एजेंसी के मुताबिक, पिछले कुछ सालों में मुस्लिम आबादी बढ़ने के बाद जापानी मुस्लिमों को दफनाने के लिए नई जगहों की जरूरत है।

एजेंसी का कहना है कि कुछ लोकल सरकारें बढ़ती मुस्लिम आबादी के लिए नए कब्रिस्तानों के लिए ज़मीन अलग रखने को तैयार हैं, जबकि दूसरी सरकारें इतनी मदद नहीं कर रही हैं।

जापान में दाह संस्कार आम बात है और 99.9% शवों का दाह संस्कार किया जाता है। इससे मुसलमान अपने दफ़नाने के तरीकों को लेकर परेशान हैं।

उत्तर-पूर्वी जापान में मौजूद मियागी प्रांत के गवर्नर ने दिसंबर में कहा था कि 2023 में इंडोनेशिया के साथ लोकल इलाकों के लिए मज़दूर देने के लिए मेमोरेंडम साइन करने के बाद एक नए कब्रिस्तान पर विचार किया जा रहा है।

जापान शांति पसंद देश माना जाता है। अनुशासन प्रिय इस देश की बड़ी आबादी बुजुर्ग हो चुकी है। ऐसे में कामगार की जरूरत को पूरा करने के लिए विदेशों से लोग यहाँ आकर बस रहे हैं। इनमें मुस्लिम आबादी सबसे ज्यादा है। खासकर ईरान, पाकिस्तान, इंडोनेशिया जैसे देशों से कामगार आकर यहाँ स्थायी रूप से बस रहे हैं। इसका असर जापान में दिखने लगा है।

श्रीलंकाई मीडिया से ‘ऑपरेशन सागर बंधु’ पर भारत को मिल रही तारीफ, भारत की बदनामी के चक्कर में खुद ही ट्रोल हुआ पाकिस्तान: जानिए कैसे भारत बना पड़ोसी का मददगार

श्रीलंका में चक्रवात दितवाह इतिहास की सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदा बनकर आया। श्रीलंकाई राष्ट्रपति अनुर कुमार दिसानायके ने इसे ‘सबसे चुनौतीपूर्ण विपदा’ घोषित किया। डिजास्टर मैनेजमेंट सेंटर (डीएमसी) के अनुसार, 25 जिलों में 1.55 मिलियन लोग प्रभावित हुए, जिसमें 2,33,000 लोग 1,441 आश्रय स्थलों में विस्थापित हैं।

565 घर पूरी तरह नष्ट हो गए और 20,271 आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हुए, जबकि केलानी नदी के किनारे बाढ़ ने कोलंबो जैसे शहरों तक को जलमग्न कर दिया।​ श्रीलंका की पहाड़ियों में भूस्खलन और पूर्वी राज्यों में बाढ़ के कारण बुनियादी ढाँचा ध्वस्त हो गया है। सड़कें, पुल और बिजली आपूर्ति बाधित रही।

यूएन ICEF ने 2,75,000 बच्चों को प्रभावित बताया, जबकि डब्ल्यूएफपी ने राहत कार्यों का परेशानी आने की बात कही। मौसम सुधरने के बावजूद, अलग-थलग समुदायों तक पहुँचना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।

दुनिया भर से राहत का आया वादा, भारत ने सबसे पहले पहुँचाई मदद

राहत कार्यों में डीएमसी और नेशनल डिजास्टर रिलीफ सर्विस सेंटर समन्वय कर रहे हैं, जिसमें खोज-बचाव, भोजन वितरण और चिकित्सा सहायता शामिल है। श्रीलंका की मदद करने के लिए यूके, चीन और अन्य देशों ने सहायता का वादा किया, लेकिन भारत ने सबसे तेज और बड़े पैमाने पर योगदान दिया।

भारत ने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए ऑपरेशन सागर बंधु शुरू किया। इसके तहत 28 नवंबर 2025 से 53 टन राहत सामग्री, NDRF की 80 सदस्यीय टीमें, IAF हेलीकॉप्टर और सेना कंटिंजेंट भेजे। आईएएफ ने 5.5 टन राहत पैकेट्स गिराए, दर्जनों को आपदा से निकाला और मंडारम नुवारा में 2,000 किलोग्राम आपूर्ति पहुँचाई

NDRF ने पुत्तलम में 800 लोगों की मदद की, जिसमें गर्भवती महिलाएँ और घायल शामिल थे। आईएनएस सुकन्या ने त्रिंकोमाली में आपूर्ति पहुँचाई, जबकि 2,000 से अधिक भारतीय नागरिकों को भी सुरक्षित निकाला गया।​

भारत की ओर से श्री लंका को भेजी गई मदद

भारतीय उच्चायुक्त संतोष झा ने सेडावट्टा में एनडीआरएफ कार्यों की समीक्षा की, जहाँ 6-10 फीट पानी में घर-घर खोज चल रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्रीलंकाई राष्ट्रपति अनुर कुमार दिसानायके से बात की। कुल मिलाकर ‘नेबरहुड फर्स्ट’ और ‘विजन महासागर’ नीति के तहत भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने 10 टन राहत आपूर्ति की पुष्टि की।

श्रीलंकाई मीडिया में भारत की मदद की प्रशंसा

भारत से मदद मिलने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से बातचीत कर श्रीलंका के राष्ट्रपति दिसानायके ने कहा कि भारत की त्वरित मदद ने राहत और बचाव कार्यों को मजबूती दी और श्रीलंकाई लोगों तक तेजी से मदद पहुँचाने में अहम भूमिका निभाई।

उन्होंने विशेष रूप से ‘रेस्क्यू टीमों और राहत सामग्री की तेज तैनाती’ की सराहना की और कहा कि श्रीलंका की जनता भारत की समय पर और प्रभावी प्रतिक्रिया की प्रशंसा कर रही है।​

साभार- dailynews.lk

पीएमओ और श्रीलंका सरकार की आधिकारिक प्रेस विज्ञप्तियों के मुताबिक, राष्ट्रपति ने यह भी रेखांकित किया कि भारत ने सिर्फ शुरुआती आपातकाल में ही नहीं, बल्कि पुनर्वास और पुनर्निर्माण के अगले चरणों में भी साथ देने का आश्वासन दिया है, जिसे कोलंबो अत्यंत सकारात्मक संकेत मान रहा है।

श्रीलंकाई दैनिक अखबार डेली मिरर ने भारत की चिकित्सा टीम को जाफेला क्षेत्र में जीवनरक्षक बताया, जहां बाढ़ प्रभावित इलाके में बिना बिजली के पाँच दिनों बाद आरोग्य मैत्री टीम ने इलाज शुरू किया।

इसी अखबार ने ऑपरेशन सागर बंधु के तहत भारत द्वारा 53 टन राहत सामग्री भेजने का उल्लेख किया, जिसमें एनडीआरएफ और वायुसेना की भूमिका प्रमुख रही। डेली न्यूज ने लगातार रिपोर्ट्स में भारत की खोज-बचाव और चिकित्सा सहायता जैसे जाफेला में मेडिकल कैंप और साइक्लोन दितवाह से प्रभावित क्षेत्रों में सहयोग की सराहना की।​

श्रीलंका के विशेष वर्ग जैसे सेलेब्रिटीज और क्रिकेटर्स के साथ आम लोगों ने भी सोशल मीडिया के जरिए भारत और यहाँ से भेजी गई मदद की सराहना की। रेडिट पर एक यूजर ने लिखा, “दितवाह चक्रवात में प्रभावित लोगों और इाकों में मदद पहुँचाने के लिए भारत और यहाँ के लोगों का दिल से आभार। आप सच्चे दोस्त हैं।”

पाकिस्तान की आलोचना और एक्सपायर्ड सामान

पाकिस्तान ने दावा किया कि भारत ने श्रीलंका के लिए उसकी सहायता विमान को एयरस्पेस न देकर रोका, लेकिन भारत ने इसे खारिज कर तुरंत मंजूरी देने की बात कही। विदेश कार्यालय ने एक्स पर कहा कि सी-130 विमान 60 घंटे से अधिक इंतजार कर रहा और भारत की आंशिक मंजूरी से काम नहीं हो पा रहा था।

पाकिस्तानी उच्चायोग ने भारत पर ‘शेनानिगन्स’ का आरोप लगाया, जबकि प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने राहत अभियान का आदेश दिया।​ भारत ने इस दावे को ‘हास्यास्पद’ बताकर खारिज किया। तथ्यों के साथ इस बात को सिद्ध कर दिया कि एयरस्पेस के लिए माँगी गई मंजूरी महज 4 घंटे में ही दे दी गई थी।

हालाँकि इस पर मीडिया ने रिपोर्ट किया कि भारत ने पाकिस्तानी उड़ान के लिए देरी से एयरस्पेस खोला। उसने लिखा कि पाकिस्तान ने समुद्री मार्ग से 200 टन सहायता भेजी, लेकिन हवाई अभियान में देरी हुई।

पाकिस्तान के नापाक इरादों के बाद उसकी खिल्ली खुद तब उड़ गई जब श्रीलंका को भेजी गई राहत सामग्री में एक्सपायर्ड दवाएँ और खाद्य सामग्री मिली। इनकी एक्सपायरी डेट अक्टूबर 2024 अंकित थी।

इससे जुड़ी फोटो भी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुई और पाकिस्तान को कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा। नेटिजनंस ने ‘Have Some Shame’ जैसे हैशटैग ट्रेंड कर पाकिस्तान को आड़े हाथों लिया। श्रीलंका ने भी इस पर असंतोष जताया।

कुल मिलाकर अगर कहा जाए तो आपदा में जहाँ एक ओर भारत ने आगे बढ़कर श्रीलंका की न केवल मदद की, बल्कि ये भी साबित किया कि वह एक बेहतर पड़ोसी देश की भूमिका निभाने में कभी पीछे नहीं रहेगा।

वहीं दूसरी ओर, पाकिस्तान ने इस संकट के समय में भी अपनी असलियत दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। भारत की बेइज्जती करने की कोशिश में पाकिस्तान को इस बार भी मुँह की खानी पड़ी जब खुद के भेजे गए राहत सामग्री की एक्सपायरी सामने आई। इसके साथ ही दुनिया को ये बी पता चला कि पाकिस्तान वहीं हाथी है जिसके खाने के दाँत अलग और दिखाने के दाँत अलग हैं जिससे आगाह रहने की आवश्यकता है।

पुतिन के भारत दौरे से पहले यूरोप का प्रोपेगेंडा, UK-फ्रांस-जर्मनी के राजदूतों ने TOI में लिखा ‘ज्ञान बाँटू’ लेख: भारत ने दिखाए कड़े तेवर, कहा- ‘हमारी विदेश नीति हम तय करेंगे’

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत आने वाले थे, और दिल्ली का कूटनीतिक गलियारा उनके स्वागत की तैयारियों में जुटा था। लेकिन तभी, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी के दूतों को न जाने क्या सूझा कि उन्होंने एक भारतीय अखबार ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में ‘ज्ञान’ देने वाला एक लेख छपवा डाला। लेख का मकसद रूस को यूक्रेन युद्ध का विलेन बताना और भारत को कान में फुसफुसाकर समझाना कि ‘रूस से दूरी बनाओ’ था।

लेकिन भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने इस अवांछित दखल को सीधा-सीधा ‘कूटनीतिक बदतमीजी’ करार देते हुए उन्हें करारा जवाब दिया। यूरोपीय दूतों ने सोचा कि भारत उनका मंच है, पर MEA ने साफ कर दिया कि यह देश किसी के एजेंडे पर नहीं चलता। पुतिन की यात्रा से पहले माहौल बिगाड़ने का यह खेल बुरी तरह से उल्टा पड़ गया है और अब भारत ने यूरोप को आईना दिखा दिया है।

UK-फ्रांस-जर्मनी ने अपने लेख में क्या छपवाया था?

इन तीनों देशों के दूतों (फिलिप एकरमैन, थिएरी मथौ और लिंडी कैमरून) ने एक साथ मिलकर टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI) में जो लेख छपवाया, उसमें रूस पर सीधे-सीधे युद्ध भड़काने और यूक्रेन में क्रूरता दिखाने के आरोप लगाए गए। लेख का पूरा टोन ऐसा था जैसे वे भारत को समझा रहे हों कि रूस से दूरी बनाओ और यूरोप के नजरिए को अपनाओ। उन्होंने लिखा कि रूस ने यूक्रेन युद्ध ‘निर्दयता’ से लड़ा है और उसे ‘मानव जीवन की कोई परवाह नहीं’ है। उनका दावा था कि रूस साइबरअटैक, झूठी खबरें और दूसरे तरीकों से दुनिया में अस्थिरता फैलाता है। लेख में यहाँ तक कहा गया कि पुतिन ‘जानबूझकर शांति वार्ता में देरी करते हैं’ और शांति को लेकर गंभीर नहीं हैं।

TOI में छपा लेख

लेख का लहजा ऐसा था कि मानो भारत को पढ़ाया जा रहा हो कि रूस कैसे गलत है और कैसे दुनिया उसके खिलाफ खड़ी है। उन्होंने यह भी लिखा कि दुनिया युद्ध खत्म करना चाहती है, लेकिन रूस ऐसा नहीं चाहता। यानी पूरे लेख में कोशिश यही थी कि भारत की जनता और नीति-निर्माताओं में रूस को लेकर नकारात्मक सोच पैदा की जाए। यह पूरा लेख पुतिन की भारत यात्रा से ठीक पहले छापा गया, ताकि माहौल बिगाड़ा जा सके और भारत-रूस रिश्तों में दूरी लाई जा सके।

लेख में तीनों ने साफ तौर पर यह कोशिश की कि भारत पर नैतिक दबाव बनाया जाए कि वह रूस से अपने रिश्तों पर पुनर्विचार करे। उन्होंने यहाँ तक कहा कि रूस का ‘वैश्विक व्यवहार खतरनाक’ है और उसकी नीतियाँ यूक्रेन से बाहर भी दुनिया की स्थिरता के लिए खतरा हैं। सबसे दिलचस्प बात यह रही कि लेख में उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी का नाम लेते हुए कहा कि ‘जंग से समाधान नहीं निकलते’, जैसे वे भारत की विदेश नीति को अपने तर्ज पर ढालना चाह रहे हों। यह सब करते हुए उन्होंने यह नहीं सोचा कि भारत अपनी विदेश नीति खुद तय करता है, किसी यूरोपीय निर्देश पर नहीं।

कुल मिलाकर, यह लेख सिर्फ युद्ध पर राय नहीं था, बल्कि भारत को घुमा-फिराकर यह बताने की नाकाम कोशिश थी कि वह रूस से दूरी बनाए। यही वजह है कि इस पूरे मामले ने कूटनीतिक बवाल खड़ा कर दिया और भारत के विदेश मंत्रालय को भी कड़ी प्रतिक्रिया देनी पड़ी।

कंवल सिबल की कड़क प्रतिक्रिया- ‘ये लेख नहीं, प्रचार का पोस्टर’

पूर्व विदेश सचिव कंवल सिबल ने इस लेख पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने X पर पोस्ट कर लिखा, “पुतिन की भारत यात्रा से ठीक पहले रूस के खिलाफ छापा गया यह घटिया और जहरीला लेख सीधा-सीधा कूटनीतिक नियमों की धज्जियाँ उड़ाता है। यह भारत का अपमान है, क्योंकि यह हमारे एक बेहद करीबी और भरोसेमंद दोस्त देश ‘रूस’ के साथ हमारे रिश्तों पर सवाल उठाता है।”

कंवल सिबल आगे लिखते हैं, कि ये तीनों देशों के दूत भारत के अंदरूनी मामलों में दखल दे रहे हैं। साफ इरादा यही है कि भारत में बैठे pro-Europe लोग रूस के खिलाफ भड़कें और हमारे रूस के साथ रिश्तों की नैतिकता पर उंगली उठाई जाए। इन दूतों को अगर इतनी ही चिंता थी, तो MEA के पास आधिकारिक तौर पर आकर बात करते। लेकिन नहीं, इन्होंने जानबूझकर ऐसा पब्लिक तमाशा किया है, ताकि अपना प्रोपेगेंडा फैलाया जा सके।

इसके अलावा, पूर्व विदेश सचिव ने लिखा, “टाइम्स ऑफ इंडिया ने भी बड़ी गैर-जिम्मेदारी दिखाई है कि उसने ऐसा लेख छापा। यह भारत की कूटनीति और राष्ट्रीय हित, दोनों के साथ खुला खिलवाड़ है। MEA को चाहिए कि वह इन तीनों दूतों की इस हरकत पर खुलकर नाराजगी जताए, क्योंकि यह साफ तौर पर कूटनीतिक शिष्टाचार का उल्लंघन है।”

विदेश मंत्रालय का कड़ा रुख: ‘हमें मत सिखाओ’

हमारे विदेश मंत्रालय ने इन यूरोपीय दूतों को बिल्कुल साफ और सीधी भाषा में आईना दिखा दिया है। MEA के अधिकारियों ने कहा कि इस तरह किसी विदेशी दूत का भारतीय अखबार (TOI) में आकर भारत को सीख देना न सिर्फ असामान्य है बल्कि पूरी तरह गलत कूटनीतिक तरीका है। दुनिया में कहीं भी राजनयिक ऐसे खुलेआम किसी देश की विदेश नीति में दखल नहीं देते, लेकिन ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी के दूतों ने मिलकर यही काम किया और वो भी पुतिन के भारत आने से ठीक पहले।

विदेश मंत्रालय ने साफ-साफ कहा कि यह ‘कूटनीतिक व्यवहार स्वीकार्य नहीं‘ है कि कोई हमें सार्वजनिक रूप से बताए कि हमें रूस जैसे तीसरे देश के साथ कैसे रिश्ते रखने चाहिए। भारत किसी का पिछलग्गू नहीं है। हम कोई उपनिवेश नहीं हैं कि यूरोप बताता फिरें कि हमें किससे दोस्ती करनी है और किससे दूरी रखनी है। भारत एक स्वतंत्र देश है और अपनी विदेश नीति अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर तय करता है, न कि यूरोप के नैरेटिव, दबाव या एजेंडे के हिसाब से।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह पूरा विवाद ऐसे समय में खड़ा किया गया, जब भारत और रूस एक महत्वपूर्ण श्रम समझौते पर बातचीत कर रहे हैं। इस समझौते से हजारों भारतीयों को रूस में नौकरी के नए अवसर मिलने वाले हैं। यानी जबकि भारत अपने नागरिकों के लिए मौके बढ़ा रहा है और द्विपक्षीय रिश्तों को मजबूत कर रहा है, यूरोपीय देश यहाँ प्रोपेगेंडा फैलाने की कोशिश में लगे थे। लेकिन भारत ने साफ कर दिया है कि हमें ऐसी चालबाजियों से कोई फर्क नहीं पड़ता। हम वही करेंगे जो हमारे देश के हित में है और कोई भी बाहरी ताकत इसे रोक नहीं सकती।

बंद करें ये दखलअंदाजी

ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी के दूतों को यह समझना चाहिए कि भारत अब 1947 वाला देश नहीं है। वे इस तरह का दखल और प्रचार करके भारत की विदेश नीति को नहीं बदल सकते। यह आर्टिकल न केवल ओछी हरकत थी, बल्कि उस भारतीय अखबार TOI की भी गलती है जिसने विदेशी दूतों को देशहित के खिलाफ जाकर अपनी बात रखने की जगह दी। इन दूतों को अपनी सीमा में रहना चाहिए और भारत के रिश्तों पर सवाल उठाना बंद कर देना चाहिए। भारत और रूस का साथ मजबूत है और ऐसे फालतू लेख इसे जरा भी हिला नहीं सकते।

जॉर्ज सोरोस की फंडिंग वाली RSF ने ‘ऑपइंडिया’ को बनाया निशाना, ‘प्रेस की आजादी’ के नाम पर प्रोपेगेंडा: विदेशी फेक न्यूज फैक्ट्रियों के निशाने पर भारत की राष्ट्रवादी आवाज

2025 के आखिर में अचानक एक मोड़ आया, जब RSF ने भारत के हिंदू राष्ट्रवादी न्यूज़ आउटलेट OpIndia को अपनी सालाना ‘प्रेस फ्रीडम प्रिडेटर्स’ लिस्ट में एलन मस्क और अडानी ग्रुप जैसे ग्लोबल कॉर्पोरेट दिग्गजों के साथ शामिल किया। इस की वजह से RSF की न्यूट्रैलिटी और पॉलिटिकल एजेंडा पर बड़े पैमाने पर चर्चा हुई। OpIndia राष्ट्रवादी और सॉवरेन नैरेटिव का एक घोर समर्थक है।

कई लोगों ने OpIndia को शामिल करने को राष्ट्रवादी आवाजों को बदनाम करने की बड़ी योजना के रूप में देख रहे हैं। यह लिस्टिंग RSF की पिछली रिपोर्टों की वजह से हुआ है। इनमें राष्ट्रवादियों को प्रेस की आजादी के लिए खतरा बताया गया था और मोदी सरकार के दौरान मीडिया के माहौल की आलोचना की गई थी।

UK की टेलीग्राफ ने बताया कि कैसे RSF ने दुनिया को भारत के डेमोक्रेटिक माहौल और प्रेस लैंडस्केप को बताया। इसमें दुनिया भर में आलोचना के साथ अलग-अलग भारतीय मीडिया और कॉर्पोरेट हस्तियों के गठबंधन को हाईलाइट किया गया।

यह रिसर्च RSF के फाइनेंसिंग सोर्स को ट्रैक करके इसकी जाँच करती है। इनमें से ज्यादातर पश्चिमी सरकारी संगठनों और शासन परिवर्तन से जुड़े फाउंडेशन हैं। जैसे- US कांग्रेस द्वारा फंडेड नेशनल एंडोमेंट फॉर डेमोक्रेसी (NED)।

यह बेलिंगकैट (Bellingcat) जैसे जाँच संगठनों के साथ RSF के कनेक्शन की भी जाँच करता है। स्टडी से पता चलता है कि RSF स्वतंत्र पत्रकारिता का निष्पक्ष संरक्षक नहीं है, बल्कि भारत की संप्रभुता और लोकतंत्र पर दुनिया भर में चल रही वैचारिक लड़ाई को हवा देता है।

RSF: इमेज बनाम इकोसिस्टम

RSF द्वारा पब्लिश वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स (WPFI) की चर्चा पश्चिमी सरकारों, मल्टीलेटरल संगठनों और लेगेसी मीडिया द्वारा किया जाता है। RSF खुद को एक इंटरनेशनल NGO के रूप में पेश करता है, जो दुनिया भर में प्रेस फ्रीडम का बचाव करता है।

यह इंडेक्स बिना किसी जानकारी के, सोच-समझकर किए गए सर्वे पर निर्भर करता है। इसमें जवाब देने वालों का नाम नहीं बताया जाता और कैटेगरी के हिसाब से स्कोरिंग नहीं होती। भारत के ऑफिशियल पॉलिसी थिंक टैंक नीति आयोग ने भी इसकी जानकारी दी है।

भारत और दूसरी जगहों के आलोचकों के मुताबिक, ऐसा इंडेक्स एक न्यूट्रल असेसमेंट के बजाय एक जियोपॉलिटिकल टूल बनने का खतरा रहता है। यह एक सब्जेक्टिव सवालों के जवाबों पर आधारित होता है।

असल में RSF देशों के नैरेटिव अक्सर पश्चिमी ह्यूमन राइट्स ऑर्गनाइज़ेशन और उनसे जुड़े मीडिया की बातों को दिखाते हैं। खासकर जब बात भारत, हंगरी और दूसरे देशों की आती है, जिन्हें ‘इलीबरल’ या ‘नेशनलिस्ट’ माना जाता है। कॉर्पोरेट कंसोलिडेशन, इंटेलिजेंस लीक और सर्विलांस स्कैंडल जैसी पश्चिमी स्ट्रक्चरल समस्याओं को आम तौर पर छोटी-मोटी गड़बड़ियाँ बताया जाता है। RSF अक्सर भारत के हिंदू राष्ट्रवाद को जर्नलिज़्म के लिए खतरा बताते हैं।

फंडिंग: पश्चिमी सरकारें, NED और शासन बदलने वाली समाज सेवा

RSF को पश्चिमी सरकारों और डेमोक्रेसी को बढ़ावा देने वाले संगठनों से मदद मिलती है। OpIndia-CSDS डॉक्यूमेंट में बताई गई रिसर्च बताती है कि RSF को इनसे फंडिंग मिली है:

  1. फ्रांस की सरकारी एजेंसियां, जिनमें फ्रेंच डेवलपमेंट एजेंसी (AFD), विदेश मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, गृह मंत्रालय, संस्कृति मंत्रालय और बेयूक्स शहर शामिल हैं।
  2. यूरोपियन कमीशन का यूरोपियन इंस्ट्रूमेंट फॉर डेमोक्रेसी एंड ह्यूमन राइट्स (EIDHR)।
  3. इसी तरह के यूरोप के मदद करने वाले संगठन, जैसे स्वीडिश इंटरनेशनल डेवलपमेंट एजेंसी (SIDA)।
  4. नेशनल एंडोमेंट फॉर डेमोक्रेसी (NED), जिसे US कांग्रेस से फंड मिलता है। यह संगठन स्पष्ट तौर पर बताता है कि यह डेमोक्रेसी को बढ़ावा देता है। इसे मुख्य रूप से US सरकार का सपोर्ट है।

फोर्ड फाउंडेशन जैसे बड़े US फाउंडेशन, जिनका भारत में पॉलिटिकल एक्शन और लॉबिंग को सपोर्ट करने का लंबा और विवादित इतिहास रहा है। इसमें वे संगठन भी शामिल हैं, जिन पर बाद में फाइनेंशियल गड़बड़ियों और भारत विरोधी कैंपेन के आरोप लगे, वे भी RSF से जुड़े हैं। ऑपइंडिया पेपर में बताई गई इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग के मुताबिक, RSF ने US-EU के रिजीम चेंज इनिशिएटिव्स के टारगेटेड सरकारों, जैसे वेनेजुएला के खिलाफ लगातार सख्त रुख अपनाया है। उन देशों में US फंडेड ऑर्गनाइजेशन्स और अमीरों के मालिकाना हक वाले विपक्षी मीडिया को सपोर्ट किया है।

यह डोनर प्रोफाइल साफ तौर पर RSF को जाने-माने ‘डेमोक्रेसी प्रमोशन’ नेटवर्क में रखती है। NGOs, मीडिया इनिशिएटिव्स, इंडेक्स और लॉबिंग कैंपेन जो वेस्टर्न जियोपॉलिटिकल पसंद के खिलाफ सरकारों में ‘अथॉरिटेरियनिज्म’ को खास तौर पर हाईलाइट करते हैं, जिनमें से भारत भी एक है। उन्हें वेस्टर्न सरकारों और उनसे जुड़े इंस्टीट्यूशन्स द्वारा फंड दिया जाता है।

वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स का विवादास्पद तरीका

RSF के इंडेक्स की तीन मुख्य समस्याएँ हैं – ओपेसिटी, सब्जेक्टिविटी और सेलेक्टिव एम्फेसिस, जो कई इंडियन और इंटरनेशनल समीक्षा पर आधारित हैं।

ओपेसिटी: यह ऑडिट करना मुश्किल है कि भारत के लिए खास स्कोर कैसे बनाए गए? वैसी ही स्थिति वाले देशों से कैसे की जाए, क्योंकि RSF सवाल के हिसाब से स्कोर या अपने जवाब देने वालों की पहचान और इंस्टीट्यूशनल लोकेशन नहीं बताता है।

सब्जेक्टिविटी: इंडेक्स सोच पर आधारित है। ‘एक्सपर्ट्स’ ‘ओनरशिप प्रेशर’, ‘हेट कैंपेन’, और ‘सेल्फ-सेंसरशिप’ जैसे मुद्दों पर सर्वे पूरा करते हैं। एक्सपर्ट्स का यह ग्रुप ज़्यादातर लिबरल-प्रोग्रेसिव, वेस्टर्न सोच वाले होते हैं। खासकर कंजर्वेटिव या नेशनलिस्ट सरकारों के विरोध में इनकी राय होती है।

सिलेक्टिव : आलोचकों का कहना है कि जहाँ भारत जैसे देशों को ‘हिंदू नेशनलिस्ट प्रेशर’ और सोशल मीडिया ट्रोलिंग जैसे नैरेटिव की वजह से कड़ी सज़ा मिलती है, वहीं गंभीर स्ट्रक्चरल दिक्कतों वाले वेस्टर्न डेमोक्रेसी में मीडिया ओनरशिप, सिक्योरिटी कानूनों का अग्रेसिव इस्तेमाल और इंटेलिजेंस मिलीभगत काफी ज्यादा है।

भारत सरकार के एक डिस्कशन पेपर के मुताबिक, RSF का तरीका पॉलिसी बेंचमार्क के तौर पर काफ़ी नहीं है, क्योंकि इसमें ‘प्रेस की आज़ादी की आम सहमति वाली परिभाषा की कमी है।’ ‘सैंपल साइज बहुत कम है,’ ‘पैरामीटर्स का नॉन-ट्रांसपेरेंट वेटिंग है।’

इनको देखते हुए ऑपइंडिया ने इंडेक्स को ‘ग्लोबल लेफ्ट की कहानी को फैलाने के लिए बनाया गया एक बायस्ड टूल’ बताया है। दरअसल RSF का पुराना डेटा बताता है कि कॉन्ग्रेस के सालों में भारत का मीडिया माहौल गिरा, लेकिन यह बहस मोदी सरकार के कार्यकाल पर ज्यादा हमला करती है।

RSF और भारत: राष्ट्रवादी राजनीति के खिलाफ मनगढ़ंत बातें बनाना

RSF की भारत फैक्ट शीट और प्रेस रिलीज में अक्सर एक तय टेम्पलेट को हाईलाइट किया जाता है। ‘हिंदू राष्ट्रवादी भीड़,’ ‘मोदी समर्थक,’ ‘भक्त’ और ‘राइट-विंग इकोसिस्टम’ को पत्रकारों के सामने आने वाले मुख्य खतरों के तौर पर हाईलाइट किया जाता है।

स्थानीय या राष्ट्रवादी बैकग्राउंड के पत्रकारों के खिलाफ हिंसा को ज़्यादातर उन घटनाओं और कहानियों के पक्ष में नजरअंदाज कर दिया जाता है, जिन्हें अंग्रेजी भाषा की लिबरल साइटों के एक खास ग्रुप द्वारा मजबूत किया जाता है। इनमें से कई पश्चिमी फाउंडेशन से जुड़ी हैं।

लगभग ‘कब्जा किए गए मीडिया’ की इमेज के साथ मेल न खाने के बावजूद, भारत के मीडिया में स्ट्रक्चरल वैरायटी, हजारों पत्रकारों, सैकड़ों चैनलों और कई बड़े प्लेटफॉर्म पर मोदी सरकार की तीखी आलोचना वाली कवरेज इन्हें कम दिखता है।

CSDS-लोकनीति की ‘इंडियन मीडिया, ट्रेंड्स और पैटर्न’ पर रिपोर्ट को OpIndia ने अपने रिसर्च में शामिल किया है। भारतीय मीडिया की आज़ादी के बारे में RSF नकारात्मक वर्णन करता है। इसमें यह दावा किया जाता है कि ज्यादातर पत्रकारों का मानना ​​है कि मीडिया आउटलेट सत्ताधारी BJP को सपोर्ट करते हैं। हालाँकि, सर्वे के नतीजे, जैसे कि ‘85% महिला पत्रकारों को मेंटल हेल्थ की दिक्कतें’ थीं और 1.4 बिलियन की आबादी वाले देश में से 206 पत्रकारों के एक छोटे से सैंपल से लिए गए थे।

OpIndia के अनुसार, ग्लोबल इंडेक्स भारत की बुराई करता है, एक घरेलू विदेशी फंडेड थिंक टैंक इंडेक्स पर आधारित है और फिर ‘मीडिया में लोकतंत्र की कमी’ के तौर पर पेश करता है। यह फीडबैक लूप RSF की सब्जेक्टिव स्टोरी और CSDS के कम डेटा की वजह से होता है।

RSF OpIndia को एक ‘हिंदू राष्ट्रवादी वेबसाइट’ बताता है जो सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों को ‘बदनाम’ करती है। ये तकनीक या विचारधारा पर की गई आपत्ति को प्रेस की आजादी से जोड़कर देखती है। यह एक स्ट्रैटेजी है, जिसमें इंडेक्स को चुनौती देने वालों को पत्रकारिता का दुश्मन बताया जाता है, जिससे असल में असली मुद्दा कहीं खो जाता है।

बेलिंगकैट: OSINT, NED का पैसा और इंटेलिजेंस शैडो

नीदरलैंड्स का एक ‘ओपन सोर्स इन्वेस्टिगेशन’ ग्रुप माना जाता है बेलिंगकैट। इसकी रूस, सीरिया जैसे देशों में काम करने को लेकर वेस्टर्न मीडिया ने तारीफ़ की है। यह OpIndia-CSDS स्टडी में बताए गए नेटवर्क का एक ज़रूरी हिस्सा है।

पब्लिक रिकॉर्ड के मुताबिक, बेलिंगकैट को नेशनल एंडोमेंट फॉर डेमोक्रेसी (NED) से डोनेशन मिला है। यह एक US कॉन्ग्रेस फंडिंग संगठन है, जिसे खास तौर पर उन संगठन की मदद के लिए बनाया गया है, जो विदेशों में US के हितों को बढ़ावा देते हैं। इसके अलावा, इसे कई पश्चिमी सरकार से जुड़े संस्थानों से फंडिंग मिलती है। खासकर यूरोपियन और ब्रिटिश सोर्स से।

यहाँ तक ​​कि इनके प्रति हमदर्दी रखने वाले सोर्स भी मानते हैं कि इस तरह की फंडिंग अक्सर उन स्टडीज़ को बढ़ावा देने के लिए दी जाती है, जो पश्चिम की विदेश नीति के हिसाब से हों, जैसे- रूस में सेना की मूवमेंट को ट्रैक करना या सीरिया में केमिकल हथियारों के आरोप। ये आरोप आसानी से NATO की बातों से मेल खाते हैं।

इसलिए, क्रिटिकल ऑब्ज़र्वर NED को US विदेश नीति के लिए एक ‘फ्रंट’ मानते हैं, जिसे खुले तौर पर वही करने के लिए बनाया गया था, जो CIA कभी चुपके से करती थी। बेलिंगकैट उस इकोसिस्टम का हिस्सा है, जो पश्चिमी स्ट्रेटेजिक मैसेजिंग के लिए फायदेमंद जानकारी के फ्लो को बढ़ाता और ढोता है। बेलिंगकैट पर रूसी सरकार और दूसरों ने सीधे तौर पर पश्चिमी इंटेलिजेंस का पिछलग्गू होने का आरोप लगाया है। इन देशों ने ऐसे उदाहरण भी दिए हैं।

ग्लोबल इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म नेटवर्क (GIJN), OCCRP, फॉरबिडन स्टोरीज, इंटरन्यूज, ICIJ, DRFLab, फ्रीडम हाउस, NED, और दूसरे संगठन जिन्हें पश्चिमी सरकारों, सोरोस के ओपन सोसाइटी फाउंडेशन, ओमिडयार नेटवर्क, फोर्ड फाउंडेशन और इसी तरह के दूसरे लोगों से फंडिंग मिलती है।

ये सभी जानकारी OpIndia–CSDS पेपर में शामिल हैं। विदेशी फंडेड स्टोरी को ‘इंडिपेंडेंट इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म’ की आड़ में चलाया जाता है। इसकी वजह ये भी है कि उनमें से कई भारतीय मीडिया आउटलेट्स और एक्टिविस्ट्स के साथ मिलकर काम किया गया होता है, जो मोदी सरकार और हिंदुत्व के सख्त खिलाफ हैं।

इस तरह, बेलिंगकैट उस बड़े इकोसिस्टम के लिए एक मॉडल का काम करता है। यह एक ऑफिशियली मान्यता प्राप्त गैर सरकारी संगठन है। यह काफी हद तक वेस्टर्न सिक्योरिटी और फॉरेन पॉलिसी एजेंडा के हिसाब से है। इसे अक्सर वही वेस्टर्न मीडिया आउटलेट्स निष्पक्ष जानकारी वाले सोर्स के तौर पर पेश करते हैं। साथ ही इसे फंड करते हैं।

RSF का सीरियाई मीडिया प्रोजेक्ट्स और नैरेटिव

ऑपइंडिया रिपोर्ट में सीरिया केस स्टडी दिखाती है कि कैसे RSF जैसे संगठन विवादित क्षेत्रों में वेस्टर्न देशों के साथ मिलकर काम करते हैं। दस्तावेज के मुताबिक, कैनाल फ्रांस इंटरनेशनल (CFI), एक फ्रेंच मीडिया-सपोर्ट संगठन है, जिसे फ्रेंच फॉरेन मिनिस्ट्री का सपोर्ट है।

यह रेडियो रोज़ाना को फंडिंग देता है। यह एक सीरियाई चैनल है, जिसे RSF ने ‘इंडिपेंडेंट’ बताया। डेनमार्क, स्वीडन और नॉर्वे की सरकारें इंटरनेशनल मीडिया सपोर्ट के लिए फंडिंग देती हैं। RSF खुद दूसरे वेस्टर्न डोनर्स के साथ मिलकर फंडिंग करता है।

रेडियो रोज़ाना ने आरा पैसिस इनिशिएटिव के ‘सीरियाज़ा’ नैरेटिव प्रोजेक्ट के साथ मिलकर काम किया है। इसे खास तौर पर इटैलियन फॉरेन मिनिस्ट्री ने फंड किया था और इटैलियन सरकार और प्रेसिडेंसी के समर्थन में ऑपरेट किया गया था।

सीरिया में और उसके बारे में लोगों की राय को प्रभावित करने के लिए ‘नैरेटिव’ और ‘स्टोरीटेलिंग’ बनाने का जिक्र प्रोजेक्ट में किया गया है।

जब इसे पूरा देखा जाए, तो यह एक मॉडल दिखाता है। पश्चिमी सरकारें RSF और CFI जैसे बिचौलियों के जरिए मीडिया आउटलेट्स को फाइनेंस करती हैं, फिर उन पत्रकारों के लिए कंटेंट और ‘कैपेसिटी बिल्डिंग’ करती हैं, जिनका काम उनके नेरेटिव से मेल खाता है।

आम तौर पर इसमें ‘टारगेट की गई सरकार’ और ‘तानाशाह शासक’ होते हैं, जबकि पश्चिमी देशों के समर्थन वाली विपक्षी ताकतें डेमोक्रेट होती हैं।

ऐसे देशों में RSF ‘प्रेस की आज़ादी’ की घोषणा करता है, तो वह असल में उन जानकारियों का मूल्यांकन कर रहा होता है, जहाँ डोनर का हित हो।

भारत में काम करने वाला नेटवर्क: CSDS, KAS, RSF और GIJN

OpIndia रिसर्च से पता चलता है कि RSF का भारत के एक बड़ा नेटवर्क है। ये कई संस्थानों को फंडिंग करती है और उसकी पार्टनर है या विचारधारा को शेयर करती हैं।

1.पेपर में कहा गया है कि दिल्ली का थिंक टैंक कहलाने वाला CSDS और उसका प्रोग्राम अक्सर पश्चिमी संगठनों और सरकार से जुड़े डोनर्स के साथ मिलकर ‘हिंदू बहुसंख्यकवाद,’ दलित-मुस्लिम जुड़ाव और जाति विभाजन की बातों को सिस्टमैटिक तरीके से बढ़ाता है।

2.कोनराड एडेनॉयर स्टिफ्टंग (KAS) एक जर्मन फाउंडेशन है जो CDU से राजनीतिक तौर पर जुड़ा हुआ है। यह लगभग पूरी तरह से जर्मन पब्लिक फंड से स्पॉन्सर है और इसने 2016 से CSDS को ₹2.6 करोड़ से ज़्यादा की ‘सहायता’ दी। यह एक खास ‘मीडिया प्रोग्राम एशिया’ भी चलाता है जो युवाओं और इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज़्म पर केन्द्रित है।

3.’अनकवरिंग एशिया’ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज़्म कॉन्फ्रेंस के स्पॉन्सर GIJN, OCCRP, फोर्ड फाउंडेशन, ओपन सोसाइटी फाउंडेशन, ओक फाउंडेशन समेत कई थे। इसमें शामिल होने वाले भारतीय लोगों में वे पत्रकार और मीडिया आउटलेट थे, जो लगातार मोदी सरकार और हिंदुत्व की बुराई करते रहे हैं।

स्टडी के मुताबिक, RSF इस वेब के लिए एक अच्छा सोर्स है। इंटरनेशनल इन्वेस्टिगेटिव नेटवर्क एक-दूसरे के काम को क्रॉस-प्रमोट करते हैं। इंटरनेशनल डोनर्स इनकी फंडिंग के लिए एक ही पूल का इस्तेमाल करते हैं। CSDS इंडियन मीडिया के पतन पर RSF का रेफरेंस देता है, और RSF वेस्टर्न-फंडेड इंडियन आउटलेट्स के नैरेटिव्स पर निर्भर रहता है।

इनका एक छोटा सा सर्किट है, जिसमें वेस्टर्न-फंडेड संगठन प्रश्नावली तैयार करते हैं। स्टोरी गढ़ते हैं, डेटा को एनालाइज करते हैं, और फिर एक-दूसरे को रैंकिंग और रिवॉर्ड देते हैं। इनका इस्तेमाल घरेलू पॉलिटिकल डिस्कशन और इंटरनेशनल डिप्लोमेसी दोनों में हथियार के तौर पर किया जाता है।

    नैरेटिव इम्पैक्ट: नेशनलिस्ट इंडिया को गलत साबित करना

    मुद्दा यह नहीं है कि RSF इंडिया की आलोचना करता है, बल्कि यह लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को कमज़ोर करता है। इसके लिए वह मुश्किल मीडिया इकोसिस्टम को ‘साहसी लिबरल जर्नलिस्ट्स’ और ‘अथॉरिटेरियन हिंदू नेशनलिस्ट्स’ के बीच एक मोरैलिटी प्ले में बदल देता है।

    यह उन जर्नलिस्ट्स के खिलाफ धमकियों और हिंसा के कामों को नजरअंदाज करता है या उसे कम करके आँकता है, जिन्हें राष्ट्रवादी, हिंदुत्व समर्थक या ग्लोबल लिबरल नैरेटिव्स की आलोचना करने वाला माना जाता है।

    इसे वही वेस्टर्न मीडिया भी बढ़ावा देता है। किसान आंदोलन, CAA, कश्मीर और ‘ अल्पसंख्यकों पर ज़ुल्म’ जैसे टॉपिक पर भारत की आलोचना करता है और अक्सर RSF, फ्रीडम हाउस और ऐसे ही दूसरे इंडेक्स को आधार बनाकर ‘लोकतंत्र कमजोर’ होने की दुहाई देता है।

    यह सिर्फ एक चर्चा नहीं है, जैसा कि OpIndia-CSDS रिपोर्ट में बताया गया है। जब इंडेक्स दिखाते हैं कि भारत तानाशाही की ओर बढ़ रहा है, तो इसे सही ठहराना आसान हो जाता है।

    1.भारतीय कानूनों और नीतियों का विरोध करने वाले एक्टिविस्ट नेटवर्क और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) के लिए विदेशी फंडिंग में बढ़ोतरी।

    2.इंटरनेशनल फोरम पर, डिप्लोमैटिक दबाव और ‘नाम लेकर शर्मिंदा करना’।

      3.भारत की इंटरनेशनल इमेज को जानबूझकर कमजोर करने की कोशिशें, खासकर तब जब नई दिल्ली रूस, चीन, क्लाइमेट या व्यापार के मुद्दे पर अलग स्टेंड लेती है और पश्चिमी देशों के रुख को चुनौती देती है। US-EU अलायंस के संबंध में स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी का दावा करती है।

      दूसरे शब्दों में कहें तो, भारत पर RSF की कवरेज असल में एक ‘जियोपॉलिटिकल’ टूल है। यह भारत को एक कट्टर, गैर-उदारवादी , बहुसंख्यक देश के रूप में दिखाने की कोशिश करता है, जिसे लगातार पश्चिमी गाइडेंस और ‘सिविल सोसाइटी करेक्शन’ की जरूरत है।

        जब इन बातों को एक चश्मे से देखा जाता है, तो एक अलग पैटर्न नजर आता है। पश्चिमी सरकारी संस्थाएँ और NED जैसे US-स्टाइल डेमोक्रेसी को बढ़ावा देने वाले संगठन और शासन परिवर्तन से जुड़े बड़े फाउंडेशन RSF की ज्यादातर फंडिंग को बढ़ावा देते हैं।

        दुनिया भर में एक निष्पक्ष मानक के तौर पर प्रचारित किए जाने के बावजूद ये भेदभावपूर्ण है। RSF भारत में एकतरफ़ा स्टोरी को बढ़ावा देने के लिए ज़्यादातर वेस्टर्न फ़ंडेड, लेफ़्ट लिबरल मीडिया इकोसिस्टम पर निर्भर है। यह हिंदू राष्ट्रवाद को खतरे के तौर पर दिखाता है।

        OpIndia–CSDS स्टडी RSF को एक बड़े नेटवर्क में रखती है, जिसमें CSDS, KAS, IDRC, सोरोस से जुड़े फ़ाउंडेशन, और भारतीय एक्टिविस्ट या पत्रकार ग्रुप शामिल हैं। ये सभी संगठन एक ही लक्ष्य के लिए काम कर रहे हैं, जो है हिंदू पहचान, भारतीय लोकतंत्र और राष्ट्रवादी राजनीति के बारे में लगातार खराब खबरें फैलाना।

        एक राष्ट्रवादी भारतीय नजरिए से, RSF प्रेस की आज़ादी का एक निष्पक्ष रखवाला कम और एक ट्रांसनेशनल स्टोरी फैलाने वाले सिस्टम का एक जरूरी हिस्सा है। इसके रिसोर्स, पार्टनरशिप और प्रोडक्ट लगातार भारत की चुनी हुई सरकार और सभ्यता के खिलाफ काम करते हैं।

        जब दूर-दराज की पश्चिमी राजधानियों में तय इंडेक्स में भारत की कीमत धीरे-धीरे कम हो जाती है, तो सही मायने में सॉवरेन जवाब के लिए यह ज़रूरी है कि इस बात की अच्छी तरह जाँच की जाए कि स्कोरबोर्ड कौन बनाता है, सवाल कौन बनाता है, और आखिर में किसके स्ट्रेटेजिक फायदे पूरे होते हैं।

        (यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है, इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

        ₹331cr मनी लॉन्ड्रिंग केस में गुजरात कॉन्ग्रेस नेता तक पहुँची ED, राहुल गाँधी का है करीबी: Rapido ड्राइवर के ‘म्यूल अकाउंट’ से लेनदेन

        दिल्ली की गलियों में रैपिडो जैसे ट्रांसपोर्ट ऐप के जरिए अपनी बाइक चलाकर परिवार का गुजारा करने वाले एक ड्राइवर की जिंदगी में तूफान आ चुका है। रोजाना ₹500-₹600 कमाने वाले इस बाइक राइडर की जिंदगी 2 कमरों की झोपड़ी में कटती है, लेकिन उसके बैंक खाते में आठ महीनों में 331 करोड़ रुपए से ज्यादा का लेन-देन हो गया। दरअसल, ये कोई किस्मत का खेल नहीं था, बल्कि मनी लॉन्ड्रिंग का बड़ा जाल था, जिसके बाद में उसे खुद ही नहीं पता था।

        प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जाँच ने खुलासा किया है कि ये ‘म्यूल अकाउंट’ अवैध सट्टेबाजी ऐप 1xBet से जुड़े काले धन को सफेद करने के लिए इस्तेमाल हुआ। और सबसे चौंकाने वाली बात इसी खाते से गुजरात यूथ कॉन्ग्रेस के नेता आदित्य जुला की नवंबर 2024 वाली उदयपुर की लग्जरी शादी पर 1 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च हुए। जुला पर फर्जी सिग्नेचर और 17 अलग-अलग PAN नंबर्स इस्तेमाल करने का आरोप है।

        ईडी की ये जाँच 1xBet के अवैध ऑनलाइन बेटिंग नेटवर्क से शुरू हुई, जो दिसंबर 2023 में भारत सरकार द्वारा बैन कर दिया गया था। जाँच एजेंसी ने पाया कि 1xBet ने 6,000 से ज्यादा म्यूल अकाउंट्स का इस्तेमाल किया, जिनमें यूजर्स से पैसे इकट्ठा कर उन्हें मल्टीपल पेमेंट गेटवे से घुमाया जाता था। कुल ₹1000 करोड़ रुपए से ज्यादा की लॉन्ड्रिंग का अनुमान है।

        इसी चेन में दिल्ली के इस ड्राइवर का खाता फंस गया। 19 अगस्त 2024 से 16 अप्रैल 2025 तक उसके अकाउंट में अनजान सोर्स से बड़े-बड़े डिपॉजिट आते रहे, जो तुरंत संदिग्ध खातों में ट्रांसफर हो जाते।

        ईडी अधिकारियों ने कहा, “ये क्लासिक म्यूल अकाउंट है। असली मालिक को पता भी नहीं चलता, लेकिन कानूनी कार्रवाई का खतरा हमेशा रहता है।” ड्राइवर को शायद कमीशन के लालच में या अनजाने में फँसाया गया।

        युवा कॉन्ग्रेसी नेता की शादी में ₹1 करोड़ का खर्च

        उदयपुर शादी का कनेक्शन सबसे बड़ा ट्विस्ट है। ताज अरावली रिसॉर्ट में हुई इस ‘डेस्टिनेशन वेडिंग’ पर 1 करोड़ से ज्यादा का खर्च इसी म्यूल अकाउंट से हुआ। ईडी ने पाया कि जुला ने रिसॉर्ट को कॉन्ट्रैक्ट देने के लिए फर्जी सिग्नेचर इस्तेमाल किए। साथ ही ट्रैवल एजेंट को 18 लाख रुपये कैश और 17 फर्जी PAN नंबर्स दिए, ताकि बुकिंग एडजस्ट हो सके।

        गुजरात यूथ कॉन्ग्रेस के अहम चेहरों में से एक है जुला

        जुला गुजरात यूथ कॉन्ग्रेस के प्रमुख चेहरों में से एक हैं और राहुल गाँधी के करीबी माने जाते हैं। भाजपा आईटी सेल हेड अमित मालवीय ने सोमवार (01 दिसंबर 2025) को एक्स (पूर्व ट्विटर) पर पोस्ट कर इसे हाईलाइट किया। उन्होंने लिखा, “ईडी जाँच में उदयपुर रॉयल वेडिंग का बड़ा खुलासा। रैपिडो ड्राइवर के खाते से 331 करोड़ का ट्रांजेक्शन और अब गुजरात यूथ कॉन्ग्रेस लीडर आदित्य जुला का नाम। फर्जी सिग्नेचर से टाज रिसॉर्ट को कॉन्ट्रैक्ट, 18 लाख कैश और 17 PAN नंबर्स। ये लॉन्ड्रिंग चेन का हिस्सा है।” मालवीय ने जुला की राहुल गाँधी के साथ फोटो भी शेयर की, जो वायरल हो गई।

        फिलहाल, ईडी ने जुला को पूछताछ के लिए समन भेजा है और शादी से जुड़े परिवारों की जाँच तेज कर दी है। जाँच में ये भी पता लगाया जा रहा है कि क्या ये शादी लॉन्ड्रिंग का एंडपॉइंट थी या कवर-अप।

        कैसे होता है म्यूल अकाउंट्स के जरिए पूरा खेल

        म्यूल अकाउंट फ्रॉड का ये केस पूरे देश में फैले साइबर क्राइम का आईना है। म्यूल अकाउंट क्या है? सरल शब्दों में ये वो बैंक खाता होता है जो अपराधी काले धन को घुमाने के लिए ‘किराए’ पर लेते हैं। गरीब या बेरोजगार लोगों को 5-7% कमीशन का लालच देकर आधार, PAN, मोबाइल नंबर और बैंक डिटेल्स हासिल कर लेते हैं। फिर OTP चुराकर या पासवर्ड से कंट्रोल ले लेते। छोटे ट्रांजेक्शन से शुरू कर बड़े पैसे घुसेड़ते हैं।

        ड्राइवर के केस में भी यही पैटर्न दिखा- अनजान सोर्स से डिपॉजिट और तुरंत सारे पैसे ट्रांसफर। ईडी अधिकारियों के मुताबिक, 1xBet ने ऐसे हजारों अकाउंट्स का नेटवर्क बनाया था। भारत में ऑनलाइन बेटिंग का बाजार 2023 में 1 लाख करोड़ का था, लेकिन ये ज्यादातर अवैध रूप से था। सरकार ने बैन भी लगाया लेकिन लॉन्ड्रिंग चेन शायद अब भी बरकरार है।

        कई बड़े सितारे भी लपेटे में

        ये पहला केस नहीं। 1xBet जाँच में ही पूर्व क्रिकेटर शिखर धवन और सुरेश रैना के करोड़ों के एसेट्स अटैच हो चुके हैं। ईडी ने कई क्रिकेटरों और सेलिब्रिटीज से पूछताछ की थी। एक रिपोर्ट के अनुसार, 1xBet ने सरोगेट ब्रैंडिंग और ऐड्स से भारतीय यूजर्स को टारगेट किया। कुल लॉन्ड्रिंग ₹1,000 करोड़ से ऊपर।

        सामने आ चुके हैं म्यूल अकाउंट से जुड़े कई केस

        म्यूल अकाउंट से जुड़े कई केस सामने आ चुके हैं। इसी तरह के केस में हैदराबाद में 120 म्यूल अकाउंट्स का गैंग पकड़ा गया था, जिसमें बैंक अफसर भी शामिल थे। वहीं, बेंगलुरु साइबर पुलिस ने गुजरात के एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया, जो फेक कंपनियाँ बनाकर डॉक्यूमेंट्स इकट्ठा करता था। सीबीआई ने 8.5 लाख म्यूल अकाउंट्स का पर्दाफाश किया, जिसमें बैंक स्टाफ ने मदद की थी।

        इसी तरह वाराणसी के स्लम एरिया में SIM फ्रॉड से लोग फँसाए गए और कश्मीर में 7,000 अकाउंट्स सीज हुए। एक अन्य मामला चाइनीज हैंडलर्स से जुड़ा था, जिसमें 250 करोड़ फ्रॉड में तीन लोग पकड़े गए ते। ये लोग म्यूल अकाउंट्स सप्लाई करते थे। ऐसे ही एक मामले में लखनऊ में ‘युवा ग्लोबल नेटवर्क’ का हिस्सा बने युवा जेल पहुँच चुके हैं, तो मुंबई में 3.81 करोड़ के केस में KYC उल्लंघन केस में भी तीन गिरफ्तार हो चुके हैं।

        अपराधियों के जाल में कैसे फँसते हैं आम लोग?

        आम आदमी ज्यादातर लालच या अनजान में ऐसे मामलों में फँस जाते हैं। गाँवों और छोटे शहरों में ये ज्यादा होता है। किसी व्यक्ति का फोन आता है, “भाई, खाली खाता इस्तेमाल करेंगे, कमीशन मिलेगा।” और फिर लोग अपनी जानकारियाँ उनके साथ शेयर कर देते हैं। थोड़े से रुपयों यानी कमीशन के लालच में वो ऐसे गिरोह के हाथों फँस जाते हैं, जिसकी वजह से उन्हें जेल की हवा तक खानी पड़ती है। सर्वे बताते हैं कि ग्रामीण भारत में 40% फ्रॉड कमीशन के चक्कर में होते हैं।

        ईडी का कहना है, “ये चेन रिएक्शन है। एक म्यूल से पैसे दूसरे में घूमते हैं, ट्रेल गुम हो जाती है।” डिजिटल बैंकिंग के जमाने में रेगुलेटरी होल्स से ये आसान हो गया है।

        इस केस से सवाल भी उठ रहे हैं कि एनजीओ फंडिंग से लेकर पॉलिटिकल शादियों तक काला धन कैसे घुसता है। ईडी अब बड़े नेटवर्क की तह तक पहुँच रही है। इस मामले में जुला जैसे नाम आने से राजनीतिक घमासान तेज हो गया हो गया है। बहरहाल, अभी जाँच चल रही है, जो जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी, इस मामले की व्यापकता सामने आती जाएगी।

        कौन हैं 19 साल के देवव्रत महेश रेखे जिन्होंने दंडक्रम पारायण का पाठ कर हासिल की ‘वेदमूर्ति’ की उपाधि, PM मोदी ने भी की तारीफ

        धार्मिक नगरी वाराणसी में करीब 50 दिनों तक दंडक्रम पारायण करने वाले देवव्रत महेश रेखे का नाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘X’ पोस्ट के बाद अचानक चर्चा में आ गया है। महाराष्ट्र के छोटे से गांव में जन्मे 19 साल के देवव्रत ने 200 वर्ष बाद यह कारनामा किया है। देवव्रत को वेदमूर्ति की उपाधि भी दी गई है। उनके सम्मान में काशी में भव्य शोभायात्रा भी निकाली गई है।

        प्रधानमंत्री मोदी ने क्या कहा?

        प्रधानमंत्री मोदी ने X पर लिखा, “19 वर्ष के देवव्रत महेश रेखे जी ने जो उपलब्धि हासिल की है, वो जानकर मन प्रफुल्लित हो गया है। उनकी ये सफलता हमारी आने वाली पीढ़ियों की प्रेरणा बनने वाली है।”

        उन्होंने आगे लिखा, “भारतीय संस्कृति में आस्था रखने वाले हर एक व्यक्ति को ये जानकर अच्छा लगेगा कि श्री देवव्रत ने शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन शाखा के 2000 मंत्रों वाले ‘दण्डकर्म पारायणम्’ को 50 दिनों तक बिना किसी अवरोध के पूर्ण किया है। इसमें अनेक वैदिक ऋचाएं और पवित्रतम शब्द उल्लेखित हैं, जिन्हें उन्होंने पूर्ण शुद्धता के साथ उच्चारित किया। ये उपलब्धि हमारी गुरु परंपरा का सबसे उत्तम रूप है।”

        PM ने लिखा, “काशी से सांसद के रूप में, मुझे इस बात का गर्व है कि उनकी यह अद्भुत साधना इसी पवित्र धरती पर संपन्न हुई। उनके परिवार, संतों, मुनियों, विद्वानों और देशभर की उन सभी संस्थाओं को मेरा प्रणाम, जिन्होंने इस तपस्या में उन्हें सहयोग दिया।”

        कौन हैं देवव्रत महेश रेखे?

        देवव्रत महेश रेखे ने महाराष्ट्र के छोटे से गांव से काशी तक का सफर और यहां वेदमूर्ति की उपाधि पाने का एक लंबा सफर तय किया है। रेखे महाराष्ट्र के अहिल्यानगर जिले के एक साधारण ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए। उनके पिता महेश चंद्रकांत रेखे खुद बड़े विद्वान हैं और उनके पहले गुरु भी हैं। मात्र 5 साल की उम्र से देवव्रत ने वेद मंत्र बोलना शुरू कर दिया था। अब 19 साल की उम्र में उन्होंने शुक्ल यजुर्वेद की माध्यंदिनी शाखा को पूरा कंठस्थ कर लिया और ‘वेदमूर्ति’ की उपाधि पा ली है।

        वे वाराणसी के सांगवेद विद्यालय के बटुक हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब तक इससे पहले केवल एक बार दंडकर्म का पारायण हुआ है। 200 साल पहले नासिक में वेदमूर्ति नारायण शास्त्री देव ने दंडक्रम पारायण किया था। दंडक्रम पारायण वल्लभराम शालिग्राम सांगवेद विद्यालय, रामघाट, काशी में हुआ और पूर्णाहुति बीते शनिवार (29 अक्टूबर 2025) को हुई। टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, शृंगेरी पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी भारती तीर्थ महाराज के आशीर्वाद से यह आयोजन हुआ। शंकराचार्य जी की ओर से देवव्रत को सोने का कंगन, 1 लाख 1 हजार 116 रुपए नकद दिए जाएँगे।

        क्या होता है ‘दंडक्रम पारायण’?

        शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन शाखा के लगभग 2000 मंत्रों के पाठ को दंडक्रम पारायण कहा जाता है। इस दौरान सभी मंत्रों को कंठस्थ कर सुनाना होता है। इस दंडक्रम को अपने जटिल स्वर पैटर्न और फोनेटिक कॉम्बिनेशन की वजह से वैदिक पाठ का मुकुट माना जाता है। इस दंडक्रम पारायण में पदों का पाठ विशिष्ट शैली में उल्टा और सीधा एक साथ किया जाता है।

        कौन था दलित बौद्ध सक्षम टेट जिसकी OBC प्रेमिका के परिवार ने कर दी हत्या, कैसे वीभत्स हत्या तक पहुँचा मामला: जानें अब तक इस बारे में क्या पता है?

        महाराष्ट्र के नांदेड़ जिले में 27 नवंबर 2025 को एक 20 साल के युवक सक्षम गौतम टेट की हत्या कर दी गई। यह घटना उसके 21वें जन्मदिन से कुछ दिन पहले हुई। सक्षम की हत्या उसकी प्रेमिका आँचल मामिलवाड के पिता और भाइयों ने की। पुलिस ने इसे अलग-अलग समुदाय के बीच प्रेम संबंध से जुड़ी ऑनर किलिंग (सम्मान के नाम पर हत्या) बताया है।

        मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह मामला गुरुवार (27 नवंबर 2025) को तब बढ़ा, जब आँचल का छोटा भाई उसे इटवारा पुलिस स्टेशन ले जाने लगा। आँचल का दावा था कि वे सक्षम के खिलाफ झूठी शिकायत दर्ज कराने वाले थे। जब आँचल ने इसका विरोध किया, तो उसने आरोप लगाया कि वहाँ मौजूद दो पुलिसकर्मियों (धीरेज कोमलवार और महीत असरवार) ने उसके परिवार को झूठा केस दर्ज करने के बजाय ‘उसे (सक्षम) मारकर वापस आने’ के लिए उकसाया।

        उसी दिन शाम को, आँचल के पिता गजानन मामिलवाड और उसके भाइयों (हिमेश और साहिल) ने जुनागंज के मिनिडनगर इलाके में सक्षम को रोक लिया। पुलिस के बयान के अनुसार, उन्होंने यह सुनिश्चित करने के लिए कि वह मौके पर ही मर जाए पहले सक्षम को गोली मारी और फिर पत्थर से उसका सिर कुचल दिया।

        पुलिस ने घटना के कुछ ही घंटों के भीतर आठ आरोपितों को हिरासत में ले लिया, जिसमें एक नाबालिग और एक महिला भी शामिल हैं। नाबालिग को किशोर गृह भेज दिया गया है, जबकि महिला को न्यायिक हिरासत में रखा गया है। चार मुख्य आरोपितों को पुलिस हिरासत में भेजा गया है।

        पुलिस ने इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की कई धाराएँ, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धाराएँ, और भारतीय शस्त्र अधिनियम की धारा 3/25 के तहत मामला दर्ज किया है।

        इस मामले में आरोपित और मारे गए युवक (सक्षम) दोनों का पहले से आपराधिक रिकॉर्ड रहा है, और उनमें से कुछ पर मकोका (MCOCA) के तहत भी आरोप थे। सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) प्रशांत शिंदे इस पूरे मामले की जाँच कर रहे हैं। आँचल ने पुलिसकर्मियों पर मिलीभगत के जो आरोप लगाए हैं, उसकी जाँच अलग से की जा रही है।

        दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार, जहाँ एक तरफ आँचल के पिता शादी का विरोध कर रहे थे, वहीं उनकी खुद की शादी भी प्रेम विवाह थी। आँचल की माँ, जयश्री, राजपूत समुदाय से हैं। बताया जाता है कि जब जयश्री गजानन के संपर्क में आईं, तब उनकी पहले से शादी हो चुकी थी और उनका एक बेटा भी था।

        एक वीडियो भी सामने आया है जिसमें गजानन सक्षम के साथ नाचते हुए दिख रहे हैं। सक्षम अक्सर आँचल के घर आता-जाता था, इसी दौरान दोनों के बीच रिश्ता शुरू हुआ। जब गजानन को इस रिश्ते के बारे में पता चला, तो वह बहुत गुस्सा हुए और उन्होंने सक्षम को आँचल से दूर रहने की कई बार धमकी दी थी।

        इस मामले के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए ऑपइंडिया ने पुलिस से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने कोई भी टिप्पणी करने से मना कर दिया क्योंकि यह मामला अभी जाँच के अधीन है।

        एक प्रतीकात्मक शादी और गम में डूबा परिवार

        सक्षम की हत्या के अगले ही दिन, जब पोस्टमॉर्टम के बाद उसके शव को अंतिम संस्कार के लिए ले जाया जा रहा था, तब आँचल ने एक बहुत ही भावुक और नाटकीय कदम उठाया। आँचल सक्षम के घर पहुँची और सांकेतिक रूप से उससे शादी करते हुए उसके शव पर हल्दी और सिंदूर लगाया। एक बयान में, उसने बताया कि उन दोनों ने सक्षम के 21वें जन्मदिन के बाद भागकर शादी करने की योजना बनाई थी। आँचल के मुताबिक, सक्षम को उम्मीद थी कि वह उसके परिवार को समझा लेगा और दोनों की शादी परिवार की मर्जी से हो जाएगी।

        बीएससी (BSc) की फर्स्ट ईयर की छात्रा आँचल ने दावा किया कि सक्षम उसकी पढ़ाई में मदद करता था और चाहता था कि वह सिविल सेवा में जाए। उसने यह भी बताया कि सक्षम खुद भी सिविल सेवा में शामिल होना चाहता था। हालाँकि, सक्षम के पिछले रिकॉर्ड की जाँच में पता चला कि वह कई आपराधिक गतिविधियों में शामिल था, जिसके कारण उसके लिए सिविल सेवा तो दूर, कोई भी सरकारी नौकरी पाना असंभव था। आँचल ने सक्षम की हत्या करने वाले अपने परिवार के सदस्यों के लिए फाँसी की सजा की माँग की है।

        ऑनलाइन बढ़ता हुआ ब्राह्मण-विरोधी प्रोपेगेंडा

        जैसे ही इस हत्या की खबर फैली, सोशल मीडिया पर तुरंत एक समांतर कहानी चलने लगी। कई सोशल मीडिया अकाउंट्स ने इस घटना को तथाकथित ब्राह्मणवादी उत्पीड़न के एक और उदाहरण के रूप में पेश करने की कोशिश की। यह सब तब हुआ जब लड़की (आँचल) ने खुद स्पष्ट किया था कि सक्षम बौद्ध समुदाय से था और उसका (आँचल का) परिवार ओबीसी (OBC) समुदाय से संबंध रखता है। मामले के तथ्यों से अलग हटकर, ब्राह्मण विरोधी एंगल थोपने की इस जल्दबाजी ने ऑनलाइन गुस्से को और बढ़ा दिया।

        मीडिया से बात करते हुए, आँचल ने कहा, “हम तीन साल से रिश्ते में थे। मेरे परिवार को इस बारे में पता चल गया था। चूँकि वह ‘जय भीम’ (बौद्ध समुदाय) से थे, इसलिए मेरा परिवार हमारी शादी के लिए तैयार नहीं हुआ। मेरे परिवार ने सक्षम से कहा था कि अगर वह मुझसे शादी करना चाहता है, तो उसे हिंदू धर्म अपनाना होगा और वह इसके लिए भी तैयार था।” हालाँकि, सोशल मीडिया पर एक ऐसा अभियान चलाया जा रहा है जिसमें इस मामले को एक उच्च जाति के परिवार द्वारा दलित लड़के को मारे जाने के रूप में पेश किया जा रहा है।

        आँचल मामिलवाड जाति से संबंध रखती हैं, जो पुलिस भर्ती दस्तावेजों के अनुसार महाराष्ट्र में विशेष पिछड़ा वर्ग (SBC) के अंतर्गत आती है।

        X (पहले ट्विटर) पर, प्रचारक हर्ष मंदर ने पोस्ट करते हुए लिखा, “दो भाइयों ने अपनी बहन के प्रेमी को इसलिए मार डाला क्योंकि वह ‘निचली जाति’ का था। सदमे में डूबी लड़की ने अपने प्रेमी के शव से ‘शादी’ कर ली। यह हमारी सोसायटी में गहरे तक फैले हिंसा और पूर्वाग्रह पर इससे ज़्यादा विनाशकारी टिप्पणी और क्या हो सकती है?”

        एक पोस्ट में, सैब बिलावल ने खुलकर टिप्पणी तो नहीं की, लेकिन इस हत्या के पीछे का कारण ‘जाति’ को बताया।

        प्रचार करने वाले हैंडल ‘द दलित वॉयस’ ने लिखा, “ऑनर किलिंग। महाराष्ट्र के नांदेड़ में सक्षम टेट की हत्या उनके अंतर-जातीय संबंध के कारण बेरहमी से की गई। लड़का दलित था और लड़की उच्च जाति की थी। उनका परिवार इस रिश्ते को बर्दाश्त नहीं कर सका और उन्होंने सक्षम की हत्या कर दी।”

        सक्षम का आपराधिक अतीत

        इस मामले की जाँच के दौरान सरकारी कागजात देखने पर, ऑपइंडिया को एक कोर्ट का दस्तावेज मिला। इस दस्तावेज में सक्षम टेट के खिलाफ पिछले कुछ सालों में दर्ज किए गए कई अपराधों की लिस्ट है। रिकॉर्ड के मुताबिक, सक्षम के नाम पर कम से कम आठ आपराधिक मामले दर्ज थे। अब ये पुराने मामले भी जाँच का हिस्सा बन गए हैं, जिनसे पता चलता है कि हत्या से पहले सक्षम का पुलिस के साथ कैसा इतिहास था और वह किस तरह की गतिविधियों में शामिल था।

        एक दिलचस्प बात यह है कि दिसंबर 2024 में, आँचल ने सक्षम के खिलाफ इटवारा पुलिस स्टेशन में एक शिकायत दर्ज कराई थी। उसने आरोप लगाया था कि सक्षम ने उसके साथ छेड़छाड़ की। उस समय आँचल की उम्र 18 साल से कम थी, इसलिए सक्षम पर POCSO अधिनियम की धारा 8 और 12 के साथ-साथ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 74 और 78 भी लगाई गई थीं। आँचल ने अपनी शिकायत में कहा था कि 22 नवंबर 2024 को सक्षम ने उसका पीछा किया और उसकी मर्ज़ी के बिना उसे एक कमरे में ले गया। वहाँ उसने उसकी आपत्तिजनक तस्वीरें लीं, जिससे उसकी मर्यादा भंग हुई। खास बात यह है कि उस समय आँचल के 18 साल पूरे होने में केवल तीन दिन बाकी थे।

        लेकिन, जब सक्षम की जमानत पर कोर्ट में सुनवाई हो रही थी, तो सक्षम के वकील ने जज को बताया कि सक्षम ने आँचल पर कोई जोर-जबरदस्ती नहीं की थी और वह अपनी मर्ज़ी से उसके साथ गई थी। साथ ही, वकील ने कहा कि सक्षम ने आँचल की मर्जी के खिलाफ कुछ भी नहीं किया। सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि आँचल जमानत का विरोध करने के लिए खुद कोर्ट में पेश नहीं हुई।

        कोर्ट ने गौर किया कि पहली शिकायत (FIR) में यह बात साफ नहीं थी कि सक्षम ने लड़की के साथ कोई यौन शोषण किया है। उसकी उम्र देखते हुए, कोर्ट ने माना कि वह इतनी समझदार हो चुकी थी कि यह समझा जाए कि वह सक्षम के साथ अपनी मर्जी से गई थी। इसलिए सक्षम को कुछ शर्तों पर जमानत दे दी गई, जिनमें जाँच में सहयोग करना शामिल था। यह विशेष मामला अभी भी नांदेड़ कोर्ट में चल रहा था।

        सक्षम को हिरासत में रखने के एक पुराने आदेश (जो 8 सितंबर 2025 का था) पर कोर्ट ने टिप्पणी की थी। उसमें बताया गया था कि सक्षम नांदेड़ के अलग-अलग पुलिस स्टेशनों में आठ आपराधिक मामलों में शामिल था। इसमें शिवाजी नगर पुलिस स्टेशन, भोकर पुलिस स्टेशन और उमरी पुलिस स्टेशन में दर्ज एक-एक चोरी (डकैती) का मामला शामिल था। हालाँकि, बाकी मामलों की जानकारी उस आदेश में नहीं दी गई थी।

        कोर्ट के कागजात बताते हैं कि सक्षम को 15 मई 2025 को एहतियाती हिरासत (Preventive Detention) में ले लिया गया था। महाराष्ट्र सरकार ने उसे ‘खतरनाक व्यक्ति’ बताया था। उसे महाराष्ट्र के एक कानून के तहत हिरासत में लिया गया, जिसका नाम MPDA Act यानि महाराष्ट्र खतरनाक गतिविधियाँ निवारण अधिनियम, 1981 है।

        सरकार ने कोर्ट में यह तर्क दिया कि ‘सक्षम ने इतना डर पैदा कर रखा है कि लोग उसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराने के लिए आगे नहीं आ रहे हैं और इस वजह से इलाके की शांति (कानून व्यवस्था) बिगड़ रही है।’ सक्षम ने अपनी इस हिरासत के खिलाफ कोर्ट में अर्जी (अपील) डाली थी। उसकी इस अर्जी का विरोध करते हुए, पुलिस ने उन सभी पुराने मामलों का हवाला दिया जिनमें वह शामिल था।

        हाई कोर्ट ने सक्षम टेट की एहतियाती हिरासत (MPDA Act के तहत) के आदेश को रद्द कर दिया था। कोर्ट ने पाया कि हिरासत का आदेश बिना सोचे-समझे दिया गया था और यह साबित नहीं हो पाया था कि सक्षम की वजह से इलाके की शांति को खतरा था।

        जजों ने कहा कि सक्षम के खिलाफ भले ही आठ मामले दर्ज थे, लेकिन जिला मजिस्ट्रेट ने सिर्फ दो मामलों पर ही भरोसा किया। उन्होंने इस बात को नजरअंदाज कर दिया कि सक्षम को पहले ही जमानत मिल चुकी थी। साथ ही, हिरासत का आधार बहुत कमजोर सबूतों पर टिका था। कोर्ट का मानना था कि सक्षम की हरकतों से ज्यादा से ज्यादा ‘कानून-व्यवस्था’ बिगड़ सकती थी, न कि ‘आम जनता की शांति’ को खतरा हो सकता था। इसलिए, उसे इतने कड़े कानून के तहत ‘खतरनाक व्यक्ति’ कहना सही नहीं था।

        ये सारी बातें दिखाती हैं कि यह मामला उतना सीधा नहीं है, जितना ऑनलाइन ‘जातिवाद की कहानी’ बनाकर फैलाया जा रहा है। परिवार का विरोध, पुलिस पर लगे मिलीभगत के आरोप, आँचल का सांकेतिक विवाह और अब सक्षम का पुराना लंबा आपराधिक रिकॉर्ड और उसकी रद्द की गई हिरासत- हर बात इस मामले को बहुत जटिल बना रही है। जैसे-जैसे जाँच आगे बढ़ेगी, यह जरूरी है कि हम भावनाओं से हटकर सबूतों पर ध्यान दें। यह त्रासदी सिर्फ एक साधारण कहानी नहीं है, बल्कि कई उलझे हुए सच का नतीजा है।

        बांग्लादेश में HIV का एपिसेंटर बना रोहिंग्या कैंप, देशभर में रिकॉर्ड संख्या में बढ़े केस: जानें कैसे प्रवासी मजदूर से ट्रांसजेंडर तक AIDS विरोधी अभियान के लिए बने मुसीबत

        बांग्लादेश में HIV संक्रमण के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। इससे स्वास्थ्य विशेषज्ञों और मानवीय संगठनों में गंभीर चिंता पैदा हो गई है। विश्व एड्स दिवस (1 दिसंबर) पर जारी सरकारी आँकड़ों के अनुसार, नवंबर 2024 से अक्टूबर 2025 के बीच 1,891 नए मामले दर्ज किए गए। यह हाल के वर्षों में दर्ज हुई सबसे बड़ी वार्षिक वृद्धि है। पिछले वर्ष से तुलना करें तो यह संख्या 453 अधिक है।

        इन नए मामलों में 217 संक्रमण अकेले कॉक्स बाजार स्थित रोहिंग्या शरणार्थी कैंपों में मिले और विशेषज्ञ ‘गंभीर रूप से चिंताजनक’ बता रहे हैं। यह इसलिए भी जोखिम की बात है कि विस्थापित आबादी पहले से ही संवेदनशील और जोखिमग्रस्त मानी जाती है।

        बांग्लादेश में AIDS के आँकड़े

        रिपोर्ट्स के मुताबिक, बांग्लादेश में HIV का पहला मामला 1989 में सामने आया था। इस साल तक HIV पॉजिटिव मामलों की कुल संख्या 14,313 थी। इनमें से 2,666 की मौत हो गई है। स्वास्थ्य अधिकारियों का मानना है कि HIV से संभावित रूप से संक्रमित लगभग 18% लोग अपनी स्वास्थ्य स्थिति से अनजान हैं यानी उन्हें संक्रमण का अंदाजा ही नहीं है। ऐसे मामलो की संख्या करीब 17,480 है।

        बांग्लादेश के स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (DGHS) के तहत चलते वाले राष्ट्रीय एड्स और यौन संचारित रोग नियंत्रण कार्यक्रम की रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में AIDS के 1,438 नए मामले और 195 मौतें दर्ज हुई थीं जबकि 2023 में संक्रमण के 1,276 मामले और 266 मौतें हुईं। हालाँकि, आधिकारिक रूप से जिन मरीजों की पहचान की गई है, उनकी संख्या काफी कम है।

        नए आँकड़ों से पता चलता है कि पिछले एक साल में 14.21 लाख लोगों ने HIV टेस्ट कराया जो पिछले वर्ष की तुलना में 1.91 लाख कम है। इसके अलावा, इसी अवधि के दौरान स्वास्थ्य जाँच के तहत 10.72 लाख लोगों का HIV टेस्ट किया गया जो पिछले वर्ष की तुलना में 10.34 लाख अधिक है।

        अस्पतालों की कमी और स्वास्थ्य सुविधाओं का संकट

        रिपोर्ट्स के मुताबिक, बांग्लादेश में HIV रोगियों के लिए केवल एक ही विशेष अस्पताल, ढाका स्थित मोहाखाली संक्रामक रोग अस्पताल है। और यहाँ भी HIV/AIDS मरीजों के लिए सिर्फ 40 बेड उपलब्ध हैं। ये बेड लगभग पूरे साल भरे रहते हैं, जिसके चलते कई मरीजों को फर्श पर इलाज करवाना पड़ता है।

        सर्जरी की ज़रूरत वाले मरीजों को लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है और डॉक्टरों का कहना है कि बुनियादी ढाँचे की कमी मरीजों की जान पर खतरा बन रही है। कार्यक्रम के निदेशक डॉ. एम. खैरुज्जमान के अनुसार इसकी जाँच के लिए टेस्टिंग किटों की भी कमी है। साथ ही, इलाज करने के लिए प्रशिक्षित कर्मियों की भी जरूरत है।

        प्रवासी श्रमिक और सामाजिक कलंक का डर

        इन सबके अलावा HIV/AIDS से जुड़ा कलंक भी एक बड़ी बाधा है। बड़ी संख्या में लोग समाज में बदनामी के डर से इसकी जाँच तक कराने या फिर इलाज कराने से बचते हैं। बांग्लादेश में रहने वाले प्रवासी श्रमिकों को भी HIV का बड़ा वाहक माना जाता है। मध्य पूर्वी देशों से लौटने वाले कई श्रमिक HIV के साथ लौटते हैं और अंतत: बांग्लादेश में HIV के मामलों में बढ़ोतरी की वजह बनते हैं।

        बांग्लादेश में ‘खास आबादी’ के कारण बढ़ रहे HIV के केस

        बांग्लादेश में नैशनल AIDS/STD कंट्रोल प्रोग्राम की डिप्टी डायरेक्टर जुबैदा नसरीन देश में बढ़ते मामलों के लिए ‘खास आबादी’ में की गई टेस्टिंग को जिम्मेदारी बताती हैं। इस खास आबादी में ‘ड्रग्स लेने वाले लोग, महिला और पुरुष सेक्स वर्कर और ट्रांसजेंडर लोग’ शामिल हैं। नवंबर-अक्टूबर के दौरान इस आबादी के 1.17 लाख लोगों का टेस्ट किया गया जो पिछले साल से करीब 20,000 अधिक है।

        बांग्लादेश में नई अंतरिम सरकार के बाद भी दिक्कतें बढ़ी हैं। अधिकारियों ने कहा कि पिछले साल मध्य में सरकारी प्रोग्राम के खत्म होने से खास आबादी के बीच कंडोम, सुई और सिरिंज बांटने जैसी बचाव सेवाओं में रुकावट आई है।

        डेटा के मुताबिक, नए मामलों में 56% मुख्य आबादी के, 12% माइग्रेंट, 11% रोहिंग्या और बाकी आम लोग थे। इनमें भी 81% पुरुष, 18% महिलाएँ और 1% ट्रांसजेंडर थे। आँकड़ों को और गहराई से देखने पर पता चलता है कि इनमें भी शादीशुदा लोगों की संख्या अधिक थी। 52% शादीशुदा और 42% सिंगल थे जबकि अन्य लोग विधवा या तलाकशुदा थे।

        बांग्लादेश में नहीं कम हो रहे HIV के मामले

        बांग्लादेश के स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी देश में HIV इन्फेक्शन और मौतों को लेकर परेशान हैं। 2010 से दुनिया भर में HIV इन्फेक्शन में 40% और AIDS से जुड़ी मौतों में 56% की कमी आई है। हालाँकि, बांग्लादेश के लिए इस सफलता को दोहराना अभी भी चुनौती ही बना हुआ है। हाल के वर्षों में टेस्टिंग बढ़ी है लेकिन सरकार के रोकथाम के उपाय अभी भी बढ़ती मौतों की संख्या में दिखाई देने वाली तेजी को कम नहीं कर पा रहे हैं।

        DGHS अब डेडिकेटेड सेंटर्स पर HIV मरीजों के लिए टेस्टिंग जारी रखने और दवा देने के लिए विदेशी डोनर्स पर निर्भर है। हालाँकि, यहाँ भी फंडिंग की कमी के कारण 25 जिले इन सेवाओं की कवरेज से बाहर हैं। बांग्लादेश में HIV के केसों की संख्या बढ़ती जा रही है लेकिन इनके लिए बचाव की सेवाओं की भारी कमी है और इसके चलते हेल्थ एक्सपर्ट्स में चिंता बढ़ गई है।

        बांग्लादेश ने 2030 तक AIDS को खत्म करने का टारगेट रखा है लेकिन जिस तरह मामलों में कमी की जगह बढ़ोतरी हो रही है इस लक्ष्य का हासिल होना लगभग नामुमकिन ही लग रहा है। इसके उलट डर है कि प्रिवेंटिव सर्विस के लिए कम फंडिंग से पॉजिटिविटी रेट और बढ़ सकता है।