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24 घंटे में दूसरी बार राहुल गाँधी ने छठ पूजा पर उठाए सवाल: मुजफ्फरपुर के बाद नालंदा जाकर भी उगला जहर; क्या कॉन्ग्रेस नेता की हरकत को भुला पाएँगे बिहारी?

छठ पूजा पर राहुल गाँधी के बयान पर छिड़े विवाद के बाद भी कॉन्ग्रेस नेता बाज नहीं आ रहे हैं। 24 घंटे के भीतर ही एक बार फिर उन्होंने छठ पूजा को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा। राहुल गाँधी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद मोदी ने यमुना में नहाने का निर्णय लिया इसीलिए स्वच्छ तालाब बना दिया गया और दूसरी तरफ प्रदूषण से भरी यमुना दिखाई दी।

इससे पहले भी बिहार के मुजफ्फरपुर में गुरुवार (29 अक्टूबर 2025) को जनसभा को संबोधित करते हुए राहुल गाँधी ने कहा था, “छठ पूजा वोट हासिल करने के लिए किया गया नाटक है और मोदी वोट के लिए मंच पर नाच भी सकते हैं। उन्होंने कहा कि मोदी को छठ पूजा या बिहार की परंपरा से कोई लेना-देना नहीं है। उनका मकसद केवल वोट लेना है।”

राहुल गाँधी के छठ पूजा पर बयान का विरोध

राहुल गाँधी के छठ पूजा की विधि पर लगातार दिए जा रहे विवादित बयानों पर बिहार में विरोध है। बिहार की जनता ने उनपर छठ पूजा का अपमान करने का आरोप लगाया और माफी माँगने को कहा। बीजेपी ने भी राहुल गाँधी के इस बयान को आड़े हाथों लिया है।

अब राहुल गाँधी के बयान पर पीएम नरेंद्र मोदी ने गुरुवार (30 अक्टूबर 2025) को मुजफ्फरपुर से जवाब दिया है। पीएम मोदी ने कहा, “कॉन्ग्रेस औऱ RJD के लोग छठी मैया का अपमान कर रहे हैं। आप बताएँ क्या कोई वोट पाने के लिए छठ मैया का अपमान करेगा, क्या माताएँ निर्जला उपवास करती हैं, क्या वो सहन करेंगी क्या?”

पीएम ने कहा, “बेशर्मी से बोल रहे हैं, उनके लिए छठ पूजा नौटंकी है, ड्रामा है। ऐसे लोगों को सजा दोगे कि नहीं। जो माताएँ निर्जला व्रत रखती हैं, गंगाजी में खड़ी होती हैं, वो तो उनकी नजर में ड्रामा करती हैं। क्या बिहार की माताएँ-बहनें छठ मैया का अपमान बर्दाश्त करेंगी? यह हर उस व्यक्ति का अपमान है जो छठी मैया में श्रद्धा रखता है। मैं जानता हूँ, इस अपमान को सैकड़ों साल तक बिहार नहीं भूलेगा।”

वहीं, गृह मंत्री अमित शाह ने भी राहुल गाँधी के बयान पर पलटवार करते हुए कहा, “राहुल बाबा ने बिहार आकर कहा कि छठ करने वाले नौटंकी करते हैं। आपकी माँ कभी छठ के महत्व को समझ नहीं पाएँगी।”

तेज प्रताप यादव राहुल गाँधी को दिया करारा जवाब

तेज प्रताप यादव ने भी राहुल गाँधी के छठ पूजा के बयान को बिहारी के लिए अपमान करार दिया। साथ ही सवाल किया कि आखिर विदेश में घूमने वाले राहुल गाँधी छठ पूजा की जानकारी कैसे रख सकते हैं, यही वजह है कि वे छठी मैया के बारे में ऐसे अपशब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं।

पटना में तेज प्रताप यादव ने भी राहुल गाँधी के छठ पूजा के बयान का विरोध करते हुए कहा, “राहुल गाँधी को क्या पता छठ पर्व के बारे में… राहुल गाँधी छठ किए हैं, जो छठ के बारे में बोल रहे हैं। उनको कुछ पता है राहुल गाँधी जी को। जो आदमी विदेश भाग जाता हो, उसे छठ पर्व की क्या जानकारी होगी।”

राहुल गाँधी के बयान से बिहारी आहत

यूँ तो राहुल गाँधी अपने छठ पूजा पर अपमानित बयान से चारो ओर से घिर चुके हैं। खासतौर पर जिस तरह राहुल गाँधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नीचा दिखाने की चाह में जिस तरह छठ पूजा की विधि पर सवाल उठाया है उससे हर बिहारी आहत है।

सोशल मीडिया पर राहुल गाँधी के ‘छठ पूजा को ड्रामा’ बताने वाले बयान पर बिहारी विरोध जता रहे हैं। उन्होंने इस अपमान का बदला वोट से लेने का ऐलान किया है। कई जगह छठ पूजा पर दिए गए इस बयान को लेकर राहुल गाँधी से माफी माँगने की भी बात कही गई।

राहुल गाँधी का जाननी होगी छठ पूजा विधि

राहुल गाँधी कहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने एक अलग से स्वीमिंग पूल बनवाकर उसमें छठ पूजा करने का ढोंग किया, लेकिन क्या वो ये जानते हैं कि अपने घरों से दूर रहने वाले बिहारी दूर दराज शहरों में छठ कैसे मनाते हैं? या उन्हीं के महागठबंधन से जुड़े लालू परिवार के घर छठ की पूजा कैसे होती है।

राहुल गाँधी को ये मालूम होना चाहिए कि पीएम मोदी ने छठ पूजा के लिए यमुना में डुबकी लगाने की बात नहीं कही थी, मगर राहुल गाँधी ने अपनी कुंठा निकालने के लिए छठी मैया का अपमान जरूर किया है। सवाल यही है कि क्या उनकी इस हरकत के लिए बिहारी कभी माफ कर पाएँगे।

राहुल गाँधी का सीएम नीतीश कुमार को पर भी हमला

राहुल गाँधी ने नालंदा में रैली में यह भी कहा कि सीएम नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रिमोट दबाने से चलते हैं। उन्होंने कहा, “पीएम मोदी के हाथ में बिहार के सीएम नीतीश कुमार का रिमोट है। उन्होंने कहा, “बिहार को नीतीश नहीं चलाते हैं। सरकार अमित शाह और पीएम मोदी चलाते हैं।”

कड़ाके की ठंड, सीमित हथियार और हजारों चीनी दुश्मनों के सामने 120 जवानों ने रेजांग-ला में लहराया तिरंगा: पढ़ें उस युद्ध की शौर्यगाथा जिस पर बनी फिल्म ‘120 बहादुर’; जानिए सड़कों पर क्यों उतरा अहीर समाज

हाल ही में, अभिनेता-निर्माता फरहान अख्तर की आने वाली फिल्म ‘120 बहादुर’ देश में एक बड़े विवाद का कारण बन गई है। रविवार (26 अक्तूबर 2025) को, अहीर समाज के सैकड़ों लोगों ने फिल्म के विरोध में दिल्ली-NH-48 हाईवे पर एक विशाल पैदल मार्च निकाला। इस विरोध के कारण हाईवे पर कई किलोमीटर लंबा जाम लग गया। ये प्रदर्शनकारी संयुक्त अहीर रेजिमेंट मोर्चा के बैनर तले एकजुट हुए थे।

अहीर समाज का विरोध इसलिए है, क्योंकि यह फिल्म 1962 के भारत-चीन युद्ध की एक महान गाथा ‘लद्दाख के रेजांग ला दर्रे की लड़ाई’ पर आधारित है। इस लड़ाई में 13 कुमाऊं रेजिमेंट की ‘सी’ कंपनी के 120 अहीर जवानों ने अद्भुत वीरता दिखाते हुए अपनी जान की बाजी लगाई थी। प्रदर्शनकारियों का मानना है कि फिल्म का नाम ‘120 बहादुर’ इन 120 वीर अहीर जवानों के बलिदान और विशिष्ट पहचान को सही तरीके से नहीं दिखा रहा है।

विरोध कर रहे अहीर समाज की मुख्य माँग है कि फिल्म का नाम तुरंत बदला जाए। वे चाहते हैं कि नाम को ‘120 वीर अहीर’ रखा जाए ताकि यह उनके समुदाय के विशेष योगदान को दर्शाए। प्रदर्शनकारियों ने साफ चेतावनी दी है कि जब तक यह नाम नहीं बदला जाता, तब तक वे हरियाणा समेत उन सभी राज्यों में फिल्म को रिलीज नहीं होने देंगे, जहाँ अहीर समुदाय के लोग रहते हैं। इस विरोध ने एक बार फिर रेजांग ला की ऐतिहासिक और भावनात्मक कहानी को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का केंद्र बना दिया है।

भारत-चीन युद्ध 1962: रेजांग ला का सामरिक महत्व

1962 का भारत-चीन युद्ध भारतीय इतिहास का एक पीड़ादायक अध्याय है, लेकिन इसी संघर्ष में रेजांग ला की लड़ाई भारतीय सेना के अदम्य साहस और शौर्य का प्रतीक बनकर उभरी। इस युद्ध की जड़ें 1961 में पनपनी शुरू हो गईं थीं। उस समय, भारत चीनी अतिक्रमणों से बुरी तरह त्रस्त था। विशेष रूप से तब, जब चीन द्वारा भारतीय क्षेत्र से होते हुए शिनजियांग और तिब्बत को जोड़ने वाली एक सामरिक सड़क बनाने की खबरें सामने आईं।

इस स्थिति का मुकाबला करने के लिए, तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने एक साहसिक निर्णय लिया, जिसे ‘फॉरवर्ड पॉलिसी’ नाम दिया गया। यह एक जोखिमभरा दाँव था, जिसके तहत भारतीय सेना को निर्देश दिया गया कि वे विवादित सीमा पर, यहाँ तक कि चीनी चौकियों के ठीक सामने भी, अपनी छोटी सैन्य चौकियाँ स्थापित करें और डटकर खड़े रहें।

इस नीति के परिणामस्वरूप सीमा पर तनाव चरम पर पहुँच गया। जबकि चीन ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ के कूटनीतिक नारे की आड़ में अपनी सैन्य ताकत को तेजी से बढ़ा रहा था। अंततः, 20 अक्टूबर 1962 को, यह बढ़ता तनाव एक पूर्ण युद्ध में बदल गया, जब चीन ने एक साथ कई भारतीय चौकियों पर विनाशकारी हमला बोल दिया।

लेह की अंतिम सुरक्षा दीवार

नवंबर 1962 तक, भारतीय सेना को पीछे हटकर लद्दाख की राजधानी लेह तक आना पड़ा था। अब सारी तैयारी लेह को बचाने की थी। लेह की सुरक्षा का सबसे जरूरी ठिकाना था रेजांग ला। रेजांग ला कोई आम जगह नहीं थी। यह करीब 18,000 फीट (लगभग 5,500 मीटर) की बहुत ऊँची पहाड़ी पर मौजूद एक दर्रा था।

यह दर्रा चुशूल घाटी की हिफाजत करता था। अगर चीन चुशूल घाटी तक पहुँच जाता, तो लेह तक जाने का रास्ता उसके लिए खुल जाता। इसलिए, चीन के लिए रेजांग ला को पार करना बेहद जरूरी था और भारत के लिए यह दर्रा किसी भी कीमत पर बचाना आखिरी और सबसे बड़ी चुनौती थी।

रेजांग ला के रक्षक: ‘चार्ली कंपनी’ के 120 सूरमा

रेजांग ला की हिफाजत करने का मुश्किल काम 13 कुमाऊं रेजिमेंट की ‘चार्ली कंपनी’ को मिला था। इस कंपनी की कमान मेजर शैतान सिंह भाटी संभाल रहे थे। इस कंपनी में कुल 120 जाँबाज जवान थे। इन जवानों में से ज्यादातर सैनिक हरियाणा के अहीर (यादव) समुदाय से थे। उनके पास जंग लड़ने के लिए बहुत कम सामान था। बस पुरानी राइफलें, मोर्टार और उनकी सबसे बड़ी ताकत, यानी हार न मानने का पक्का इरादा। ये जवान इस बेहद मुश्किल चुनौती का सामना करने के लिए तैयार थे।

18 नवंबर 1962: बर्फीली रात, जब चीनियों ने हमला बोला

18 नवंबर 1962 की सुबह, करीब 3:00 बजे का वक्त था। वहाँ बर्फीली हवाएँ चल रही थीं और तापमान माइनस 25 डिग्री से भी नीचे था। लांस नायक हुकुम सिंह के साथ चार जवानों की एक छोटी-सी चौकी (लिस्निंग पोस्ट) तैनात थी। घने कोहरे के बीच, उन्हें दिखाई दिया कि सैकड़ों चीनी सैनिक चुपके से पहाड़ी की तरफ बढ़ रहे हैं।

चीनी अपनी भारी तोपों (मोर्टार) की मदद से हजारों की संख्या में हमला करने आ रहे थे। हुकुम सिंह के बहादुर जवानों ने फौरन इसकी खबर अपनी मुख्य कंपनी को पहुँचाई। हुकुम सिंह जानते थे कि उनके सामने सैकड़ों दुश्मन हैं, फिर भी उन्होंने पीछे हटने से साफ मना कर दिया।

हुकुम सिंह ने कहा, “हम दुश्मन को जितनी देर तक रोकेंगे और उन्हें मारेंगे, हमारी कंपनी को जीतने का उतना ही अच्छा मौका मिलेगा।” जैसे ही हुकुम सिंह ने आदेश दिया, उनकी बंदूकों से गोलियाँ बरसने लगीं। चीनी सेना की पहली कतार इस अचानक हमले से पूरी तरह हैरान रह गई।

आखिरी साँस तक लोहा: जब जवानों ने खाली हाथों से भी लड़ी जंग

जैसे ही चीनियों का बड़ा हमला भारतीय मोर्चे पर शुरू हुआ, मेजर शैतान सिंह अपनी जगह पर मजबूती से खड़े हो गए। दुश्मन ने तीन तरफ से हमला किया और ‘चार्ली कंपनी’ को घेरने की पूरी कोशिश की। लेकिन, हर तरफ से हो रहे हमले का जवाब भारतीय जवानों ने गोलियों की जबरदस्त बौछार से दिया।

नाएब सूबेदार सूरजा की 7 नंबर की टुकड़ी (प्लाटून) पर करीब 400 चीनी सैनिकों ने धावा बोला। भारतीय जवानों की मोर्टार (एक तरह की तोप) से हुई फायरिंग ने चीनियों को भारी नुकसान पहुँचाया। फिर भी, चीनी सैनिक अपने मारे गए साथियों की परवाह किए बिना लगातार आगे बढ़ते रहे।

एक वक्त ऐसा भी आया, जब कुछ अहीर जवानों का गोला-बारूद खत्म हो गया। तब भी वे नहीं रुके, उन्होंने खाली हाथों से ही दुश्मन से लड़ाई शुरू कर दी। दो जवान तो चीनी सैनिकों की मशीनगन पोस्ट की तरफ दौड़ पड़े, लेकिन शहीद हो गए।

एक ताकतवर अहीर जवान ने एक चीनी सिपाही को पकड़ा और उसे उठाकर रेजांग ला की चट्टानों से नीचे फेंक दिया। जब नाएब सूबेदार सूरजा के सिर में गोली का टुकड़ा (छर्रा) लगा, तो उनके आखिरी शब्द थे- ‘लड़ते रहो, 13 कुमाऊं का नाम ऊँचा रखो’।

कमांडर का हौसला: मेजर शैतान सिंह का सबसे बड़ा बलिदान

जब चारों तरफ गोलियाँ और गोले बरस रहे थे, तब भी मेजर शैतान सिंह डटे रहे। वह लगातार एक चौकी से दूसरी चौकी पर जाते रहे। उनका काम था जवानों का हौसला बनाए रखना, टूटे हुए बचाव को ठीक करना और दुश्मन की तरफ फायरिंग का सही निशाना लगवाना। लड़ते-लड़ते वह खुद एक मशीनगन के फटने से बुरी तरह घायल हो गए।

परमवीर मेजर शैतान सिंह की तस्वीर

मगर, मेजर शैतान सिंह ने अपनी जगह से हटने या इलाज के लिए जाने से साफ मना कर दिया। मेजर सिंह ने अपने जवानों को आदेश दिया कि उन्हें वहीं छोड़कर वे लड़ाई जारी रखें। मेजर सिंह के आखिरी शब्द थे- ‘बटालियन को बताना कि कंपनी कितनी बहादुरी से लड़ी।’

तीन महीने बाद, उनका शरीर ठीक उसी जगह बर्फ में मिला। देश के लिए इस सबसे बड़े साहस, शानदार नेतृत्व और अंतिम बलिदान के लिए, उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र दिया गया, जो भारत का सबसे बड़ा वीरता सम्मान है।

रेजांग ला का इतिहास: ट्रिगर पर जमी उंगलियों की दास्तान

सुबह 8 बजे तक, रेजांग ला की भीषण लड़ाई खत्म हो चुकी थी। सिर्फ पाँच घंटों की इस लड़ाई में, 13 कुमाऊं की ‘चार्ली कंपनी’ ने बहादुरी की एक ऐसी कहानी लिख दी, जो सेना के इतिहास में बहुत कम सुनने को मिलती है।

मेजर शैतान सिंह के सभी जवान अपनी आखिरी साँस तक लड़े। 120 बहादुर सैनिकों में से 114 जवान शहीद हो गए। सिर्फ चार जवान ही बच पाए। 1963 में, जब बर्फ पिघली और जवानों के शव मिले, तो हैरान करने वाला नजारा था। ज्यादातर जवान अभी भी अपनी बंदूकें पकड़े हुए थे और उनका रुख दुश्मन की तरफ था। उन्हें गोलियों और संगीनों से कई गहरे घाव लगे थे।

इस छोटी-सी भारतीय टुकड़ी ने चीन को भारी नुकसान पहुँचाया। मेजर जनरल जगजीत सिंह के मुताबिक, चीन के लगभग 500 सैनिक मारे गए थे। इस लड़ाई ने यह साबित कर दिया कि भारतीय सैनिक कितने पक्के इरादे वाले होते हैं। रेजांग ला की यह लड़ाई आज भी देश के लिए अदम्य साहस की निशानी है।

रेजांग ला का गौरव: शहीदों को सलाम

रेजांग ला की लड़ाई हमारे देश की सेना के इतिहास में बहादुरी की सबसे बड़ी मिसालों में से एक है। इन शहीदों को सम्मान देने के लिए, रेजांग ला में एक युद्ध स्मारक (वॉर मेमोरियल) बनाया गया है। 18 नवंबर 2021 को, इस लड़ाई की 59वीं सालगिरह पर इस स्मारक को नया रूप दिया गया। देश के रक्षा मंत्री ने इसका उद्घाटन किया था। यह स्मारक आज भी उन 120 वीर अहीर जवानों के बलिदान और भारतीय सेना के अटूट साहस की कहानी दुनिया को बताता है।

प्राइवेट पार्ट पर मारा हाथ, विरोध करने पर की पिटाई: कोलकाता के 5 सितारा होटल में गैंगरेप दोषी नासिर खान ने महिला को छेड़ा; जानिए ममता राज में कितनी असुरक्षित हैं महिलाएँ

पार्क स्ट्रीट गैंगरेप के दोषी नासिर खान पर कोलकाता के एक पाँच सितारा होटल में एक महिला से छेड़छाड़ करने और उस पर हमला करने का आरोप लगाया है। यह घटना रविवार (26 अक्टूबर) सुबह करीब 4:15 बजे होटल हयात रीजेंसी में हुई। बिधाननगर दक्षिण पुलिस स्टेशन में नासिर खान और उसके भतीजे जुनैद खान के खिलाफ जानबूझकर चोट पहुँचाने, मारपीट करने समेत कई धाराओं में केस दर्ज किया है।

पीड़िता द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत के अनुसार, वह अपने पति, भाई और कुछ दोस्तों के साथ हयात रीजेंसी के प्ले बॉय क्लब में घूम रही थी। तभी आरोपित वहाँ पहुँचे और झगड़ा करने लगे। इनलोगों ने महिला पर बीयर की बोतलें फेंकी और गलत तरीके से छूने की कोशिश की।

पीड़िता ने शिकायत में कथित तौर पर कहा, “जब मेरे भाई ने मुझे बचाने की कोशिश की, तो उन्होंने हम पर काँच की बोतलें फेंकनी शुरू कर दीं। हमने होटल से सुरक्षित भागने की कोशिश की, लेकिन जुनैद खान ने लगभग 20 लड़कों को बुला लिया और हम पर हमला करना शुरू कर दिया।”

महिला ने कहा, “मैंने 100 नंबर पर कॉल किया, लेकिन उन्होंने सारे दरवाजे बंद कर दिए। कुछ लड़कों ने मुझे धक्का देना शुरू कर दिया और मेरे गुप्तांगों को छूने लगा। मैंने मेडिकल रिपोर्ट भी संलग्न कर दी है, और आप रेस्टोरेंट क्लब के सीसीटीवी कैमरे में हमले के सभी वीडियो देख सकते हैं।” पुलिस ने अभी तक किसी को गिरफ्तार नहीं किया है।

पीड़िता के मुताबिक, वह लगभग आधे घंटे तक छिपी रही, फिर पुलिस ने उसे शराबखाने से बचाया। वह उस वक्त छिपी हुई थी।

नासिर खान कौन हैं?

व्यवसायी नासिर खान उन पाँच लोगों में शामिल थे जिन्हें 2012 में कोलकाता के पॉश इलाके पार्क स्ट्रीट में चलती कार में 40 वर्षीय एंग्लो-इंडियन महिला सुजेट जॉर्डन के साथ गैंगरेप का दोषी पाया गया था। दो बेटियों की माँ, इस महिला का फरवरी 2012 में एक नाइट क्लब के सामने से एक कार में आरोपियों ने अपहरण कर लिया और चलती कार में घंटों तक उसके साथ सामूहिक बलात्कार करते रहे। इसके बाद महिला को उस जगह से कुछ किलोमीटर दूर एक चौराहे के पास फेंक दिया।

महिला को बेहोशी की हालत में वहाँ से उठाया गया था। नासिर खान को इस मामले में 10 साल जेल की सजा हुई थी। लेकिन 2022 में, ‘अच्छे व्यवहार’ का हवाला देते हुए एक साल पहले उसे रिहा कर दिया गया।

पश्चिम बंगाल में यौन हिंसा के बढ़ते मामले

पश्चिम बंगाल में एक महिला मुख्यमंत्री होने के बावजूद महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा के मामले बढ़ रहे हैं। ऐसी घटनाओं में पीड़ितों के प्रति मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और टीएमसी नेताओं के उदासीन रवैये से स्थिति और बिगड़ गई है। राज्य में महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा को रोकने के लिए जवाबदेही सुनिश्चित करने के बजाय, महिला मुख्यमंत्री या तो पीड़ितों को ही दोषी ठहराती हैं या घटनाओं को अपनी सरकार के खिलाफ साजिश बताकर खारिज कर देती हैं।

हाल ही में, पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर में हुए एक सामूहिक बलात्कार मामले में, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने यौन हिंसा की पीड़िता पर ही दोष मढ़ दिया। ओडिशा की रहने वाली और दुर्गापुर मेडिकल कॉलेज में पढ़ने वाली द्वितीय वर्ष की एमबीबीएस छात्रा के साथ शुक्रवार (10 अक्टूबर) की रात पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर में एक जंगल में अपू बाउरी, फिरदौस सेख, सेख रियाजुद्दीन और दो अन्य लोगों ने सामूहिक बलात्कार किया।

विडंबना यह है कि इस घटना पर दुख व्यक्त करते हुए, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बलात्कार के लिए पीड़िता को ही दोषी ठहराया। उन्होंने कहा कि महिलाओं को रात में कॉलेज से बाहर जाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए और महिलाओं को अपनी सुरक्षा खुद करनी चाहिए।

यह पहली बार नहीं था जब मुख्यमंत्री ने बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को कम करके आँका हो। 2012 के पार्क स्ट्रीट सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद भी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसी तरह की असंवेदनशीलता दिखाई थी। उन्होंने घटना को ‘मनगढ़ंत’ करार दिया और अपनी सरकार को बदनाम करने की साजिश बताकर खारिज कर दिया। मुख्यमंत्री की ऐसी संवेदनहीनता और जवाबदेही की कमी अपराधियों के हौसले बढ़ाती है और पीड़ितों को न्याय के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती हैं।

दुर्गापुर सामूहिक बलात्कार मामले से एक महीने पहले हुए एक अन्य मामले में, कोलकाता के हरिदेवपुर इलाके में एक युवती के साथ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के एक कार्यकर्ता और उसके सहयोगी ने बलात्कार किया। आरोपियों ने उसे अपना जन्मदिन मनाने के लिए बुलाया था। आरोपियों ने पीड़िता को पूरी रात एक कमरे में बंद रखा और बारी-बारी से उसके साथ बलात्कार किया। इससे पहले इसी साल जुलाई में एक और गैंगरेप का मामला सामने आया।

पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के साउथ कलकत्ता लॉ कॉलेज में तीन लोगों ने 24 वर्षीय एक छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार किया। यह भयावह घटना आरजी कर मेडिकल कॉलेज में हुए जघन्य बलात्कार और हत्या मामले के एक साल से भी कम समय में हुई। आरजी कॉलेज में एक 31 वर्षीय पीजी ट्रेनी डॉक्टर के साथ मेडिकल कॉलेज में ड्यूटी के दौरान बेरहमी से बलात्कार किया गया और उसकी हत्या कर दी गई थी।

2013 में, पश्चिम बंगाल विधानसभा में राज्य में बलात्कार के बढ़ते मामलों पर एक बहस के दौरान मुख्यमंत्री ने इशारे-इशारों में इसके लिए राज्य की बढ़ती आबादी को दोषी बताया। उन्होंने रेप के बढ़ते मामलों के लिए आधुनिकीकरण, शॉपिंग मॉल और मल्टीप्लेक्स की बढ़ती संख्या को भी जिम्मेदार ठहराया था। 2024 के संदेशखाली की घटना को ‘मामूली’ बता कर कमतर आँकने की कोशिश की। इसमें ममता बनर्जी ने तृणमूल कॉन्ग्रेस के गुंडें शामिल थे।

एनसीआरबी के आँकड़े बता रहे राज्य की स्थिति

पश्चिम बंगाल में महिला सुरक्षा की गंभीर स्थिति राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की वर्ष 2023 की रिपोर्ट से उजागर हुई है। एनसीआरबी की ‘भारत में अपराध’ रिपोर्ट से पता चलता है कि पश्चिम बंगाल में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और विशेष एवं स्थानीय कानूनों (एसएलएल) के तहत महिलाओं के खिलाफ अपराध के 34,691 मामले दर्ज किए गए। हालाँकि यह 2022 के 34,738 मामलों की तुलना में थोड़ी कम है। लेकिन, यह संख्या देश में सबसे अधिक है। ये आँकड़े प्रति लाख महिला आबादी पर 71.3 मामलों की अपराध दर दर्शाते हैं।

एनसीआरबी के आँकड़े यह भी दर्शाते हैं कि वर्ष 2023 तक देश में होने वाले सभी एसिड हमलों में से 27.5% अकेले पश्चिम बंगाल में हुए। 2022 में, देश भर में हुए 202 मामलों में से, पश्चिम बंगाल में 48 एसिड हमले दर्ज किए गए, जिनमें से 52 पीड़ित थे। इस अपराध श्रेणी में, टीएमसी शासित राज्य 2018 से देश में अग्रणी है।

2023 तक बलात्कार/सामूहिक बलात्कार के साथ हत्या के 7 मामले, दहेज हत्या के 350 मामले और महिलाओं को आत्महत्या के लिए उकसाने की 419 घटनाएँ दर्ज की गईं।

(ये खबर मूल रूप से अंग्रेजी में बनी है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

अहमदाबाद के जिस मिशनरी स्कूल में घोंपा गया हिंदू छात्र को चाकू, उसे सरकार के नियंत्रण में देने की सिफारिश: जानिए ‘सेवेंथ डे स्कूल’ की जाँच के बाद रिपोर्ट में क्या-क्या हुए खुलासे, पढ़ें Exclusive डिटेल

गुजरात के अहमदाबाद स्थित सेवेंथ डे स्कूल में हिंदू छात्र की मुस्लिम सहपाठी द्वारा हत्या मामले में जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा नियुक्त समिति ने रिपोर्ट सौंप दी है। रिपोर्ट में बताया गया कि स्कूल प्रशासन ने लापरवाही बरती है और कई नियमों का उल्लंघन भी किया है। समिति ने स्कूल को सरकार के नियंत्रण में लेने की भी सिफारिश की है। शिक्षा अधिकारी ने यह रिपोर्ट राज्य सरकार को भेज दी है। अब सरकार आगे की कार्रवाई करेगी।

रिपोर्ट के अनुसार, जाँच में सामने आया कि स्कूल ने मान्यता के लिए सरकारी नियमों का उल्लंघन किया और अतिरिक्त कक्षाओं के लिए अनुमति नहीं ली गई थी। प्रबंधन और स्कूल परिसर में किए गए बदलाव के लिए भी जरूरी मंजूरी नहीं ली गई। इसके अलावा स्कूल के प्रबंधन में भी कई गड़बड़ियाँ मिली हैं। समिति की जाँच में यह भी पता चला कि अल्पसंख्यक स्कूल का दर्जा प्राप्त करने में कुछ अनियमितताएँ बरती गई थीं।

नियमों का उल्लंघन और गड़बड़ियाँ

जाँच में यह भी सामने आया कि है कि जिस जमीन पर स्कूल चल रहा है, उस जमीन को अहमदाबाद नगर निगम ने साल 2003 में लीज पर दिया था। लेकिन स्कूल ने 80 के दशक में कुछ कक्षाओं के लिए मंजूरी ली थी। वह जगह अब मौजूद नहीं है और न ही इस जगह पर कक्षाओं की मंजूरी के लिए समिति के सामने कोई आधार प्रस्तुत किया गया है। इसीलिए समिति ने प्रथम दृष्टया इस स्कूल को अवैध घोषित कर दिया था।

इसके अतिरिक्त, बाद में स्कूल में कुछ अतिरिक्त कक्षाएँ शुरू की गईं, जिनके लिए नियमानुसार बोर्ड से पहले एप्रूवल की आवश्यकता होती है लेकिन स्कूल ने इस नियम का पालन नहीं किया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि नियमों के अनुसार, प्रबंधन, ट्रस्ट या स्कूल परिसर में कुछ बदलाव करने के लिए संबंधित बोर्ड से अनुमति लेना जरूरी है लेकिन इस मामले में ऐसा कोई दस्तावेज जमा नहीं किया गया। इसके अलावा अगर स्कूल दो पालियों में भी चलाना है तो भी पहले बोर्ड से अनुमति लेनी जरूरी है। इस मामले में भी बिना अनुमति के ही दो पालियों में कक्षाएँ चलाई जा रही थीं।

जाँच में यह भी सामने आया है कि स्कूल का संचालन किस ट्रस्ट या सोसायटी द्वारा किया जा रहा है। इसकी साफ जानकारी नहीं दी गई है। समिति के सामने रखे गए दस्तावेजों में स्कूल संचालक के रूप में अलग-अलग नाम दिए गए हैं। इनमें इंडिया फाइनेंशियल एसोसिएशन ऑफ सेवेंथ डे एडवेंटिस्ट्स, काउंसिल ऑफ सेवेंथ डे एडवेंटिस्ट्स एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन्स और एशलोक एजुकेशन ट्रस्ट शामिल हैं। इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि वास्तव में कौन-सा ट्रस्ट या संस्था स्कूल का संचालन कर रही है।

साथ ही स्कूल ने अल्पसंख्यक दर्जा (माइनॉरिटी स्टेटस) पाने के लिए कई नियमों का पालन नहीं किया। रिपोर्ट के अनुसार, एशलोक एजुकेशन सोसायटी ने सितंबर 2020 में अहमदाबाद जिला शिक्षा अधिकारी के कार्यालय में अल्पसंख्यक दर्जा पाने के लिए आवेदन किया था। यह सोसायटी पुणे में पंजीकृत है और इसे महाराष्ट्र सरकार ने 14 मार्च 2013 को ‘माइनॉरिटी स्टेटस’ दिया था, जो सिर्फ महाराष्ट्र के लिए मान्य है।

इसके अलावा, रिपोर्ट में कहा गया कि संस्था ने प्राथमिक विभाग के लिए अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था होने का प्रमाण भी स्पष्ट रूप से प्रस्तुत नहीं किया। इसी कारण से आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के 25 प्रतिशत बच्चों को प्रवेश नहीं दिया गया, जो कि RTE (शिक्षा का अधिकार) अधिनियम का उल्लंघन है।

लीज एग्रीमेंट का उल्लंघन

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि स्कूल ने लीज एग्रीमेंट का उल्लंघन किया है। जिस जमीन पर स्कूल बना हुआ है, उसे नगर निगम ने द इंडिया फाइनेंशियल एसोसिएशन ऑफ सेवेंथ डे एडवेंटिस्ट्स को शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए लीज पर दिया था। लेकिन स्कूल का प्रबंधन अलग-अलग संस्थाओं द्वारा किया जा रहा है। यानी जमीन किसी और संस्था को लीज पर दी गई थी और स्कूल का प्रबंधन अलग संस्थाएँ कर रही हैं।

यहाँ तक कि स्कूल ने शुल्क (फीस) नियमों का भी उल्लंघन किया है। रिपोर्ट में बताया गया कि संस्था ने फीस नियामक समिति को किराया ₹1,59,000 दिखाया जबकि वास्तव में नगर निगम ने जमीन केवल ₹10,000 के किराए पर दी थी।

स्कूल परिसर में MBA और BSc के साथ आर्ट्स कॉलेज भी चलाए जा रहे हैं। नियम के अनुसार, ऐसा करने के लिए संबंधित बोर्ड से NOC(अनापत्ति प्रमाणपत्र) लेना जरूरी होता है। स्कूल ने 2022 में ICSE बोर्ड से NOC तो ले ली थी, लेकिन गुजरात माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक शिक्षा बोर्ड से NOC नहीं ली।

इसके अलावा, कुछ और गड़बड़ियाँ भी मिली हैं। जैसे कि नियमों के मुताबिक स्कूल परिसर में किताबें बेचना मुनाफाखोरी माना जाता है लेकिन ऑडिट रिपोर्ट में पाया गया कि स्कूल में किताबें बेची जा रही थीं, जो नियमों का उल्लंघन है।

स्कूल प्रशासन पर सरकारी अधिग्रहण की सिफारिश

जाँच रिपोर्ट में समिति ने कहा है कि सभी पहलुओं पर विचार करने पर यह साफ है कि स्कूल ने मान्यता की शर्तों का उल्लंघन किया है। इसके साथ ही रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि झूठे आधार प्रस्तुत करके धोखाधड़ी की गई है, जिससे शिक्षा विभाग, FRC, अभिभावकों और छात्रों का विश्वास टूटा है।

समिति ने सरकार से सिफारिश की है कि स्कूल में पढ़ने वाले 10 हजार से ज्यादा छात्रों के हितों को ध्यान में रखते हुए स्कूल का प्रशासन सरकार को सौंप दिया जाएगा या फिर इसे किसी अन्य ट्रस्ट को सौंप दिया जाए। शिक्षा अधिकारी ने यह रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है। आने वाले समय में और भी बड़े फैसले लिए जा सकते हैं।

क्या है पूरा मामला?

गौरतलब है कि अगस्त 2025 में 10वीं कक्षा में पढ़ने वाले एक हिंदू छात्र नयन संतानी को उसी स्कूल में पढ़ने वाले एक मुस्लिम छात्र ने चाकू मारकर हत्या कर दी थी। इस घटना के बाद अभिभावकों में आक्रोश था और स्कूल पर गंभीर आरोप लगाए गए। स्कूल में पहले भी कुछ ऐसी ही घटनाएँ सामने आ चुकी हैं, जिसके चलते स्कूल प्रशासन पर सवाल खड़े होते रहे हैं।

घटना के बाद जिला शिक्षा अधिकारी ने जाँच के आदेश दिए। हालाँकि, स्कूल ने इसके खिलाफ गुजरात उच्च न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया, लेकिन कोर्ट ने भी कोई राहत नहीं दी और जाँच में सहयोग करने का निर्देश दिया। अब समिति द्वारा जाँच रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद मामला जिला शिक्षा अधिकारी और सरकार के फैसले का इंतजार है।

(मूलरूप से यह रिपोर्ट गुजराती भाषा में लिखी गई है, जिसे विस्तार में पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

तेहरान में हुआ 13 लोगों का अपहरण, भारत ने जाकर छुड़ाया: जानिए अमेरिका-कनाडा-ऑस्ट्रेलिया जाने के सपने देखने वाले भारतीय कैसे फँसते हैं किडनैपर्स के चंगुल में, क्या होता है उनके साथ?

विदेश जाने का सपना देख रहे भारतीय अब किडनैपिंग का शिकार हो रहे हैं। डंकी रूट से कनाडा अमेरिका और यूके जाने वाले युवा ईरान जैसे दूसरे देश में ट्रैप हो रहे हैं और उसके परिवार वालों से भारी फिरौती माँगी जा रही है।

एक ऐसा ही मामला गुजरात से आया है। जहाँ के 13 नौजवान ऑस्ट्रेलिया में अवैध तरीके से जा रहे थे। इन्हें फिरौती के लिए ईरान में बंधक बना लिया गया। इनमें से अभी भी 6 वहाँ फँसे हुए हैं, बाकियों की वतन वापसी हो गई है।

अपहरणकर्ताओं ने बंधकों का एक वीडियो उन्हें ऑस्ट्रेलिया भेजने वाले एजेंट और उनके परिवारों को भेजकर करोड़ों रुपये की फिरौती माँगी। मामला सामने आने पर मानसा से भाजपा विधायक जयंती पटेल ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर मदद माँगी। इसके बाद बंधकों की रिहाई संभव हो पाई।

19 अक्टूबर को मानसा के बापूपुरा गाँव की प्रिया चौहान, अजय चौधरी, अनिल चौधरी और निखिल चौधरी ऑस्ट्रेलिया के लिए रवाना हुए। उन्हें दिल्ली से थाईलैंड, वहाँ से दुबई और फिर अमीरात एयरलाइंस के जरिए ईरान की राजधानी तेहरान ले जाया गया। ईरान पहुँचने के बाद, उन्हें एक टैक्सी में बिठाकर किसी अज्ञात स्थान पर ले जाया गया।

इसके बाद, उन्हें बंधक बना लिया गया और बेरहमी से पीटा गया। इन लोगों के दो वीडियो ऑनलाइन सामने आए। एक वीडियो में दो युवकों को नंगा करके पीटा जा रहा था। इन दो वीडियो के अलावा, अपहरणकर्ताओं ने एक जोड़े की तस्वीर भी साझा की, जिसमें उनके हाथ और मुँह बंधे हुए थे। इस वीडियो और तस्वीरों को दिखाते हुए पीड़ितों के परिवारों से ₹2 करोड़ की फिरौती माँगी गई।

डंकी मार्ग, फिरौती के लिए अपहरण: हताशा और धोखे की कहानी

हालाँकि, यह कोई पहला मामला नहीं है जब विदेश में अवैध रूप से पहुँचने की कोशिश करते समय भारतीय नागरिकों का अपहरण किया गया हो। जुलाई 2023 में, एक ऐसा ही मामला सामने आया था जिसमें एक गुजराती दंपति, डॉ. पंकज और निशा पटेल का ईरान में वसीम नाम के एक व्यक्ति ने अपहरण कर लिया था। ये लोग जो ‘डंकी मार्ग’ से अमेरिका जा रहे थे। दंपति को प्रताड़ित किया गया और अपहरणकर्ताओं ने उनके एजेंट से 10 लाख रुपए की फिरौती माँगी।

सितंबर 2024 में, केरल के 26 वर्षीय हिमांशु नाम के एक व्यक्ति का ईरान में इसी तरह अपहरण कर लिया गया था। उसके परिवार द्वारा 20 लाख रुपये की फिरौती देने के बाद ही युवक को रिहा किया गया था। हिमांशु हरियाणा के करनाल के अमन राठी नाम के एक एजेंट के संपर्क में आया। राठी ने हिमांशु को ऑस्ट्रेलिया में वर्क वीजा दिलाने का झाँसा दिया।

इसके बाद हिमांशु को नोएडा ले जाया गया और 15 दिनों का प्रशिक्षण दिया गया। उसे इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता भेज दिया गया। तीन हफ़्ते बाद, वह दिल्ली लौटा। फिर उसे ईरान भेज दिया गया। चाबहार पहुँचने के बाद हिमांशु का अपहरण कर लिया गया। पाकिस्तानी मानव तस्करों ने भारतीय नागरिक पर हमला किया और उसे प्रताड़ित किया। हिमांशु के परिवार से एक करोड़ रुपए की फिरौती माँगी गई। बातचीत में 20 लाख रुपए पर सहमति बनी और हिमांशु के परिवार ने उसकी रिहाई के लिए 20 लाख दे दिए।

इस साल जून में, संगरूर के हुसनप्रीत सिंह, एसबीएस नगर के जसपाल सिंह और होशियारपुर के अमृतपाल सिंह नामक तीन भारतीय तेहरान पहुँचने के कुछ ही समय बाद गायब हो गए। होशियारपुर के एक एजेंट ने उन्हें दुबई और ईरान के रास्ते ऑस्ट्रेलिया में जॉब देने का सब्जबाग दिखाया था। उसे तेहरान में अस्थायी तौर पर रहने के लिए कहा गया।

परिवार के मुताबिक तेहरान पहुँचते ही उनका अपहरण कर लिया गया था। अपहरणकर्ताओं ने एक करोड़ रुपए की फिरौती माँगी। इनलोगों ने काफी दर्दनाक वीडियो परिजनों को भेजा। इसमें बंधकों को पीली रस्सियों से बाँधा गया था और खून बह रहा था। लापता भारतीयों से आखिरी बार 11 मई को संपर्क हुआ था। भारत सरकार के हस्तक्षेप और ईरानी पुलिस के सक्रिय होने के बाद तीनों भारतीयों को बचाया जा सका।

हाल ही में, एक पंजाबी परिवार का सीमा पार के एक गिरोह ने अपहरण कर लिया था। 4 अक्टूबर 2025 को धरमिंदर सिंह, उनकी पत्नी संदीप कौर और उनका 12 साल का बेटा तब रिहा हुआ, जब 80 लाख रुपए की फिरौती और गहने पाकिस्तानी गिरोह को दिए।

पंजाब के राहों का यह परिवार एक एजेंट के संपर्क में आया। एजेंट ने उन्हें कहा कि वे सीधे भारत से कनाडा नहीं भेज सकते हैं, लेकिन ईरान के रास्ते कनाडा में बसाया जा सकता है।

परिवार के मुताबिक, “एजेंट ने कहा कि परिवार को चिंता करने की जरूरत नहीं है। कनाडा पहुँचने के बाद ही पूरा भुगतान करना होगा। तब तक का खर्च वह उठाएगा,”

ठेके पर ज़मीन लेने वाले किसानी करने वाले धरमिंदर ने बात मान ली। धरमिंदर सिंह ने एजेंट के हवाले से कहा, “पूरे परिवार के लिए कुल खर्च 26 लाख रुपए हैं, लेकिन भुगतान कनाडा पहुँचने के बाद ही होगा।”

25 सितंबर को, सिंह परिवार चंडीगढ़ से कोलकाता, फिर दुबई और फिर तेहरान के लिए रवाना हुआ। वे इमाम खुमैनी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर टैक्सी ड्राइवर का इंतज़ार कर रहे थे। एजेंट उन्हें टैक्सी देने वाला था। इस दौरान एक टैक्सी ड्राइवर आया और भारतीय नागरिकों को एक दूर दराज के स्थान पर ले गया। वहाँ भारतीय परिवार के पासपोर्ट और मोबाइल फोन छीन लिए गए। पीड़ित परिवार को पता चला कि उन्हें पाकिस्तान से संचालित अंडरवर्ल्ड से जुड़े एक गिरोह ने अगवा कर लिया है। पाकिस्तानी गिरोह ने 1.5 करोड़ रुपए की फिरौती माँगी।

सिंह परिवार को पाकिस्तानी गिरोह की कैद से अपनी रिहाई के लिए 80 लाख रुपये का इंतजाम करना पड़ा, गहने देने पड़े और जमीन बेचनी पड़ी।

हाल के दिनों में ऐसे मामलों में वृद्धि हुई है, जिसमें धोखेबाज एजेंट हताश लोगों को विदेश में नौकरी और आकर्षक करियर का झाँसा देकर ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और अमेरिका भेजने के नाम पर फँसाते हैं। मानव तस्करों और फिरौती माँगने वाले ऐसे लोगों की तलाश में रहते हैं जो विदेश जाने का सपना देखते हैं और इसे पूरा करने के लिए ‘कुछ भी’ करने को तत्पर रहते हैं। ‘डंकी रूट’ ऐसे ही लोगों की वजह से फलफूल रहा है।

हाल ही में, पंजाब पुलिस ने एक ऐसे ही रैकेट का भंडाफोड़ किया और लीबिया से पाँच युवकों को छुड़ाया। इस मामले में भी कार्यप्रणाली कुछ अलग नहीं थी। हताश लोगों को विदेश में बेहतर जीवन और अवसरों का लालच देकर, उन्हें अवैध रास्ता अपनाने के लिए राजी करना, उन्हें उनके मनमुताबिक देश भेजने के बहाने, उनका अपहरण करना, यातनाएँ देना और फिर फिरौती माँगना।

काम के लिए विदेश जाने में कोई बुराई नहीं है, बशर्ते रास्ते सही हों। वीजा प्रक्रिया में देरी से हताश भारतीय धोखे, विश्वासघात, यातना, आर्थिक नुकसान और सबसे बढ़कर जान गँवाने की स्थिति में ये लोग फँस रहे हैं। ये कुछ ऐसे मामले हैं जो मीडिया के जरिए बाहर आ पाई हैं। ऐसी कई घटनाएँ हुई हैं, जो रिपोर्ट ही नहीं की गईं।

इस खतरे की जड़ में ‘डंकी रूट’ है। डंकी पंजाबी में एक शब्द है जिसका अर्थ है एक जगह से दूसरी जगह कूदना। समय के साथ, यह उन लोगों द्वारा अपनाए जाने वाले अवैध रास्ते के लिए इस्तेमाल होने लगे, जो बिना कागजात के दूसरे देश में एंट्री करते हैं।

कई एजेंट डंकी रूट के जरिए भारतीयों को विदेश भेजने का लालच देते हैं। जो लोग डंकी रूट चुनते हैं, उनका पहले पासपोर्ट और वीजा बनवाया जाता है। अक्सर अवैध रास्तों पर काम करने वाले एजेंट पैसे लेकर किसी यूरोपीय देश या लैटिन अमेरिका के किसी देश का वीजा बनवा देते हैं।

ज्यादातर मामलों में यह पर्यटक वीजा होता है। इसके जरिए डंकी रूट के लोगों को भारत से निकाला जाता है। उन्हें नेपाल, दुबई या किसी अन्य देश में कुछ दिनों की यात्रा करवाई जाती है और उनकी यात्रा की पूरी कहानी सुनाई जाती है। कई लोग शरण लेने के लिए अमेरिका, कनाडा या ऑस्ट्रेलिया जाना चाहते हैं। अक्सर गैरकानूनी काम करने वाले एजेंट पैसे लेकर किसी यूरोपीय देश या लैटिन अमेरिका के किसी देश का वीज़ा बनवा देते हैं। इसमें प्रति व्यक्ति 25-50 लाख रुपये तक का खर्च आता है। साथ ही पुलिस द्वारा पकड़े जाने, अपहरण किए जाने, आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने के लिए मजबूर किए जाने या जान गँवाने का भी जोखिम रहता है।

इसी तरह के आपराधिक गिरोह म्यांमार और अन्य देशों में भी सक्रिय हैं। हज़ारों भारतीयों को दक्षिण पूर्व एशिया में कॉल सेंटर और डेटा एंट्री जैसी नौकरियों के फर्जी विज्ञापनों और वादों के जरिए 1-3 लाख रुपए की अग्रिम राशि देकर ठगा जाता है। ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें इस जाल में फँसे भारतीयों के पासपोर्ट जब्त कर लिए गए और उन्हें ‘स्कैम फॉर्म’ में कैद कर दिया गया। न केवल भारतीय, बल्कि अन्य देशों के लोगों को भी निवेश घोटाले या संदिग्ध क्रिप्टो योजनाओं जैसे ऑनलाइन धोखाधड़ी चलाने के लिए इन स्कैम फ़ार्मों में काम करने के लिए मजबूर किया जाता है।

बात नहीं मानने पर प्रताड़ना झेलना पड़ता है। भूखे रखा जाता है और शरीर के अँग काटने की धमकियाँ दी जाती हैं। पीड़ितों को प्रतिदिन कोटा या लक्ष्य दिए जाते हैं और उन्हें पूरा न कर पाने पर उनसे मारपीट किया जाता है। हाल ही में, भारत ने कंबोडिया और थाईलैंड से अपने सैकड़ों नागरिकों को बचाया है।

जैसा कि ऑपइंडिया ने दिसंबर 2023 में बताया था, क्रिस्टल मेथामफेटामाइन की तस्करी का केंद्र होने के अलावा, म्यांमार का उत्तरी शान राज्य चीनी सीमा से लगी चौकियों में कई अन्य अवैध गतिविधियों का भी केंद्र है।

पिछले जुलाई में, म्यावाड्डी के हपा लू स्थित एक स्कैम सेंटर में काम कर रहे आठ भारतीय नागरिकों को बचाकर संबंधित म्यांमार पुलिस और आव्रजन अधिकारियों को सौंप दिया गया था।

ऐसी खबरें आईं कि कई अपहृत भारतीय नागरिकों को एक सशस्त्र समूह द्वारा ऑनलाइन धोखाधड़ी करने के लिए मजबूर किया जा रहा था। उनके परिवारों ने विदेश मंत्रालय से शिकायत कर उनकी रिहाई के लिए हस्तक्षेप की माँग की।

म्यावाडी में सक्रिय एक समूह ने तमिलनाडु के कम से कम 60 लोगों सहित 300 से ज्यादा भारतीयों पर साइबर क्राइम में शामिल होने का दबाव डाला। इन पीड़ितों को धमकियाँ दी गईं, प्रताड़ित किया गया और उन्हें रोजाना 15 घंटे से ज्यादा काम करने के लिए मजबूर किया गया। उन्होंने आगे बताया कि जब उन्होंने गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल होने से इनकार किया, तो उन्हें शारीरिक हिंसा और बिजली के झटके दिए गए।

यह एक दुष्चक्र है जिसमें विदेश में रहने का काल्पनिक सपना और इस सपने को साकार करने की असाध्य हताशा कई भारतीयों को शिकारियों का आसान शिकार बना देती है। अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया या किसी भी यूरोपीय देश तक पहुँचने के लिए किसी भी हद तक जाने की कमज़ोरियाँ और इच्छाशक्ति भारतीय नागरिकों को अपहरण के लिए फिरौती गिरोहों, नौकरी और ऑनलाइन घोटालों, और आधुनिक गुलामी के जाल में फँसा रही है।

लोगों को एजेंटों को लेकर बेहद सतर्क रहने की जरूरत है। कोई शॉटकट नहीं अपनाना चाहिए बल्कि वैध तरीके से ही विदेश जाने की योजना बनानी चाहिए। चाहे इसमें जितना भी वक्त लगे। जब तक उनके पास स्पष्ट, मान्य अनुबंध न हों, तब तक कोई भी पैसा देने से बचना चाहिए।

इसके अलावा, इन घोटालों के बारे में जागरूकता बढ़ाना बेहद जरूरी है, और अगर किसी को भी संदेह है कि वह या उसका कोई परिचित इसका शिकार हो सकता है, तो तुरंत अधिकारियों को इसकी सूचना देनी चाहिए। इस खतरे को खत्म करने के लिए, सरकार को भी कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। जागरूकता कार्यक्रम शुरू करने चाहिए और सहयोगी देशों से सहयोग बढ़ाने के लिए प्रेरित करना चाहिए। भारतीयों को येन केन प्रकारेण विदेश जाना और इसके लिए अवैध तरीके अपनाना बंद करना होगा।

(ये लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

बेगूसराय में ऑपइंडिया टीम पर नशे की हालत में RJD समर्थकों ने बोला हमला, पत्रकारों को धमकाया: लालू के जंगलराज की यादें हुई ताजा

बिहार के बेगूसराय में ऑपइंडिया की टीम रिपोर्टिंग करने गई तो वहाँ नशे में धुत कुछ RJD समर्थक हिंसक हो गए। उन्होंने BJP समर्थकों के साथ बदसलूकी की और पत्रकारों को भी धमकाने लगे। कैमरे के सामने ये सब करते हुए उन्होंने पूरी बातचीत को जैसे हाईजैक कर लिया। स्थानीय लोगों को ये देखकर लालू यादव के जंगलराज के डरावने दिन याद आ गए।

अनुराग मिश्रा की ग्राउंड रिपोर्ट में दिखा कि कैसे ये लोग गुस्से में थे। RJD वाले नशे की हालत में थे और विरोध करने वालों पर टूट पड़े। पत्रकारों ने वीडियो बनाया तो धमकी दी।

बिहार चुनाव 2025 के बीच ये घटना बता रही है कि राजनीतिक तनाव कितना बढ़ गया है। जंगलराज का मतलब था कानून-व्यवस्था का दम निकलना, वही सीन दोबारा लग रहा था। रिपोर्ट में साफ दिखा कि कैसे समर्थक बेकाबू हो जाते हैं। ये वीडियो देखकर समझ आता है कि बिहार में माहौल किस तरह से बिगाड़ा जा रहा है।

ऑपइंडिया की पूरी रिपोर्ट आप नीचे देख सकते हैं:

बिहार चुनाव में महागठबंधन का घोषणा पत्र निकाल देगा राज्य की आर्थिकी का तेल, क्या वादे सिर्फ इसलिए कि सत्ता में आना ही नहीं है तो बड़ी बातों से क्यों हटे पीछे?

बिहार चुनाव में महागठबंधन ने तेजस्वी प्रण के नाम से साझा घोषणा पत्र जारी किया। इसमें बेरोजगारों के लिए सरकारी नौकरी से लेकर किसानों, महिलाओं समेत भी से वादे किए गए हैं। लेकिन इन वादों को पूरा करने पर जो खर्च आएगा, उसे वहन करना बिहार जैसे राज्य के लिए संभव ही नहीं है।

आखिर हम ऐसा क्यों कह रहे हैं, आइये समझते हैं। महागठबंधन के मेनिफेस्टो में सबसे बड़ा वादा हर परिवार के एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी देने का है और वह भी सत्ता में आते ही, सिर्फ 20 महीनों में।

सरकारी नौकरी पर खर्च सालाना 5.5 लाख करोड़ रुपए

2023 की जातिगत सर्वे के मुताबिक, बिहार की जनसंख्या 13,07,25,310 है और यहाँ 2.7 करोड़ परिवार रहते हैं। यानी हर परिवार को नौकरी दी गई तो ये संख्या होगा 2.7 करोड़। फिलहाल बिहार में अभी 20 लाख लोग सरकारी नौकरी कर रहे हैं। इन लोगों को अगर घटा दिया जाए तो भी 2.5 करोड़ लोगों को सरकारी नौकरी देनी होगी।

अगर इतने लोगों को चतुर्थ वर्ग का कर्मचारी भी बनाया जाए तो उन्हें कम से कम 18000 रुपए देने होंगे। यानी हर महीने राज्य को 45 हजार करोड़ रुपए अतिरिक्त खर्च करने होंगे। सालाना खर्च की बात की जाए तो ये होगा करीब 5.5 लाख करोड़ रुपए।

बेरोजगारी भत्ता पर खर्च करीब 10 हजार करोड़ रुपए

बिहार के ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट कर चुके बेरोजगारों को हर महीने क्रमश: 2000 रुपए और 3000 रुपए बेरोजगारी भत्ता देने की बात कही गई है।

अगर मान लें कि आधे ग्रेजुएट और आधे पोस्ट ग्रेजुएट को सरकारी नौकरी मिल जाती है, तो बच जाते हैं आधे। 2023 की जातिगत जनगणना के मुताबिक, राज्य में 7989528 लोग ग्रेजुएट हैं। जबकि राज्य में स्नातकोत्तरों की कुल संख्या 1076700 है, जो कुल जनसंख्या का 0.82 प्रतिशत है।

इनमें से आधे लोग नौकरी में चले भी गए तो करीब 45 लाख लोगों को बेरोजगारी भत्ता देना होगा। ये खर्च आएगा कम से कम 10 हजार करोड़ रुपए।

स्वास्थ्य बीमा पर खर्च आएगा कम से कम 5 हजार करोड़ रुपए

महागठबंधन के वादों में एक वादा स्वास्थ्य को लेकर भी किया गया है। यानी महागठबंधन हर गरीब और लोअर मिडिल क्लास के परिवार को 25 लाख का बीमा कराएगा। एक अनुमान के मुताबिक बिहार में 94 लाख परिवार गरीबी रेखा से नीचे जीवन व्यतीत करते हैं। यानी राज्य में कम से कम 94 लाख परिवारों को स्वास्थ्य बीमा दिया जाएगा।

आयुष्मान के आधार पर इसपर होने वाले खर्च का भी अनुमान लगाया जा सकता है। आयुष्मान धारकों में हर साल करीब 47 फीसदी लोग क्लेम करते हैं। उस हिसाब से अगर बिहार में 44 लाख परिवार औसतन क्लेम करते हैं। ये खर्च अगर 12 हजार रुपए प्रति परिवार भी हैं, तो खर्च आएगा करीब 5 हजार करोड़ रुपए।

200 यूनिट फ्री बिजली पर खर्च 16 हजार करोड़ रुपए सालाना

बिहार में बिजली रेट है कम से कम 7.42 रुपए यानी 200 यूनिट महीने का खर्च आएगा करीब 1500 रुपए प्रति परिवार। अगर बिहार में सिर्फ गरीब परिवारों को ही फ्री बिजली दिया गया तो 94 लाख परिवारों पर हर महीने खर्च आएगा करीब ₹1400 करोड़। यानी सालाना 16 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा।

इसके अलावा भी कई वादे किए गए हैं, जिसका असर राज्य की कमाई पर पड़ेगा। इनको जोड़ दिया जाए तो कम से कम ये खर्च आएगा 5 लाख 80 हजार करोड़ रुपए। सरकारी सब्सिडी के वादे को जोड़ा जाए तो ये बजट और ऊपर जाएगा, क्योंकि इसमें भी जनता की गाढ़ी कमाई ही इस्तेमाल होती है।

अब सवाल ये है कि इतना खर्च आएगा कहाँ से? राज्य का 2023-24 का बजट देखा जाए तो ये है करीब 3 लाख 16 हजार करोड़ रुपए का। यानी महागठबंधन ने राज्य की जनता से जो वादे किए हैं, उस पर बिहार के बजट का दोगुने से ज्यादा खर्च आएगा।

महागठबंधन ये पैसे कहाँ से ला पाएगा, इस पर न तो कॉन्ग्रेस कुछ कहती है और न ही आरजेडी। महागठबंधन के इस वादे से तो बड़े बड़े उनके समर्थक भी हिल गए हैं। अजीम अंजुम ने खर्च का हिसाब बताया है 9 लाख करोड़ रुपए।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि जब सत्ता में आना ही नहीं है तो वादा करने से गुरेज क्यों? जनता से जितना चाहे वादे कर डालो, पूरा करना तो है नहीं।

कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश सरकार का बुरा हाल

कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश जैसे कॉन्ग्रेस शासित राज्यों का बुरा हाल है। कैग की 2023-24 की रिपोर्ट के मुताबिक, कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार की पाँच “गारंटी” योजनाओं ने खर्च में 36,538 करोड़ रुपए की वृद्धि की, जो कुल खर्च का लगभग 15% है, जबकि राजस्व में बमुश्किल 2% की वृद्धि हुई।

कर्नाटक का राजकोषीय घाटा बढ़कर 65,522 करोड़ रुपए हो गया, जिससे सरकार को बाजार से 63,000 करोड़ रुपये उधार लेने पड़े। हिमाचल प्रदेश भी वित्तीय संकट को देखते हुए वेतन में कटौती और मुफ्त सुविधाओं को वापस ले रहा है।

वैचारिक विरोधियों को ब्लॉक करता है वामपंथी प्रोपेगेंडा वाला विकिपीडिया, को-फाउंडर जिमी वेल्स ने खुद किया स्वीकार: पूर्वाग्रहों के आधार पर करता है काम

पॉलिटिक्स होम ने 27 अक्टूबर 2025 को एक नया इंटरव्यू छापा। इसमें विकिपीडिया के को-फाउंडर (सह-संस्थापक) जिमी वेल्स ने ब्रिटेन सरकार के साथ ‘राजनीतिक झगड़े’ की चेतावनी दी, जो ऑनलाइन सेफ्टी कानून को लेकर है। उन्होंने इस कानून को ‘बुरा सोचा हुआ’ बताया और कहा कि ये इंटरनेट को ‘ओपन’ रखने में खतरा पैदा करेगा। क्योंकि ये प्लेटफॉर्मों को लोगों की पहचान बताने और उम्र चेक करने के लिए मजबूर करेगा। उन्होंने कहा कि विकिपीडिया ने तुर्की या चीन सरकारों की ऐसी माँगों के आगे सिर नहीं झुकाया।

लेकिन उसी बातचीत में वेल्स ने बिना पछतावे के विकिपीडिया की अपनी अंदरूनी सेंसरशिप का बचाव किया। यानी उन स्रोतों को ब्लैकलिस्ट करना जिन्हें उन्होंने खुद पहले गलत माना है। उन्होंने कहा कि “ऐसी साइट्स को लेना जो हमेशा पागल साजिश की कहानियाँ और बकवास छापती हैं, ये बिल्कुल बेवकूफी है।” उन्होंने ब्लैकलिस्ट वाले प्रकाशनों को ‘साजिश की कहानियाँ और बकवास’ का इतिहास बताया। लेकिन हकीकत में ज्यादातर दक्षिणपंथी झुकाव वाले प्रकाशन को विकिपीडिया ने स्रोत के तौर पर लेने से बैन कर दिया था। इसका मतलब ये स्रोत ऑनलाइन, यूजर-बनाई ‘ज्ञानकोश’ के लेखों में इस्तेमाल नहीं हो सकते।

विरोधाभास साफ दिखता है। वेल्स ने सरकार के बोलने पर नियंत्रण को ठुकराया, लेकिन विकिपीडिया की सूचना पर विचारधारा आधारित पहरेदारी को पूरी तरह ठीक बताया। मुद्दा ये नहीं कि विकिपीडिया को गुणवत्ता चेक करनी चाहिए, जो हर प्लेटफॉर्म को चाहिए। बल्कि ये है कि क्या ये चेक (जाँच) एक विचारधारा (वामपंथ) को दुनिया भर में बढ़ावा देने और दूसरी (दक्षिणपंथ) को बाहर करने का हथियार बन गया है।

विकिपीडिया की जाँच सिर्फ नाम भर की, हकीकत-विरोधियों को दबाना

वेल्स ने आगे कहा कि ब्लैकलिस्ट और पुराने स्रोतों की व्यवस्था सिर्फ ‘गुणवत्ता’ के बारे में है, राजनीति के बारे में नहीं। उन्होंने कहा, “ये डेली मेल के राजनीतिक विचार के बारे में नहीं – ये उसकी छपाई की गुणवत्ता के बारे में है।” उन्होंने द सन और द डेली मेल जैसे मुख्यधारा प्रकाशनों को पुराना (आर्काइव) करने का बचाव किया। साथ ही माना कि ब्रेटबार्ट न्यूज और द हेरिटेज फाउंडेशन जैसे रूढ़िवादी (परंपरावादी) जगहों को पूरी तरह ब्लैकलिस्ट कर दिया गया है।

लेकिन असल में इसका मतलब पूरे विचारधारा वाले सिस्टम को मिटा देना है। वेल्स ने माना कि ब्लैकलिस्ट हटाना नामुमकिन है। उन्होंने विकिपीडिया में लेफ्टिस्ट विचारों का पक्षपात होने की आलोचना को नकार दिया और कहा कि वो खुद ‘बीच का रास्ता’ अपनाते हैं। उनकी ये नकारना ‘मिडिल्ड मॉडरेशन’ के आसान नाम से ढका था। यही वो बहाना जो बड़ी टेक कंपनियाँ अक्सर पक्षपात को जायज ठहराने के लिए इस्तेमाल करती हैं, जबकि खुद की तटस्थता का नाटक करती हैं।

असहमत मीडिया को ‘पागल साजिश वाली साइट्’ कहकर वेल्स ने इशारा किया कि कोई रूढ़िवादी (परंपरावादी-राष्ट्रवादी-दक्षिणपंथी) प्रकाशन (पब्लिकेशन) विकिपीडिया के नॉलेज सिस्टम में बराबर जगह नहीं पाता। ये सोच ही विकिपीडिया की लंबे दावे वाली तटस्थता को तोड़ देती है।

अल जज़ीरा से ऑपइंडिया तक- कैसे चुनिंदा भरोसा बदलता है नरेटिव का खेल

सितंबर 2024 में ऑपइंडिया ने विकिपीडिया पर एक रिपोर्ट जारी की। इसमें दिखाया गया कि विचारधारा का पक्षपात वेल्स की नई बातों से बहुत पहले से था। ये दिखाता है कि विकिपीडिया का कंटेंट सीधे संपादक के आदेश से नहीं, बल्कि ‘भरोसेमंद’ और ‘न भरोसेमंद’ स्रोतों के बाँटने के खेल से जुड़ा होता है। ये जिसे जिस लिस्ट में डाल दें।

मिसाल के तौर पर लेफ्टिस्टि यानी वापमंथी झुकाव वाली और वैश्विक सोच वाली जगहें जैसे अल जज़ीरा, बीबीसी, द गार्जियन और द वायर को ‘भरोसेमंद’ कहा जाता है। जबकि दक्षिणपंथी, मध्यमार्गी या राष्ट्रवादी जैसे ऑपइंडिया, स्वराज्य और रिपब्लिक को ब्लैकलिस्ट या गैर-भरोसेमंद के टैग में बदल दिया जाता है।

ये बाँटने का खेल खुद भी चलता रहता है। एक बार ‘भरोसेमंद’ स्रोत को हाँ मिल जाए, तो उसकी झूठी खबर को भी सच्ची गलती बता दिया जाता है। द वायर का ही उदाहरण ले लें। द वायर ने एक फेक ऐप ‘टेक फॉग’ पर आधारित झूठी खबरें कीं। और एक लेख में कहा कि बीजेपी के पास मेटा के तहत सोशल मीडिया पर कंटेंट रोकने का तरीका है। दोनों बातें गलत साबित हुईं जब मेटा पर आरोप लगाया और जानकारों ने बीच में आए।

रिपोर्ट ने कई जगहों का जिक्र किया जहाँ द वायर की साबित झूठी खबरों को बचाया गया। क्योंकि विरोधी सबूत ब्लैकलिस्ट वाली जगहों से आए थे।

एक और मिसाल में एक रिटायर्ड नौसेना अधिकारी ने खुलेआम द वायर पर इल्जाम लगाया कि उसने भारत की नौसेना कामयाबी को छोटा दिखाने वाले लेख में उसके बात को गलत लिखा। लेकिन उसका बयान द वायर के विकिपीडिया पेज पर नहीं डाला जा सका। क्यों? क्योंकि ट्विटर पर उसकी सफाई को ‘खुद का स्रोत’ कहा गया। और ऑपइंडिया जिसने उसके जवाब की खबर की थी, उसे ब्लैकलिस्ट रखा गया। नतीजा ये हुआ कि द वायर की फेक न्यूज बिना रोक-टोक के फैलती रही।थ ये विकिपीडिया के तटस्थ नजरिए के गिरने का साफ उदाहरण है, जब तटस्थता विचारधारा से तय होती है।

एक और उदाहरण दें, पुलिस के आधिकारिक अकाउंट्स ने द वायर की कहानियों को झूठा बताया, तो विकिपीडिया वाले संपादकों ने उनका कोट तक शामिल करने से मना कर दिया। उनका तर्क था कि पुलिस के बयान को ‘दूसरा भरोसेमंद स्रोत’ साबित करे। लेकिन वो सभी दूसरी जगहें ऑपइंडिया, रिपब्लिक और स्वराज्य सहित ब्लैकलिस्ट थीं। तो सच्चाई को व्यवस्था से दबा दिया गया।

ये तर्क और बेतुका हो जाता है क्योंकि विकिपीडिया अल जज़ीरा की भारत-विरोधी झूठी रिपोर्ट को ‘कन्फ्यूजन या युद्ध की रिपोर्टिंग में होने वाली आम गलतियाँ’ बता माफ कर देता है। लेकिन ऑपइंडिया की साबित सच्ची बातों को शुरू से ही गैर-भरोसेमंद कह देता है।

ब्लैकलिस्टिंग के खेल से पक्षपात को संस्थागत का रूप देना

ऑपइंडिया की विकिपीडिया रिपोर्ट ने विस्तार से दिखाया कि ब्लैकलिस्ट प्रक्रिया खुद पक्षपात को संस्थागत रूप देने का तरीका बनी। इसने विकिपीडिया संपादकों के बार-बार कोशिशों का रिकॉर्ड सामने रखा, जो वाम झुकाव वाली मीडिया खासकर द वायर जैसों की फेक न्यूज को उजागर करने से रोकते थे। जब एक संपादक ने द वायर के खिलाफ एफआईआर का उद्धरण डालने की कोशिश की, जो पूर्वोत्तर में झूठ फैलाकर हिंसा भड़काने वाली थी, तो दूसरे बड़े संपादक ने कहा ‘एफआईआर तो आम बात हैं।’

रिपोर्ट ने देखा कि विकिपीडिया उन प्रकाशनों के एफआईआर को बड़ा दिखाता था जिन्हें नापसंद करता था। लेकिन ‘भरोसेमंद’ वापमंथी स्रोतों पर एफआईआर को या तो छोड़ देता या हल्का कर देता। ऐसी दोहरी छाप ने रूढ़िवादी या राष्ट्रवादी जगहों को हमेशा के लिए गैर-भरोसेमंद बना दिया, जबकि विचारधारा के साथियों को बहानों से बचाया।

ये सिर्फ बेतरतीब संपादक का काम नहीं था। ये तटस्थता का नाटक बनाए रखने का बना बनाया पैटर्न है, ताकि चुनिंदा सच्ची खबरों को सामने आने से रोका जा सके। वेल्स का इस सिस्टम का नया बचाव बताता है कि ये कभी बागी ‘वालंटियर्स’ का काम नहीं था, बल्कि पहले से चल रहा एक अनकहा नियम था।

न्यूजलिंगर से मिलिए- जिसने पैसे लेकर भी विकिपीडिया के प्लेटफॉर्म को बना दिया ‘बायस्ड’

रिपोर्ट के सबसे साफ हिस्सों में न्यूजलिंगर नाम के संपादक की पहचान की गई, जो विकीमीडिया का एडमिन है। उसने गैर-वाम स्रोतों को पुराना करने और सच्चे सुधारों को रोकने के लिए जोरदार कोशिश की। रिपोर्ट के मुताबिक, विकीमीडिया फाउंडेशन ने खुद न्यूजलिंगर को विकीक्रेड प्रोग्राम से पैसे दिए। ये प्रोग्राम ‘सूचना सिस्टम में भरोसेमंदी मजबूत करने’ वाले प्रोजेक्ट्स को 10,000 डॉलर तक देता था।

न्यूजिंगर का प्रोजेक्ट ‘सोर्सरर: विकिपीडिया कम्युनिटी का झूठ के खिलाफ प्लेटफॉर्म’ नाम का था। इसमें ब्राउजर टूल और एपीआई बनाने का प्लान था जो विकिपीडिया की पुरानी स्रोत सूची, यानी ब्लैकलिस्ट से इंटरनेट पर साइट्स को नाम देता। उसके पैसे के विवरण में कहा गया कि ये टूल विकिपीडिया से ‘भरोसेमंद’ साइट्स के लिए निशान दिखाएगा। इससे विकिपीडिया की विचारधारा पर रोक उसके पेजों से बाहर फैल जाएगी।

उसने फख्र किया कि सोर्सरर बोट सूची को खुद स्कैन और अपडेट करेगा। एक और फीचर से संपादक ‘गैर-भरोसेमंद’ स्रोतों के उद्धरण कुछ बटन दबाकर हटा सकेंगे। आसान शब्दों में पैसे लेने वाले विकिपीडिया एडिमिनिस्ट्रेटर ने असहमति वाले सबूतों को हटाने का सिस्टम बनाया। साथ ही विचारधारा वाले साथियों को बड़ा बताया। ये सब उसने विकीमीडिया फाउंडेशन से मंजूर हुए पैसों के जरिए किया।

विकीमीडिया का पैसे देना बताता है कि पक्षपात ऊपर से मंजूर था

यहीं जिमी वेल्स की नई बातें अहम हैं। जब वो कहते हैं, ‘ऐसी साइट्स को लेना जो हमेशा पागल साजिश और बकवास छापती हैं, बेवकूफी है’ तो वो वही सोच दोहरा रहे हैं जिसे न्यूजलिंगर को पैसे देकर लिखवाया गया।

न्यूजलिंगर को पैसे देना कोई छोटी गलती नहीं थी। ये संस्था का समर्थन था। ‘भरोसेमंद सूची’ को हथियार बनाने वाले प्रोजेक्ट को चेक कर पैसे देकर, विकीमीडिया ने उसके नीचे के संपादक फैसलों से रजामंदी दिखाई। इसलिए विकिपीडिया की विचारधारा उनके स्वयंसेवकों का पक्षपात का संयोग नहीं। बल्कि ऊपर से सोची, पैसे दी गई और सही तरीके से अपनाई गई नीति है।

जब वेल्स ब्लैकलिस्ट बचाते हैं, तो वो उसी पैसे के नतीजे का बचाव कर रहे हैं। उनकी बातें रिपोर्ट की पुरानी चेतावनी साबित करती हैं कि विकिपीडिया का पक्षपात ऊपर से मँजूर और बनाया गया था, कुछ बागी संपादकों का नहीं।

यह सेंसरशिप मॉडल सत्य और लोकतंत्र के लिए क्यों खतरनाक है

यहाँ खतरा एक प्लेटफॉर्म से परे फैलता है। विकिपीडिया पत्रकारों, छात्रों और यहाँ तक कि उसके डेटा पर आधारित एआई मॉडल्स के लिए डिफॉल्ट संदर्भ बिंदु बना हुआ है। जब ऐसा एक प्लेटफॉर्म पूरे विचारधाराओं को ब्लैकलिस्ट करता है, तो यह केवल तथ्यों को फिल्टर नहीं करता, यह सार्वजनिक समझ को तार-तार कर देता है।

एक छात्र भारतीय राजनीति ढूँढेगा तो द वायर, स्क्रॉल और बीबीसी को खूब ‘कोट’ कर पाएगा, लेकिन ऑपइंडिया और स्वराज्य गायब दिखेंगे। ये गायबगी मिटाने जैसी है। ‘भरोसेमंद’ स्रोतों की दोहराई झूठी कहानी को सच्चाई मान लिया जाता है। जबकि ब्लैकलिस्ट वाली जगह से सच्चा सुधार भुला दिया जाता है।

तटस्थता बन जाती है प्रोपेगेंडा- विचारधारा को लेकर खुलेपन की जरूरत

जिमी वेल्स ने कहा था कि विकिपीडिया का काम ‘सारे इंसानी ज्ञान को सबके लिए पहुँचाना’ है। आज ये काम शर्तों वाला लगता है, ज्ञान तभी ठीक अगर राजनीतिक तौर पर एक तरफ से मेल खाए। ऐसे में ‘तटस्थ नजरिया’ वाला नियम अनदेखा कर दिया जाता है, क्योंकि तटस्थता अब इस पर टिकी है कि कौन से स्रोत उस लेख में आने दिए जाते हैं।

जैसा ऑपइंडिया की रिपोर्ट में कहा गया है, “अगर भरोसेमंद स्रोतों का समूह ही वैचारिक पक्षपात से भरा है, तो ‘तटस्थ नजरिया’ सिर्फ नियम है जहाँ लेफ्ट विचारधारा ही चलती है।”

एलन मस्क का ग्रोकिपीडिया लॉन्च, जो विकिपीडिया का एआई वाला विकल्प है, सही समय पर आया। वेल्स सरकारी रोक की चेतावनी देते हैं, लेकिन उनका प्लेटफॉर्म लंबे समय से मॉडरेशन के नाम पर हल्की तानाशाही का नमूना है। अगर ग्रोकिपीडिया असहमति को ब्लैकलिस्ट न कर कई विचारों को जगह देता रहे, तो विकिपीडिया की तथाकथित तटस्थता की कमजोरी खुल जाएगी।

अब विकिपीडिया के रीडर्स को उसके फाउंडरों से भरोसेमंद और गैर-भरोसेमंद सोर्स को लेकर लेक्चर पाने की जरूरत नहीं है, बल्कि जरूरत है तो उनके ये मानने की कि उनकी अंदरुनी व्यवस्था में ही सेंसरशिप जैसा जाल है। ट्रांसपेरेंसी वहीं से शुरू होगी, जिसमें एक पक्ष को रोकने को तटस्थता कहना बंद कर दिया जाए।

मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

योगी आदित्यनाथ को तो ‘नकली बाबा’ कह दिया, कभी किसी मुस्लिम नेता को ‘नकली मौलवी’ कह पाओगे तेजस्वी यादव?

बिहार में विधानसभा चुनाव के लिए सरगर्मी तेज है और नेता अलग-अलग मंचों-टीवी चैनलों पर जाकर अपनी बातें रख रहे हैं। एक इंटरव्यू के दौरान बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और RJD प्रमुख लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजस्वी यादव ने ‘रैपिड फायर राउंड’ में योगी आदित्यनाथ को लेकर सवाल पूछे जाने पर उन्हें ‘नकली बाबा‘ बता दिया।

योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री तो है हीं, साथ ही वो हिंदुओं की पवित्र गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर भी हैं। तेजस्वी यादव को अगर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पर कोई राजनीतिक हमला करना था तो वो उनके काम को लेकर सवाल उठा सकते थे लेकिन उन्होंने योगी आदित्यनाथ पर हमले के लिए उनकी धार्मिक पहचान को चुना।

असल में तेजस्वी यादव ने उत्तर योगी आदित्यनाथ को ‘नकली बाबा’ कहकर न सिर्फ एक व्यक्ति पर हमला किया है बल्कि पूरे हिंदू समाज की धार्मिक पहचान पर प्रहार करने की कोशिश की है। यह बयान केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं है, यह उस मानसिकता की झलक है जो दशकों से हिंदू प्रतीकों, संतों और सनातन परंपराओं का मजाक उड़ाने में आनंद महसूस करती आई है।

योगी आदित्यनाथ एक हजार साल पुरानी नाथ परंपरा के उत्तराधिकारी है। उनकी साधु या बाबा की पहचान कोई राजनीतिक मुखौटा नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक जीवन का प्रतीक है। लेकिन तेजस्वी यादव जैसे नेताओं के लिए हिंदू साधु का सम्मान कोई मायने नहीं रखता क्योंकि उनकी राजनीति का ईंधन ही हिंदू विरोध है।

अब सवाल उठता है कि क्या तेजस्वी यादव किसी मुसलमान नेता को ‘नकली मौलाना’ कह सकते हैं? क्या वे किसी मौलवी या इमाम के वस्त्र पर व्यंग्य कर सकते हैं? क्या वे किसी मुस्लिम नेता से कह सकते हैं कि उसकी टोपी, दाढ़ी या नमाज दिखावा है? इसका जवाब आपको, हमें सभी को पता है कि वह ऐसा नहीं करेंगे। अगर उन्होंने ऐसा करने की हिम्मत भी दिखाई तो पूरा सेक्युलर कुनबा और मीडिया की तथाकथित प्रगतिशील जमात उन पर टूट पड़ेगी।

हिंदुओं के मामले में भावनाओं के आहत होने से जुड़ा कोई नियम लागू नहीं होता है। केवल तेजस्वी ही नहीं, उनकी जमात के दूसरे नेता भी हिंदुओं को निशाने पर रखते हैं। तेजस्वी और उन जैसे नेताओं को ये अच्छी तरह से पता है कि हिंदू अपने विवेक में विश्वास रखता और इसलिए बार-बार उसे अपमानित किया जा सकता है। वो जानते हैं कि हिंदू ऐसा कहने पर कभी सड़क पर नहीं उतरेगा, हिंसा नहीं करेगा। हिंदुओं की इसी सहिष्णुता को ये नेता अपनी ढाल बनाते हैं।

योगी आदित्यनाथ की धार्मिक पहचान पर हमला कोई नई बात नहीं है। तेजस्वी और उनकी पूरी कथित सेक्युलर ब्रिगेड के लोग योगी आदित्यनाथ को अजय सिंह बिष्ट कहकर बुलाते रहे हैं। संत बनने के बाद कोई शख्स अपनी पुरानी पहचान, अपना परिवार छोड़ देता है लेकिन राजनीतिक मर्यादा तो छोड़िए ये ब्रिगेड धार्मिक परंपराओं का सम्मान तक नहीं करती है।

इन्हीं तेजस्वी यादव को चुनाव में मुस्लिम वोट बैंक को साधना है तो ये उनके पक्ष में वक्फ बिल तक को कूड़ेदान में फेंकने की बात कर रहे हैं। ये उस वोट बैंक के लिए टोपी भी लगाते हैं लेकिन हिंदुओं का सम्मान उनके लिए कोई मायने नहीं रखता है।

तेजस्वी यादव जैसे नेता शायद भूल जाते हैं कि योगी आदित्यनाथ जैसे संत न केवल राजनीतिक पद पर हैं बल्कि लाखों लोगों के लिए आस्था और प्रेरणा के प्रतीक हैं। योगी आदित्यनाथ ने जिस अनुशासन और तपस्या से खुद को इस परंपरा का उत्तराधिकारी बनाया है क्या वो कोई ‘नकली बाबा’ कर सकता है। मगर तेजस्वी यादव के लिए ये बातें मायने नहीं रखतीं क्योंकि उनके लिए सत्ता और वोट बैंक ही सर्वोपरि हैं। उन्हें इस देश की सनातन आत्मा से कोई लेना-देना नहीं है।

यह भी सच है कि ऐसे बयान हिंदू समाज को भावनात्मक रूप से चोट पहुँचाते हैं। दुर्भाग्य है कि हमारे यहाँ हिंदू अस्मिता की रक्षा को लेकर कोई सामाजिक या राजनीतिक एकजुटता नहीं बन पाती है। अब वक्त आ गया है कि हिंदू समाज इस तरह के दोहरेपन को पहचानें। लोकतंत्र में आलोचना और असहमति रहे, रहती भी है लेकिन हिंदुओं की धार्मिक पहचान पर प्रहार लंबे समय तक एजेंडा नहीं बन सकता है।

भारत के विकास का ‘जल मार्ग’: जिस ‘ब्लू इकोनॉमी’ की हुई अनदेखी, उसे PM मोदी ने बनाया ‘टॉप एजेंडा’, जानें क्या है मैरीटाइम विजन 2030?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुधवार (29 अक्टूबर 2025) को देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में एक बहुत बड़े कार्यक्रम में हिस्सा लिया। यह कार्यक्रम ‘इंडिया मैरीटाइम वीक 2025’ है, जो मुंबई के नेस्को एग्जीबिशन सेंटर में चल रहा है। पीएम मोदी ने यहाँ ‘मैरीटाइम लीडर्स कॉन्क्लेव’ को संबोधित किया और दुनिया भर की बड़ी समुद्री कंपनियों के मुखियाओं के ‘ग्लोबल मैरीटाइम सीईओ फोरम’ की अध्यक्षता की।

क्या है यह ‘मैरीटाइम वीक’?

जानकारी के अनुसार, ‘इंडिया मैरीटाइम वीक’ एक पाँच दिन का (27 से 31 अक्टूबर 2025) बड़ा अंतर्राष्ट्रीय मेला है। इसका नारा ‘सागर एक, दृष्टि एक’ है। इस आयोजन में दुनिया के 85 से ज्यादा देशों से 1 लाख से अधिक लोग (प्रतिनिधि, कंपनी मालिक, एक्सपर्ट) हिस्सा ले रहे हैं। इसका सीधा मतलब है कि यह मंच भारत के समंदर से जुड़े व्यापार (जिसे ब्लू इकॉनोमी कहते हैं) को नई दिशा देने के लिए दुनिया भर के बड़े खिलाड़ियों को एक साथ ला रहा है।

पीएम मोदी का इस कार्यक्रम में शामिल होना दिखाता है कि वह भारत के समुद्री क्षेत्र को बदलने के लिए कितने गंभीर हैं। पीएम मोदी का लक्ष्य भारत को ‘समुद्री अमृत काल विजन 2047’ के तहत एक ऐसी समुद्री ताकत बनाना है, जो दुनिया में सबसे आगे हो। यह कॉन्क्लेव और फोरम इसी सपने को पूरा करने की ओर पहला कदम है। यहाँ जिन बड़े मुद्दों पर बात होगी, उनमें ‘हरित नौवहन, सतत विकास, लचीली सप्लाई चेन शामिल है।

बता दें, कि हरित नौवहन का मतलब, पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना जहाजों को चलाना और समुद्री विकास करना। वहीं, सतत विकास का मतलब, ऐसा विकास जो लंबे समय तक चले और लचीली सप्लाई चेन का मतलब, यह सुनिश्चित करना कि दुनिया भर में माल पहुँचाने का काम बिना रुके और आसानी से चलता रहे। कुल मिलाकर, इस आयोजन का मकसद भारत को सिर्फ एक समुद्री व्यापारिक केंद्र ही नहीं, बल्कि वैश्विक समुद्री व्यापार और बंदरगाह विकास में अगुआ बनाना है।

समंदर बनेगा भारत की शक्ति: जानिए ‘मैरीटाइम इंडिया विजन 2030’ की पूरी कहानी

हमारे देश भारत का समुद्री किनारा बहुत विशाल है। यही वजह है कि समंदर का रास्ता हमारी अर्थव्यवस्था के लिए प्राणवायु की तरह है। जरा सोचिए, भारत का करीब 95 प्रतिशत व्यापार (वजन के हिसाब से) और 70 प्रतिशत व्यापार (पैसे के हिसाब से) सिर्फ समुद्री रास्तों से होता है। यानी, समुद्र ही हमारे वाणिज्य की असली ताकत है।

इसी बड़ी ताकत को समझते हुए, भारत सरकार ने साल 2021 में एक बहुत बड़ा और खास प्लान बनाया, जिसका नाम ‘मैरीटाइम इंडिया विजन (MIV) 2030’ है। यह सिर्फ कागजी योजना नहीं है, बल्कि देश के समुद्री क्षेत्र को पूरी तरह से बदलने का एक मास्टरप्लान है।

MIV 2030 का मुख्य मकसद बहुत सीधा है। भारत को साल 2030 तक दुनिया की सबसे ताकतवर, सबसे समृद्ध और सबसे आधुनिक समुद्री शक्तियों में शामिल करना। इस लक्ष्य को पाने के लिए, सरकार ने 2030 तक इस क्षेत्र में 3 से 3.5 लाख करोड़ रुपए के भारी-भरकम निवेश के साथ 150 से ज्यादा बड़े कदम उठाने का फैसला किया है।

इस पूरे विजन की खास बात यह है कि यह सिर्फ पैसा कमाने पर ध्यान नहीं देता, बल्कि पर्यावरण की सुरक्षा और लोगों को हुनरमंद बनाने (कौशल विकास) पर भी पूरा ध्यान केंद्रित करता है। यानी, यह विजन केवल सामान ढोने का रास्ता नहीं है, बल्कि देश में नया व्यापार, बड़ा निवेश और लाखों रोजगार पैदा करने का इंजन है।

MIV 2030 के 4 आधार स्तंभ: समंदर से समृद्धि का रास्ता

‘मैरीटाइम इंडिया विजन 2030’ (MIV 2030) एक मजबूत इमारत की तरह है, जो चार मुख्य खंभों (स्तंभों) पर खड़ी है। इन चारों पर एक साथ काम करके ही भारत समुद्री दुनिया का लीडर बन पाएगा।

पोर्ट को बनाना सुपरपावर (पोर्ट-आधारित विकास)- पहला स्तंभ हमारे बंदरगाहों को आधुनिक और विश्वस्तरीय बनाने पर टिका है। सरकार का लक्ष्य है कि हमारे बंदरगाह इतने कुशल हो जाएँ कि विदेशी बंदरगाहों को टक्कर दे सकें। पिछले दस सालों में हमारे बंदरगाहों की सामान संभालने की क्षमता 140 करोड़ मीट्रिक टन से बढ़कर 276.2 करोड़ मीट्रिक टन यानि दोगुनी हो गई है।

बंदरगाहों पर जहाजों के रुकने और माल लादने-उतारने में लगने वाला औसत समय 93 घंटे से घटकर सिर्फ 48 घंटे रह गया है, यानी काम लगभग आधे समय में हो रहा है। बंदरगाहों का सालाना मुनाफा भी 1026 करोड़ रुपए से बढ़कर 9352 करोड़ रुपए हो गया है। MIV 2030 के तहत बंदरगाहों को कई तरह के परिवहन (सड़क, रेल, जल) को जोड़ने वाले स्मार्ट हब में बदला जा रहा है, जिससे व्यापार की लागत कम हो जाएगी।

अपने जहाज बनाना और चलाना (नौवहन और जहाज निर्माण)- दूसरा स्तंभ कहता है कि भारत को जहाज चलाने की अपनी क्षमता बढ़ानी होगी और देश में ही जहाज बनाने के उद्योग को फिर से जिंदा करना होगा। भारत के पास अपने झंडे वाले जहाजों की संख्या 1205 से बढ़कर 1549 हो गई है। जहाजों की कुल माल ढोने की क्षमता भी 1 करोड़ सकल टन से बढ़कर 1.35 करोड़ सकल टन हो गई है।

जहाज निर्माण को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने हाल ही में 69,725 करोड़ रुपए का एक बड़ा आर्थिक पैकेज घोषित किया है। इसके अलावा, जहाज बनाने और खरीदने के लिए 25,000 करोड़ रुपए का एक खास समुद्री विकास कोष (MDF) भी बनाया गया है। विशाखापत्तनम में एक खास केंद्र ‘भारतीय जहाज प्रौद्योगिकी केंद्र’ बनाया जा रहा है, जहाँ जहाज डिजाइन और रिसर्च का काम होगा।

माल की आसान आवाजाही (निर्बाध आपूर्ति शृंखला और आसान लॉजिस्टिक्स)- तीसरा स्तंभ देश में माल ढुलाई की लागत कम करने और परिवहन को आसान, सस्ता और पर्यावरण के अनुकूल बनाने पर ध्यान देता है। तटीय इलाकों में जहाजों से माल ढोने का काम दोगुना हो गया है। देश की नदियों और नहरों (अंतर्देशीय जलमार्ग) का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। इन रास्तों से माल ढुलाई 2014 के मुकाबले 710 प्रतिशत ज्यादा हो गई है। चालू जलमार्गों की संख्या 3 से बढ़कर 29 हो गई है।

‘सागरमाला कार्यक्रम’ इस काम का मुख्य हिस्सा है। यह 5.8 लाख करोड़ रुपए की लागत से समुद्री और नदी परिवहन नेटवर्क को मजबूत कर रहा है, ताकि माल ढुलाई का खर्च कम हो और रोजगार पैदा हों।

कुशल कारीगर तैयार करना (समुद्री कौशल निर्माण)- चौथा और सबसे जरूरी स्तंभ समुद्र से जुड़े कामों के लिए हुनरमंद लोग (मानव संसाधन) तैयार करने पर केंद्रित है। पिछले एक दशक में भारत में समुद्री कामगारों (नाविकों और अन्य स्टाफ) की संख्या 1.25 लाख से बढ़कर 3 लाख से अधिक हो गई है। भारत अब प्रशिक्षित नाविकों के मामले में दुनिया के टॉप 3 सप्लायरों में से एक बन गया है। MIV 2030 का लक्ष्य है कि कौशल विकास से देश और विदेश में जहाज चलाने, रसद (लॉजिस्टिक्स) और अन्य समुद्री उद्योगों में बड़े अवसर पैदा किए जाएँ।

पर्यावरण का ख्याल (हरित नौवहन)- इन चार स्तंभों के अलावा, MIV 2030 और IMW 2050 का सबसे बड़ा जोर हरित टेक्नोलॉजी पर है। भारत अब समुद्री क्षेत्र में हरित नेतृत्वकर्ता बनना चाहता है। सरकार हरित गलियारे बना रही है। बंदरगाहों पर जहाजों के लिए हरित हाइड्रोजन जैसे साफ ईंधन की व्यवस्था की जा रही है। मेथनॉल जैसे कम प्रदूषण वाले ईंधन से चलने वाले जहाजों को बढ़ावा दिया जा रहा है। यह दिखाता है कि भारत की आर्थिक तरक्की को पर्यावरण के साथ जोड़कर चल रहा है।

‘अमृत काल’ का समुद्री सपना: 2047 तक भारत बनेगा दुनिया का ‘सी-किंग’

‘मैरीटाइम इंडिया विजन 2030’ असल में एक बहुत बड़ी यात्रा की शुरुआत है, जिसका अंतिम पड़ाव ‘समुद्री अमृत काल विजन 2047’ है। सरल शब्दों में 2047 तक, जब भारत अपनी आजादी के 100 वर्ष पूरे करेगा, सरकार का सपना है कि हमारा देश जहाज निर्माण और समुद्री शक्ति के मामले में दुनिया के टॉप देशों में शामिल हो जाए। यह सपना बहुत विशाल है, जिसके लिए 80 लाख करोड़ रुपए से भी ज्यादा के बड़े निवेश की तैयारी की गई है।

इस विजन को जमीन पर उतारने का काम शुरू हो चुका है। हाल ही में, अलग-अलग कंपनियों और सरकार के बीच 27 बड़े समझौते हुए हैं। इनमें 66,000 करोड़ रुपए से ज्यादा के निवेश के रास्ते खुल गए हैं। उदाहरण के लिए, ओडिशा में 21,500 करोड़ रुपए की लागत से एक बिल्कुल नया, इको-फ्रेंडली ‘ग्रीनफिल्ड बंदरगाह’ बन रहा है। इसके अलावा, पटना में 908 करोड़ रुपए की शानदार ‘जल मेट्रो परियोजना’ पर काम चल रहा है। इसमें पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए इलेक्ट्रिक नावें चलाई जाएँगी।

भारत अब सिर्फ दर्शक नहीं, लीडर है

प्रधानमंत्री मोदी का मुबंई दौरा और ‘इंडिया मैरीटाइम वीक 2025’ का इतना सफल आयोजन यह साफ कर देता है कि भारत अब अपने समुद्री भविष्य को लेकर बहुत ज्यादा गंभीर है। यह अब सिर्फ इतना नहीं चाहता कि वैश्विक व्यापार में हमारा देश बस एक भागीदार बना रहे। बल्कि, भारत ने संकल्प लिया है कि वह भविष्य के समुद्री व्यापार की दिशा को तय करने वाला और पूरी दुनिया की आपूर्ति श्रृंखला को आकार देने वाला एक ‘निर्णायक खिलाड़ी’ बनेगा।

आजादी के बाद समंदर को भुला दिया गया

आजादी मिलने के बाद, हमारे देश का सारा ध्यान अपनी सीमाओं की सुरक्षा और जमीन से जुड़े खतरों पर रहा। यही वजह थी कि हमने समंदर की शक्ति और समुद्री रास्तों को लगभग भुला दिया। इंदिरा गाँधी की सरकार ने दुनिया के बड़े देशों से हिंद महासागर को खाली रखने की बात तो की, लेकिन बंदरगाहों को सुधारने या नए समुद्री ढाँचे पर कोई खास काम नहीं किया गया। उस समय की सरकारों ने समुद्र को केवल सुरक्षा के नजरिए से देखा, व्यापार और विकास के नजरिए से नहीं।

1990 के दशक तक आते-आते, भारत के सारे बंदरगाह पुराने और कमजोर हो चुके थे। यहाँ माल उतारने-चढ़ाने की क्षमता दुनिया के बाकी देशों के मुकाबले बहुत पीछे थी। बाद में, यूपीए सरकार (2004-2014) ने कुछ कोशिशें जरूर कीं, जैसे कि ‘सागरमाला’ नाम की योजना शुरू की, लेकिन यह भी सिर्फ कागजों तक सिमटकर रह गई। जरूरी पैसा नहीं मिला और सरकारी कामकाज की रुकावटों के चलते काम बहुत धीमा रहा।

नतीजा क्या हुआ?

हमारे बंदरगाहों पर किसी भी जहाज को माल उतारने या लादने में 2 से 3 दिन लग जाते थे, जबकि सिंगापुर जैसे देश यह काम चंद घंटों में निपटा देते थे। इस देरी से व्यापार की लागत बहुत बढ़ गई। गुजरात में लोथल और धोलावीरा जैसे हमारी पुरानी समुद्री विरासत के स्थल भी ध्यान न दिए जाने के कारण खराब होते चले गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2024 में खुद कहा था कि आजादी के बाद दशकों तक हमने अपनी समृद्ध विरासत और इतिहास को अनदेखा किया।

केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने भी माना कि पिछली सरकारों ने भारत के समुद्री इतिहास को दशकों तक उपेक्षित रखा। इस उपेक्षा ने देश को आर्थिक रूप से भारी नुकसान पहुँचाया। हमारा 95% आयात-निर्यात समंदर पर निर्भर है, लेकिन समुद्री ढाँचे की कमी से लागत हमेशा ज्यादा बनी रही।