पॉलिटिक्स होम ने 27 अक्टूबर 2025 को एक नया इंटरव्यू छापा। इसमें विकिपीडिया के को-फाउंडर (सह-संस्थापक) जिमी वेल्स ने ब्रिटेन सरकार के साथ ‘राजनीतिक झगड़े’ की चेतावनी दी, जो ऑनलाइन सेफ्टी कानून को लेकर है। उन्होंने इस कानून को ‘बुरा सोचा हुआ’ बताया और कहा कि ये इंटरनेट को ‘ओपन’ रखने में खतरा पैदा करेगा। क्योंकि ये प्लेटफॉर्मों को लोगों की पहचान बताने और उम्र चेक करने के लिए मजबूर करेगा। उन्होंने कहा कि विकिपीडिया ने तुर्की या चीन सरकारों की ऐसी माँगों के आगे सिर नहीं झुकाया।
लेकिन उसी बातचीत में वेल्स ने बिना पछतावे के विकिपीडिया की अपनी अंदरूनी सेंसरशिप का बचाव किया। यानी उन स्रोतों को ब्लैकलिस्ट करना जिन्हें उन्होंने खुद पहले गलत माना है। उन्होंने कहा कि “ऐसी साइट्स को लेना जो हमेशा पागल साजिश की कहानियाँ और बकवास छापती हैं, ये बिल्कुल बेवकूफी है।” उन्होंने ब्लैकलिस्ट वाले प्रकाशनों को ‘साजिश की कहानियाँ और बकवास’ का इतिहास बताया। लेकिन हकीकत में ज्यादातर दक्षिणपंथी झुकाव वाले प्रकाशन को विकिपीडिया ने स्रोत के तौर पर लेने से बैन कर दिया था। इसका मतलब ये स्रोत ऑनलाइन, यूजर-बनाई ‘ज्ञानकोश’ के लेखों में इस्तेमाल नहीं हो सकते।
विरोधाभास साफ दिखता है। वेल्स ने सरकार के बोलने पर नियंत्रण को ठुकराया, लेकिन विकिपीडिया की सूचना पर विचारधारा आधारित पहरेदारी को पूरी तरह ठीक बताया। मुद्दा ये नहीं कि विकिपीडिया को गुणवत्ता चेक करनी चाहिए, जो हर प्लेटफॉर्म को चाहिए। बल्कि ये है कि क्या ये चेक (जाँच) एक विचारधारा (वामपंथ) को दुनिया भर में बढ़ावा देने और दूसरी (दक्षिणपंथ) को बाहर करने का हथियार बन गया है।
विकिपीडिया की जाँच सिर्फ नाम भर की, हकीकत-विरोधियों को दबाना
वेल्स ने आगे कहा कि ब्लैकलिस्ट और पुराने स्रोतों की व्यवस्था सिर्फ ‘गुणवत्ता’ के बारे में है, राजनीति के बारे में नहीं। उन्होंने कहा, “ये डेली मेल के राजनीतिक विचार के बारे में नहीं – ये उसकी छपाई की गुणवत्ता के बारे में है।” उन्होंने द सन और द डेली मेल जैसे मुख्यधारा प्रकाशनों को पुराना (आर्काइव) करने का बचाव किया। साथ ही माना कि ब्रेटबार्ट न्यूज और द हेरिटेज फाउंडेशन जैसे रूढ़िवादी (परंपरावादी) जगहों को पूरी तरह ब्लैकलिस्ट कर दिया गया है।
लेकिन असल में इसका मतलब पूरे विचारधारा वाले सिस्टम को मिटा देना है। वेल्स ने माना कि ब्लैकलिस्ट हटाना नामुमकिन है। उन्होंने विकिपीडिया में लेफ्टिस्ट विचारों का पक्षपात होने की आलोचना को नकार दिया और कहा कि वो खुद ‘बीच का रास्ता’ अपनाते हैं। उनकी ये नकारना ‘मिडिल्ड मॉडरेशन’ के आसान नाम से ढका था। यही वो बहाना जो बड़ी टेक कंपनियाँ अक्सर पक्षपात को जायज ठहराने के लिए इस्तेमाल करती हैं, जबकि खुद की तटस्थता का नाटक करती हैं।
असहमत मीडिया को ‘पागल साजिश वाली साइट्’ कहकर वेल्स ने इशारा किया कि कोई रूढ़िवादी (परंपरावादी-राष्ट्रवादी-दक्षिणपंथी) प्रकाशन (पब्लिकेशन) विकिपीडिया के नॉलेज सिस्टम में बराबर जगह नहीं पाता। ये सोच ही विकिपीडिया की लंबे दावे वाली तटस्थता को तोड़ देती है।
अल जज़ीरा से ऑपइंडिया तक- कैसे चुनिंदा भरोसा बदलता है नरेटिव का खेल
सितंबर 2024 में ऑपइंडिया ने विकिपीडिया पर एक रिपोर्ट जारी की। इसमें दिखाया गया कि विचारधारा का पक्षपात वेल्स की नई बातों से बहुत पहले से था। ये दिखाता है कि विकिपीडिया का कंटेंट सीधे संपादक के आदेश से नहीं, बल्कि ‘भरोसेमंद’ और ‘न भरोसेमंद’ स्रोतों के बाँटने के खेल से जुड़ा होता है। ये जिसे जिस लिस्ट में डाल दें।
मिसाल के तौर पर लेफ्टिस्टि यानी वापमंथी झुकाव वाली और वैश्विक सोच वाली जगहें जैसे अल जज़ीरा, बीबीसी, द गार्जियन और द वायर को ‘भरोसेमंद’ कहा जाता है। जबकि दक्षिणपंथी, मध्यमार्गी या राष्ट्रवादी जैसे ऑपइंडिया, स्वराज्य और रिपब्लिक को ब्लैकलिस्ट या गैर-भरोसेमंद के टैग में बदल दिया जाता है।
ये बाँटने का खेल खुद भी चलता रहता है। एक बार ‘भरोसेमंद’ स्रोत को हाँ मिल जाए, तो उसकी झूठी खबर को भी सच्ची गलती बता दिया जाता है। द वायर का ही उदाहरण ले लें। द वायर ने एक फेक ऐप ‘टेक फॉग’ पर आधारित झूठी खबरें कीं। और एक लेख में कहा कि बीजेपी के पास मेटा के तहत सोशल मीडिया पर कंटेंट रोकने का तरीका है। दोनों बातें गलत साबित हुईं जब मेटा पर आरोप लगाया और जानकारों ने बीच में आए।
रिपोर्ट ने कई जगहों का जिक्र किया जहाँ द वायर की साबित झूठी खबरों को बचाया गया। क्योंकि विरोधी सबूत ब्लैकलिस्ट वाली जगहों से आए थे।
एक और मिसाल में एक रिटायर्ड नौसेना अधिकारी ने खुलेआम द वायर पर इल्जाम लगाया कि उसने भारत की नौसेना कामयाबी को छोटा दिखाने वाले लेख में उसके बात को गलत लिखा। लेकिन उसका बयान द वायर के विकिपीडिया पेज पर नहीं डाला जा सका। क्यों? क्योंकि ट्विटर पर उसकी सफाई को ‘खुद का स्रोत’ कहा गया। और ऑपइंडिया जिसने उसके जवाब की खबर की थी, उसे ब्लैकलिस्ट रखा गया। नतीजा ये हुआ कि द वायर की फेक न्यूज बिना रोक-टोक के फैलती रही।थ ये विकिपीडिया के तटस्थ नजरिए के गिरने का साफ उदाहरण है, जब तटस्थता विचारधारा से तय होती है।
एक और उदाहरण दें, पुलिस के आधिकारिक अकाउंट्स ने द वायर की कहानियों को झूठा बताया, तो विकिपीडिया वाले संपादकों ने उनका कोट तक शामिल करने से मना कर दिया। उनका तर्क था कि पुलिस के बयान को ‘दूसरा भरोसेमंद स्रोत’ साबित करे। लेकिन वो सभी दूसरी जगहें ऑपइंडिया, रिपब्लिक और स्वराज्य सहित ब्लैकलिस्ट थीं। तो सच्चाई को व्यवस्था से दबा दिया गया।
ये तर्क और बेतुका हो जाता है क्योंकि विकिपीडिया अल जज़ीरा की भारत-विरोधी झूठी रिपोर्ट को ‘कन्फ्यूजन या युद्ध की रिपोर्टिंग में होने वाली आम गलतियाँ’ बता माफ कर देता है। लेकिन ऑपइंडिया की साबित सच्ची बातों को शुरू से ही गैर-भरोसेमंद कह देता है।
ब्लैकलिस्टिंग के खेल से पक्षपात को संस्थागत का रूप देना
ऑपइंडिया की विकिपीडिया रिपोर्ट ने विस्तार से दिखाया कि ब्लैकलिस्ट प्रक्रिया खुद पक्षपात को संस्थागत रूप देने का तरीका बनी। इसने विकिपीडिया संपादकों के बार-बार कोशिशों का रिकॉर्ड सामने रखा, जो वाम झुकाव वाली मीडिया खासकर द वायर जैसों की फेक न्यूज को उजागर करने से रोकते थे। जब एक संपादक ने द वायर के खिलाफ एफआईआर का उद्धरण डालने की कोशिश की, जो पूर्वोत्तर में झूठ फैलाकर हिंसा भड़काने वाली थी, तो दूसरे बड़े संपादक ने कहा ‘एफआईआर तो आम बात हैं।’
रिपोर्ट ने देखा कि विकिपीडिया उन प्रकाशनों के एफआईआर को बड़ा दिखाता था जिन्हें नापसंद करता था। लेकिन ‘भरोसेमंद’ वापमंथी स्रोतों पर एफआईआर को या तो छोड़ देता या हल्का कर देता। ऐसी दोहरी छाप ने रूढ़िवादी या राष्ट्रवादी जगहों को हमेशा के लिए गैर-भरोसेमंद बना दिया, जबकि विचारधारा के साथियों को बहानों से बचाया।
ये सिर्फ बेतरतीब संपादक का काम नहीं था। ये तटस्थता का नाटक बनाए रखने का बना बनाया पैटर्न है, ताकि चुनिंदा सच्ची खबरों को सामने आने से रोका जा सके। वेल्स का इस सिस्टम का नया बचाव बताता है कि ये कभी बागी ‘वालंटियर्स’ का काम नहीं था, बल्कि पहले से चल रहा एक अनकहा नियम था।
न्यूजलिंगर से मिलिए- जिसने पैसे लेकर भी विकिपीडिया के प्लेटफॉर्म को बना दिया ‘बायस्ड’
रिपोर्ट के सबसे साफ हिस्सों में न्यूजलिंगर नाम के संपादक की पहचान की गई, जो विकीमीडिया का एडमिन है। उसने गैर-वाम स्रोतों को पुराना करने और सच्चे सुधारों को रोकने के लिए जोरदार कोशिश की। रिपोर्ट के मुताबिक, विकीमीडिया फाउंडेशन ने खुद न्यूजलिंगर को विकीक्रेड प्रोग्राम से पैसे दिए। ये प्रोग्राम ‘सूचना सिस्टम में भरोसेमंदी मजबूत करने’ वाले प्रोजेक्ट्स को 10,000 डॉलर तक देता था।
न्यूजिंगर का प्रोजेक्ट ‘सोर्सरर: विकिपीडिया कम्युनिटी का झूठ के खिलाफ प्लेटफॉर्म’ नाम का था। इसमें ब्राउजर टूल और एपीआई बनाने का प्लान था जो विकिपीडिया की पुरानी स्रोत सूची, यानी ब्लैकलिस्ट से इंटरनेट पर साइट्स को नाम देता। उसके पैसे के विवरण में कहा गया कि ये टूल विकिपीडिया से ‘भरोसेमंद’ साइट्स के लिए निशान दिखाएगा। इससे विकिपीडिया की विचारधारा पर रोक उसके पेजों से बाहर फैल जाएगी।
उसने फख्र किया कि सोर्सरर बोट सूची को खुद स्कैन और अपडेट करेगा। एक और फीचर से संपादक ‘गैर-भरोसेमंद’ स्रोतों के उद्धरण कुछ बटन दबाकर हटा सकेंगे। आसान शब्दों में पैसे लेने वाले विकिपीडिया एडिमिनिस्ट्रेटर ने असहमति वाले सबूतों को हटाने का सिस्टम बनाया। साथ ही विचारधारा वाले साथियों को बड़ा बताया। ये सब उसने विकीमीडिया फाउंडेशन से मंजूर हुए पैसों के जरिए किया।
विकीमीडिया का पैसे देना बताता है कि पक्षपात ऊपर से मंजूर था
यहीं जिमी वेल्स की नई बातें अहम हैं। जब वो कहते हैं, ‘ऐसी साइट्स को लेना जो हमेशा पागल साजिश और बकवास छापती हैं, बेवकूफी है’ तो वो वही सोच दोहरा रहे हैं जिसे न्यूजलिंगर को पैसे देकर लिखवाया गया।
न्यूजलिंगर को पैसे देना कोई छोटी गलती नहीं थी। ये संस्था का समर्थन था। ‘भरोसेमंद सूची’ को हथियार बनाने वाले प्रोजेक्ट को चेक कर पैसे देकर, विकीमीडिया ने उसके नीचे के संपादक फैसलों से रजामंदी दिखाई। इसलिए विकिपीडिया की विचारधारा उनके स्वयंसेवकों का पक्षपात का संयोग नहीं। बल्कि ऊपर से सोची, पैसे दी गई और सही तरीके से अपनाई गई नीति है।
जब वेल्स ब्लैकलिस्ट बचाते हैं, तो वो उसी पैसे के नतीजे का बचाव कर रहे हैं। उनकी बातें रिपोर्ट की पुरानी चेतावनी साबित करती हैं कि विकिपीडिया का पक्षपात ऊपर से मँजूर और बनाया गया था, कुछ बागी संपादकों का नहीं।
यह सेंसरशिप मॉडल सत्य और लोकतंत्र के लिए क्यों खतरनाक है
यहाँ खतरा एक प्लेटफॉर्म से परे फैलता है। विकिपीडिया पत्रकारों, छात्रों और यहाँ तक कि उसके डेटा पर आधारित एआई मॉडल्स के लिए डिफॉल्ट संदर्भ बिंदु बना हुआ है। जब ऐसा एक प्लेटफॉर्म पूरे विचारधाराओं को ब्लैकलिस्ट करता है, तो यह केवल तथ्यों को फिल्टर नहीं करता, यह सार्वजनिक समझ को तार-तार कर देता है।
एक छात्र भारतीय राजनीति ढूँढेगा तो द वायर, स्क्रॉल और बीबीसी को खूब ‘कोट’ कर पाएगा, लेकिन ऑपइंडिया और स्वराज्य गायब दिखेंगे। ये गायबगी मिटाने जैसी है। ‘भरोसेमंद’ स्रोतों की दोहराई झूठी कहानी को सच्चाई मान लिया जाता है। जबकि ब्लैकलिस्ट वाली जगह से सच्चा सुधार भुला दिया जाता है।
तटस्थता बन जाती है प्रोपेगेंडा- विचारधारा को लेकर खुलेपन की जरूरत
जिमी वेल्स ने कहा था कि विकिपीडिया का काम ‘सारे इंसानी ज्ञान को सबके लिए पहुँचाना’ है। आज ये काम शर्तों वाला लगता है, ज्ञान तभी ठीक अगर राजनीतिक तौर पर एक तरफ से मेल खाए। ऐसे में ‘तटस्थ नजरिया’ वाला नियम अनदेखा कर दिया जाता है, क्योंकि तटस्थता अब इस पर टिकी है कि कौन से स्रोत उस लेख में आने दिए जाते हैं।
जैसा ऑपइंडिया की रिपोर्ट में कहा गया है, “अगर भरोसेमंद स्रोतों का समूह ही वैचारिक पक्षपात से भरा है, तो ‘तटस्थ नजरिया’ सिर्फ नियम है जहाँ लेफ्ट विचारधारा ही चलती है।”
एलन मस्क का ग्रोकिपीडिया लॉन्च, जो विकिपीडिया का एआई वाला विकल्प है, सही समय पर आया। वेल्स सरकारी रोक की चेतावनी देते हैं, लेकिन उनका प्लेटफॉर्म लंबे समय से मॉडरेशन के नाम पर हल्की तानाशाही का नमूना है। अगर ग्रोकिपीडिया असहमति को ब्लैकलिस्ट न कर कई विचारों को जगह देता रहे, तो विकिपीडिया की तथाकथित तटस्थता की कमजोरी खुल जाएगी।
अब विकिपीडिया के रीडर्स को उसके फाउंडरों से भरोसेमंद और गैर-भरोसेमंद सोर्स को लेकर लेक्चर पाने की जरूरत नहीं है, बल्कि जरूरत है तो उनके ये मानने की कि उनकी अंदरुनी व्यवस्था में ही सेंसरशिप जैसा जाल है। ट्रांसपेरेंसी वहीं से शुरू होगी, जिसमें एक पक्ष को रोकने को तटस्थता कहना बंद कर दिया जाए।
मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।


