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‘अखिलेशुद्दीन’ से क्या उम्मीद करें: दीपावली पर दीप ना जलाने का ज्ञान दे रहे सपा प्रमुख की लगी क्लास, क्रिसमस को बता रहे थे आदर्श; संस्कृति से रोजगार तक है दीपोत्सव का महत्व

जहाँ देशभर में दीपावली पर खुशी का माहौल है, वहीं समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख अखिलेश यादव को इससे चिढ़ हो रही है। उनकी ये चिढ़ इस बार दीपावली पर जलने वाले दीयों को लेकर है। इतना ही नहीं उनके बयान से यह भी साफ है कि ईसाइयों का त्योहार क्रिसमस उन्हें ज्यादा पसंद है लेकिन हिंदू त्योहार दीपावली पर दीया जलाना उनके लिए पैसों की बर्बादी है।

यह अखिलेश यादव ने खुद कहा है। लखनऊ में धनतेरस (18 अक्टूबर 2025) पर आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अखिलेश यादव ने कहा, “मैं प्रभु राम के नाम पर एक सुझाव देना चाहता हूँ। क्रिसमस के समय कई महीनों तक शहर जगमगा जाते हैं। उन्हीं से सीख लो बस क्यों खर्चा करना बार-बार दीयों और मोमबत्ती का। इस सरकार से हम क्या उम्मीद कर सकते हैं? इसे तो हटा देना चाहिए। हम यह सुनिश्चित करेंगे कि यहाँ और भी खूबसूरत रोशनियाँ हों…”

सोशल मीडिया पर अखिलेश के बयान का विरोध

दीपावली पर अखिलेश यादव का यह सुझाव हिंदू त्योहारों के प्रति घृणा को दर्शाता है। यहाँ तक कि सोशल मीडिया पर भी दीपावली मनाने वाले हिंदू लोगों ने अखिलेश के बयान का विरोध किया। सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने कहा कि लगता है अखिलेश यादव हिंदू भी नहीं है।

वहीं कई लोगों ने अखिलेश यादव को ‘अखिलेशुद्दीन’ नाम दे दिया और कहा कि ‘अखिलेशुद्दीन’ से क्या ही आशा की जा सकती है।?

एक्स/ट्विटर पर एक यूजर ने लिखा, “अब अखिलेश यादव को दीयों और मोमबत्तियों से दिक्कत हो गई है। आज उत्तरप्रदेश वालों को सोचना है ये ईसाई है या मुस्लिम?”

अन्य यूजर ने लिखा, “एक से बढ़कर एक नेता देखे पर इन के जैसा कोई नहीं जो खुद ही अपना स्टैंड क्लियर नहीं कर पाए। आखिर PDA के नाम पर लोगों को गुमराह कर झूठी तसल्ली दे अपना राजनीतिक करियर बनाने में माहिर नेता जी ब्राह्मणों, क्षत्रियों और सर्वणों का विरोध करते करते हिन्दुओं का अभी अपमान करने लगे। एक तरफ कुम्हार जाति के हमारे भाई बहन सालभर मेहनत कर दिवाली के उत्सव के लिए दीपक बनाते हैं तो दूसरी ओर यह महोदय क्रिसमस का उदाहरण देकर झालर लटकाने को बोलते हैं। अब सनातन धर्म के लोग क्रिसमस से सलाह लें… ?”

एक एक्स यूजर ने तर्क दिया, “उसी तरह हर साल ईद पर जानवरों की कुर्बानी क्यों दी जाती है? अगर आपने एक बार कर लिया तो क्या ये काफी नहीं है? पैसे बचाएँ और शायद एक मासूम जानवर भी। हर साल क्रिसमस पर पेड़ क्यों काटे जाते हैं?”

जाहिर है कि अखिलेश यादव के दीया जलाने पर पैसा बर्बाद करने वाले बयान से हिंदू धर्म के लोग नाखुश हैं। क्योंकि उन्हें दीपावली पर दीया जलाने का महत्व मालूम है। जो शायद सपा सुप्रीमो हिंदू होने के बावजूद नहीं जानते। तो अखिलेश यादव को जान लेना चाहिए कि दीपोत्सव का महत्व सिर्फ एक धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि आध्यात्मिक और सामाजिक स्तर पर भी जुड़ा है।

दीया जलाने का महत्व

दीपोत्सव की परंपरा सिर्फ एक धार्मिक रस्म नहीं बल्कि हमारी संस्कृति, आत्म-चेतना और सामाजिक आर्थिक जीवन से भी गहराई से जुड़ी हुई है।

बतौर प्रतीय यह दर्शाती है कि अंधकार पर प्रकाश, ज्ञान पर अज्ञान, असत्य परसत्य की विजय संभव है। धार्मिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाए तो हिंदू परंपरा में दीपक को ‘आत्मा की ज्योति’ और ‘ईश्वर के दर्शन’ का माध्यम माना गया है। दीपक का उजाला न सिर्फ बाहरी बनाए हुए अंधकार को मिटाता है बल्कि भीतरी विचारों, भाव- निराशा और नकारात्मकता के अंधेरे को भी रोशन करता है।

इसके साथ ही सामाजिक और आर्थिक स्तर पर दीया उन हजारों परिवारों की आजीविका का आधार भी बन गया है जो दीपावली जैसे त्योहारों के समय इस काम में जुटते हैं। इसका उदाहरण अयोध्या में हर साल होने वाले दीपत्सव से भी समझा जा सकता है। दीपावली के लिए स्थानीय कुम्हार परिवारों को दीये बनाने के बड़े ऑर्डर्स मिलते हैं।

दीया बनाने से रोजगार

वहीं दीपावली पर अयोध्या दीपोत्सव में हर साल बनने वाला विश्व रिकॉर्ड इस साल 2025 में भी बरकरार रहेगा। पिछले साल 26 लाख से अधिक दीयों का रिकॉर्ड अब 29 लाख दीये जलकर टूटेगा। यह केवल दीपावली पर लोगों की आस्था नहीं बल्कि इससे रोजगार के अवसर भी उत्पन्न होते हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, स्थानीय कुम्हारों का कहना है कि साल 2017 से दीपोत्सव के बाद से उनका जीवन बदल गया। जहाँ पहले कु्म्हार परिवार दीपावली पर केवल 20 हजार कमाते थे, उनकी आय अब लाखों में पहुँच गई है। देशभर में भी छोटे-छोटे गाँवों में सैंकड़ों परिवार दीया बनाने के कारण ही सहज आजीविका जुटा रहे हैं।

यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वदेशी उत्पाद पर जोर दे रहे हैं। दीपावली पर भी पीएम मोदी ने अपील की, “स्वदेशी अपनाएँ और इसे हर घर और बाजार का मंत्र बनाएँ।” पीएम मोदी की अपील से दीपावली के बाजार पर भी खासा असर देखने को मिला है। रंग-बिरंगे सजे बाजारों में दीपावली पर सारा सामान स्वदेशी है, जिसे खरीदने के लिए लोग भी उत्साहित नजर आ रहे हैं।

क्रिसमस पर पेड़ों का कटान

वहीं अखिलेश यादव के पसंदीदा त्योहार क्रिसमस पर लाखों पेड़ों को काटा जाता है, जो पर्यावरण और समाज पर कई नकारात्मक प्रभाव डालती है। हर साल क्रिसमस पर पेड़ों को सजाने का चलन है और ये पेड़ या तो असली होते हैं या फिर प्लास्टिक के। प्राकृतिक क्रिसमस ट्री उगाने के लिए बड़े पैमाने पर कैमिकल फर्टिलाइजर्स और कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है, जिससे इकोसिस्टम पर गहरा असर पड़ता है।

इसके अलावा, इन पेड़ों की कटाई से वन्यजीवों के घर नष्ट होते हैं, जिससे बायोडायवर्सिटी को नुकसान होता है। कटे हुए पेड़ जब लैंडफिल में जाते हैं तो वे कार्बड डाइऑक्साइड छोड़ते हैं, जिससे जलवायु परिवर्तन प्रभावित होता है। वहीं आर्टिफिशियल क्रिसमस ट्री भी पर्यावरण के लिए हानिकारक हैं क्योंकि ये प्लास्टिक से बने होते हैं, जो नॉन-बायोडिग्रेडेबल होते हैं और लैंडफिल में वर्षों तक बने रहते हैं।

इसके साथ ही क्रिसमस पर आर्टिफिशयल लाइटों को दीपोत्सव से तुलना करने वाले अखिलेश यादव जान लें कि ये लाइट बिजली की खपत बढ़ाते हैं वहीं दीप जलाने से बिना बिजली का उपयोग करे संसार जगमग हो जाता है।

अखिलेश यादव का दोगलापन

शायद अब अखिलेश यादव को दीपावली पर दीपोत्सव का महत्व समझ आ जाए। या शायद वे यहाँ भी आँख मींच लें। क्योंकि अखिलेश यादव साल 2024 में दीपावली पर दी गई शुभकामनाओं से तो लगता है कि उन्हें दीपोत्सव को थोड़ा बहुत ज्ञान तो जरूर है।

या फिर पिछली बार जो ट्वीट किया थो वो सिर्फ दिखावा था अखिलेश यादव? और इस बार प्रेस कॉन्फ्रेंस में मन की बात निकाल दी। दीपावली पर अखिलेश यादव ने आसानी से दीपोत्सव न करने का सुझाव दे डाला। लेकिन ये सुझाव अखिलेश यादव को ईद, क्रिसमस या किसी अन्य धर्म के त्योहारों पर याद नहीं आते है क्या?

असल में उनका टारगेट अयोध्या में विश्व रिकॉर्ड दीपोत्सव है। उन्हें चिड़ है कि अयोध्या में बड़े संख्या में दीप जलाए जा रहे हैं, जिससे देश के नहीं बल्कि विदेशों के लोग भी जुड़ रहे हैं। अखिलेश यादव ने दीपावली पर जहरीला बयान देकर साफ कर दिया है कि अगर उनकी सरकार आती है तो उनके लिए दीपोत्सव का कोई महत्व नहीं है। हिंदू त्योहार दीपावली को पश्चिमी देशों में मनाए जाने वाले क्रिसमस से तुलना करना अखिलेश यादव की एक भद्दी हिंदू-विरोधी राजनीति के अलावा कुछ और नहीं है।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ में पाकिस्तान का साथ देकर अपने पैरों पर मारी कुल्हाड़ी, तुर्की-अजरबैजान जाने वाले भारतीय पर्यटकों की संख्या में आई 56% तक की कमी

‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान पाकिस्तान का खुलकर समर्थन करने वाले तुर्की और अजरबैजान को अब भारतीय सैलानियों की नाराजगी झेलनी पड़ रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मई से अगस्त 2025 के बीच इन दोनों देशों में भारत से आने वाले पर्यटकों की संख्या में जबरदस्त गिरावट देखी गई। अजरबैजान में भारतीय सैलानियों की संख्या में 56% की गिरावट हुई, जबकि तुर्की में यह गिरावट 33.3% तक पहुँच गई।

यह बदलाव अचानक नहीं हुआ है। पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तानी आतंकियों के ठिकानों पर ऑपरेशन सिंदूर किया था। इसके बाद पाकिस्तान ने सीमावर्ती इलाकों में हमले की कोशिश की, जिसे भारत ने नाकाम कर दिया। इस दरम्यान तुर्की और अजरबैजान ने पाकिस्तान का खुल कर साथ दिया।

इन देशों के रुख ने भारतीय जनता के बीच असंतोष पैदा किया, जिसका सीधा असर इनकी पर्यटन आय पर पड़ा। भारत जैसे बड़े बाजार से आने वाले पर्यटकों की कमी ने दोनों देशों की अर्थव्यवस्था और उनकी पर्यटन रणनीति को हिला कर रख दिया है।

बयानबाजी का तुर्की और अजरबैजान पर असर

कश्मीर के पहलगाम में मई 2025 में हुए आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ गया। भारत ने जवाबी कार्रवाई के तहत ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया, जो चार दिनों तक चला। इस दौरान, तुर्की और अजरबैजान ने पाकिस्तान के समर्थन में बयान दिए और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस्लामाबाद के पक्ष में खड़े दिखाई दिए।
यहीं से भारतीय नागरिकों में नाराजगी बढ़ने लगी। सोशल मीडिया पर #BoycottTurkey और #BoycottAzerbaijan जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे। बड़ी संख्या में लोगों ने इन देशों की यात्रा रद्द करने की अपील की और पर्यटन एजेंसियों पर भी दबाव पड़ा कि वे अपनी सेवाएँ रोक दें।

जिसके बाद, भारतीय ट्रैवल प्लेटफॉर्म्स ने भी राष्ट्रीय भावना का सम्मान करते हुए इन देशों के लिए बुकिंग्स बंद करनी शुरू कर दीं। MakeMyTrip और EaseMyTrip जैसी कंपनियों ने आधिकारिक बयान जारी करते हुए कहा कि वे गैर-जरूरी यात्रा से बचने की सलाह दे रही हैं। MakeMyTrip ने तो यहाँ तक कहा कि “हम अपने देश और सशस्त्र बलों के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए अज़रबैजान और तुर्की के लिए प्रमोशनल ऑफर बंद कर रहे हैं।”

अजरबैजान पर बयान का असर

ऑपरेशन सिंदूर से पहले अजरबैजान भारतीय यात्रियों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहा था। जनवरी से अप्रैल 2025 तक भारत से अजरबैजान जाने वाले सैलानियों की संख्या में 33% की वृद्धि हुई थी। लेकिन मई आते-आते तस्वीर पूरी तरह बदल गई।

मई से अगस्त के बीच भारत से अजरबैजान जाने वाले पर्यटकों की संख्या 1 लाख से घटकर सिर्फ 44,000 रह गई। यह 56 प्रतिशत की भारी गिरावट थी, जो किसी भी देश के लिए एक बड़ा झटका मानी जाती है।

अजरबैजान पर्यटन बोर्ड के अनुसार, 2025 के पहले आठ महीनों में भारत से वहाँ आने वाले कुल यात्रियों की संख्या 1.25 लाख रही, जो पिछले साल की तुलना में 22% कम है। यह वही अजरबैजान था जिसने कुछ महीने पहले तक भारत को अपने टॉप-5 प्राथमिक पर्यटन बाजारों में शामिल किया था।

लेकिन अगस्त 2025 तक भारत की रैंक फिसलकर 11वें स्थान पर पहुँच गई। यह गिरावट केवल संख्याओं की नहीं बल्कि एक चेतावनी है कि किसी देश की विदेश नीति उसके पर्यटन पर कितना गहरा असर डाल सकती है।

तुर्की: इस्तांबुल और कप्पाडोसिया में घटती भारतीय रौनक

तुर्की लंबे समय से भारतीयों के बीच पसंदीदा पर्यटन स्थल रहा है। इस्तांबुल, कप्पाडोसिया, अंताल्या जैसे स्थान भारतीय कपल्स, फिल्म शूटरों और हनीमून ट्रैवलर्स के लिए आकर्षण का केंद्र रहे हैं। लेकिन ऑपरेशन सिंदूर के बाद तुर्की की पाकिस्तान समर्थक स्थिति ने इस छवि को गहरा नुकसान पहुँचाया।

मई से अगस्त 2025 के बीच तुर्की जाने वाले भारतीय यात्रियों की संख्या 1.36 लाख से घटकर 90,400 रह गई, यानी 33.3% की गिरावट। इस साल के पहले चार महीनों (जनवरी से अप्रैल) में यह संख्या लगभग स्थिर थी (83,300 बनाम 84,500), लेकिन मई के बाद गिरावट तेज हो गई।

जनवरी से अगस्त 2025 में भारत से तुर्की जाने वाले कुल पर्यटकों की संख्या 21% घटकर 1.74 लाख रह गई। पिछले साल यानी 2024 में इसी वक्त के दौरान तुर्की में भारतीय पर्यटकों की संख्या में 28.5% की वृद्धि दर्ज की गई थी। यानी एक साल के भीतर पूरा ट्रेंड पलट गया।

यह गिरावट तुर्की की अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर है, क्योंकि वहाँ का पर्यटन क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 12% तक योगदान देता है। भारतीय सैलानियों की कमी से न केवल होटल और एयरलाइन कंपनियाँ प्रभावित हुईं, बल्कि स्थानीय व्यापारियों और टूर ऑपरेटर्स को भी भारी नुकसान उठाना पड़ा।

आर्थिक और कूटनीतिक असर: पर्यटन से परे की कहानी

यह घटना यह दर्शाती है कि आज के समय में कूटनीति और पर्यटन एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। भारत जैसे विशाल बाजार के सैलानियों की नाराजगी का असर किसी भी देश की अर्थव्यवस्था पर सीधा पड़ सकता है।

पहला असर आर्थिक है, होटल बुकिंग्स, एयरलाइंस की टिकट सेल, ट्रैवल गाइड, टैक्सी सर्विस और स्मारिका बाजारों में गिरावट। जब लाखों पर्यटक एक साथ किसी देश की यात्रा रद्द करते हैं, तो स्थानीय रोजगार पर इसका सीधा असर होता है।

दूसरा सामाजिक और मानसिक असर है, अब भारतीय यात्रियों की सोच बदल रही है। वे किसी देश की यात्रा करने से पहले सिर्फ सुंदर जगह या सस्ता पैकेज नहीं देखते, बल्कि यह भी ध्यान रखते हैं कि उस देश का भारत के प्रति रवैया कैसा है। सोशल मीडिया पर ऐसे ट्रेंड बनना अब सामान्य बात हो गई है, जो ट्रैवल ट्रेंड्स को प्रभावित करते हैं।

तीसरा असर कूटनीतिक है, तुर्की और अजरबैजान जैसे देशों को यह समझना होगा कि भारत का जनसमर्थन अब किसी भी राजनीतिक रुख से प्रभावित हो सकता है। यदि कोई देश पाकिस्तान जैसे भारत-विरोधी देश का खुलकर साथ देता है, तो उसकी आर्थिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद की यह पूरी कहानी इस बात की मिसाल है कि आज की वैश्विक दुनिया में राष्ट्रीय भावना एक आर्थिक शक्ति के रूप में उभर चुकी है। अजरबैजान में 56% और तुर्की में 33% की गिरावट केवल संख्याएँ नहीं, बल्कि यह दिखाती हैं कि भारतीय यात्रियों की सोच अब पहले से कहीं अधिक संवेदनशील और जागरूक हो चुकी है। भारत जैसे बड़े टूरिस्ट मार्केट को खोना किसी भी देश के लिए बड़ा झटका है।

न आतिशबाजी होगी, न होंगे कोई स्टेज शो: ब्रिटेन के लीसेस्टर में ‘पब्लिक सेफ्टी’ के नाम पर लगा दीवाली पर बैन, हिंदू बोले- अब हमारे पर्व भी खतरे में

भारत के बाहर दुनिया के सबसे बड़े दिवाली उत्सव में एक ब्रिटेन के लीसेस्टर में होने वाले उत्सव पर रोक लगा दिया गया है। दिवाली पर यहाँ आतिशबाजी और सांस्कृतिक कार्यक्रमों इस साल नहीं हो रहा है। सिटी काउंसिल की इस घोषणा को हिन्दू समुदाय ने पक्षपातपूर्ण करार दिया है।

हर साल यहाँ बड़े पैमाने पर पारंपरिक उत्सव आयोजित होते थे। आतिशबाजी और स्टेज शो जैसे कार्यक्रम होते थे। इस साल बेलग्रेव रोड पर यातायात बंद रहेगा। हालाँकि लैंपपोस्ट पर सजावट किए जाएँगे। इसके पीछे पब्लिक सेफ्टी का हवाला दिया गया है।

आवाजाही बंद, लेकिन ‘गोल्डन माइल’की होगी सजावट

लीसेस्टर सिटी काउंसिल के मुताबिक, हर साल की तरह इस साल भी बेलग्रेव रोड पर मशहूर ‘गोल्डन माइल’ लाइटों से जगमगाएगा और 20 अक्टूबर 2025 को सड़कों पर ट्रैफिक भी बंद रहेगा। लेकिन इस बार आतिशबाजी नहीं होगी, ना ही मंच पर कोई कार्यक्रम होगा। पिछले सालों की तरह दीवाली का मेला भी नहीं लगेगा।

यह कदम शहर के सुरक्षा सलाहकार समूह (SAG) के निर्देश के बाद उठाया गया है, जिसमें काउंसिल, पुलिस और आपातकालीन सेवाओं के प्रतिनिधि शामिल थे। SAG ने कहा कि पिछले साल दीपावली पर करीब 50 हजार लोग इकट्ठा हुए थे, जो कि सुरक्षा के लिए चिंता का विषय है।

भारतीय मूल की लीसेस्टर सांसद शिवानी राजा ने इस फैसले की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि दीपावली का जश्न खतरे में है। शिवानी राजा ने एक्स पर पोस्ट में लिखा, “हमारी दीवाली का जश्न अब भी खतरे में, हमारे जश्न पर संकट मंडरा रहा है।”

पिछली दीवाली में परोसा गया नॉन वेज- शराब

यह पहली बार नहीं है जब ब्रिटेन में दीवाली के जश्न पर विवाद खड़ा हुआ है। पिछले साल 2024 में भी पीएम कीर स्टार्मर की सरकार के दौरान 10 डाउनिंग स्ट्रीट पर दीवाली रिसेप्शन कार्यक्रम में मीट और शराब परोसी गई थी।

उस वक्त भी हिंदू, सिख और जैन समाज के लोगों ने इसका विरोध किया था और इसे धार्मिक भावनाओं के खिलाफ बताया था। लीसेस्टर सांसद शिवानी राजा ने तब भी स्टार्मर को पत्र लिखकर कहा था कि खाने का मेन्यू धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार नहीं था। उन्होंने आगे से गाइडेंस देने की पेशकश भी की थी।

लीसेस्टर में हिंदू-विरोधी माहौल खड़ा करने की हुई कोशिश

ब्रिटेन के लीसेस्टर में 18 प्रतिशत हिंदू समाज के लोग रहते हैं। यही कारण है कि लीसेस्टर की दीवाली दुनियाभर में मशहूर है। इसके अलावा बाकी हिंदू त्योहार भी धूमधाम से मनाए जाते हैं। हालाँकि, शहर में कई बार हिंदू-विरोधी माहौल खड़ा करने की कोशिश की गई है।

गणेश चतुर्थी की शोभायात्रा में भगवा झंडे लगाने को लेकर विवाद शुरू हुआ था। जब मुस्लिम काउंसिल ऑफ ब्रिटेन (MCB) ने इसे ‘हिंदू कट्टरवाद’ बताकर कार्रवाई की माँग की थी।

वहीं साल 2022 में भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच के बाद हिंसा के जख्म अब तक नहीं भरे हैं। सोशल मीडिया पर हिंदुओं के खिलाफ झूठी अफवाहें फैलाई गई थीं। इन अफवाहों के बाद हिंदू घरों और मंदिरों पर हमले हुए, भगवा झंडो का अपमान किया गया और सरेआम लोगों पर चाकू से वार किए गए थे।

कुछ समय बाद नवंबर 2022 में आई घटना की जाँच रिपोर्ट में साफ हो गया था कि हिंसा ‘हिंदुत्व कट्टरवाद’ से नहीं, बल्कि इस्लामी दुष्प्रचार से भड़की थी।

नेक्सपेरिया पर चीन के एक्सपोर्ट बैन के बाद यूरोप में हड़कंप, मंडराया चिप का संकट: जानिए कैसे ट्रंप की सख्ती ने EU का ऑटो उद्योग ठप होने की कगार पर पहुँचा

यूरोपीय ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ACEA) ने गुरुवार  (16 अक्टूबर 2025) को एक बयान जारी कर कहा कि यूरोप की कार कंपनियों के लिए जरूरी चिप्स की सप्लाई में भारी रुकावट आ सकती है, जिससे वाहन उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। यह संकट डच चिप निर्माता कंपनी नेक्सपीरिया से जुड़ा है, जो अब यूरोपीय कंपनियों को सप्लाई की गारंटी नहीं दे पा रही है।

इस संकट की शुरुआत तब हुई जब डच सरकार ने चीन की स्वामित्व वाली नेक्सपीरिया कंपनी को सीज कर दिया। यह कदम अमेरिका के दबाव में लिया गया, जिसने नेक्सपीरिया के चीन से जुड़े होने पर प्रतिबंधों की धमकी दी थी। इसके जवाब में चीन ने नेक्सपीरिया पर एक एक्सपोर्ट बैन (निर्यात प्रतिबंध) लगा दिया।

इस फैसले का असर अब यूरोप की ऑटो इंडस्ट्री पर पड़ रहा है क्योंकि कारों में इस्तेमाल होने वाली जरूरी चिप्स की सप्लाई बंद होने का खतरा है। नेक्सपीरिया ने कहा है कि वह अब यूरोपीय कार कंपनियों को सप्लाई की गारंटी नहीं दे सकती। ACEA ने इस स्थिति पर गहरी चिंता जताई है और कहा है कि अगर यह समस्या तुरंत नहीं सुलझी, तो यूरोप में वाहनों का उत्पादन रुक सकता है।

यह पूरा मामला वैश्विक स्तर पर बढ़ते राजनीतिक और व्यापारिक दबावों का नतीजा है, जिसकी जड़ें अमेरिका से जुड़ी हैं। विशेष रूप से डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति काल में अमेरिका ने वैश्विक व्यापार पर दबाव काफी बढ़ा दिया था। अब उसी दबाव के चलते यूरोप की ऑटो इंडस्ट्री भी संकट में आ गई है।

नेक्सपीरिया और इसका सामरिक महत्व

नेक्सपीरिया एक डच चिप निर्माता कंपनी है, जिसका मुख्यालय नीदरलैंड्स के निजमेगेन शहर में है। यह कंपनी बड़ी मात्रा में सेमीकंडक्टर बनाती है, जो दुनियाभर की कारों, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और औद्योगिक मशीनों में इस्तेमाल होते हैं।

ये चिप्स बहुत हाई-टेक नहीं होतीं, जैसे GPU या AI चिप्स लेकिन ये गाड़ियों के इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल यूनिट्स (ECUs) और अन्य जरूरी हिस्सों को चलाने के लिए अनिवार्य होती हैं। नेक्सपीरिया दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक है जो डायोड्स, ट्रांजिस्टर और MOSFETs जैसे बेसिक चिप्स बनाती है, जो हर इलेक्ट्रॉनिक और बिजली से चलने वाले उपकरण में बड़ी मात्रा में लगते हैं।

कंपनी की शुरुआत 2017 में NXP से अलग होकर हुई थी और 2019 में चीन की विंगटेक टेक्नोलॉजी ने इसे करीब 3.6 अरब डॉलर में खरीद लिया। इस खरीद के बाद कंपनी का मालिकाना ढांचा दो हिस्सों में बँट गया। शंघाई में सूचीबद्ध कंपनी विंगटेक के पास इसके नियंत्रण है। वहीं, नेक्सपीरिया ने वैश्विक उपस्थिति के साथ अपनी परिचालन स्वतंत्रता बनाए रखी है।

हालांकि, नेक्सपीरिया ने अब भी अपनी वैश्विक पहचान और संचालन में स्वतंत्रता बनाए रखी है और इसकी मौजूदगी यूरोप, अमेरिका और एशिया के कई देशों में है। कंपनी के पास 14,000 से ज्यादा कर्मचारी हैं और इसका कारोबार अरबों डॉलर का है।

नेक्सपीरिया का उत्पादन मॉडल ऐसा है कि इसका डिजाइन और शुरुआती निर्माण यानि वेफर निर्माण यूरोप जर्मनी और ब्रिटेन में होता है और फिर अंतिम असेंबली और टेस्टिंग एशिया (चीन, मलेशिया, फिलीपींस) में की जाती है।

इसे समझने के लिए भारत की टाटा ग्रुप के सेमीकंडक्टर प्रोजेक्ट का उदाहरण लिया जा सकता है, जिसमें गुजरात में चिप्स का निर्माण होगा और असम में पैकेजिंग और टेस्टिंग। नेक्सपीरिया का यह हाइब्रिड मॉडल लागत में कमी और उत्पादन में तेजी लाने में मदद करता है, लेकिन यह सीमा पार निर्भरता के कारण बहुत संवेदनशील भी हो गया है।

हाल ही में कंपनी भारी राजनीतिक संकट में फंस गई है। डच सरकार ने अमेरिका के दबाव में आकर नेक्सपीरिया को जब्त कर लिया, क्योंकि इसकी मालिक कंपनी विंगटेक का चीन से गहरा संबंध है।

अमेरिका को डर है कि चीन तकनीकी कंपनियों के जरिए महत्वपूर्ण तकनीक पर नियंत्रण पा रहा है। इस कदम के जवाब में चीन ने नेक्सपीरिया पर निर्यात प्रतिबंध लगा दिया है, जिससे कंपनी अब यूरोपीय कार निर्माताओं को चिप्स की सप्लाई की गारंटी नहीं दे पा रही है।

यह संकट यूरोपीय ऑटोमोबाइल उद्योग के लिए बहुत बड़ा खतरा है, क्योंकि ये चिप्स उनके लिए जरूरी हैं। पहले ही COVID-19 और अन्य वैश्विक तनावों के दौरान चिप्स की भारी कमी हो चुकी है, जिससे उत्पादन रुक गया था।

अब अगर नेक्सपीरिया की सप्लाई बंद हो गई, तो यूरोप की गाड़ियों की उत्पादन लाइनें फिर से बुरी तरह प्रभावित होंगी। दूसरी कंपनियों से चिप्स लेने में कई महीने लग सकते हैं, क्योंकि हर नए पार्ट को पहले टेस्ट और अप्रूव समरूपीकरण करना पड़ता है।

नतीजा यह है कि नेक्सपीरिया, जो अब तक यूरोपीय तकनीक और चीनी उत्पादन क्षमता का बेहतरीन मेल थी, अब अमेरिका-चीन टेक युद्ध का शिकार बन गई है। इससे न केवल एक कंपनी, बल्कि पूरे यूरोपीय वाहन उद्योग के भविष्य पर संकट मंडरा रहा है।

अमेरिकी दबाव के कारण डच सरकार का अधिग्रहण हुआ

यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब अमेरिका ने दुनिया भर में तकनीकी सप्लाई चेन पर चीन के प्रभाव को लेकर चिंता जताई। ट्रंप प्रशासन के दौरान अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि नेक्सपीरिया पर चीन का स्वामित्व एक राष्ट्रीय सुरक्षा खतरा है।

उनका मानना था कि चीन इस कंपनी के जरिए यूरोप और अमेरिका में हो रहे रिसर्च और टेक्नोलॉजी तक पहुँच सकता है। इसी वजह से अमेरिका को आशंका थी कि संकट की स्थिति में चीन इस सप्लाई का दुरुपयोग कर सकता है।

वॉशिंगटन ने जून 2025 में डच सरकार को चेतावनी दी कि अगर कंपनी में बदलाव नहीं किए गए, खासकर इसके चीनी CEO Zhang Xuezheng को लेकर, तो नेक्सपीरिया को अमेरिकी एंटिटी लिस्ट (ब्लैकलिस्ट) में डाला जा सकता है। इस लिस्ट में आने का मतलब है कि कंपनी को अमेरिकी तकनीक और उपकरणों की सप्लाई पर रोक लग जाएगी।

अमेरिका ने सितंबर 2025 में एक नया नियम जारी किया, जिसके अनुसार अगर कोई कंपनी 50% या उससे ज्यादा हिस्सेदारी किसी पहले से ब्लैकलिस्टेड कंपनी के पास है, तो वह भी अपने आप इस लिस्ट में आ जाएगी। ये नियम सीधे विंगटेक (नेक्सपीरिया की चीनी पैरेंट कंपनी) पर लागू हुआ, जिससे नेक्सपीरिया पर भी अमेरिकी निर्यात प्रतिबंध लगने लगे।

इस राजनीतिक दबाव के अलावा, नेक्सपीरिया में अंदरूनी प्रबंधन को लेकर भी कई गंभीर आरोप लगे। कंपनी पर 200 मिलियन के अनावश्यक वेफर ऑर्डर जबरन करने, विरोध करने वाले अधिकारियों को निकालने और CEO Zhang की अन्य कंपनियों के साथ हितों के टकराव जैसे आरोप लगे।

डच सरकार ने 30 सितंबर 2025 को 1952 के ‘Goods Availability Act’ (जो कि शीत युद्ध के समय का आपातकालीन कानून है) का इस्तेमाल करते हुए नेक्सपीरिया का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया। सरकार ने कहा कि उन्हें डर है कि कंपनी की तकनीक चीन को ट्रांसफर की जा सकती है, जिससे यूरोप में सेमीकंडक्टर की कमी और ऑटो इंडस्ट्री की सुरक्षा पर खतरा पैदा हो सकता है।

इस फैसले के तहत, कंपनी को अस्थायी बाहरी प्रबंधन के तहत रखा गया और CEO Zhang को उनके सभी पदों से हटा दिया गया। एक डच अदालत ने पहले ही Zhang को कंपनी के कार्यकारी निदेशक पद से सस्पेंड कर दिया था और उनकी जगह डच बिजनेसमैन Guido Dierick को निर्णायक अधिकारों के साथ नियुक्त किया गया। साथ ही, नेक्सपीरिया के अधिकतर शेयरों का नियंत्रण एक डच वकील को सौंप दिया गया, ताकि कंपनी का संचालन स्थानीय कानूनों के तहत पारदर्शी तरीके से हो।

इस कार्रवाई में कंपनी का पूरी तरह राष्ट्रीयकरण नहीं किया गया, बल्कि एक साल तक के लिए सीमित नियंत्रण लगाया गया है। इस दौरान नेक्सपीरिया कोई बड़ा बिजनेस फैसला, संसाधनों का ट्रांसफर या कर्मचारियों में बड़ा बदलाव नहीं कर सकती, जिससे कि प्रोडक्शन चलता रहे और टेक्नोलॉजी चीन न जाए।

इस कदम की  विंगटेक ने कड़ी आलोचना की और इसे भूराजनीतिक पक्षपात से प्रेरित बताया। कंपनी ने कहा कि नेक्सपीरिया ने सभी स्थानीय नियमों का पालन किया है और यूरोप में भारी संख्या में लोगों को रोजगार दिया है। उन्होंने शंघाई स्टॉक एक्सचेंज में एक फाइलिंग के जरिए बताया कि इस डच फैसले के कारण उनके नियंत्रण और निर्णय लेने की क्षमता पर अस्थायी असर पड़ा है।

इससे पहले भी 2022 में अमेरिका के दबाव में ब्रिटेन सरकार ने नेक्सपीरिया को अपनी न्यूपोर्ट वाली चिप फैक्ट्री बेचने के लिए मजबूर किया था, जिसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया गया था। अब वही स्थिति डच इकाई में दोहराई जा रही है।

चीन का जवाबी निर्यात प्रतिबंध और यूरोप पर इसका प्रभाव

यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब अमेरिका ने दुनिया भर में तकनीकी सप्लाई चेन पर चीन के प्रभाव को लेकर चिंता जताई। ट्रंप प्रशासन के दौरान अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि नेक्सपीरिया पर चीन का स्वामित्व एक राष्ट्रीय सुरक्षा खतरा है।

उनका मानना था कि चीन इस कंपनी के जरिए यूरोप और अमेरिका में हो रहे रिसर्च और टेक्नोलॉजी तक पहुँच सकता है। इसी वजह से अमेरिका को आशंका थी कि संकट की स्थिति में चीन इस सप्लाई का दुरुपयोग कर सकता है।

वॉशिंगटन ने जून 2025 में डच सरकार को चेतावनी दी कि अगर कंपनी में बदलाव नहीं किए गए, खासकर इसके चीनी CEO Zhang Xuezheng को लेकर, तो नेक्सपीरिया को अमेरिकी एंटिटी लिस्ट (ब्लैकलिस्ट) में डाला जा सकता है। इस लिस्ट में आने का मतलब है कि कंपनी को अमेरिकी तकनीक और उपकरणों की सप्लाई पर रोक लग जाएगी।

अमेरिका ने सितंबर 2025 में एक नया नियम जारी किया, जिसके अनुसार अगर कोई कंपनी 50% या उससे ज्यादा हिस्सेदारी किसी पहले से ब्लैकलिस्टेड कंपनी के पास है, तो वह भी अपने आप इस लिस्ट में आ जाएगी। ये नियम सीधे विंगटेक (नेक्सपीरिया की चीनी पैरेंट कंपनी) पर लागू हुआ, जिससे नेक्सपीरिया पर भी अमेरिकी निर्यात प्रतिबंध लगने लगे।

इस राजनीतिक दबाव के अलावा, नेक्सपीरिया में अंदरूनी प्रबंधन को लेकर भी कई गंभीर आरोप लगे। कंपनी पर 200 मिलियन के अनावश्यक वेफर ऑर्डर जबरन करने, विरोध करने वाले अधिकारियों को निकालने और CEO Zhang की अन्य कंपनियों के साथ हितों के टकराव जैसे आरोप लगे।

डच सरकार ने 30 सितंबर 2025 को 1952 के ‘Goods Availability Act’ (जो कि शीत युद्ध के समय का आपातकालीन कानून है) का इस्तेमाल करते हुए नेक्सपीरिया का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया। सरकार ने कहा कि उन्हें डर है कि कंपनी की तकनीक चीन को ट्रांसफर की जा सकती है, जिससे यूरोप में सेमीकंडक्टर की कमी और ऑटो इंडस्ट्री की सुरक्षा पर खतरा पैदा हो सकता है।

इस फैसले के तहत, कंपनी को अस्थायी बाहरी प्रबंधन के तहत रखा गया और CEO Zhang को उनके सभी पदों से हटा दिया गया। एक डच अदालत ने पहले ही Zhang को कंपनी के कार्यकारी निदेशक पद से सस्पेंड कर दिया था और उनकी जगह डच बिजनेसमैन गुइडो डिएरिक को निर्णायक अधिकारों के साथ नियुक्त किया गया। साथ ही, नेक्सपीरिया के अधिकतर शेयरों का नियंत्रण एक डच वकील को सौंप दिया गया, ताकि कंपनी का संचालन स्थानीय कानूनों के तहत पारदर्शी तरीके से हो।

इस कार्रवाई में कंपनी का पूरी तरह राष्ट्रीयकरण नहीं किया गया, बल्कि एक साल तक के लिए सीमित नियंत्रण लगाया गया है। इस दौरान नेक्सपीरिया कोई बड़ा बिजनेस फैसला, संसाधनों का ट्रांसफर या कर्मचारियों में बड़ा बदलाव नहीं कर सकती, जिससे कि प्रोडक्शन चलता रहे और टेक्नोलॉजी चीन न जाए।

इस कदम की  विंगटेक ने कड़ी आलोचना की और इसे भूराजनीतिक पक्षपात से प्रेरित बताया। कंपनी ने कहा कि नेक्सपीरिया ने सभी स्थानीय नियमों का पालन किया है और यूरोप में भारी संख्या में लोगों को रोजगार दिया है। उन्होंने शंघाई स्टॉक एक्सचेंज में एक फाइलिंग के जरिए बताया कि इस डच फैसले के कारण उनके नियंत्रण और निर्णय लेने की क्षमता पर अस्थायी असर पड़ा है।

इससे पहले भी 2022 में अमेरिका के दबाव में ब्रिटेन सरकार ने नेक्सपीरिया को अपनी न्यूपोर्ट वाली चिप फैक्ट्री बेचने के लिए मजबूर किया था, जिसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया गया था। अब वही स्थिति डच इकाई में दोहराई जा रही है।

ACEA का संकट संकेत

नेक्सपीरिया ने 10 अक्टूबर 2025 को यूरोप की वाहन कंपनियों और उनके सप्लायर्स को सूचित किया कि चीन द्वारा लगाए गए एक्सपोर्ट बैन के कारण अब वह चिप्स की सप्लाई की कोई गारंटी नहीं दे सकती।

कंपनी ने कहा कि उनके पास मौजूद स्टॉक केवल कुछ ही हफ्तों तक चलेगा, इसके बाद सप्लाई पूरी तरह रुक सकती है। नेक्सपीरिया ने बताया कि हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि वे अब ऑटोमोटिव सप्लाई चेन को चिप्स देना जारी नहीं रख सकते।

इस सूचना के बाद, 16 अक्टूबर 2025 को यूरोपीय ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ACEA) ने एक आपात चेतावनी (distress note) जारी की। ACEA ने कहा कि नेक्सपीरिया की चिप्स के बिना ऑटो कंपनियों के सप्लायर्स जरूरी पार्ट्स और कंपोनेंट्स नहीं बना सकते, जिससे पूरे वाहन उत्पादन पर खतरा मंडरा रहा है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही बाजार में ऐसे ही चिप्स दूसरे सप्लायर्स से भी मिलते हैं, लेकिन नई कंपनियों को अप्रूव करने और उत्पादन बढ़ाने में कई महीने लग सकते हैं। इस बीच नेक्सपीरिया की चिप्स का स्टॉक खत्म हो जाएगा।

ACEA की डायरेक्टर जनरल सिग्रिड डी व्रीस ने चिंता जताते हुए कहा, “हम अचानक बहुत गंभीर स्थिति में आ गए हैं। अब हमें जल्द और व्यावहारिक समाधान चाहिए, वो भी उन सभी देशों से जो इसमें शामिल हैं।”

यूरोप की बड़ी कार कंपनियों ने भी स्थिति को लेकर सतर्कता दिखाई है। BMW ने कहा कि उसके सप्लायर नेटवर्क पर असर पड़ा है, लेकिन अभी उत्पादन रुका नहीं है। Volkswagen ने भी नेक्सपीरिया की चिप्स पर अपनी निर्भरता मानी और कहा कि वे स्थिति पर नजर रख रहे हैं।

Mercedes-Benz और Stellantis संभावित असर का आकलन कर रहे हैं और समाधान की दिशा में काम कर रहे हैं, हालांकि हर कंपनी की स्थिति अलग-अलग है। Bosch जैसी बड़ी सप्लायर कंपनियाँ, जो नेक्सपीरिया की चिप्स इस्तेमाल करती हैं, अलर्ट मोड पर हैं।

इस संकट की गंभीरता को समझते हुए नीदरलैंड्स की सरकार ने अब संवाद का रास्ता अपनाने की बात कही है। आर्थिक मामलों के मंत्री विंसेंट कर्रेमन्स ने कहा कि वह चीन के साथ इस एक्सपोर्ट बैन पर समाधान निकालना चाहते हैं और उन्हें उम्मीद है कि बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ेगी।

यह संकट अब सिर्फ यूरोप तक सीमित नहीं है। अमेरिका में भी ऑटो इंडस्ट्री पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। ऑटोमोटिव नवाचार के लिए गठबंधन, जो अमेरिकी ऑटो कंपनियों का प्रतिनिधित्व करता है, उसने आगामी सप्लाई संकट की चेतावनी दी है। यह दिखाता है कि आज की दुनिया में सप्लाई चेन कितनी आपस में जुड़ी हुई है, एक देश की नीति का असर पूरी दुनिया की फैक्ट्रियों पर पड़ सकता है।

ट्रम्प के आदेश यूरोप में व्यवधान पैदा कर रहे हैं

हालांकि नेक्सपीरिया चिप संकट सीधे तौर पर डच और चीनी सरकारों की कार्रवाइयों से शुरू हुआ, लेकिन इसके पीछे की मुख्य वजह हैं अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की आक्रामक व्यापार और विदेश नीतियाँ। ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका और चीन के बीच चल रही टेक्नोलॉजी जंग और तेज हो गई है।

उनका प्रशासन चीन से डिकपलिंग (तकनीकी रूप से अलगाव) को प्राथमिकता दे रहा है। इसके तहत ट्रम्प सरकार ने चीन की कंपनियों को एन्टिटी लिस्ट में डालना शुरू किया और यूरोप और एशिया के सहयोगी देशों पर दबाव डाला कि वो सभी चीन से जुड़ी कंपनियों पर सख्त कदम उठाएँ।

अमेरिका ने दिसंबर 2024 में विंगटेक (नेक्सपीरिया की चीनी मूल कंपनी) को सुरक्षा कारणों से ब्लैकलिस्ट कर दिया। फिर सितंबर 2025 में नेक्सपीरिया को भी इसी लिस्ट में डाल दिया गया। अमेरिका ने नेक्सपीरिया के CEO Zhang Xuezheng को हटाने की माँग की, जिसे डच सरकार ने मान लिया और नेक्सपीरिया पर नियंत्रण ले लिया।

इस अमेरिकी दबाव ने यूरोप को बहुत मुश्किल स्थिति में डाल दिया है। यूरोपीय देशों को अब अमेरिका के साथ अपने रणनीतिक रिश्ते और चीन के साथ आर्थिक संबंधों के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है।

डच सरकार ने नेक्सपीरिया पर नियंत्रण लेने का जो फैसला किया, वह भले ही देश के अंदर गवर्नेंस समस्याओं के आधार पर लिया गया हो, लेकिन यह फैसला अमेरिकी धमकियों और दबाव से ही तेजी से लागू हुआ।

इसके जवाब में चीन ने नेक्सपीरिया की चिप्स के एक्सपोर्ट पर बैन लगा दिया, जिससे यूरोप में चिप्स की भारी कमी हो गई। इसका सबसे बड़ा नुकसान यूरोप की ऑटो इंडस्ट्री को हो रहा है, जो पहले से ही टैरिफ, माँग में कमी और चीन की इलेक्ट्रिक कार कंपनियों से हो रही कड़ी प्रतिस्पर्धा से जूझ रही है। नेक्सपीरिया की चिप्स न मिलने से उत्पादन रुकने की नौबत आ गई है।

यह सिर्फ एक उदाहरण है कि कैसे ट्रम्प की एकतरफा नीतियाँ पूरी दुनिया के लिए व्यापारिक अस्थिरता  पैदा कर रही हैं। अमेरिका की चीन और रूस विरोधी नीतियों का सीधा खामियाजा उसके सहयोगी देशों, खासकर यूरोप को भुगतना पड़ रहा है। उदाहरण के लिए, ट्रम्प ने रूसी तेल और गैस की खरीद पर भी प्रतिबंध लगाने का दबाव डाला है, जिससे ऊर्जा के लिए रूस पर निर्भर यूरोप को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में राजू दास ने लिखी है, जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)


केवल मंदिर में आरती नहीं, गाइडेड मेडिटेशन और मंत्रों की रील्स बनीं भक्ति का नया स्वरूप: कैसे भारत के Gen Z आध्यात्म को बना रहे आधुनिक जीवनशैली का हिस्सा?

भारत एक ऐसा देश है जिसकी आत्मा आध्यात्म में बसती है। यह परंपरा, दर्शन और भावनात्मक जुड़ाव से भरी हुई एक सांस्कृतिक विरासत है। लेकिन बदलते दौर में जहाँ तकनीक, ग्लोबल सोच और मानसिक दबावों का बोलबाला है, वहाँ एक नई पीढ़ी जनरेशन Z (1997 से 2012 के बीच जन्मी) आध्यात्म को नए अंदाज में अपना रही है।

इस पीढ़ी के लिए आध्यात्म अब सिर्फ पूजा-पाठ या कर्मकांडों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानसिक शांति, आत्म-खोज और व्यक्तिगत जुड़ाव का माध्यम बन चुका है। यह बदलाव नकारात्मक नहीं, बल्कि बेहद सकारात्मक और सशक्तिकरण से भरा हुआ है।

सोच में बदलाव: परंपरा से सवाल तक और जवाब अपने अंदाज में

जनरेशन Z वह पीढ़ी है जो इंटरनेट और सूचना की दुनिया में पली-बढ़ी है। पहले जहाँ धर्म को बिना सवाल किए स्वीकार किया जाता था, अब यह पीढ़ी पूछती है “क्यों?, क्या ये मेरे लिए प्रासंगिक है?” यह पीढ़ी आध्यात्म को एक निजी अनुभव मानती है, न कि सामाजिक या पारिवारिक जिम्मेदारी।

वे शास्त्रों को पढ़ते हैं, पर सरल भाषा में। वे भक्ति संगीत सुनते हैं, पर लो-फाई बीट्स के साथ। वे प्रार्थना करते हैं, पर उसकी परिभाषा बदल गई है, अब यह अभिव्यक्ति भी हो सकती है, प्रतिज्ञा भी।

उदाहरण के तौर पर, बनारस का 24 साल का देवेश सिंह, जो खुद को धार्मिक नहीं मानता, वो बताता है कि उसने मंदिर जाना तब शुरू किया जब वह मानसिक स्वास्थ्य के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा था। आज भी वो नौकरी की तलाश में हैं पर आध्यात्म ने उसे आत्म-संवाद और शांति दी है।

आँकड़े कहते हैं: आध्यात्मिकता बढ़ रही है, धार्मिकता नहीं घट रही

भारत में जहाँ बाकी देशों की तुलना में धर्म से जुड़ाव कम हो रहा है, वहीं एक खास बात सामने आई है, भारत की युवा पीढ़ी आध्यात्म से जुड़ रही है, पर अपने ढंग और समझ से। एक YouGov-Mint सर्वे के अनुसार, 53% भारतीय Gen Z मानते हैं कि धर्म महत्वपूर्ण है और 62% नियमित रूप से प्रार्थना करते हैं।

लेकिन यह प्रार्थना अब केवल मंदिर में आरती या हवन नहीं है, बल्कि कई बार यह Spotify पर 10 मिनट का गाइडेड मेडिटेशन होता है या इंस्टाग्राम पर मंत्रों की रील्स सुनना होता है।

यह ट्रेंड सिर्फ शहरी भारत में नहीं है। छोटे शहरों और गाँवों में भी यह बदलाव दिख रहा है। WhatsApp भक्ति ग्रुप्स, यूट्यूब प्रवचन और मेलों में युवाओं की भागीदारी ये सब बताते हैं कि यह बदलाव गहराई से हो रहा है, न कि सिर्फ सतही तौर पर।

आध्यात्म: अब मानसिक स्वास्थ्य का भी सहारा

मानसिक स्वास्थ्य आज की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। युवा पीढ़ी अकेलेपन, प्रतिस्पर्धा, करियर की अनिश्चितता और सामाजिक दबावों से जूझ रही है। इस संदर्भ में आध्यात्म सिर्फ एक विश्वास प्रणाली नहीं, बल्कि एक थेरेपी बन कर उभरी है।

काउंसलिंग साइकोलॉजिस्ट मानवी खुराना बताती हैं कि उनके Gen Z क्लाइंट्स कई बार ध्यान, मंत्र-जप, चंद्रमा पर जर्नलिंग, या टेरोट कार्ड जैसे अभ्यास करते हैं। ये सब उन्हें मानसिक स्पष्टता और आत्मबल देने में सहायक हैं।

डिजिटल आध्यात्म: इंस्टाग्राम, यूट्यूब और ऐप्स बनें नए ‘मंदिर’

Gen Z की भाषा डिजिटल है और आध्यात्म भी उसी भाषा में ढल गया है। अब युवा पूरे वेद नहीं पढ़ते, लेकिन ‘Gita wisdom in 60 seconds’ जैसी रील्स देखते हैं। वे साधु-संतों के प्रवचन यूट्यूब पर सुनते हैं, Instagram Live पर सवाल पूछते हैं और मोबाइल ऐप्स से अपनी कुंडली देखते हैं।

2023 की OMTV रिपोर्ट के अनुसार, 80% भारतीय युवा (18–30 साल) नियमित रूप से आध्यात्मिक कंटेंट ऑनलाइन देखते हैं। ये कंटेंट छोटे, सरल और भावनात्मक रूप से जुड़ने वाले होते हैं, जो आज की तेज रफ्तार जिंदगी में फिट बैठते हैं।

आध्यात्मिक यात्राएँ: अब सेल्फ-डिस्कवरी का माध्यम

कभी तीर्थयात्राएँ बुज़ुर्गों का काम मानी जाती थीं, पर अब केदारनाथ, ऋषिकेश, वाराणसी, ईशा फाउंडेशन जैसे स्थानों पर युवाओं की भीड़ बढ़ रही है। 2024 में केदारनाथ यात्रा में 30% से ज्यादा यात्री 30 साल से कम उम्र के थे। ये लोग अकेले यात्रा करते हैं, अपने अनुभव शेयर करते हैं और उस यात्रा को अपनी आत्मिक खोज का हिस्सा मानते हैं।

कई सारे ट्रैवल इन्फ्लुएंसर बताते हैं कि वे धार्मिक वजहों से नहीं बल्कि आत्म-शांति और अनुभव के लिए जाती हैं। जो इस नए आध्यात्मिक ट्रेंड से प्रेरित हो रहे हैं।

नई भाषा, नई रस्में: आध्यात्म का Gen Z के अनुसार अनुवाद

Gen Z के लिए स्नान अब ऊर्जा शुद्धिकरण (energy cleansing) है, प्रार्थना अब manifestation और ध्यान अब mindfulness बन चुका है। वे क्रिस्टल चार्ज करते हैं, चक्र बैलेंसिंग म्यूजिक सुनते हैं और मंदिर में घंटों बैठने के बजाय 10 मिनट का निर्देशित ध्यान (guided meditation) करते हैं।

हमारी पीढ़ी के लोग आध्यात्म को एक जीवनशैली की तरह अपनाते हैं, टैटू में ओम बनवाना, ध्यान के लिए जगह बनाना या vision boards में धार्मिक प्रतीक जोड़ना, ये सब दर्शाते हैं कि परंपरा और आधुनिकता एक साथ चल सकती है।

भारत सरकार, विशेषकर प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में धार्मिक स्थलों को पुनः विकसित करने में सक्रिय है। राम मंदिर, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, महाकाल लोक जैसे प्रोजेक्ट्स आध्यात्म को संरचनात्मक रूप से मज़बूत कर रहे हैं। सरकारों द्वारा आयोजित ‘स्पिरिचुअल सर्किट टूरिज्म’ ने आध्यात्मिकता को एक युवा अनुकूल अनुभव बना दिया है।

उद्यमिता और आध्यात्म: एक नया मेल के साथ LGBTQIA+ के लिए नई राह

Gen Z केवल आध्यात्म को जी नहीं रही, बल्कि उसे व्यवसाय में भी बदल रही है। चाहे वह Daily Dharma कार्ड्स हों, ध्यान आधारित जर्नल्स, या धार्मिक प्रतीकों की मॉडर्न मर्चेंडाइज, ये सब आध्यात्म को और भी सहज और आकर्षक बना रहे हैं।

परंपरागत धर्मों ने अक्सर LGBTQIA+ समुदाय को हाशिए पर रखा, लेकिन अब Gen Z के क्वीर युवा आध्यात्म में अपने लिए जगह बना रहे हैं। अर्धनारीश्वर, कृष्ण का प्रेम और भारतीय दर्शन की लचीलापन इन सब को वे अपने अनुभव के रूप में देख रहे हैं। इंस्टाग्राम पर समावेशी भक्ति पेज, कविताएँ और आर्टवर्क इस बात की पुष्टि करते हैं।

Gen Z का आध्यात्मिक पुनर्जागरण

Gen Z आज भगवान की आरती में नहीं, बल्कि आत्मिक शांति में विश्वास करती है। वो मंदिर में कम समय बिताते हैं, लेकिन खुद से जुड़ने में ज्यादा समय देते हैं। यह आध्यात्म अब व्यक्तिगत है, डिजिटल है और सबसे बड़ी बात प्रासंगिक है।

‘कान में हेडफोन, दिल में प्रार्थना’ – यही है आज की आध्यात्मिक पीढ़ी की पहचान। यह बदलाव केवल एक ट्रेंड नहीं, बल्कि एक गहरी और स्थायी प्रक्रिया है। भारत की युवा पीढ़ी आध्यात्म को न केवल जीवित रख रही है, बल्कि उसे अपना स्वरूप देकर आगे बढ़ा रही है। शांत और बेहद सुंदर रूप में।

जिन शरद यादव ने लालू को बनवाया CM, अपनी पार्टी का RJD में कर दिया विलय उनके बेटे संग ही तेजस्वी ने कर दिया धोखा: ‘हिंदू विरोधी’ चंद्रशेखर को मधेपुरा से दिया टिकट

बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले टिकटों के लिए खूब मारा-मारी मची है। मधेपुरा विधानसभा सीट से राजद से दिवंगत पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद यादव के बेटे शांतनु यादव को टिकट मिलने की चर्चा थी लेकिन पार्टी ने पूर्व मंत्री प्रो. चंद्रशेखर को आखिरी वक्त में अपना उम्मीदवार बना दिया। प्रो. चंद्रशेखर वही नेता हैं जो अपने हिंदू विरोधी बयानों के लिए कुख्यात हैं और रामचरित मानस को ‘नफरती ग्रंथ’ तक बता चुके हैं।

इसके बाद राजद में अपनी पार्टी का विलय करने वाले शरद यादव के बेटे शांतनु यादव ने तेजस्वी पर गंभीर आरोप लगाए हैं। कॉन्ग्रेस की नेता और शांतनु यादव की बहन सुभाषिनी यादव भी अपने भाई के पक्ष में आ गईं और तेजस्वी यादव को आड़े हाथों लिया।

शांतनु यादव और सुभाषिनी यादव ने क्या कहा?

बीते 13 अक्टूबर को शांतनु यादव ने तेजस्वी यादव के ‘बीजेपी से लड़ने’ के एक X पोस्ट पर जवाब देते हुए कहा था, “हम लड़ेंगे और जीतेंगे। ✊?” लेकिन शनिवार (17 अक्टूबर) आते-आते यह स्थिति बदल गई।

शांतनु यादव ने शनिवार सुबह X पर तेजस्वी यादव के साथ अपनी और अपने पिता शरद यादव की एक तस्वीर साझा की। इसके साथ शांतनु ने लिखा, “मेरे खिलाफ राजनीतिक षड्यंत्र हुआ। समाजवाद की हार हुई।”

शांतनु यादव के इस पोस्ट के बाद उनकी बहन सुभाषिनी यादव भी उनके समर्थन में आ गईं। सुभाषिनी यादव ने X पर लिखा, “जो अपने खून के नहीं हुए, वो दूसरों के क्या सगे होंगे। जो अपने ही परिवार के वफादार नहीं, वो किसी और के लिए कैसे भरोसेमंद हो सकते हैं? ये विश्वासघात की पराकाष्ठा और उनकी असहजता का उत्कृष्ट उदाहरण है। जो षड्यंत्र इन्होंने रचा है, अब वही षड्यंत्र इनके खिलाफ जनता रचेगी।”

टिकट देने का वादा कर मुकर गए लालू-तेजस्वी: शांतनु ने सुनाया किस्सा

इसके बाद शांतनु यादव ने शनिवार (18 अक्टूबर) को X पर एक वीडियो पोस्ट किया। उन्होंने X पर वीडियो के साथ लिखा, “राजनीति में हम झाल बजाने नहीं आए हैं मुझे भी अपने पिता का नाम और उनकी विरासत को आगे बढ़ाना है। मेरा विरोध सिर्फ आवाज उठाना नहीं, बल्कि जिंदा होने और अपने हक के लिए डटे रहने का सबूत है।”

इस वीडियो में शांतनु ने बताया है कि किस तरह उनके पिता उन्हें मधेपुरा से अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे। शांतनु ने कहा, “मेरे पिता ने अस्वस्थ होने पर इच्छा जताई थी कि शांतनु मेरी विरासत को आगे बढ़ाएँगे। उनका पहला कदम अपनी पार्टी (लोकतांत्रिक जनता दल) को आरजेडी में विलय करना था।”

शांतनु बताते हैं कि पिता के निधन के बाद वह आश्वस्त थे कि वह आरजेडी के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ेंगे और उन्होंने इसके लिए पूरी तैयारी भी कर ली थी। उन्होंने कहा, “लोकसभा चुनाव से पहले लालू यादव जी और तेजस्वी यादव जी बोले कि शांतनु लोकसभा की नहीं, आप विधानसभा चुनाव की तैयारी करिए। मैंने सोचा कि वो हमारे अभिभावक है और वो कह रहे हैं तो हम विधानसभा चुनाव की तैयारी करते हैं।”

हालाँकि, शांतनु नहीं चाहते थे कि वह विधानसभा चुनाव लड़ें लेकिन लोगों के कहने पर वह इसके लिए भी तैयार हो गए थे। उन्होंने कहा, “हम गए लेकिन आखिरी में हमारी जगह किसी और को टिकट दे दिया।” उन्होंने आगे कह, “राजनीति में हम झाल बजाने नहीं आए हैं हमें भी अपने पिताजी का नाम आगे बढ़ाना है।” शांतनु का कहना है कि वह लोगों के साथ बैठेंगे और आगे का फैसला करेंगे।

आखिरी वक्त तक शांतनु को भरोसा देते रहे तेजस्वी

पत्रकार अजय झा ने 17 अक्टूबर को एक X पोस्ट में दावा किया है कि तेजस्वी यादव आखिरी वक्त तक शांतनु यादव को टिकट मिलने का भरोसा दे रहे थे। अजय झा ने लिखा है, “स्वर्गीय शरद यादव ने अपनी पार्टी का विलय राजद में किया था। उस वक्त ये सहमति बनी थी कि उनके बेटे शांतनु यादव को राजद मधेपुरा से लोकसभा का टिकट देगी। लेकिन टिकट नहीं दिया गया। इस बीच शरद यादव का निधन हो गया।”

झा ने आगे लिखा, “अब विधानसभा चुनाव में एक बार फिर तेजस्वी यादव ने शांतनु को मधेपुरा सीट से विधानसभा चुनाव की तैयारी करने को कहा। दो दिन पहले फोन करके पेपर तैयार करने को भी कहा गया।”

उन्होंने आगे कहा, “यहाँ तक कि कल (16 अक्टूबर) आकर सिंबल लेकर जाने को कहा गया। लेकिन आखिरी वक्त में फिर से राजद ने सिटिंग विधायक को दे दिया। शांतनु ने इसके बाद तेजस्वी से मुलाकात कर साफ कर दिया कि इस विश्वासघात वो अब उनके साथ नहीं रह सकते हैं।”

जब शरद यादव ने लालू यादव को दिलाई थी बिहार CM की कुर्सी

यूँ तो शरद यादव मध्य प्रदेश में जन्मे थे लेकिन उनकी राजनीति की धाक उत्तर प्रदेश और बिहार तक थी। जय प्रकाश नारायण ने छात्र आंदोलन के बाद जिस उम्मीदवार को हलधर किसान के चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़वाया वो शरद यादव ही थे। इसके बाद वे 1989 में बदायूँ से लोकसभा पहुँचे और बिहार के मधेपुरा से भी 4 बार लोकसभा सांसद रहे।

मार्च 1990 में बिहार विधानसभा चुनाव हुए और कॉन्ग्रेस सत्ता से बाहर हो गई। जनता दल के विधायक दल का नेता चुनने की बारी आई तो सबको लगा कि रामसुंदर दास मुख्यमंत्री होंगे क्योंकि वे प्रधानमंत्री वीपी सिंह और जॉर्ज फर्नांडीस की पहली पसंद थे। इस बीच लालू यादव के नाम की चर्चा चलने लगी क्योंकि वे देवीलाल, शरद यादव और नीतीश कुमार की पसंद थे।

जब जनता दल विधायक दल का नेता सर्वसम्मति से चुनने की कोशिश की गई, तो शरद यादव विधायकों से वोटिंग के जरिए नेता चुनने पर अड़े गए। उन्हें सीधे मुकाबले में दास की जीत का अंदाजा था। वहाँ वोटिंग हुई और शरद यादव की सेट की गई फील्डिंग की बदौलत लालू यादव जीत गए। इसके बाद भी लालू यादव को शपथ ग्रहण का न्योता नहीं मिल रहा था तो उन्होंने खुद यह सुनिश्चित किया कि लालू को ना केवल न्यौता मिले बल्कि उनका भव्य शपथ ग्रहण समारोह भी हो।

बाद में उनके लालू यादव से मतभेद भी हुए। शरद यादव JDU में चले गए, फिर अपनी पार्टी भी बनाई और अंत में मार्च 2022 में अपनी पार्टी लोकतांत्रिक जनता दल (LJD) का विलय राष्ट्रीय जनता दल (RJD) में कर दिया। उन्होंने तब कहा था, “हमारी पार्टी का आरजेडी में विलय विपक्षी एकता की दिशा में पहला कदम है। देशभर में बीजेपी को हराने के लिए पूरा विपक्ष एकजुट होना बहुत जरूरी है।”

लालू यादव खुद उनका यह एहसान मानते रहे और जब शरद यादव का निधन हुआ तो उन्होंने उन्हें बड़ा भाई बताते हुए कहा कि उनसे मतभेद तो हुए लेकिन कभी मनभेद नहीं हुए थे।

‘हिंदू विरोधी’ चंद्रशेखर को आरजेडी ने दिया टिकट

आरजेडी ने जिन पूर्व मंत्री चंद्रशेखर को टिकट दिया है उनका ‘हिंदू विरोधी’ बयानों को इतिहास रहा है। वो रामचरितमानस को ‘नफरत फैलान वाला ग्रंथ’ और ‘पोटेशियम साइनाइड’ तक बता चुके हैं।

जनवरी 2023 में ‘नालंदा ओपन यूनिवर्सिटी’ के दीक्षांत समारोह में छात्रों को संबोधित करते हुए उन्होंने रामचरितमानस के एक दोहे “अधम जाति में विद्या पाए, भयहु यथा अहि दूध पिलाए” का जिक्र करते हुए कहा था कि यह समाज में नफरत फैलानेवाला ग्रंथ है। उन्होंने इस कार्यक्रम से बाहर आकर कहा कि किसी जमाने में मनुस्मृति ने समाज में नफरत का बीज बोया, उसके बाद रामचरितमानस ने समाज में नफरत पैदा की।

यही शिक्षा मंत्री जो रामचरितमानस पर सवाल उठाते थे वे इस्लाम को ही मोहब्बत का पैगाम देने वाला मजहब मानते हैं। इतना ही नहीं सितंबर 2023 में तो उन्होंने इस्लाम के पैगंबर मुहम्मद को मर्यादा पुरुषोत्तम बता दिया था। उन्होंने जन्माष्टमी पर आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा था, “जब शैतानियत बढ़ गई दुनिया में, ईमान खत्म हो गया, बेईमान और शैतान ज्यादा हो गए तो मध्य एशिया के इलाके में ईश्वर ने, प्रभु ने, परमात्मा ने मर्यादा पुरुषोत्तम प्रोफेट मुहम्मद साहब को पैदा किया।”

2023 के सितंबर में ही उन्होंने रामचरितमानस में जहरीला रसायन पोटेशियम साइनाइड होने का दावा कर दिया था। इतना ही नहीं वे रामचरितमानस का खुलकर विरोध करते हैं और अब आरजेडी ने उन्हें उनके काम का ईनाम देते हुए शरद यादव के बेटे से वादाखिलाफी कर उन्हें टिकट दे दिया है।

ये कोई अदीना मस्जिद नहीं, हिंदुओं का आदिनाथ मंदिर है: TMC सांसद युसूफ पठान इस्लामी आक्रांताओं का कर रहे थे बखान, नेटीजन्स ने दिखाया आईना

तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के सांसद और पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान ने 16 अक्टूबर को पश्चिम बंगाल के मालदा जिले की ऐतिहासिक अदीना मस्जिद की तस्वीरें अपने सोशल मीडिया पर साझा कीं।

यूसुफ पठान ने मस्जिद की तारीफ करते हुए लिखा कि यह एक ऐतिहासिक धरोहर है, जिसे 14वीं सदी में इलियास शाही वंश के दूसरे शासक सुलतान सिकंदर शाह ने बनवाया था। यह मस्जिद 1373 से 1375 ईस्वी के बीच बनाई गई थी और उस समय यह भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे बड़ी मस्जिद थी। यह उस दौर की शानदार वास्तुकला को दर्शाती है।

जैसे ही TMC सांसद यूसुफ पठान ने अदीना मस्जिद की पोस्ट साझा की, कुछ लोगों ने इसका फैक्टचेक करना शुरू कर दिया और इसके हिंदू इतिहास की बात सामने रखी।

अधिवक्ता शेखर कुमार झा ने मस्जिद की दीवार पर खुदे हुए भगवान गणेश की एक तस्वीर साझा करते हुए लिखा, “ऐतिहासिक: आदिनाथ मंदिर बना अदीना मस्जिद।”

एक्स यूजर ‘PlanH’ ने यूसुफ पठान की पोस्ट का जवाब देते हुए लिखा: “प्रिय यूसुफ पठान, आप जिस जगह खड़े हैं वह कभी भारत के सबसे बड़े हिंदू मंदिरों में से एक आदिनाथ मंदिर का परिसर था, जिसे इस्लामी आक्रमणकारियों ने तोड़कर कब्जा कर लिया था।

यूजर ने कुछ तस्वीरें भी लगाई और कहा, “अब समय आ गया है कि इस अन्याय और बर्बरता को सुधारा जाए और मंदिर की खोई हुई गरिमा को फिर से स्थापित किया जाए।”

‘अब्दुल किताबी’ नामक एक यूजर ने अदीना मस्जिद परिसर में पाए गए हिंदू मूर्तियों की तस्वीरें साझा करते हुए यूसुफ पठान को टैग कर जवाब दिया:

“प्रिय यूसुफ पठान (@iamyusufpathan), आप जिस जगह खड़े हैं, वह कभी भारत के सबसे बड़े हिंदू मंदिरों में से एक आदिनाथ मंदिर का परिसर था, जिसे इस्लामी आक्रमणकारियों ने तोड़कर मस्जिद में बदल दिया था।”

उन्होंने आगे लिखा, “मैंने कुछ तस्वीरें संलग्न की हैं जो इस बात का प्रमाण हैं। अब समय आ गया है कि इस अन्याय और बर्बरता को सुधारा जाए और मंदिर की खोई हुई गरिमा को फिर से स्थापित किया जाए। एक सच्चे मुसलमान के तौर पर हमें यह मस्जिद हिंदुओं को लौटा देनी चाहिए।”

एक अन्य ने लिखा, “आदिनाथ मंदिर अब अदीना मस्जिद है! हमारी धर्मनिरपेक्षता की खूबसूरती!”

एक एक्स यूजर ने पूछा, “क्या आप लोगों ने अपना कुछ बनाया है, या दूसरों के धार्मिक स्थलों को तोड़कर सब कुछ अपने कब्जे में ले लिया है और उसे अपना बता दिया है?”

अदीना या आदिनाथ, मस्जिद में बदला गया एक और हिंदू मंदिर

अदीना मस्जिद पश्चिम बंगाल के मालदा जिले के ऐतिहासिक शहर पांडुआ में स्थित है। पारंपरिक इतिहासकारों के अनुसार, इस मस्जिद का निर्माण बंगाल सल्तनत के इलियास शाही वंश के सुलतान सिकंदर शाह ने 1373 में शुरू कराया था और 1375 में पूरा हुआ। उस समय यह मस्जिद पूरे भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे बड़ी मस्जिद थी और इसे दिल्ली सल्तनत पर शाह की सैन्य जीत का प्रतीक माना गया।

हालाँकि, ऐतिहासिक और पुरातात्त्विक साक्ष्य बताते हैं कि इस मस्जिद का निर्माण पहले से मौजूद हिंदू धार्मिक संरचनाओं को तोड़कर उनके पत्थरों और सामग्री से किया गया था। ये मंदिर पाल–सेन काल (8वीं से 12वीं सदी) के थे।

मूर्ति और मूर्तिकला से जुड़े अवशेषों से यह भी संकेत मिलता है कि जहाँ आज अदीना मस्जिद खड़ी है, वहाँ पहले भगवान शिव को समर्पित एक मंदिर था, जिसे आदिनाथ मंदिर कहा जाता था।

आदिनाथ शिव का एक प्राचीन रूप है। इस मंदिर परिसर में भगवान विष्णु का एक मंदिर भी था। इतिहासकारों का यह भी मानना है कि आज अदीना मस्जिद के भीतर जो मिंबर है, वह किसी पुराने मंदिर के काले पत्थर से बने दरवाजे को तोड़कर बनाया गया था।

अदीना मस्जिद की दीवारों, दरवाजों, मेहराबों और नमाज़ के स्थानों पर टेराकोटा और पत्थर की नक्काशी देखने को मिलती है, जिनमें भगवान शिव और गणेश जैसे हिंदू देवी-देवताओं की आकृतियाँ बनी हुई हैं।

इसके अलावा, वहाँ फूलों की आकृति, चैत्य मेहराबें, कीर्तिमुख (मुखाकृति वाला मुखौटा), मोतियों की माला, और घुँघरू व घँटियों की जंजीर जैसी कलाकृतियाँ भी मौजूद हैं। ऐसी सजावट इस्लामी वास्तुकला में नहीं पाई जाती, जिससे यह साफ संकेत मिलता है कि ये सभी नक्काशियाँ और कलात्मक चिन्ह पाला–सेन काल (8वीं–12वीं सदी) के हिंदू स्थापत्य कला से संबंधित हैं।

अदीना मस्जिद के केंद्रीय मिहराब (नमाज पढ़ने की दिशा दर्शाने वाला हिस्सा) में इसके हिंदू इतिहास के साफ संकेत मिलते हैं। यह मिहराब एक घुमावदार दीवार में बना है और इसके सामने की मेहराब त्रि-पत्रीय (तीन खंडों वाली) डिजाइन में है। मेहराब के दोनों ओर के हिस्सों (स्पैंड्रल) को फूलों की आकृतियों (रोसेट्स) से सजाया गया है।

मिहराब के अंदर के पैनलों में भी त्रि-पत्रीय मेहराबों और रोसेट डिजाइनों की नक्काशी है, जिनके ऊपर से घंटियों और जंजीरों के लटकते हुए डिजाइन दिखाई देते हैं। ऐसे सजावटी डिजाइन खासतौर पर हिंदू स्थापत्य कला में पाए जाते हैं, और इन्हें आमतौर पर मंदिरों के खंभों पर उकेरा जाता था, खासकर पाला–सेन काल में।

अदीना मस्जिद के परिसर और उसकी दीवारों में आज भी टूटा हुआ शिवलिंग और कई हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ दिखाई देती हैं। आसपास की संरचनाओं जैसे पांडुआ पुल में भी हिंदू मंदिरों के खंडहरों से लिए गए पत्थरों का इस्तेमाल हुआ है। यह इस पूरे क्षेत्र में इस्लामी आक्रमणकारियों द्वारा बड़े पैमाने पर मंदिरों के विध्वंस को दर्शाता है।

पूर्व क्रिकेटर और TMC सांसद यूसुफ पठान ने इस मस्जिद को इस्लामी वास्तुकला की मिसाल बताते हुए एक ऐतिहासिक गौरव के रूप में पेश किया और सुल्तान सिकंदर शाह को भारतीय मुस्लिम शासक के तौर पर याद रखने की बात कही। जबकि ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो सिकंदर शाह की राजनीतिक और धार्मिक सोच भारत नहीं बल्कि अरब और इराक (कटेसिफन) से प्रेरित थी।

यह मस्जिद 14वीं शताब्दी में सिकंदर शाह ने एक भव्य हिंदू मंदिर को तोड़कर बनवाई थी, जिसे पहले आदिनाथ मंदिर कहा जाता था। इसके बाद, 19वीं सदी में आए भूकंपों के चलते यह स्थल उजाड़ हो गया। वर्तमान में यह स्थल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के तहत राष्ट्रीय महत्त्व का संरक्षित स्मारक है, जिससे यहाँ खुदाई या पूजा-पाठ पर रोक लगी हुई है।

यह मुद्दा पहले भी बीजेपी द्वारा उठाया गया था और 2024 में फिर चर्चा में आया जब वरिष्ठ अधिवक्ता हरी शंकर जैन ने हिंदुओं से आह्वान किया कि वे अदीना मस्जिद में जाकर पूजा शुरू करें। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस संबंध में पत्र भी लिखा।

फरवरी 2024 में, हिरण्मय गोस्वामी नाम के एक युवा पुजारी ने कुछ हिंदू अनुयायियों के साथ अदीना मस्जिद परिसर में शिवलिंग के पास पूजा और मंत्रोच्चार शुरू किया। हालांकि, बाद में पुलिस ने उन्हें पूजा जारी रखने से रोक दिया।

इतिहास में मध्यकालीन इस्लामी आक्रमणों के दौरान हजारों हिंदू मंदिरों को तोड़ा गया। आज जो कई ऐतिहासिक मस्जिदें मानी जाती हैं, वे वास्तव में उन्हीं मंदिरों के खंडहरों पर बनी हैं या उन्हीं मंदिरों को ढाँचे में थोड़ा बदलाव कर मस्जिद में बदल दिया गया है। अयोध्या का बाबरी ढाँचा, मथुरा की शाही ईदगाह, और काशी की ज्ञानवापी मस्जिद ये सभी ऐसे प्रमुख उदाहरण हैं जहाँ मंदिरों को कब्जा करके मस्जिदें बनाई गईं।

इस प्रक्रिया की कानूनी रुकावट है 1991 का पूजा स्थल अधिनियम (Places of Worship Act), जो 15 अगस्त 1947 के बाद किसी भी धार्मिक स्थल के स्वरूप में बदलाव की इजाज़त नहीं देता। यह कानून मंदिर पुनःस्थापन की कोशिशों में बड़ी बाधा बना हुआ है। हालाँकि अयोध्या में राम जन्मभूमि की सफल पुनर्प्राप्ति ने हिंदू समाज को नया उत्साह और आशा दी है।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रद्धा पांडे ने लिखी है। इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)

बिहार में ‘महागठबंधन’ में मची सिर फुटव्वल, एक-दूसरे के खिलाफ ही प्रत्याशी उतार रहे RJD-कॉन्ग्रेस-वामपंथी-VIP: तेजस्वी यादव के सहारे खोई सियासी जमीन की तलाश में राहुल गाँधी

बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण के लिए नामांकन की समय सीमा शनिवार (17 अक्टूबर 2025) को खत्म हो गई है लेकिन अब तक विपक्षी गठबंधन के बीच सीट शेयरिंग का फॉर्मूला ही तय नहीं हो पाया है। NDA से लड़ाई की तैयारी के बीच महागठबंधन के दल आपस में ही भिड़े हुए हैं और कई सीटों पर तो राजद और कॉन्ग्रेस ने एक-दूसरे के खिलाफ ही प्रत्याशी उतार दिए हैं।

इस कथित महागठबंधन की मौजूदा स्थिति दिखाती है कि इनकी चुनाव लड़ने की ही कोई साझा रणनीति या विचारधारा नहीं है। इस गठबंधन में केवल सत्ता की लालसा के लिए एकजुटता दिखने की कोशिश की जा रही है। कॉन्ग्रेस के सबसे बड़े चेहरे राहुल गाँधी बिहार चुनाव के बीच विदेश में छुट्टियाँ मना रहे थे और जब लौटे तब भी उन्होंने सीट बँटवारे के लिए तेजस्वी के साथ बैठक नहीं की है।

तेजस्वी यादव सीट बँटवारे की समस्या के समाधान के लिए दिल्ली तक आए भी लेकिन उनकी राहुल गाँधी के साथ बैठक नहीं हो सकी। बताया जा रहा है कि कॉन्ग्रेस नेतृत्व ने उन्हें पार्टी महासचिव केसी वेणुगोपाल से मिलकर इस समस्या का समाधान खोजने की सलाह दी है लेकिन इससे भी कोई बात नहीं बनी है। अब भी यह रार लगातार जारी है और बढ़ती ही जा रही है।

RJD के सहारे बिहार में सियासी पैर जमाने की कोशिश में कॉन्ग्रेस

मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि कॉन्ग्रेस किसी भी हाल में अपनी पसंद की सीटों से पीछे हटने को तैयार नहीं है। पार्टी करीब 60 सीटों पर दावेदारी कर रही है और इनमें कई ऐसी सीटें हैं जिन पर राजद की नजर भी है।

राजद, कॉन्ग्रेस को लगभग 60–61 सीटें देने को तैयार तो है लेकिन असली विवाद इस बात पर अटका है कि कौन-सी सीटें किसके खाते में जाएँगी। यानी यहाँ मामला सिर्फ संख्या का नहीं बल्कि सियासी जमीन के कब्जे का है।

महागठबंधन में राजद और कॉन्ग्रेस के अलावा वामपंथी दल और मुकेश सहनी की वीआईपी भी शामिल हैं लेकिन असली मुकाबला फिलहाल दो बड़े दलों के बीच है। कॉन्ग्रेस सीमांचल और दलित-मुस्लिम समीकरण वाली सीटों पर अपना दावा ठोक रही है।

पार्टी का मानना है कि इन इलाकों में उसका सामाजिक आधार मजबूत है जबकि राजद इस बात से भली-भाँति वाकिफ है कि अगर उसने इन क्षेत्रों में कॉन्ग्रेस को मौका दिया, तो भविष्य में इन इलाकों में उसकी पकड़ ढीली पड़ सकती है। कॉन्ग्रेस, राजद के कँधे पर चढ़कर अपने दशकों पुराने जनाधार को फिर से वापस पाने के जुगाड़ में लगी है।

हालाँकि, इसमें यह भी ध्यान देने वाली बात है कि बिहार में कॉन्ग्रेस का अपना आधार राजद के मुकाबले कहीं नहीं ठहरता है फिर भी वो राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते अपनी ताकत को भुनाने की कोशिश में है। कॉन्ग्रेस का यह भी दावा है कि राहुल गाँधी की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ से चुनाव का माहौल महागठबंधन के पक्ष में हो गया है और वे अधिक सीटों पर जीत दर्ज कर सकते हैं।

एक-दूसरे पर शायराना वार कर रहे RJD-कॉन्ग्रेस

बिहार में सीट बँटवारे की खींचतान में ‘शायरी वार’ भी देखने को मिल रहा है। राजद और कॉन्ग्रेस के नेताओं ने अपनी नोकझोंक को अब कविताओं के जरिए बयाँ करना शुरू कर दिया है।

राजद के राज्यसभा सांसद मनोज झा ने X पर गठबंधन के बीच रार को लेकर लिखा, “रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो छिटकाय, टूटे से फिर न मिले, मिले गाँठ परिजाय…”। उन्होंने इसे ‘हर अवसर के लिए प्रासंगिक’ बताया है।

कुछ ही समय में कॉन्ग्रेस का भी इस पर जवाब आ गया। कॉन्ग्रेस के राज्यसभा सांसद इमरान प्रतापगढ़ी ने इस पर तंज करते हुए लिखा, “पानी आँख में भर कर लाया जा सकता है, अब भी जलता शहर बचाया जा सकता है।”

आधा दर्जन से अधिक सीटों पर एक-दूसरे के खिलाफ महागठबंधन के प्रत्याशी

बिहार विधानसभा चुनाव में कई सीटों पर गठबंधन के घटक दल एक-दूसरे को सीधी चुनौती दे रहे हैं। कहलगाँव में राजद के रजनीश यादव और कॉन्ग्रेस के प्रवीण कुशवाहा आमने-सामने हैं जबकि तारापुर में राजद के अरुण शाह का मुकाबला वीआईपी के सकलदेव सिंह से है।

बछवाड़ा, बिहारशरीफ, रोसड़ा और राजपाकर सीटों पर कॉन्ग्रेस और सीपीआई के उम्मीदवारों के बीच सीधी है। बछवाड़ा से कॉन्ग्रेस के प्रकाश दास और सीपीआई के अवधेश राय, बिहारशरीफ से कॉन्ग्रेस के उमैर खान और सीपीआई के शिव प्रसाद यादव, रोसड़ा से कॉन्ग्रेस के बीके रवि और सीपीआई के लक्ष्मण पासवान जबकि राजपाकर से कॉन्ग्रेस की प्रतिमा कुमारी और सीपीआई के मोहित पासवान मैदान में हैं।

वहीं, वैशाली सीट पर राजद के अजय कुशवाहा और कॉन्ग्रेस के ई. संजीव सिंह के बीच टक्कर है। सबसे चर्चित लालगंज सीट पर राजद ने बाहुबली नेता मुन्ना शुक्ला की बेटी शिवानी शुक्ला को मैदान में उतारा है तो कॉन्ग्रेस से आदित्य कुमार राजा ने मोर्चा सँभाल लिया है।

बीबीसी ने राजद की एक पूर्व प्रवक्ता के हवाल से बताया है कि राजद और कॉन्ग्रेस की कई सीटों पर ‘फ्रेंडली फाइट’ होगी। इस प्रवक्ता ने नाम ना छापने की शर्त पर बीबीसी से कहा है, “लगभग छह से सात ऐसी सीटें ऐसी हैं, जहाँ कॉन्ग्रेस और राजद आमने-सामने हो सकते हैं।”

अविश्वास से भरी आगे की राह

यह भी स्पष्ट है कि राजद और कॉन्ग्रेस दोनों एक-दूसरे पर दबाव की राजनीति का खेल खेल रहे हैं। एक दल खुद को राष्ट्रीय स्तर की ताकत बताकर झुकने को तैयार नहीं, तो दूसरा दल अपने क्षेत्रीय प्रभाव की ताकत को आजमा रहा है। यही कारण है कि कई सीटों पर दोनों के उम्मीदवार एक-दूसरे के खिलाफ मैदान में उतर चुके हैं।

अगर देखा जाए तो यह केवल ‘सीट शेयरिंग’ का विवाद नहीं रहा बल्कि यह सवाल उठने लगा है कि क्या महागठबंधन अब भी किसी साझा लड़ाई के लायक बचा है या फिर यह सिर्फ नाममात्र का गठबंधन है, जो इस चुनावी दौर में सत्ता की लालसा तक ही सीमित रह गया है।

इसके अलावा यह स्थिति बिहार की राजनीति में विपक्ष के लिए शुभ संकेत नहीं है। जनता यह देख रही है कि जो दल अपने भीतर तालमेल नहीं बना पा रहे, वे राज्य को स्थिर नेतृत्व कैसे देंगे? महागठबंधन लोगों के लिए अविश्वास के प्रतीक की तरह बन गए है। जहाँ साथी दल ही एक-दूसरे की जड़ों के मट्ठा डालने में लगे हुए हैं।

मोदी सरकार में कमजोर नहीं ‘मजबूत’ हुआ है RTI का अधिकार, डिस्पोजल रेट 95% तक पहुँचा: CIC की रिपोर्ट से जानें आँकड़े, समझें डिजिटल इंडिया ने कैसे बढ़ाई पारदर्शिता

सूचना का अधिकार यानी RTI एक्ट आज भारत की लोकतंत्र की रीढ़ बन चुका है। कॉन्ग्रेस ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि उसने RTI को कमजोर कर दिया, सूचनाएँ छिपाई जा रही हैं और पारदर्शिता पर संकट है। खासकर बिहार में हालात ठप होने की बात कही। लेकिन अगर हम आँकड़ों की माने तो तस्वीर बिल्कुल उलट है।

सेंट्रल इंफॉर्मेशन कमीशन (CIC) की ताजा रिपोर्ट्स और सरकारी डेटा साफ बताते हैं कि मोदी सरकार ने RTI को न सिर्फ मजबूत किया, बल्कि इसे और आसान, तेज और पारदर्शी बनाया। कोविड जैसे मुश्किल वक्त में भी RTI का डिस्पोजल रेट बढ़ा, वो भी डिजिटल इंडिया की बदौलत।

कॉन्ग्रेस के आरोप कितने सही, कितने गलत?

दरअसल, कॉन्ग्रेस ने अक्टूबर 2025 में RTI के 20 साल पूरे होने पर मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला था। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने एक्स पर लिखा कि सरकार RTI को धीरे-धीरे खोखला कर रही है। डेटा प्रोटेक्शन लॉ के नाम पर सूचनाएँ रोकने की कोशिश हो रही है।

जयराम रमेश ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में पाँच बड़े मुद्दे गिनाए: पीएम की डिग्री, फर्जी राशन कार्ड, नोटबंदी, राफेल डील और इलेक्टोरल बॉन्ड्स। उनका कहना था कि इन मामलों में RTI से सवाल पूछे गए, जिससे सरकार डर गई और 2019 में RTI एक्ट में संशोधन करके सेंट्रल इंफॉर्मेशन कमीशन (CIC) को कमजोर कर दिया। संशोधन से चीफ इंफॉर्मेशन कमिश्नर की सैलरी और टेन्योर पर सरकार का कंट्रोल बढ़ गया।

बिहार पर कॉन्ग्रेस ने खास जोर दिया। उनके मीडिया कोऑर्डिनेटर अभय दुबे और राजेश राठौड़ ने कहा कि बिहार में सूचना आयोग ठप है। 2017-18 के बाद कोई वार्षिक रिपोर्ट नहीं आई। 25,101 अपीलें और शिकायतें लंबित हैं और एक केस निपटाने में औसतन पाँच साल लग रहे हैं।

RTI से जुड़े आँकड़ों की सच्चाई

अब आते हैं असल सच्चाई पर, जो आँकड़ों में छिपी है। केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने दिसंबर 2022 में राज्यसभा में RTI की स्थिति पर विस्तार से जवाब दिया था और हाल के डेटा इसे और पुख्ता करते हैं। उनके मुताबिक, मोदी सरकार के पिछले आठ सालों में RTI केस डिस्पोजल रेट लगातार बढ़ा है। कोविड जैसे मुश्किल समय में भी रिजल्ट्स बेहतर रहे। कुछ पीरियड्स में तो कोविड के दौरान डिस्पोजल रेट सामान्य समय से भी ज्यादा था। क्यों? क्योंकि सरकार ने डिजिटल इंडिया के तहत पूरी प्रक्रिया को ऑनलाइन और आसान कर दिया।

यूपीए बनाम मोदी सरकार: आँकड़ों की तुलना

यूपीए और NDA के 7 साल में RTI (फोटो साभार: AI Grok, Data-PIB)

ये आँकड़े साफ दिखाते हैं कि डिस्पोजल रेट में 10% की बढ़ोतरी हुई, कंप्लायंस 17% ऊपर गया और रिजेक्शन रेट कम हुआ। इसका मतलब है कि ज्यादा लोगों को समय पर जवाब मिला और कम आवेदन रिजेक्ट हुए।

क्या कहती है आरटीआई से जुड़ी सीआईसी रिपोर्ट?

2023-24 की CIC रिपोर्ट के मुताबिक, देश में 17.5 लाख RTI एप्लीकेशन्स फाइल हुईं, जो दस साल पहले के मुकाबले दोगुनी हैं। यानी जनता का RTI पर भरोसा बढ़ा है। डिस्पोजल रेट 90% से ऊपर रहा। नवंबर 2023 में चीफ इंफॉर्मेशन कमिश्नर हीरालाल समरिया ने कहा कि वित्त वर्ष में पहली बार 90% से ज्यादा डिस्पोजल रेट हासिल हुआ। पेंडिंग केस 2020-21 के 38,116 से घटकर 2023-24 में 19,233 रह गए। जुलाई 2024 से जून 2025 तक के डेटा में पेनल्टी इम्पोजमेंट सिर्फ 1.2% रहा, लेकिन डिस्पोजल रेट हाई रहा।

जून 2025 तक CIC में 26,800 केस पेंडिंग थे, जो पूरे सिस्टम की तुलना में बेहतर है। सतर्क नागरिक संगठन की एक रिपोर्ट कहती है कि 29 सूचना आयोगों में 4,13,972 केस पेंडिंग हैं, लेकिन डिस्पोजल रेट में सुधार साफ दिखता है।

कैसे हुआ ये कमाल?

तो सवाल ये है कि मोदी सरकार ने ऐसा क्या किया कि RTI इतना बेहतर हुआ? चलिए कुछ पॉइंट्स में समझते हैं-

डिजिटल इंडिया का जादू: साल 2014 में पीएम मोदी ने डिजिटल इंडिया की शुरुआत की, जिसका असर RTI पर भी पड़ा। अब RTI 24 घंटे ऑनलाइन पोर्टल से फाइल हो सकती है। कहीं से भी, कभी भी। ई-ऑफिस, ऑनलाइन ट्रैकिंग और डिजिटल रिकॉर्ड्स ने प्रक्रिया को तेज किया। कोविड में जब सब कुछ बंद था, तब भी ऑनलाइन सिस्टम की वजह से CIC का काम नहीं रुका।

हाइब्रिड हियरिंग्स: CIC ने फिजिकल और वर्चुअल, दोनों तरह की हियरिंग्स शुरू कीं। ऑडियो-वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से अपीलकर्ता और जवाबदेही अधिकारी आसानी से जुड़ सके। इससे समय बचा और ज्यादा केस निपटे।

टाइमलाइन्स की सख्ती: मोदी सरकार ने टाइमलाइन्स फिक्स किए। फर्स्ट अपील 30 दिन में, सेकंड अपील 45 दिन में। थर्ड अपील में भी समय सीमा तय की गई। अगर कोई अधिकारी देरी करता है, तो पेनल्टी का प्रावधान है। 2023-24 में सिर्फ 1.2% केस में पेनल्टी लगी, यानी ज्यादातर समय पर जवाब दे रहे हैं।

पब्लिक अथॉरिटीज की जवाबदेही: देश में करीब 25,000 पब्लिक अथॉरिटीज हैं, जो RTI के तहत जवाब देती हैं। इनका एनुअल रिटर्न फाइलिंग रेट 92% से ज्यादा है, जो यूपीए के समय 77% था। ये दिखाता है कि सरकारी दफ्तर अब ज्यादा जिम्मेदार हो गए हैं।

बजट आवंटन में भी इजाफा: CIC को 2023-24 में ₹120 करोड़ मिले, जिसमें ₹110 करोड़ खर्च भी हुए। इस दौरान स्टाफ बढ़ा और 500 CPIOs के लिए ट्रेनिंग प्रोग्राम भी चलाया गया। इस रिपोर्ट के चैप्टर 3 में CIC की एक्टिविटीज हैं: 19 इनकंबेंट्स, 28,000 अपील्स डिस्पोज्ड। पेनल्टी रियलाइजेशन 95 लाख रुपए। ये सब दिखाता है कि सिस्टम पहले से मजबूत है।

CIC में वैकेंसीज पर कंट्रोल: पहले कमीशन में कमिश्नर्स की कमी रहती थी, जिससे केस लटकते थे। अब सरकार समय पर वैकेंसीज भर रही है। जितेंद्र सिंह ने कहा कि सभी मेंबर्स की नियुक्ति समय पर हो रही है, जिससे सिस्टम तेज हुआ।

एआई और टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल: CIC ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल शुरू किया है। RTI पैटर्न एनालाइज करने और अप्लिकेंट्स की क्रेडेंशियल्स चेक करने में AI मदद कर रहा है। इससे फर्जी या गैरजरूरी आवेदनों को जल्दी छाँटा जा रहा है।

बिहार का क्या हाल?

बिहार स्टेट इंफॉर्मेशन कमीशन में 25,101 केस पेंडिंग हैं और एक केस निपटाने में पाँच साल लग रहे हैं। 2017-18 के बाद वार्षिक रिपोर्ट नहीं आई, जो चिंता की बात है। लेकिन ये स्टेट लेवल की कमी है, जिसकी जिम्मेदारी नीतीश सरकार की है। सेंट्रल लेवल पर मोदी सरकार ने गाइडलाइंस दीं और सिस्टम सुधारा, लेकिन स्टेट्स को भी इसे लागू करना होगा। बिहार में सुधार की जरूरत है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि सेंट्रल RTI सिस्टम कमजोर है।

RTI से मिली कामयाबियाँ

RTI ने पिछले कुछ सालों में कई बड़े खुलासे किए। चाहे वो सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार हो, राशन कार्ड की धाँधली हो या स्कॉलरशिप की गड़बड़ी, RTI से लाखों लोगों को उनके हक मिले। मिसाल के तौर पर-

  • मनरेगा में मजदूरी के भुगतान की जानकारी RTI से मिली, जिससे हजारों मजदूरों को समय पर पेमेंट हुआ।
  • पेंशन स्कीम्स में गड़बड़ियाँ उजागर हुईं, जिससे बुजुर्गों को लाभ मिला।
  • सरकारी जमीनों के गलत आवंटन के केस सामने आए, जिससे भ्रष्टाचार रुका।

2023-24 में 17.5 लाख RTI फाइलिंग्स दिखाती हैं कि लोग अब ज्यादा जागरूक हैं। रिजेक्शन रेट सिर्फ 5.65% रहा, यानी ज्यादातर लोगों को जवाब मिला।

CIC की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

RTI की शुरुआत और इसका मकसद

RTI एक्ट 2005 में यूपीए सरकार के समय लागू हुआ था। इसका मकसद था आम लोगों को सरकार से सवाल पूछने का हक देना। चाहे वो राशन कार्ड हो, पेंशन हो, स्कॉलरशिप हो या सरकारी योजनाओं की जानकारी, RTI ने जनता को ताकत दी कि वो बिना डरे जवाब माँग सके।

इस कानून ने भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने और पारदर्शिता बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई। लेकिन समय के साथ इसकी प्रक्रिया में कुछ दिक्कतें भी सामने आईं, जैसे देरी, रिजेक्शन और जटिल प्रक्रिया। यूपीए के समय RTI ने अच्छा काम किया, लेकिन मोदी सरकार ने इसे और बेहतर करने की ठानी।

मोदी सरकार ने RTI को मजबूत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। डिजिटल सिस्टम, तेज डिस्पोजल, कम रिजेक्शन और सख्त टाइमलाइन्स ने इसे जनता के लिए और सुलभ बनाया। लेकिन कुछ चुनौतियाँ अभी बाकी हैं। बिहार जैसे राज्यों में स्टेट कमीशन्स को मजबूत करना होगा। एक्टिविस्ट्स की सेफ्टी के लिए और सख्त कानून चाहिए। साथ ही जनता को RTI के सही इस्तेमाल की जागरूकता बढ़ानी होगी, ताकि फर्जी आवेदन कम हों।

आँकड़े झूठ नहीं बोलते। यूपीए के 81% डिस्पोजल से मोदी सरकार के 94% तक पहुँचना छोटी बात नहीं। डिजिटल इंडिया ने RTI को नई ताकत दी। कॉन्ग्रेस के आरोपों में बिहार की बात को छोड़कर ज्यादातर दम नहीं दिखता। अगर बिहार में दिक्कत है, तो नीतीश सरकार को जवाब देना चाहिए। सेंट्रल लेवल पर RTI आज पहले से कहीं ज्यादा मजबूत है। ये पारदर्शिता और जवाबदेही की जीत है। उम्मीद है कि सरकार और विपक्ष मिलकर इसे और बेहतर बनाएँगे।

कॉमनवेल्थ गेम्स 2030 की तैयारी में जुटा भारत, क्या दिल्ली CWG 2010 के घोटालों को छोड़ पाएगा पीछे? जानें कैसे कॉन्ग्रेस राज में जमकर हुआ था भ्रष्टाचार

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बुधवार (15 अक्टूबर 2025) को घोषणा की कि भारत 2030 में कॉमनवेल्थ गेम्स (CWG) की मेजबानी करेगा। यह खेल भारत में 2010 के विवादों से घिरे गेम्स के 20 साल बाद फिर से आयोजित होंगे।

कॉमनवेल्थ स्पोर्ट्स की कार्यकारी समिति ने 2030 के शताब्दी संस्करण (100वें साल) के लिए अहमदाबाद को मेजबान शहर के रूप में सुझाया है। नाइजीरिया की राजधानी अबुजा भी एक प्रस्तावित शहर था, लेकिन आखिरकार अहमदाबाद को अंतिम रूप से चुना गया।

कॉमनवेल्थ गेम्स फेडरेशन की जनरल असेंबली में 26 नवंबर 2025 को ग्लासगो में औपचारिक मंजूरी मिलने की उम्मीद है। यह कदम भारत के 2036 के ओलंपिक्स की मेजबानी की महत्वाकांक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है। केंद्र सरकार ने इसे ‘अत्यंत खुशी और गर्व का दिन’ बताया है।

अमित शाह ने इस फैसले की सराहना करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खेल अवसंरचना और प्रतिभा विकास पर ध्यान देने की वजह से भारत अब एक महान खेल गंतव्य बन गया है। भारतीय ओलंपिक संघ की अध्यक्ष पी टी उषा ने कहा कि यह गेम्स भारत की आयोजन क्षमता को दिखाएँगे और युवाओं को प्रेरित करेंगे। उन्होंने इसे ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।

भारत ने आखिरी बार 2010 में दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम्स आयोजित किए थे, लेकिन वह आयोजन खराब योजना, निर्माण में देरी और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों की वजह से प्रभावित हुआ था। उस विवाद की याद 2030 की तैयारी के दौरान हमेशा बनी रहेगी। अब सरकार के लिए जिम्मेदारी बड़ी हो गई है कि वह यह साबित करे कि उसने पहले से सीखे हैं और समय पर पारदर्शी, सफल और बजट में रहकर गेम्स आयोजित कर सकता है।

2010 की परछाईं- कैसे हुआ राष्ट्रमंडल खेल घोटाला

जब भारत ने 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स (CWG) की मेज़बानी जीतकर नई दिल्ली को चुना, तो इसे देश के लिए गर्व की बात माना गया। लेकिन यह आयोजन जल्द ही कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार का पर्याय बन गया।

यह कहानी नवंबर 2003 में शुरू हुई, जब भारत ने 2010 के CWG की मेजबानी का अधिकार जीता। कनाडा मुख्य प्रतिस्पर्धी था। भारतीय ओलंपिक संघ (IOA) ने इस आयोजन की कुल लागत केवल 1,200 करोड़ रुपए बताई थी, जिसे बाद में बहुत छोटा और असलियत से दूर माना गया। बाद में पता चला कि बजट काफी कम आंका गया था और अंतिम खर्च कई गुना बढ़ गया। इसके अलावा आरोप लगा कि भारत ने हर कॉमनवेल्थ देश की ओलंपिक समिति को 1,00,000 डॉलर का घुस देकर समर्थन खरीदा था। पूर्व खेल मंत्री मणि शंकर अय्यर ने इसे रिश्वत देने जैसा बताया था।

दिसंबर 2004 में कॉन्ग्रेस के सांसद सुरेश कलमाड़ी को प्रधानमंत्री कार्यालय की सिफारिश पर CWG आयोजन समिति का अध्यक्ष बनाया गया, जबकि उस समय के खेल मंत्री सुनील दत्त ने इसका विरोध किया था। कलमाड़ी के अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने गेम्स की तैयारियों पर पूरा नियंत्रण ले लिया। बाद में लेखा परीक्षकों ने इसे एक बड़ी गलती बताया।

स्टेडियम और शहर की संरचना का निर्माण 2006 से 2009 के बीच धीमी गति से हुआ। बजट कई बार बढ़ाया गया। अप्रैल 2007 से सितंबर 2010 तक आधिकारिक लागत का अनुमान सात बार बदला गया। शुरुआत में जो 1,100 करोड़ रुपए का अनुमान था, वह बढ़कर 3,566 करोड़ और फिर 11,687 करोड़ रुपए तक पहुँच गया, जो कि शुरूआती अनुमान से दस गुना ज्यादा था। गेम्स के समय कुल खर्च लगभग 18,532 करोड़ रुपए हो गया, जो लगभग 15 गुना अधिक था।

2009 के अंत में, कॉमनवेल्थ गेम्स फेडरेशन के अध्यक्ष माइकल फेनेल ने सार्वजनिक रूप से चेतावनी दी कि तैयारियाँ समय से पीछे हैं और ‘समय आपके दुश्मन है।’ इस वजह से CGF ने एक विशेष निगरानी पैनल बनाया जो हर महीने प्रगति की समीक्षा करता रहा।

भारत के खेल मंत्री एम एस गिल ने सरकार की ओर से अधिक फंड देने का भरोसा दिया ताकि आयोजन सफल हो सके। इससे साफ था कि खर्च पर नियंत्रण खो चुका था।

पूर्व खेल मंत्री और कॉन्ग्रेस नेता मणि शंकर अय्यर ने जुलाई 2010 में आयोजन पर कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि 35,000 करोड़ रुपए एक सर्कस पर खर्च हो रहे हैं, जबकि देश के गरीब खिलाड़ियों की जरूरतें पूरी नहीं हो रही हैं। उन्होंने कहा कि अगर गेम्स सफल रहे तो वह नाखुश होंगे क्योंकि इससे इस तरह के खर्च बढ़ेंगे। उन्होंने भारत पर अन्य देशों को रिश्वत देने के आरोप भी लगाए। कलमाड़ी ने उन्हें लापरवाह और देश विरोधी कहा।

सितंबर 2010 में खेल शुरू होने से ठीक पहले अफरातफरी बढ़ गई। 21 सितंबर 2010 को मुख्य स्थल जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम के बाहर 95 मीटर लंबा नया फुट ओवरब्रिज गिर गया, जिसमें लगभग 27 मजदूर घायल हो गए। इस घटना ने कमजोर निर्माण गुणवत्ता को उजागर किया। इस तरह 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स भारत के लिए एक बड़ी सीख और चेतावनी साबित हुए।

अंतर्राष्ट्रीय मीडिया द्वारा ध्वस्त पुल की तस्वीरें प्रकाशित। स्रोत: द गार्जियन।

खराब निर्माण ही अकेली समस्या नहीं थी। जब अंतरराष्ट्रीय टीमें दिल्ली पहुँचीं, तो उन्होंने एथलीट्स विलेज की हालत पर गंभीर शिकायतें कीं। उन्होंने कहा कि वहाँ की सफाई बेहद खराब थी, काम अधूरा था और वह जगह ‘इंसानों के रहने लायक नहीं’ थी।

जलभराव वाले फ्लैटों और कमरों में घूमते आवारा कुत्तों की तस्वीरें दुनियाभर की मीडिया में छा गईं। कई देशों के दल प्रमुखों ने खुले तौर पर सवाल उठाया कि क्या इतने खराब हालात में कॉमनवेल्थ गेम्स कराना भी ठीक है, क्योंकि खेल शुरू होने में बस कुछ ही दिन बचे थे और जरूरी सुविधाएँ अब भी अधूरी थीं। कॉमनवेल्थ गेम्स स्कॉटलैंड ने साफ कहा कि स्थिति असुरक्षित है और अगर हालात में सुधार नहीं हुआ तो CGF को खेल रद्द करने पर विचार करना चाहिए।

गंदे शौचालयों और कमरों की तस्वीरें अंतरराष्ट्रीय मीडिया द्वारा साझा की गईं। स्रोत: नेशनलपोस्ट

एक असाधारण कदम के तहत आयोजनकर्ताओं की मदद के लिए भारतीय सेना को बुलाया गया। सेना के इंजीनियरों ने गिरे हुए फुटओवर ब्रिज की जगह सिर्फ चार दिनों में एक अस्थाई बैली ब्रिज बना दिया। उन्होंने दिन-रात काम किया ताकि सुरक्षा और व्यवस्थाओं से जुड़ी बड़ी समस्या को टाला जा सके।

इसके बावजूद, भारतीय अधिकारियों ने दावा किया कि सारी समस्याएँ समय पर ठीक कर ली जाएँगी और ज़्यादातर दिक्कतों को सिर्फ बाहरी दिखावटी बताया। आख़िरी समय में की गई आपातकालीन सफाई और मरम्मत से किसी तरह स्टेडियम और अन्य स्थानों को खेलों से पहले तैयार कर लिया गया।

ढहे हुए पैदल पुल के निर्माण के लिए भारतीय सेना को बुलाया गया। स्रोत: इंडिया टुडे

दिल्ली में 2010 में हुए 19वें कॉमनवेल्थ गेम्स (CWG) का आयोजन 3 से 14 अक्टूबर के बीच तय समय पर हुआ। 71 देशों के 6,000 से ज़्यादा एथलीट्स ने भाग लिया। खेल शुरू होने के बाद भारत ने एक हद तक सफल आयोजन किया और मेडल तालिका में दूसरा स्थान हासिल किया।

लेकिन यह राहत ज्यादा समय तक नहीं टिकी। आयोजन से पहले हुए घोटालों और अव्यवस्थाओं की परछाई इन खेलों पर बनी रही। जैसे ही समापन समारोह हुआ, भ्रष्टाचार और वित्तीय गड़बड़ियों के आरोप चर्चा में आ गए।

तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 25 अक्टूबर 2010 को पूर्व CAG वी के शुंगलू की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति बनाई, जिसका काम था पूरे आयोजन से जुड़ी एजेंसियों (जैसे आयोजन समिति, दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के मंत्रालयों) की भूमिका की जाँच करना और कार्रवाई की सिफारिश करना। साथ ही, CVC (सेंट्रल विजिलेंस कमिशन) और CBI ने भी घोटालों की जाँच शुरू कर दी।

CBI ने पहली चार्जशीट दाखिल की, जिसमें सुरेश कलमाड़ी को मुख्य आरोपित ने बताया। आरोप था कि उन्होंने एक स्विस कंपनी को Timing, Scoring, Results (TSR) सिस्टम का ठेका 141 करोड़ रुपए में दिलवाया, जो बाजार कीमत से लगभग 95 करोड़ ज्यादा था। 24 अप्रैल 2011 को कलमाड़ी को गिरफ्तार किया गया।

उनके करीबी सहयोगी जैसे आयोजन समिति के महासचिव ललित भनोट और महानिदेशक वी के वर्मा भी गिरफ्तार हुए। कलमाड़ी 9 महीने तक तिहाड़ जेल में रहे और जनवरी 2012 में जमानत मिली। CAG (भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक) ने 5 अगस्त 2011 को संसद में एक ऑडिट रिपोर्ट पेश की। इसमें बताया गया कि खेल परियोजनाओं में भारी खर्च बढ़ोतरी, गलत योजनाएँ और नियमों का उल्लंघन हुआ।

 शुंगलू समिति ने 2012 से 2015 के बीच 6 रिपोर्टें दीं। रिपोर्टों में दिल्ली के उपराज्यपाल तेजिंदर खन्ना और मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को Games Village और शहर के इंफ्रास्ट्रक्चर में लागत बढ़ोतरी के लिए जिम्मेदार ठहराया गया। इसके अलावा, प्रसारण सौदों में गड़बड़ी पाई गई और समिति ने प्रसार भारती के तत्कालीन CEO बी एस लाली के खिलाफ भी कार्रवाई की सिफारिश की। 2012 तक CBI ने 19 FIR दर्ज कीं। इन मामलों में खेल स्थलों का निर्माण, स्ट्रीट लाइटिंग और अन्य कान्ट्रैक्ट शामिल थे।

एक विशेष कोर्ट ने 2014 में एक स्विमिंग पूल कान्ट्रैक्ट मामले में सबूत के अभाव में केस बंद कर दिया।  दिल्ली की एक कोर्ट ने 2015 में स्ट्रीट लाइट घोटाले में 6 लोगों को दोषी ठहराया। इनमें 4 दिल्ली नगर निगम के इंजीनियर और एक निजी कंपनी के 2 निदेशक शामिल थे। उन्हें 4 से 6 साल की सजा सुनाई गई, लेकिन सभी ने हाई कोर्ट में अपील की और सजा रोक दी गई।

CBI ने कई मामलों को 2016-17 के बीच चुपचाप बंद कर दिया। एक हाई प्रोफाइल केस में लंदन की इवेंट नॉलेज सर्विसेज को 70 करोड़ रुपए के कान्ट्रैक्ट देने में गड़बड़ी के आरोप थे, लेकिन सबूत नहीं मिलने पर केस बंद कर दिया गया।

दो ठेकेदारों को 2017 में स्टेडियम निर्माण में गड़बड़ी के लिए सजा हुई। लेकिन इसमें शामिल सरकारी अधिकारी बरी कर दिए गए। इसी साल स्कोरिंग सिस्टम वाले केस में 11 आरोपितों (जैसे कलमाड़ी और भनोट) को कोर्ट ने बरी कर दिया क्योंकि प्रमाण नहीं मिल सके।

2020 से 2025 के बीच, ज्यादातर केस या तो बंद हो गए या कोर्ट में लटक गए। 19 में से 11 केस CBI ने बिना आरोप तय किए बंद कर दिए। सिर्फ 2 मामलों में सजा हुई, जिनमें अपील चल रही है और किसी को अब तक जेल नहीं हुई।

दिल्ली की एक कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) की अंतिम रिपोर्ट स्वीकार की, जिसमें कहा गया कि कलमाड़ी, भनोट या किसी अन्य के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का कोई मामला नहीं बनता। जज ने कहा कि CBI पहले ही केस बंद कर चुकी है, इसलिए कोई ‘अपराध से अर्जित धन’ साबित नहीं हो सका।

15 साल बाद भी, इस बड़े घोटाले में कोई शीर्ष अधिकारी दोषी नहीं ठहराया गया। इससे भारत की जाँच प्रक्रिया और न्याय प्रणाली की कमजोरियाँ उजागर हुई हैं। 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स को भले ही भारत ने सफलतापूर्वक आयोजित किया हो, लेकिन इससे जुड़ी भ्रष्टाचार की कहानी और लंबी कोर्ट लड़ाई भारत की छवि पर अब भी एक धब्बा बनी हुई है।

प्रमुख खिलाड़ी और भ्रष्टाचार का व्यापक स्तर

कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 के घोटाले में केंद्र में उस समय के कॉन्ग्रेस सांसद सुरेश कलमाड़ी थे, क्योंकि उनके पास गेम्स से जुड़ी ठेकेबाज़ी और खर्चों पर बड़ा नियंत्रण था। कलमाड़ी एक अनुभवी खेल प्रशासक माने जाते थे। उनके साथ आयोजन समिति के महासचिव ललित भनोट और महानिदेशक वी के वर्मा जैसे नजदीकी सहयोगी भी थे। इनके अलावा टी एस दरबारी, एम जयरचंद्रन और दिल्ली की कई सरकारी एजेंसियों के अधिकारी भी आयोजन की तैयारियों में शामिल थे।

आरोपों के अनुसार इस घोटाले में बड़े पैमाने पर वित्तीय गड़बड़ी हुई। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, इस घोटाले में लगभग 70,000 करोड़ रुपए की गड़बड़ी की आशंका है, जो कि पूरी गेम्स की अनुमानित लागत के बराबर है। इससे 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स इतिहास के सबसे महंगे गेम्स बन गए।

तुलना करें तो 2006 में ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में हुए पिछले CWG पर सिर्फ 7,000 करोड़ रुपए से भी कम खर्च हुआ था। CAG की रिपोर्ट में बताया गया कि 2003 से 2010 के बीच लागत 15 गुना तक बढ़ गई और इस पर किसी भी स्तर पर सही तरीके से नियंत्रण नहीं रखा गया।

खर्चों में बढ़ोतरी लगभग हर क्षेत्र में देखी गई। कनॉट प्लेस के नवीनीकरण का खर्च 76 करोड़ से बढ़कर 671 करोड़ रुपए हो गया। स्ट्रीट लाइटिंग परियोजना का बजट 13 करोड़ से बढ़कर 37 करोड़ पहुँच गया। CAG के अनुसार, सौंदर्यीकरण के नाम पर 101 करोड़ रुपए फिजूल में खर्च कर दिए गए। कई ठेके जरूरत से ज्यादा दरों पर, मनचाही कंपनियों को दिए गए। CVC ने भी खेलों से पहले ही चेतावनी दी थी कि लागतें बहुत अधिक बताई जा रही हैं।

मीडिया में कई चौंकाने वाले उदाहरण सामने आए, जैसे टॉयलेट पेपर रोल्स के लिए 4,000 रुपए प्रति पीस और छातों के लिए 6,000 रुपए प्रति छाता का बिल लगाया गया। CAG ने कहा कि जानबूझकर काम में देरी की गई ताकि बाद में ‘तत्काल जरूरत’ दिखाकर नियमों को दरकिनार कर दिया जाए और सीधे महँगे सौदे किए जा सकें।

सबसे चर्चित मामलों में से एक था 141 करोड़ रुपए का TSR (Timing, Scoring, Results) सिस्टम, जिसका ठेका स्विस कंपनी Swiss Timing को दिया गया था, जबकि इसकी असली लागत केवल 50 करोड़ रुपए थी। यानी इस अनुबंध में करीब 90 करोड़ रुपए की अनियमितता पाई गई।

गेम्स विलेज का निर्माण Emaar MGF ने किया था, जिसमें कई गड़बड़ियाँ सामने आईं। जब यह प्रोजेक्ट फंसा तो दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) को 766 करोड़ रुपए लगाकर इसे बचाना पड़ा। बाद में इसकी कई यूनिट्स को व्यावसायिक रूप से बेच दिया गया, जिस पर भी सवाल उठे।

लंदन में हुई क्वीन की बैटन रिले यात्रा के दौरान भी घोटाले के आरोप लगे। इसमें बिना किसी टेंडर प्रक्रिया के कुछ गुमनाम ब्रिटिश कंपनियों को 3.8 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया, जो कथित तौर पर  सुरेश कलमाड़ी के एक करीबी की व्यक्तिगत सिफारिश पर किया गया था। CAG ने इन भुगतानों को बेहद संदिग्ध करार दिया।

कुल मिलाकर सिर्फ 12 दिन के इस खेल आयोजन के लिए 18,000 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च कर दिए गए। इसके बाद कॉमनवेल्थ गेम्स भारत में सरकारी भ्रष्टाचार, अफसरशाही की लापरवाही और अनियंत्रित खर्च का प्रतीक बन गए।

बुनियादी ढांचे में देरी, बढ़ी हुई लागत और राष्ट्रीय शर्मिंदगी

अक्टूबर 2010 से पहले के हफ्तों में, दिल्ली की तैयारियों की कमी ने पूरी दुनिया में सुर्खियाँ बटोरीं। खेलों का आयोजन द्वितीय पृष्ठ पर चला गया और हर कोई भारत की अव्यवस्था की चर्चा करने लगा। लगभग हर कॉमनवेल्थ गेम्स (CWG) प्रोजेक्ट में देरी थी। कई खेल स्थल या तो अधूरे थे या उद्घाटन समारोह से ठीक पहले हड़बड़ी में पूरे किए जा रहे थे।

मुख्य खेलों और समारोहों का स्थल जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम समय पर बस किसी तरह तैयार हो पाया। वहीं, शिवाजी स्टेडियम, जिसे हॉकी प्रशिक्षण स्थल बनना था, 2012 में यानी खेलों के दो साल बाद पूरा हुआ। सितंबर 2010 तक भी आयोजक बुनियादी ढाँचे को पूरा करने के लिए दौड़-भाग कर रहे थे, जिससे भारत की मेज़बानी पर सवाल उठने लगे।

21 सितंबर को सबसे शर्मनाक और गंभीर घटना हुई, जब नेहरू स्टेडियम के बाहर बना नया फुटओवर ब्रिज गिर गया। यह पुल 10.5 करोड़ रुपए की लागत से बनाया जा रहा था। हादसे के समय मजदूरों द्वारा कंक्रीट डाला जा रहा था। इस दुर्घटना में 27 मजदूर घायल हुए, जिनमें से पाँच की हालत गंभीर थी और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।

पुल के मलबे की तस्वीरें अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियाँ बन गईं। दिल्ली के लोक निर्माण मंत्री (PWD) ने माना कि पुल में संरचनात्मक कमजोरी थी। स्थिति इतनी खराब हो गई कि सेना को तुरंत बुलाना पड़ा। एक हजार सैनिकों और इंजीनियरों ने केवल चार दिन में एक अस्थाई ‘बेली ब्रिज’ तैयार किया, जिसे 29 सितंबर को प्रशासन को सौंपा गया। सेना की ये कार्रवाई एक नागरिक संकट में बचाव अभियान के रूप में देखी गई।

खिलाड़ियों के ठहरने के लिए यमुना नदी के किनारे बनाया गया ‘एथलीट्स विलेज’ 6,500 खिलाड़ियों और अधिकारियों के लिए बनाया गया था। लेकिन स्कॉटलैंड और न्यूजीलैंड की शुरुआती टीमों ने इसे मानव निवास के लायक नहीं बताया। उन्होंने शिकायत की कि वहाँ पानी भरा हुआ था, गंदगी फैली थी, जंगली कुत्ते घूम रहे थे, नल और पाइपिंग खराब थी और बिजली की तारें खुली पड़ी थीं। कई टीमों ने तो प्रतियोगिता में हिस्सा न लेने या आने में देरी करने की धमकी दी।

दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी ने स्थिति संभालने की कोशिश की। सफाई दल तैनात किए गए और खुद दीक्षित ने निगरानी की। अधिकारियों ने स्थिति के लिए मजदूरों को दोषी ठहराया और दावा किया कि कुछ ही दिनों में सब कुछ सही कर दिया जाएगा। लेकिन यह सफाई अभियान तब चला जब अंतरराष्ट्रीय आलोचना हो चुकी थी। इंग्लैंड और कनाडा की टीमें पहले होटलों में ठहरीं और बाद में, अंतिम समय पर सुधारों के बाद, विलेज में आईं।

CAG की रिपोर्ट के अनुसार, खराब योजना और आखिरी समय की हड़बड़ी के कारण खर्च कई गुना बढ़ गया, जिसे रोका जा सकता था। दुनिया भर की मीडिया ने भारत की इस अव्यवस्था को उजागर किया और भारत की तुलना चीन के 2008 के शानदार बीजिंग ओलंपिक से की, जिससे भारत की छवि को गहरा नुकसान पहुँचा।

कैग रिपोर्ट और खुलासे जिसने भारत को चौंका दिया

जहाँ एक ओर मीडिया रिपोर्ट्स और विपक्ष की आलोचना पहले से ही चर्चा में थीं, वहीं असली झटका तब लगा जब 5 अगस्त 2011 को संसद में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट पेश की गई। यह रिपोर्ट 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स से जुड़ी बड़े पैमाने पर हुई गड़बड़ियों और भ्रष्टाचार की पहली आधिकारिक पुष्टि थी।

इसमें CWG 2010 की परफॉर्मेंस ऑडिट बेहद कठोर थी और उसने आयोजन समिति के साथ-साथ केंद्र और राज्य सरकारों की कई एजेंसियों को भी कटघरे में खड़ा किया। रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि पूरे आयोजन में नियमों की अनदेखी, चहेते ठेकेदारों को फायदा पहुँचाना और प्रशासनिक विफलताएँ आम बात थीं। इस रिपोर्ट के बाद पूरे देश में हलचल मच गई और कई जिम्मेदार लोगों पर सवाल उठने लगे।

सीएजी रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष

CAG (नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक) की रिपोर्ट ने दिखाया कि कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 के दौरान लागत में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई, लेकिन इस पर किसी स्तर पर नियंत्रण नहीं रखा गया। 2003 में गेम्स की अनुमानित लागत सिर्फ 1,200 करोड़ रुपए थी, लेकिन 2010 तक यह बढ़कर 18,532 करोड़ रुपए हो गई।

CAG ने कहा कि सरकार ने हर स्तर पर लागत को न तो दोबारा जाँचा और न ही रोकने की कोशिश की। इससे आयोजन समिति (OC) को बिना किसी जवाबदेही के असीमित सरकारी फंडिंग मिलती रही। रिपोर्ट में इसे वित्तीय अनुशासन का पूरी तरह टूट जाना कहा गया।

CAG ने यह भी बताया कि फैसलों में जानबूझकर देरी की गई, ताकि बाद में ‘तत्काल जरूरत’ दिखाकर टेंडरिंग प्रक्रिया को दरकिनार किया जा सके। इससे कई ठेके सीधे दिए गए या मनचाही कंपनियों को लाभ पहुँचाया गया। ये सभी कार्य नियमित प्रतिस्पर्धी प्रक्रियाओं से हटकर किए गए, जो पूरी व्यवस्था की गंभीर खामी को दिखाते हैं।

रिपोर्ट में बताया गया कि सुरेश कलमाड़ी को 2004 में प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) की सिफारिश पर CWG आयोजन समिति का अध्यक्ष बनाया गया, जबकि तत्कालीन खेल मंत्री सुनील दत्त ने इसका विरोध किया था। PMO ने बाद में किसी गलती से इनकार किया, लेकिन CAG ने इसे एक बड़ी चूक बताया। इस फैसले ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी सवालों के घेरे में ला दिया, हालांकि उन्हें किसी आपराधिक आरोप में नहीं घसीटा गया।

CAG ने यह भी पाया कि हॉकी टर्फ, ट्रैक सतह और स्ट्रीट लाइटिंग जैसी चीजों के ठेके विदेशी कंपनियों को बिना निष्पक्ष तुलना के दिए गए। उदाहरण के लिए, विदेश से मंगाई गई स्ट्रीट लाइटें भारत में उपलब्ध लाइटों की तुलना में दो गुना महँगी थीं और दस्तावेजों से पता चला कि इसमें दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की भूमिका रही थी।

गेम्स विलेज के लिए Emaar MGF को दिया गया ठेका और लंदन में क्वीन बैटन रिले से जुड़े खर्चों में भी नियमों की गंभीर अनदेखी हुई। ब्रिटेन की कंपनी AM Films और SIS Live को बिना पारदर्शिता के करोड़ों रुपए के कांट्रैक्ट दिए गए। खासतौर पर Rs 246 करोड़ का ब्रॉडकास्टिंग कॉन्ट्रैक्ट, जिस पर शुंगलू समिति ने आपराधिक कार्रवाई की सिफारिश की।

CAG ने बताया कि आयोजन की निगरानी के लिए कई ओवरलैपिंग कमेटियाँ बनाई गईं, जिससे जिम्मेदारी तय नहीं हो पाई। एक भी एजेंसी अकेले जवाबदेह नहीं थी, जिससे चेतावनियों पर समय से कार्रवाई नहीं हो सकी और कामकाज में समन्वय की कमी बढ़ती गई।

रिपोर्ट में ठेकों की दरें बढ़ाने, फर्जी टेंडरों और दस्तावेजों में छेड़छाड़ जैसे गंभीर आरोपों का भी उल्लेख किया गया। उदाहरण के तौर पर, किसी सामान की टेंडर दर Rs 800 से बढ़ाकर Rs 1,800 कर दी गई। कुछ मामलों में टेंडर नियमों को तोड़ने के लिए ठेके टुकड़ों में बांटे गए। कई बार बदले गए दस्तावेजों की फॉरेंसिक जाँच तक नहीं करवाई गई।

हालाँकि CAG की भाषा संयमित थी, लेकिन उसकी रिपोर्ट की गंभीरता को छुपाया नहीं जा सका। इस रिपोर्ट ने जनता के उस शक की पुष्टि कर दी कि गेम्स में भारी बर्बादी, पक्षपात और कुप्रशासन हुआ है। रिपोर्ट के सामने आते ही राजनीतिक भूचाल आ गया और विपक्ष ने जवाबदेही की माँग शुरू कर दी।

इसी दौरान शुंगलू समिति ने भी अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल तक को विलंब और लागत बढ़ने के लिए जिम्मेदार ठहराया गया।

हालाँकि CAG रिपोर्ट ने घोटाला जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया, लेकिन यह साफ संकेत दिया कि पूरा सिस्टम विफल हो गया था। इस रिपोर्ट की गूंज सिर्फ CWG तक सीमित नहीं रही, यह भारत की संस्थागत कमजोरियों का प्रतीक बन गई।

कुछ मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कॉन्ग्रेस के अंदर के लोग भी निजी रूप से इस नुकसान को मानने लगे थे। संसद में कानून मंत्री सलमान खुर्शीद का बचाव कमजोर साबित हुआ और यह पूरा मामला राजनीतिक बदलाव और सुधार की जरूरत का प्रतीक बन गया।

राजनीतिक परिणाम – यूपीए सरकार को जनता के आक्रोश का सामना कैसे करना पड़ा

कॉमनवेल्थ गेम्स (CWG) घोटाला कॉन्ग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के लिए एक बड़ी राजनीतिक परेशानी बन गया था। उस समय कॉन्ग्रेस पहले से ही 2G स्पेक्ट्रम घोटाले जैसे अन्य भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर आलोचना झेल रही थी। 2010 से 2011 के बीच जनता का गुस्सा तेजी से बढ़ा  मीडिया के खुलासे, CAG की रिपोर्ट और शुंगलू समिति की लगातार रिपोर्टों ने हालात और बिगाड़ दिए।

इसी दौर में उस समय देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने सरकार के खिलाफ जबरदस्त अभियान चलाया। बीजेपी नेताओं ने कॉन्ग्रेस पर ‘राष्ट्रीय सम्मान को नुकसान पहुँचाने’ का आरोप लगाया और तत्कालीन दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के इस्तीफे की माँग की। पार्टी प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने कहा कि अगर दीक्षित इस्तीफा नहीं देतीं, तो उन्हें हटाया जाना चाहिए।

सरकार पर हमले इतने तीखे थे कि कॉन्ग्रेस नेताओं ने एक-दूसरे पर आरोप लगाना शुरू कर दिया। कलमाड़ी और दीक्षित के बीच खुली तकरार हुई, जिससे कॉन्ग्रेस पार्टी को बीच में आकर दोनों को चुप रहने के लिए कहना पड़ा।

वहीं डॉ मनमोहन सिंह के दफ्तर से भी सवाल पूछे गए कि कलमाड़ी की नियुक्ति कैसे हुई, जब तत्कालीन खेल मंत्री सुनील दत्त ने इस पर आपत्ति जताई थी। कॉन्ग्रेस ने बचाव में कहा कि CAG ने ‘भ्रष्टाचार’ शब्द का इस्तेमाल नहीं किया है और कानून की प्रक्रिया चलने दी जानी चाहिए, लेकिन जनता का गुस्सा कम नहीं हुआ।

समाजसेवी अन्ना हज़ारे ने अप्रैल 2011 में लोकपाल बिल की माँग को लेकर भूख हड़ताल शुरू की। यह आंदोलन कई घोटालों खासकर CWG और 2G  से नाराज जनता के समर्थन से तेजी से बढ़ा। इसी महीने सुरेश कलमाड़ी को गिरफ्तार किया गया और कॉन्ग्रेस ने उन्हें पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित कर दिया। उस समय तक उन पर आधिकारिक आरोप नहीं थे, लेकिन वो अपने गृहनगर पुणे में राजनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ गए।

प्रदर्शन और राजनीति में उठापटक का असर 2014 के आम चुनावों तक देखने को मिला। 2013 में बीजेपी ने चुनावी अभियान शुरू किया और UPA के कथित घोटाले जिनमें CWG प्रमुख था प्रचार का मुख्य मुद्दा बने।  

नरेंद्र मोदी, जो अब राष्ट्रीय नेता बन चुके थे, उन्होंने अपनी रैलियों में CWG घोटाले को लेकर कॉन्ग्रेस पर हमला किया। एक भाषण में उन्होंने कहा कि “एक देश खेल के ज़रिये दुनिया में सम्मान कमाता है और दूसरा अपमान” यह तुलना भारत के CWG और दक्षिण कोरिया के ओलंपिक आयोजन को लेकर की गई थी।

इसी साल दिल्ली विधानसभा चुनाव हुए, जिसमें कॉन्ग्रेस को आम आदमी पार्टी (AAP) से भारी हार का सामना करना पड़ा। AAP ने कॉन्ग्रेस के समर्थन से कुछ महीनों के लिए सरकार बनाई, लेकिन शीला दीक्षित का चुनाव हार जाना कॉन्ग्रेस के लिए बड़ा झटका था और इसमें CWG घोटाले की अहम भूमिका रही।

कुछ सालों बाद जब मुकदमे कमजोर पड़े और आरोपितों को राहत मिलनी शुरू हुई, तो कॉन्ग्रेस ने कहना शुरू कर दिया कि यह सब राजनीतिक साजिश थी। 2025 में, पुणे में कॉन्ग्रेस नेताओं ने कलमाड़ी की बरी होने और ईडी केस के बंद होने को सबूत बताते हुए कहा कि CWG घोटाला राजनीतिक रूप से प्रेरित आरोप था।

लेकिन इसके बावजूद, CAG और शुंगलू समिति की रिपोर्टें आज भी यह दिखाती हैं कि उस समय व्यवस्था पूरी तरह विफल थी। जनता की नजर में, CWG घोटाला आज भी कुप्रशासन और भ्रष्टाचार का प्रतीक बना हुआ है।

परिणाम – परीक्षण, गिरफ्तारियाँ और दोषसिद्धि

कॉमनवेल्थ गेम्स (CWG) घोटाले से जुड़े कानूनी नतीजे लंबे, जटिल और निराशाजनक रहे। हालाँकि शुरुआत में जाँच तेजी से हुई और मुकदमे जल्द शुरू हो गए थे, लेकिन जवाबदेही तय करने में व्यवस्था पूरी तरह फेल रही। 2010 से 2012 के बीच CBI ने घोटाले के विभिन्न पहलुओं पर कुल 19 FIR दर्ज की थीं। सुरेश कलमाड़ी, वी के वर्मा और अन्य पर षड्यंत्र, धोखाधड़ी, जालसाजी और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए। कलमाड़ी और वर्मा को अप्रैल 2011 से जनवरी 2012 तक जेल में रहना पड़ा, इसके बाद उन्हें जमानत मिली।

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने भी इनके खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों में जाँच शुरू की। कई मामलों में रोज़ाना सुनवाई भी हुई, लेकिन भारी दस्तावेज़ी बोझ, गवाहों की अनुपलब्धता और कानूनी प्रक्रिया की देरी के कारण मामले धीरे-धीरे ठंडे पड़ गए। एक मामले में तो छेड़छाड़ किए गए टेंडर दस्तावेजों को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा ही नहीं गया, जिससे कोर्ट ने नाराज़गी जताई।

अब तक सिर्फ दो मामलों में छह लोगों को दोषी ठहराया गया, लेकिन वे मामले दिल्ली हाई कोर्ट में अपील के तहत विचाराधीन हैं और दोषियों की सजा पर रोक लगी हुई है। ज्यादातर मुख्य मामले या तो बंद हो गए या फिर अभियुक्त बरी हो गए। 2016 में, CBI ने स्विमिंग पूल कॉम्प्लेक्स मामले को सबूतों की कमी के कारण बंद कर दिया। 2017 में, सबसे अहम TSR कॉन्ट्रैक्ट से जुड़े मुकदमे में कलमाड़ी, भानोट और सभी आरोपित को बरी कर दिया गया, क्योंकि कोर्ट ने कहा कि कोई आपराधिक साजिश साबित नहीं हुई। इसी मामले से जुड़े ED के केस को भी 2025 में बंद कर दिया गया, क्योंकि कोर्ट ने माना कि मनी लॉन्ड्रिंग का कोई ठोस सबूत नहीं है।

अब तक किसी भी बड़े राजनीतिक व्यक्ति (राजनेता) को दोषी नहीं ठहराया गया, जिससे यह साफ हो गया कि जाँच में खामियाँ, सबूतों की कमी और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी ने सिस्टम की विफलता को उजागर किया है।

आज जहाँ कॉन्ग्रेस खुद को निर्दोष साबित करने की कोशिश कर रही है, वहीं बीजेपी और अन्य विपक्षी दल अब भी CAG और CVC की रिपोर्टों को भ्रष्टाचार के सबूत के रूप में सामने रखते हैं। भले ही कानूनी सज़ा न हुई हो, लेकिन जनता की नजर में CWG घोटाला अब भी भारतीय सिस्टम की विफलता और लापरवाही का प्रतीक बना हुआ है।

सबक सीखा या भुला दिया? बड़े आयोजनों में जवाबदेही

कॉमनवेल्थ गेम्स (CWG) जो 2010 के घोटाले के बाद कई बदलाव हुए। सुधारों की बात तो हुई, लेकिन उन्हें सही तरीके से लागू नहीं किया गया। कैग (CAG) की रिपोर्ट में सबसे बड़ी गलती यह बताई गई कि किसी एक केंद्रीय समन्वय संस्था की कमी के कारण पूरे आयोजन में अव्यवस्था फैली।

इसके बाद मोदी सरकार के कार्यकाल में हुए 2016 के साउथ एशियन गेम्स और 2017 के फीफा अंडर-17 वर्ल्ड कप जैसे आयोजनों को बेहतर निगरानी और सख्त नियंत्रण के साथ संभाला गया।

उस समय 2011 में खेल मंत्री अजय माकन ने नेशनल स्पोर्ट्स बिल पेश किया था। इसमें भारतीय ओलंपिक संघ (IOA) जैसे खेल संगठनों को ऑडिट और सूचना के अधिकार (RTI) के दायरे में लाने का प्रस्ताव था, जिससे पारदर्शिता आ सके। लेकिन इस बिल को विरोध के कारण पास नहीं किया जा सका।

CAG की 2009 में जो शुरुआती रिपोर्ट पहले नजरअंदाज कर दी गई थी, वह बाद में एक चेतावनी बन गई। इसके बाद योजना आयोग और प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने दिशा-निर्देश जारी किए कि भविष्य में समय पर ऑडिट हो और शुरुआती चेतावनियों को नजरअंदाज न किया जाए।

सुरेश कलमाड़ी को हटाया गया और IOC (इंटरनेशनल ओलंपिक कमेटी) ने उन्हें बैन कर दिया। IOA को भी 2012 में दूसरी गड़बड़ियों के चलते निलंबित  कर दिया गया था। फिर 2014 में IOA ने एक नया संविधान अपनाया जिसमें निगरानी तंत्र को मजबूत किया गया। अब पीटी उषा जैसी पूर्व खिलाड़ी इस संगठन की अध्यक्ष हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि भारत अब ओलंपिक जैसे आयोजनों की तैयारी में ज्यादा गंभीर है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बदलाव हुए। कॉमनवेल्थ गेम्स फेडरेशन (CGF) ने भी आगे के आयोजकों के लिए कड़े नियम और निगरानी प्रणाली बनाई। इससे ग्लासगो 2014 और गोल्ड कोस्ट 2018 गेम्स की तैयारियों में सुधार दिखा। हालांकि, हाल के सालों में कुछ आयोजक देशों को लागत के कारण पीछे हटना पड़ा। डरबन (2022) और विक्टोरिया (2026) ने खेलों की मेज़बानी से मना कर दिया। इसके बाद CGF ने खेलों की संख्या घटाकर 10 कर दी ताकि खर्च कम हो सके।

2010 के घोटाले ने भारत को कई सबक सिखाए, लेकिन सुधार अब भी अधूरे और बिखरे हुए हैं। सरकार अब डिजिटल खरीद प्रक्रिया और निजी क्षेत्र की विशेषज्ञता की बात कर रही है, लेकिन 2030 के कॉमनवेल्थ गेम्स भारत के लिए एक मौका हैं यह साबित करने का कि हमने पिछली गलतियों से सच में सीखा है, वरना इतिहास खुद को दोहरा सकता है।

इस बार क्या अलग है – नई पारदर्शिता और निगरानी रूपरेखा

भारत ने 2030 के कॉमनवेल्थ गेम्स (CWG) की मेज़बानी के लिए जो दावेदारी पेश की, उसमें यह साफ कहा गया कि 2010 जैसी गलतियाँ दोहराई नहीं जाएँगी। भारत सरकार और कॉमनवेल्थ गेम्स फेडरेशन (CGF)  दोनों ने इस बार पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए कई सुधारों की बात की है।

हालाँकि इस बार भारत को तैयारी के लिए कम समय मिल रहा है, फिर भी तैयारियाँ समय पर चल रही हैं। अच्छी बात यह है कि कई खेल स्थलों पहले से मौजूद हैं या फिर उन्हें 2036 ओलंपिक के आयोजन की बिडिंग के लिए तैयार किया जा रहा है। इसका मतलब है कि 2010 जैसी अंतिम समय की अव्यवस्था और हड़बड़ी वाली निर्माण योजनाएँ नहीं होंगी।

मोदी सरकार ने इस बार ई-प्रोक्योरमेंट (डिजिटल टेंडर प्रणाली) और खुली निविदाओं को अपनाया है, जिससे खर्च और अनुबंधों में पारदर्शिता बनी रहेगी। वहीं, CGF की निगरानी प्रणाली भी पहले से ज्यादा सख्त हो गई है।

जनता, मीडिया और नागरिक निगरानी की भूमिका भी अब 2010 की तुलना में कहीं अधिक सक्रिय है। अगर कोई अनुचित खर्च या देरी होती है, तो वह तुरंत राष्ट्रीय खबर बन जाती है, जिससे जिम्मेदार लोगों पर दबाव बढ़ता है।

राजनीतिक दाँव भी इस बार ज्यादा ऊँचे हैं। सरकार के लिए 2030 CWG सिर्फ एक खेल आयोजन नहीं, बल्कि भारत के 2036 ओलंपिक की दावेदारी का पहला कदम है। गृहमंत्री अमित शाह समेत केंद्र सरकार के शीर्ष स्तर के नेता खुद योजना और निगरानी में शामिल हैं, जिससे लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं बचती। इस बार का मकसद साफ है, भारत को एक दुनिया के भरोसेमंद खेल आयोजक के रूप में पेश करना।

2030 का रास्ता – क्या भारत अपनी छवि सुधार पाएगा?

भारत को 2030 कॉमनवेल्थ गेम्स की मेज़बानी मिलने से 2010 की बदनाम छवि को सुधारने का एक बड़ा मौका मिला है। अब आने वाले पाँच साल में तैयारी और आयोजन की गुणवत्ता यह तय करेगी कि भारत पर जो भरोसा जताया गया है, वह सही था या नहीं।

अगर ये गेम्स समय पर बिना भ्रष्टाचार और देरी के सफलतापूर्वक आयोजित किए जाते हैं, तो भारत न सिर्फ 2010 की नकारात्मक छवि से बाहर निकल सकेगा, बल्कि यह भी साबित कर देगा कि वह ओलंपिक जैसे बड़े आयोजनों के लिए पूरी तरह तैयार है। भारत एक ऐसा देश बनना चाहता है जो विश्व में खेल आयोजनों के लिए पसंदीदा गंतव्य  बन जाए।

भारत के लिए इस सफलता का लंबे समय का असर भी महत्वपूर्ण है। 2010 दिल्ली CWG के बाद वहाँ बना इन्फ्रास्ट्रक्चर पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हो पाया। लेकिन अगर अहमदाबाद में बहुउद्देश्यीय स्टेडियम, बेहतर शहरी सेवाएँ और टिकाऊ विकास हो पाया, तो यह आयोजन शहर के लिए लंबे समय के फायदे ला सकता है। हालांकि यह सब पारदर्शिता और खर्च पर नियंत्रण के दायरे में ही होना चाहिए।

2030 भारत के लिए दूसरा मौका है। इस बार नई पीढ़ी की अगुआई में, डिजिटल तकनीकों और पिछली गलतियों से सीखी गई सीखों के साथ तैयारी हो रही है। अगर यह पीढ़ी सफल होती है, तो 2030 का उद्घाटन समारोह भारत के लिए पूरा चक्र पूरा करने जैसा क्षण बन सकता है, जहाँ से देश पुरानी शर्म से निकलकर, ईमानदारी और क्षमता के साथ वैश्विक मंच पर अपनी नई पहचान बना सकेगा।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)