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जब तक तुष्टिकरण में डूबे राजनीतिक दल सत्ता के लालच में इस्लामी कट्टरपंथियों को संरक्षण देंगे, तब तक हिंदू त्योहारों पर पत्थर चलते रहेंगे

नवरात्रि और दशहरा बीत गया है। एक बार फिर इस्लामी कट्टरपंथियों ने हिंदू आस्था को अपने आतंक से डराने की पूरी कोशिश की। हर बार की तरह वही कहानी फिर दोहराई गई, श्रद्धा और शोभायात्राओं के बीच कट्टरपंथियों ने पत्थरों की बारिश शुरू कर दी। कहीं, काँच की बोतलें फेंकी गईं। हर बीतते साल के साथ हिंदू त्योहारों पर कट्टरपंथियों की हिंसा बढ़ती जा रही है।

किसने पत्थर फेंके ये तो हमने देख लिया लेकिन फिर एक सवाल सामने आता है कि पत्थर क्यों फेंके गए? हर बार निशाने पर सिर्फ हिंदू त्योहार ही क्यों आते हैं? क्या कभी किसी ने सुना कि हनुमान चालीसा पढ़ने गए लोगों ने किसी पर पथराव किया हो? नहीं सुना, क्योंकि यह असहिष्णुता एकतरफा है।

नेपाल में भी दुर्गा विसर्जन के दौरान शोभायात्रा पर हमला किया गया। इससे साफ पता चलता है कि यह भारत की समस्या नहीं है बल्कि यह एक मानसिकता की समस्या है। यह मानसिकता क्या है? यह मानसिकता अपने मजहब को दूसरों की आस्था के ऊपर दिखाने की जिद है। यह मजहबी कट्टरता के साथ-साथ अपनी पहचान को आक्रामकता से दिखाने का सवाल भी है।

पहचान के संकट ने कट्टरपंथियों के अकीदे को हिंसा का हथियार बना दिया है। जब किसी समाज का एक हिस्सा अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और अपने भविष्य पर भरोसा खो देता है, तो वह अपनी असुरक्षा को आक्रामकता से ढकने की कोशिश करता है।

त्यौहारों पर झंडे लहराने वाले, पत्थर चलाने वाले और नारे लगाने वाले खुद को बहादुर समझते हैं जबकि असल में वे अपनी पहचान के संकट को चीख-चीखकर जाहिर कर रहे होते हैं।

भारत में यह प्रवृत्ति केवल सामाजिक नहीं रही, इसे राजनीतिक संरक्षण मिला है, जिससे यह और भी खतरनाक होती जा रही है। यह कट्टरपंथ राजनीति की गोद में पल रहा है। वोट बैंक की लालच में राजनीतिक दलों ने वर्षों से इस असहिष्णुता को ‘संवेदनशीलता’ का नाम दिया है।

देश में लगभग 15-16 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं, और यही संख्या कई राज्यों में जीत-हार तय कर सकती है। यही वजह है कि राहुल गाँधी हों या अखिलेश यादव, ममता बनर्जी हों या असदुद्दीन ओवैसी ये सब एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में लगे हैं कि कौन खुद को बड़ा ‘मुस्लिम हितैषी’ दिखा सके।

बरेली में हाल में जो हुआ, वह इसका ताजा उदाहरण है। I Love Muhammad के नाम पर दंगाइयों ने उपद्रव किया। पुलिस पर गोली चलाई गईं, पत्थराव किया गया। जिसके बाद समाजवादी पार्टी का दल वहाँ दौड़ पड़ा, वो भी आरोपितों का पक्ष लेने के लिए। इन्हें दंगाई बेगुनाह नजर आते हैं और पुलिस-प्रशासन को ये अत्याचारी बताते हैं।

यह वही राजनीति है जिसने दंगाइयों को यह भरोसा दिला दिया है कि चाहे कुछ भी कर लो, ‘वोट बैंक’ के लिए कुछ दल तुम्हारे साथ खड़े हैं। तुम्हारे लिए वकील खड़े होंगे, तुम्हें बचाने वाले बयान आएँगे और मीडिया का एक हिस्सा तुम्हें पीड़ित दिखाने में जुट जाएगा।

यह सिलसिला नया नहीं है। दशकों से यही खेल चल रहा है। मजहब की आड़ में एक वर्ग ने आक्रामकता को सामान्य बना दिया है और यही सबसे खतरनाक है। क्योंकि जब समाज का कोई हिस्सा यह मान ले कि कानून से ऊपर उसकी मजहबी भावनाएँ हैं, तो फिर राज्य की सत्ता भी बेबस दिखने लगती है।

अब यह समझना होगा कि हर बार पत्थर चलने के बाद सिर्फ कुछ गिरफ्तारियाँ और बयान काफी नहीं हैं। यह मानसिकता तब तक नहीं बदलेगी जब तक समाज और राज्य मिलकर इसे वैचारिक स्तर पर चुनौती नहीं देंगे। यह कह देना कि ‘हर धर्म में कुछ कट्टर लोग होते हैं’ अब बहाना बन गया है।

क्योंकि यहाँ समस्या ‘कुछ’ की नहीं बल्कि एक मानसिकता की है जो हर उत्सव, हर धार्मिक पर्व पर आतंक का अपना चेहरा दिखाती है।

मंदिर की घंटी, पायल की खनक और देवता की हुंकार: ऋषभ शेट्टी की ‘कांतारा’ ने बदल दिया फिल्मों का ‘786’ वाला अवतार, ये मनोरंजन से बढ़कर सांस्कृतिक अनुष्ठान है

ऋषभ शेट्टी भारतीय सिनेमा की वह नायाब खोज हैं, जो केवल अभिनेता या निर्देशक भर नहीं, बल्कि एक संपूर्ण कथाशिल्पी हैं। उनके भीतर वह ग्राम्य लय है, जिसकी अनुगूँज किसी देवस्थान की ध्वनि की भाँति दूर तक फैली रहती है। यदि कांतारा मैं बनाता, तो सम्भवतः उन्हें परदे से एक पल भी ओझल न होने देता। किन्तु यह उनके कौशल का वैभव है कि वे ख़ुद को भी कहानी के भीतर एक पात्र की तरह भंग कर देते हैं, और परदे पर देवत्व, लोक और आस्था को केंद्र में स्थापित कर देते हैं।

जहाँ मुख्यधारा का भारतीय सिनेमा नायक को कभी किसी ‘बिल्ला नंबर 786’ के भरोसे बचाता है, जबकि मंदिर में न जाने की सौगंध जब उसने ली तो उसे ‘एंग्री यंग मैन’ का नाम दे दिया गया; मानो समाज से आक्रोशित युवा का यही चेहरा हो सकता है। या हमारा जो सिनेमा नायिका के आँसूओं से नायक के लिए मोक्ष लिख देता है, उस दौर में ऋषभ शेट्टी हमें ऐसे सिनेमा का अनुभव कराते हैं, जहाँ मंदिर की घंटी, पायल की खनक, और देवता की हुँकार ही कथा की रीढ़ है। कांतारा ने हमें याद दिलाया कि असली सुरक्षा तो लोक-देवता की हुंकार और प्रकृति की आभा में निहित है। गुलिगा और पंजुरली की गूँज जब सिनेमा-गृह की दीवारों से टकराती है, तो दर्शक के भीतर आदिम स्मृतियाँ जाग उठती हैं। यह संगीत आपको जकड़ता है, भीतर तक भिगो देता है।

कांतारा-चैप्टर 1 फ़िल्म का सबसे बड़ा आकर्षण उसका संगीत है। यह संगीत किसी एक भाव को साधता नहीं, बल्कि पूरा लोक रचता है। कभी यह ढोल की थाप है, कभी पायल की झंकार, कभी देवता की हुंकार और इन सबके बीच शून्य का मौन भी। यह वही है, जैसा कि मैंने कांतारा की पहली फिल्म समीक्षा में कहा था कि जिसे कीट्स ने “Full Throated Ease” कहा था; एक सहज, उदात्त, पूर्ण स्वर।

सिनेमेटोग्राफी यहाँ दैव-आभा का आलोक है। लाल माटी से ढँके गाँव, वर्षा में भीगी वन-भूमि, और अंधकार में छिपे दृश्य, ये सब मिलकर दर्शक को स्मरण कराते हैं कि सिनेमा का सबसे बड़ा चमत्कार उसकी दृश्य-भाषा है, न कि केवल उसके संवाद।

कथा का आरम्भ उसी राजा से है, समृद्ध किन्तु अशांत, वह राजा, जिसके पास सब कुछ है, पर शांति नहीं।

जो अपने आँसुओं को एक लोक देवता के चरणों में अर्पित करता है। यह समर्पण ही उसके अहंकार का पराभव है। परन्तु इस बार कथा और गहरी है। आस्था को नष्ट करने के प्रयास भी आस्था के सहारे ही किए जाते हैं। मानो आस्था के भीतर ही आस्था का प्रतिपक्ष छिपा हो।

कहानी बताती है कि जहाँ उजाला है, वहाँ अंधेरा भी होगा। जहाँ श्रद्धा है, वहीं संशय भी जन्म लेगा। फ़िल्म के पहले आधे हिस्से में यह संघर्ष धीरे-धीरे बुना जाता है। इंटरवल के बाद लोककथा का वेग अब अपने चरम पर है, लोककथा का वाद्य अब पूर्ण उग्रता से बज उठा और घटनाओं की गति अचानक तीव्र हो जाती है। 

ऋषभ शेट्टी की अदाकारी यहाँ चरमोत्कर्ष पर है। वे अभिनेता से अधिक स्वयं एक प्रतीक हो जाते हैं। उनकी आँखों का विस्मय, उनका भय और उनका समर्पण, सब कुछ दर्शक को अपने वश में कर लेता है। 

भारतीय ग्राम्य जीवन, चाहे वह कर्नाटक के तुलु भूभाग में हो या उत्तराखंड की हिमालयी घाटियों में; देवता और प्रकृति का यही सम्मिलित लोक-विश्वास है। हर पत्थर, हर जलधारा, हर वृक्ष सबमें देवत्व का निवास मानना। हर स्वप्न में कोई संदेश सुन लेना। यही हमारी सभ्यता का साझा सांस्कृतिक बोध है।

कांतारा-चैप्टर 1 यही याद दिलाता है कि ग्रामीण अंचलों में आस्था किसी शास्त्रीय पुस्तक से नहीं आती, बल्कि लोक अनुभव से जन्म लेती है। लोक की धमनियों में प्रवाहित कथा, जो शहरी दर्शकों को “लेसर रिलेटेड” लग सकता है, वही ग्रामीण समाज के लिए जीवन का सत्य है। और यही वह सेतु है जो ऋषभ शेट्टी ने सिनेमा और समाज के बीच खड़ा किया है।

तर्क जहाँ थम जाता है, वहीं से आस्था का पथ प्रारम्भ होता है। कांतारा-चैप्टर 1 हमें इसी सीमा-रेखा पर लाकर खड़ा करता है। यह फ़िल्म केवल एक मनोरंजन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक अनुष्ठान है। दर्शक इसके पश्चात उसी तरह नहीं लौटता, जैसा वह गया था। 

कहानी: जहाँ तक फ़िल्म की कथा का प्रश्न है, कांतारा वस्तुतः ईश्वर का मधुबन है, एक ऐसा पावन स्थल, जहाँ परम्पराएँ केवल निभायी नहीं जातीं, वरन् श्वास की भाँति जीयी जाती हैं। इस लोकनिवास में रहने वाले जन, जब पड़ोसी राज्य के व्यापारी उपक्रमों से परिचित होते हैं, तो उनके अंतःकरण में भी यह आकांक्षा जाग उठती है कि वे उस व्यापार के सहभागी बनें; क्योंकि अन्ततः उस व्यापार की जड़ें तो इसी मधुबन की धरित्री में प्रतिष्ठित थीं।

परन्तु, इस मधुबन के अंतरालों में अनेक रहस्य, अनेक रहस्यान्तर छिपे पड़े हैं, जो कथा के आगे बढ़ने पर पुराणोक्त गाथाओं की भाँति शनैः शनैः उद्घाटित होते जाते हैं। यहाँ प्रत्येक पीड़ा का, प्रत्येक यातना का एक ही औषध है, और वह हैं ‘दैव’। वही दैव, जिसे कोई रहस्यमयी शक्ति निरंतर दुर्बल करने की चेष्टा में है। इसी दैव के रक्षण और विघटन के मध्य संघर्षरत यह आख्यान बहता है, और ऐसे-ऐसे घटनाक्रमों से टकराता है, जिनकी कल्पना भी सामान्य दर्शक के लिए दुर्लभ है।

कथानक की बुनावट सलीक़े और संयम की पराकाष्ठा है। ऋषभ शेट्टी द्वारा अभिनीत बेड़मे का चरित्र मात्र अभिनय नहीं, अपितु साधना प्रतीत होता है। और दूसरी ओर, नया चेहरा रुक्मिणी वसंत, राजकुमारी कनकवती की भूमिका में ऐसे दीप्त होती हैं मानो प्राचीन शिलालेख पर उत्कीर्ण कोई लुप्त श्लोक पुनः जीवन पा गया हो। 

ऋषभ शेट्टी ने हमें वह सिनेमा दिया है, जिसे आने वाली पीढ़ियाँ देखती रहेंगी। यह भारतीय लोककला और आस्था का जीवित दस्तावेज़ है। जिस समय बॉलीवुड ने दशकों तक यह सिखाया कि “हिंदू होना पटकथा में फिट नहीं बैठता”, उस समय कांतारा ने हमारे समाज को उसकी स्मृतियों और आत्मविश्वास से पुनः जोड़ा। कांतारा हमें वह आत्मविश्वास लौटाती है कि हमारी आस्थाएँ, हमारे देवता और हमारे लोकगीत ही हमारी सबसे बड़ी कथा हैं।

कांतारा यह केवल फ़िल्म नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता की प्रतिध्वनि है, यह बार-बार देखी जानी चाहिए। सिनेमा प्रेमियों को ऋषभ शेट्टी का ऋणी रहना होगा। यह हमारी सभ्यता का श्रवण और उसका पुनः स्मरण है। 

पाकिस्तान को JF-17 के लिए इंजन की आपूर्ति नहीं करता है रूस, कॉन्ग्रेस ने भारत की विदेश नीति पर उठाए सवाल तो बीजेपी ने किया पलटवार

रूस ने उन खबरों को खारिज कर दिया है, जिनमें कहा गया था कि पाकिस्तान को JF-17 थंडर ब्लॉक III लड़ाकू विमानों में इस्तेमाल के लिए रूस RD-93MA इंजन की आपूर्ति कर रहा है। रूस द्वारा इंजन दिए जाने की खबरों पर कॉन्ग्रेस ने मोदी सरकार पर हमला बोला था। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान JF-17 लड़ाकू विमान का इस्तेमाल पाकिस्तान ने किया था, जिसे भारतीय वायु सेना ने मार गिराया था।

रूस द्वारा विमान का इंजन देने की खबर उस वक्त आई है जब रूस के राष्ट्रपति पुतिन भारत आने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। बीजेपी नेता अमित मालवीय ने ट्वीट कर कॉन्ग्रेस पर हमला बोला।

उन्होंने कहा, “रूस ने उन खबरों को खारिज कर दिया है जिनमें कहा गया था कि मॉस्को पाकिस्तान को JF-17 थंडर ब्लॉक III लड़ाकू विमानों में लगाने के लिए RD-93MA इंजन की आपूर्ति कर रहा है। कॉन्ग्रेस के पास कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है। कोई विश्वसनीय स्रोत भी नहीं है।”

WION ने एक रूसी सूत्र के हवाले से कहा, “इस तरह की किसी भी घटनाक्रम की पुष्टि नहीं हुई है। रूस और भारत के बीच बड़े सौदों की संभावना की तलाश अभी भी जारी है। ऐसे में कोई व्यक्ति जानबूझ कर दोनों देशों के बेहद मजबूत और दीर्घकालिक सहयोग में दरार डालने की कोशिश कर रहा है। उसने कहा कि पाकिस्तान के साथ इस स्तर का सहयोग नहीं हो सकता, जिससे भारत को दिक्कत महसूस हो।”

जेएफ-17 का इंजन बनाता है रूस

IDRW की रिपोर्ट में दावा किया गया था कि रूस ने पाकिस्तान को जेएफ-17 थंडर फाइटर जेट में इस्तेमाल के लिए इंजन देने का फैसला किया है। चीन इस जेट को बनाता है। पाकिस्तान के पास 150 जेएफ 17 लड़ाकू विमान हैं। लेकिन इस विमान में रूस का आरडी-93एमए इंजन लगे हुए हैं। इसलिए विमान के आधुनिकीकरण के लिए रूस का सहयोग जरूरी है।

भरोसेमंद रूस क्यों कर रहा पाकिस्तान की मदद- कॉन्ग्रेस

कॉन्ग्रेस ने रूस द्वारा पाकिस्तान को जेएफ-17 इंजन दिए जाने संबंधी खबरों का हवाला देते हुए मोदी सरकार पर निशाना साधा है। कॉन्ग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने इसे कूटनीतिक विफलता करार देते हुए कहा कि भारत का भरोसेमंद साथी रूस अब पाकिस्तानी सेना का सहयोग क्यों कर रही है? खबरों में कहा गया है कि रूस जेएफ-17 विमानों के लिए आरडी-93एमए इंजन देने पर सहमति जताई है। बीजेपी नेता अमित मालवीय ने कॉन्ग्रेस के आरोपों को निराधार बताया है।

राष्ट्रपति पुतिन कर रहे भारत दौरे का इंतजार

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन दिसंबर में भारत दौरे पर आने वाले हैं। भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन में कई अहम समझौतों पर हस्ताक्षर होने वाले हैं। पिछले हफ्ते रूसी राष्ट्रपति ने वल्दाई फोरम में कहा कि वे दिसंबर की शुरुआत में अपनी दिल्ली यात्रा का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं और अपने प्रिय मित्र और भरोसेमंद साथी, प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।”

भारत-रूस के बीच शिखर सम्मेलन बारी-बारी से होता है। पिछले साल प्रधानमंत्री मोदी इस शिखर सम्मेलन के लिए रूस गए थे और इस साल राष्ट्रपति पुतिन भारत आ रहे हैं। इससे पहले भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर रूस की यात्रा पर गए थे। उन्होंने अपने समकक्षों से मुलाकात के अलावा खास तौर पर राष्ट्रपति पुतिन से मुलाकात की थी।

पीएम मोदी और पुतिन एससीओ सम्मेलन में मिले थे

प्रधानमंत्री मोदी और रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने तियानजिन में एससीओ शिखर सम्मेलन के दौरान मुलाकात की। इस दौरान रूसी राष्ट्रपति और पीएम मोदी एक ही कार से द्विपक्षीय वार्ता स्थल पर गए। पूरी दुनिया में ये सुर्खियाँ भी बनी थी। रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव शीर्ष नेताओं के बीच दिसंबर में होने वाली बैठक की तैयारियों के तहत वार्षिक शिखर सम्मेलन से पहले दिल्ली आ सकते हैं।

भारत-रूस संबंध काफी मजबूत

भारत-रूस व्यापार 60 अरब डॉलर से अधिक का है। रक्षा, ऊर्जा और व्यापार भारत-रूस संबंधों के केन्द्र में हैं। रूस भारत का सबसे बड़ा रक्षा आपूर्तिकर्ता ह। तकनीक हस्तांतरण से लेकर सह-विकास तक के कई परियोजनाओं में दोनों भागीदार हैं। रूस से खरीदा गया S400 विमान ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान पाकिस्तान में आतंकवादी ठिकानों को ध्वस्त करने में अहम भूमिका निभाई थी।

ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल भारत-रूस संयुक्त उद्यम का एक अहम उदाहरण है। इसने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान अपनी क्षमता साबित की और इसे फिलीपींस जैसे देशों को निर्यात भी किया जा रहा है।

भारत पर अमेरिकी टैरिफ को देखते हुए रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने पिछले हफ़्ते कहा था कि उनका देश भारतीय दवा और कृषि उत्पादों का आयात बढ़ाना चाहेगा। दोनों देश भारत और यूरेशियन आर्थिक संघ के बीच एक मुक्त व्यापार समझौते के भी इच्छुक हैं।

अरब सागर से उठा ‘शक्ति’ चक्रवात, 100km/hr है रफ्तार: जानें भारत के कौन-कौन से राज्यों पर पड़ेगा असर, क्या है निपटने की तैयारी

2025 का अरब सागर में उठा चक्रवात ‘शक्ति’ रौद्ररूप धारण कर चुका है और 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाओं के साथ समुद्र में कोहराम मचा रहा है। यह इस साल अरब सागर में मानसून के बाद का पहला चक्रवाती तूफान है, जिसका नामकरण ‘शक्ति’ श्रीलंका ने किया है।

क्या है चक्रवाती तूफान शक्ति

मानसून के बाद अरब सागर में उठने वाला चक्रवात शक्ति पहला तूफान है। यह भयानक रूप धारण कर चुका है, जिसकी हवाएँ 100 किलोमीटर प्रति घंटा है। तूफान गुजरात के द्वारका से लगभग 420 किलोमीटर दूर है और अरब सागर में आगे बढ़ रहा है। चक्रवात की वर्तमान स्थिति को देखते हुए गुजरात, महाराष्ट्र में चेतावनी जारी कर दी गई है। मछुआरों को इस दौरान समुद्र में जाने से बचने को कहा गया है। कई क्षेत्रों में भारी बारिश का अलर्ट जारी किया गया है।

जमीन से कब टकराएगा चक्रवात ‘शक्ति’

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, शक्ति तूफान के पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम की ओर बढ़ने और रविवार तक अरब सागर के उत्तर-पश्चिम और आसपास के मध्य भागों तक पहुँचने की संभावना है। फिर, सोमवार सुबह से, इसके दिशा बदलने और पूर्व, उत्तर-पूर्व की ओर वापस लौटने का अनुमान है। इस दौरान यह धीरे-धीरे कमजोर पड़ जाएगा। शनिवार 4 अक्टूबर को इसके ओमान की तरफ बढ़ जाने से भारत में इससे होने वाले नुकसान की आशंका कम हो गई है।

इसके महाराष्ट्र- गुजरात के तट से टकराने की संभावना काफी कम हो गयी है। क्योंकि यह गुजरात और महाराष्ट्र के तटों से दूर पश्चिम की ओर बढ़ रहा है। हालाँकि 7 अक्टूबर 2025 तक महाराष्ट्र और गुजरात के तटीय इलाकों में तेज हवाएं, भारी बारिश और ऊंची लहरें उठ सकती हैं, इसलिए मछुआरों और तटीय क्षेत्रों के लोगों के लिए अलर्ट जारी किया गया है। 

महाराष्ट्र- गुजरात के समुद्री इलाकों में जबरदस्त असर

आईएमडी के मुताबिक सोमवार (6 अक्टूबर 2025) तक 60-100 किमी प्रति घंटे की रफ़्तार से हवाएँ चलने का अनुमान लगाया है। साथ ही गुजरात-महाराष्ट्र तट पर समुद्र की स्थिति खराब से बहुत खराब होने का अनुमान लगाया है। मंगलवार (7 अक्टूबर 2025) को हवा की रफ्तार 45-55 किमी प्रति घंटे से लेकर 65 किमी प्रति घंटे की हो सकती है। मछुआरों को मंगलवार तक उत्तर-पश्चिमी अरब सागर क्षेत्र में न जाने की चेतावनी दी गई है।

भारतीय मौसम विभाग के मुताबिक शनिवार 4 अक्टूबर 2025 को ही चक्रवात ‘शक्ति’ के जबरदस्त तूफान में तब्दील होने की चेतावनी दी थी। इससे मुंबई और समुद्र से सटे इलाकों में भारी बारिश का अनुमान लगाया गया है। महाराष्ट्र के आंतरिक हिस्सों, विशेषकर मराठवाड़ा और पूर्वी विदर्भ में भारी से बहुत भारी बारिश का अनुमान है।

पाँच दिनों का पूर्वानुमान जारी करते हुए, आईएमडी ने कहा है कि मुंबई में 8 अक्टूबर तक बारिश होती रहेगी। ठाणे और रायगढ़ ज़िलों में भी बारिश होने की संभावना है। हालाँकि पालघर जिले में 8 अक्टूबर को भारी बारिश की संभावना है।

महाराष्ट्र में की गई तैयारियाँ

महाराष्ट्र सरकार ने चक्रवात ‘शक्ति’ से निपटने के लिए तैयारियाँ कर ली हैं। राज्य सरकार ने पहले ही जिला प्रशासन को अपनी आपदा प्रबंधन सिस्टम को एक्टिव करने के लिए कहा था। तटीय और निचले इलाकों के लोगों को सुरक्षित स्थानों में पहुँचाया जा रहा है। लोगों को समुद्री तूफान से सावधान रहने, समुद्री तटों से दूर रहने, घरों से नहीं निकलने, समुद्री यात्रा नहीं करने की सलाह दी गई है। साथ ही एनडीआरएफ और एसडीआरएफ को तैनात कर दिया गया है। उत्तरी कोंकण के निचले हिस्से में बाढ़ आने की आशंका जताई गई है।

गुजरात में चक्रवात से निपटने की तैयारियाँ

भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने चक्रवात शक्ति के मद्देनजर मछुआरों को समुद्र में न जाने की चेतावनी जारी की है। सौराष्ट्र के तटीय जिलों के कलेक्टर अपने क्षेत्र में लौट आए हैं। ये लोग गाँधीनगर में भूमि प्रशासन और आपदा प्रबंधन पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लेने गए थे। कलेक्टर ऑफिस के कर्मचारियों की रविवार (5 अक्टूबर 2025) की छुट्टियाँ रद्द कर दी गई है।

गुजरात के समुद्र से सटे सभी जिले स्थिति पर कड़ी नज़र रख रहे हैं, हालाँकि मौसम विभाग के पूर्वानुमानों के अनुसार, चक्रवात ‘शक्ति’ के गुजरात में आए बिना ही समुद्र में चले जाने की संभावना है।

6 अक्टूबर से धीमा पड़ जाएगा तूफान

उत्तर-पश्चिम अरब सागर के ऊपर मंडरा रहा चक्रवाती तूफान ‘शक्ति’ शनिवार शाम तक 15 किमी प्रति घंटे की रफ़्तार से पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम की ओर बढ़ रहा था और रात 8:30 बजे यह स्थिर हो गया। इसके पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम की ओर बढ़ने और रविवार तक उत्तर-पश्चिम और उससे सटे पश्चिम-मध्य अरब सागर तक पहुँचने की संभावना है। आईएमडी ने कहा कि चक्रवात ‘शक्ति’ इसके बाद पूर्व और उत्तर-पूर्व की ओर बढ़ेगा और धीरे-धीरे कमजोर पड़ जाएगा।

शनिवार को चक्रवात द्वारका और पोरबंदर से करीब 420-480 किमी दूर थी। मौसम विभाग ने अगले 12 घंटों में इसके और तीव्र होने की चेतावनी दी थी। रविवार को 100 से 110 किमी प्रति घंटे की तेज हवाएँ चल सकती हैं, जिससे सौराष्ट्र और कच्छ में भारी बारिश का अलर्ट जारी किया गया है। मछुआरों को 6 अक्टूबर तक समुद्र में न जाने की सलाह दी गई है।

चक्रवात ‘शक्ति’ नाम कैसे पड़ा

चक्रवात का नाम ‘शक्ति’ रखने का सुझाव श्रीलंका ने दिया है। विश्व मौसम संगठन (WMO) और एशियाई देशों का संयुक्त पैनल (ESCAP Panel) मिलकर चक्रवातों के नाम तय करते हैं। इसके लिए बंगाल की खाड़ी और अरब सागर के आसपास के 13 देशों ने नाम सुझाए थे। ये 13 देश हैं – भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका, म्यांमार, मालदीव, थाईलैंड, ईरान, ओमान, कतर, सऊदी अरब, यमन और संयुक्त अरब अमीरात। पहले चक्रवातों के नाम चुनने और याद रखने में काफी दिक्कत होती थी। इसको देखते हुए ये परंपरा शुरू की गई कि आसपास के देश नाम सुझाएँ।

स्टालिन सरकार के निशाने पर हिंदूवादी यूट्यूबर मरीदास, जोसेफ विजय की रैली में भगदड़ पर बनाए गए वीडियो को लेकर किया गिरफ्तार: मंत्री सेंथिल की भूमिका पर उठाए थे सवाल

तमिलनाडु में विरोध को दबाने की सरकार की आदत का एक और उदाहरण देखने को मिला है। मशहूर यूट्यूबर मरीदास को शनिवार (4 अक्टूबर 2025) को DMK सरकार ने गिरफ्तार कर लिया क्योंकि उन्होंने करूर में तमिलागा वेत्रि कझागम (TVK) नेता और अभिनेता जोसेफ विजय की रैली में हुई भगदड़ पर अपने वीडियो में सवाल उठाए थे। इस भगदड़ में 41 लोगों की मौत हो चुकी है।

यह पहली बार नहीं है जब मरीदास स्टालिन सरकार के निशाने पर आए हों, इससे पहले भी तमिलनाडु सरकार उन्हें 2021 में गिरफ्तार कर चुकी है। शनिवार को मरीदास के अपने गिरफ्तारी को लेकर एक ट्वीट भी किया है।

इस मामले में स्टालिन की पुलिस का दावा है कि मरीदास ने अपने वीडियो में गुमराह करने वाले और झूठे बयान दिए हैं, जिसके चलते उनके खिलाफ आईपीसी और आईटी एक्ट की कई धाराओं के तहत केस दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है।

मौजूदा मामला: करूर भगदड़ और साजिश का आरोप

मरीदास को चेन्नई के नीलंकरई स्थित उनके घर से गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी से कुछ घंटे पहले ही उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था, “पूरे नाटक को डीएमके गैंग ने अदालत में रचा है, मैं इसे उजागर करने वाला हूँ।” उनका वीडियो वायरल होने के बाद मुख्यमंत्री स्टालिन ने सख्त संदेश जारी करते हुए कहा था कि सोशल मीडिया पर अपमानजनक और भ्रामक टिप्पणी करने वालों पर कड़ी कार्रवाई होगी।

अपने यूट्यूब वीडियो में मरीदास ने सीधे तौर पर डीएमके के वरिष्ठ नेता और मंत्री सेंथिल बालाजी पर उंगली उठाई थी। उन्होंने कहा कि करूर बालाजी का गढ़ है और विजय की रैली के दौरान भगदड़ स्वाभाविक नहीं बल्कि जानबूझकर पैदा की गई अफरातफरी का नतीजा हो सकती है। उन्होंने आरोप लगाया कि सेंथिल बालाजी सत्ता परिवार के बेहद करीबी और ऐसे राजनेता हैं जो किसी भी हद तक जा सकते हैं।

मरीदास ने भगदड़ में साजिश की संभावना जताते हुए तीन बिंदुओं का जिक्र किया-

  1. रैली में लगातार घूमती एक एंबुलेंस और उसे लेकर सन टीवी की कवरेज।
  2. एक ऐसा व्यक्ति, जो सेंथिल बालाजी का करीबी बताया जा रहा था, उसकी बाइट का इस्तेमाल।
  3. कार्यक्रम के दौरान अचानक काटी गई बिजली, जिसे जाँच आयोग ने नजरअंदाज कर दिया।

उन्होंने इस हादसे की जाँच के लिए बनाए गए अरुणा जगदीशन आयोग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए और इसे सिर्फ दिखावा करार दिया। मरीदास का कहना था कि आयोग असली विफलताओं और संभावित षड्यंत्र को ढकने के लिए बनाया गया है।

2021 में गिरफ्तारी का कारण बना सोशल मीडिया पोस्ट

यह पहली बार नहीं है जब मरीदास को उनकी टिप्पणियों के कारण गिरफ्तार किया गया। दिसंबर 2021 में भी उन्हें साइबर क्राइम पुलिस ने मदुरै से गिरफ्तार किया था। उस समय उन्होंने कुन्नूर में हुए हेलीकॉप्टर हादसे पर सवाल उठाए थे जिसमें तत्कालीन चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल बिपिन रावत और 13 अन्य लोगों की मौत हुई थी।

मरीदास ने ट्वीट कर पूछा था कि क्या ‘तमिलनाडु कश्मीर बनता जा रहा है’ और आरोप लगाया था कि डीएमके की शह पर देशद्रोही ताकतें सक्रिय हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि डीएमके समर्थक सोशल मीडिया पर रावत की मौत पर मजाक उड़ा रहे हैं और यही वजह है कि पार्टी अलगाववादी ताकतों के लिए सबसे अच्छा विकल्प है।

इस ट्वीट को आधार बनाकर मरीदास पर आईपीसी की धारा 153 और 505(2) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। उनकी गिरफ्तारी के विरोध में उस समय भाजपा समर्थक बड़ी संख्या में पुलिस थाने पहुँचे थे। यह गिरफ्तारी भी सोशल मीडिया पोस्ट को आधार बनाकर की गई थी, जबकि अदालतें बार-बार कह चुकी हैं कि सिर्फ सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणी के लिए गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए।

अपनी जड़ों पर है गर्व

डीएमके और उसके समर्थक लंबे समय से मरीदास पर साम्प्रदायिकता फैलाने का आरोप लगाते रहे हैं। पार्टी का कहना है कि उनके वीडियो हिंदू-मुस्लिमो के बीच शत्रुता भड़काते हैं और समाज में तनाव पैदा करते हैं। मरीदास ने कई मौकों पर डीएमके की राजनीति पर सवाल उठाए हैं।

चाहे वह अनुच्छेद 370 हटाने के फैसले का विरोध हो या फिर जम्मू-कश्मीर मुद्दे पर पार्टी का रुख। उन्होंने खुले तौर पर कहा था कि डीएमके का विरोध आतंकी संगठनों का समर्थन करने जैसा है और सवाल उठाया था कि क्या पार्टी ने पाकिस्तान या आतंकियों से समझौता किया है। डीएमके ने इसे देश विरोधी बयान करार देते हुए उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी।

दिलचस्प बात यह है कि मरीदास अपनी हिंदू पहचान को लेकर खुलकर बोलते हैं और इसे अपनी ताकत मानते हैं। उनका कहना है, “हिंदू जड़ों पर गर्व करना सांप्रदायिकता नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की बुनियाद है।” यही कारण है कि उनके वीडियो अक्सर विवादों में आ जाते हैं और उन्हें हिंदूवादी यूट्यूबर के रूप में देखा जाता है।

कट्टर राष्ट्रवादी, घोर चीन विरोधी: जानें कौन हैं जापान की पहली महिला PM बनने जा रहीं साने ताकाइची, अपने देश को बनाना चाहती हैं महाशक्ति

जापान की सत्ताधारी पार्टी लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (LDP) ने शनिवार (4 अक्टूबर 2025) को साने ताकाइची (Sanae Takaichi) को अपना नया नेता चुन लिया है। 64 साल की ताकाइची अब जापान की पहली महिला प्रधानमंत्री बनने की ओर अग्रसर हैं।

ताकाइची ने पार्टी मुख्यालय में हुए वोटिंग में सेंटरिस्ट उम्मीदवार शिंजिरो कोइजुमी को हराया। जापान की संसद (जिसे डाइट कहा जाता है) में मध्य अक्टूबर में औपचारिक रूप से उन्हें प्रधानमंत्री चुना जाएगा। ताकाइची शिगेरू इशिबा की जगह लेंगी, जिन्होंने सिर्फ एक साल पहले प्रधानमंत्री पद सँभाला था। LDP इस समय संकट में है।

पार्टी संसद के दोनों सदनों में अपना बहुमत खो चुकी है। इशिबा के खिलाफ पार्टी के भीतर से असंतोष था, जिसके चलते उन्होंने इस्तीफा देने की घोषणा की थी। ताकाइची की जीत को पार्टी के दक्षिणपंथी (राइट-विंग) धड़े की जीत के रूप में देखा जा रहा है।

अपनी जीत के बाद ताकाइची ने कहा, “लोग सवाल कर रहे हैं कि LDP आखिर किसके लिए खड़ी है और क्या हमें जनता की मुश्किलें समझ आती हैं। पार्टी की नीतियों में अब कोई दूरदृष्टि नहीं दिख रही है।”

ताकाइची का एजेंडा: राष्ट्रवाद और सैन्य मजबूती

ताकाइची खुद को शिंजो आबे की राजनीतिक विरासत का उत्तराधिकारी मानती हैं। आबे 2012 से 2020 तक प्रधानमंत्री रहे और 2022 में उनकी हत्या हो गई थी। ताकाइची भी उनकी तरह राष्ट्रवादी, सामाजिक रूप से रूढ़िवादी और आक्रामक आर्थिक नीतियों की समर्थक हैं। वो पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर को अपना आदर्श मानती हैं।

वह जापान की सांविधानिक pacifism (अहिंसा और युद्ध विरोध) नीति को बदलना चाहती हैं, खासकर अनुच्छेद 9 को जो कहता है कि जापान कभी युद्ध नहीं करेगा और न ही सेना रखेगा। ताकाइची चाहती हैं कि जापान की सैन्य ताकत बढ़ाई जाए ताकि वह चीन जैसे देशों से मुकाबला कर सके। वे चीन के खिलाफ सख्त रुख रखने के लिए जानी जाती हैं और ताइवान के साथ ‘अर्ध-सैन्य साझेदारी’ चाहती हैं।

(फोटो साभार: द जापान टाइम्स)

वह यासुकुनी मंदिर जाती हैं, जो जापान के युद्धकालीन सैनिकों को श्रद्धांजलि देता है, जिनमें कुछ युद्ध अपराधी भी शामिल हैं। चीन और कोरिया जैसे पड़ोसी देश इसे जापान की सैन्यवादी मानसिकता की वापसी मानते हैं। ताकाइची मानती हैं कि जापान को अब और युद्ध अपराधों के लिए माफी माँगने की जरूरत नहीं है।

सामाजिक मुद्दों पर रुख: महिलाओं और समलैंगिकों के खिलाफ

ताकाइची महिला अधिकारों और लैंगिक समानता की विरोधी मानी जाती हैं। वे शादीशुदा जोड़ों को अलग-अलग सरनेम रखने की अनुमति देने के खिलाफ हैं। वे महिलाओं को शाही परिवार की उत्तराधिकारी बनने का अधिकार देने के खिलाफ हैं। वे समलैंगिक विवाह की भी विरोधी हैं।

इसी कारण कई महिलाएँ ताकाइची की प्रधानमंत्री बनने की संभावना को महिलाओं की प्रगति के रूप में नहीं देखतीं। क्योटो की प्रोफेसर यायो ओकानो ने कहा, “ताकाइची ने महिलाओं की मुश्किलों या लैंगिक भेदभाव पर कुछ भी नहीं कहा। इससे संकेत मिलता है कि महिलाओं के लिए आने वाला समय और कठिन हो सकता है।”

अर्थव्यवस्था: खर्च बढ़ाने की नीति

आर्थिक मामलों में ताकाइची भी आबे की तरह हैं। वे सरकारी खर्च बढ़ाकर और सस्ते कर्ज के जरिए अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना चाहती हैं। वे जापान के सेंट्रल बैंक द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने की आलोचक रही हैं और मंदी से जूझ रही अर्थव्यवस्था को तेजी से बढ़ाने की बात करती हैं, भले ही इससे घाटा बढ़े या मुद्रास्फीति हो।

हाल ही में उन्होंने उपभोग कर (Consumption Tax) घटाने की बात की थी, लेकिन चुनाव के दौरान उन्होंने इस प्रस्ताव को थोड़ा दबा दिया। अगर विपक्ष के दबाव में वह इसे दोबारा लाती हैं, तो मुद्रास्फीति, महँगाई और कमजोर येन जैसी समस्याएं आ सकती हैं।

विदेश नीति और चुनौतियाँ

ताकाइची को अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से भी जल्दी ही निपटना होगा, जो अक्टूबर के अंत या नवंबर की शुरुआत में जापान आने वाले हैं। ट्रंप और इशिबा के बीच हुए व्यापार समझौते पर ताकाइची दोबारा बातचीत कर सकती हैं।

वे आव्रजन (इमिग्रेशन) के खिलाफ भी सख्त रुख रखती हैं। हाल ही में उन्होंने विदेशी पर्यटकों के व्यवहार को लेकर नाराजगी जताई थी और ‘बुरे व्यवहार वाले विदेशियों’ पर कार्रवाई की बात कही थी। ताकाइची की जीत से LDP को दक्षिणपंथी वोटर्स का समर्थन फिर से मिल सकता है, लेकिन देश की राजनीति में अस्थिरता अभी बनी रह सकती है।

उनके विचार दक्षिण कोरिया, चीन और अमेरिका के साथ जापान के रिश्तों को प्रभावित कर सकते हैं। पार्टी के पास संसद में बहुमत नहीं है, इसलिए ताकाइची को कई मुद्दों पर समझौता करना होगा, जिससे उनकी आलोचना हो सकती है। दूर-दराज की दक्षिणपंथी पार्टी सान्सेइतो (Sanseito) की लोकप्रियता भी LDP को चुनौती देती रहेगी।

वहीं कुछ विशेषज्ञों का कहना है, ताकाइची की आर्थिक नीतियाँ जोखिम भरी हो सकती हैं और जनता का भरोसा जीतने में उन्हें काफी मेहनत करनी पड़ेगी।

‘80,000 मुस्लिम वोटरों को अंतिम सूची से हटाया गया’: प्रोपेगेंडा मीडिया ‘द रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ ने बिहार SIR पर की झूठी रिपोर्ट, जानिए क्या है पूरा सच

बिहार में विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, राजनीतिक माहौल भी तेज होता जा रहा है। बीते दिनों में ‘वोट चोरी’ और विशेष मतदाता पुनरीक्षण अभियान (Special Intensive Revision – SIR) के जरिए मतदाताओं का नाम वोटर लिस्ट से हटाने जैसे झूठे आरोपों ने माहौल को और तनावपूर्ण बना दिया है।

इसी बीच प्रोपेगेंडा वेबसाइट ‘द रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ ने 28 सितंबर 2025 को एक रिपोर्ट प्रकाशित की। इसमें दावा किया गया कि पूर्वी चंपारण जिले के ढाका विधानसभा क्षेत्र में लगभग 80,000 मुस्लिम वोटरों को वोटर लिस्ट से हटाने की कोशिश की गई।

यह रिपोर्ट आयुषी कर और विष्णु नारायण ने लिखी थाी। रिपोर्ट में दावा किया गया कि यह योजना पूर्वी चंपारण जिले के ढाका विधानसभा क्षेत्र में चलाई जा रही थी, जहाँ मुस्लिम वोटरों को ‘गैर-नागरिक’ बताकर सूची से हटाने की कोशिश की गई।

हालाँकि इन दावों की पोल तब खुल गई जब अंतिम वोटर लिस्ट 30 सितंबर 2025 को जारी हुई। चुनाव आयोग ने बताया कि पूरे SIR की प्रक्रिया में ढाका विधानसभा के महज 17,631 वोटर्स के नाम ही हटाए गए।

हटाए गए नाम उन लोगों के थे जो या तो मृतक थे, लंबे समय से मौजूद नहीं थे, या फिर दूसरे स्थानों पर चले गए थे। ढाका क्षेत्र में कुल 3,44,000 वोटर थे, जिनमें से 3,27,000 को फॉर्म जारी किए गए थे। यानी, 80,000 मुस्लिम वोटरों को हटाने का दावा पूरी तरह से झूठा और गुमराह करने वाला निकला।

चुनाव आयोग ने किसी भी धर्म या समुदाय को निशाना नहीं बनाया। जिन मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए, वे सभी तय प्रक्रिया के तहत हटाए गए थे। इसके अलावा, बूथ स्तर के एजेंट (Booth Level Agents – BLAs) ने सिर्फ उन्हीं मतदाताओं को हटाने के लिए आवेदन दिए जो योग्य नहीं थे, जैसे कि फर्जी नाम, दोहराव, या जिनके दस्तावेज अधूरे थे।

रिपोर्ट में किए गए विवादित दावे

रिपोर्ट में दावा किया गया कि बिहार के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी (CEO) और भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के जिला अधिकारी यानी निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) को आधिकारिक आवेदन दिए गए ताकि मुस्लिम वोटरों को मतदाता सूची से हटाया जा सके।

इसमें आरोप लगाते हुए लिखा गया, “एक आवेदन ढाका से बीजेपी विधायक पवन कुमार जैसवाल के निजी सहायक के नाम से किया गया। दूसरा आवेदन पटना स्थित बीजेपी राज्य मुख्यालय के लेटरहेड पर किया गया। ये हमारे द्वारा देखे गए दस्तावेजों से स्पष्ट होता है।”

रिपोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि ‘यह एक सोचा समझा और टार्गेटेड प्रयास था, जिसका उद्देश्य ढाका विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम वोटरों को बड़े पैमाने पर हटाना था।’

रिपोर्ट में यह भी आरोप लगाया गया कि चुनाव आयोग के अधिकारियों ने उन लोगों को रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया, जो ढाका के लोगों का नाम मतदान सूची से हटाना चाहते थे।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि SIR अभियान के दौरान ECI ने ‘बीच में यह निर्णय लिया कि लोगों को सिर्फ नामांकन फॉर्म भरवाना होगा और दस्तावेजी प्रमाण बाद में दिए जा सकते हैं।’

रिपोर्ट ने आयोग, उसके अधिकारियों, बूथ स्तर के कर्मचारियों और स्वयंसेवकों को ‘विश्वास न करने लायक’ तक कह डाला। रिपोर्ट में कहा गया, “हमने बीजेपी द्वारा जिला निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी को दिए गए सभी आवेदन देखे। जिन सभी नामों को हटाने की माँग की गई, वे मुस्लिम थे।”

रिपोर्ट ने यह आरोप भी लगाया कि पार्टी की ओर से हर आवेदन पर BLA ने हस्ताक्षर किए, लेकिन यह नहीं बताया गया कि किन कारणों से नाम हटाने की माँग की गई, जबकि यह बताना जरूरी होता है।

रिपोर्ट ने बीजेपी नेता और ढाका विधायक के निजी सहायक धीरज कुमार पर आरोप लगाया कि उन्होंने ढाका सीट से 78,384 मुस्लिम वोटरों को हटाने की माँग की।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया, “बीजेपी राज्य मुख्यालय के लेटरहेड पर एक पत्र पटना स्थित मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी को भेजा गया। CEO राज्य में आयोग का सबसे वरिष्ठ अधिकारी होता है।” इस पत्र में वही माँग दोहराई गई।

हालाँकि मीडिया पोर्टल द्वारा लगाए गए इन चौंकाने वाले आरोपों के बावजूद ढाका की अंतिम वोटर सूची ने उनके दावों की पोल पूरी तरह से खोल दी। इसके अलावा, यह भी जानना जरूरी है कि किसी भी राजनीतिक दल ने SIR अभियान को लेकर चुनाव आयोग में कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई।

इसके उलट उनके नेताओं ने झूठ फैलाया और उनके कार्यकर्ता पूरे अभियान के दौरान आयोग के साथ मिलकर काम करते रहे। इससे उनके प्रचार का गुब्बारा और भी फूट गया।

‘द रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ की स्थापना किसने की?

इस मीडिया संस्थान की स्थापना नितिन सेठी और कुमार संभव श्रीवास्तव ने की थी और यह ग्लोबल इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म नेटवर्क से जुड़ा हुआ है। इसे ओपन सोसाइटी फाउंडेशन, फोर्ड फाउंडेशन और KAS जैसी संस्थाओं से आर्थिक सहायता मिलती है, साथ ही अन्य नेटवर्कों से भी फंड प्राप्त होता है।

जर्मनी की KAS फाउंडेशन CSDS को भी आर्थिक मदद देती है। CSDS तब सुर्खियों में आया जब इसके निदेशक संजय कुमार ने महाराष्ट्र चुनावों को लेकर गलत जानकारी फैलाई। उन्होंने बाद में माफी माँगी, लेकिन तब तक वह झूठ सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल चुका था और कॉन्ग्रेस पार्टी ने इसका इस्तेमाल बीजेपी पर हमला करने के लिए किया।

‘मोटरसाइकल से भारी होती है कार ताकि इंजन बचाए ड्राइवर की जान’: समझ से परे है राहुल गाँधी का तर्क, कोलंबिया में बेतुकी बात कर उड़वा रहे अपनी खिल्ली

अपने कोलंबिया के दौरे में राहुल गाँधी ने एनविगेडो में स्थित एआईए विश्वविद्यालय में एक भाषण दिया। इस भाषण में उन्होंने कार और मोटरसाइकिल पर एक बेतुका दावा किया जिसके बाद भाजपा और नेटीजंस ने उनको आधे हाथों ले लिया।

राहुल ने विकेंद्रीकरण यानी डिसेंट्रलाइजेशन को मोटर इंजीनियरिंग, क्रैश सेफ्टी और इलेक्ट्रिक मोटर के फायदे जैसी बातों से अपने दावे को समझाने की कोशिश की। इसमें उन्होंने कार और मोटरसाइकिलों के बीच तुलना करके अपने बिंदुओं को समझाया।

राहुल गाँधी ने पहले पूछा कि कार 3000 किलोग्राम तक भारी क्यों होती हैं, जबकि एक मोटरसाइकिल का वजन सिर्फ 100 किलोग्राम होता है। राहुल ने कहा, “एक यात्री को ले जाने के लिए आपको 3000 किलोग्राम के कार की जरूरत पड़ती है लेकिन 100 किलोग्राम की मोटरसाइकिल दो यात्रियों को लेकर जा सकती है। तो ऐसे में दो लोगों को ले जा सकने वाली मोटरसाइकिल का वजन सिर्फ 150 किलोग्राम ही क्यों और कार को 3000 किलोग्राम के वजन की जरूरत क्यों पड़ती है?”

इसके बाद उन्होंने खुद ही इस बात का जवाब दिया, यह दावा करते हुए की कार भारी इसलिए होती है ताकि दुर्घटना होने पर इंजन से ड्राइवर को कुचलने से बचाया जा सके। जबकि इस तरह की स्थिति में मोटरसाइकिल का इंजन आराम से वाहन से अपने आप अलग हो जाता है।

उन्होंने कहा, “मोटरसाइकिल में जब कोई दुर्घटना होती है तो इंजन आपसे अलग हो जाता है। ऐसे में इंजन आपको नुकसान नहीं पहुँचाता। कार की दुर्घटना होने के दौरान इंजन कार के अंदर आने लगता है, इसलिए कार इस तरह से डिजाइन की जाती है ताकि इंजन आपको मार ना सके।”

फिर राहुल गाँधी ने सुझाव दिया कि इलेक्ट्रिक कारें इस समस्या का हल देती हैं, क्योंकि उनमें कई मोटर लगाई जा सकती हैं। उन्होंने कहा, “इलेक्ट्रिक मोटर आपको यह सुविधा देती है कि आप एक मोटर यहाँ लगाएँ, एक वहाँ लगाएँ और एक वहाँ भी लगाएँ। यानी इलेक्ट्रिक मोटर शक्ति का विकेंद्रीकरण है। यही इसकी असली ताकत है।”

राहुल गाँधी और उनके समर्थकों को लग सकता है कि यह बहुत तर्कसंगत बात है, लेकिन सच्चाई यह है कि कॉन्ग्रेस नेता के ये सारे दावे बेबुनियाद हैं। बीजेपी ने तो इसे ‘गिबरिश’ यानी बकवास तक कह दिया। आइए जानते हैं क्यों।

वाहन के वजन की बात करें तो

पहला, चार पहियों वाली कार और दोपहिया वाहन के वजन में फर्क होना जाहिर है, लेकिन राहुल गाँधी ने इसे बहुत ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर बताया। उन्होंने कहा कि एक आम कार को सिर्फ एक यात्री को ले जाने के लिए 3,000 किलो धातु की जरूरत होती है, जबकि मोटरसाइकिल सिर्फ 100 किलो धातु में दो लोगों को ले जाती है।

असल में, आम पैसेंजर कारों का वजन इससे काफी कम होता है, अमूमन 1,000 से 2,000 किलो के बीच। 3,000 किलो का आँकड़ा भारी-भरकम गाड़ियों के लिए होता है, न कि आम कारों के लिए।

उदाहरण के तौर पर, भारतीय बाजार में, प्रसिद्ध मॉडल जैसे मारुति सुजुकी ऑल्टो का वजन करीब 680-800 किलोग्राम होता है। टाटा नैनो, जिसे कभी दुनिया की सबसे सस्ती कार कहा गया था, उसका वजन भी लगभग 600- 800 किलोग्राम था। ये कारें शहरी इलाकों में आसानी से चलती हैं और राहुल गाँधी के बताए वजन के पास भी नहीं पहुँचतीं।

आज के लोकप्रिय मॉडलों जैसे सुजुकी स्विफ्ट, टाटा नेक्सॉन, हुंडई क्रेटा जैसी सभी 1500 किलो से कम वजन की हैं। कुछ बड़े SUV जरूर भारी होते हैं, लेकिन वे भी 2,000 किलो से ज्यादा नहीं होते। सिर्फ कुछ अमेरिकी मसल कारें जैसे हमर ही 3,000 किलोग्राम से अधिक की होती हैं।

इसके अलावा, ज्यादातर मोटरसाइकिलों का वजन 100 किलो से ज्यादा होता है। आम मॉडल का वजन 150-300 किलो के बीच होता है। उदाहरण के लिए, भारत में सबसे ज्यादा बिकने वाली हीरो स्प्लेंडर का वजन लगभग 110-120 किलो होता है और बजाज पल्सर सीरीज का वजन 140-160 किलो तक होता है।

रॉयल एनफील्ड की ज्यादातर मोटरसाइकिलें करीब 200 किलो की होती हैं। यहाँ तक कि स्कूटर भी 100 किलो से ज्यादा वजन के होते हैं।

कारें भारी होती हैं क्योंकि उसका इंजन ड्राइवर को मार सकता है?

राहुल गाँधी ने कार और मोटरसाइकिल के वजन में फर्क को लेकर तर्क दिया कि कारें इसलिए भारी होती हैं ताकि एक्सीडेंट में उनका इंजन ड्राइवर को ‘मार’ न दे, जबकि मोटरसाइकिल का इंजन टक्कर में ‘उड़’ कर अलग हो जाता है। ये तर्क सामान्य समझ और वैज्ञानिक नियमों के बिल्कुल उलट है।

कारण बहुत ही सरल है। जब कोई कार एक्सीडेंट का शिकार होती है, तो इंजन केबिन की तरफ नहीं आता, बल्कि आगे की दिशा में जाने की कोशिश करता है। इसका कारण है न्यूटन का पहला नियम, जिसे जड़त्व का नियम कहते हैं। जब कोई कार चल रही होती है, तो उसमें मौजूद हर चीज उसी गति से चलती है। अगर अचानक ब्रेक लगे या टक्कर हो जाए, तो कार तो रुक जाती है लेकिन अंदर की चीजें अपनी गति बनाए रखने की कोशिश करती हैं। यही कारण है कि एक्सीडेंट में यात्री डैशबोर्ड से टकरा जाते हैं। इंजन भी यही प्रवृत्ति दिखाता है।

दुर्घटना में केवल यात्री और ढीली या कार से न जुड़ी हुई चीजें आगे बढ़ती हैं, लेकिन इंजन जैसे हिस्से वाहन के चेसिस से मजबूती से जुड़े होते हैं। कार का इंजन, गियरबॉक्स और अन्य हिस्सों से जुड़ा होता है और इतनी मजबूती से फिट किया जाता है कि वह टक्कर के बाद भी अपनी जगह से नहीं हिलता। इसलिए राहुल गाँधी का यह दावा कि इंजन अंदर घुसकर ड्राइवर को मार सकता है, पूरी तरह गलत है।

ठीक इसी तरह, मोटरसाइकिल का इंजन भी फ्रेम से मजबूती से जुड़ा होता है। यह कोई सेफ्टी मेकेनिज्म नहीं है कि टक्कर के समय इंजन ‘उड़ जाए’ या अलग हो जाए। आम सड़क दुर्घटनाओं में मोटरसाइकिल का इंजन अपनी जगह पर ही रहता है, चाहे टक्कर कितनी भी जोरदार क्यों न हो।

दोपहिया वाहन चालकों को एक्सीडेंट के बाद इंजन से चोट नहीं लगती क्योंकि टक्कर के समय झटका इतना तेज होता है कि सवार आमतौर पर वाहन से बाहर फेंका जाता है। यह न्यूटन के जड़त्व के नियम के कारण होता है। सिर्फ कुछ खास रेसिंग घटनाओं जैसे MotoGP में कभी-कभी इंजन अलग होता दिखता है, लेकिन आम सड़क दुर्घटनाओं में जो मोटरसाइकिलें चलती हैं, उनका इंजन फ्रेम से जुड़ा ही रहता है।

कार और मोटरसाइकिल दोनों में इंजन चेसिस से मजबूती से जुड़ा होता है ताकि गाड़ी की स्थिरता, प्रदर्शन और सुरक्षा बनी रहे। ये इंजन न तो आमतौर पर ड्राइवर को चोट पहुंचाते हैं और न ही एक्सीडेंट में अलग हो जाते हैं, जैसा कि राहुल गाँधी ने दावा किया।

इसके अलावा, आधुनिक कारों में ऐसी तकनीक होती हैं जैसे क्रम्पल जोन, फायरवॉल और ब्रेकअवे माउंट्स आदि टक्कर के समय इंजन को केबिन से दूर मोड़ देती हैं। ये हिस्से दुर्घटना के समय ऊर्जा को सोखते हैं और इंजन को अंदर घुसने से रोकते हैं।

भारत में अब कई गाड़ियों में ऐसी सुरक्षा तकनीक आ चुकी हैं, जो यह सुनिश्चित करती हैं कि एक्सीडेंट के समय इंजन नीचे की ओर खिसक जाए और यात्रियों को कोई खतरा न हो।

कारें मोटरसाइकिल से भारी क्यों होती हैं?

यह बात तो बिल्कुल जाहिर है, कारें और मोटरसाइकिल दोनों ही स्टील और अन्य धातुओं से बनी होती हैं, लेकिन कारों का आकार मोटरसाइकिल से कहीं बड़ा होता है। कारों में बड़ा चेसिस होता है, ज्यादा पहिए होते हैं (स्पेयर टायर समेत), ज्यादा सीटें होती हैं और इंजन भी बड़ा और भारी होता है जिसमें आमतौर पर ज्यादा सिलेंडर होते हैं। ट्रांसमिशन सिस्टम भी बड़ा होता है।

कारों में कई ऐसे फीचर्स होते हैं जो मोटरसाइकिल में नहीं होते, जैसे विंडशील्ड, खिड़कियाँ, एयर कंडीशनिंग, म्यूजिक सिस्टम, सुरक्षा उपकरण (जैसे एयरबैग) और कई इलेक्ट्रॉनिक, मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल हिस्से। इन सबकी वजह से कार का वजन बढ़ता है। कारों में बैटरी भी मोटरसाइकिल की तुलना में अधिक बड़ी होती है।

भले ही मोटरसाइकिल दो लोगों को ले जा सकती है और कारों का इस्तेमाल कई बार सिर्फ एक व्यक्ति करता है, लेकिन कारें असल में 4 से 5 लोगों और उनके सामान को ले जाने के लिए बनाई जाती हैं। इसलिए कार और मोटरसाइकिल की तुलना करना ही गलत है। यह पूरी तरह से बेमतलब है।

इलेक्ट्रिक मोटर की ताकत ‘शक्ति का विकेंद्रीकरण’ है?

राहुल गाँधी ने अपने भाषण में कहा कि इलेक्ट्रिक गाड़ियों की ताकत ‘शक्ति के विकेंद्रीकरण’ में है, यानी मोटर को गाड़ी के अलग-अलग हिस्सों में लगाया जा सकता है जिससे ऊर्जा का बेहतर वितरण होता है।

कुछ इलेक्ट्रिक गाड़ियों में ऐसा होता है कि हर पहिए पर अलग मोटर होती है, जिससे ट्रैक्शन और एफिशिएंसी बेहतर होती है। लेकिन यह कोई सामान्य सेटिंग नहीं है। ऐसी तकनीक सिर्फ कुछ महँगी और हाई-एंड गाड़ियों में मिलती है। ज्यादातर इलेक्ट्रिक गाड़ियों में सिर्फ एक या दो मोटर ही होते हैं।

अगर गाड़ी में ज्यादा मोटर लगाए जाएँ, तो उसकी कीमत बढ़ जाती है और बिजली की खपत भी ज्यादा होती है। हर ग्राहक को चार मोटर वाली गाड़ी चाहिए, ऐसा भी जरूरी नहीं है।

इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की मजबूती कई दूसरे पहलुओं से भी आती है। उदाहरण के लिए, इलेक्ट्रिक मोटर ऊर्जा को बहुत कुशलता से बदलती है (इनकी एफिशिएंसी 80–90% तक होती है, जबकि पेट्रोल या डीजल इंजन की दक्षता सिर्फ लगभग 25% होती है) इसके अलावा, इलेक्ट्रिक मोटर तुरंत टॉर्क देती है, जिससे गाड़ी तेजी से चलती है और ये प्रदूषण भी बहुत कम करती हैं।

हालाँकि यह मान लेना कि EV हल्की होती हैं- सही नहीं है। इनकी बैटरी बहुत भारी होती है, जिससे इनका कुल वजन पेट्रोल गाड़ियों जितना या उससे ज्यादा हो सकता है। उदाहरण के तौर पर, Tata Nexon का पेट्रोल मॉडल लगभग 1300 किलो वजन का होता है, जबकि Tata Nexon EV का वजन करीब 1400 किलो होता है। EV मोटर भले ही हल्की होती है, लेकिन भारी बैटरी पैक कुल वजन को बढ़ा देता है।

ये खबर मूल रूप से अंग्रेजी में राजू दास ने लिखी है। मूल कॉपी पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएं।

क्या है व्यक्तित्व अधिकारों की सुरक्षा? श्री श्री रविशंकर को AI वीडियो तो आशा भोसले को आवाज क्लोनिंग मामले में HC से राहत: डीपफेक वीडियो को लेकर अभिषेक-ऐश्वर्या ने Google पर किया केस

इंटरनेट पर डीपफेक फोटो और वीडियो के प्रसार पर दिल्ली हाईकोर्ट ने आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर के ‘व्यक्तित्व के अधिकारों’ (Personality Rights) की रक्षा की है। इसके अलावा कोर्ट ने ऐश्वर्या राय बच्चन और अभिषेक बच्चन की याचिका पर भी सुनवाई की, जिसमें AI जेनरेटेड वीडियो यूट्यूब पर डालने के चलते गूगल से ₹4 करोड़ की माँग की गई है। वही बॉम्बे हाई कोर्ट ने आशा भोसले को उनकी आवाज की क्लोनिंग और तस्वीरों को लेकर सुरक्षा प्रदान की है।

जॉन डो नाम के व्यक्ति पर श्री श्री रविशंकर की डीपफेक बनाने का आरोप

दिल्ली हाईकोर्ट में 26 अगस्त 2025 को श्री श्री रविशंकर ने शिकायत की कि कुछ AI वीडियो प्रसारित हो रहे हैं, जिसमें उनके नाम और पहचान का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है। इसमें खासतौर से जॉन डो नाम के व्यक्ति पर आरोप लगाए गए।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, रविशंकर की ओर से कोर्ट में बताया गया कि ये वीडियो जुलाई और अगस्त 2025 के बीच सामने आए, जिनमें उन्हें गंभीर बीमारियों के लिए संदिग्ध इलाजों का प्रचार करते हुए दिखाया गया और उनके नाम से झूठे वैज्ञानिक दावे किए गए।

रवि शंकर ने कोर्ट से कहा कि ये वीडियो उनकी शिक्षाओं को गलत तरीके से पेश कर रहे हैं, जिससे जनता भ्रमित हो सकती है और उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँच सकता है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि उनके नाम, छवि और विशिष्ट शैली पर उनका अधिकार है, जिसे बिना अनुमति डिजिटल रूप से छीना जा रहा है।

कोर्ट ने इस पर आदेश देते हुए कहा कि ऐसे कन्टेंट को फैलाने से नहीं रोका गया तो रवि शंकर को काफी नुकसान पहुँच सकता है। कोर्ट ने आदेश में साफ कहा कि जॉन डो को रविशंकर के व्यक्तित्व अधिकारों और प्रचार अधिकारों का उल्लंघन करने से रोका जाता है।

आशा भोसले की आवाज की क्लोनिंग पर रोक

बॉम्बे हाई कोर्ट ने मशहूर गायिका आशा भोसले के अधिकारों की रक्षा करते हुए AI प्लेटफॉर्म्स, ई-कॉमर्स वेबसाइट्स और स्वतंत्र विक्रेताओं को उनकी आवाज की नकल करने या उनकी छवि का गलत इस्तेमाल करने पर रोक लगा दी है।

कोर्ट ने यह आदेश गायिका की याचिका पर दिया है, जिसमें कई लोगों पर उनकी आवाज और तस्वीरों का दुरुपयोग करने के आरोप थे। इनमें AI कंपनी Mayk Inc. पर आवाज की क्लोनिंग करने का आरोप है। Amazon Sellers Services Pvt Ltd और Flipkart Internet Pvt Ltd पर उनकी छवि वाले पोस्टर और मर्चेंडाइज बिना अनुमति बेचने के आरोप हैं।

इसके अलावा एक स्वतंत्र कलाकार पर उनकी तस्वीरों के कपड़े बेचने के आरोप और Google LLC पर यूट्यूबर पर उनकी आवाज की नकल करने वाले AI वीडियो होस्ट करने का आरोप है।

आशा भोसले को अंतरिम सुरक्षा प्रदान करने के साथ ही कोर्ट ने इन सभी प्रतिवादियों को ऐसी सभी कन्टेंट को अपने प्लेटफॉर्म से हटाने के भी आदेश दिए हैं। इसके अतिरिक्त सभी प्लेटफॉर्म्स को उल्लंघनकारी सामग्री से जुड़ी ग्राहक या विक्रेता की जानकारी, जिसमें नाम, संपर्क जानकारी, IP लॉग और भुगतान विवरण की जानकारी देनी होगी ताकि भोसले आगे कानूनी उपाय अपना सकें।

अभिषेक और ऐश्वर्या बच्चन ने गूगल पर किया केस

बॉलीवुड के मशहूर दंपति अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या राय बच्चन ने भी AI जेनरेटेड डीपफेक वीडियो को लेकर गूगल और यूट्यूब पर केस किया है और व्यक्तित्व अधिकारों के सुरक्षा माँगी गई है। साथ ही उनकी छवि को पहुँचे नुकसान के लिए गूगल से ₹4 करोड़ की राशि की भी माँग की गई है।

अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या राय ने इस संबंध में 06 सितंबर 2025 को 1500 पन्नों की याचिका दायर की थी। इसमें सैंकड़ों लिंक औऱ स्क्रीनशॉट शामिल हैं, जिनमें दावा किया गया है कि यूट्यूब पर कई ऐसे वीडियो हैं जिनमें उनकी तस्वीरों और आवाजों का इस्तेमाल फर्जी, भ्रामक और अपमानजनक तरीकों से किया गया है।

गुरुवार (02 अक्टूबर 2025) को मामले की सुनवाई में दिल्ली हाई कोर्ट ने गूगल को नोटिस जारी किया है और लिखित जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 15 जनवरी 2026 तय की गई है।

अरिजीत सिंह के व्यक्तित्व अधिकारों की रक्षा का कोर्ट आदेश

बॉलीवुड के मशहूर सिंगर भी बॉम्बे हाई कोर्ट में कुछ AI प्लेटफॉर्म पर उनके नाम, आवाज और तस्वीर के उपयोग से व्यक्तित्व अधिकारों की रक्षा की माँग कर चुके हैं। इस मामले में कोर्ट ने 26 जुलाई 2024 को ex-parte आदेश पारित कर अंतरिम सुरक्षा प्रदान की, जिसमें कहा गया कि बिना उनकी सहमति किसी को उनके नाम, आवाज, छवि आदि का उपयोग करने की अनुमति नहीं है। इसके साथ इंटरनेट पर उपलब्ध इस प्रकार का कन्टेंट हटाने के भी आदेश दिए थे।

क्या है व्यक्तित्व अधिकारों की रक्षा करना?

व्यक्तित्व अधिकारों की रक्षा इसीलिए की जाती है क्योंकि किसी भी व्यक्ति का नाम, चेहरा, आवाज, फोटो या हावभाव उसकी पहचान और निजी संपत्ति माने जाते हैं। ऐसे में जब AI या तकनीक से नकली वीडियो या वॉइस क्लोनिंग होती है तो यह उसकी छवि को नुकसान पहुँचाने, लोगों को गुमराह करने और उसकी पेशेवर कमाई पर असर डालने का खतरा पैदा करती है।

इसकी सुरक्षा के लिए अदालत बिना अनुमति ऐसी किसी भी तरह की सामग्री का न इस्तेमाल करने का आदेश देती है। ये अधिकार लोगों को, विशेष रूप से सार्वजनिक हस्तियों को उनकी सहमति के बिना विज्ञापन, व्यापारिक वस्तुओं, AI जेनरेटेड सामग्री और अन्य व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए उनके व्यक्तित्व के दुरुपयोग से बचाते हैं।

एक्ट्रेस रश्मिका मंदाना का डीपफेक वीडियो हुआ था वायरल

एक्ट्रेस रश्मिका मंदाना का एक डीपफेक वीडियो दो साल पहले इंटरनेट पर खूब वायरल हुआ था। इस वीडियो में एक बिकनी मॉडल के चेहरे को मॉर्फ कर रश्मिका मंदाना की तस्वीर लगा दी गई थी। सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद इस वीडियो की सच्चाई खुद सामने आकर रश्मिका ने बताई थी।

इस वीडियो पर दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने BNS की धारा 465 (जालसाजी के लिए दंड) और 469 (प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाने के उद्देश्य से जालसाजी) और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66 C और 66E के तहत मामला दर्ज कर संज्ञान लिया। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए वीडियो बनाने वाले मुख्य आरोपित को भी गिरफ्तार कर लिया था।

कहाँ से आया डीपफेक, कैसे करता है काम?

डीपफेक के सम्बन्ध में ‘द गार्जियन‘ के एक लेख में जानकारी दी गई है कि यह सबसे पहले सोशल मीडिया एप रेडिट (Reddit) पर सामने आया था। तब एक Deepfake नाम के यूजर ने टेलर स्विफ्ट, गल गडोट जैसी अभिनेत्रियों के फर्जी पोर्न क्लिप डाल दिए। इसके बाद से ऐसे वीडियो की बाढ़ आ गई।

डीपफेक तकनीक से वीडियो बनाना एक लम्बी प्रक्रिया है। सबसे पहले जिन दो लोगों के चेहरे आपस में बदले जाने हैं उनके हजारों फोटो वीडियो ‘एनकोडर’ नाम के एक AI आधारित प्रोग्राम पर चलाए जाते हैं। यह तकनीक इन दो चेहरों की समानताएँ परखती है। इसके बाद यह तकनीक इन चेहरों को केवल उनकी समानताओं के आधार पर सीमित कर देती है और एक कंप्रेस्ड इमेज बनाती है।

इसके पश्चात एक और AI तकनीक ‘डीकोडर’ से चेहरा तलाशने को कहा जाता है। आसान भाषा में समझे तो इनकोडर को ‘A’ का चेहरा पढ़ने के लिए तैयार किया जाता और डीकोडर को ‘B’ का चेहरा पढ़ने के लिए तैयार किया जाता है। इसके पश्चात दोनों मशीनों से यह चेहरा बनाने को कहा जाता है लेकिन इस स्थिति में इनकोडर को B का और डीकोडर को A का चेहरा बनाने को कहा जाएगा। ऐसे में मान लीजिए कि B उस फोटो में रो रहा है तो नई फोटो में A रोता हुआ दिखेगा।

इसके अलावा एक अन्य तकनीक जिसका नाम ‘जनरेटिव एड्वर्सियल नेटवर्क’ (GAN) है उसके जरिए भी बनाई जाती हैं। इसमें एक गड़बड़ तस्वीर और एक सही तस्वीर डाली जाती है। AI तकनीक इन दोनों के कोड डिकोड करके फोटो को आपस में मिलाती है। इसमें समय लगता है।

MLA बनने के शरजील इमाम के ख्वाब पर मुस्लिम भी खसा रहे बज्जर: समर्थक कह रहे- किशनगंज से ओवैसी दे टिकट, AIMIM ने कहा- मर्द है तो अपने इलाके से लड़े

बिहार के किशनगंज में मुस्लिमों की संख्या पूरे राज्य में सर्वाधिक है, 70% मुस्लिम आबादी वाले इस जिले में चुनाव से पहले मुस्लिम आपस में बँट गए हैं। इसकी वजह बना है जेल में बंद दिल्ली दंगों का आरोपित शरजील इमाम।

शरजील ने किशनगंज जिले के अंतर्गत आने वाली बहादुरगंज विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने का एलान कर दिया है। शरजील का भाई मुजम्मिल इमाम उसके लिए प्रचार कर रहा है। अब यहाँ मुस्लिम इस बात को लेकर आपस में बँट गए हैं कि शरजील इमाम को किस दल से चुनाव लड़ना चाहिए।

स्क्रॉल में बीते अगस्त में शरजील इमाम का एक इंटरव्यू छपा था। इसमें शरजील से पूछा गया कि वह किस पार्टी से चुनाव लड़ना चाहता है। शरजील ने कहा, “हमारे विकल्प सीमित हैं। मैं उन पार्टियों के साथ जुड़ना नहीं चाहता जो सिर्फ इमोशनल भाषण देती हैं।”

शरजील ने कहा, “हम किसी भी ऐसी पार्टी के साथ काम करने और जुड़ने के लिए तैयार हैं जो हमें बुनियादी व्यवस्थागत मुद्दों को उठाने और अल्पसंख्यकों व हाशिए पर पड़े लोगों के सम्मानजनक जीवन के लिए जरूरी संवैधानिक बदलावों के बारे में संदेश फैलाने में मदद करे।”

शरजील को AIMIM के समर्थन मिलने की माँग

सीमांचल के इस इलाके में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM ने 2020 के चुनावों में शानदार प्रदर्शन किया था। उन्होंने सीमांचल की 24 सीटों में से 20 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे जिनमें से 5 सीटें जीतीं थी। इस बार भी इस मुस्लिम बहुल इलाके में उनकी पार्टी पूरे दमखम से चुनाव लड़ रही है।

ऐसे में सोशल मीडिया और जमीन पर शरजील के समर्थकों के बीच यह माँग उठने लगी है कि ओवैसी की पार्टी को अपना उम्मीदवार इस सीट पर नहीं खड़ा करना चाहिए, कुछ लोग माँग कर रहे हैं कि ओवैसी की पार्टी को शरजील को टिकट देना चाहिए।

X पर शेख सब्बीर नामक एक यूजर ने लिखा, “शरजील इमाम जैसे होनहार, काबिल, पढ़ा लिखा, संजीदा शख्स को सदन में भेजना चाहिए। इसके लिए AIMIM के जिम्मेदार हजरात मुजम्मिल से बात करें।” सोहेल नामक एक अन्य यूजर ने लिखा, “AIMIM ने शरजील इमाम को टिकट क्यों नहीं दी है।”

वहीं, बहादुरगंज विधानसभा के AIMIM प्रत्याशी तौसीफ आलम ने कह दिया है कि वो किसी शरजील इमाम को नहीं जानते हैं। तौसीफ ने तो यहाँ तक कह दिया कि अगर उसमें मर्दानगी है तो अपने क्षेत्र से वह चुनाव लड़े। इस पर शरजील के भाई मुजम्मिल ने प्रतिक्रिया दी है।

मुजम्मिल ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए वही बात दोहराई जो सोशल मीडिया पर चर्चा में है। मुजम्मिल ने कहा, “क्या किसी ने ये सवाल AIMIM के आलाकमान से ये सवाल पूछा कि शरजील इमाम को टिकट क्यों नहीं दिया, जब कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में ताहिर हुसैन साहब के घर तक चल कर खुद ओवैसी साहब गए और उनके परिवार से मुलाकात कर टिकट दिया।”

सोशल मीडिया पर जारी इस बहस के बीच यह जानना भी अहम है कि शरजील इमाम के अब्बू अकबर इमाम भी नेता रहे हैं। 2000 में उन्होंने कुर्था से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा था और इसके बाद वह नीतीश कुमार की पार्टी JDU से जुड़े रहे। 2005 में उन्होंने JDU के टिकट पर जहाँनाबाद से चुनाव लड़ा था लेकिन वह RJD के उम्मीदवार से चुनाव हार गए थे। 2014 में उनका निधन हो गए था।

मुस्लिमों के ठेकेदार RJD-कॉन्ग्रेस की चुप्पी

शरजील इमाम को टिकट देने के नाम पर RJD और कॉन्ग्रेस दोनों चुप हैं। ये दोनों पार्टियाँ खुद को मुस्लिमों की रहनुमा बताती हैं लेकिन ये दोनों ही ना शरजील को टिकट देने में दिलचस्पी दिखा रही हैं, ना कोई इनसे यह माँग कर रहा है कि ये शरजील को टिकट दें। यानी बिहार में मुस्लिमों की उम्मीद केवल अब AIMIM से रह गई है और उस उम्मीद के चक्कर में किशनगंज के वोटर बँट गए हैं।

RJD और कॉन्ग्रेस दोनों दल AIMIM पर वोट काटने का आरोप लगाते हैं, बीजेपी की ‘B’ टीम बताते हैं लेकिन जब बारी साथ खड़े होने की आती है तो भाग खड़े होते हैं। इस चुनाव से पहले भी खुद औवेसी ने RJD से गठबंधन कर उन्हें महागठबंधन का हिस्सा बनाने की बात कही थी।

RJD ने क्या किया, RJD ने गठबंधन करना तो दूर AIMIM के नेताओं से ठीक तरह से मिलना तक मुनासिब नहीं समझा। ऐसे में शरजील इमाम के बहाने मुस्लिमों के बीच किशनगंज में मची सर-फुटव्वल फिर सामने आ गई है।