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‘80,000 मुस्लिम वोटरों को अंतिम सूची से हटाया गया’: प्रोपेगेंडा मीडिया ‘द रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ ने बिहार SIR पर की झूठी रिपोर्ट, जानिए क्या है पूरा सच

प्रोपेगेंडा वेबसाइट 'द रिपोर्टर्स कलेक्टिव' ने 28 सितंबर 2025 को एक रिपोर्ट प्रकाशित की। इसमें दावा किया गया कि पूर्वी चंपारण जिले के ढाका विधानसभा क्षेत्र में लगभग 80,000 मुस्लिम वोटरों को वोटर लिस्ट से हटाने की कोशिश की गई।

बिहार में विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, राजनीतिक माहौल भी तेज होता जा रहा है। बीते दिनों में ‘वोट चोरी’ और विशेष मतदाता पुनरीक्षण अभियान (Special Intensive Revision – SIR) के जरिए मतदाताओं का नाम वोटर लिस्ट से हटाने जैसे झूठे आरोपों ने माहौल को और तनावपूर्ण बना दिया है।

इसी बीच प्रोपेगेंडा वेबसाइट ‘द रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ ने 28 सितंबर 2025 को एक रिपोर्ट प्रकाशित की। इसमें दावा किया गया कि पूर्वी चंपारण जिले के ढाका विधानसभा क्षेत्र में लगभग 80,000 मुस्लिम वोटरों को वोटर लिस्ट से हटाने की कोशिश की गई।

यह रिपोर्ट आयुषी कर और विष्णु नारायण ने लिखी थाी। रिपोर्ट में दावा किया गया कि यह योजना पूर्वी चंपारण जिले के ढाका विधानसभा क्षेत्र में चलाई जा रही थी, जहाँ मुस्लिम वोटरों को ‘गैर-नागरिक’ बताकर सूची से हटाने की कोशिश की गई।

हालाँकि इन दावों की पोल तब खुल गई जब अंतिम वोटर लिस्ट 30 सितंबर 2025 को जारी हुई। चुनाव आयोग ने बताया कि पूरे SIR की प्रक्रिया में ढाका विधानसभा के महज 17,631 वोटर्स के नाम ही हटाए गए।

हटाए गए नाम उन लोगों के थे जो या तो मृतक थे, लंबे समय से मौजूद नहीं थे, या फिर दूसरे स्थानों पर चले गए थे। ढाका क्षेत्र में कुल 3,44,000 वोटर थे, जिनमें से 3,27,000 को फॉर्म जारी किए गए थे। यानी, 80,000 मुस्लिम वोटरों को हटाने का दावा पूरी तरह से झूठा और गुमराह करने वाला निकला।

चुनाव आयोग ने किसी भी धर्म या समुदाय को निशाना नहीं बनाया। जिन मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए, वे सभी तय प्रक्रिया के तहत हटाए गए थे। इसके अलावा, बूथ स्तर के एजेंट (Booth Level Agents – BLAs) ने सिर्फ उन्हीं मतदाताओं को हटाने के लिए आवेदन दिए जो योग्य नहीं थे, जैसे कि फर्जी नाम, दोहराव, या जिनके दस्तावेज अधूरे थे।

रिपोर्ट में किए गए विवादित दावे

रिपोर्ट में दावा किया गया कि बिहार के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी (CEO) और भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के जिला अधिकारी यानी निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) को आधिकारिक आवेदन दिए गए ताकि मुस्लिम वोटरों को मतदाता सूची से हटाया जा सके।

इसमें आरोप लगाते हुए लिखा गया, “एक आवेदन ढाका से बीजेपी विधायक पवन कुमार जैसवाल के निजी सहायक के नाम से किया गया। दूसरा आवेदन पटना स्थित बीजेपी राज्य मुख्यालय के लेटरहेड पर किया गया। ये हमारे द्वारा देखे गए दस्तावेजों से स्पष्ट होता है।”

रिपोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि ‘यह एक सोचा समझा और टार्गेटेड प्रयास था, जिसका उद्देश्य ढाका विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम वोटरों को बड़े पैमाने पर हटाना था।’

रिपोर्ट में यह भी आरोप लगाया गया कि चुनाव आयोग के अधिकारियों ने उन लोगों को रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया, जो ढाका के लोगों का नाम मतदान सूची से हटाना चाहते थे।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि SIR अभियान के दौरान ECI ने ‘बीच में यह निर्णय लिया कि लोगों को सिर्फ नामांकन फॉर्म भरवाना होगा और दस्तावेजी प्रमाण बाद में दिए जा सकते हैं।’

रिपोर्ट ने आयोग, उसके अधिकारियों, बूथ स्तर के कर्मचारियों और स्वयंसेवकों को ‘विश्वास न करने लायक’ तक कह डाला। रिपोर्ट में कहा गया, “हमने बीजेपी द्वारा जिला निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी को दिए गए सभी आवेदन देखे। जिन सभी नामों को हटाने की माँग की गई, वे मुस्लिम थे।”

रिपोर्ट ने यह आरोप भी लगाया कि पार्टी की ओर से हर आवेदन पर BLA ने हस्ताक्षर किए, लेकिन यह नहीं बताया गया कि किन कारणों से नाम हटाने की माँग की गई, जबकि यह बताना जरूरी होता है।

रिपोर्ट ने बीजेपी नेता और ढाका विधायक के निजी सहायक धीरज कुमार पर आरोप लगाया कि उन्होंने ढाका सीट से 78,384 मुस्लिम वोटरों को हटाने की माँग की।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया, “बीजेपी राज्य मुख्यालय के लेटरहेड पर एक पत्र पटना स्थित मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी को भेजा गया। CEO राज्य में आयोग का सबसे वरिष्ठ अधिकारी होता है।” इस पत्र में वही माँग दोहराई गई।

हालाँकि मीडिया पोर्टल द्वारा लगाए गए इन चौंकाने वाले आरोपों के बावजूद ढाका की अंतिम वोटर सूची ने उनके दावों की पोल पूरी तरह से खोल दी। इसके अलावा, यह भी जानना जरूरी है कि किसी भी राजनीतिक दल ने SIR अभियान को लेकर चुनाव आयोग में कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई।

इसके उलट उनके नेताओं ने झूठ फैलाया और उनके कार्यकर्ता पूरे अभियान के दौरान आयोग के साथ मिलकर काम करते रहे। इससे उनके प्रचार का गुब्बारा और भी फूट गया।

‘द रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ की स्थापना किसने की?

इस मीडिया संस्थान की स्थापना नितिन सेठी और कुमार संभव श्रीवास्तव ने की थी और यह ग्लोबल इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म नेटवर्क से जुड़ा हुआ है। इसे ओपन सोसाइटी फाउंडेशन, फोर्ड फाउंडेशन और KAS जैसी संस्थाओं से आर्थिक सहायता मिलती है, साथ ही अन्य नेटवर्कों से भी फंड प्राप्त होता है।

जर्मनी की KAS फाउंडेशन CSDS को भी आर्थिक मदद देती है। CSDS तब सुर्खियों में आया जब इसके निदेशक संजय कुमार ने महाराष्ट्र चुनावों को लेकर गलत जानकारी फैलाई। उन्होंने बाद में माफी माँगी, लेकिन तब तक वह झूठ सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल चुका था और कॉन्ग्रेस पार्टी ने इसका इस्तेमाल बीजेपी पर हमला करने के लिए किया।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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