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‘आइए गर्व से कहें, ये स्वदेशी है’: PM मोदी का ‘GST बचत उत्सव’ पर देश के नाम पत्र, कहा- सुधारों से आत्मनिर्भर भारत अभियान को तेज गति मिलेगी

मेरे प्यारे देशवासियों, नमस्कार।

आपको और आपके परिवार को शक्ति की उपासना के पर्व नवरात्रि की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ। मेरी प्रार्थना है, ये त्योहार आप सभी के जीवन में सुख और समृद्धि लेकर आए।

इस वर्ष त्योहारों में हमें एक और उपहार मिल रहा है। 22 सितंबर 2025 से Next Generation GST Reforms लागू होने के साथ ही पूरे देश में ‘GST बचत उत्सव की शुरुआत हो गई है। इन रिफॉर्म्स से किसान, महिला, युवा, गरीब, मध्यम वर्ग, व्यापारी, लघु उद्योग, कुटीर उद्योग, सभी को फायदा होगा।

नए GST रिफॉर्म्स की विशेषता है कि अब मुख्य रूप से सिर्फ दो ही स्लैब रहेंगे। रोजमर्रा की जरूरी चीजें जैसे स्वाना, दवाइयाँ, साबुन, टूथपेस्ट और कई अन्य सामान अब या तो टैक्स फ्री होंगे या 5% की सबसे कम स्लैब में आएँगे। घर बनाने, गाड़ी खरीदने, बाहर खाने या परिवार के साथ छुट्टियाँ मनाने जैसे सपनों को पूरा करना अब आसान होगा। हेल्थ इंश्योरेंस पर भी अब GST को शून्य कर दिया गया है।

मुझे ये देखकर अच्छा लगा कि कई दुकानदार और व्यापारी ‘पहले और अब’ के बोर्ड लगाकर, लोगों को बता रहे हैं कि कोई सामान कितना सस्ता हो गया है।

हमारी GST यात्रा 2017 में शुरू हुई थी। तब देश को अनेक तरह के टैक्स और टोल के जंजाल से मुक्ति मिली थी। इससे ग्राहकों और व्यापारियों, कारोबारियों को बहुत राहत मिली थी। अब ये नेक्स्ट जनरेशन GST रिफॉर्म हमें और आगे ले जा रहे है। इसमें सिस्टम को और सरल बनाया गया है। इससे हमारे दुकानदार साथियों, लघु उद्योगों की सहूलियत और बढ़ेगी।

नागरिक देवो भव हमारा मंत्र है। पिछले 11 वर्षों में हमारे प्रयासों से 25 करोड़ लोग गरीबी से बाहर आए हैं। देश में एक नियो मिडिल क्लास तैयार हुआ है। अब इसे और सशक्त बनाया जा रहा है। हमने मध्यम वर्ग को भी मजबूत किया है। 12 लाख रुपए तक की आप पर कोई टैक्स नहीं लिया जा रहा है। अगर इनकम टैक्स में छूट और नए GST Reforms को मिलाकर देखें तो देशवासियों के सालाना लगभग 2.5 लाख करोड़ रुपए बचेंगे।

देश ने 2047 तक विकसित भारत का संकल्प लिया है और इसे सिद्ध करने के लिए आत्मनिर्भरता के रास्ते पर चलना जरूरी है। नए GST रिफॉर्म्स से आत्मनिर्भर भारत अभियान को भी तेज गति मिलेगी।

आत्मनिर्भरता के लिए आवश्यक है कि हम स्वदेशी को अपने जीवन का हिस्सा बनाएँ। चाहे ब्रांड कोई भी हो, कंपनी कोई भी हो, अगर उसमें भारतीय श्रमिक और कारीगर की मेहनत लगी है, तो वो स्वदेशी है।

जब भी आप अपने देश के कारीगरों, श्रमिकों और इंडस्ट्री के बनाए सामान को खरीदते हैं तो आप कई परिवारों की रोजी-रोटी में मदद करते हैं और देश के युवाओं के लिए रोजगार पैदा करते हैं।

मैं अपने दुकानदारों और व्यापारियों से भी अपील करता हूँ कि वो स्वदेशी सामान ही बेचें।

आइए गर्व से कहें, ये स्वदेशी है।

आपके घर की बचत बढ़े, आपके सपने पूरे हों, आप अपने पसंद की चीजों के साथ त्योहारों की चमक बढ़ाएँ… मेरी यही कामना है। एक बार फिर, मैं आपको नवरात्रि के साथ ही ‘GST बचत उत्सव’ की शुभकामनाएँ देता हूँ। धन्यवाद ।

नरेन्द्र मोदी

UP में अब नहीं होंगी जाति आधारित सभाएँ, FIR और अरेस्ट मेमो में नहीं भी होगा जातियों का जिक्र: योगी सरकार का बड़ा कदम

यूपी में जाति आधारित रैलियाँ, गाड़ियों पर जाति सूचक शब्द या एफआईआर में जातियों का अब उल्लेख नहीं होगा। योगी सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का पालन करते हुए सार्वजनिक तौर पर जाति सूचक शब्दों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। राज्य के मुख्य सचिव ने इसे सार्वजनिक जगहों और पुलिस रिकॉर्डस् में जाति के उल्लेख पर रोक लगाने के निर्देश दिए हैं। राज्य में जाति भेदभाव को दूर करने की दिशा में इसे एक अहम कदम माना जा रहा है।

यूपी के मुख्य सचिव के निर्देश में जिन बातों पर जोर दिया गया है, उसमें जाति आधारित रैलियों पर पूरी तरह से रोक, सोशल मीडिया पर सख्ती अहम है। हालाँकि एससी-एसटी एक्ट के तहत आने वाले मामलों में छूट दी गई है।

राज्य के मुख्य सचिव के निर्देश

FIR और पुलिस रिकॉर्ड में जाति का जिक्र नहीं- अब पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर, चार्जशीट या दूसरे दस्तावेजों में जाति का उल्लेख नहीं होगा। अब आरोपित के पिता-माता का नाम लिखा जाएगा। इससे उसकी पहचान होगी। पहले माता का नाम लिखना अनिवार्य नहीं था।

जाति आधारित रैलियों पर बैन- जाति आधारित रैलियों पर पूरी तरह रोक लगा दिया गया है। सोशल मीडिया और इंटरनेट पर जातीय घृणा फैलाने वाले कंटेंट या जाति विशेष के महिमामंडन वाले कंटेंट या वीडियो पर रोक लगा दी गई है। ऐसा करने पर आईटी नियमों के तहत कार्रवाई की जाएगी।

हालाँकि इस मामले में एससी-एसटी एक्ट के तहत आने वाले मामलों में छूट दी जाएगी।

सार्वजनिक स्थानों पर जातिसूचक शब्दों पर बैन- गाड़ियों, साइन बोर्ड्स, थाने के नोटिस बोर्ड या दूसरे सार्वजनिक जगहों पर जाति आधारित संकेत, शब्द या प्रतीक हटा दिए जाएँगे। इसके लिए मोटर वाहन नियमों में भी बदलाव किया जाएगा।

एनसीआरबी और सीसीटीएनएस सिस्टम- राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के क्राइम क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क एंड सिस्टम सीसीटीएनएस में जाति भरने वाले कॉलम को छोड़ा जाएगा। एनसीआरबी को पत्र लिखकर इस कॉलम को डिलीट करने की अपील सरकार करेगी।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रवीण छेत्री बनाम राज्य मामले में सुनवाई के दौरान ऐतिहासिक फैसला दिया था। जस्टिस विनोद दिवाकर ने 19 सितंबर 2025 को शराब तस्करी के मामले पर सुनवाई के दौरान जाति सूचक शब्द को हटाने का निर्देश दिया था। याचिकाकर्ता प्रवीण छेत्री ने अपनी गिरफ्तारी के दौरान एफआईआर और जब्ती मेमो में अपनी भील जाति लिखे जाने पर आपत्ति जताई थी। कोर्ट ने जाति के महिमामंडन को ‘एंटी नेशनल’ और नैतिकता के खिलाफ कहा था।

‘राम-राम नहीं कहा तो इमाम को पीटा’: कॉन्ग्रेस हो या इस्लामी कट्टरपंथी या फिर मीडिया… सबने अलीगढ़ की आपसी झड़प पर हिंदुओं को बदनाम करने के लिए फैलाया झूठ, जानिए सच

अलीगढ़ से एक इमाम की पिटाई का मामला चर्चा में है। इमाम का नाम मुहम्मद मुस्तकीम है। पुलिस ने इस केस में जाँच के बाद स्पष्ट कहा है कि ये आपसी झड़प का मामला था। बावजूद इसके सोशल मीडिया पर वामपंथी और इस्लामी कट्टरपंथी इसे मॉब लिंचिंग का केस बताकर फैला रहे हैं।

दावा किया जा रहा है कि ‘राम-राम’ न कहने के कारण इमाम पर हमला हुआ। दिलचस्प बात ये है कि घटना से जुड़ी लिखित शिकायत में मुस्तकीम ने धार्मिक नारे लगवाने वाली बात कहीं बताई ही नहीं है। सारा प्रोपेगेंडा बाद में बनाई गई एक वीडियो को वायरल करके फैलाया जा रहा है।

वायरल वीडियो में इमाम क्या बोला?

वायरल वीडियो में मुस्तकीम बताता है कि वह लखनपुरा की मस्जिद का इमाम है और बच्चों को उर्दू पढ़ाता है। शनिवार (20 सितंबर 2025) शाम को वह बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर लौट रहा था। उसे बुलाकगढ़ी के पास कुछ लोगों ने रोका। उसे राम-राम बोलने के लिए कहा गया। जब उसने किसी बात का जवाब नहीं दिया तो उसके साथ मार-पीट की गई। उसे पाकिस्तान जाने के लिए कहा गया। उसने यहाँ तक आरोप लगाया कि राह चलते लोगों से बुलवाया जाता है और बदतमीजी की जाती थी।

इस्लामी कट्टरपंथी बता रहे मॉब लिंचिंग, कॉन्ग्रेस का प्रोपेगेंडा

अब उसकी इसी वीडियो को शेयर करते हुए इस्लामी कट्टरपंथी अलग एंगल दे रहे हैं। इमाम से मारपीट को स्थानीय मुफ्ती मोहम्मद अकबर काजमी ने ‘मॉब लिंचिंग’ करार दिया। उसने कहा है कि इमाम से ‘जय श्रीराम’ के नारे लगवाए गए और 10-12 लोगों ने मिलकर पीटा। पुलिस इस मामले में जल्द कार्रवाई करे।

तस्वीर साभार: दैनिक भास्कर

शाही जामा मस्जिद के इमाम महमूद रजा काजमी ने आरोप लगाया कि मुस्तकीम को 1 महीने से परेशान किया जा रहा था। लड़के उसे राम-राम कहकर परेशाम करते थे। जवाब न देने पर उसे गाली दी जाती थी-कठमुल्ला कहा जाता था। उसके साथ इन्हीं सबके कारण मारपीट हुई है। मामले में सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

इसी तरह इस वीडियो के बूते कॉन्ग्रेसी अपना प्रोपगेंडा आगे बढ़ा रहे हैं। दिखाया जा रहा है कि मस्जिद के इमाम को बंधक बनाकर इसलिए पीटा गया क्योंकि उसने राम-राम नहीं बोला।

यूपी कॉन्ग्रेस का ट्वीट

मीडिया संस्थानों ने दी गलत जानकारी को हवा

यूपी कॉन्ग्रेस और इस्लामी कट्टरपंथियों के अलावा सोशल मीडिया व मीडिया संस्थानों ने भी बिना मामले में सच्चाई की पड़ताल किए इसी दावे को हवा दी है। द ऑब्जर्वर पोस्ट ने तो ये लिखा है कि इमाम की दाढ़ी-टोपी देखकर उस पर हमला हुआ।

ऑब्जर्वर पोस्ट का ट्वीट

एबीपी ने तो अपनी रिपोर्ट में ये भी बताया कि मुस्तकीम की दाढ़ी नोचकर उसे कटवा, गाय खाने वाला कहा गया। इसी तरह दैनिक भास्कर ने भी इसी बयान के आधार पर ये रिपोर्ट की।

एबीपी और दैनिक भास्कर में प्रकाशित रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

पुलिस ने सारे दावे किए खारिज

वहीं अगर केस की जाँच करने वाली अलीगढ़ पुलिस का पक्ष जानें तो पता चलता है कि ये सारे दावे फर्जी हैं। ऑपइंडिया से बातचीत में भी पुलिस ने बताया कि ये सामान्य मारपीट वाली घटना है।

पुलिस के अनुसार, घटना 20 अगस्त 2025 को थाना लोदा में ग्राम बुलाकगढ़ी के मुहम्मद मुस्तकीम को लेकर है। इमाम मुस्तकीम उस दिन अपनी साइकिल से उस दिन रास्ते से जा रहा था। रास्ते में कुछ बच्चे आ गए थे और उन बच्चों को हटाने के दौरान पास खड़े जीशांत से उसकी बहस हो गई और दोनों के बीच मारपीट होने से दोनों घायल हुए और दोनों को अस्पताल लेकर जाया गया।

पुलिस ने बताया कि इस केस में दोनों पक्ष से शिकायत दर्ज करवाई है। पुलिस की जाँच में सामने आया है इसमें किसी भी तरह का कोई भी धार्मिक रंग व धार्मिक नारा लगाने के लिए मजबूर करने की बात सामने नही आई है, यह बात पूर्णतः गलत है अलीगढ़ पुलिस द्वारा इसका खंडन करती है।

सनातन से नफरत, मजहब से मोहब्बत: तमिलनाडु के स्कूलों में होगी इस्लाम की पढ़ाई, बोले CM स्टालिन- मुस्लिमों के साथ हमेशा खड़ी रहेगी DMK

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने एक बार फिर अपनी पार्टी डीएमके की पुरानी आदत चली। प्रोफेट मुहम्मद के 1500वें जन्म वर्षगांठ पर रविवार (21 सितंबर 2025) को चेन्नई में आयोजित एक बड़े कार्यक्रम में उन्होंने ऐलान कर दिया कि राज्य के स्कूलों के पाठ्यक्रम में इस्लामिक स्टडीज को शामिल किया जाएगा।

स्टालिन ने कहा कि डीएमके हमेशा मुस्लिम समुदाय के साथ खड़ी रही है। उन्होंने सीएए का विरोध करने और वक्फ कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का जिक्र किया। इस दौरान उन्होंने विपक्षी पार्टी एआईएडीएमके पर तीखा हमला बोला कि वो ट्रिपल तलाक जैसे मुद्दों पर दोहरा चरित्र अपनाती है। लेकिन ये ऐलान सिर्फ मुस्लिम भाईयों का दिल जीतने की कोशिश ही नहीं, बल्कि आने वाले विधानसभा चुनावों से पहले वोटबैंक को मजबूत करने का शातिर खेल लगता है।

कार्यक्रम में स्टालिन ने मुस्लिम संगठनों जैसे पीएफआई और एसडीपीआई की पुरानी माँगों पर भी हामी भरी। एसडीपीआई के नेता नेलाई मुबारक ने स्कूलों में प्रोफेट मुहम्मद की शिक्षाओं को पढ़ाने की बात कही थी और स्टालिन ने तुरंत हाँ कह दी। ये देखें तो साफ है कि डीएमके अब तमिलनाडु की राजनीति और समाज को इस्लामी रंग देने पर तुली हुई है। स्टालिन का ये कदम चुनावी साल में आया है, जब तमिलनाडु में 2026 के विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। क्या ये सिर्फ वोट की राजनीति है या सनातन धर्म को नेस्तनाबूद करने की साजिश का नया चरण?

अब बात करते हैं डीएमके की पुरानी दुश्मनी की। ये पार्टी तो सनातन धर्म को लेकर खुलेआम जंग का ऐलान करती रही है। स्टालिन के बेटे और डिप्टी सीएम उदयनिधि स्टालिन ने तो सनातन को डेंगू और मलेरिया से जोड़ दिया था। सितंबर 2023 में एक कार्यक्रम में उदयनिधि ने कहा था कि सनातन धर्म जैसी चीजों को मिटा देना चाहिए, जैसे बीमारियों को खत्म किया जाता है।

ये बयान सुनकर पूरे देश में हंगामा मच गया। सुप्रीम कोर्ट ने भी उदयनिधि को फटकार लगाई और कहा कि वो कोई साधारण आदमी नहीं, मंत्री हैं, तो बयान जिम्मेदारी से दें। लेकिन उदयनिधि ने माफी नहीं माँगी। अक्टूबर 2024 में उन्होंने फिर कहा कि वो कलाइग्नार के पोते हैं, माफी नहीं देंगे। सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2025 में उनके खिलाफ नई एफआईआर रोक दी, लेकिन डीएमके की एंटी-सनातन सोच साफ दिखती है। द्रविड़ राजनीति की जड़ों में ही सनातन को वैदिक परंपरा बताकर जातिवाद का प्रतीक मानने की आदत है।

डीएमके का ये रवैया नया नहीं है। वो तो ब्राह्मणों के खिलाफ खुली जंग लड़ती रही है। 1930-40 के एंटी-हिंदी आंदोलन में डीएमके के पूर्वजों ने हिंदी और संस्कृत को ब्राह्मणों की साजिश बताया। वो मानते थे कि ब्राह्मण तमिल पर हिंदी-सस्कृत थोपना चाहते हैं।

आज भी डीएमके संस्कृत को हिंदू भावना का प्रतीक मानकर विरोध करती है। फरवरी 2025 में एक रिपोर्ट में कहा गया कि डीएमके ने तमिलनाडु में संस्कृत की पढ़ाई को व्यवस्थित तरीके से खत्म करने की कोशिश की है। ये सब सोशल जस्टिस के नाम पर एंटी-हिंदू एजेंडा है।

इसी तरह हिंदी को लेकर डीएमके की दुश्मनी जगजाहिर है। मुख्यमंत्री स्टालिन ने हाल ही में एंटी-हिंदी बयान देकर फिर हंगामा बांधा, लेकिन ये राजनीतिक फायदा नहीं दे रहा। नॉर्थ इंडियन और ब्राह्मणों को निशाना बनाकर डीएमके तमिल अस्मिता का ढोंग करती है। लेकिन वोटबैंक के लिए इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों को समर्थन? ये तो दोहरा चरित्र है!

देखिए, कैसे तमिलनाडु की हवा जहरीली हो रही है। स्कूलों में बच्चों को अच्छी शिक्षा, साइंस, मैथ्स या इतिहास की जगह धार्मिक किताबें पढ़ाई जाएंगी। स्टालिन ने सितंबर 2025 में ही 2000 मुस्लिम छात्रों के लिए स्कॉलरशिप प्रोग्राम लॉन्च किया, जिसमें हर साल 10 हजार रुपए मिलेंगे। ये सब मुस्लिम युवाओं को लुभाने की चालें हैं।

डीएमके नेता करुणानिधि ने तो कहा था कि वो एंटी-इंडियन, एंटी-तमिल, एंटी-ब्राह्मण हैं। उनकी विचारधारा आज भी जिंदा है। तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति ने सनातन को कास्ट सुप्रीमेसी का नाम दिया, लेकिन अब इस्लाम को बढ़ावा देकर बैलेंस करने की कोशिश? ये तो समाज को बाँटने वाली साजिश है।

भाजपा ने स्टालिन के ऐलान पर तीखा रिएक्शन दिया। नारायण तिरुपति ने कहा कि डीएमके कम्युनल पार्टी है, जो हमेशा मुस्लिम वोट्स के लिए कुछ न कुछ करती रहती है। इंडिया टुडे की रिपोर्ट में भी यही कहा गया कि ये प्री-पोल पुश है। विपक्ष का कहना है कि तमिलनाडु में पहले से ही सांप्रदायिक तनाव है और ये कदम आग में घी डालने जैसा है।

एआईएडीएमके ने भी स्टालिन पर दोहरा मापदंड अपनाने का आरोप लगाया। लेकिन डीएमके चुप नहीं बैठी। स्टालिन ने कहा कि उनकी पार्टी सभी धर्मों का सम्मान करती है, लेकिन सच्चाई तो ये है कि सनातन को तो वो मलेरिया बता चुके हैं।

अब सवाल ये है कि तमिलनाडु का भविष्य क्या होगा? जहाँ एक तरफ स्कूलों में इस्लाम की पढ़ाई, तो दूसरी तरफ सनातन, हिंदी और संस्कृत का विरोध। ये जड़ों में जहर घोलने जैसा है। बच्चे अच्छी शिक्षा से वंचित हो जाएँगे और समाज बँट जाएगा।

विशेषज्ञ कहते हैं कि ड्राविड़न पॉलिटिक्स ने तमिलनाडु को एंटी-हिंदू बना दिया और अब ये इस्लामीकरण की ओर बढ़ रहा है। स्टालिन सरकार का ये फैसला चुनावी दाँव हो सकता है, लेकिन लंबे में तमिलनाडु की एकता को खतरा है। क्या तमिल लोग इस धोखे को समझेंगे? या वोटबैंक की राजनीति फिर जीत जाएगी? ये तो वक्त बताएगा, लेकिन सनातनी अब सतर्क हो चुके हैं।

ममता सरकार ने वापस ली उद्योगों को मिल रही रियायत, कोर्ट पहुँची कई बड़ी कंपनियाँ: 14 वर्षों में 6600 कंपनियों ने छोड़ा बंगाल, मजदूर निर्यात करने को मजबूर ‘पूरब का मैनचेस्टर’

देश की कई बड़ी औद्योगिक कंपनियाँ हाल ही में कलकत्ता हाईकोर्ट पहुँची हैं। वजह है पश्चिम बंगाल सरकार का विवादित फैसला, जिसमें 1993 से अब तक दी गई सभी औद्योगिक प्रोत्साहन योजनाओं को खत्म कर दिया गया है।

अल्ट्राटेक सीमेंट, इलेक्ट्रोस्टील कास्टिंग, ग्रासिम इंडस्ट्रीज, नुवोको विस्तास और डालमिया सीमेंट जैसी कंपनियों ने सरकार के इस फैसले को ‘असंवैधानिक’ बताते हुए याचिकाएँ दायर की हैं। हाईकोर्ट ने सभी अपीलों की संयुक्त सुनवाई 7 नवंबर 2025 के लिए तय की है।

उल्लेखनीय है कि मार्च 2025 में पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने पश्चिम बंगाल अनुदान और प्रोत्साहन की प्रकृति में प्रोत्साहन योजनाओं और दायित्वों का निरसन विधेयक, 2025 पारित किया था। इस विधेयक को अप्रैल 2025 में अधिसूचित किया गया था।

इस विधेयक के तहत 1993 से अब तक लागू सभी औद्योगिक नीतियों में दी गई रियायतें वापस ले ली गईं। इसमें जमीन पर सब्सिडी, टैक्स रीफंड, बिजली और ब्याज पर छूट समेत कई सुविधाएँ शामिल थीं। सरकार का तर्क है कि अब इन पैसों को ‘आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े और वंचित वर्गों’ पर खर्च करना जरूरी है।

इलेक्ट्रोस्टील कास्टिंग ने अपनी याचिका में कोर्ट से अधिनियम को ‘अधिकार से बाहर और असंवैधानिक’ घोषित करने की माँग की। उद्योग विभाग के अधिकारियों ने माना कि कई कंपनियाँ इस फैसले के बाद लाभ में काम नहीं कर पा रहीं। हालाँकि, सरकार ने केवल इतना कहा है कि ‘नई औद्योगिक नीति’ बनाई जा रही है।

उद्योग का दुश्मन रहा है बंगाल

यह विवाद कोई नया नहीं है। पश्चिम बंगाल का इतिहास यही बताता है कि यहाँ उद्योग हमेशा राजनीति की भेंट चढ़े हैं। वामपंथी दौर में मजदूर संघों की सख्ती और पूँजी-विरोधी नीतियों ने बड़े घरानों को राज्य से बाहर कर दिया। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस भी सत्ता में सिंगुर और नंदीग्राम जैसे आंदोलनों की बदौलत आई, जिनमें किसानों की जमीन पर फैक्ट्री लगाने का विरोध किया गया था।

जुलाई 2025 में केंद्र सरकार ने खुलासा किया कि साल 2011 से अब तक 6,600 से ज्यादा कंपनियाँ बंगाल छोड़कर जा चुकी हैं, जिनमें से 2,200 कंपनियाँ सिर्फ पिछले पाँच साल में बाहर गईं हैं। इनमें से ज्यादातर यूपी, महाराष्ट्र, गुजरात और दिल्ली चली गईं। साल 2024 में ब्रिटानिया ने भी अपनी कोलकाता की फैक्ट्री बंद कर दी। टाटा को तो पहले ही सिंगुर से जाना पड़ा। जूट मिलें भी लगातार बंद हो रही हैं।

राजनीति बनाम विकास

ममता बनर्जी सरकार के लिए यह फैसला केवल अर्थशास्त्र नहीं बल्कि राजनीति का हिस्सा है। साल 2026 में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और कल्याणकारी योजनाएँ ही सरकार की रणनीति हैं।

हालाँकि, आलोचकों का कहना है कि इस तरह की नीतियाँ बंगाल को ठहराव की ओर धकेल रही हैं। जहाँ दूसरे राज्य सस्ती जमीन और निवेशकों के लिए आसान नीतियाँ देकर उद्योग खींच रहे हैं, वहीं बंगाल उन्हें भगा रहा है। 1960 के दशक में जहाँ राज्य का देश के औद्योगिक उत्पादन में हिस्सा 10% से ज्यादा था, वहीं अब यह घटकर लगभग 3.5 प्रतिशत रह गया है।

जिस बंगाल को कभी ‘पूरब का मैनचेस्टर’ कहा जाता था, आज वही बंगाल उत्पाद के बजाए मजदूरों को निर्यात कर रहा है। लाखों युवा रोजगार की तलाश में दिल्ली, केरल और महाराष्ट्र जाने को मजबूर हैं।

उद्योग से समाजवादी दलदल तक

इसका निशाना सटीक है। वामपंथियों ने निजी उद्योग को दुश्मन मानकर माहौल खराब किया। उसके बाद ममता बनर्जी ने ‘माँ-माटी-मानुष’ की राजनीति के नाम पर फैक्ट्रियों के खिलाफ आंदोलनों को हवा दी। आज हालत यह है कि राज्य में उद्योगपति निवेश करने से कतराते हैं, ठेकेदारी और माफिया का बोलबाला है और राजनीति में वोट बैंक को खुश करने के लिए उद्योग की बलि चढ़ाई जा रही है।

हाईकोर्ट में दाखिल की गई याचिकाएँ सिर्फ औद्योगिक प्रोत्साहन योजनाओं की बहाली के लिए नहीं हैं। असल सवाल यह है कि क्या बंगाल अब भी निवेश का गंतव्य तय कर सकता है। राज्य के लोगों के लिए यह एक चेतावनी है कि कभी उद्योग का गढ़ रहा बंगाल, आज राजनीतिक लोकलुभावन वादों की भेंट चढ़कर पिछड़ता जा रहा है।

(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। विस्तार से रिपोर्ट को पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

नवरात्रि के पहले दिन PM मोदी ने की माता त्रिपुरसुंदरी की आराधना, 524 वर्ष प्राचीन माताबाड़ी का नव्य-दिव्य-भव्य स्वरुप राष्ट्र को किया समर्पित: शक्तिपीठ के बारे में जानिए सब कुछ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार (22 सितंबर 2025) को नवरात्रि के पहले दिन त्रिपुरा के प्रसिद्ध त्रिपुरसुंदरी (त्रिपुरा सुंदरी\ Tripua Sundari) मंदिर में पूजा अर्चना की है। इस दौरान पीएम मोदी ने गोमती जिले के उदयपुर शहर में स्थित इस तीर्थ के पुनर्विकसित स्वरूप का उद्घाटन भी किया है।

इस धाम को माता के 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। स्थानीय लोगों के बीच इसे त्रिपुरेश्वरी मंदिर या माताबाड़ी के नाम से भी जाना जाता है।

हिंदू मान्यताओं के अनुसार, माता सती के शरीर के अध:-पैर का दक्षिण चरण (दक्षिण पैर की अंगुली सहित) हिस्सा यहाँ गिरा था, इसलिए यह स्थान बेहद पवित्र माना जाता है। इसे ‘कुर्भपीठ’ भी कहा जाता है, क्योंकि यह मंदिर एक ऐसे टीले पर बना है जो कछुए की पीठ जैसा दिखता है। यह तांत्रिक साधना के लिए शुभ माना जाता है।

ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व

इस मंदिर का निर्माण वर्ष 1501 में महाराजा धन्या माणिक्य ने करवाया था। शुरू में यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित था, लेकिन एक दिव्य स्वप्न में देवी माया ने महाराजा को आदेश दिया कि उन्हें इस स्थान पर अपने सुंदरतम रूप में प्रतिष्ठित किया जाए।

इसके बाद यहाँ देवी त्रिपुरसुंदरी की मूर्ति स्थापित की गई। मंदिर की स्थापत्य शैली बंगाली ‘एक-रत्न’ (Ek-Ratna) शैली की है, जो इसकी पुरानी वास्तुकला को दर्शाती है। मंदिर के पास ही कल्याण सागर नामक पवित्र झील है, जहाँ के कछुओं को श्रद्धालु पूजनीय मानते हैं। हालाँकि यह मंदिर वैष्णव और शाक्त संप्रदायों के बीच एकता का प्रतीक है।

यहाँ भगवान विष्णु की पूजा शालिग्राम शिला के रूप में की जाती है, जो कि काले रंग का एक पवित्र पत्थर होता है। ऐसा उदाहरण कि शक्ति पीठ या काली मंदिर में देवी शक्ति के साथ भगवान विष्णु की पूजा हो, बहुत ही दुर्लभ है। यही इस मंदिर की खासियत भी है।

यहाँ त्रिपुर सुंदरी माता की एक बड़ी मूर्ति (लगभग 5 फीट ऊँची) और एक छोटी मूर्ति ‘छोटो-मा’ (लगभग 2 फीट ऊँची) है। ‘छोटो-मा’ को पहले विशेष अवसरों जैसे राजाओं द्वारा युद्ध, शिकार या उत्सवों में साथ ले जाया था।

यहाँ देवी शक्ति को माँ त्रिपुर सुंदरी के रूप में पूजा जाता है और उनके साथ भैरव को त्रिपुरेश के नाम से जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि राज्य का नाम ‘त्रिपुरा’ भी देवी त्रिपुर सुंदरी से ही जुड़ा है, जिससे यह मंदिर राज्य की संस्कृति और आस्था का केंद्र बन गया है।

ऐसी लोककथाएँ हैं कि वर्तमान में जो मूर्ति स्थापित है, वह पास के ‘ब्रह्मछरा’ जलस्रोत से प्राप्त हुई थी। मूर्ति के चरणों के नीचे श्री यंत्र बना हुआ है, जो एक दिव्य और पवित्र ज्यामितीय आकृति है। इसे देखना या इसकी पूजा करना अनेक शुभ कर्मों के समान माना जाता है।

माँ को विशेष रूप से लाल गुड़हल का फूल अर्पित किया जाता है और पेडा प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। यह ‘माताबाड़ी पेडा’ अब GI टैग प्राप्त कर चुका है। हर साल दीवाली के अवसर पर यहाँ दो दिवसीय दीवाली मेला आयोजित होता है, जिसमें लाखों श्रद्धालु भारत और बांग्लादेश सहित विभिन्न स्थानों से आते हैं। यह मेला त्रिपुरा की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाता है।

मंदिर का प्रबंधन राज्य सरकार द्वारा नियुक्त समिति और माता त्रिपुर सुंदरी मंदिर ट्रस्ट द्वारा किया जाता है।

पुनर्विकास और सौंदर्यीकरण

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर कहते हैं कि पर्यटन हमारे विरासत और विकास के बीच एक सेतु है। खासकर आध्यात्मिक पर्यटन को उन्होंने भारत की प्रगति में एक अहम भूमिका दी है। तीर्थ स्थल न केवल आस्था के केंद्र होते हैं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान और समुदाय की भावना के जीवंत प्रतीक भी हैं।

इसी सोच के तहत केंद्र सरकार ने PRASHAD योजना (Pilgrimage Rejuvenation and Spiritual, Heritage Augmentation Drive) शुरू की, जिसके माध्यम से देशभर के प्रमुख तीर्थ स्थलों को नई पहचान दी जा रही है।

इसमें सुविधाओं का विकास, बेहतर संपर्क साधन और धार्मिक स्थलों की पवित्रता को बनाए रखने पर जोर दिया गया है। इससे न केवल श्रद्धालुओं को बेहतर अनुभव मिल रहा है, बल्कि स्थानीय लोगों को रोजगार के नए अवसर भी मिल रहे हैं।

इस मंदिर का पुनर्विकास भी केंद्र सरकार की PRASAD योजना के तहत किया गया है। यह योजना भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय द्वारा 2021 में स्वीकृत की गई थी। इस योजना की कुल लागत 54.04 करोड़ है, जिसमें से 34.43 करोड़ केंद्र सरकार और 17.61 करोड़ राज्य सरकार द्वारा दिए गए हैं।

प्रोजेक्ट के अंतर्गत निम्नलिखित कार्य किए जा रहे हैं। जैसे मंदिर परिसर का सौंदर्यीकरण और संगमरमर फ्लोरिंग, नई प्रवेश द्वार और रास्ते, दुकानों और प्रसाद स्टॉल्स के लिए नया भवन, ध्यान कक्ष और अतिथि कक्ष, पुजारियों, मैनेजर और स्वयंसेवकों के लिए आवासीय क्षेत्र, विश्रामगृह, टॉयलेट ब्लॉक, जल की व्यवस्था, और बैठने की सुविधा। इसके अलावा VIP लाउंज और माताबाड़ी गैलरी शामिल है।

PRASHAD योजना के जरिए इस मंदिर में न सिर्फ आधुनिक सुविधाएँ जोड़ी गई हैं, बल्कि इसकी पवित्रता और विरासत को भी संरक्षित किया गया है। यह प्रधानमंत्री के ‘विकास भी, विरासत भी’ के विजन का जीवंत उदाहरण है, जो विकसित भारत 2047 की दिशा में एक ठोस कदम है।

पर्यटन और रोजगार पर प्रभाव

फिलहाल प्रतिदिन 3000-3500 श्रद्धालु और पर्यटक मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं। परियोजना पूर्ण होने के बाद यह संख्या बढ़कर 5000-7000 प्रतिदिन तक पहुँचने की संभावना है।

इससे स्थानीय होटल, टैक्सी सेवाएँ, गाइड, हस्तशिल्प विक्रेता और खाद्य व्यवसायों को सीधा और परोक्ष रोजगार मिलेगा। सरकार की योजना है कि उदयपुर शहर को एक प्रमुख धार्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जाए।

आधुनिक सुविधाओं, सौंदर्यीकरण और 51 शक्तिपीठ पार्क जैसी योजनाओं के साथ यह धाम अब आस्था के साथ-साथ त्रिपुरा की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का भी प्रतीक बन गया है। 524 साल पुराने त्रिपुर सुंदरी मंदिर का नवीनीकरण न सिर्फ एक धार्मिक स्थल के रूप में, बल्कि सांस्कृतिक और पर्यटन की दृष्टि से भी त्रिपुरा के लिए एक नया अध्याय साबित होगा।

जिस प्रोफेसर ने हनुमान जी की प्रतिमा के लिए लिखा- तोड़ दो, उस पर कानूनी एक्शन के विकल्प तलाश रही सूरत की यूनिवर्सिटी: कहा- हमसे नहीं वास्ता, 2021 में दे दिया था इस्तीफा

गुजरात के सूरत में स्थित वीर नर्मद दक्षिण गुजरात यूनिवर्सिटी (VNSGU) को सोशल मीडिया पर मचे बवाल के बाद सफाई देनी पड़ी है। दरअसल, यूनिवर्सिटी से जुड़े बताए जा रहे प्रोफेसर मधुसूदन राज के कई ट्वीट वायरल हुए, जिन्हें यूजर्स ने हिंदू-विरोधी करार देते हुए गुजरात पुलिस को टैग कर कड़ी कार्रवाई की माँग की।

विवाद तब भड़का जब अमेरिका के टेक्सास में बनी हनुमान जी की प्रतिमा को लेकर मधुसूदन राज का ट्वीट सामने आया। एक अमेरिकी अकाउंट ने 20 सितंबर को हनुमान जी की मूर्ति की तस्वीर साझा करते हुए लिखा था, “अब जब हम H1B वीजा वाले भारतीयों को यहाँ से निकाल रहे हैं, तो टेक्सास के फोर्ट बेंड काउंटी में लगी इस ‘हिंदू डेमन मंकी गॉड’ की मूर्ति को हटाना भी सरकार के लिए मुश्किल काम नहीं होगा।”

इस शर्मनाक पोस्ट को मधुसूदन राज ने रीट्वीट करते हुए लिखा ‘Smash it’ यानी ‘इसे तोड़ डालो।’

यही दो शब्द आग में घी का काम कर गए और सोशल मीडिया पर जबरदस्त आक्रोश फूट पड़ा। लोग इसे हिंदू आस्था पर सीधा हमला मानकर VNSGU को घेरने लगे। कई यूजर्स ने दावा किया कि वह अब भी यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं।

हालाँकि, यूनिवर्सिटी के मानव संसाधन विभाग ने तुरंत बयान जारी कर स्पष्ट किया कि मधुसूदन राज पहले यहाँ कार्यरत थे, लेकिन उन्होंने 2021 में इस्तीफा दे दिया था। तब से उनका विश्वविद्यालय से कोई संबंध नहीं है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने कहा कि वे मामले की जाँच कर रहे हैं और विस्तृत बयान भी जारी किया जाएगा, लेकिन साफ है कि राज के निजी विचारों और गतिविधियों से संस्थान का कोई लेना-देना नहीं है।

खबरों के मुताबिक, मधुसूदन राज इस समय विदेश में रह रहे हैं। उनके एक्स प्रोफाइल में वह खुद को ‘Born again Christian’ बताते हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि यह पहली बार नहीं है जब उनके बयान विवादों में आए हों।

पहले भी उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, हिंदुओं और गुजरातियों के खिलाफ आपत्तिजनक बातें लिखी हैं। कभी पीएम मोदी को ‘जोकर’ बताया तो कभी भारत की स्थिति की तुलना तानाशाही से की। इतना ही नहीं, धार्मिक आस्था, मंदिरों और परंपराओं का मजाक उड़ाना भी उनकी पोस्ट्स का हिस्सा रहा है, जिसे लोगों ने बेहद अपमानजनक माना।

इन सबको देखते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन ने कहा है कि कानूनी विकल्पों पर विचार किया जा रहा है, भले ही राज अब वहाँ के कर्मचारी न हों।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट गुजराती में मेघल सिंह परमार ने लिखी है। इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है।)

कभी ‘AK-47’ तो कभी बीच मैदान नमाज, कभी ‘6-0’ तो कभी मुस्लिम बनने का ऑफर: पाकिस्तानी क्रिकेटरों ने बैट-बॉल के गेम को बना दिया मजहब का खेल, इस्लामी एजेंडा आगे-खेल भावना पीछे

क्रिकेट को दुनिया भर में एक ऐसा खेल माना जाता है, जो लोगों को जोड़ता है, भाईचारे को बढ़ाता है और खेल भावना को सबसे ऊपर रखता है। लेकिन जब बात भारत-पाकिस्तान के क्रिकेट मैच की आती है, तो यह सिर्फ खेल नहीं रह जाता। यह एक भावनात्मक जंग बन जाता है, जिसमें मैदान पर खेल से ज्यादा सियासत और मजहबी रंग नजर आता है।

एशिया कप 2025 में भारत-पाकिस्तान के बीच हुए मुकाबले ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि पाकिस्तानी खिलाड़ी खेल के मैदान को भी मजहबी कट्टरपंथ का अखाड़ा बनाने से नहीं चूकते। साहिबजादा फरहान का बल्ले को एके-47 की तरह दिखाकर ‘फायरिंग सेलिब्रेशन’ करना हो या हारिस रऊफ का ‘6-0’ का इशारा, पाकिस्तानी खिलाड़ियों ये हरकतें खेल भावना को तार-तार करती हैं।

खेल के मैदान पर इस्लामी कट्टरपंथ फैलाते हैं पाकिस्तानी खिलाड़ी

पाकिस्तानी खिलाड़ियों का इतिहास रहा है कि वे मैदान पर खेल भावना को कम और मजहबी कट्टरपंथ को ज्यादा तवज्जो देते हैं। साहिबजादा फरहान ने एशिया कप 2025 के सुपर-4 मैच में अर्धशतक बनाकर बल्ले को बंदूक की तरह इस्तेमाल किया और ‘गोली चलाने’ का इशारा किया।

इसी तरह हारिस रऊफ ने बाउंड्री लाइन पर फील्डिंग करते हुए ‘6-0’ का इशारा किया और विमान गिराने की एक्टिंग की, जो पाकिस्तान के उस दावे से जोड़ा गया, जिसमें उसने फर्जी तरीके से भारत के छह राफेल विमान गिराने की बात कही थी।

ये इशारे खेल भावना के खिलाफ हैं और साफ दिखाते हैं कि पाकिस्तानी खिलाड़ी मैदान पर भी सियासत और मजहबी भावनाओं को लाने से नहीं हिचकते।

यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तानी खिलाड़ियों ने ऐसी हरकतें की हैं। मोहम्मद रिजवान का मैदान पर नमाज पढ़ना भी कई बार चर्चा का विषय बना है। 2023 में नीदरलैंड के खिलाफ एक मैच में रिजवान का बीच मैदान में नमाज पढ़ने का वीडियो वायरल हुआ था।

कट्टरपंथी रहा है पाकिस्तान का ड्रेसिंग रूम

पाकिस्तानी क्रिकेट में मजहबी कट्टरपंथ का इतिहास पुराना है। पाकिस्तान के हिंदू टेस्ट क्रिकेटर दानिश कनेरिया ने कई बार खुलासा किया कि उन्हें अपने करियर के दौरान मजहब के आधार पर भेदभाव का सामना करना पड़ा।

दानिश कनेरिया ने 2006 में एक इंटरव्यू में कहा था कि उन्हें कभी धर्म बदलने के लिए मजबूर तो नहीं किया गया, लेकिन टीम में उनके साथ अलग व्यवहार होता था। उन्होंने यह भी बताया कि कुछ खिलाड़ी उन्हें ‘काफिर’ कहकर ताने मारते थे। यह साफ दिखाता है कि पाकिस्तानी क्रिकेट में गैर-मुस्लिम खिलाड़ियों के लिए माहौल कितना मुश्किल रहा है।

इसी तरह यूसुफ योहाना (जो अब मोहम्मद यूसुफ के नाम से जाने जाते हैं) की कहानी और भी चौंकाने वाली है। योहाना पहले ईसाई थे, लेकिन उसने साल 2005 में इस्लाम कबूल कर लिया। कई लोगों का मानना है कि यह फैसला उनके करियर को लंबा खींचने और टीम में अपनी जगह पक्की करने के लिए दबाव में लिया गया था।

धर्म परिवर्तन के बाद यूसुफ का व्यवहार भी बदल गया और आज वह एक कट्टरपंथी मौलाना के रूप में जाने जाते हैं। एशिया कप 2025 में ही भारत-पाकिस्तान के पिछले मैच के बाद यूसुफ ने एक टीवी शो में भारतीय कप्तान सूर्यकुमार यादव के लिए अपशब्द कहे और भारत पर अंपायरों के दुरुपयोग का आरोप लगाया। यह व्यवहार न सिर्फ खेल भावना के खिलाफ है, बल्कि उनके मजहबी कट्टरपंथ को भी दर्शाता है।

श्रीलंकाई खिलाड़ी को मैदान पर दिया मुस्लिम बनने का ऑफर

पाकिस्तानी खिलाड़ियों की हरकतें सिर्फ उनके देश तक सीमित नहीं रहतीं। कई बार वे विरोधी टीमों के खिलाड़ियों को भी निशाना बनाते हैं। कुछ साल पहले एक श्रीलंकाई खिलाड़ी ने खुलासा किया था कि पाकिस्तानी खिलाड़ियों ने उन्हें मैदान पर इस्लाम कबूल करने का ऑफर दिया था।

खुद मैदान छोड़ने वाले पाकिस्तानी सिखा रहे खेल भावना

एशिया कप 2025 में भारत-पाकिस्तान मैच के बाद एक और विवाद ने सुर्खियाँ बटोरीं, जब भारतीय खिलाड़ियों ने पाकिस्तानी खिलाड़ियों से हाथ मिलाने से इनकार कर दिया। इसकी वजह थी भारत का पहलगाम हमले को लेकर गुस्सा, जिसके लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया गया। भारतीय कप्तान सूर्यकुमार यादव ने टॉस के समय और मैच के बाद पाकिस्तानी खिलाड़ियों से दूरी बनाए रखी।

पाकिस्तानी क्रिकेट बोर्ड (PCB) और खिलाड़ियों ने इसे खेल भावना के खिलाफ बताया, लेकिन सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान का इतिहास खेल भावना का समर्थन करता है? 2006 में इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट मैच में पाकिस्तानी टीम ने मैदान छोड़ दिया था, क्योंकि उन्हें बॉल टैंपरिंग का दोषी ठहराया गया था। यह घटना क्रिकेट इतिहास में खेल भावना के उल्लंघन का सबसे बड़ा उदाहरण है।

पाकिस्तानी खिलाड़ियों और बोर्ड का यह दावा कि भारत ने खेल भावना का उल्लंघन किया। ऐसे में हास्यास्पद लगता है-जब उनके अपने खिलाड़ी मैदान पर भड़काऊ इशारे करते हैं और मजहबी रंग लाते हैं और PCB इसका बचाव करे।

क्रिकेट या सियासत का मैदान?

पाकिस्तानी खिलाड़ियों की हरकतें बार-बार यह सवाल उठाती हैं कि क्या वे क्रिकेट को सिर्फ एक खेल की तरह देखते हैं? 2023 में भारत में हुए वर्ल्ड कप के दौरान, जब पाकिस्तानी खिलाड़ी मोहम्मद रिजवान पवेलियन लौट रहे थे, तो दर्शकों ने ‘जय श्री राम’ के नारे लगाए। इस पर पाकिस्तानी मीडिया और खिलाड़ियों ने इसे धार्मिक उन्माद से जोड़ा, लेकिन खुद रिजवान का मैदान पर नमाज पढ़ना क्या था? क्या यह खेल के मैदान को मजहबी मंच बनाने की कोशिश नहीं थी?

पाकिस्तान के पूर्व खिलाड़ी जैसे शाहिद अफरीदी और मोहम्मद यूसुफ भी अपने बयानों से विवाद खड़ा करते रहे हैं। अफरीदी ने एशिया कप 2025 के हैंडशेक विवाद के बाद भारत सरकार पर ‘हिंदू-मुस्लिम कार्ड‘ खेलने का आरोप लगाया। यह बयान न सिर्फ आधारहीन था, बल्कि खेल को सियासत और मजहब से जोड़ने की उनकी मानसिकता को दर्शाता है।

खेल भावना की जरूरत

क्रिकेट को ‘जेंटलमैन गेम’ कहा जाता है, लेकिन पाकिस्तानी खिलाड़ियों की हरकतें बार-बार इसकी गरिमा को ठेस पहुँचाती हैं। खेल का मैदान सम्मान, एकता और प्रतिस्पर्धा का प्रतीक होना चाहिए, न कि मजहबी या सियासी जंग का अखाड़ा। पाकिस्तानी खिलाड़ियों को यह समझना होगा कि क्रिकेट सिर्फ जीत-हार का खेल नहीं है, बल्कि यह दुनिया भर के प्रशंसकों के लिए एक भावना है। आखिरकार इतिहास हमेशा खेल भावना का मूल्यांकन करता है और इस मामले में पाकिस्तानी खिलाड़ी बार-बार नाकाम साबित हुए हैं।

पूर्वोत्तर के राज्यों को हम अष्ट लक्ष्मी की तरह पूजते हैं: अरुणाचल को PM मोदी ने ₹5100 करोड़ परियोजनाओं की दी सौगात, कहा- दिल की दूरी मिटाकर आपके पास लाए दिल्ली

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमवार (22 सितंबर 2025) को अरुणाचल प्रदेश की राजधानी ईटानगर पहुँचे। यहाँ प्रधानमंत्री ने ₹5100 करोड़ लागत की कई विकास परियोजनाओं की आधारशिला रखी। इन तमाम परियोजनाओं से प्रदेश के विकास में गति आएगी।

इस दौरान प्रधानमंत्री ने जनता को भी संबोधित किया। पीएम ने अरुणाचल प्रदेश की धरती को माँ शैलपुत्री की धरती बताते हुए प्रशंसा की। साथ ही कहा कि कॉन्ग्रेस सरकार ने प्रदेश को पीछे छोड़ दिया। इसके अलावा पीएम ने आत्मनिर्भर बन स्वदेशी अपनाने का आह्वान किया और GST बचत उत्सव की शुभकामनाएँ दी।

अरुणाचल उगते सूर्य और देशभक्ति की धरती: पीएम मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संबोधन की शुरुआत अरुणाचल प्रदेश के महत्व की प्रशंसा से की। पीएम ने कहा, “अरुणाचल उगते सूर्य की धरती के साथ ही देशभक्ति के ऊफान की भी धरती है। जैसे तिरंगे का रंग केसरिया है वैसे ही अरुणाचल का पहला रंग केसरिया है। यहाँ का हर व्यक्ति शौर्य और सादगी का प्रतीक है।”

पीएम ने कहा, “अरुणाचल तो मैं कई बार आया हूँ, राजनीति और सत्ता के गलियारे में नहीं था तब भी आया हूँ। यहाँ की ढेर सारी यादें मेरे साथ जुड़ी हुई हैं। आप सभी के साथ बिताया हर पल मेरे लिए यादगार है। तवांग मठ से लेकर नमसाई का स्वर्णिम पगोडा तक अरुणाचल सांस्कृति का संगम है, माँ पारवती का गौरव है। मैं इस भूमि को प्रणाम करता हूँ।”

नरेंद्र मोदी ने यह भी कहा, “मैं अरुणाचल प्रदेश की प्रशंसा करता हूँ कि आप सभी नमस्कार से भी पहले जय हिंद कहते हैं आप लोग स्वयं से भी पहले देश को रखते हैं।”

पीएम मोदी के अरुणाचल आना की तीन वजह

अरुणाचल प्रदेश पहुँचे पीएम मोदी ने कहा कि तीन वजह से वो अरुणाचल प्रदेश आए हैं। पीएम मोदी ने कहा, “नवरात्र में आज के दिन हम माँ शैलपुत्री की पूजा करते हैं और शैलपुत्री पर्वतराज हिमालय की ही बेटी है। दूसरी वजह ये है कि आज से देश में नेक्सट जेनरेशन GST रिफॉर्म्स लागू हुई है।”

तीसरी वजह बताते हुए पीएम ने कहा, “तीसरी वजह अरुणाचल को विकास के लिए ढेर सारे नए प्रोजेक्ट मिलने को लेकर है। पावर, कनेक्टिविटी और टेक सहित अनेक सेक्टर से जुड़े अनेक प्रोजेक्ट मिले हैं। ये बीजेपी की डबल इंजन सरकार का डबल बेनिफिट है।”

कॉन्ग्रेस सरकार में अरुणाचल को हुआ नुकसान: पीएम मोदी

कॉन्ग्रेस सरकार में नॉर्थ ईस्ट के नुकसान को गिनाते हुए पीएम मोदी कहते हैं, “अरुणाचल में सूर्य की किरण सबसे पहले आती है। दुर्भाग्य से तेज विकास की किरण पहुँचते हुए कई दशक लग गए। अरुणाचल को प्रकृति ने काफी कुछ दिया है। यहाँ इतना कुछ है लेकिन तब जिन लोगों ने दिल्ली में बैठकर देश चलाया उन्होंने अरुणाचल को कुछ नहीं दिया।”

पीएम मोदी ने आगे कहा, “अरुणाचल में लोकसभा की दो ही सीटें है इसीलिए कॉन्ग्रेस ने ध्यान नहीं दिया। कॉन्ग्रेस की सोच का पूरे अरुणाचल को बहुत नुकसान हुआ। हमारा नॉर्थ ईस्ट विकास में बहुत पीछे पहुँच गया। मैंने 2014 में सत्ता में आने के बाद देश को कॉन्ग्रेसी सोच से मुक्ति दिलाने की ठान ली।

प्रधानमंत्री ने कहा, “हमारी राजनीति किसी प्रदेश वोटों और सीटों की संख्या नहीं बल्कि नेशन फर्स्ट की भावना है। हमारा मंत्र है नागरिक भव: जिसको किसी ने नहीं पूछा उसको मोदी पूजता है। जिस नॉर्थ ईस्ट को कॉन्ग्रेस के समय में भूला दिया गया, वो 2014 के बाद विकास की प्राथमिकताओं का केंद्र बना।”

दिल की दूरी मिटा दिल्ली आपके पास लाए: पीएम मोदी

प्रधानमंत्री ने कहा, “हमने ये पक्का किया कि सरकार दिल्ली में बैठकर नहीं चलेगी। अफसर और मंत्रियों को नॉर्थ ईस्ट आना होगा। यहाँ रात्रि मुकाम करना होगा। कॉन्ग्रेस के समय में दो-तीन महीने में एक या दो मंत्री आता था। बीजेपी सरकार में 800 से ज्यादा बार मंत्री नॉर्थ ईस्ट आ चुके हैं। सिर्फ ऐसा नहीं है कि आए और चले गए। हमारे मंत्री आते हैं तो प्रयास रहता है कि दूरदराज के क्षेत्र में जाएँ।”

पीएम मोदी कहते हैं, “मैं खुद ही प्रधानमंत्री के तौर पर 70 से ज्यादा बार नॉर्थ ईस्ट आया हूँ। अभी पिछले हफ्ते ही मैं मिजोरम मणिपुर और असम गया था और रात गुवाहाटी में गया था। नॉर्थ ईस्ट में मुझे दिल से पसंद है। इसीलिए हमने दिल की दूरी भी मिटाई और दिल्ली को आपके पास लेकर आए हैं। हम नॉर्थ ईस्ट के 8 राज्यों को अष्ट लक्ष्मी के रूप में पूजते हैं इसीलिए यहाँ विकास का इंतजार नहीं कर सकते। केंद्र सरकार ज्यादा से ज्यादा पैसे खर्च कर रही है।”

सीमावर्ती गाँव पहले पलायन को मजबूर थे: पीएम मोदी

अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती गाँव पर बोलते हुए पीएम ने कहा, “कॉन्ग्रेस की एक पुरानी आदत है कि विकास का जो भी काम मुश्किल होता है वो उसको हाथ नहीं लगाते हैं। कॉन्ग्रेस की इस आदत से नॉर्थ ईस्ट और अरुणाचल को नुकसान हुआ। पहाड़ों, जंगलो के बीच हो जहाँ विकास के काम करना चुनौती होता था उन क्षेत्रों को कॉन्ग्रेस पिछड़ा कहकर भूल जाती थी। जो बॉर्डर से सटे गाँव थे उनके देश का आखिरी गाँव कहकर अपना पल्ला झाड़ लेती थी और अपनी नाकामियों को छुपा लेती थी।”

पीएम मोदी ने आगे कहा, “यही वजह है कि बॉर्डर क्षेत्र से लगातार पलायन होता रहे। जिनको कॉन्ग्रेस बैकवर्ड डिस्ट्रिक्ट कहती थी, हमने उनको एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट बनाया उनको विकास में प्राथमिकता दी। कॉन्ग्रेस जिनको लास्ट विलेज कहती थी, हमने उनका फर्स्ट विलेज बनाया। वाइब्रेंट विलेज योजना ने लोगों का जीवन आसान बनाया है। अरुणाचल प्रदेश के 450 अधिक बॉर्डर गाँव में तेजी आई है, वहाँ बिजली, नेटवर्क जैसी सुविधा मिली है। अब बॉर्डर के गाँव टूरिज्म का केंद्र बन रहे हैं।”

अरुणाचल में पर्यटन बढ़ रहा है: पीएम मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, “अरुणाचल में टूरिज्म बढ़ रहा है। बीते दशक में यहाँ टूरिस्ट की संख्या में दोगुना वृद्धि हुई है। आजकल दुनिया में कॉन्फ्रेस और कन्सर्न टूरिज्म की बाढ़ आ रही है इसीलिए तवांग में बनने जा रहा आधुनिक कन्वेंन्शन सेंटर अरुणाचल के टूरिज्म में नया आवाम जोड़ेगा। अरुणाचल को वाइब्रेंट विलेज से भी मील का पत्थर साबित होगा।”

पीएम ने कहा, “अरुणाचल अब कृषि और बागवानी में आगे बढ़ रहा है। यहाँ के किवी, संतरा, इलायची और पाइनऐपल अरुणाचल को नई पहचान दे रहे हैं।”

माँ-बहन को सशक्त करने के लिए तीन करोड़ लखपति दीदिया बना रही है, ये बहुत बड़ा मिशन है लेकिन ये मोदी का मिशन है। पेमाखांडू जी और उनकी टीम इस मिशन को गति दे रही है। वर्किंग वुमन हॉस्टल बन रहा है। आपको अब हर महीने घर के बजट में राहत मिलने वाली है। किचन का सामान, बच्चों की पढ़ाई की चीजे, जूते-चप्पल अब सस्ते हो गए हैं।

देश पर आई चुनौती के बावजूद इनकम टैक्स घटाया: पीएम मोदी

पीएम मोदी ने कहा, “साल 2014 से पहले कितनी परेशानी थी, महँगाई आसमान छू रही थी। चारों तरफ महाघोटाले हो रहे थे। तब की कॉन्ग्रेस सरकार जनता पर टैक्स का बोझ बढ़ाती जा रही थी। उस समय साल के 2 लाख रुपए कमाने पर भी इनकम टैक्स लग जाता था और आम जरूरत की कई चीजों पर 30 प्रतिशत से अधिक टैक्स लेती थी। बच्चों की टॉफी पर भी 3 प्रतिशत टैक्स लेती थी।”

प्रधानमंत्री ने आगे कहा, “बीते सालों में देश के सामने अनेक चुनौतियाँ आई लेकिन हम इनकम टैक्स घटाते गए। 11 साल पहले 2 लाख और इसी साल 12 लाख वार्षिक आय पर इनकम टैक्स जीरो कर दिया। और आज से हमने GST को भी सिर्फ दो स्लैब में कर दिया। बहुत सारी चीजे टैक्स फ्री हो गई हैं। अब आराम से घर बनाए, स्कूटर बाइक खऱीदे, घूमने फिरने जाएँ। ये सब पहले से सस्ते हो गए हैं। ये GST बचत उत्सव आपके लिए यादगार बनने वाला है।”

पीएम ने ₹5100 करोड़ की परियोजनाओं की रखी आधारशिला

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईटानगर में ₹5100 करोड़ की लागत वाली कई विकास परियोजनाओं की आधारशिला रखी। इनमें हीओ जलविद्युत परियोजना (240 मेगावाट) और तातो-I जलविद्युत परियोजना (186 मेगावाट) के सियोम उप-बेसिन में बनाई जाएँगी।

तवांग में बनने जा रहे अत्याधुनिक कन्वेंशन सेंटर की भी प्रधानमंत्री ने आधारशिला रखी। सीमावर्ती जिले तवांग में 9,820 फीट से अधिक की ऊँचाई पर स्थित यह केन्‍द्र राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों, सांस्कृतिक उत्सवों और प्रदर्शनियों की मेजबानी के लिए एक ऐतिहासिक इमारत के रूप में कार्य करेगा। साथ ही 1,500 से अधिक प्रतिनिधियों की मेजबानी करने की क्षमता वाले इस केन्‍द्र से प्रदेश के पर्यटन और सांस्कृतिक संभावना को गति मिलेगी।

प्रधानमंत्री ने 1,290 करोड़ रुपए से अधिक की लागत वाली अनेक प्रमुख बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं का भी शुभारंभ किया। ये परियोजनाएँ कनेक्टिविटी, स्वास्थ्य, अग्नि सुरक्षा, कामकाजी महिलाओं के लिए छात्रावासों सहित विभिन्न क्षेत्रों को लाभ देंगी। इन पहलों से क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियों को गति मिलेगी। साथ हीजीवन स्तर और कनेक्टिविटी में सुधार भी होगा।

कभी दूर से हरियाणा के कुरुक्षेत्र में हुआ रण देख रहा था संजय, आज बिहार के ‘राजपरिवार’ में रण करवा रहा हरियाणा का संजय

महाभारत में किरदारों में से एक हैं, सारथी संजय। उन्होंने ही महल में बैठकर दिव्यदृष्टि के जरिए धृतराष्ट्र को हरियाणा के कुरुक्षेत्र में हुए रण का हाल सुनाया था। अब इसी हरियाणा से आने वाले राजद के राज्यसभा संजय यादव के कारण बिहार के ‘राजपरिवार’ यानी लालू यादव-राबड़ी देवी के कुनबे में घमासान मच गया है।

लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने X पर अपने परिवार और पार्टी को अनफॉलो कर अपनी छिपी हुई नाराजगी जगजाहिर कर दी है और ऐसा करने वाली वह घर की इकलौती सदस्य नहीं है। इससे पहले तेज प्रताप यादव और मीसा भारती भी संजय यादव को लेकर तेजस्वी यादव से नाराजगी जता चुके हैं।

संजय यादव से जुड़ी पोस्ट शेयर करने के बाद बढ़ी रोहिणी की नाराजगी

लालू परिवार के इस सियासी झगड़े के केंद्र में तेजस्वी यादव के सलाहकार संजय यादव हैं। मूल रूप से हरियाणा से आने वाले संजय यादव राजद से राज्यसभा सांसद भी हैं। तेज प्रताप यादव कई मौकों पर पार्टी में जयचंद होने की बात कहते रहे हैं और राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह दरअसल संजय यादव के लिए ही कहा जा रहा है।

रोहिणी भी संजय यादव के तेजस्वी यादव पर बढ़ते प्रभाव से नाखुश हैं। तेजस्वी यादव ने बिहार में एक यात्रा निकाली थी, इसके लिए एक खास बस डिजाइन की गई जिसमें तेजस्वी के लिए आगे की सीट तय की गई थी। इस दौरान के दौरान सामने आई तस्वीरों में संजय यादव उस सीट पर बैठे दिखे जिससे रोहिणी बिफर गईं।

रोहिणी ने फेसबुक पर पोस्ट शेयर किया जिसमें एक शख्स ने संजय यादव की तीखी आलोचना की थी। इसमें लिखा था, “फ्रंट सीट सदैव शीर्ष के नेता-नेतृत्वकर्त्ता के लिए चिह्नित होती है और उनकी अनुपस्थिति में भी किसी को उस सीट पर नहीं बैठना चाहिए…वैसे अगर ‘कोई’ अपने आप को शीर्ष नेतृत्व से भी ऊपर समझ रहा है, तो अलग बात है!!”

रोहिणी द्वारा शेयर किया गया पोस्ट

X पोस्ट के बाद रोहिणी को अकाउंट करना पड़ा प्राइवेट

इस फेसबुक पोस्ट के बाद रोहिणी ने बीते शुक्रवार (19 सितंबर 2025) को X पर भी 2 पोस्ट शेयर किए गए। एक पोस्ट में उन्होंने पिता को किडनी डोनेट किए जाने का जिक्र किया तो दूसरे में खुद को किसी पद की लालसा ना होने का दावा किया।

पहली पोस्ट में रोहिणी ने लिखा, “जो जान हथेली पर रखते हुए बड़ी से बड़ी कुर्बानी देने का जज्बा रखते हैं, बेखौफी-बेबाकी-खुद्दारी तो उनके लहू में बहती है।” जबकि दूसरी पोस्ट में उन्होंने लिखा, “मैंने एक बेटी और बहन के तौर पर अपना कर्तव्य एवं धर्म निभाया है और आगे भी निभाती रहूँगी, मुझे किसी पद की लालसा नहीं है, न मेरी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा है, मेरे लिए मेरा आत्म सम्मान सर्वोपरि है।”

रोहिणी की X पोस्ट

इसके बाद इन पोस्ट्स को लेकर खूब विवाद हुआ तो रोहिणी आचार्य को अपना अकाउंट प्राइवेट करना पड़ा। माना जा रहा था कि रोहिणी ने आलोचना से बचने के लिए यह अकाउंट प्राइवेट किया है।

रोहिणी ने परिवार और पार्टी को किया अनफॉलो

रोहिणी ने जो अकाउंट प्राइवेट किया था वो अब पब्लिक कर दिया है। हालाँकि, इस दौरान उन्होंने सैकड़ों लोगों को अनफॉलो किया है जिसमें उनके परिवार के लोग और पार्टी भी शामिल है। कभी X पर 100 से अधिक लोगों को फॉलो करने वालीं रोहिणी अब केवल 3 लोगों को ही फॉलो करती हैं। जिसमें एक उनके पति समरेश सिंह, एक रहात इंदौरी के नाम का हैंडल और एक सिंगापुर के अखबार ‘द स्ट्रेट्स टाइम्स’ का हैंडल है।

केवल तीन लोगों को फॉलो करती हैं रोहिणी

‘राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना चाहती हैं मीसा भारती’

लालू के परिवार में कलह के कई किरदार है जिसमें एक नाम मीसा भारती का भी है। संजय यादव को लेकर मीसा भारती लगातार मुखर हैं ही तो दूसरी तरफ दावा किया जाता है कि वह पार्टी की कमान खुद अपने हाथ में लेना चाहती हैं।

वरिष्ठ पत्रकार अजीत द्विवेदी ने एक शो में बातचीत के दौरान दावा किया कि मीसा भारती, तेजस्वी यादव की बड़ी चैलेंजर हैं। उन्होंने कहा, “6-8 महीने पहले राबड़ी देवी के आवास पर मीसा भारती का बड़ा विवाद हुआ था। मीसा ये चाहती थी कि उनको राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जाए।”

अजीत द्विवेदी कहते हैं, “उनका (मीसा भारती) कहना है कि अगर तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री के दावेदार हैं। उनको मुख्यमंत्री की कुर्सी मिलनी है। उनको सत्ता मिलनी है तो पार्टी का संगठन मेरे पास रहे। लोग बताते हैं कि उस रात में मीसा भारती होटल में रहने चली गई थी।”

तेज प्रताप यादव पहले ही किए जा चुके हैं घर और परिवार से बाहर

तेज प्रताप यादव इस दिनों सियासी वनवास झेल रहे हैं। उन्हें RJD से निकाल दिया गया है और अब वह भगवान कृष्ण और गीता की कसमें खा रहे हैं कि वह कभी भी दोबारा उस पार्टी में नहीं जाएँगे। वह भी संजय यादव के मामले को लेकर खुलकर RJD के विरोध में खड़े हैं।

इस विवाद में वह भी रोहिणी आचार्य की तरफ खड़े हैं। वह सीधे तौर पर कह रहे हैं कि कुछ लोग तेजस्वी यादव की कुर्सी हथियाने की फिराक में है। उन्होंने कहा कि परिवार के मतभेदों को फायदा उठाकर बाहरी लोग सत्ता हासिल करना चाहते हैं।

तेज प्रताप के इससे पहले भी सत्ता को लेकर परिवार के भीतर संघर्ष होते रहे हैं लेकिन जिस तरह मीसा भारती और रोहिणी आचार्य ने खुलकर अपनी राय रखी है उसे पार्टी के लिए बड़े संकट की आमद के तौर पर देखा जा रहा है।