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कर्नाटक से बिहार तक कॉन्ग्रेस ने किसानों को बताई औकात: खरगे ने फसल बर्बादी की पीड़ा को बताया पब्लिसिटी स्टंट, MP तारिक अनवर ने पीठ पर सवार हो बाढ़ का लिया जायजा

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसके आधार पर बीजेपी उन्हें ‘किसान विरोधी’ करार दे रही है। वहीं एक और वीडियो कॉन्ग्रेस सांसद तारिक अनवर का सामने आया है, जिसमें वह किसानों के पीठ पर चढ़ कर उनकी दुर्दशा देख रहे हैं और बाढ़ का जायजा ले रहे हैं।

ये दो घटनाएँ कॉन्ग्रेस की सोच को दर्शाती है। चलिए पहले बात कर लेते हैं अध्यक्ष खरगे की। कर्नाटक के बाढ़ प्रभावित कलबुर्गी में अपने घर पहुँचे मल्लिकार्जुन खरगे ने किसान से कहा कि सिर्फ पब्लिसिटी के लिए यहाँ मत आओ, जाकर मोदी- शाह से पूछा। हुआ यूं कि खरगे प्रेस कॉन्ग्रेस कर रहे थे। उसी दौरान एक किसान ने उनसे फसल नुकसान खासकर अरहर दाल को लेकर कुछ बोलने की कोशिश की। इस पर कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ने उसे रोकते हुए कहा कि सिर्फ पब्लिसिटी के लिए मत आओ।

दरअसल, खरगे का यह वीडियो वायरल हो गया है। इसमें खरगे किसान से पूछ रहे हैं कि तुम्हारा कितने एकड़ में बोया है? इस पर किसान कहता है, चार एकड़। खरगे उसे जवाब देते हैं कि उनका 40 एकड़ है। खरगे बोले, “मेरा तुमसे ज्यादा बदतर है। तुम आकर मुझे बता सकते हो, लेकिन मेरा तुमसे भी खराब है।”

वीडियो में आगे वह कहते हैं, प्रचार के लिए यहाँ मत आओ, मुझे इसके बारे में सब पता है। मूँग, अरहर, उड़द सभी फसलें बर्बाद हो गई हैं। आप तो कम से कम इसे झेल सकते हैं। हम इसे नहीं झेल सकते क्योंकि मेरा नुकसान बड़ा है। जाकर मोदी-शाह से पूछा।”

इस पर बीजेपी ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष को जमकर लताड़ा है। बीजेपी ने वीडियो पोस्ट कर कहा है कि किसान खरगे के पास गए, उन्हें वहाँ से जाने के लिए कहा गया और बोला गया कि प्रचार के लिए आना बंद करो। आखिर कॉन्ग्रेस और राहुल गाँधी को किसानों से इतनी नफरत क्यों है?

इसी बीच एक और वीडियो सामने आ गया है। ये कटिहार के कॉन्ग्रेस सांसद तारिक अनवर का है। बिहार के बाढ़ग्रस्त अपने संसदीय क्षेत्र का उन्होंने दौरा किया । सांसद बाढ़ग्रस्त किसानों का हाल-चाल लेने पहुँचे थे। खेतों में पानी- कीचड़ के बीच संभलते हुए पगडंडी पर चलना उनके लिए काफी मुश्किल हो रहा था। फिर क्या था वो एक किसान की पीठ पर बैठ कर बाढ़ का जायजा लेने लगे।

सांसद अनवर के चेहरे पर मुस्कान देखा जा सकता है। दो सिपाही उनके पीछे-पीछे चल रहे हैं। तीन लोग संभालने में लगे हैं। सांसद का यह वीडियो अब वायरल हो रहा है। ये घटना उस वक्त की है, जब तारिक अनवर मनिहारी के धुरयाही पंचायत पहुँचे थे।

वीडियो में देखा जा सकता है कि सांसद एक व्यक्ति की पीठ पर चढ़े हैं और दो लोग उन्हें संभालने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि गिर न जाएँ। इस पर सफाई देते हुए स्थानीय कॉन्ग्रेस नेताओं का कहना है कि उनकी तबीयत खराब हो गई थी, इसलिए ग्रामीणों ने उन्हें गोद में उठा लिया।

TMC कार्यकर्ता ने कोलकाता में दोस्त के साथ 20 साल की युवती का किया गैंगरेप: बर्थडे पार्टी के बहाने पीड़िता को घर से उठाया, पूरी रात बंधक बनाकर की हैवानियत

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के दक्षिणी इलाके हरिदेवपुर में 20 साल की एक युवती के साथ गैंगरेप की घटना सामने आई है। पुलिस के मुताबिक, इस घिनौने वारदात में शामिल आरोपितों का नाम चंदन मलिक और देबांशु बिस्वास है।

दोनों की तस्वीरें अब सार्वजनिक कर दी गई हैं ताकि लोग उन्हें पहचान सकें और उनकी गिरफ्तारी में मदद मिल सके। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, आरोपित चंदन का आपराधिक बैकग्राउंड भी है। वहीं, बीजेपी का दावा है कि दूसरा आरोपित देबांशु, तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) का कार्यकर्ता है।

बता दें कि इससे पहले कोलकाता लॉ कालेज में 25 जून 2025 को छात्रा के साथ रेप करने वाला मुख्य आरोपित मनोजित भी TMC का ही कार्यकर्ता था।

क्या है पूरा मामला?

पीड़ित युवती हरिदेवपुर थाना क्षेत्र की रहने वाली है। उसने अपनी शिकायत में बताया कि कुछ महीने पहले उसकी मुलाकात चंदन मलिक नाम के एक युवक से हुई थी। चंदन ने खुद को दक्षिण कोलकाता में एक बड़ी दुर्गा पूजा समिति का प्रमुख बताया था। चंदन ने ही युवती को देबांशु से मिलवाया था। दोनों ने युवती को पूजा समिति में शामिल करने का वादा किया था। इसी सिलसिले में उनकी अक्सर बात होती थी।

पुलिस की रिपोर्ट के अनुसार, मुख्य आरोपित चंदन मलिक ने युवती को एक जन्मदिन की पार्टी में बुलाया था। जब उसने आने से इनकार किया, तो शनिवार (6 सितंबर 2025) की रात को चंदन और देबांशु उसे जबरन उसके घर से उठा ले गए। फिर वे उसे मालंचा इलाके में ले गए और वहाँ कई बार उसके साथ दुष्कर्म किया गया। पीड़िता को आरोपितों ने पूरी रात बंधक बनाकर रखा था और अगले दिन वह किसी तरह बचकर निकल पाई।

घटना के बाद युवती किसी तरह घर लौटी और अपने परिवार को पूरी बात बताई। इसके बाद परिवार ने तुरंत थाने जाकर शिकायत दर्ज करवाई। पुलिस ने मेडिकल जाँच करवाई और घटनास्थल की छानबीन भी शुरू कर दी है।

चंदन मलिक इलाके में पहले से ही एक बदनाम और दबंग किस्म का इंसान माना जाता है। वह इलाके के लोगों के साथ अक्सर मारपीट करता था। वह एक स्थानीय पूजा समिति से भी जुडा हआ है और उसकी क्राइम हिस्ट्री भी है। दोनों ही आरोपित फिलहाल फरार हैं।

TMC का कार्यकर्ता है आरोपित देबांशु

महिला के रेप के आरोपित देबांशु के राज्य की सत्तारूढ़ तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) से जुड़े होने के आरोप भी लग रह हैं। बीजेपी नेता केया घोष ने X पर एक पोस्ट कर देबांशु के TMC कार्यकर्ता होने का दावा किया है।

केया ने X पर अपने पोस्ट में लिखा, “कोलकाता में एक और गैंगरेप और जैसी की उम्मीद थी। एक आरोपित TMC से है। पहले मनोजित और अब देबांशु…TMC के माँ, माटी और मानुष मॉडल के उदाहरण हैं।”

सोशल मीडिया पर कुछ पोस्ट भी सामने आए हैं जिनमें दावा किया जा रहा है कि देबांशु ममता बनर्जी की पार्टी TMC का कार्यकर्ता है।

देबांशु ममता के नेतृत्व वाली पश्चिम बंगाल सरकार के भूमि सुधार विभाग में राजस्व निरीक्षक के पद पर तैनात है। उसके पड़ोसियों का कहना है कि उसे पिता की मृत्यु के बाद यह नौकरी मिली थी।

खुले में पेशाब करने से रोका तो अमेरिकी शख्स ने हरियाणा के युवक को मारी गोली, डंकी रूट से US गया था कपिल: जानें कितना खतरनाक है घने जंगल, पहाड़ों वाला यह रास्ता

हरियाणा के जींद के एक 26 साल के युवक की अमेरिका के कैलिफॉर्निया में गोली मारकर हत्या कर दी गई। उसका कसूर सिर्फ इतना था कि उसने एक अमेरिकन को खुले में पेशाब करने से रोका था। बराह कलां गाँव का रहने वाला कपिल करीब ढ़ाई साल पहले डंकी रूट से अमेरिका गया था।

शनिवार रात (6 सिंतबर 2025) को कपिल ने सार्वजनिक स्थान पर पेशाब करने से एक अमेरिकी मूल के व्यक्ति को टोका था। इसको लेकर दोनों में बहस हुई। अमेरिकी मूल के व्यक्ति ने पिस्टल निकाल कर कपिल पर गोलियाँ चला दी। आसपास मौजूद लोगों ने पुलिस को सूचना दी। पुलिस उसे लेकर नजदीक के अस्पताल गई, जहाँ डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। हत्या की खबर से पूरे गाँव में मातम पसरा हुआ है। परिजन उसके शव को लाने की तैयारी कर रहे हैं।

कपिल अपने परिवार का अकेला बेटा था। पिता ईश्वर सिंह के मुताबिक, उन्हें अपने बेटे को अमेरिका भेजने में 45 लाख रुपए खर्च हुए। वह पनामा के घने जंगलों को पार करते हुए, मेक्सिको की दीवार फाँद कर अमेरिका पहुँचा था। इसके बाद वह अमेरिका में गिरफ्तार हो गया। उस पर केस चल रहा था। कपिल के पिता किसान हैं और वह अपने चाचा रमेश सिंह के घर पर रह कर जींद में पढ़ाई-लिखाई करता था। चाचा के मुताबिक उन्होंने 2022 में काफी मुश्किल से उसे डंकी रूट से अमेरिका भेजा था।

क्या है डंकी रूट ?

डंकी पंजाबी भाषा में इस्तेमाल होता है, जिसका अर्थ है- एक जगह से दूसरी जगह पर उछल कर जाना। लेकिन अब डंकी शब्द का अर्थ बदल गया है। ‘डंकी रूट’ नाम उस रास्ते को दे दिया गया है, जिससे कोई भी व्यक्ति अवैध तरीके से भारत छोड़ कर दूसरे देश में प्रवेश करता है। यह शब्द हालिया समय में अमेरिका जाने के अवैध रास्ते का नाम हो गया है। इस नाम से रील्स बनती हैं, वीडियो बनते हैं, फिल्म तक बनाई गई है।

डंकी रूट के जरिए भारतीयों को कई एजेंट विदेश भेजने का वादा करते हैं। जो लोग डंकी का रास्ता चुनते हैं, सबसे पहले उनका पासपोर्ट और वीजा तैयार करवाया जाता है। डंकी का काम करने वाले एजेंट पैसा लेकर किसी यूरोपियन या फिर लैटिन अमेरिका के किसी देश का वीजा तैयार करवाते हैं। अधिकांश मौकों पर यह टूरिस्ट वीजा होता है। इसी के सहारे डंकी वालों को भारत से निकाला जाता है। इनको नेपाल, दुबई और किसी अन्य देश में कुछ दिन यात्रा करवा कर इनकी एक यात्रा की पूरी कहानी तैयार करवाई जाती है।

इसके बाद डंकी रूट का सहारा लेने वाले की लैटिन अमेरिकी देश पहुँचते हैं। इन देशों में भारतीय डंकी एजेंटों के सहायक होते हैं, जो डंकी रूट लेने वालों को रास्ता बताते हैं और यहाँ अवैध तरीके से उनकी मदद करते हैं। कई बार यह लोग आपराधिक गैंग से जुड़े होते हैं। यह लोग इन्हें अमेरिका सीमा तक की यात्रा करवाते हैं। यह यात्रा जंगल, नदी और पहाड़ों से होकर गुजरती है। 40-50 किलोमीटर तक पैदल चलना भी पड़ता है। अमेरिका में घुसने के लिए सीमा लांघनी पड़ती है।

लैटिन अमेरिकी देश तक हवाई यात्रा करते हैं

अमेरिका में अवैध रूप से घुसने वाले लोग सबसे पहले किसी लैटिन अमेरिकी देश में हवाई यात्रा के जरिए पहुँचते हैं। यह देश ब्राजील, वेनेज़ुएला, बोलिविया, पेरू, कोलंबिया, निकारागुआ समेत कोई भी हो सकता है। यदि कोई व्यक्ति ब्राजील पहुँचा है तो उसे यहाँ से सीमा पर करके कोलंबिया पहुँचना होगा। इसके लिए कभी कभार मानव तस्करी करने वाले गाड़ी उपलब्ध करवाते हैं। फिर उस व्यक्ति को पनामा में घुसाया जाता है। पनामा में अधिकांश लोगों को चुपके से जंगल पार करना होता है।

घने जंगल, पहाड़ों को पार कर घुसते हैं

इसके बाद निकारागुआ और ग्वाटेमाला होते हुए यह लोग मेक्सिको पहुँचते हैं। मेक्सिको और अमेरिका आपस में सीमा साझा करते हैं। मेक्सिको की सुरक्षा एजेंसियों से बचते हुए यह यहाँ इकट्ठा होते हैं। अमेरिका और मेक्सिको की सीमा पर वर्तमान में ऊँची लोहे की बाड़ लगी हुई है। इसे पार करने के लिए रस्सियों का सहारा लिया जाता है। डंकी रूट लेने वाले लोग अमेरिकी सीमा में घुसना एक उपलब्धि की तरह होता है।

इस बीच इन्हें कई बार पहाड़, नदी तक पार करने होते हैं। डंकी रूट से गए एक व्यक्ति ने बताया, “हमने 17-18 पहाड़ियाँ पार कीं। अगर कोई फिसल जाता, तो उसके बचने की कोई उम्मीद नहीं थी। अगर कोई घायल हो जाता, तो उसे मरने के लिए छोड़ दिया जाता। हमने लाशें देखीं।” एक और व्यक्ति ने बताया कि उन्हें नाव की 10-15 घंटे तक की यात्रा करनी पड़ी।”

शरणार्थी बनना चाहते हैं डंकी रूट से आए लोग

अमेरिका से वापस भेजे गए भारतीय बताते हैं कि डंकी रूट के सहारे जो लोग घुसने में कामयाब हो जाते हैं, वह शरणार्थी का दर्जा पाने का प्रयास करते हैं। सीमा पार करते समय अगर किसी शरणार्थी को अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियाँ पकड़ लेती हैं, तो वह दावा करते हैं कि भारत में उनके साथ उत्पीड़न हो रहा है और वह खाने-पीने तक को मोहताज है। इसलिए शरण लेने के लिए अमेरिका पहुँचे हैं।

माँ भारती के सच्चे उपासक, लोगों की धड़कन: PM मोदी का भूपेन हजारिका की जयंती पर विशेष लेख, लिखा- कालजयी नदी की तरह बहती रही भूपेन दा की आवाज

भारतीय संस्कृति और संगीत से लगाव रखने वालों के लिए आज 8 सितंबर का दिन बहुत खास है। और विशेषकर इस दिन के साथ असम के मेरे भाइयों और बहनों की भावनाएं जुड़ी हुई हैं। आज भारत रत्न डॉ. भूपेन हजारिका की जन्म जयंती है। वे भारत की सबसे असाधारण और सबसे भावुक आवाज़ों में से एक थे। ये बहुत सुखद है कि इस वर्ष उनके जन्म शताब्दी वर्ष का आरंभ हो रहा है। यह भारतीय कला-जगत और जन-चेतना की दिशा में उनके महान योगदानों को फिर से याद करने का समय है।

भूपेन दा ने हमें संगीत से कहीं अधिक दिया। उनके संगीत में ऐसी भावनाएं थीं जो धुन से भी आगे जाती थीं। वे केवल एक गायक नहीं थे, वे लोगों की धड़कन थे। कई पीढ़ियां उनके गीत सुनते हुए बड़ी हुईं। उनके गीतों में हमेशा करुणा, सामाजिक न्याय, एकता और गहरी आत्मीयता की गूंज है।

भूपेन दा के रूप में असम से एक ऐसी आवाज़ निकली जो किसी कालजयी नदी की तरह बहती रही। भूपेन दा सशरीर हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी आवाज आज भी हमारे बीच है। वो आवाज आज भी सीमाओं और संस्कृतियों से परे है। उसमें मानवता का स्पर्श है।

भूपेन दा ने दुनिया का भ्रमण किया, समाज के हर वर्ग के लोगों से मिले, लेकिन वे असम में अपनी जड़ों से हमेशा जुड़े रहे। असम की समृद्ध मौखिक परंपराएं, लोकधुनें और सामुदायिक कहानी कहने के तरीकों ने उनके बचपन को गढ़ा। यही अनुभव उनकी कलात्मक भाषा की नींव बने। वे असम की आदिवासी पहचान और लोगों के सरोकार को हर समय साथ लेकर चले।

बहुत छोटी उम्र से उनकी प्रतिभा लोगों को नजर आने लगी। केवल पांच वर्ष की उम्र में उन्होंने सार्वजनिक मंच पर गाया। वहां लक्ष्मीनाथ बेझबरुआ जैसे असमिया साहित्य के अग्रदूत ने उनके कौशल को पहचाना। किशोरावस्था तक पहुंचते-पहुंचते उन्होंने अपना पहला गीत रिकॉर्ड कर लिया।

लेकिन संगीत उनके व्यक्तित्व का सिर्फ एक पहलू था। भूपेन दा भीतर से एक बौद्धिक व्यक्तित्व थे। जिज्ञासु, साफ बोलने वाले, दुनिया को समझने की अटूट चाह रखने वाले। ज्योति प्रसाद अग्रवाला और विष्णु प्रसाद रभा जैसे सांस्कृतिक दिग्गजों ने उनके मन पर गहरा प्रभाव डाला, और उनकी जिज्ञासु प्रवृत्ति को और बढ़ावा दिया।

सीखने की यही लगन उन्हें कॉटन कॉलेज, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय तक ले गई। वो बीएचयू में राजनीति शास्त्र के छात्र थे, लेकिन उनका अधिकतर समय संगीत साधना में बीतता था। बनारस ने उन्हें पूरी तरह संगीत की तरफ मोड़ दिया। काशी का सांसद होने के नाते मैं उनकी जीवन यात्रा से एक जुड़ाव महसूस करता हूं, और मुझे बहुत गर्व होता है।

काशी से आगे बढ़ी जीवन यात्रा में फिर उन्होंने अमेरिका में कुछ समय बिताया। वहां उन्होंने अपने समय के नामचीन विद्वानों, विचारकों और संगीतकारों से संवाद किया। वे पॉल रोबसन से मिले, जो दिग्गज कलाकार और सिविल राइट्स नेता थे। रोबसन का गीत “Ol’ Man River” उनके कालजयी गीत ‘बिश्टीरनो परोरे’ की प्रेरणा बना। अमेरिका की पूर्व प्रथम महिला एलेनॉर रूजवेल्ट ने भारतीय लोकसंगीत प्रस्तुतियों के लिए उन्हें गोल्ड मेडल भी दिया।

भूपेन हजारिका, संगीत के साथ ही मां भारती के भी सच्चे उपासक थे। भूपेन दा के पास अमेरिका में रहने का विकल्प था, लेकिन वे भारत लौट आए और संगीत साधना में डूब गए। रेडियो से लेकर रंगमंच तक, फिल्मों से लेकर एजुकेशनल डॉक्यूमेंट्री तक, हर माध्यम में वे पारंगत थे। जहां भी गए, नई प्रतिभाओं को समर्थन दिया।

भूपेन दा की रचनाएं काव्यात्मक सौंदर्य से भरी रहीं, और साथ-साथ उन्होंने सामाजिक संदेश भी दिए। गरीबों को न्याय, ग्रामीण विकास, आम नागरिक की ताकत, ऐसे अनेक विषय उन्होंने उठाए। उनके गीतों ने नाविकों, चाय बागान के मजदूरों, महिलाओं, किसानों की आकांक्षाओं को आवाज़ दी। उनकी रचनाएं लोगों को पुरानी स्मृतियों में ले जाती थीं, साथ ही, उन्होंने आधुनिकता को देखने का एक सशक्त नजरिया भी दिया। बहुत से लोग, खासकर सामाजिक रूप से वंचित तबकों के लोग, उनके संगीत से शक्ति और आशा पाते रहे…और आज भी पा रहे हैं।

भूपेन दा की जीवन यात्रा में ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना का स्पष्ट प्रभाव दिखता है। उनकी रचनाओं ने भाषा और क्षेत्र की सीमाएं तोड़कर एकजुट किया। उन्होंने असमिया, बांग्ला और हिन्दी फिल्मों के लिए संगीत रचा। उनकी आवाज में जो पीड़ा थी, वो बरबस हम सभी का ध्यान खींच लेती थी। ‘दिल हूम हूम करे’ में जो पीड़ा बहती है, वो सीधे दिल की गहराइयों को छू लेती है। और जब वे पूछते हैं, ‘गंगा बहती है क्यूं’, तो ऐसा लगता है मानो हर आत्मा को झकझोर कर जवाब मांग रहे हों।

उन्होंने पूरे भारत के सामने असम को सुनाया, दिखाया, महसूस कराया। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि आधुनिक असम की सांस्कृतिक पहचान को गढ़ने में उनका बड़ा योगदान रहा। असम के भीतर और दुनिया भर के असमिया प्रवासियों, दोनों के लिए वो असम की आवाज बने।

भूपेन दा राजनीतिक व्यक्ति नहीं थे, फिर भी जनसेवा की दुनिया से जुड़े रहे। 1967 में वे असम के नौबोइचा से निर्दलीय विधायक चुने गए। यह दिखाता है कि लोगों को उन पर कितना गहरा विश्वास था। उन्होंने राजनीति को अपना करियर नहीं बनाया, लेकिन हमेशा लोगों की सेवा में जुटे रहे।

भारत की जनता और भारत सरकार ने उनके योगदान का सम्मान किया। उन्हें पद्मश्री, पद्मभूषण, पद्मविभूषण, दादासाहेब फाल्के अवार्ड समेत कई सम्मान मिले। 2019 में हमारे कार्यकाल के दौरान उन्हें भारत रत्न मिला। यह मेरे लिए और एनडीए सरकार के लिए भी सम्मान की बात थी। दुनिया भर में, खासकर असम और उत्तर-पूर्व के लोगों ने, इस अवसर पर खुशी जताई। यह उन सिद्धांतों का सम्मान था, जिन्हें भूपेन दा दिल से मानते थे। वो कहते थे कि सच्चाई से निकला संगीत किसी एक दायरे में सिमट कर नहीं रहता। एक गीत लोगों के सपनों को पंख लगा सकता है, और दुनिया भर के दिलों को छू सकता है।

मुझे 2011 का वह समय याद है जब भूपेन दा का निधन हुआ। मैंने टीवी पर देखा, उनके अंतिम संस्कार में लाखों लोग पहुंचे। हर आंख नम थी। जीवन की तरह, मृत्यु में भी उन्होंने लोगों को साथ ला दिया। इसलिए उन्हें जलुकबाड़ी की पहाड़ी पर ब्रह्मपुत्र की ओर देखते हुए अंतिम विदाई दी गई, वही नदी जो उनके संगीत, उनके प्रतीकों और उनकी स्मृतियों की जीवनरेखा रही है। अब ये देखना बहुत सुखद है कि असम सरकार भूपेन हजारिका कल्चरल ट्रस्ट के कार्यों को बढ़ावा दे रही है। यह ट्रस्ट युवा पीढ़ी को भूपेन दा की जीवन यात्रा से जोड़ने में जुटा है।

भूपेन दा की सांस्कृतिक विरासत को सम्मान देने के लिए देश के सबसे बड़े पुल को भूपेन हजारिका सेतु नाम दिया गया। 2017 में जब मुझे इस सेतु के उद्घाटन का अवसर मिला, तो मैंने महसूस किया कि असम और अरुणाचल…इन दो राज्यों को जोड़ने वाले, उनके बीच की दूरी कम करने वाले इस सेतु के लिए भूपेन दा का नाम सबसे उपयुक्त है।

भूपेन हजारिका का जीवन हमें करुणा की शक्ति का एहसास कराता है। लोगों को सुनने और अपनी मिट्टी से जुड़े रहने की सीख देता है। उनके गीत आज भी बच्चों और बुजुर्गों, दोनों की ज़ुबान पर हैं। उनका संगीत हमें माननीय और साहसी बनना सिखाता है। वह हमें अपनी नदियों, अपने मजदूरों, अपने चाय बागान के कामगारों, अपनी नारी शक्ति और अपनी युवा शक्ति को याद रखने को कहता है। वह हमें विविधता में एकता पर भरोसा करने के लिए प्रेरित करता है।

भारत भूपेन हजारिका जैसे रत्न से धन्य है। जब हम उनके शताब्दी वर्ष का आरंभ कर रहे हैं, तो आइए यह संकल्प लें कि उनके संदेश को दूर-दूर तक पहुंचाएंगे। यह संकल्प हमें संगीत, कला और संस्कृति के लिए और काम करने की प्रेरणा दे, नई प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करे, भारत में सृजनात्मकता और कलात्मक उत्कृष्टता को बढ़ावा दे। मेरी बहुत-बहुत शुभकामनाएँ।

(यह लेख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने निजी ब्लॉग पर लिखा है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

बरेली में रेहान ने बिट्टू बनकर की हिंदू महिला से दोस्ती, निकाह और धर्मांतरण का बनाया दबाव: नहीं मानी पीड़िता तो काटे कान-उँगलियाँ, बेटी को बीच रास्ते से उठाने की कोशिश

उत्तर प्रदेश के बरेली के थाना किला क्षेत्र में एक महिला ने आरोप लगाया है कि रेहान नामक शख्स ने अपना नाम बिट्टू बताकर पहले उससे दोस्ती की और बाद में निकाह और धर्म परिवर्तन का दबाव बनाने लगा। मना करने पर महिला पर जानलेवा हमला कर उसके कान और उँगलियाँ काट दी। आरोपित ने महिला की चार साल की बच्ची को अगवा करने की कोशिश भी की।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पीड़िता ने बताया कि करीब 6-7 महीने पहले वह कोहरापीर पुलिया स्थित रेहान की दुकान पर मिक्सी ठीक कराने गई थी। इस दौरान उसने अपना नाम बिट्टू बताया था। यहाँ उसने महिला उसका नंबर ले लिया और फिर लगातार फोन कर बातें करने लगा। यह बातचीत धीरे-धीरे प्रेम संबंधों में बदलने लगी।

दोनों के बीच प्रेम संबंध के कुछ दिन बाद महिला को पता चला कि वह मुस्लिम है और उसका नाम रेहान है, तो उसने आरोपित से दूरी बनाने की कोशिश शुरू कर दी। रेहान के इस काले कारनामे में साथ देने के लिए पूरा परिवार उसके साथ आ गया।

रेहान की अम्मी, बहन-बहनोई ने महिला को धोखे से घर बुला लिया। इसके बाद सभी ने मिलकर उस पर दबाव बनाया कि वह धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम बन जाए और रेहान से निकाह करे। मना करने पर पूरे परिवार को जान से मारने की धमकी दी गई।

शनिवार (6 सितंबर) को पीड़िता अपनी चार साल की बेटी के साथ बाजार जा रही थी, तभी रेहान ने पीछे से आकर उस पर लोहे की रॉड और धारदार हथियार से हमला कर दिया। रेहान ने उसका कान और उसकी उँगलियाँ भी काट दी।

लहूलुहान होकर महिला सड़क पर गिर गई, इस बीच आरोपित ने उसकी मासूम बच्ची को भी उठाकर ले जाने की कोशिश की, लेकिन बच्ची की चीख सुनकर आसपास के लोगों ने उसे छुड़ा लिया।

महिला का कहना है कि वह दो दिन तक पुलिस थाने के चक्कर काटती रही, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। अंत में मामले की जानकारी मिलने के बाद हिंदू संगठनों ने थाने पहुँचकर मामले की शिकायत की, जिसके बाद पुलिस ने रेहान सहित कुल 7 लोगों पर पर मुकदमा दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है। मुख्य आरोपित रेहान फिलहाल फरार बताया जा रहा है।

छत्तीसगढ़ में 50 हिंदुओं के धर्मांतरण की साजिश, गरीब-बीमार लोगों को निशाना बना रहे पादरी समेत 8 गिरफ्तार: महिला ने पति पर कराई FIR, कहा- जबरन ईसाई बनाना चाहता है

छत्तीसगढ़ के बालोद में धर्मांतरण का मामला सामने आया है। रविवार (7 सितंबर 2025) को गुंडरदेही धमतरी रोड पर एक घर में ईसाईयों की प्रार्थना सभा चल रही थी। इसमें हिन्दुओं का धर्मांतरण किया जा रहा था। पूछताछ के बाद पास्टर समेत 8 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। वहीं एक और मामले में पत्नी ने अपने पति पर ईसाइयत स्वीकार करने के लिए दबाव डालने का आरोप लगाया। पुलिस ने मामला दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है।

40-50 हिन्दुओं के धर्मांतरण की कोशिश

बालोद के गुंडरदेही धमतरी मेन रोड पर पंचराम नाम के व्यक्ति के घर पर ईसाईयों की प्रार्थना सभा चल रही थी। हिन्दू संगठनों का कहना है कि प्रार्थना सभा की आड़ में 40-50 हिन्दुओं का धर्मांतरण कराया जा रहा था। इसकी खबर मिलने के बाद संगठन के लोग घटनास्थल पर पहुँच गए और जमकर बवाल किया। पुलिस के साथ उनकी बहस भी हुई। पुलिस करीब 22 लोगों को थाने लेकर आई और पूछताछ के बाद पास्टर समेत 8 लोगों को गिरफ्तार कर लिया।

गरीब- बीमार लोग टारगेट पर- वीएचपी नेता

हिन्दू संगठनों का कहना है कि बीमार और गरीब हिन्दुओं को चमत्कार दिखा कर फुसलाया जाता है। उन्हें आर्थिक मदद करने का भरोसा दिया जाता है और धर्मांतरण के लिए बरगलाया जाता है। विश्व हिन्दू परिषद के जिलाध्यक्ष बलराम गुप्ता का कहना है कि यहाँ धर्मांतरण का रैकेट चल रहा है। उन्होंने कहा कि जिस घर में रविवार को प्रार्थना हो रही थी, वहाँ पादरी को बैठने के लिए खास आसन बनाया गया था। लोगों को हर तरीके से प्रभावित करने की कोशिश हो रही थी। उन्होंने कहा कि पुलिस धर्मांतरण को रोकने के लिए सख्त एक्शन ले, वरना संगठन धर्मांतरण के खिलाफ आंदोलन करेगा।

धर्मांतरण के लिए पति ने डाला दबाव- महिला

वहीं एक और मामले में एक महिला ने अपने पति पर जबरन ईसाइयत स्वीकार करने के लिए दबाव डालने का आरोप लगाया। सिविल लाइन के भारतीय नगर में रहने वाली महिला अपने बेटे के साथ थाने पहुँची और पति के खिलाफ मामला दर्ज करवाया। महिला का कहना है कि उसका पति पूरे परिवार को ईसाईयों के प्रार्थना सभा में ले जाना चाहता है। मना करने पर घर पर ही ईसाईयों की तरह प्रार्थना करने का दबाव डालता है। वह चाहता है कि पूरा परिवार ईसाई बने। पुलिस ने केस दर्ज कर लिया है और पूरे मामले की जाँच करने की बात कही है।

कहीं गणेश प्रतिमा पर थूका, कहीं मस्जिद से बरसाए पत्थर: कर्नाटक में गणपति विसर्जन के दौरान इस्लामी कट्टरपंथियों का बवाल, पुलिस ने 21 लोगों को किया गिरफ्तार

कर्नाटक के मांड्या में रविवार (7 सितंबर 2025) को गणपति विसर्जन के दौरान जमकर बवाल हुआ है। इस दौरान हिंसक झड़प और शोभायात्रा पर पथराव भी हुआ, जिसमें कम-से-कम 8 लोगों के गंभीर रूप से घायल होने की खबर है। वहीं, कर्नाटक के ही शिवमोग्गा में विसर्जन के दौरान दो मुस्लिम युवकों द्वारा भगवान गणेश की प्रतिमा पर थूके जाने का मामला सामने आया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, मांड्या में गणपति के विसर्जन के लिए निकाली जा रही शोभायात्रा पर जब एक मस्जिद के पास पहुँची तो उस पर मस्जिद से पथराव कर दिया गया। इसके बाद शोभायात्रा में शामिल लोग भी भड़क गए और दोनों समुदायों के बीच हालात तनावपूर्ण हो गए। दोनों तरफ से पथराव हुआ और इसमें 8 लोग घायल हो गए।

गणपति विसर्जन करने के लिए जा रहे लोगों ने भगवान गणेश की प्रतिमा पर भी हमला किए जाने का आरोप लगाया है। झड़प के बाद मौके पर भारी पुलिस बल की तैनाती की गई है और घायलों को अस्पताल में भर्ती करा दिया है। वहीं, पुलिस ने हिंसा और पथराव मामले में कार्रवाई करते हुए 21 लोगों को गिरफ्तार कर लिया है। वहीं, विवाद के बाद पूरे इलाके में धारा 163 लागू कर दी गई है।

पिछले साल भी मांड्या में हुआ था बवाल

मांड्या जिले में गणपति विसर्जन के दौरान साम्प्रदायिक झड़पें कोई नई बात नहीं हैं। वर्ष 2024 में नागमंगला में गणेश विसर्जन जुलूस के दौरान दो समुदायों के बीच खूनी संघर्ष हुआ था, जिसमें जमकर पथराव और हिंसा देखने को मिली थी। इस दौरान कई दुकानों और वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया था, जिससे पूरे इलाके में दहशत का माहौल बन गया।

हालात बिगड़ने पर पुलिस को धारा 144 लागू करनी पड़ी और अतिरिक्त बल की तैनाती करनी पड़ी। तब 50 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया था। इससे पहले भी गणपति विसर्जन के अवसर पर इसी तरह की झड़पें हो चुकी थीं, जो इस क्षेत्र में सांप्रदायिक तनाव की लगातार मौजूदगी को दर्शाती हैं।

शिवमोग्गा में गणेश प्रतिमा पर थूका

इसके अलावा, शिवमोग्गा जिले के सागर नगर में जय भुवनेश्वरी युवा संघ द्वारा निकाले गए गणेश विसर्जन जुलूस के दौरान एक घटना ने पूरे इलाके में तनाव फैला दिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, जब जुलूस जन्नत नगर की ओर बढ़ रहा थ तभी दूसरी समुदाय के दो बच्चों ने भगवान गणेश की प्रतिमा पर कथित रूप से थूक दिया।

इस घटना के बाद लोगों में गुस्सा और आक्रोश फैल गया। जुलूस में शामिल भक्तों ने प्रशासन से घटना में शामिल लोगों पर कड़ी कार्रवाई की माँग की है। इस दौरान पुलिस मौके पर पहुंची और प्रदर्शनकारियों को आश्वासन दिया कि उचित कानूनी कदम उठाए जाएंगे। पुलिस ने लोगों से क्षेत्र में शांति और सौहार्द बनाए रखने की अपील की है।

‘धर्मांतरण और लव जिहाद समाज के लिए खतरा’: RSS ने पंजाब में ड्रग्स और बांग्लादेशी घुसपैठ पर भी जताई चिंता, SIR को बताया- लोकतंत्र की रीढ़

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने लव जिहाद और धर्मांतरण को सामाजिक सद्भाव के लिए गंभीर खतरा बताया है। RSS ने ऐसी घटनाओं को रोकने पर जोर दिया और समस्या के समाधान पर बात की।

RSS के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने कहा, “जबरदस्ती, प्रलोभन या धोखे से किया गया धर्मांतरण उचित नहीं है। इससे समाज में अशांति फैल सकती है। इन्हें हर हाल में रोकना ही हमारा लक्ष्य है। इस समस्या का समाधान एक लंबी प्रक्रिया है लेकिन हमें विश्वास है कि जल्द ही अनुकूल परिस्थितियों बनेंगी।”

यह बातें RSS के जोधपुर में आयोजित तीन दिवसीय अखिल भारतीय समन्वय बैठक के समापन के बाद पत्रकार वार्ता के दौरान कही गई। इस दौरान शिक्षा, सामाजिक चुनौतियों, आंतरिक सुरक्षा और संघ की आने वाली योजनाओं पर विस्तार से जानकारी दी गई।

आंबेकर ने सबसे पहले चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) पहल का समर्थन किया। उन्होंने कहा, “स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की रीढ़ हैं और इस तरह की पहल मतदाता सूची की पारदर्शिता और विश्वसनीयता बढ़ाती है।” संघ ने देशव्यापी स्तर पर SIR को लागू करने की जरूरत पर जोर दिया।

बैठक में शिक्षा नीति पर भी चर्चा हुई। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) को लागू करने में आ रही चुनौतियों और उसके अनुभव साझा किए गए। संघ से जुड़े विभिन्न शैक्षिक संगठनों ने कहा कि प्राथमिक से उच्च शिक्षा तक मातृभाषा को बढ़ावा देने और भारतीय भाषाओं को सम्मान दिलाने के प्रयास जारी हैं। किताबों का पुनर्लेखन, शिक्षक प्रशिक्षण और भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा में शामिल करने पर भी काम चल रहा है। आंबेकर ने कहा कि अंग्रेजी का विरोध नहीं है लेकिन भारतीय भाषाओं को शिक्षा और शासन में उचित स्थान मिलना चाहिए।

बैठक में देश की सामाजिक परिस्थितियों पर भी चर्चा हुई। पंजाब में युवाओं में फैलते नशे और धर्मांतरण को लेकर चिंता जताई गई। संघ और उसके सहयोगी संगठन नशा मुक्ति अभियान और समाज जागरण कार्यक्रम चला रहे हैं। पश्चिम बंगाल में बांग्लादेश से हो रही घुसपैठ और बिगड़ती कानून-व्यवस्था पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई। आंबेकर ने कहा कि अपराध और घुसपैठ की घटनाएँ लोगों के लिए बड़ी चुनौती बन गई हैं।

पूर्वोत्तर राज्यों को लेकर आंबेकर ने कहा कि वहाँ हिंसा में कमी आई है और विकास के नए अवसर खुल रहे हैं। मणिपुर में हाल की घटनाओं के बाद संघ ने संवाद और सामंजस्य पर जोर दिया। स्थानीय समुदायों के बीच बातचीत और गृह मंत्रालय की पहल, जैसे राजमार्गों का फिर से खुलना, सकारात्मक संकेत माने गए।

जनजातीय क्षेत्रों को लेकर भी चर्चा हुई। नक्सली और माओवादी हिंसा में कमी आने को सकारात्मक माना गया लेकिन अभी भी भ्रम फैलाने की कोशिशें जारी हैं। वनवासी कल्याण आश्रम द्वारा छात्रावास और शिक्षा के क्षेत्र में किए गए कामों का उल्लेख किया गया।

महिलाओं की भागीदारी को लेकर भी संघ ने अपने दृष्टिकोण रखे। आंबेकर ने बताया कि महिला कार्यकर्ताओं द्वारा ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के अंतर्गत 887 कार्यक्रम आयोजित किए गए और महिलाओं की भूमिका लगातार बढ़ रही है। क्रीड़ा भारती जैसे संगठनों के माध्यम से महिला खिलाड़ियों को योग और अध्ययन से जोड़ा जा रहा है।

संघ शताब्दी वर्ष की तैयारियों पर भी चर्चा हुई। 2 अक्टूबर 2025 को नागपुर से इसका औपचारिक शुभारंभ होगा। पर्यावरण संरक्षण, कुटुंब प्रबोधन और नागरिक कर्तव्य जैसे विषयों पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाएँगे। अंत में, आंबेकर ने कहा कि देश की दिशा सकारात्मक है, लेकिन कई विषयों पर अभी और कार्य करने की आवश्यकता है।

PM मोदी के सामने नतमस्तक हुआ विदेशी मीडिया: लिखा- ट्रंप के बड़बोलेपन के आगे तनकर खड़े हुए, इजरायल को भी इससे सीखने की जरूरत

अमेरिका के साथ टैरिफ वॉर के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी झुके नहीं। भारत ने रूस से तेल लेना चालू रखा। यहाँ तक की चीन और रूस से दोस्ती गहरी की। अब पीएम मोदी की इस दिलेरी की दुनिया तारीफ कर रही है। इजरायल ने खुद के लिए इसे सबक बताया है और पीएम मोदी से सीखने की बात कही है।

इजरायली मीडिया पोर्टल The Jerusalam Post ने एक लेख में बताया है कि इजरायल को पीएम मोदी से सीखने की जरूरत है कि कैसे वो राष्ट्रीय सम्मान को सर्वोपरि रखते हैं। इस रिपोर्ट की हेडलाइन से समझ आता है कि पीएम मोदी विश्वभर के ताकतवर नेताओं में से एक हैं- “What Israel can Learn from Modi: National honor as strategic asset”

The Jerusalam Post के लेख का स्क्रीनशॉट

जकी शालोम द्वारा लिखी गई इस रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि भारत से सीख मिलती है, ‘राष्ट्रीय सम्मान कोई विलासिता नहीं बल्कि एक दूरगामी रणनीतिक संपत्ति है।’ इससे साफ है कि कैसे भारत के पीएम नरेंद्र मोदी ने अपने नेतृत्व में राष्ट्रीय सम्मान और आत्मविश्वास को बढ़ावा दिया है, जो एक महत्वपूर्ण रणनीतिक संपत्ति बन गया है।

डोनाल्ड ट्रंप की भारत पर तीखी बयानबाजी

इजरायल की रिपोर्ट में अमेरिका और भारत के रिश्तों पर भी बात की गई। रिपोर्ट में बताया गया कि भारत-अमेरिका के बीच रिश्तों में गंभीर विश्वास की कमी आई है, जिसका कारण ‘टैरिफ’, भारत-रूस संबंध और अमेरिका का भारत-पाकिस्तान सीमा विवाद पर नजरिया बताया गया है।

रिपोर्ट में इस बात को भी उल्लेख किया गया कि कैसे डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि भारत के अमेरिका पर ‘दुनिया में सबसे ज्यादा’ टैरिफ लगाने के जवाब में ही भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ बढ़ाया। इसके अलावा डोनाल्ड ट्रंप के भारत को ‘डेड इकोनॉमी’ बताने और पीएम मोदी पर यूक्रेन को व्यापारिक मदद देने की भी बात पर जोर डाला।

जकी शालोम लिखते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप ने भारत-पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता का भी दावा किया। इसके बाद पाकिस्तान ने भी इस मामले में ट्रंप की तारीफ की और नोबेल पुरस्कार देने की बात कही। लेकिन भारत ने कभी अमेरिका की मध्यस्थता को नहीं माना, जिससे दोनों देशों के बीच दरार आई।

इन सब तकरारों के बावजूद पीएम मोदी ने अमेरिका की ओर सख्त रुख अपनाया। इजरायली रिपोर्ट में पीएम मोदी की तारीफ करते हुए लिखा मोदी का यह रुख आर्थिक या सैन्य कारणों से नहीं था बल्कि यह भारत की राष्ट्रीय और व्यक्तिगत सम्मान की भावना से भी जुड़ा था। इजरायली मीडिया लिखती हैं कि इस मामले में इजरायल को भी कुछ सीख मिलती है।

खान यूनिस हमले में इजरायल का रुख

जकी शालोम ने खान यूनिस हमले का उदाहरण देते हुए इजरायल को पीएम मोदी से सीख लेने की बात कही। वे लिखते हैं खान यूनिस में इजरायली गोलीबारी में 20 लोग मारे गए, जिनमें पत्रकार भी शामिल थे। घटना के तुरंत बाद इजरायली सेना ने इसे ‘दुखद घटना’ बताते हुए माफी माँगी।

रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया इजरायली सेना ने पूरी जानकारी के बिना हमले की जिम्मेदारी स्वीकार कर ली जबकि मृतकों में हमास के सदस्य भी शामिल थे, जिससे संदेश गया कि इजरायल ने मासूम नागरिकों की हत्या की है।

इस घटना के बाद इजरायली मीडिया अपने प्रशासन को तंज कसते हुए पीएम मोदी की तारीफ करती है।

पीएम मोदी की तारीफ

इजरायली मीडिया पीएम मोदी का उदाहरण बताते हुए लिखती है कि ट्रंप ने जब भारत पर लगातार मौखिक हमले किए तब मोदी ने माफी नहीं माँगी। बल्कि उन्होंने मजबूती से जवाब दिया और देश का सम्मान बचाया।

जकी शालोम कहते हैं कि पीएम मोदी से इजरायल को सीखना चाहिए कि राष्ट्रीय सम्मान को हमेशा प्राथमिकता देनी चाहिए। इजरायल प्रशासन को तंज कसते हुए वह लिखते हैं कि जल्दी जिम्मेदारी मान लेना कमजोरी समझा जा सकता है और दुश्मन इसका फायदा उठा सकते हैं। अंत में वह लिखते हैं कि भारत की तरह सम्मान को रणनीतिक संपत्ति मानना चाहिए, जिसे बनाए रखना जरूरी है।

हजरतबल दरगाह में अशोक स्तंभ का चिह्न तोड़ने पर हिरासत में लिए गए 26 लोग, CM अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती ने वक्फ बोर्ड पर उठाए सवाल: BJP बोली- दोषियों पर हो सख्त कार्रवाई

जम्मू कश्मीर के श्रीनगर के हजरतबल दरगाह में अशोक स्तंभ का चिह्न तोड़े जाने की घटना के बाद पूरे देश में विवाद खड़ा हो गया है। इस मामले में पुलिस ने 26 लोगों को हिरासत में लिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, दरगाह में हाल ही में हुए सौंदर्यीकरण के दौरान एक बोर्ड लगाया गया था, जिस पर राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ का चिह्न बना था। कुछ लोगों ने इसे इस्लामी सिद्धांतों के खिलाफ बताते हुए पत्थरों से तोड़ दिया। उनका कहना था कि धार्मिक स्थल पर किसी भी तरह का प्रतीक या मूर्ति बनाना इस्लाम में मान्य नहीं है।

इस घटना के बाद बीजेपी नेताओं ने इसे राष्ट्रीय प्रतीक का अपमान बताते हुए दोषियों पर सख्त कार्रवाई की माँग की है। वहीं उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती ने वक्फ बोर्ड पर सवाल उठाया कि धार्मिक स्थल पर अशोक चिह्न क्यों लगाया गया, जबकि देशभर के किसी भी धार्मिक स्थान पर ऐसा नहीं होता।

पुलिस ने इस मामले में बीएनएस की कई धाराओं और राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम, 1971 के तहत केस दर्ज किया है। अब तक 26 लोगों को हिरासत में लिया जा चुका है और कुछ अन्य से पूछताछ जारी है।

कानून विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति राष्ट्रीय प्रतीक का अपमान करता है, तो उसे तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। वहीं अगर प्रतीक का अनुचित उपयोग या तोड़फोड़ की जाती है, तो दो साल तक की सजा और 5,000 रुपये तक का जुर्माना भी हो सकता है।

वक्फ बोर्ड की चेयरपर्सन और बीजेपी नेता दरख्शां अंद्राबी ने इसे संविधान और राष्ट्रीय प्रतीक पर हमला बताया है और इसे आतंकी मानसिकता से जोड़ते हुए केंद्र सरकार से सख्त कार्रवाई की माँग की है।

वहीं, नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी ने वक्फ बोर्ड पर बिना संवेदनशीलता के काम करने का आरोप लगाया है। फिलहाल, पुलिस जाँच कर रही है, लेकिन यह मामला सिर्फ धार्मिक भावना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान और राजनीतिक मतभेदों से भी जुड़ गया है।