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‘कूर्म पीठ’ पर बना शक्तिपीठ, कच्छप मरने से पहले लेते हैं माँ का आशीर्वाद: जानें माता त्रिपुरसुंदरी मंदिर के कछुए क्यों हैं खास, अनुष्ठानों में भी विशेष महत्व

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पुनर्निर्मित त्रिपुरसुंदरी मंदिर का उद्घाटन 22 सितंबर 2025 को किया। 51 शक्तिपीठों में शामिल देवी त्रिपुरीश्वरी का यह मंदिर अपनी दिव्यता, तांत्रिक साधना के लिए जाना जाता है। राज्य के गोमती जिले के उदयपुर शहर में यह स्थित है और कछुओं से इसका संबंध काफी दिलचस्प है।

महाराजा धन्य माणिक्य ने मंदिर की स्थापना 1501 ई. में की थी। 524 साल पुराना यह मंदिर एक छोटी पहाड़ी की चोटी पर बना है, जो कछुए की पीठ जैसी दिखती है। इसीलिए त्रिपुरसुंदरी मंदिर को कूर्म पीठ (कूर्म का अर्थ कछुआ होता है) के नाम से भी जाना जाता है।

शक्तिपीठ मंदिर के बगल में कल्याण सागर झील है। इस कृत्रिम झील में दुर्लभ बोस्तामी कछुओं का घर है। इससे झील की खूबसूरती बढ़ गई है।

बोस्तामी कछुआ विलुप्त जीव माना जाता है, लेकिन त्रिपुरसुंदरी मंदिर (जिसे उदयपुर माताबाड़ी भी कहा जाता है) के परिसर में ये आसानी से दिख जाएँगे।

ये आकार में बड़े होते हैं और अक्सर मीठे पानी की झील के किनारे तक आ जाते हैं। शक्तिपीठ में आने वाले भक्त अनुष्ठान के रूप में बोस्तामी कछुओं को ब्रेड क्रम्ब्स, बिस्कुट और मुरमुरे खिलाते हैं।

2.75 एकड़ में फैले इस झील में मछली पकड़ना और कछुओं को बाहर निकालना सख्त मना है। त्रिपुरसुंदरी मंदिर के बगल में होने की वजह से कल्याण सागर झील को भी पवित्र माना जाता है।

यह आस्था, विरासत और जैव विविधता के बीच के अनोखे संबंध को भी दर्शाता है। कल्याण सागर और बोस्तामी कछुए की परंपरा और एक-दूसरे पर निर्भरता देखने लायक है।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, रेंगने वाले जीव अपनी मृत्यु से पहले त्रिपुरसुंदरी मंदिर के चरणों में जाते हैं और देवी का आशीर्वाद लेते हैं।

बोस्तामी कछुओं की देखभाल माताबारी मंदिर समिति द्वारा की जाती है।

त्रिपुरा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (टीएसपीसीबी) ने झील के पास प्लास्टिक बैग न ले जाने को लेकर सख्त हिदायत दी है। बोर्ड समय-समय पर झील के पानी की गुणवत्ता की जाँच भी करता है।

झील में बोस्तामी कछुओं की एक अच्छी आबादी हो गई है। ये दुर्लभ सरीसृप त्रिपुरसुंदरी मंदिर के आध्यात्मिक पारिस्थितिकी तंत्र का अभिन्न अंग हैं।

हिंदू धर्म में आस्था और प्रकृति का गहरा तालमेल देखने को मिलता है। शक्तिपीठ में बोस्तामी कछुओं की मौजूदगी और लोगों की श्रद्धा अनोखे आध्यात्मिक संबंध को भी उजागर करता है।

बीजेपी के नेतृत्व वाली त्रिपुरा सरकार ने हाल के वर्षों में पवित्र कछुओं के संरक्षण के लिए काफी प्रयास किए हैं।

सरकार ने वैश्विक संरक्षण संगठन, टर्टल सर्वाइवल अलायंस के साथ मिलकर इसका वैज्ञानिक अध्ययन भी शुरू किया है।

एक साल के इस कार्यक्रम का उद्देश्य कछुओं की पूरी आबादी की गणना करना, उनके स्वास्थ्य का आकलन करना और दीर्घकालिक संरक्षण रणनीतियाँ तैयार करना है। कल्याण सागर की पवित्रता बनाए रखने के लिए श्रद्धालुओं के बीच जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं।

कहीं हाथ काटने की धमकी, कहीं ‘सर तन से जुदा’ के नारे: जानें कैसे ‘I Love Muhammad’ के नाम पर इस्लामी कट्टरपंथी मचा रहे बवाल, झूठ फैलाकर की जा रही हिंसा

I Love Muhammad से जुड़े विवाद को लेकर देशभर में जगह-जगह पर इस्लामी कट्टरपंथियों की उन्मादी भीड़ हिंसक प्रदर्शन कर रही है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और गुजरात समेत देश के कई राज्यों में इससे जुड़े प्रदर्शनों के दौरान हिंसा की गई है। इसकी शुरुआत कानपुर में दर्ज की गई एक FIR से हुई है।

अलग-अलग शहरों में पुलिस पर पथराव किए गए और जुलूस में सरेआम ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगाए जा रहे हैं। वहीं, बरेली में एक मौलाना ने इस विवाद में इंस्पेक्टर को मारने की धमकी दी है।

बरेली में ‘आई लव मोहम्मद’ लिखे पोस्टर हटाने की कार्रवाई पर पुलिस और मुस्लिम समुदाय आमने-सामने आ गए। इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल (IMC) के राष्ट्रीय महासचिव डॉ. नफीस खान ने मौके पर पहुँचकर खुलेआम इंस्पेक्टर को जान से मारने की धमकी दी। नफीस का यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, जिसमें वह ‘तेरे हाथ काट लूँगा, तेरी वर्दी उतरवा दूँगा’ कहता नजर आ रहा है।

बरेली में कैसे हुआ विवाद?

यह पूरा मामला बीते 19 सितंबर से शुरू हुआ, जब जुमे की नमाज के बाद शहर के कई इलाकों में ‘आई लव मोहम्मद’ के पोस्टर लगाए गए। ये पोस्टर दरगाह आला हजरत से जुड़े संगठन ‘जमात रजा-ए-मुस्तफा’ के पदाधिकारी मोईन खान के नेतृत्व में लगाए गए थे। पुलिस ने इसे कानून-व्यवस्था के लिहाज से संवेदनशील मानते हुए 20 सितंबर की रात किला क्षेत्र से पोस्टर हटवा दिए।

अगले ही दिन फिर वही पोस्टर लगाए जाने लगे। जब किला पुलिस रविवार को कार्रवाई करने पहुँची, तो मौके पर भारी संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोग जमा हो गए। पुलिस को घेरकर दबाव बनाने की कोशिश की गई और भीड़ ने फोन कर IMC नेता डॉ. नफीस खान को बुला लिया। मौके पर पहुँचते ही नफीस ने पुलिस टीम से अभद्रता की और इंस्पेक्टर सुभाष कुमार को सरेआम धमकी दी। यह वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ, जिसके बाद पुलिस प्रशासन हरकत में आया।

एसपी सिटी मानुष पारीक ने पुष्टि की है कि डॉ. नफीस खान के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कानून-व्यवस्था बिगाड़ने की किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी।

उत्तराखंड के काशीपुर कट्टरपंथियों ने की पत्थरबाजी

उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले के काशीपुर में ‘आई लव मोहम्मद’ जुलूस के दौरान अचानक पथराव, मारपीट और तोड़फोड़ की घटनाएँ हुईं। इस दौरान पुलिसकर्मियों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा गया, गाली-गलौज की गई और सरकारी वाहनों में तोड़फोड़ भी की गई है।

पुलिस ने इस घटना को लेकर 3 नामजद और 400-500 अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया था। इस मामले में पुलिस ने 15 आरोपितों को जेल भेज दिया है। साथ ही, जिस जगह पर हंगामा किया गया वहाँ प्रशासन ने बुलडोजर चलाकर अतिक्रमण भी हटाया है।

यूपी के उन्नाव में पथराव, कन्नौज में लगाए गए ‘सिर तन से जुदा’ के नारे

उत्तर प्रदेश के उन्नाव में कट्टरपंथियों की भीड़ ने रविवार (21 सितंबर 2025) को जमकर हंगामा किया है। बिना अनुमति के सैकड़ों की संख्या में मुस्लिमों ने जुलूस निकालना शुरू कर दिया था। इस दौरान जुलूस में ‘सर तन से जुदा’ जैसे नारे खुलेआम लगाए गए, पुलिस पर हमला और उनके साथ धक्का-मुक्की की गई।

गंगाघाट कोतवाली के प्रभारी इंस्पेक्टर अजय कुमार सिंह की वर्दी फाड़ दी गई। पुलिस ने समझाने की कोशिश की तो कट्टरपंथी भीड़ ने पुलिस पर ही पथराव करना शुरू कर दिया। उन्नाव पुलिस ने इस घटना के बाद 8 नामजद समेत 30 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की है।

इसके अलावा यूपी के कन्नौज में भी इसे लेकर भारी बवाल हुआ। कन्नौज की सफदरगंज मस्जिद में नमाज के बाद मुस्लिम युवकों ने इस घटना को लेकर जुलूस निकाला और इस जुलूस में ‘सिर तन से जुदा’ जैसे नारे लगाए गए।

गुजरात के गोधरा में कट्टरपंथियों ने थाने मे की तोड़फोड़

गुजरात के गोधरा में शुक्रवार (19 सितंबर 2025) को कट्टरपंथियों ने ‘I Love Muhammad’ के प्रदर्शन को लेकर खूब हिंसा हुई थी। सोशल मीडिया पर लगातार भड़काऊ पोस्ट डालने वाले एक इन्फ्लुएंसर को गोधरा सिटी बी डिवीजन थाने द्वारा बुलाया गया था जिसे छुड़ाने के लिए उपद्रवियों की भीड़ ने जमकर हंगामा किया।

देर रात तक यह हंगामा चलता रहा और थाने में जमकर तोड़फोड़ की गई और फर्नीचर, खिड़कियाँ और पुलिस के वाहनों को भी नुकसान पहुँचाया गया। साथ ही, भीड़ ने पुलिस कर्मियों पर पथराव भी शुरू कर दिया। पुलिस ने इसके बाद भीड़ पर लाठीचार्ज किया और पुलिस को आँसू गैस के गोले तक छोड़ने पड़े जिसके बाद ही बेकाबू भीड़ पर काबू पाया जा सका।

औवेसी और तौकीर रजा की बयानबाजी से प्रदर्शनों को मिली हवा

इस मामले को लेकर AIMIM के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और IMC के अध्यक्ष तौकीर रजा समेत कई बड़े मुस्लिम नेताओं ने भी बयानबाजी की है। असदुद्दीन ओवैसी ने X पर लिखा कि अगर I LOVE मोहम्मद लिखना जुर्म है तो वह इसकी हर साज काटने को मंजूर हैं। ओवैसी ने लिखा, “तुम पर मैं लाख जान से कुर्बान या-रसूल, बर आएँ मेरे दिल के भी अरमान या-रसूल।”

तौकीर रजा ने भी इस घटना को लेकर मुसलमानों के सड़कों पर उतरने की धमकी दी। उन्होंने कहा कि ‘I Love Muhammad’ कहना जुर्म बना दिया गया है। रजा ने कहा, “अगर मुसलमान सड़कों पर आ गया तो मुल्क में क्या हालात बनेंगे। हमें सड़कों पर आने को मजबूर ना करें।”

नेताओं की बयानबाजी के बाद प्रदर्शनों का सिलसिला और तेज हुआ और देश भर में मुसलमान सड़कों पर आ गए। कई राज्यों में हिंसक प्रदर्शनों के अलावा, अलग-अलग शहरों में जुलूस भी निकाले जा रहे हैं। इन लोगों को बताया गया है कि कानपुर में ‘I Love Muhammad’ का बैनर लगाने पर FIR दर्ज कर ली गई थी। असल में कानपुर में सिर्फ ‘I Love Muhammad’ के बैनर को लेकर FIR किया जाने का दावा पूरी तरह सही नहीं है।

कानपुर में FIR को लेकर फैलाया जा रहा ‘झूठ’

कानपुर में ‘I Love Muhammad’ के बैनर लगाने को लेकर विवाद हुआ था लेकिन पूरी कहानी इस विवाद से आगे की है। 4 सितंबर को रावतपुर थाना क्षेत्र में सजावट के लिए ‘I Love Muhammad’ का लाइट बोर्ड लगाया गया था।

स्थानीय लोगों के विरोध के बाद बोर्ड वहाँ से थोड़ी दूरी पर लगवा दिया गया। इसके बाद अगले दिन यानी 5 सितंबर को बारावफात के जुलूस के दौरान मुस्लिमों ने हिंदुओं के एक धार्मिक पोस्टर को फाड़ दिया।

FIR के मुताबिक, “जुलूस निकाले जाने पर रावतपुर गाँव में हिंदू बस्ती से जुलूस निकाल रहे मुस्लिम समुदाय के कुछ अज्ञात मुस्लिम युवकों के द्वारा रास्ते में लगे हिंदू समुदाय के धार्मिक पोस्टर को जानबूझकर जुलूस में शामिल गाड़ी…में सवार मुस्लिम युवको द्वारा डंडों की मदद से फाड़ दिया गया।”

कानपुर में FIR का मामला केवल ‘I Love Muhammad’ के बैनर से जुड़ा हुआ नहीं है। वो बस इस पूरे विवाद का एक हिस्सा है जबकि असली कहानी मुस्लिम युवकों द्वारा हिंदुओं के धार्मिक पोस्टर को मुस्लिमों द्वारा फाड़े जाने की है। इसके बाद भी एक तबके को बैनर हटाने को लेकर उकसाया जा रहा है और यह तबका सड़कों पर हंगामा कर रहा है।

बच्चों और महिलाओं के कत्लेआम पर पाकिस्तानी फौज के खिलाफ गुस्से में आवाम, सोशल मीडिया से सड़क तक लोगों का हंगामा: अंतर्राष्ट्रीय मदद की लगा रहे गुहार

पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में पाकिस्तानी फौज अपने ही मुल्क के नागरिकों पर हमला कर रहा है, जिसमें 30 लोग मारे गए। मारे गए लोगों में महिलाएँ और बच्चे भी शामिल हैं। इस बर्बर कार्रवाई के बाद पाकिस्तानी नेताओं, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और आम जनता ने सरकार और फौज के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई और सोशल मीडिया पर शवों की तस्वीर शेयर कर विरोध हो रहा है। इसके अलावा, अंतर्राष्ट्रीय मदद की गुहार भी लगाई गई है।

हमले पर पाकिस्तानी राजनेताओं और जनता का गुस्सा

पाकिस्तानी फौज के आम नागरिकों पर हमले के बाद देशभर में गुस्सा देखा जा रहा है। इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) की स्थानीय शाखा ने इसे अपने ही नागरिकों पर ‘जेट-बॉम्बिंग’ कहा है।

खैबर पख्तूनख्वा असेंबली के सदस्य अब्दुल गनी आफरीदी ने भी फौज की आलोचना की है। अब्दुल गनी ने कहा कि तिराह में बेगुनाह बच्चों, नौजवानों और औरतों को मारना मानवता के खिलाफ एक खुला अपराध है। अब्दुल गनी ने आगे कहा कि ये बच्चे आतंकवादी नहीं थे। उनके हाथों में खिलौने थे, बंदूकें नहीं।

कई लोगों ने सोशल मीडिया पर इस हमले में मारे गए मासूम बच्चों की दिल दहला देने वाली तस्वीरें साझा की हैं। रिपोर्टर फिरोज बलोच ने बच्चों की तस्वीरें पोस्ट की हैं। ये दिल दहला देने वाली हैं। खाट पर लेटे शवों पर चादरें पड़ी थीं, जिन्हें एक-एक कर हटाया गया। आसपास रोने की आवाजें थीं। लोगों की आँखों में खून उतर आया।

अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से मदद की गुहार

पाकिस्तान के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों ने अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से इस मामले में हस्तक्षेप करने की माँग की है। मानवाधिकार कार्यकर्ता जहनवाज वेशा ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से पूछा है कि क्या इन बच्चों के कोई अधिकार नहीं हैं? क्या पाकिस्तान को अपने ही नागरिकों की हत्या का लाइसेंस मिल गया है?

इमरान खान के समर्थकों ने भी इस घटना को गाजा या सीरिया से जोड़ा है। समर्थकों ने सवाल उठाया कि जब गाजा या सीरिया में बमबारी होती है, तो पूरी दुनिया हिल जाती है। लेकिन तिराह घाटी में मारे गए बच्चों के लिए कोई नहीं बोल रहा। शायद इसलिए क्योंकि ये पाकिस्तान के गरीब परिवारों से थे। न इनके पास पावर है, न प्लेटफॉर्म।

फौज और सरकार पर गंभीर आरोप

इस हमले के बाद पाकिस्तानी फौज पर अत्याचार के आरोप लग रहे हैं। पाकिस्तान की खैबर पख्तूनख्वा सरकार ने भी अपनी गलती मानी है। पुलिस अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि जेट विमानों ने चार घरों को निशाना बनाया, जो पूरी तरह से नष्ट हो गए।

इसके अलावा, बलूच जनता भी पाकिस्तानी फौज से नाराज है और उन्होंने विरोध प्रदर्शन करने की घोषणा की है। राजनेता मौलाना फजल-उर-रहमान ने भी आरोप लगाया है कि बलूचिस्तान में लोगों के गायब होने में फौज का हाथ है। इस घटना ने एक बार फिर से इस बात को साबित कर दिया है कि पाकिस्तानी फौज ‘आतंकवाद-विरोधी अभियानों’ के नाम पर अपने ही लोगों पर अत्याचार कर रही है।

योगी राज में बीमारू से ‘बेस्ट’ बना उत्तर प्रदेश, 2023 में ₹37000 करोड़ के रेवेन्यू सरप्लस के साथ रहा नंबर वन: CAG की रिपोर्ट में खुलासा, केंद्र ने बंगाल-केरल को दिया सबसे ज्यादा अनुदान

उत्तर प्रदेश देश में सबसे ज्यादा कमाई करने वाला राज्य बन गया है। ₹37,000 करोड़ के रेवेन्यू सरप्लस के साथ इसने देश के सभी राज्यों को पीछे छोड़ दिया है। ये तब हुआ है, जब यहाँ पेट्रोलियम पर सबसे कम टैक्स लिया जाता है। एक वक्त था जब उत्तर प्रदेश बीमारू राज्यों में गिना जाता था। लेकिन अब देश का सबसे ‘उत्तम प्रदेश’ बन गया है।

सबसे ज्यादा रेवेन्यू सरप्लस वाला राज्य बना उत्तर प्रदेश

नियंत्रक महालेखा परीक्षक यानी सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक, 2022-23 के दौरान देश के 16 राज्यों में रेवेन्यू सरप्लस थे, जिसमें उत्तर प्रदेश 37,263 करोड़ रुपए के साथ सबसे ऊपर था, उसके बाद गुजरात और ओडिशा का स्थान आता है।

15वें वित्त आयोग ने राज्यों के लिए राजकोषीय उत्तरदायित्व निर्धारित किए थे। इसमें राज्यों को 2022-23 के दौरान राजस्व घाटा खत्म करने और राजस्व सरप्लस पर जोर दिया गया था उत्तर प्रदेश ने योगी सरकार के दौरान राजस्व संग्रह सिस्टम और प्रबंधन के क्षेत्र में काफी सुधार किए हैं। इससे राज्य की अर्थव्यवस्था मजबूत हुई है।

सीएजी के मुताबिक, “31 मार्च 2023 तक, कुल 28 राज्यों में से 16 राज्य राजस्व अधिशेष में थे और 12 राजस्व घाटे में थे।”

जिन 16 राज्यों की राजस्व अधिशेष उनके राजस्व व्यय से ज्यादा थे, उनमें उत्तर प्रदेश के बाद गुजरात का नंबर आता है, जहाँ 19,865 करोड़ रुपए के राजस्व अधिशेष रहा। इसके बाद ओडिशा (19,456 करोड़ रुपये), झारखंड (13,564 करोड़ रुपये), कर्नाटक (13,496 करोड़ रुपये), छत्तीसगढ़ (8,592 करोड़ रुपये), तेलंगाना (5,944 करोड़ रुपये), उत्तराखंड (5,310 करोड़ रुपये), मध्य प्रदेश (4,091 करोड़ रुपये) और गोवा (2,399 करोड़ रुपये) का स्थान है। पूर्वोत्तर राज्यों में अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, त्रिपुरा, सिक्किम और मणिपुर भी राजस्व अधिशेष वाले राज्य है।

घाटे वाले 12 राज्यों का संयुक्त राजस्व घाटा 2,22,648 करोड़ रुपए था। 2022-23 में राज्यों के राजस्व घाटे को पाटने के लिए वित्त आयोग ने 86,201 करोड़ रुपए का अनुदान दिया, जो कुल राजस्व घाटे का 39 % था। सीएजी रिपोर्ट में कहा गया है कि 12 राज्य ऐसे थे जिनका राजस्व व्यय उन्हें मिलने वाले राजस्व से अधिक था।

राजस्व घाटे वाले राज्य आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, केरल, महाराष्ट्र, मेघालय, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल थे। बिहार, केरल, मेघालय और महाराष्ट्र में राजस्व की प्राप्ति राजस्व व्यय का 90-100 फीसदी रहा। यानी राजस्व घाटा 0-10 फीसदी तक रहा।

12 राज्यों को अभी भी हो रहा घाटा

असम, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में राजस्व प्राप्तियाँ राजस्व व्यय का 80-90 प्रतिशत थीं। यानी राजस्व घाटा 10-20 फीसदी रहा। रिपोर्ट में कहा गया है कि आंध्र प्रदेश और पंजाब ऐसे राज्य रहे, जहाँ राजस्व की प्राप्ति राजस्व व्यय का 75-80 प्रतिशत थीं। राजस्व घाटा 20-25 फीसदी था

रिपोर्ट के अनुसार, 2022-23 में राजस्व घाटा अनुदान राज्यों को दिए गए कुल वित्त आयोग अनुदान का 50 प्रतिशत था।

अनुदान पाने वाले राज्यों में बंगाल अव्वल

राजस्व घाटा अनुदान का सबसे बड़ा हिस्सा पश्चिम बंगाल को मिला। उसे कुल अनुदान का 15.76 फीसदी दिया गया, ताकि वह अपने राजस्व घाटे को पाट सके। दूसरे नंबर पर केरल है, जिसे कुल अनुदान का 15.28 प्रतिशत मिला। इसके बाद आंध्र प्रदेश (12.24 प्रतिशत), हिमाचल प्रदेश (10.88 प्रतिशत), पंजाब (9.60 प्रतिशत), उत्तराखंड (8.28 प्रतिशत), असम (5.67 प्रतिशत), राजस्थान (5.64 प्रतिशत), नागालैंड (5.26 प्रतिशत) और त्रिपुरा (5.13 प्रतिशत) का स्थान आता है।

बंगाल- केरल समेत 10 राज्यों को वित्त आयोग राजस्व घाटा अनुदान का लगभग 94 प्रतिशत दिया गया।

हरियाणा के टैक्स सिस्टम में जबरदस्त सुधार

सीएजी की रिपोर्ट में कुछ ऐसे राज्य भी चर्चा की गई है जिसने अपने टैक्स सिस्टम को मजबूत किया है। इससे उनकी अर्थव्यवस्था पहले से मजबूत हुई है। इसमें पहले नंबर पर हरियाणा है, जो कुल आय का 80 फीसदी हिस्सा खुद कमाता है। दूसरे नंबर पर तेलंगाना है और फिर महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु और गोवा का नंबर आता है।

H1-B वीजा फीस और टैरिफ चुनौतियों के बीच एस जयशंकर और मार्को रूबियो की मुलाकात, अमेरिकी विदेश मंत्री बोले- ‘भारत बेहद अहम’

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कुछ दिन पहले ही H1-B वीजा की फीस ₹88 लाख कर दी थी। इसके बाद, न्यूयॉर्क में सोमवार (22 सितंबर 2025) को अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो और भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर के बीच एक अहम मुलाकात हुई। मुलाकात में मार्को रूबियों ने ‘अमेरिका के लिए भारत को काफी अहम’ बताया है।

मुलाकात के दौरान विभिन्न मुद्दों पर चर्चा

मार्को रूबियो ने कहा कि भारत अमेरिका के लिए ‘बेहद महत्वपूर्ण’ देश है। मार्को रूबियो ने भारत की व्यापार, रक्षा, ऊर्जा, फार्मास्यूटिकल्स और महत्वपूर्ण खनिजों में भागीदारी की सराहना की। मार्को रूबियों ने यह भी कहा कि दोनों देशों को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक स्वतंत्र और खुले वातावरण को बढ़ावा देने के लिए मिलकर काम करना चाहिए, विशेष रूप से क्वाड के माध्यम से।

रूबियो और जयशंकर पहले भी मिल चुके हैं। जुलाई 2025 में वे ‘क्वाड’ (QUAD) की बैठक में मिले थे। क्वाड में अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। इस समूह का मकसद हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकना है। दोनों नेताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि क्वाड के माध्यम से स्वतंत्र और खुले हिंद-प्रशांत क्षेत्र को बढ़ावा देना जरूरी है।

एस जयशंकर ने भी इस मुलाकात को महत्वपूर्ण बताया और कहा कि कई द्विपक्षीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा की गई। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि प्राथमिक मुद्दों पर प्रगति के लिए निरंतर सहयोग की आवश्यकता है।

वीजा फीस का भारत पर असर

बता दें, कि भारत H-1B वीजा का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करने वाला देश है। पिछले साल, अमेरिका ने जितने भी H-1B वीजा दिए, उनमें से 71% भारतीयों को मिले थे। डोनाल्ड ट्रंप के वीजा फीस बढ़ोतरी के बाद नए शुल्क से भारतीय आईटी कंपनियों की लागत में तेजी से बढ़ोतरी होगी। इससे छोटे-छोटे बिजनेस और स्टार्टअप को भी मुश्किलें आ सकती हैं। भारत सरकार और तकनीकी कंपनियाँ इस फैसले पर अपनी नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि यह भारतीय पेशेवरों के अमेरिका जाने के रास्ते को कठिन बना सकता है।

भारत और अमेरिका के रिश्ते पहले से अधिक जटिल हो चुके हैं, लेकिन इन व्यापारिक और वीजा विवादों के बावजूद दोनों देश सहयोग को बनाए रखने के लिए प्रयासरत हैं। दोनों पक्षों ने यह संदेश दिया है कि चाहे चुनौतियाँ बढ़ें, वे संवाद और सहयोग को जारी रखेंगे।

विश्व गैंडा दिवस 2025: वन्यजीव संरक्षण की अद्भुत सफलता का पैमाना बना असम का काजीरंगा नेशनल पार्क, यहाँ दुनिया के 70% एक सींग वाले गैंडों का बसेरा

हर साल 22 सितंबर को विश्व गैंडा दिवस (World Rhino Day) मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य लोगों को इस बात के लिए जागरूक करना है कि धरती के सबसे प्राचीन और प्रतीकात्मक जीवों में से एक गैंडे का संरक्षण कितना जरूरी है।

यह दिवस इस बात पर भी जोर देता है कि गैंडे की आबादी को बचाए रखना पर्यावरणीय संतुलन, सांस्कृतिक धरोहर और जंगलों के संरक्षण के लिए अत्यंत आवश्यक है। यह पूरी दुनिया से गैंडे की रक्षा की मुहिम में हाथ मिलाने की अपील है।

विश्व गैंडा दिवस की शुरुआत 2010 में हुई, जब डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-साउथ अफ्रीका (WWF-South Africa) ने इसे एक एक्शन डे के रूप में घोषित किया। इसके अगले ही साल 2011 में इसे वैश्विक पहचान मिली। इसका श्रेय वन्यजीव संरक्षण कार्यकर्ताओं लिसा जेन कैंपबेल और रिश्जा को जाता है, जिन्होंने इसे पूरी दुनिया तक पहुँचाने में अहम भूमिका निभाई।

ब्लैक, व्हाइट, ग्रेटर वन-हॉर्न्ड (भारतीय), जावन और सुमात्रन ये गैंडे की आखिरी बची हुई पाँच प्रजातियाँ हैं। लेकिन चिंता की बात यह है कि ये सभी विलुप्ति के कगार पर हैं। इनके सामने सबसे बड़ी चुनौतियाँ हैं, सींगों के लिए शिकार (Poaching), गैरकानूनी वन्यजीव व्यापार और वनों की कटाई व मानव बस्तियों के फैलाव से आवास का नष्ट होना।

विश्व में गैंडों की पांच प्रजातियां (फोटो साभार : बेबी राइनो रेस्क्यू)

विश्व गैंडा दिवस मनाकर दुनिया इन खतरों पर रोशनी डालती है और ठोस कदम उठाने की अपील करती है, चाहे वह शिकार पर रोक अभियान हों, आवास संरक्षण हो या फिर कड़े कानूनों का सख्ती से पालन।

इन्हीं अंतरराष्ट्रीय कहानियों के बीच भारत की धरती पर एक अलग ही अध्याय लिखा गया है। वो अध्याय है काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान का, जहाँ गैंडों ने वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में सबसे उल्लेखनीय वापसी (Turnaround) की मिसाल पेश की है।

काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान: 12 गैंडों से बढ़कर 3,000 से अधिक

20वीं सदी की शुरुआत में असम के काजीरंगा की स्थिति बेहद चिंताजनक थी। 1908 में यहाँ ग्रेटर वन-हॉर्न्ड (एक सींग वाले) गैंडों की संख्या घटकर सिर्फ 12 रह गई थी। सदियों से चले आ रहे मनोरंजन के लिए शिकार, अवैध शिकार (Poaching) और आवास के विनाश ने इस प्रजाति को विलुप्ति की कगार पर पहुँचा दिया था।

(फोटो साभार – काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान)

खतरा इतना गंभीर था कि 1986 में भारतीय गैंडों को संकटग्रस्त (Endangered) घोषित कर दिया गया। उनका विशिष्ट एकल सींग, जिसे काले बाजार में स्टेटस सिंबल माना जाता था और उनका प्रागैतिहासिक रूप हमेशा उन्हें खतरे में डालता रहा।

रिपोर्टों के अनुसार, औपनिवेशिक काल में खासकर 1800 के आकीर समय में और 1900 के शुरुआती दशकों में असम में ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों ने मनोरंजन के लिए 200 से अधिक गैंडों का शिकार किया।

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने भी काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान की सफलता की कहानी पर प्रकाश डाला। उन्होंने अपने एक्स अकाउंट पर एक पोस्ट साझा करते हुए बताया कि असम में गैंडों की संख्या 600 से बढ़कर 4,000 से अधिक हो चुकी है।

उन्होंने कहा “#WorldRhinoDay पर हम गैंडे के संरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हैं। ऑप फाल्कन (Op Falcon), आवास विस्तार और उन्नत मॉनिटरिंग जैसी पहलों के जरिए असम ने गैंडे की आबादी 600 से बढ़ाकर 4,000 से अधिक की है और हम इस दिशा में और आगे बढ़ने के लिए संकल्पित हैं।”

यह परिवर्तन विश्व के सबसे बड़े वन्यजीव संरक्षण सफलताओं में से एक माना जाता है। काजीरंगा में गैंडे अब विलुप्ति के कगार पर नहीं हैं, बल्कि पूरी तरह फल-फूल रहे हैं। असम आज इस प्रजाति के लिए वैश्विक मजबूत केंद्र (Global Stronghold) बन चुका है।

वैश्विक स्तर पर गैंडे के शिकार (poaching) के खिलाफ एक भावनात्मक और प्रभावशाली संदेश देने के लिए असम सरकार ने 2022 में ‘दहा संस्कार’ यानी मृत गैंडों का पूर्ण हिंदू रीति-रिवाजों और परंपराओं के अनुसार अंतिम संस्कार किया।

यह संदेश देने के लिए कि गैंडे असम में परिवार के समान हैं, सरकार ने दशकों से जब्त किए गए 2479 गैंडे के सींगों का दाह संस्कार भी किया, जो शिकार मामलों की कानूनी कार्रवाई के दौरान संग्रहित थे। इस संस्कार का उद्देश्य यह स्पष्ट करना था कि गैंडे के सींगों का कोई औषधीय मूल्य नहीं है, बल्कि ये असम के बच्चों के अवशेष हैं, जिनका जीवन शिकारियों के कारण समय से पहले समाप्त हो गया।

गैंडे लगभग विलुप्त क्यों हो गए?

असम में गैंडों की आबादी में गिरावट का मुख्य कारण मनोरंजन के लिए शिकार (Sport Hunting) था। राजघरानों और ब्रिटिश अधिकारियों ने गैंडों का निरंतर शिकार किया और उन्हें अपने ट्रॉफी के रूप में रखा। 1908 तक काजीरंगा में केवल कुछ ही गैंडे बचे थे।

साथ ही सींगों के लिए शिकार (Rhino Horn Poaching) भी एक लगातार बनी रहने वाली समस्या रही है। 20वीं सदी की शुरुआत में भी शिकारियों ने गैंडों को मारने के विभिन्न तरीके ढूँढ निकाले, ताकि उनके सींगों को काले बाजार में बेचा जा सके, यह झूठा माहौल बनाते हुए कि उनके औषधीय या सजावटी मूल्य हैं।

ग्राफ – PIB

1980 से 1993 के बीच भारत में अकेले 692 गैंडे शिकारियों का शिकार बने। हालाँकि हाल के वर्षों में कड़े कानून लागू होने के बावजूद शिकार की घटनाएँ लगातार सामने आती रही हैं। 2008 से 2019 के बीच भारत में 102 गैंडे शिकार किए गए, जिनमें अधिकांश असम में थे।

आवास का नाश (Habitat Loss) भी एक बड़ी समस्या थी। जैसे-जैसे मानव आबादी बढ़ी, गैंडों द्वारा उपयोग किए जाने वाले घास के मैदान कम होने लगे। गैंडों को भोजन की तलाश में गाँवों में आना पड़ता, जिससे ग्रामीणों के साथ संघर्ष होता और कई गैंडों की मौत हो गई।

जनसंख्या घनत्व (Population Density) भी समस्या बन गया। जैसे ही काजीरंगा और पोबितोरा वाइल्डलाइफ सेंचुरी जैसी छोटी जगहों में गैंडों की संख्या बढ़ी, संसाधनों की कमी और प्रजनन अनुपात पर असर पड़ा। यही कारण था कि बाद में संरक्षण कार्यकर्ताओं ने गैंडों को अन्य उद्यानों में स्थानांतरित किया, ताकि उन्हें अधिक विशाल और सुरक्षित आवास मिल सके।

भारत ने विश्व स्तर पर कैसे एक उदाहरण स्थापित किया

अब भारत को गैंडों के संरक्षण की दुनिया की सबसे सफल कहानी के रूप में वैश्विक स्तर पर सराहा जाता है, लेकिन यह सफलता एक दिन में हासिल नहीं हुई। इसके पीछे कानूनों का निर्माण, उनका सख्ती से पालन, लोगों की सक्रिय भागीदारी और वैश्विक सहयोग जैसी मुख्य कोशिशें रही हैं, जिन्होंने गैंडों के संरक्षण में मूलभूत बदलाव लाए हैं।

असम फॉरेस्ट प्रोटेक्शन एक्ट 1891 और बंगाल राइनोप्रेसर्वेशन एक्ट 1932 गैंडों के संरक्षण के लिए पहली कानूनी पहल थीं। ये प्रारंभिक नियम गैंडों के औपचारिक संरक्षण की शुरुआत थे। इन कानूनों ने विभिन्न वन संबंधी अपराधों को परिभाषित किया, जैसे वन में अवैध प्रवेश, आग लगाना या वनस्पति का विनाश और इनके लिए सजा का प्रावधान किया गया। सबसे महत्वपूर्ण यह था कि इन कानूनों ने गैंडों को मारने, घायल करने या पकड़ने पर रोक लगा दी, सिवाय आत्मरक्षा या विशेष अनुमति के मामलों को छोड़कर।

गैंडे को बचाने के लिए सरकार के प्रयास (फोटो -पीआईबी)

वाइल्डलाइफ (प्रोटेक्शन) एक्ट 1972 सबसे प्रभावशाली कानून साबित हुआ, जिसने शिकार (Poaching) के खिलाफ एक मजबूत कानूनी ढाँचा दिया। असम में 2009 में इस कानून में संशोधन किया गया, जिससे यह और भी सख्त हो गया और बार-बार अपराध करने वालों के लिए आजीवन कारावास का प्रावधान रखा गया। इन कानूनों ने स्पष्ट संदेश दिया कि गैंडे के शिकार को अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

लेकिन केवल कानून ही पर्याप्त नहीं थे। असम सरकार को स्थानीय समुदायों के साथ भी मिलकर काम करना पड़ा, जो गैंडों के आवास के पास रहते हैं। सालों से जागरूकता अभियान और पर्यटन से मिलने वाले लाभों ने स्थानीय समर्थन बनाने में मदद की। लोग अब गैंडों को संकट या खतरे के रूप में नहीं, बल्कि गौरव और आजीविका का प्रतीक मानने लगे।

भारतीय राइनो विजन 2020: एक महत्वपूर्ण मोड़

यह पहल 2005 में शुरू की गई थी और इसका उद्देश्य एक सींग वाले गैंडों के दीर्घकालिक संरक्षण को सुनिश्चित करना था। इस परियोजना को असम सरकार, बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल, इंटरनेशनल राइनो फाउंडेशन (IRF), वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर (WWF) और यूएस फिश & वाइल्डलाइफ सर्विस ने मिलकर चलाया।

इस योजना का लक्ष्य था कि भारत में गैंडों की आबादी को दोगुना करके 2020 तक 3,000 पहुँचाया जाए और उन्हें असम के सात अभयारण्यों (Sanctuaries) में भेजा जाए। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि गैंडों की संख्या किसी एक उद्यान में अत्यधिक न हो, बल्कि उन्हें मानस नेशनल पार्क, लाओखोवा-बुराचापोरी-कोचमोरी और डिब्रू-सैखोवा जैसे अन्य संरक्षित उद्यानों में फैलाया जाए, ताकि वे सुरक्षित वातावरण में प्रजनन कर सकें।

2008 से 2012 के बीच, काजीरंगा और पोबितोरा से 18 गैंडों को मानस नेशनल पार्क में स्थानांतरित किया गया और बाद में 8 और गैंडों को वहाँ ले जाया गया। यह प्रयास सफल रहा क्योंकि इसके बाद मानस में नए बच्चों का जन्म हुआ। यह केवल स्थानांतरण अभियान नहीं था। इसमें गश्त के रास्ते, प्रहरी चौकियाँ और मॉनिटरिंग सिस्टम भी बनाए गए, ताकि शिकार पर नियंत्रण रखा जा सके।

राष्ट्रीय गैंडा संरक्षण रणनीति और आईआरवी 2.0

भारत ने IRV 2020 की सफलता के बाद नेशनल राइनो कंसर्वेशन स्ट्रैटेजी शुरू किया, जो भारत के संकटग्रस्त ग्रेटर वन-हॉर्न्ड गैंडों के संरक्षण के लिए एक व्यापक नीति है। इसके प्रमुख कार्यक्रमों में भारत के सभी गैंडों के लिए डीएनए प्रोफाइल विकसित करना शामिल है, ताकि उन्हें प्रभावी ढंग से सुरक्षा और निगरानी प्रदान की जा सके।

Indian Rhino Vision 2020 जैसी संरक्षण अभियानों की सफलता के बाद यह नीति भविष्य-केंद्रित ढांचा पेश करती है, जो लंबे समय तक इस प्रजाति के अस्तित्व को सुनिश्चित करने में मदद करेगी। यह भारत की गैंडों के संरक्षण के लिए पहली स्वतंत्र और समग्र नीति है। यह अभूतपूर्व पहल भारत के वन्यजीव संरक्षण प्रयासों में एक बड़ा कदम है, जो देश की सबसे प्रतीकात्मक प्रजातियों में से एक को संरक्षित करने के लिए एक केंद्रित और एकीकृत रणनीति पेश करती है।

अब यह अभियान दूसरे चरण में प्रवेश कर चुका है, जिसे Indian Rhino Vision 2.0 कहा जाता है। इसका लक्ष्य है कि 2030 तक असम में कम से कम तीन मेटा-आबादी में 4,500–5,000 ग्रेटर वन-हॉर्न्ड गैंडों की संख्या सुरक्षित और बनाए रखी जाए।

IRV 2.0 में आवास सुधार (Habitat Enhancement), गैंडे के विस्तार क्षेत्र (Rhino Range Extension), समुदाय की भागीदारी, अपराध निगरानी और सक्रिय संरक्षण कार्रवाई पर विशेष ध्यान दिया गया है।

काजीरंगा: संरक्षण के लिए एक वैश्विक मॉडल

आज काजीरंगा की प्रतिष्ठा पूरी दुनिया में है। यह वास्तव में वैश्विक गैंडे संरक्षण परियोजना की रीढ़ है, जहाँ विश्व के लगभग 70% ग्रेटर वन-हॉर्न्ड गैंडों का आवास है। केवल 2022 की जनगणना में ही 2,613 गैंडों की संख्या दर्ज की गई।

यह उद्यान यह भी दिखाता है कि लगातार प्रयास और दृढ़ता से संरक्षण से क्या हासिल किया जा सकता है। 1908 में केवल 12 गैंडों के साथ शुरू होकर, काजीरंगा ने अब 3,000+ गैंडों की संख्या पार कर ली है, और यह विश्व स्तर पर वन्यजीव संरक्षण की सबसे सफल पुनरुद्धार कहानियों में से एक बन चुका है।

असम में गैंडों की जनसंख्या में वृद्धि 1966-2022 (वास्तविक जनगणना रिकॉर्ड के आधार पर) (ग्राफ़ पीआईबी द्वारा)

गैंडों की आबादी बढ़ाने के लिए इतनी सारी पहलों के बावजूद, वे शिकार  के खतरे से पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। पिछले दस सालों में लगभग 10,000 गैंडों का शिकार उनके सींगों की माँग को पूरा करने के लिए किया गया, जिन्हें परंपरागत औषधि और स्टेटस सिंबल के रूप में, विशेषकर चीन और वियतनाम में, उच्च मूल्य दिया जाता है। संयुक्त राष्ट्र के ड्रग्स एंड क्राइम कार्यालय (UNODC) के अनुसार, गैंडे से बने उत्पाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तस्करी किए जाने वाले अवैध वन्यजीव सामान का 29% हिस्सा हैं।

इसी कारण विश्व गैंडा दिवस (World Rhino Day) का महत्व है। यह याद दिलाता है कि संरक्षण कभी पूर्ण नहीं होता। गैंडे केवल जीव-जंतु नहीं हैं, बल्कि भारत की पारिस्थितिकी और सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा हैं। इन्हें संरक्षित करना प्रकृति के संतुलन को बनाए रखना है।

भारत में एक सींग वाले गैंडों के संरक्षण की कहानी 1900 के दशक की शुरुआत में विलुप्ति के कगार पर पहुँचने से लेकर आज 4,000 से अधिक समृद्ध आबादी तक पहुँचने तक एक चमत्कार से कम नहीं है। इस कहानी के केंद्र में काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान है, जो अब दुनिया का सबसे मजबूत गैंडों का किला बन चुका है। काजीरंगा विश्व प्रसिद्ध वन्यजीव पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हुआ है, जो घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों प्रकार के पर्यटकों को आकर्षित करता है और गैंडे संरक्षण के प्रति जागरूकता और समर्थन को और बढ़ावा देता है।


(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में शृति सागर ने लिखी है। इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)

नहीं ‘पाप’ का भागी केवल व्याध (कॉन्ग्रेस+सुप्रीम कोर्ट), सुषुप्त हिंदुओं का भी समय लिखेगा ‘अपराध’

वह मुस्लिम है। पर मस्जिद में नमाज नहीं पढ़ सकती। क्योंकि वह मुस्लिम होने के साथ-साथ औरत भी है। कुछेक मस्जिदों में उसे नमाज पढ़ने का हक मिला भी है तो शर्तों के साथ। मसलन, पर्दे में रहना, सुगंध न लगाना, अलग कमरा… वगैरह वगैरह। लेकिन एक गैर हिंदू (मुस्लिम महिला) आपके मंदिर में प्रवेश कर नवरात्र के आपके आगमिक अनुष्ठानों का प्रारंभ कर सकती है। क्योंकि कॉन्ग्रेस और इस देश की अदालतें ऐसा चाहती हैं। क्योंकि इस देश का हिंदू सुषुप्त है।

सोमवार (22 सितंबर 2025) को कलश स्थापना के साथ हिंदुओं की आस्था के महत्वपूर्ण पर्व नवरात्रि का प्रारंभ हुआ। लेकिन इसी दिन कॉन्ग्रेस शासित कर्नाटक से एक ऐसा वीडियो आया है जो हिंदुओं की आस्था पर सीधा प्रहार है। बानू मुश्ताक ने चामुंडेश्वरी मंदिर में प्रवेश कर मैसूर के विश्व प्रसिद्ध दशहरा महोत्सव का प्रारंभ किया है।

ऐसा नहीं है कि लेखिका बानू मुश्ताक की हिंदुत्व में आस्था है। उनकी देवी पूजा में आस्था है। जैसा कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य प्रियांक कानूनगो ने इस घटना को लेकर टिप्पणी करते हुए कहा भी है, “कन्नड़ भाषा को देवी के रूप में पूजने पर स्वयं के मुस्लिम होने के नाते मजहबी ऐतराज जताने वाली लेखिका मुश्ताक बानो को कर्नाटक सरकार ने मैसूर दशहरा समारोह का अतिथि बना कर आमंत्रित किया है।”

बानू मुश्ताक इतने अव्वल दर्जे की सेकुलर हैं कि इस्लाम में औरतों की स्थिति पर वह केवल चुप्पी ही नहीं ओढ़ती हैं, बल्कि वह प्रयास करती हैं कि औरतों के साथ भेदभाव का ठीकरा भी सनातन की कथित परंपराओं पर फोड़ा जा सके। ऐसे में सीधा सवाल यह है कि जिसकी सनातन में कोई आस्था नहीं है, उसे माँ चामुंडेश्वरी के अनुष्ठान में शामिल क्यों किया गया? वैदिक मंत्रोच्चार के बीच माँ की पवित्र मूर्ति पर पुष्प अर्पित करने की अनुमति कैसे दी गई?

चामुंडी पहाड़ियों पर स्थित इस मंदिर में विराजमान माँ चामुंडेश्वरी, मैसूर राजघराने की अधिष्ठात्री देवी हैं। भले कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार मैसूर के दशहरा महोत्सव को ‘राजकीय यानी सरकारी’ कार्यक्रम बताए। भले हिंदुओं की याचिका खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट भी इसे ‘सरकारी कार्यक्रम’ कह दे। पर सच्चाई यह है कि यह​ सदियों से चला आ रहा एक आगमिक अनुष्ठान है।

हमारे मंदिर, हमारे अनुष्ठान, हमारी परम्पराएँ किसी व्यक्ति या सरकार की बपौती नहीं हैं। सरकारी कार्यक्रम बताकर हमारी आस्थाओं से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता है। इनकी व्याख्या कोई अपनी सहूलियत के हिसाब से नहीं कर सकता। बावजूद एक विधर्मी महिला ने हमारे मंदिर में प्रवेश किया, हमारे अनुष्ठान की पवित्रता और गरिमा को भंग किया।

क्या इसकी दोषी केवल कॉन्ग्रेस है? यकीनन नहीं। अतीत में ऐसे सैकड़ों उदाहरण भरे पड़े हैं जब हिंदुओं की आस्थाओं पर प्रहार कर कॉन्ग्रेस ने मुस्लिम तुष्टिकरण किया है। फिर क्या इसकी दोषी कर्नाटक की वह जनता नहीं, जिसने कॉन्ग्रेस को अपनी आस्था पर प्रहार का यह मौका प्रदान किया है?

क्या हम इस मामले में अदालतों के भरोसे रहे सकते हैं? यकीनन नहीं। बानू मुश्ताक को आमंत्रित करने के कर्नाटक सरकार के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। उसने याचिका खारिज कर दी। फिर हिंदू सुप्रीम कोर्ट गए। परिणाम नहीं बदला। वैसे भी जिस देश का मुख्य न्यायाधीश एक याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी करे कि ‘अपने भगवान से कहो कि वे भी अपने लिए कुछ करें’, उस देश की न्यायपालिका से उम्मीद करना अपने कर्तव्यों से भागने जैसा है।

इस क्षण के लिए दोषी माँ चामुंडेश्वरी मंदिर के वे पुजारी भी हैं, जिन्होंने बानू मुश्ताक के हाथों में पूजा की थाली थमाई। पवित्र मूर्ति पर चढ़ाने के लिए उन्हें पुष्प भेंट किया। उन्हें आरती दी। दोषी मैसूर के वे हिंदू भी हैं जिन्होंने इस क्षण को आने से रोकने के लिए विरोध के अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल नहीं किया। इस क्षण के लिए हर एक हिंदू दोषी है। इस पाप का पाश्ताचाप उन्हें ही करना होगा। कॉन्ग्रेस या न्यायापालिका को कोस कर हम अपने कर्तव्यों से भाग नहीं सकते।

AXIS बैंक के विज्ञापन में नवरात्रि की धूम के बीच अचानक टपके सांता क्लॉज, फिर वही ‘सेक्युलरिज्म’ का पाठ: हिंदू त्योहारों के ‘ईसाई करण’ पर भड़के लोग

हिंदू त्योहार दीवाली के मौके पर एक्सिस बैंक (Axis Bank) ने अपना नया विज्ञापन कैंपेन ‘दिल से ओपन सेलिब्रेशन 2025’ लॉन्च किया है। हैरानी की बात यह है कि इस विज्ञापन में दीवाली की रोशनी और नवरात्रि की धूम के बीच अचानक सांता क्लॉज टपक पड़ते हैं।

जाहिर है, यह वही सांता है जो आमतौर पर क्रिसमस का प्रतीक है। इन्हीं सांता को हिंदू त्योहारों के बीच लाकर यह संदेश देने की कोशिश की गई कि त्यौहार सबका है और उत्सव धर्म की सीमाओं से परे होना चाहिए। यानि वही हिंद त्योहारों पर सेक्युलरिज्म का भाषण।

इस विज्ञापन की वीडियो में दिखाया गया कि नवरात्रि के अवसर पर ‘गरबा डांस’ चल रहा होता है तभी अचानक सांता क्लॉज की एंट्री हो जाती है। इस विज्ञापन से एक्सिस बैंक ने अपने ऑफर्स प्रोमोट करने की कोशिश की है, जो नवरात्रि से लेकर दीवाली और फिर क्रिसमस तक चलेंगे।

सोशल मीडिया पर एक्सिस बैंक के ‘ईसाई करण’ का विरोध

एक्सिस बैंक के इस विज्ञापन को लेकर सोशल मीडिया में बवाल मचा हुआ है। एक्सिस बैंक पर ईसाई करण को लेकर विरोध हो रहा है। नेटिजन्स एक्सिस बैंक से विज्ञापन हटाने की माँग कर रहे हैं। ट्विटर/एक्स पर बैंक को बॉयकाट करने का हैशटैग ट्रेंड भी चल रहा है।

एक्सिस बैंक के विज्ञापन पर एक्स यूजर The Jaipur Dialogues ने लिखा, “एक्सिस बैंक सांता क्लॉज के साथ नवरात्रि मना रहा है। यह हिंदू त्योहार को नीचा दिखाने की चरम सीमा है। एक्सिस बैंक इस विज्ञान को तुरंत वापस ले वरना बहिष्कार का सामना करे। एक्सिस बैंक को सबक सिखाना जरूरी है।”

एक्स पर Treeni ने लिखा, “नवरात्रि का ईसाई करण? एक्सिस बैंक नवरात्रि के दौरान सांता क्लॉज को उपहार बाँटते हुए दिखाकर हिंदू धर्म का मजाक उड़ा रहा है और आने वाले सभी हिंदू त्योहारों में भी ऐसा ही करने की योजना बना रहा है!”

एक्स यूजर अभय प्रताप सिंह ने लिखा, “Axis Bank ने किया नवरात्रि का ईसाई करण आख़िर हिंदू त्योहारों के साथ ही ऐसा खिलवाड़ क्यों होता है? क्या ईद के एड में सेंटा क्लॉज केपी दिखा सकते हैं? क्या क्रिसमस के एड में इस्लामिक प्रतीकों को दिखा सकते हैं? फिर नवरात्रि के एड में सेंटा क्लॉज क्यों?”

अदवाएता नाम की एक्स यूजर ने लिखा, “मैं अपनी बीमा योजना की जाँच करवाती हूँ, तुम्हारी बेवकूफी के चलते अपना खाता बंद करवाऊँगी। पागल आदमी.. इस bugger का हमारे नवरात्रि से क्या संबंध है??”

रितु प्रिया नाम की एक्स यूजर ने लिखा, “ये क्या मजाक है?? थोड़ा दिन में रहना सीखो, हमारे पर्व त्यौहार पर अपनी रोटी सेंकने की कोशिश न करें।”

वैशाली मिश्रा नाम की एक्स यूजर ने सवाल किया, “ईद हो या कोई अन्य मुस्लिम पर्व आप ऐसा ऐड बना सकते हैं।”

सौरव सिंह नाम के एक्स यूजर ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) और प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) को टैग करते हुए एक्सिस बैंक पर कार्रवाई की माँग की। यूजर ने लिखा, “@RBI @PMOIndia कृपया कार्रवाई करें। हिंदुओं की भावनाएँ भी मायने रखती हैं।”

एक्स यूजर पारीतोष व्यास ने लिखा, “इस विज्ञापन में आप क्या बकवास दिखा रहे हैं? यह विचार किस विज्ञापन एजेंसी के दिमाग में आया है? एक्सिस बैंक हिंदुओं को क्या बताना चाह रहा है? भारतीय त्योहारों को बेचने का एक बहुत ही घटिया तरीका। कृपया इस विज्ञापन को कूड़ेदान में फेंक दो। बेवकूफ लोग।”

एक यूजर ने लिखा, “गरबा हिंदू धर्म की परंपरा है जो देवी पूजन से संबंधित है कोई साधारण नाच नहीं है फिर इसमें सांता क्लॉज का क्या काम? क्या एक्सिस बैंक ऐसा मजाक अन्य धर्मों के साथ कर सकता है?”

हिंदू त्योहारों को निशाना बनाकर ‘सेक्युलरिज्म’ का पाठ

एक्सिस बैंक ने हिंदू त्योहारों पर सेक्युलरिज्म का वही पुराना पाठ पढ़ाने की कोशिश की है, जो पहले भी कई ब्रांड्स और कंपनियाँ दे चुकी है। यानि हिंदू त्योहार को निशाना बनाकर नीचा दिखाने का यह पहला मामला नहीं है। साल 2020 में ज्वैलरी ब्रांड ‘तनिष्क’ ने दीवाली पर लव जिहाद को प्रमोट करते विज्ञापन बनाया था।

इस विज्ञापन में एक हिंदू बहू को उसकी मुस्लिम सास के साथ मिलकर गोद भराई का जश्न मनाते हुए दिखाया गया था। यह वही सेकुलर प्रोपेगेंडा है, जिसके बाद हिंदू लड़कियाँ फ्रिज और सूटकेस में मिलती हैं।

ऐसे कई ब्रांड्स और कंपनियाँ हौ जो सेकुलर विज्ञापन के नाम पर हिंदुओं का अपमान करते हैं। इसमें सभी धर्मों को एक बताते हुए हिंदुओं को कट्टर और असहिष्णु दिखाया जाता है। वहीं मुस्लिम को ‘पीड़ित’ और शांतिप्रिय दिखाते हैं और यह सब केवल हिंदू त्योहारों को निशाना बनाकर किया जाता है।

गौर करने वाली बात यह भी है कि रमजान या ईद के विज्ञापन आते हैं तो उनमें किसी और धर्म का प्रतीक या त्योहार नहीं घुसाया जाता। क्रिसमस के विज्ञापन में कभी दीवाली की झलक नहीं मिलती। लेकिन दीवाली और नवरात्रि जैसे हिंदू त्योहारों पर अक्सर बड़ी-बड़ी कंपनियाँ सेक्युलरिज्म का झंडा लेकर आ धमकती हैं।

एक्सिस बैंक का यह विज्ञापन भी उसी सोच का हिस्सा लगता है, जहाँ हिंदू त्योहारों को किसी न किसी बहाने ‘सभी के’ त्योहार में बदलने की कोशिश की जाती है। यह एक सोची-समझी मार्केटिंग रणनीति है, जिसमें कंपनियाँ जानबूझकर हिंदू पर्वों पर ही ‘सेक्युलरिज्म’ का पाठ पढ़ाती हैं।

अरुणाचल में PM मोदी ने की GST बचत उत्सव की शुरुआत, व्यापारियों से बोले- नए सुधारों से व्यापार बनेगा आसान: स्वदेशी खरीदारी का किया आह्वान किया

ईटानगर में सोमवार (22 सितम्बर 2025) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अरुणाचल प्रदेश के स्थानीय व्यापारियों, करदाताओं और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों से मुलाकात की। इस मौके पर उन्होंने हाल ही में लागू किए गए ‘अगली पीढ़ी के जीएसटी सुधारों’ को जनता के लिए दोहरा लाभ बताते हुए कहा कि अब व्यापार आसान होगा, लागत घटेगी और आम लोगों के बजट में भी राहत मिलेगी।

ईटानगर में आयोजित GST बचत उत्सव को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि 56वीं GST परिषद बैठक के बाद चार स्तरीय कर ढाँचे को सरल करते हुए अब इसे दो प्रमुख स्लैब 5% और 18% में बदल दिया गया है।

विलासिता और सेहत के लिए नुकसान दायक वस्तुओं पर 40% कर का अलग स्लैब रहेगा। पीएम मोदी ने कहा, “आज से अगली पीढ़ी के GST सुधार लागू हो गए हैं और देशभर में GST बचत उत्सव शुरू हो गया है। त्योहारों के मौसम में लोगों को दोहरा लाभ मिला है।”

स्थानीय व्यापारियों ने प्रधानमंत्री को धन्यवाद देते हुए कहा कि पहले उन्हें कई तरह के करों से जूझना पड़ता था, लेकिन एक राष्ट्र, एक कर ने व्यापार को सरल बनाया है। उनका मानना है कि निर्माण लागत घटने से आवास किफायती होंगे और स्थानीय कच्चा माल सस्ता होने से उत्पाद प्रतिस्पर्धी बनेंगे। होटल उद्योग ने उम्मीद जताई कि GST कटौती से घरेलू पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, जबकि कृषि और मत्स्य पालन क्षेत्र को भी इसका सीधा लाभ होगा।

पीएम मोदी ने व्यापारियों का उत्साह बढ़ाते हुए कहा कि वह हमेशा स्थानीय उत्पादों के ब्रांड एंबेसडर रहे हैं। उन्होंने लोगों से स्वदेशी खरीदें और स्वदेशी बेचें का आह्वान किया और जोर देकर कहा कि विकसित भारत के लक्ष्य को पाने के लिए आत्मनिर्भरता जरूरी है।

कार्यक्रम में अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने भी प्रधानमंत्री का आभार जताया और कहा कि इन सुधारों से राज्य के व्यापारियों और जनता को बड़ा लाभ मिलेगा। प्रधानमंत्री कार्यालय के मुताबिक, पीएम मोदी ने ईटानगर में 5100 करोड़ रुपए से अधिक की विकास परियोजनाओं की आधारशिला भी रखी।

इसके बाद वह त्रिपुरा स्थित माता त्रिपुरा सुंदरी मंदिर में पूजा-अर्चना और विकास कार्यों के उद्घाटन के लिए रवाना हुए। प्रधानमंत्री ने अखबारों में GST दरों में कटौती को लेकर हुई सकारात्मक कवरेज का जिक्र करते हुए कहा कि यह सुधार हर घर में खुशियाँ और रसोई के बजट में राहत लेकर आएगा। उन्होंने कहा, बाजारों से लेकर घरों तक, GST बचत उत्सव त्योहारी रौनक लेकर आया है।

लोथल में नेशनल मैरीटाइम हेरिटेज कॉम्प्लेक्स: प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता के ऐतिहासिक समुद्री ज्ञान और इंजीनियरिंग की विरासत को सहेजने में जुटी मोदी सरकार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 20 सितंबर को गुजरात का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने अहमदाबाद जिले के लोथल में बन रहे नेशनल मैरीटाइम हेरिटेज कॉम्प्लेक्स (NMHC) का जायजा लिया। पीएम मोदी ने निर्माण कार्य की प्रगति की समीक्षा की और परियोजना से जुड़ी बैठक भी की।

लोथल में एनएमएचसी परियोजना क्या है?

गुजरात के लोथल में बन रहा नेशनल मैरीटाइम हेरिटेज कॉम्प्लेक्स (NMHC) मोदी सरकार की एक पहल है। इसका उद्देश्य सिंधु-सरस्वती सभ्यता यानी इंडस वैली सिविलाइज़ेशन की समुद्री और इंजीनियरिंग उपलब्धियों को सम्मान देना है।

करीब 2400 ईसा पूर्व लोथल इस सभ्यता का एक अहम बंदरगाह शहर था। गुजरात सरकार द्वारा आवंटित 400 एकड़ जमीन पर 4,500 करोड़ रुपए की लागत से तैयार हो रहा यह प्रोजेक्ट लोथल की ऐतिहासिक धरोहर को सहेजने, पर्यटन को बढ़ावा देने और आने वाली पीढ़ियों के लिए शिक्षा का केंद्र बनाने की दिशा में काम करेगा।

अक्टूबर 2024 में केंद्र सरकार ने सागरमाला कार्यक्रम के तहत नेशनल मैरीटाइम हेरिटेज कॉम्प्लेक्स (NMHC) को मंज़ूरी दी थी। इसका मकसद प्राचीन समुद्री इंजीनियरिंग की इस अनोखी धरोहर को दुनिया के सामने लाना है। यह परियोजना विकास और विरासत संरक्षण के बीच संतुलन बनाने के साथ-साथ भारत के प्राचीन समुद्री व्यापार को नई पहचान देने पर भी जोर देती है।

यह कॉम्प्लेक्स दो चरणों में विकसित किया जा रहा है और इसमें नेशनल मैरीटाइम हेरिटेज म्यूज़ियम शामिल है, जिसमें भारत के समुद्री इतिहास को इंडस वैली सिविलाइज़ेशन से आधुनिक समय तक दिखाने वाली 14 गैलरी होंगी।

फेज 1A का काम 60% से अधिक पूरा हो चुका है और यह साल के अंत तक खुलने के लिए तैयार है। इसमें छह गैलरी शामिल हैं, जिनमें इंडियन नेवी और कोस्ट गार्ड की प्रदर्शनी भी है, जिसमें INS निशंक मिसाइल बोट, सी हैरियर विमान और UH-3 हेलिकॉप्टर जैसे ऐतिहासिक वस्त्र और मॉडल दिखाए जाएँगे। इसके अलावा इसमें लोथल का पुनर्निर्मित टाउनशिप और जेट्टी वॉकवे भी मौजूद हैं।

गुजरात के लोथल में निर्माणाधीन एनएमएचसी, देश गुजरात के माध्यम से छवि

फेज 1B में आठ और गैलरी जोड़ी जाएँगी, साथ ही 77 मीटर ऊँचा लाइटहाउस म्यूजियम बनेगा, जो दुनिया का सबसे ऊँचा म्यूज़ियम होने की योजना में है। इसमें 5D डोम थिएटर और बागीचा कॉम्प्लेक्स भी शामिल होगा, जिसमें 1500 वाहनों के लिए पार्किंग, फ़ूड कॉर्ट और मेडिकल सुविधाएँ होंगी।

फेज 2, जिसे पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के माध्यम से आठीक साहियोग किया जाएगा, जिसमें तटीय राज्यों के पवेलियन, ईको-रिज़ॉर्ट्स, लोथल शहर का पूरी तरह से पुनर्निर्मित मॉडल, एक मैरीटाइम इंस्टिट्यूट और चार थीम पार्क शामिल होंगे। ये थीम पार्क समुद्री इतिहास, जलवायु परिवर्तन, स्मारक और एडवेंचर पर केंद्रित होंगे।

इस परियोजना को बंदरगाह, शिपिंग और वाटरवे मंत्रालय और संस्कृति मंत्रालय का समर्थन प्राप्त है। इसके लिए फंडिंग मुख्य बंदरगाहों, रक्षा मंत्रालय, नेशनल कल्चर फंड और 3,000 करोड़ रुपए के निजी निवेश से की जा रही है। वहीं, लाइटहाउस म्यूज़ियम का वित्तपोषण डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ लाइटहाउस और लाइटशिप्स (DGLL) करेगा।

आर्थिक दृष्टि से, नेशनल मैरीटाइम हेरिटेज कॉम्प्लेक्स (NMHC) रोज़ाना 25,000 पर्यटकों को आकर्षित करने की उम्मीद है। इससे सीधे और अप्रत्यक्ष रूप से 22,000 नौकरियाँ पैदा होंगी और क्षेत्र की स्थानीय उद्योगों को भी बढ़ावा मिलेगा। इसका उद्देश्य लोथल को भारत के प्रमुख हेरिटेज पर्यटन स्थलों के बराबर एक बड़ा पर्यटन केंद्र बनाना है।

लोथल का महत्व: यह भारत के समृद्ध समुद्री इतिहास का प्रमाण कैसे है

लोथल सिंधु-सरस्वती सभ्यता का एक प्रमुख स्थल है। यह दिखाता है कि प्राचीन भारतीय सभ्यता कैसे सिंधु नदी से फैलकर सरस्वती के किनारे फली-फूली और उत्तर-पश्चिम भारत तक विकसित हुई। इस सभ्यता ने व्यापार, शिल्पकला, नगर योजना और संस्कृति में अपनी विरासत की निरंतरता को बनाए रखा।

लोथल, गुजरात के भाल क्षेत्र में खंभात की खाड़ी के पास स्थित है और यहाँ दुनिया का सबसे पुराना मानव निर्मित डॉकयार्ड है। इसमें 214 मीटर लंबा और 36 मीटर चौड़ा ट्रैपेज़ॉइडल बेसिन है, जिसकी लंबवत ईंट की दीवारें हैं और यह साबरमती नदी से इनलेट और आउटलेट चैनलों के जरिए जुड़ा हुआ है।

सिंधु-सरस्वती सभ्यता के लोग जल प्रबंधन और योजना बनाने में अत्यंत कुशल थे। लोथल का डॉकयार्ड क्षेत्र में उच्च ज्वार-भाटा को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया था और इसमें सिल्ट जमाव को रोकने के लिए स्पिल चैनल भी बनाया गया था।

लोथल में प्रारंभिक उत्खनन 1955 से 1962 के बीच किए गए थे। इस उत्खनन परियोजना का नेतृत्व एस आर राव ने किया था, जिन्हें अपने जीवन में 30 हड़प्पा स्थलों की खोज करने का श्रेय दिया जाता है। राव ने लोथल के महत्व को बताते हुए इसे पेन म्यूज़ीअम एक्स्पिडिशन मैगजीन (Penn Museum’s Expedition Magazine) में लिखा था।

“हड़प्पावासियों द्वारा निर्मित पकी हुई ईंटों की अब तक की सबसे बड़ी संरचना लोथल में रखी गई थी, जिसका उपयोग जहाजों को खड़ा करने और माल को संभालने के लिए बर्थ के रूप में किया जाता था… मूल रूप से, गोदी को 18 मीटर से 20 मीटर लंबे और 4 से 6 मीटर चौड़े जहाजों को जलद्वार में डालने के लिए डिज़ाइन किया गया था… कम से कम दो जहाज एक साथ प्रवेश द्वार से गुजर सकते थे…”

कुछ पश्चिमी विशेषज्ञ इस बात से संतुष्ट नहीं थे कि लोथल एक डॉकयार्ड हो सकता है। हालाँकि, IIT गाँधी नगर के हालिया अध्ययन ने सैटेलाइट इमेजरी की मदद से दिखाया कि डॉकयार्ड और बंदरगाह की थ्योरी अधिक सही है। सैटेलाइट इमेजरी ने साबरमती की पुरानी नहरों को उजागर किया, जो लोथल के ठीक पास बहती थीं, जैसा कि इंडियन एक्सप्रेस ने बताया। समय के साथ नदी का मार्ग बदल गया और यह स्थल से दूर चली गई, जिससे लोथल का डॉकयार्ड असामान्य स्थिति में रह गया। जब पुरानी नहरें बहती थीं, तब नावें आसानी से लोथल से धोलाविरा तक जा सकती थीं, जो रण ऑफ कच्छ में एक अन्य महत्वपूर्ण IVC स्थल है।

IIT गाँधी नगर के अध्ययन, प्रोफेसर वी एन प्रभाकर, प्रोफेसर विक्रांत जैन और एकता गुप्ता द्वारा किया गया, राव की लिखी बातों की पुष्टि करता है। साबरमती की पुरानी नहरों का प्रवाह लोथल को भूगोलिक दृष्टि से सुविधाजनक स्थान प्रदान करता था, जो सक्रिय व्यापार नेटवर्क के केंद्र में था। यह नेटवर्क अरब सागर के भारतीय बंदरगाहों, खासकर खंभात की खाड़ी, से शुरू होकर प्राचीन मेसोपोटामिया तक फैला हुआ था।

आईआईटी गाँधी नगर के अध्ययन में साबरमती के पुराने चैनलों के उपग्रह साक्ष्य मिले

इस थ्योरी को लोथल और आसपास के क्षेत्र से मिले प्राचीन मुहरों (seals) की संख्या भी समर्थन देती है। रिपोर्ट के अनुसार, यह संख्या सौराष्ट्र के किसी भी अन्य स्थल से अधिक है। इन मुहरों का इस्तेमाल माल ढोने के पैकेज, व्यापार दस्तावेज और पत्रों पर चिह्न लगाने के लिए किया जाता था।

लोथल में कई चरणों में आबादी और पुनर्स्थापनाएँ हुईं। इस क्षेत्र का धीरे-धीरे पतन मुख्य रूप से साबरमती नदी के विनाशकारी बाढ़ और नदी के मार्ग बदलने के कारण हुआ, जिससे डॉकयार्ड सूख गया।

राव ने लिखा कि लगभग 2000 ईसा पूर्व की एक बड़ी बाढ़ के बाद यह फलता-फूलता शहर तबाह हो गया और बचे रह गए केवल कुछ लोग और असंगठित गाँव। फिर 1900 ईसा पूर्व एक और बड़ी बाढ़ ने इस स्थल को स्थायी रूप से नष्ट कर दिया।

नेशनल मैरीटाइम हेरिटेज कॉम्प्लेक्स (NMHC) इंडस वैली सभ्यता की समुद्री और इंजीनियरिंग क्षमताओं की विरासत को संरक्षित करेगा, साथ ही आर्थिक विकास और सांस्कृतिक जागरूकता को बढ़ावा देगा।

उन लोगों के लिए, जो अपनी समुद्री विरासत से दूर हो गए हैं, NMHC हमारी शिपबिल्डिंग और समुद्री व्यापार की समृद्ध परंपरा तक पहुँच का माध्यम बनेगा। उन्नत तकनीक और सोच-समझकर डिजाइन के जरिए NMHC सुनिश्चित करेगा कि लोथल का ऐतिहासिक महत्व भविष्य की पीढ़ियों यानी सिंधु-सरस्वती सभ्यता के वंशजों तक सुलभ और जीवंत रहे।


(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में संघमित्रा ने लिखी है। इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)